राधा स्वामी सत्संग ब्यास (RSSB)
मुख्य लेख : राधा स्वामी समाज
राधा स्वामी सत्संग ब्यास संत मत परंपरा से संबंधित एक प्रमुख आध्यात्मिक संगठन है। इसकी स्थापना 1891 ई. में पंजाब में संत जयमल सिंह ने की थी। इसका मुख्यालय पंजाब में ब्यास नदी के तट पर स्थित डेरा बाबा जयमल सिंह है। यह राधा स्वामी आंदोलन की प्रमुख शाखाओं में से एक है और समय के साथ इसका विस्तार भारत के बाहर अनेक देशों तक हुआ है।
राधा स्वामी सत्संग ब्यास की प्रमुख शिक्षाएँ
राधा स्वामी सत्संग ब्यास की शिक्षाओं का केंद्रीय सिद्धांत यह है कि आत्मा को उसके दिव्य स्रोत की ओर ले जाने के लिए एक जीवित आध्यात्मिक गुरु या सतगुरु का मार्गदर्शन आवश्यक है। संगठन की आध्यात्मिक साधना का प्रमुख आधार ‘सूरत शब्द योग’ है, जिसके माध्यम से साधक आत्मा को आंतरिक ‘शब्द’ या ध्वनि-धारा से जोड़ने का प्रयास करता है। दीक्षित अनुयायियों से नियमित ध्यान, शाकाहारी जीवन, नशीले पदार्थों से परहेज और नैतिक आचरण का पालन करने की अपेक्षा की जाती है। ब्यास स्थित मुख्य केंद्र समय के साथ एक छोटे आश्रम से विकसित होकर विशाल और सुव्यवस्थित आध्यात्मिक नगर के रूप में परिवर्तित हुआ। बड़े सत्संगों के दौरान देश-विदेश से बड़ी संख्या में अनुयायी यहाँ आते हैं। संगठन आध्यात्मिक गतिविधियों के साथ-साथ स्वास्थ्य सेवाओं, आपदा राहत, सामुदायिक सहायता, शिक्षा और अन्य सामाजिक-कल्याण कार्यों में भी सक्रिय रहा है।
स्थापना की पृष्ठभूमि
राधा स्वामी सत्संग ब्यास की स्थापना का संबंध राधा स्वामी मत के प्रवर्तक संत शिव दयाल सिंह और उनके प्रमुख शिष्य जयमल सिंह से है। शिव दयाल सिंह ने 1861 ई. में आगरा में अपनी आध्यात्मिक शिक्षाओं का प्रचार आरंभ किया था। जयमल सिंह को 1856 ई. में उनसे दीक्षा मिली थी। 1878 ई. में शिव दयाल सिंह के निधन के बाद जयमल सिंह ने पंजाब क्षेत्र में उनकी शिक्षाओं का प्रचार-प्रसार किया।
ब्रिटिश भारतीय सेना से सेवानिवृत्त होने के बाद जयमल सिंह ब्यास नदी के पश्चिमी तट पर स्थित एक अपेक्षाकृत निर्जन स्थान में रहने लगे। उन्होंने वहाँ एक साधारण मिट्टी की झोपड़ी बनाई और ध्यान तथा आध्यात्मिक साधना में अपना जीवन समर्पित कर दिया। धीरे-धीरे उनके बारे में लोगों को जानकारी होने लगी और अनुयायियों का एक समूह उनके आसपास एकत्र होने लगा। इसी संगति से आगे चलकर सत्संग की परंपरा विकसित हुई।
डेरा बाबा जयमल सिंह की स्थापना
जयमल सिंह (1839–1903 ई.) राधा स्वामी सत्संग ब्यास के संस्थापक और प्रथम गुरु थे। ब्रिटिश भारतीय सेना से सेवानिवृत्त होने के बाद उन्होंने ब्यास में अपना आध्यात्मिक केंद्र स्थापित किया। इसी कारण ब्यास में विकसित होने वाले आध्यात्मिक केंद्र को बाद में डेरा बाबा जयमल सिंह के नाम से जाना गया। उन्होंने सादगी, ध्यान और आध्यात्मिक साधना पर आधारित जीवन व्यतीत किया तथा धीरे-धीरे अनुयायियों का एक समुदाय उनके आसपास विकसित हुआ। 1898 ई. में सावन सिंह ने, जो पेशे से सिविल इंजीनियर थे और आगे चलकर जयमल सिंह के उत्तराधिकारी बने, यहाँ पहला सामुदायिक कुआँ बनवाया। इसके बाद एक छोटा सत्संग भवन और अतिथि-कक्ष भी तैयार किए गए। जयमल सिंह के जीवन के अंतिम वर्षों तक अनुयायियों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हो चुकी थी। 1903 ई. में उनके निधन तक ब्यास में एक संगठित आध्यात्मिक समुदाय की मजबूत आधारशिला स्थापित हो चुकी थी।
