खाकसार आंदोलन
मुख्य लेख : मुस्लिम सुधार आंदोलन
परिचय
खाकसार आंदोलन ब्रिटिश भारत का एक प्रमुख सामाजिक, राजनीतिक और स्वतंत्रता-समर्थक आंदोलन था, जिसका केंद्र लाहौर, पंजाब में था और जिसकी स्थापना 1931 ई. में अल्लामा इनायतुल्लाह ख़ान मशरिक़ी ने की थी। आंदोलन का प्रमुख उद्देश्य भारत को ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन से मुक्त कराना, हिंदू-मुस्लिम सहयोग पर आधारित शासन तथा राष्ट्रीय एकता स्थापित करना, सामाजिक समानता कायम करना तथा जनता में अनुशासन और सेवा की भावना विकसित करना था। खाकसार आंदोलन भारत के विभाजन का विरोध करता था और धर्म के आधार पर विभाजन के बजाय एक संयुक्त भारत का समर्थक था। इसकी सदस्यता धर्म, जाति, नस्ल और सामाजिक स्थिति के किसी भी भेदभाव के बिना सभी लोगों के लिए खुली थी और इसके लिए कोई सदस्यता शुल्क भी नहीं लिया जाता था- मानव जाति के भाईचारे पर विशेष बल दिया गया था।
अल्लामा इनायतुल्लाह ख़ान मशरिक़ी : प्रारंभिक जीवन
इनायतुल्लाह ख़ान मशरिक़ी, जिन्हें सामान्यतः अल्लामा मशरिक़ी के नाम से जाना जाता है, बीसवीं शताब्दी के प्रमुख मुस्लिम बुद्धिजीवी, गणितज्ञ, इस्लामी विद्वान और राजनीतिक कार्यकर्ता थे। उनका जन्म 25 अगस्त 1888 ई. को अमृतसर में एक शिक्षित परिवार में हुआ था। प्रारंभिक और उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने कैंब्रिज विश्वविद्यालय में अध्ययन किया तथा गणित, प्राकृतिक विज्ञान, ओरिएंटल भाषाओं और यांत्रिक विज्ञान सहित विभिन्न विषयों में उल्लेखनीय शैक्षणिक उपलब्धियाँ प्राप्त कीं।
भारत लौटने के बाद मशरिक़ी ने शिक्षा के क्षेत्र में कार्य किया। वे इस्लामिया कॉलेज, पेशावर से जुड़े थे और बाद में सरकारी शिक्षा सेवा में भी कार्यरत रहे। वर्ष 1930 ई. में उन्होंने सरकारी सेवा से त्यागपत्र देकर अपना जीवन सामाजिक सुधार और राजनीतिक संगठन के कार्यों के लिए समर्पित कर दिया।
खाकसार आंदोलन की स्थापना और वैचारिक पृष्ठभूमि
‘खाकसार’ शब्द फ़ारसी भाषा के ‘ख़ाक’ और ‘सार’ शब्दों से बना है, जिसका सामान्य अर्थ है विनम्र सेवक अथवा धूल के समान स्वयं को तुच्छ समझने वाला व्यक्ति। यह नाम विनम्रता, सेवा, आत्मत्याग और सामाजिक समानता की भावना का प्रतीक था। आंदोलन का उद्देश्य केवल राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त करना नहीं था, बल्कि समाज में समानता, अनुशासन, आत्मनिर्भरता, नैतिक सुधार और सेवा की भावना विकसित करना भी था। यह संगठन धार्मिक, जातीय और सामाजिक भेदभाव से ऊपर उठकर लोगों को एकजुट करने पर बल देता था।
आंदोलन की वैचारिक पृष्ठभूमि अल्लामा मशरिक़ी की पुस्तकों ‘तज़किरा’ और ‘इशारात’ से जुड़ी हुई थी। 1924 ई. में प्रकाशित ‘तज़किरा’ में उन्होंने धर्म, विज्ञान, इतिहास और सामाजिक विकास के संबंधों पर अपने विचार प्रस्तुत किए थे; बाद में इन्हीं विचारों को संगठित रूप देकर खाकसार आंदोलन की स्थापना की गई। सरकारी सेवा से त्यागपत्र देने (1930 ई.) के बाद मशरिक़ी ने संगठन को व्यवस्थित रूप देना आरंभ किया और 1931 ई. में लाहौर में औपचारिक रूप से खाकसार तहरीक की स्थापना हुई। आंदोलन का उद्देश्य अनुशासन, आत्मनिर्भरता, सामाजिक सेवा और राजनीतिक जागरूकता के माध्यम से भारतीय समाज को संगठित करना था।
