ईश्वरचंद्र विद्यासागर (1820–1891 ई.)
ईश्वरचंद्र बंद्योपाध्याय (26 सितंबर 1820–29 जुलाई 1891 ई.), जिन्हें सामान्यतः ईश्वरचंद्र विद्यासागर के नाम से जाना जाता है, उन्नीसवीं शताब्दी के भारत के प्रमुख शिक्षाविद्, समाज-सुधारक, लेखक और मानवतावादी थे। वे बंगाल पुनर्जागरण के प्रमुख समर्थकों में गिने जाते हैं। संस्कृत और भारतीय शास्त्रों के गहन अध्ययन तथा असाधारण विद्वत्ता के कारण संस्कृत कॉलेज, कलकत्ता ने उन्हें ‘विद्यासागर’ अर्थात् ‘विद्या का सागर’ की सम्मानसूचक उपाधि प्रदान की। उन्होंने शिक्षा के आधुनिकीकरण, बंगला गद्य के विकास, स्त्री-शिक्षा के प्रसार और सामाजिक कुरीतियों के विरोध में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। विधवा पुनर्विवाह के समर्थन में उनके अभियान के परिणामस्वरूप हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम, 1856 पारित हुआ, जिसने हिंदू विधवाओं के पुनर्विवाह को कानूनी मान्यता प्रदान की। वे बाल-विवाह और बहुविवाह के विरोधी तथा महिलाओं की शिक्षा और सम्मान के प्रबल समर्थक थे। वे हिंदू फीमेल स्कूल से भी जुड़े रहे, जो आगे चलकर बेथ्यून स्कूल के नाम से प्रसिद्ध हुआ। 15 नवंबर 1858 ई. को द्वारकानाथ विद्याभूषण द्वारा आरंभ किए गए साप्ताहिक पत्र ‘सोमप्रकाश’ के प्रकाशन की प्रेरणा भी विद्यासागर से जुड़ी थी और वे उसके संपादकीय मामलों में द्वारकानाथ को सलाह देते थे। शिक्षा, साहित्य, सामाजिक सुधार और मानवतावादी विचारों के क्षेत्र में उनके बहुआयामी योगदान ने उन्हें आधुनिक भारत के प्रमुख समाज-सुधारकों में प्रतिष्ठित किया।
प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
ईश्वरचंद्र विद्यासागर का जन्म 26 सितंबर 1820 ई. को पश्चिम मेदिनीपुर जिले के बीरसिंघा गाँव में एक साधारण और निर्धन बंगाली ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता ठाकुरदास बंद्योपाध्याय और माता भगवती देवी थीं। उनका परिवार मूलतः बनमालीपुर का निवासी था, जो वर्तमान में हुगली जिले में स्थित है। नौ वर्ष की आयु में वे अपने पिता के साथ कलकत्ता गए और बड़ाबाजार में भागवत चरण सिंह के घर रहने लगे, जहाँ उनके पिता पहले से रह रहे थे। भागवत चरण के परिवार से उन्हें आत्मीयता और स्नेह मिला तथा उनकी पुत्री रायमणि का मातृवत स्नेह उनके व्यक्तित्व पर गहरा प्रभाव डालने वाला अनुभव माना जाता है। आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद उनकी अध्ययन के प्रति अदम्य लगन बनी रही। वे पर्याप्त प्रकाश की व्यवस्था न होने पर सड़क की रोशनी में भी पढ़ते थे। उन्होंने उत्कृष्ट प्रदर्शन के साथ विभिन्न परीक्षाएँ उत्तीर्ण कीं और छात्रवृत्तियाँ प्राप्त कीं। अपनी आर्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए उन्होंने अध्यापन का कार्य भी किया। उन्होंने कलकत्ता के संस्कृत कॉलेज में अध्ययन किया और संस्कृत व्याकरण, साहित्य, तर्कशास्त्र, अलंकारशास्त्र, वेदांत, स्मृति तथा खगोलशास्त्र में विशेष योग्यता प्राप्त की। 1839 ई. में उन्होंने संस्कृत कानून की परीक्षा सफलतापूर्वक उत्तीर्ण की और 1841 ई. में अपनी औपचारिक शिक्षा पूर्ण की। उनकी असाधारण विद्वत्ता के कारण उन्हें ‘विद्यासागर’ की उपाधि मिली।