सावन सिंह का नेतृत्व और विस्तार
1903 ई. में सावन सिंह (1858–1948 ई.) ने जयमल सिंह के उत्तराधिकारी के रूप में संगठन का नेतृत्व संभाला। उनके अनुयायी उन्हें ‘ग्रेट मास्टर’ या ‘महान गुरु’ के नाम से संबोधित करते थे। इंजीनियरिंग की पृष्ठभूमि और संगठनात्मक क्षमता के कारण उन्होंने डेरा के भौतिक तथा प्रशासनिक विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके नेतृत्व में ब्यास की छोटी बस्ती का क्रमशः विस्तार हुआ और भारत के विभिन्न क्षेत्रों के साथ-साथ विदेशों से भी अनुयायी यहाँ आने लगे। सावन सिंह ने एक बड़े सत्संग भवन की योजना बनाई, जो 1937 ई. में पूरा हुआ। उनके लगभग 45 वर्ष के नेतृत्व में संगठन का उल्लेखनीय विस्तार हुआ और अनुयायियों की संख्या लगातार बढ़ने के कारण कुछ समय बाद खुले स्थानों में भी सत्संग आयोजित करने की आवश्यकता पड़ने लगी।
1947 ई. में भारत के विभाजन के दौरान डेरा ने विभिन्न समुदायों से आए शरणार्थियों को आश्रय और सहायता प्रदान की। इस अवधि में संगठन की मानवीय सेवा गतिविधियों का भी विस्तार हुआ। सावन सिंह का निधन 2 अप्रैल 1948 ई. को हुआ। उन्होंने 20 मार्च 1948 ई. की लिखित वसीयत के माध्यम से सरदार बहादुर जगत सिंह को अपना उत्तराधिकारी नामित किया था।
1948 ई. का उत्तराधिकार विवाद और स्वतंत्र शाखाएँ
सावन सिंह के निधन के बाद उत्तराधिकार को लेकर मतभेद उत्पन्न हुए। 13 अप्रैल 1948 ई. को जगत सिंह को औपचारिक रूप से तीसरे गुरु के रूप में गुरुगद्दी पर स्थापित किया गया। ब्यास परंपरा के अनुसार उन्हें शिष्यों को दीक्षित करने तथा नए सत्संग केंद्र स्थापित करने का अधिकार प्राप्त था। इसके बावजूद सावन सिंह के कुछ शिष्यों ने दावा किया कि उन्हें अपने गुरु से स्वतंत्र रूप से कार्य करने के मौखिक अथवा आंतरिक निर्देश प्राप्त हुए थे। इस परिस्थिति में कई स्वतंत्र शाखाएँ विकसित हुईं। इनमें दिल्ली में 1948 ई. में कृपाल सिंह द्वारा स्थापित रूहानी सत्संग प्रमुख था। कृपाल सिंह ने दावा किया कि सावन सिंह ने उन्हें 1947 ई. में यह मिशन सौंपा था।
इसी अवधि में मस्ताना बलोचिस्तानी ने 29 अप्रैल 1948 ई. को हरियाणा के सिरसा में डेरा सच्चा सौदा की स्थापना की। वे सावन सिंह के शिष्य थे और 1920 ई. में ब्यास में दीक्षित हुए थे। 1948 ई. में तेजा सिंह ने अमृतसर जिले के सैदपुर गाँव में एक स्वतंत्र केंद्र स्थापित किया, जिसे ‘असली डेरा बाबा सावन सिंह’ के नाम से जाना गया। इसके अतिरिक्त तरनतारन का केंद्र भी पहले से अस्तित्व में था और उसका संबंध जयमल सिंह के शिष्य बग्गा सिंह से था। इन स्वतंत्र केंद्रों के नेता अलग-अलग ढंग से कार्य करते रहे, लेकिन उनमें से कई सावन सिंह को अपना आध्यात्मिक गुरु मानते रहे और ब्यास के साथ संबंध बनाए रखते थे।
जगत सिंह का कार्यकाल
जगत सिंह ने 1948 से 1951 ई. तक लगभग तीन वर्षों तक संगठन का नेतृत्व किया। यह काल भारत के विभाजन के बाद की कठिन परिस्थितियों का था। उन्होंने डेरा की आध्यात्मिक गतिविधियों के साथ-साथ मानवीय सेवा कार्यों को भी जारी रखा। जगत सिंह का निधन 23 अक्टूबर 1951 ई. को हुआ। इससे एक दिन पहले, 22 अक्टूबर 1951 ई. की लिखित वसीयत में उन्होंने चरण सिंह को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया था। चरण सिंह पेशे से वकील थे, सावन सिंह के पौत्र और जगत सिंह के शिष्य थे।