आंदोलन के प्रमुख उद्देश्य
खाकसार आंदोलन का एक महत्त्वपूर्ण उद्देश्य भारत से ब्रिटिश शासन का अंत करना और देश में स्वशासन की स्थापना करना था। इसके साथ ही संगठन समाज में व्याप्त असमानता और भेदभाव को समाप्त कर सामाजिक एकता और भाईचारे को बढ़ावा देना चाहता था। माश़रिकी विभिन्न समुदायों, विशेषकर हिंदुओं और मुसलमानों, के बीच सहयोग और एकता को आवश्यक मानते थे। अल्लामा मशरिक़ी ने आंदोलन के मूल उद्देश्यों में ईश्वर की सर्वोच्चता, राष्ट्रीय एकता और मानवता की सेवा को विशेष महत्त्व दिया। उनका विचार था कि समाज की उन्नति के लिए व्यक्ति में आत्मानुशासन, परिश्रम, सेवा और त्याग की भावना होना आवश्यक है।

खाकसार संगठन की सदस्यता व्यापक रूप से सभी समुदायों के लिए खुली थी और इसके कार्यकर्ता राहत तथा जनसेवा के कार्यों में भाग लेते थे। संगठन का जोर आत्म-अनुशासन, श्रम और समाज के प्रति जिम्मेदारी पर था। खाकसार आंदोलन सामाजिक असमानता, जातिगत भेदभाव और आर्थिक विषमता को कम करने का समर्थक था और इसके कार्यकर्ताओं को धर्म-जाति से ऊपर उठकर मानवता की सेवा करने के लिए प्रेरित किया जाता था। आंदोलन का उद्देश्य भारतीय समाज को संगठित कर ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध एक मजबूत जनशक्ति तैयार करना था।
संगठनात्मक संरचना और अनुशासन
खाकसार आंदोलन अपनी कठोर अनुशासन व्यवस्था और अर्धसैनिक शैली के लिए प्रसिद्ध था। आंदोलन के स्वयंसेवकों को नियमित रूप से शारीरिक प्रशिक्षण, परेड और सामाजिक सेवा में भाग लेना पड़ता था। संगठन में अल्लामा मशरिक़ी को ‘खाकसार-ए-आज़म’ अर्थात् सर्वोच्च नेता का स्थान प्राप्त था और संगठन की संरचना अत्यधिक केंद्रीकृत थी, महत्त्वपूर्ण निर्णयों में उनकी भूमिका निर्णायक होती थी। आंदोलन की विचारधारा और निर्देशों के प्रचार के लिए ‘अल-इस्लाह’ नामक साप्ताहिक समाचारपत्र भी प्रकाशित किया जाता था। मूल विवरणों के अनुसार सदस्यों से अपने नेता और आंदोलन के प्रति पूर्ण निष्ठा तथा बलिदान की भावना रखने की अपेक्षा की जाती थी। आंदोलन के विस्तार के साथ बड़ी संख्या में युवा और अन्य सामाजिक वर्गों के लोग इससे जुड़े।
खाकसार आंदोलन की इस संगठनात्मक और अर्धसैनिक शैली के कारण ब्रिटिश प्रशासन तथा कुछ पश्चिमी पर्यवेक्षकों ने इसकी तुलना यूरोप के फासीवादी आंदोलनों से की। यद्यपि इस प्रकार की तुलना विवादास्पद रही है और खाकसार आंदोलन की अपनी विशिष्ट भारतीय राजनीतिक एवं सामाजिक पृष्ठभूमि थी।
खाकी वर्दी और फावड़े का प्रतीक
खाकसार आंदोलन की सबसे विशिष्ट पहचान उसके सदस्यों की खाकी वर्दी और बेलचा (फावड़ा) थी। रैंक चाहे जो भी हो, सभी सदस्य एक जैसी वर्दी पहनते थे। खाकी पायजामे के साथ एक खाकी शर्ट, बेल्ट और सैन्य जूते। खाकी रंग इसलिए चुना गया था क्योंकि यह ‘सरल और निर्विवाद’ था तथा ‘सस्ता और सभी के लिए सुलभ’ भी था, यद्यपि व्यवहार में वर्दी के लिए सदस्यों को संगठन को भुगतान करना होता था। भाईचारे (अखुव्वत) के प्रतीक के रूप में सदस्य अपनी दाहिनी भुजा पर एक लाल पट्टी (बैज) पहनते थे। सिर पर वे अरबों और हाजियों की तरह एक सफेद रूमाल, ढाई गज लंबा-चौड़ा, कपास के धागे वाला सफेद कपड़ा बाँधते थे, यद्यपि कुछ सदस्य पश्तून शैली की पगड़ी भी पहना करते थे। यह वर्दी सभी सदस्यों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति से परे समानता और सादगी का प्रतीक मानी जाती थी।