तत्कालीन सामाजिक परंपरा के अनुसार उनका विवाह कम आयु में दिनमयी देवी से हुआ था और उनके एकमात्र पुत्र का नाम नारायणचंद्र बंद्योपाध्याय था। 1841 ई. में इक्कीस वर्ष की आयु में वे फोर्ट विलियम कॉलेज, कलकत्ता के संस्कृत विभाग में प्रधान पंडित नियुक्त हुए। 1846 ई. में उन्होंने फोर्ट विलियम कॉलेज छोड़कर संस्कृत कॉलेज में सहायक सचिव का पद ग्रहण किया। वहाँ उन्होंने शिक्षा-व्यवस्था में सुधार के अनेक सुझाव दिए, जिसके कारण कॉलेज के सचिव रसमय दत्त के साथ उनके मतभेद उत्पन्न हो गए। 1849 ई. में उन्होंने संस्कृत कॉलेज से त्यागपत्र दिया और फोर्ट विलियम कॉलेज में पुनः हेड क्लर्क के रूप में नियुक्त हुए। इस प्रकार अत्यंत साधारण आर्थिक परिस्थितियों से उठकर उन्होंने अपनी प्रतिभा, परिश्रम, आत्मानुशासन और दृढ़ संकल्प के बल पर शिक्षा के क्षेत्र में विशिष्ट स्थान बनाया।
व्यक्तित्व और विचार
विद्यासागर का व्यक्तित्व भारतीय परंपरा और आधुनिक विचारों के समन्वय का उत्कृष्ट उदाहरण था। वे संस्कृत तथा भारतीय शास्त्रों के महान विद्वान थे, किंतु रूढ़िवादी विचारों के समर्थक नहीं थे। वे तर्क, मानवतावाद, आधुनिक शिक्षा और सामाजिक समानता को महत्त्व देते थे। उनका मानना था कि किसी भी सामाजिक प्रथा का मूल्यांकन उसके मानवीय परिणामों के आधार पर किया जाना चाहिए। वे भारतीय परंपरा का सम्मान करते हुए उसके भीतर मौजूद मानवीय और सुधारवादी तत्त्वों को सामने लाने का प्रयास करते थे। उनके लिए विद्वता का वास्तविक महत्त्व तभी था, जब उसका उपयोग समाज और मानव-कल्याण के लिए किया जाए। गरीबों, विधवाओं, असहायों और वंचितों के प्रति उनकी गहरी संवेदना उनके व्यक्तित्व की प्रमुख विशेषता थी।

शिक्षा के क्षेत्र में योगदान
1851 ई. में विद्यासागर संस्कृत कॉलेज, कलकत्ता के प्रधानाचार्य नियुक्त हुए। इस पद पर रहते हुए उन्होंने शिक्षा-व्यवस्था में अनेक महत्त्वपूर्ण सुधार किए। उन्होंने पाठ्यक्रम, अनुशासन और शिक्षण-पद्धति में परिवर्तन करते हुए संस्कृत की पारंपरिक शिक्षा को आधुनिक विषयों और तर्कपूर्ण अध्ययन से जोड़ने का प्रयास किया। उन्होंने प्रवेश-व्यवस्था में भी सुधार किए और संस्कृत शिक्षा को अधिक व्यापक बनाने की दिशा में कदम उठाए। उनका उद्देश्य ऐसी शिक्षा-व्यवस्था विकसित करना था, जिसमें भारतीय ज्ञान-परंपरा के साथ आधुनिक विज्ञान, तर्क और व्यावहारिक ज्ञान का समन्वय हो।
1854 ई. के वुड्स डिस्पैच ने भारतीय शिक्षा-व्यवस्था में व्यापक परिवर्तन की दिशा निर्धारित की और जन-शिक्षा तथा स्थानीय भाषाओं में प्राथमिक शिक्षा के प्रसार पर बल दिया। विद्यासागर ने भी मातृभाषा में शिक्षा को विशेष महत्त्व दिया। उन्होंने बंगला भाषा में सरल और सुबोध पाठ्य-पुस्तकों की रचना तथा संपादन किया और प्राथमिक शिक्षा के प्रसार में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। उनका मानना था कि शिक्षा तभी प्रभावी हो सकती है, जब वह विद्यार्थियों की भाषा और सामाजिक जीवन से जुड़ी हो। इस प्रकार उन्होंने बंगाल की शिक्षा-व्यवस्था को अधिक आधुनिक, व्यवस्थित और व्यावहारिक बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