चरण सिंह का नेतृत्व और संस्थागत विकास
चरण सिंह (1916–1990 ई.) ने 1951 से 1990 ई. तक लगभग चार दशकों तक संगठन का नेतृत्व किया। पेशे से वकील होने के कारण उन्होंने संगठन के प्रशासनिक और संस्थागत आधुनिकीकरण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके कार्यकाल में राधा स्वामी सत्संग ब्यास का आधुनिकीकरण, संस्थागत विस्तार और अंतरराष्ट्रीय विकास विशेष रूप से हुआ। 1957 ई. में राधा स्वामी सत्संग ब्यास को गैर-लाभकारी संस्था के रूप में पंजीकृत कराना उनके कार्यकाल की प्रमुख उपलब्धियों में शामिल था। इससे संगठन की संपत्ति, प्रशासन और आध्यात्मिक गतिविधियों के संचालन को अधिक व्यवस्थित कानूनी ढाँचा मिला। उनके नेतृत्व में डेरा बाबा जयमल सिंह का व्यापक विस्तार हुआ और यह एक बड़े तथा आत्मनिर्भर परिसर में बदलने लगा। निर्माण, भूमि समतलीकरण, रसोई, सफाई और अन्य कार्यों में बड़ी संख्या में स्वयंसेवकों ने सेवा की। 1950 के दशक में ‘मिट्टी सेवा’ के माध्यम से स्वयंसेवकों ने डेरा के विस्तार के लिए भूमि को समतल करने तथा सामुदायिक सुविधाओं के निर्माण में योगदान दिया।
चरण सिंह सामाजिक समानता पर भी विशेष बल देते थे। वे विभिन्न सामाजिक पृष्ठभूमियों से आने वाले अनुयायियों के साथ समान रूप से बैठकर भोजन करते थे और इस प्रकार जातिगत भेदभाव से ऊपर उठकर समानता का संदेश देते थे। उनके कार्यकाल में राधा स्वामी सत्संग ब्यास की अंतरराष्ट्रीय उपस्थिति भी बढ़ी और संगठन अनेक देशों में पहुँचा।
गुरिंदर सिंह का कार्यकाल
चरण सिंह के निधन के बाद 1990 ई. में गुरिंदर सिंह को उनका उत्तराधिकारी नियुक्त किया गया। 1 अगस्त 1954 ई. को जन्मे गुरिंदर सिंह, गुरमुख सिंह ढिल्लों और मोहिंदर कौर के पुत्र हैं। मोहिंदर कौर चरण सिंह की बहन और सावन सिंह के पुत्र हरबंस सिंह ग्रेवाल की बेटी थीं। इस प्रकार गुरिंदर सिंह का संबंध ब्यास की गुरु-परंपरा से पारिवारिक रूप से भी जुड़ा रहा। अपनी नियुक्ति के समय गुरिंदर सिंह स्पेन के मालागा स्थित राधा स्वामी सत्संग ब्यास केंद्र में सेवा कर रहे थे। उनके कार्यकाल में संगठन की अंतरराष्ट्रीय गतिविधियों का विस्तार हुआ तथा ब्यास स्थित डेरा के बुनियादी ढाँचे में बड़े पैमाने पर विकास किया गया।
बढ़ती हुई अनुयायी संख्या को ध्यान में रखते हुए विशाल सत्संग परिसर, आवासीय सुविधाएँ, सामुदायिक रसोई और अन्य व्यवस्थाएँ विकसित की गईं। मुख्य सत्संग स्थल की क्षमता भी बहुत बड़े स्तर तक बढ़ाई गई, जिससे बड़े आयोजनों के दौरान लाखों तक पहुँचने वाली भीड़ को व्यवस्थित किया जा सके।
2024 ई. में नेतृत्व परिवर्तन
2 सितंबर 2024 ई. को गुरिंदर सिंह ने जसदीप सिंह गिल को राधा स्वामी सत्संग ब्यास की संबद्ध सोसाइटियों का संरक्षक और मनोनीत संत सतगुरु घोषित किया। यह निर्णय उत्तराधिकार की उस परंपरा से अलग था, जिसमें पूर्व गुरु अपने जीवन के अंतिम समय में उत्तराधिकारी का नाम घोषित करते थे।
जसदीप सिंह गिल की आयु उस समय लगभग 45 वर्ष थी। उन्होंने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से केमिकल इंजीनियरिंग में पीएचडी की है और वे फार्मास्यूटिकल क्षेत्र में भी कार्य कर चुके हैं। वे सिप्ला में चीफ साइंटिफिक ऑफिसर के पद पर कार्यरत रहे हैं। राधा स्वामी सत्संग ब्यास की परंपरा में उत्तराधिकार को औपचारिक रूप से आध्यात्मिक नियुक्ति पर आधारित माना जाता है, न कि केवल वंशानुगत अधिकार पर। यद्यपि पिछले कुछ गुरु पारिवारिक रूप से एक-दूसरे से संबंधित रहे हैं, जसदीप सिंह गिल का भी सावन सिंह की वंश-परंपरा से पारिवारिक संबंध बताया जाता है।