सभी खाकसार एकता और शक्ति के संकेत के रूप में एक बेलचा (फावड़ा) रखते थे। बेलचा नम्रता, श्रम, आत्मनिर्भरता और जनसेवा का भी प्रतिनिधित्व करता था। जिस प्रकार यह उबड़-खाबड़ ज़मीन को समतल करने के काम आता है, उसी प्रकार खाकसारों ने इसे समाज को ‘समतल’ करने, अर्थात् अमीर-गरीब के बीच की मौजूदा खाई को मिटाकर समानता स्थापित करने के प्रतीक के रूप में अपनाया। खाकसार का ध्वज एक संशोधित तुर्क प्रतीक था, जिसमें लाल पृष्ठभूमि पर एक सितारा और कोने में चंद्रमा अंकित था।
आंदोलन का विस्तार
खाकसार आंदोलन ने अपने प्रारंभिक वर्षों में तेजी से विस्तार किया। लाहौर के निकट इचहरा से आरंभ होकर यह आंदोलन भारत के अनेक क्षेत्रों में फैल गया। विभिन्न समकालीन स्रोतों में इसके सदस्यों की संख्या को लेकर अलग-अलग दावे मिलते हैं। कुछ रिपोर्टों में इसके समर्थकों और स्वयंसेवकों की संख्या लाखों में बताई गई है तथा महिलाओं की भागीदारी का भी उल्लेख मिलता है। 1940 के दशक के प्रारंभ तक इसे एक बड़े जनसंगठन के रूप में देखा जाने लगा था और इसका प्रभाव पंजाब, संयुक्त प्रांत और सिंध सहित कई क्षेत्रों में दिखाई देता था। इसकी सदस्यता में विभिन्न सामाजिक वर्गों के लोग शामिल थे, और संगठन ने अनुशासन, जनसेवा और राजनीतिक जागरूकता के माध्यम से अपनी अलग पहचान बनाई। आंदोलन का प्रभाव भारत के बाहर अफ़ग़ानिस्तान, इराक और ईरान तक पहुँचने के दावे भी उस समय की कुछ रिपोर्टों में किए गए थे।
ब्रिटिश सरकार के साथ संघर्ष
खाकसार आंदोलन की तीव्र वृद्धि और उसकी अर्धसैनिक शैली ने ब्रिटिश सरकार को चिंतित कर दिया। आंदोलन की कठोर संगठनात्मक व्यवस्था और सार्वजनिक परेडों के कारण ब्रिटिश प्रशासन इसे संभावित राजनीतिक चुनौती के रूप में देखने लगा। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान ब्रिटिश सरकार खाकसार आंदोलन को संदेह की दृष्टि से देखने लगी। सितंबर 1942 ई. में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान कांग्रेस के प्रमुख नेताओं की गिरफ्तारी के कुछ समय बाद, ब्रिटिश प्रशासन ने खाकसार गतिविधियों पर भी कड़ी कार्रवाई की। सरकार को आशंका थी कि खाकसार संगठन देशभर की जेलों पर हमले जैसी योजनाओं के माध्यम से ब्रिटिश शासन के विरुद्ध व्यापक कार्रवाई कर सकता है। इस दौरान अल्लामा मशरिक़ी और उनके अनुयायियों की गतिविधियों पर विशेष निगरानी रखी गई; कुछ विवरणों के अनुसार खाकसार स्वयंसेवकों को गुप्त गतिविधियों के लिए तैयार रहने और अपनी पहचान छिपाने के निर्देश दिए गए थे। ब्रिटिश साम्राज्यवादी प्रशासन मशरिक़ी को एक प्रभावशाली और संभावित राजनीतिक चुनौती के रूप में देखता था।
खाकसार आंदोलन और ब्रिटिश सरकार के बीच तनाव लगातार बढ़ता गया। अल्लामा मशरिक़ी और उनके अनेक अनुयायियों को कई बार गिरफ्तार किया गया। मशरिक़ी को लंबे समय तक हिरासत में रखा गया और उन्होंने अपनी गिरफ्तारी के विरोध में भूख हड़ताल भी की। बाद में उन्हें रिहा किया गया, लेकिन उनकी गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाए गए।
लाहौर खाकसार घटना (1940 ई.)