भारतीय और पाश्चात्य विचारों का समन्वय
विद्यासागर भारतीय शास्त्रीय ज्ञान के गहरे अध्येता थे, लेकिन वे परंपराओं को बिना तर्क के स्वीकार करने के पक्ष में नहीं थे। उनका दृष्टिकोण विवेकपूर्ण और मानवीय था। वे पश्चिमी शिक्षा तथा आधुनिक विचारों के उपयोगी तत्वों को भारतीय समाज की आवश्यकताओं के अनुरूप अपनाने के समर्थक थे। विशेष रूप से विधवा पुनर्विवाह के प्रश्न पर उन्होंने संस्कृत धर्मशास्त्रों का अध्ययन करके यह तर्क प्रस्तुत किया कि विधवा-विवाह पर पूर्ण प्रतिबंध हिंदू परंपरा का अनिवार्य सिद्धांत नहीं है। इस प्रकार उन्होंने परंपरा और आधुनिकता के बीच संघर्ष के बजाय उनके रचनात्मक समन्वय का मार्ग अपनाया।
विधवा पुनर्विवाह आंदोलन
ईश्वरचंद्र विद्यासागर का भारतीय सामाजिक सुधार आंदोलन में सबसे महत्त्वपूर्ण योगदान विधवा पुनर्विवाह के समर्थन से संबंधित था। उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में हिंदू समाज के अनेक उच्च जातीय वर्गों में विधवाओं की स्थिति अत्यंत दयनीय थी। कम आयु में पति की मृत्यु हो जाने पर अनेक महिलाओं को जीवन भर सामाजिक प्रतिबंधों, उपेक्षा और अपमान का सामना करना पड़ता था। कई विधवाओं को सिर मुंडवाने और सफेद वस्त्र धारण करने जैसी कठोर सामाजिक प्रथाओं का पालन करना पड़ता था। विद्यासागर ने इस स्थिति को अमानवीय मानते हुए विशेष रूप से बंगाल में विधवा पुनर्विवाह के पक्ष में व्यापक अभियान चलाया।
1855 ई. में उन्होंने विधवा पुनर्विवाह के समर्थन में एक प्रभावशाली ग्रंथ प्रकाशित किया और संस्कृत धर्मशास्त्रों के आधार पर तर्क दिया कि विधवा-विवाह पर पूर्ण प्रतिबंध का कोई अनिवार्य धार्मिक आधार नहीं है। उन्होंने सरकार के समक्ष याचिकाएँ प्रस्तुत कीं और जनमत तैयार करने का प्रयास किया। उनके प्रयासों के विरोध में राधाकांत देव तथा धर्म सभा से जुड़े रूढ़िवादी नेताओं ने भी याचिका प्रस्तुत की। व्यापक सामाजिक बहस और विद्यासागर के निरंतर प्रयासों के परिणामस्वरूप ब्रिटिश भारतीय सरकार ने हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम, 1856 पारित किया, जिसने हिंदू विधवाओं के पुनर्विवाह को कानूनी मान्यता प्रदान की। यह भारतीय सामाजिक सुधार के इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण पड़ाव था। कानून बनने के बाद भी विद्यासागर ने अपना अभियान जारी रखा और उनकी प्रेरणा तथा सक्रिय सहयोग से बंगाल में अनेक विधवा पुनर्विवाह संपन्न हुए। यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि भारत के अनेक क्षेत्रों और विभिन्न समुदायों में विधवा पुनर्विवाह पहले से ही प्रचलित था; विद्यासागर का मुख्य संघर्ष उन उच्च जातीय हिंदू समुदायों की कठोर सामाजिक रूढ़ियों के विरुद्ध था, जहाँ विधवा पुनर्विवाह को निषिद्ध माना जाता था।