प्रमुख मान्यताएँ और शिक्षाएँ
राधा स्वामी सत्संग ब्यास की विचारधारा संत मत की व्यापक आध्यात्मिक परंपरा से संबंधित है। इसकी शिक्षाओं को किसी एक संगठित धर्म के रूप में प्रस्तुत करने के बजाय आत्मा की आध्यात्मिक खोज का मार्ग बताया जाता है। अनुयायियों को अपनी मौजूदा धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान छोड़ने के लिए बाध्य नहीं किया जाता। इस परंपरा का अंतिम आध्यात्मिक लक्ष्य आत्मा को जन्म-मरण अथवा पुनर्जन्म के चक्र से मुक्त कर उसके दिव्य स्रोत से पुनः जोड़ना माना जाता है। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए ध्यान, नैतिक जीवन और आध्यात्मिक गुरु के मार्गदर्शन को महत्त्वपूर्ण माना जाता है।
ईश्वर, आत्मा और शब्द
राधा स्वामी सत्संग ब्यास की शिक्षाओं में निराकार परम सत्ता में विश्वास प्रमुख है। इस सृष्टि को एक सर्वोच्च दिव्य शक्ति की अभिव्यक्ति माना जाता है। इसी संदर्भ में ‘शब्द’ या ‘ध्वनि-धारा’ की अवधारणा महत्त्वपूर्ण है। ‘शब्द’ को सामान्य भौतिक ध्वनि नहीं, बल्कि एक सूक्ष्म आंतरिक आध्यात्मिक धारा या दिव्य नाद के रूप में समझाया जाता है। साधना के माध्यम से साधक का ध्यान बाहरी संसार से हटाकर इस आंतरिक ध्वनि की ओर केंद्रित किया जाता है। मान्यता के अनुसार यह ध्वनि-धारा आत्मा को उसके मूल दिव्य स्रोत की ओर ले जाने का माध्यम है।
राधा स्वामी सत्संग ब्यास की शिक्षाओं के अनुसार आत्मा दिव्य सत्ता का अंश है, लेकिन कर्म और पुनर्जन्म के कारण भौतिक संसार में बंधी हुई है। मानव जीवन को इस बंधन से मुक्ति प्राप्त करने और अपने मूल स्रोत की ओर लौटने का महत्त्वपूर्ण अवसर माना जाता है।
जीवित गुरु या सतगुरु की भूमिका
राधा स्वामी सत्संग ब्यास की शिक्षाओं में जीवित आध्यात्मिक गुरु या सतगुरु को विशेष महत्त्व दिया गया है। गुरु को स्वयं ईश्वर नहीं माना जाता, बल्कि ऐसे आध्यात्मिक मार्गदर्शक के रूप में सम्मान दिया जाता है, जिसने आध्यात्मिक मार्ग को प्राप्त किया है और साधकों को उसी मार्ग पर आगे बढ़ाने में सक्षम है। मान्यता के अनुसार जीवित गुरु दीक्षा के माध्यम से साधक को आध्यात्मिक साधना की विधि बताते हैं। इसे नाम-दान या दीक्षा कहा जाता है। गुरु साधक को ध्यान की प्रक्रिया से परिचित कराते हैं और उसकी आध्यात्मिक यात्रा में मार्गदर्शन प्रदान करते हैं।
आध्यात्मिक साधना : सूरत शब्द योग
राधा स्वामी सत्संग ब्यास की प्रमुख साधना ‘सूरत शब्द योग’ है। ‘सूरत’ का अर्थ चेतना या आत्मिक ध्यान तथा ‘शब्द’ का संबंध आंतरिक दिव्य ध्वनि-धारा से है। इस साधना का उद्देश्य चेतना को बाहरी विषयों से हटाकर आंतरिक आध्यात्मिक अनुभव की ओर केंद्रित करना है। यह अभ्यास सामान्यतः नियमित रूप से किया जाता है और अनुयायियों को प्रतिदिन लगभग ढाई घंटे ध्यान करने का संकल्प लेने के लिए कहा जाता है। साधना में तीन प्रमुख प्रक्रियाओं का उल्लेख किया जाता है—सिमरन, ध्यान और भजन।
सिमरन
सिमरन में दीक्षा के समय बताए गए पवित्र नामों का मानसिक रूप से दोहराव किया जाता है। इसका उद्देश्य मन को शांत करना और ध्यान को एकाग्र करना है।
ध्यान