मार्च 1940 ई. में खाकसार आंदोलन और ब्रिटिश प्रशासन के बीच तनाव अपने चरम पर पहुँच गया। पंजाब सरकार ने गैर-सरकारी संगठनों की सैन्य शैली की परेडों, वर्दियों और सार्वजनिक गतिविधियों पर प्रतिबंध लगा दिया था। 19 मार्च 1940 ई. को खाकसार स्वयंसेवकों ने इन प्रतिबंधों के बावजूद लाहौर में मार्च निकाला। इसके बाद पुलिस और खाकसार स्वयंसेवकों के बीच संघर्ष हुआ, जिसमें पुलिस कार्रवाई में अनेक खाकसार कार्यकर्ता मारे गए। इस घटना ने आंदोलन और ब्रिटिश सरकार के संबंधों को और अधिक तनावपूर्ण बना दिया। बाद में अल्लामा मशरिक़ी को गिरफ्तार कर हिरासत में रखा गया और संगठन की गतिविधियों पर कड़ी निगरानी रखी गई।
खाकसार आंदोलन और हिटलर से तुलना
24 सितंबर 1942 ई. को ब्रिटिश भारतीय विधानमंडल में खाकसार आंदोलन की प्रकृति और उसकी संगठनात्मक शैली पर चर्चा हुई। कुछ सदस्यों ने यह प्रश्न भी उठाया कि क्या यूरोप के नाज़ी आंदोलन और खाकसार आंदोलन की सैन्य अनुशासन वाली शैली के बीच कोई प्रभाव या समानता थी। यद्यपि यह कहना कि एडॉल्फ हिटलर ने अपने नाज़ी आंदोलन की प्रेरणा सीधे अल्लामा मशरिक़ी के खाकसार आंदोलन से ली थी, एक विवादास्पद दावा है और इसे स्थापित ऐतिहासिक तथ्य के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता, दोनों आंदोलनों की वैचारिक पृष्ठभूमि और राजनीतिक परिस्थितियाँ भिन्न थीं।
खाकसार आंदोलन और भारत का विभाजन
खाकसार आंदोलन का एक प्रमुख राजनीतिक सिद्धांत भारत की एकता था। अल्लामा मशरिक़ी ब्रिटिश शासन के कट्टर विरोधी और भारतीय स्वतंत्रता के समर्थक होने के साथ-साथ भारत के विभाजन के भी प्रबल विरोधी थे तथा उपमहाद्वीप की एकता के पक्षधर माने जाते थे। वे और उनके अनुयायी धर्म के आधार पर विभाजन के विरुद्ध थे और हिंदुओं-मुसलमानों के बीच सहयोग तथा ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संयुक्त संघर्ष के समर्थक थे। इसी कारण खाकसार आंदोलन के अनेक कार्यकर्ता भारत के विभाजन की योजना के विरोध में सक्रिय रहे।
इसके विपरीत, मुहम्मद अली जिन्ना के नेतृत्व में मुस्लिम लीग ने द्वि-राष्ट्र सिद्धांत के आधार पर मुसलमानों के लिए एक अलग राष्ट्र की मांग को आगे बढ़ाया। इस प्रकार खाकसार आंदोलन और मुस्लिम लीग के बीच भारत के राजनीतिक भविष्य को लेकर गहरे मतभेद उत्पन्न हो गए। खाकसार एक संयुक्त भारत के समर्थक थे, जबकि मुस्लिम लीग पाकिस्तान की स्थापना की दिशा में आगे बढ़ रही थी। भारत का विभाजन केवल हिंदू-मुस्लिम समुदायों के बीच राजनीतिक संघर्ष का परिणाम नहीं था, बल्कि मुस्लिम समाज और मुस्लिम राजनीतिक संगठनों के भीतर भी भविष्य के भारत को लेकर गंभीर मतभेद मौजूद थे। खाकसार आंदोलन और मुस्लिम लीग के बीच का यह वैचारिक संघर्ष इस बात स्पष्ट परिचायक है।
भारत के विभाजन के समय खाकसार आंदोलन ने संयुक्त भारत की अपनी मूल नीति का समर्थन जारी रखा। विभाजन के दौरान फैली व्यापक सांप्रदायिक हिंसा में हिंदू, मुस्लिम और सिख समुदायों के लाखों लोग प्रभावित हुए। कुछ विवरणों के अनुसार खाकसार स्वयंसेवकों ने इस हिंसा से प्रभावित लोगों की सहायता और सुरक्षा के लिए भी कार्य किया, तथा संगठन के कार्यकर्ताओं ने धार्मिक पहचान से ऊपर उठकर पीड़ित लोगों की मदद करने का प्रयास किया।
जिन्ना पर हमले के प्रयास (1943 और 1947 ई.)