बाल-विवाह और बहुविवाह का विरोध
विधवा पुनर्विवाह के साथ-साथ विद्यासागर ने बाल-विवाह और बहुविवाह जैसी सामाजिक कुरीतियों का भी विरोध किया। उनका मानना था कि कम आयु में विवाह महिलाओं के शारीरिक, मानसिक और शैक्षिक विकास में बाधा डालता है। बहुविवाह को वे महिलाओं के सम्मान और पारिवारिक समानता के विरुद्ध मानते थे। उन्होंने लेखों, पुस्तिकाओं और सार्वजनिक बहसों के माध्यम से इन प्रथाओं के विरुद्ध जनमत तैयार करने का प्रयास किया। महिलाओं को सम्मानजनक और सुरक्षित सामाजिक जीवन प्रदान करना उनके व्यापक सुधार कार्यक्रम का महत्त्वपूर्ण उद्देश्य था।
स्त्री-शिक्षा के समर्थक
विद्यासागर स्त्री-शिक्षा के प्रबल समर्थक थे। उनका मानना था कि किसी समाज की वास्तविक प्रगति तभी संभव है, जब महिलाओं को शिक्षा का समान अवसर मिले। उन्होंने बालिकाओं के लिए विद्यालयों की स्थापना और उनके विस्तार में सक्रिय भूमिका निभाई। कलकत्ता के बेथ्यून स्कूल से भी वे जुड़े रहे और उसके विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। तत्कालीन समाज में लड़कियों की शिक्षा को लेकर अनेक रूढ़ियाँ और विरोध मौजूद थे, लेकिन विद्यासागर ने इनका सामना करते हुए महिला शिक्षा को सामाजिक सुधार का आवश्यक आधार माना। उनका विश्वास था कि शिक्षित महिलाएँ परिवार और समाज के बौद्धिक, नैतिक तथा सामाजिक विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।
बालिका विद्यालयों की स्थापना
शिक्षा विभाग में निरीक्षक के रूप में कार्य करते हुए विद्यासागर ने बंगाल के विभिन्न क्षेत्रों में बालिका शिक्षा के विस्तार के लिए उल्लेखनीय प्रयास किए। उनके प्रयासों से अनेक बालिका विद्यालय स्थापित हुए। वे चाहते थे कि शिक्षा केवल समाज के विशेषाधिकार प्राप्त वर्गों तक सीमित न रहे, बल्कि अधिकाधिक लोगों तक पहुँचे। महिला शिक्षा के प्रसार को उन्होंने सामाजिक सुधार, पारिवारिक उन्नति और आधुनिक चेतना के विकास से जोड़ा।
बंगला भाषा और साहित्य में योगदान
विद्यासागर का योगदान केवल शिक्षा और सामाजिक सुधार तक सीमित नहीं था। उन्होंने बंगला भाषा और साहित्य के विकास में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने बंगला गद्य को सरल, स्पष्ट, व्यवस्थित और प्रभावशाली बनाने में योगदान दिया। उनकी प्रसिद्ध कृति ‘बर्ण परिचय’ ने बंगला भाषा की प्रारंभिक शिक्षा को सरल और व्यवस्थित बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने अनेक पाठ्य-पुस्तकों तथा साहित्यिक और शैक्षिक ग्रंथों की रचना एवं संपादन किया। उनके प्रयासों से बंगला गद्य के विकास और आधुनिक शिक्षा के लिए उपयुक्त साहित्य के निर्माण को नई दिशा मिली।
सामाजिक रूढ़िवाद का विरोध
विधवा पुनर्विवाह, स्त्री-शिक्षा और अन्य सामाजिक सुधारों के कारण विद्यासागर को तत्कालीन रूढ़िवादी समाज के तीव्र विरोध का सामना करना पड़ा। उनके विचारों की आलोचना की गई और उन्हें व्यक्तिगत स्तर पर भी विरोध एवं धमकियों का सामना करना पड़ा। इसके बावजूद वे अपने सिद्धांतों से पीछे नहीं हटे। उनका मानना था कि किसी सामाजिक परंपरा को केवल इसलिए स्वीकार नहीं किया जा सकता कि वह पुरानी है; यदि कोई प्रथा मनुष्य के सम्मान और कल्याण के विरुद्ध है, तो उसमें परिवर्तन आवश्यक है। इस दृष्टिकोण ने उन्हें अपने समय के सबसे साहसी सुधारकों में स्थान दिलाया।