ध्यान में गुरु के स्वरूप अथवा आध्यात्मिक लक्ष्य पर मन को केंद्रित किया जाता है। इसका उद्देश्य भक्ति, एकाग्रता और आंतरिक स्थिरता को विकसित करना है।
भजन
भजन में साधक आंतरिक शब्द या ध्वनि-धारा को सुनने का अभ्यास करता है। राधा स्वामी सत्संग ब्यास की मान्यता के अनुसार यह साधना आत्मा को उच्च आध्यात्मिक अवस्थाओं की ओर ले जाने में सहायक होती है। इस ध्यान-पद्धति में किसी कठिन शारीरिक आसन की आवश्यकता नहीं बताई जाती। इसे सामान्य जीवन जीते हुए नियमित रूप से किया जा सकता है।
नैतिक जीवन और अनुशासन
राधा स्वामी सत्संग ब्यास में आध्यात्मिक साधना को नैतिक जीवन के साथ जोड़ा जाता है। अनुयायियों से शाकाहारी आहार अपनाने, नशीले पदार्थों से परहेज करने, ईमानदारी से आजीविका अर्जित करने, दूसरों के साथ न्यायपूर्ण व्यवहार करने और नियमित ध्यान करने की अपेक्षा की जाती है। शाकाहारी आहार में मांस, मछली, मुर्गी और अंडे का सेवन न करने तथा सामान्यतः दूध-आधारित शाकाहारी भोजन अपनाने पर बल दिया जाता है। शराब, तंबाकू तथा मनोरंजक नशीले पदार्थों से दूर रहने की अपेक्षा भी की जाती है। अनुयायियों को संन्यास लेने की अपेक्षा नहीं की जाती। वे परिवार, व्यवसाय और सामाजिक जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हुए आध्यात्मिक साधना करने के लिए प्रेरित किए जाते हैं।
सत्संग और सेवा
सत्संग राधा स्वामी सत्संग ब्यास की सामुदायिक आध्यात्मिक गतिविधियों का प्रमुख हिस्सा है। सत्संग में आध्यात्मिक शिक्षाओं पर चर्चा, प्रवचन और मार्गदर्शन दिया जाता है। इससे साधकों को अपने आध्यात्मिक अभ्यास को समझने और नियमित बनाए रखने में सहायता मिलती है।
‘सेवा’ या निस्वार्थ सेवा भी संगठन की महत्त्वपूर्ण परंपरा है। अनुयायी विभिन्न केंद्रों में सफाई, भोजन व्यवस्था, निर्माण, चिकित्सा सहायता, अतिथि सेवा और अन्य कार्यों में स्वयंसेवक के रूप में योगदान करते हैं। सेवा को विनम्रता, निस्वार्थता और दूसरों के प्रति प्रेम विकसित करने का माध्यम माना जाता है।
गुरु-परंपरा
राधा स्वामी सत्संग ब्यास की गुरु-परंपरा में जयमल सिंह से लेकर सावन सिंह, जगत सिंह, चरण सिंह, गुरिंदर सिंह और जसदीप सिंह गिल तक प्रमुख आध्यात्मिक गुरु रहे हैं। इस गुरु-परंपरा ने संगठन के आध्यात्मिक तथा संस्थागत विकास को दिशा प्रदान की।
ब्यास स्थित डेरा बाबा जयमल सिंह
राधा स्वामी सत्संग ब्यास का मुख्यालय पंजाब में ब्यास नदी के किनारे स्थित डेरा बाबा जयमल सिंह है। यह संगठन का प्रमुख आध्यात्मिक केंद्र होने के साथ-साथ एक विशाल और सुव्यवस्थित परिसर भी है। इसे पारंपरिक आश्रम की तुलना में एक बड़े ‘आध्यात्मिक नगर’ के रूप में देखा जाता है, जहाँ आवास, भोजन, चिकित्सा, परिवहन, जलापूर्ति, स्वच्छता और अन्य सुविधाएँ बड़े पैमाने पर संचालित होती हैं। बड़े सत्संगों के समय देश-विदेश से बड़ी संख्या में अनुयायी यहाँ पहुँचते हैं।
भूमि और बुनियादी ढाँचा
डेरा लगभग 1,900 एकड़ विकसित भूमि में फैला हुआ बताया जाता है तथा भोजन और अन्य आवश्यकताओं के लिए अतिरिक्त भूमि पर खेती भी की जाती है। इसकी स्थायी आबादी में बड़ी संख्या में पूर्णकालिक स्वयंसेवक और उनके परिवार शामिल हैं। बड़े आध्यात्मिक आयोजनों के समय यहाँ आने वाले लोगों की संख्या कई लाख तक पहुँच सकती है।
सत्संग परिसर