खाकसार आंदोलन और मुस्लिम लीग के बीच राजनीतिक मतभेदों के कारण दोनों के संबंध लगातार तनावपूर्ण होते गए, जो दो बार मुहम्मद अली जिन्ना पर हमले के प्रयासों में परिणत हुए।
पहला प्रयास लगभग 1943 ई. में हुआ, जब रफ़ीक़ साबिर मज़ंगवी नामक व्यक्ति ने मुंबई स्थित जिन्ना के निवास पर उन पर हमला करने का प्रयास किया। मुस्लिम लीग ने उस समय आरोप लगाया कि इस हमले के पीछे अल्लामा मशरिक़ी का हाथ था, यद्यपि मशरिक़ी ने इस आरोप का स्पष्ट रूप से खंडन किया। इस घटना के बाद मुस्लिम लीग और खाकसार आंदोलन के बीच दूरी और बढ़ गई।
दूसरा और अधिक गंभीर प्रयास 9 जून 1947 ई. को हुआ, जब दिल्ली के इंपीरियल होटल में मुस्लिम लीग के नेताओं की एक महत्त्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई थी, जिसका उद्देश्य ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रस्तुत भारत-विभाजन योजना को औपचारिक रूप से स्वीकार करने संबंधी प्रस्ताव पर निर्णय लेना था। बैठक में प्रस्ताव पारित होने के बाद अचानक खाकसार आंदोलन से जुड़े लगभग 50 सशस्त्र लोग होटल परिसर में घुस आए। बताया जाता है कि वे अमेरिकी सेना की जीपों में सवार होकर वहाँ पहुँचे थे। इसके बाद होटल परिसर में हिंसक संघर्ष शुरू हो गया, जिसमें चाकू, खंजर, फावड़े, रिवॉल्वर और राइफलों जैसे हथियारों का प्रयोग हुआ। खाकसार कार्यकर्ता भारत के विभाजन की योजना स्वीकार करने के कारण मुहम्मद अली जिन्ना के विरोध में थे और उन पर हमला करना चाहते थे।
इस हमले के दौरान मुस्लिम लीग के स्वयंसेवी सुरक्षा कर्मियों ने जिन्ना को चारों ओर से घेरकर उनकी सुरक्षा की। पुलिस ने भी स्थिति को नियंत्रित करने के लिए संगीनों का प्रदर्शन किया और हमलावरों को रोकने के लिए आँसू गैस के गोले छोड़े। संघर्ष में मुस्लिम लीग के कई सुरक्षा कर्मियों तथा कम-से-कम एक खाकसार कार्यकर्ता के गंभीर रूप से घायल होने की सूचना मिली। हमला विफल होने के बाद जिन्ना सुरक्षित बच गए और उन्होंने आँसू गैस से भरे होटल परिसर में मुस्लिम लीग द्वारा पारित प्रस्ताव को पढ़ा। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार उस समय होटल का वातावरण किसी युद्धभूमि जैसा दिखाई दे रहा था और आँसू गैस के धुएँ के कारण वहाँ उपस्थित लोगों की आँखों से आँसू बह रहे थे। घटना के कुछ ही घंटों बाद पुलिस ने अल्लामा मशरिक़ी की तलाश शुरू कर दी।
इन दोनों घटनाओं ने स्पष्ट कर दिया कि भारत के विभाजन और मुस्लिम राजनीति के प्रश्न पर उस समय मुस्लिम समाज के भीतर भी गंभीर राजनीतिक मतभेद मौजूद थे।
खाकसार आंदोलन का विघटन
जैसे-जैसे भारत का विभाजन निकट आता गया, खाकसार आंदोलन की राजनीतिक स्थिति कमजोर होती गई। अंततः 4 जुलाई 1947 ई. को अल्लामा मशरिक़ी ने खाकसार तहरीक को भंग कर दिया। उनका यह निर्णय उस समय की बदलती राजनीतिक परिस्थितियों और पाकिस्तान की मांग को मिल रहे व्यापक समर्थन की पृष्ठभूमि में लिया गया था। भारत के विभाजन के बाद अल्लामा मशरिक़ी पाकिस्तान चले गए, जहाँ उन्होंने बाद में एक नए राजनीतिक संगठन के माध्यम से अपनी राजनीतिक गतिविधियों को जारी रखने का प्रयास किया। भारत में खाकसार संगठन पर बाद के वर्षों में प्रतिबंध लगा दिया गया।