उच्च शिक्षा के विकास में योगदान
विद्यासागर ने आधुनिक उच्च शिक्षा के विकास में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने कलकत्ता में मेट्रोपॉलिटन इंस्टीट्यूशन के विकास में सक्रिय योगदान दिया, जो आगे चलकर विद्यासागर कॉलेज के नाम से प्रसिद्ध हुआ। उनका उद्देश्य आधुनिक शिक्षा को व्यापक सामाजिक वर्गों तक पहुँचाना था। उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में सरकारी संस्थाओं के भीतर सुधार करने के साथ-साथ स्वतंत्र शैक्षिक संस्थाओं के विकास को भी प्रोत्साहित किया।
मानवतावाद और परोपकार
विद्यासागर मूलतः महान मानवतावादी थे। गरीबों, असहायों, विधवाओं और समाज के वंचित वर्गों के प्रति उनके मन में गहरी करुणा थी। उन्होंने अपनी व्यक्तिगत आय और संसाधनों का बड़ा हिस्सा जरूरतमंदों की सहायता में लगाया। उनके लिए समाज-सुधार केवल कानून और संस्थाओं में परिवर्तन का प्रश्न नहीं था, बल्कि मनुष्य के सम्मान, स्वतंत्रता और कल्याण से जुड़ा विषय था। उनकी विद्वता के साथ उनकी करुणा, उदारता और आत्मसम्मान ने उनके व्यक्तित्व को विशिष्ट बना दिया।
करमाटांड़ से संबंध
ईश्वरचंद्र विद्यासागर का वर्तमान झारखंड के जामताड़ा जिले के करमाटांड़ क्षेत्र से लंबे समय तक घनिष्ठ संबंध रहा। वे 1873 ई. में करमाटांड़ आए और अपने जीवन के अंतिम वर्षों का एक महत्त्वपूर्ण समय यहीं बिताया। उन्होंने अपने निवास परिसर में बालिकाओं के लिए विद्यालय तथा वयस्कों के लिए रात्रि विद्यालय स्थापित किया, जिसे ‘नंदन कानन’ कहा जाता था। उन्होंने स्थानीय आदिवासी और वंचित समुदायों के लिए निःशुल्क होम्योपैथिक चिकित्सा की व्यवस्था भी की। उनकी मृत्यु के बाद उनके निवास ‘नंदन कानन’ का स्वामित्व बदल गया। बाद में इसे संरक्षित करने के प्रयास किए गए और भवन को ऐतिहासिक रूप में सुरक्षित रखा गया। करमाटांड़ में विद्यासागर की स्मृति से जुड़े शैक्षिक और सामाजिक कार्य आज भी उनके मानवीय दृष्टिकोण की याद दिलाते हैं। 26 सितंबर 2019 ई. को झारखंड सरकार ने उनके जन्मदिवस के अवसर पर जामताड़ा जिले के करमाटांड़ प्रखंड का नाम बदलकर ‘ईश्वरचंद्र विद्यासागर प्रखंड’ कर दिया। यह क्षेत्र उनके जीवन और सामाजिक कार्यों से जुड़े होने के कारण उनकी स्मृति का महत्त्वपूर्ण केंद्र माना जाता है।
रामकृष्ण के साथ मुलाकात