डेरा में विशाल सत्संग स्थल है, जहाँ बड़ी संख्या में लोग एक साथ आध्यात्मिक प्रवचन सुन सकते हैं। बड़े आयोजनों के लिए खुले और ढके हुए क्षेत्रों, ध्वनि व्यवस्था तथा वीडियो स्क्रीन जैसी आधुनिक सुविधाओं का उपयोग किया जाता है।
लंगर
सामुदायिक रसोई या लंगर राधा स्वामी सत्संग ब्यास की प्रमुख सेवा व्यवस्थाओं में से एक है। यहाँ बड़ी संख्या में आने वाले अनुयायियों और अन्य लोगों के लिए निःशुल्क शाकाहारी भोजन की व्यवस्था की जाती है। यह व्यवस्था संगठन की सेवा और समानता की भावना को दर्शाती है।
आवास व्यवस्था
डेरा में आने वाले लोगों के लिए विभिन्न प्रकार की आवासीय सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाती हैं। इनमें बड़े सामूहिक शेड, डॉरमिटरी, छात्रावास और अन्य आवासीय परिसर शामिल हैं। इन व्यवस्थाओं को बड़े आयोजनों के दौरान आने वाले लोगों की संख्या को ध्यान में रखकर संचालित किया जाता है।
आत्मनिर्भरता और स्वयंसेवा
डेरा की व्यवस्था में आत्मनिर्भरता को विशेष महत्त्व दिया गया है। खेती, निर्माण, जलापूर्ति, स्वच्छता, कचरा प्रबंधन, भोजन व्यवस्था और अन्य अनेक गतिविधियों में स्वयंसेवकों की महत्त्वपूर्ण भूमिका रहती है। सेवा के अंतर्गत अनुयायी अपने श्रम और समय का योगदान देते हैं। निर्माण कार्य से लेकर भोजन वितरण और सफाई तक विभिन्न गतिविधियों में बड़ी संख्या में लोग स्वेच्छा से भाग लेते हैं। संगठन की गतिविधियों के लिए दान को प्रमुख आर्थिक आधार माना जाता है और परिसर में उपलब्ध अनेक वस्तुओं एवं सेवाओं को गैर-लाभकारी अथवा रियायती आधार पर उपलब्ध कराया जाता है।
सामाजिक और धर्मार्थ गतिविधियाँ
राधा स्वामी सत्संग ब्यास आध्यात्मिक गतिविधियों के साथ सामाजिक कल्याण और मानवीय सहायता के कार्यों में भी सक्रिय रहा है। इसके प्रमुख क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवा, आपदा राहत, सामुदायिक भोजन, शिक्षा, रक्तदान और अन्य सामाजिक सेवाएँ शामिल हैं।
स्वास्थ्य सेवाएँ
संगठन से संबद्ध संस्थाओं के माध्यम से विभिन्न स्थानों पर धर्मार्थ अस्पताल और चिकित्सा सुविधाएँ संचालित की जाती हैं। ब्यास में महाराज सावन सिंह चैरिटेबल अस्पताल प्रमुख चिकित्सा संस्थानों में से एक है। इसके अतिरिक्त अन्य राज्यों में भी अस्पताल और चिकित्सा केंद्र संचालित किए जाते हैं। इन सेवाओं का उद्देश्य आर्थिक रूप से कमजोर तथा ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों को चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराना है। कई स्थानों पर निःशुल्क चिकित्सा और दंत चिकित्सा शिविर भी आयोजित किए जाते हैं।
आपदा राहत
प्राकृतिक आपदाओं के समय राधा स्वामी सत्संग ब्यास के स्वयंसेवकों ने राहत और पुनर्वास कार्यों में भाग लिया है। बाढ़ और भूकंप जैसी आपदाओं से प्रभावित क्षेत्रों में भोजन, पानी, चिकित्सा सहायता, अस्थायी आश्रय और अन्य आवश्यक सामग्री उपलब्ध कराने के प्रयास किए गए हैं। गुजरात, कश्मीर और नेपाल सहित विभिन्न आपदा-प्रभावित क्षेत्रों में राहत कार्यों का उल्लेख मिलता है। कुछ मामलों में संगठन ने तत्काल राहत के साथ-साथ दीर्घकालीन पुनर्वास में भी योगदान दिया।
कोविड-19 महामारी के दौरान सेवा