अल्लामा मशरिक़ी का ऐतिहासिक महत्त्व
अल्लामा इनायतुल्लाह ख़ान मशरिक़ी भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के उन नेताओं में थे जिन्होंने ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन का विरोध किया और अनुशासन, संगठन तथा जनसेवा के माध्यम से राजनीतिक परिवर्तन लाने का प्रयास किया। उनका खाकसार आंदोलन मुख्यधारा के कांग्रेस और मुस्लिम लीग जैसे संगठनों से अलग अपनी विशिष्ट राजनीतिक पहचान रखता था और इसने औपनिवेशिक भारत में अनुशासन, सामाजिक सुधार, जनसेवा और राष्ट्रीय एकता जैसे विचारों को संगठित रूप में प्रस्तुत किया। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में इसकी गतिविधियों और विचारधारा ने इसे तत्कालीन राजनीतिक परिदृश्य का एक उल्लेखनीय संगठन बनाया।
खाकसार आंदोलन की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता यह थी कि उसने राष्ट्रीय एकता, सामाजिक समानता, श्रम और अनुशासन पर विशेष बल दिया। आंदोलन की अर्धसैनिक शैली और कठोर नेतृत्व संरचना विवाद का विषय रही, लेकिन ब्रिटिश भारत के राजनीतिक इतिहास और मुस्लिम राजनीतिक आंदोलनों के अध्ययन में इसका महत्त्वपूर्ण स्थान है।
खाकसार आंदोलन से संबंधित महत्त्वपूर्ण FAQs
1. खाकसार आंदोलन क्या था?
खाकसार आंदोलन ब्रिटिश भारत का एक सामाजिक, राजनीतिक और स्वतंत्रता-समर्थक आंदोलन था। इसका उद्देश्य ब्रिटिश शासन का विरोध करना, सामाजिक समानता स्थापित करना, अनुशासन को बढ़ावा देना और भारत की राष्ट्रीय एकता को मजबूत करना था।
2. खाकसार आंदोलन की स्थापना किसने और कब की?
खाकसार आंदोलन की स्थापना अल्लामा इनायतुल्लाह ख़ान मशरिक़ी ने वर्ष 1931 में की थी। उन्होंने इस आंदोलन को संगठित अनुशासन, सामाजिक सेवा और राष्ट्रीय जागरूकता के आधार पर विकसित किया।
3. खाकसार आंदोलन का प्रमुख प्रतीक क्या था?
खाकसार आंदोलन का प्रमुख प्रतीक बेलचा या फावड़ा था। यह श्रम, विनम्रता, आत्मनिर्भरता और सामाजिक समानता का प्रतीक माना जाता था। आंदोलन के स्वयंसेवक खाकी वर्दी पहनते थे और बेलचा अपने साथ रखते थे।
4. खाकसार आंदोलन का भारत विभाजन के प्रति क्या दृष्टिकोण था?
खाकसार आंदोलन भारत के विभाजन का विरोधी था। अल्लामा मशरिक़ी एक संयुक्त भारत के समर्थक थे और धार्मिक आधार पर भारत के विभाजन के विरुद्ध थे।
5. खाकसार आंदोलन और ब्रिटिश सरकार के बीच संघर्ष क्यों हुआ?
खाकसार आंदोलन की तीव्र वृद्धि, कठोर अनुशासन और अर्धसैनिक शैली ने ब्रिटिश सरकार को चिंतित कर दिया था। इसी कारण आंदोलन के नेताओं और कार्यकर्ताओं को कई बार गिरफ्तार किया गया तथा इसकी गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाए गए।
6. खाकसार आंदोलन का अंत कब हुआ?
अल्लामा मशरिक़ी ने बदलती राजनीतिक परिस्थितियों के कारण 4 जुलाई 1947 को खाकसार तहरीक को औपचारिक रूप से भंग कर दिया। इसके बाद भारत के विभाजन और पाकिस्तान के गठन के साथ आंदोलन का मूल स्वरूप समाप्त हो गया।