ईश्वरचंद्र विद्यासागर का दृष्टिकोण उदार और मानवतावादी था। यद्यपि उनका जन्म एक हिंदू ब्राह्मण परिवार में हुआ था, वे आधुनिक शिक्षा, तर्कशीलता और सामाजिक सुधार के समर्थक थे। दूसरी ओर, रामकृष्ण परमहंस ने औपचारिक उच्च शिक्षा प्राप्त नहीं की थी, किंतु वे अपनी आध्यात्मिक अनुभूति और धार्मिक चिंतन के लिए प्रसिद्ध थे। दोनों के बीच परस्पर सम्मान का भाव था। रामकृष्ण जब विद्यासागर से मिलने पहुँचे, तो उन्होंने उनकी विद्वत्ता और परोपकारी स्वभाव की प्रशंसा करते हुए उन्हें ‘विद्या का सागर’ कहा। विद्यासागर ने विनोदपूर्वक समुद्र के खारे पानी का उल्लेख किया, जिस पर रामकृष्ण ने विनम्रता से कहा कि यह साधारण समुद्र नहीं, बल्कि ज्ञान का सागर है। यह भेंट दोनों व्यक्तित्वों के बीच सम्मान, विनम्रता और वैचारिक उदारता का परिचायक है।
बंगाल नवजागरण में स्थान
ईश्वरचंद्र विद्यासागर उन्नीसवीं शताब्दी के बंगाल नवजागरण के प्रमुख व्यक्तित्वों में से एक थे। उन्होंने सामाजिक रूढ़ियों की आलोचना करते हुए आधुनिक शिक्षा, तर्कशीलता और मानवतावाद को बढ़ावा दिया। साथ ही उन्होंने भारतीय धार्मिक और शास्त्रीय परंपराओं के भीतर से सामाजिक सुधारों के लिए वैचारिक आधार खोजने का प्रयास किया। उनकी विशेषता यह थी कि उन्होंने केवल सुधारवादी विचार प्रस्तुत नहीं किए, बल्कि उन्हें सामाजिक व्यवहार, शिक्षा और संस्थागत परिवर्तन में लागू करने का प्रयास किया। विधवा पुनर्विवाह, स्त्री-शिक्षा, बाल-विवाह और बहुविवाह के प्रश्नों पर उनका कार्य आधुनिक भारतीय सामाजिक चेतना के विकास में अत्यंत महत्त्वपूर्ण रहा।
सम्मान और स्मृति
ईश्वरचंद्र विद्यासागर को उनके निधन के बाद भी अत्यंत सम्मान के साथ स्मरण किया जाता रहा है। रवींद्रनाथ ठाकुर ने उनके असाधारण व्यक्तित्व की प्रशंसा करते हुए कहा था कि इतने बड़े जनसमुदाय के बीच ईश्वर ने विद्यासागर जैसा अद्वितीय मनुष्य कैसे बनाया। उनकी विद्वत्ता और सामाजिक योगदान को मान्यता देते हुए ब्रिटिश सरकार ने 1877 ई. में उन्हें ‘कम्पेनियन ऑफ द इंडियन एम्पायर’ की उपाधि प्रदान की। भारतीय डाक विभाग ने 1970 ई. और 1998 ई. में उनके सम्मान में डाक टिकट जारी किए। 2004 ई. में बीबीसी के ‘सर्वकालीन महानतम बंगाली’ सर्वेक्षण में उन्हें नौवाँ स्थान प्राप्त हुआ। करमाटांड़ में उनकी स्मृति से जुड़े संस्थान और उनके नाम पर स्थापित प्रखंड भी उनके सामाजिक योगदान की स्थायी स्मृति हैं।
मूल्यांकन
ईश्वरचंद्र विद्यासागर का जीवन विद्वता, कर्मठता, साहस, आत्मसम्मान और मानवतावाद का उत्कृष्ट उदाहरण है। उन्होंने भारतीय शास्त्रीय परंपरा और आधुनिक विचारों के बीच रचनात्मक समन्वय स्थापित करने का प्रयास किया। विधवा पुनर्विवाह को कानूनी मान्यता दिलाने के संघर्ष, स्त्री-शिक्षा के प्रसार, बाल-विवाह और बहुविवाह के विरोध, आधुनिक शिक्षा के विकास तथा बंगला भाषा और गद्य के संवर्धन में उनकी भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण रही। उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उनके विचार और आचरण में गहरा सामंजस्य था। वे जिस मानवतावाद, शिक्षा और सामाजिक न्याय की वकालत करते थे, उसे अपने जीवन में भी व्यवहार में उतारते थे। इसी कारण ईश्वरचंद्र विद्यासागर आधुनिक भारतीय इतिहास में एक ऐसे महान समाज-सुधारक के रूप में स्मरण किए जाते हैं, जिनका योगदान शिक्षा, साहित्य, सामाजिक सुधार और मानवतावादी चेतना के क्षेत्र में स्थायी महत्त्व रखता है।