कोविड-19 महामारी के दौरान राधा स्वामी सत्संग ब्यास ने अपने विभिन्न केंद्रों को क्वारंटीन तथा अस्थायी चिकित्सा सुविधाओं के लिए उपलब्ध कराने की पेशकश की। दिल्ली में संगठन के एक बड़े परिसर का उपयोग सरदार पटेल कोविड केयर सेंटर के रूप में किया गया, जिसकी क्षमता लगभग 10,000 बिस्तरों तक बताई गई थी। महामारी और लॉकडाउन के दौरान स्वयंसेवकों ने बड़ी मात्रा में भोजन तैयार कर प्रवासी श्रमिकों तथा अन्य जरूरतमंद लोगों तक पहुँचाया। इस दौरान संगठन के अनेक केंद्रों से राहत और भोजन वितरण गतिविधियाँ संचालित की गईं।
सामुदायिक और शैक्षिक सेवाएँ
लंगर और सामुदायिक भोजन
डेरा में लंगर केवल अनुयायियों की सुविधा का साधन नहीं, बल्कि संगठन की सेवा-परंपरा का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। बड़े आयोजनों में बड़ी संख्या में लोगों के लिए निःशुल्क भोजन उपलब्ध कराया जाता है।
शिक्षा
राधा स्वामी सत्संग ब्यास एजुकेशनल एंड एनवायरनमेंटल सोसाइटी के अंतर्गत डेरा में पाथसीकर्स स्कूल संचालित किया जाता है। यह विद्यालय सीबीएसई से संबद्ध है और मुख्यतः डेरा में रहने वाले परिवारों तथा संबद्ध संस्थानों के कर्मचारियों के बच्चों को शिक्षा प्रदान करता है।
रक्तदान और जन-जागरूकता
संगठन तथा उसके केंद्रों द्वारा समय-समय पर रक्तदान शिविर और अंगदान संबंधी जागरूकता कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं। इन गतिविधियों का उद्देश्य सामुदायिक सेवा और जनहित की भावना को बढ़ावा देना है।
प्रकाशन और मीडिया
राधा स्वामी सत्संग ब्यास अपनी शिक्षाओं और आध्यात्मिक विचारों के प्रसार के लिए पुस्तकों, पत्रिकाओं, ऑडियो और वीडियो सामग्री का उपयोग करता है। संगठन का औपचारिक प्रकाशन विभाग चरण सिंह के कार्यकाल में 1970 के दशक के मध्य में विकसित हुआ, जिसके बाद आध्यात्मिक साहित्य के अनुवाद और वितरण में वृद्धि हुई।
प्रकाशित साहित्य में ब्यास की गुरु-परंपरा से संबंधित आध्यात्मिक ग्रंथ, प्रवचनों के संग्रह, प्रश्नोत्तर, संत मत से संबंधित क्लासिक ग्रंथों के अनुवाद और नए साधकों के लिए परिचयात्मक पुस्तकें शामिल हैं। यह साहित्य विभिन्न भाषाओं में उपलब्ध कराया जाता है। पुस्तकों के साथ ई-पुस्तक, ऑडियोबुक तथा अन्य डिजिटल माध्यमों का भी उपयोग किया जाता है। संगठन प्रवचनों, प्रश्नोत्तर सत्रों और आध्यात्मिक सामग्री के ऑडियो-वीडियो संस्करण भी उपलब्ध कराता है। ‘Spiritual Link’ जैसी पत्रिका के माध्यम से भी आध्यात्मिक शिक्षाओं और संगठन की गतिविधियों से संबंधित सामग्री प्रकाशित की जाती है।
वैश्विक विस्तार
पंजाब में आरंभ हुआ राधा स्वामी सत्संग ब्यास समय के साथ एक अंतरराष्ट्रीय संगठन के रूप में विकसित हुआ। संगठन की गतिविधियाँ 90 से अधिक देशों तक फैली होने का उल्लेख मिलता है और विभिन्न देशों में स्थानीय सत्संग केंद्र संचालित होते हैं। इन केंद्रों का उद्देश्य स्थानीय स्तर पर सत्संग, आध्यात्मिक अध्ययन और सामुदायिक गतिविधियों का संचालन करना है। बड़े देशों में संगठनात्मक व्यवस्थाओं के लिए स्थानीय बोर्ड और प्रशासनिक ढाँचे भी बनाए गए हैं। गुरु द्वारा अधिकृत प्रतिनिधि विभिन्न स्थानों पर आध्यात्मिक गतिविधियों तथा दीक्षा संबंधी कार्यों में भूमिका निभाते हैं।
संयुक्त राज्य अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और दक्षिण अफ्रीका सहित अनेक देशों में राधा स्वामी सत्संग ब्यास के प्रमुख केंद्र हैं। यूरोप, एशिया-प्रशांत, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका में भी इसके सत्संग केंद्रों का नेटवर्क विकसित हुआ है।
अनुयायियों की विविधता
राधा स्वामी सत्संग ब्यास अपने दर्शन को सार्वभौमिक आध्यात्मिक मार्ग के रूप में प्रस्तुत करता है। अनुयायियों को अपनी धार्मिक, सांस्कृतिक या सामाजिक पहचान छोड़ने की आवश्यकता नहीं बताई जाती। इस कारण इसके अनुयायी विभिन्न धार्मिक, सामाजिक और आर्थिक पृष्ठभूमियों से आते हैं। इस समुदाय में विभिन्न व्यवसायों और जीवन-पद्धतियों से जुड़े लोग शामिल हैं। संगठन की शिक्षाओं में आत्म-अनुशासन, ध्यान, नैतिक जीवन और आध्यात्मिक खोज पर बल दिया जाता है।
राजनीति से संबंध
राधा स्वामी सत्संग ब्यास ने पारंपरिक रूप से स्वयं को राजनीतिक गतिविधियों से अलग रखने का प्रयास किया है और संगठन का घोषित रुख गैर-राजनीतिक रहा है। हालांकि, समय-समय पर विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं और राधा स्वामी सत्संग ब्यास के नेतृत्व के बीच मुलाकातें हुई हैं, जिसके कारण सार्वजनिक विमर्श में संगठन के राजनीतिक प्रभाव को लेकर चर्चा होती रही है।
कोविड-19 महामारी के दौरान दिल्ली स्थित राधा स्वामी सत्संग ब्यास केंद्र का उपयोग चिकित्सा सुविधा के रूप में किया गया था और उस समय विभिन्न राजनीतिक नेताओं ने वहाँ का दौरा किया। 2022 ई. में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ब्यास स्थित डेरा जाने का भी उल्लेख मिलता है।
2026 ई. में पंजाब विधानसभा चुनावों से पहले ब्यास नेतृत्व से जुड़े कार्यक्रमों में भारतीय जनता पार्टी और शिरोमणि अकाली दल के नेताओं की उपस्थिति तथा नशीली दवाओं के विरुद्ध आयोजित सार्वजनिक पदयात्रा ने संगठन की राजनीतिक तटस्थता को लेकर चर्चा को फिर से बढ़ाया। हालांकि संगठन के ऐतिहासिक दृष्टिकोण में राजनीतिक दलों से औपचारिक दूरी बनाए रखने पर जोर रहा है। इसी अवधि में राधा स्वामी सत्संग ब्यास नेतृत्व और शिरोमणि अकाली दल के नेता बिक्रम सिंह मजीठिया के बीच मुलाकात भी चर्चा में रही। इन घटनाओं को संगठन की आध्यात्मिक गतिविधियों से अलग राजनीतिक संदर्भ में देखा जाना चाहिए।
इस प्रकार राधा स्वामी सत्संग ब्यास का विकास उन्नीसवीं शताब्दी के अंत में जयमल सिंह द्वारा ब्यास में स्थापित एक छोटे आध्यात्मिक केंद्र से होकर एक व्यापक अंतरराष्ट्रीय संगठन के रूप में हुआ। इसकी मूल शिक्षाओं में जीवित गुरु का मार्गदर्शन, सूरत शब्द योग, आंतरिक आध्यात्मिक साधना, नैतिक जीवन, शाकाहार, नशीले पदार्थों से परहेज और निस्वार्थ सेवा प्रमुख हैं।
जयमल सिंह से लेकर सावन सिंह, जगत सिंह, चरण सिंह, गुरिंदर सिंह और जसदीप सिंह गिल तक इसकी गुरु-परंपरा ने संगठन के आध्यात्मिक तथा संस्थागत विकास को दिशा दी। ब्यास स्थित डेरा बाबा जयमल सिंह आज इसकी गतिविधियों का प्रमुख केंद्र है, जहाँ आध्यात्मिक सभाओं के साथ-साथ सामुदायिक सेवा, लंगर, चिकित्सा सहायता और अन्य कल्याणकारी कार्य संचालित होते हैं। राधा स्वामी सत्संग ब्यास की विशेषता यह है कि इसकी आध्यात्मिक साधना को गृहस्थ जीवन के साथ जोड़ा गया है। अनुयायियों से संसार का त्याग करने के बजाय अपने पारिवारिक और सामाजिक दायित्व निभाते हुए ध्यान, नैतिकता और सेवा पर आधारित जीवन अपनाने की अपेक्षा की जाती है। इसी कारण यह संगठन भारतीय संत परंपरा की आधुनिक अभिव्यक्तियों में एक महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है और भारत के साथ-साथ विश्व के अनेक देशों में अपना प्रभाव तथा संगठनात्मक नेटवर्क विकसित कर चुका है।


