एस्तादो दा इंडिया
‘एस्तादो दा इंडिया’ का शाब्दिक अर्थ है ‘भारत का राज्य’। यह नाम पुर्तगालियों ने अपने उस औपनिवेशिक प्रशासनिक ढाँचे के लिए प्रयोग किया, जिसकी स्थापना 1505 ई. में भारत में की गई थी। इसका उद्देश्य हिंद महासागर क्षेत्र में फैले पुर्तगाली व्यापारिक केंद्रों, बंदरगाहों, किलों और उपनिवेशों का प्रशासन संचालित करना तथा समुद्री व्यापार पर नियंत्रण स्थापित करना था। प्रारंभ में इसकी राजधानी कोचीन थी, किंतु 1510 ई. में अफोंसो डी अल्बुकर्क द्वारा गोवा पर अधिकार करने के बाद गोवा को इसकी राजधानी बना दिया गया। यहीं भारत स्थित पुर्तगाली वायसराय का मुख्यालय स्थापित हुआ।
व्यापक अर्थ में एस्तादो दा इंडिया केवल भारत तक सीमित नहीं था, बल्कि केप ऑफ गुड होप के पूर्व स्थित सभी पुर्तगाली अधिकार क्षेत्रों का प्रशासनिक संगठन था। अपने उत्कर्ष के समय सोलहवीं शताब्दी में इसका विस्तार पूर्वी अफ्रीका के तट से लेकर भारत, श्रीलंका, मलक्का, मलुक्का (मसाला द्वीप), तिमोर तथा चीन के मकाऊ तक फैला हुआ था। यह कोई विशाल भू-आधारित साम्राज्य नहीं था, बल्कि समुद्री मार्गों, सामरिक बंदरगाहों, व्यापारिक केंद्रों और किलों पर आधारित एक समुद्री साम्राज्य था।
पुर्तगाली साम्राज्य-निर्माण के उद्देश्य
पुर्तगालियों के एशियाई विस्तार के पीछे आर्थिक, धार्मिक और राजनीतिक तीनों प्रकार की प्रेरणाएँ कार्यरत थीं। यूरोप में मसालों, रेशम, बहुमूल्य पत्थरों तथा विलासिता की वस्तुओं की अत्यधिक माँग थी। ये वस्तुएँ भारत और पूर्वी देशों से मध्य-पूर्व के व्यापारिक मार्गों के माध्यम से यूरोप पहुँचती थीं, जिन पर अरब एवं अन्य मुस्लिम व्यापारियों का प्रभुत्व था। पुर्तगाली इस मध्यस्थता को समाप्त कर भारत और पूर्वी एशिया के साथ प्रत्यक्ष समुद्री व्यापार स्थापित करना चाहते थे।
इसके अतिरिक्त, वे ईसाई धर्म के प्रचार-प्रसार तथा इस्लामी शक्तियों के प्रभाव को चुनौती देने के उद्देश्य से भी प्रेरित थे। पुर्तगाली शासकों को विश्वास था कि एशिया में ईसाई सहयोगियों की सहायता से वे अपने धार्मिक और राजनीतिक प्रभाव का विस्तार कर सकेंगे। साथ ही सोना, चाँदी, मसाले और अन्य मूल्यवान वस्तुओं से होने वाला लाभ भी उनके विस्तार का प्रमुख उद्देश्य था। इस प्रकार पुर्तगाली साम्राज्यवाद व्यापारिक लाभ, धार्मिक उत्साह और राजकीय प्रतिष्ठा का संयुक्त परिणाम था।
विश्व समुद्री खोज और पूर्वी विस्तार
पंद्रहवीं और सोलहवीं शताब्दी की समुद्री खोजों ने विश्व व्यापार और भूगोल की दिशा बदल दी। भारत तथा पूर्वी देशों तक प्रत्यक्ष समुद्री मार्ग खोजने की प्रतिस्पर्धा ने यूरोपीय शक्तियों को नए अभियानों के लिए प्रेरित किया। भारत पहुँचने से पहले पुर्तगालियों ने अटलांटिक महासागर के द्वीपों पर अपना नियंत्रण स्थापित कर समुद्री अभियानों की सुदृढ़ आधारभूमि तैयार की। उन्होंने 1420 ई. में मदीरा, 1439 ई. में अज़ोरेस तथा 1462 ई. में केप वर्डे द्वीप समूह पर अधिकार किया। बाद में गिनी की खाड़ी में स्थित साओ टोमे और प्रिंसिपे द्वीप भी उनके नियंत्रण में आ गए, जिन्होंने अफ्रीकी तट की खोज और हिंद महासागर तक पहुँचने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
वास्को डी गामा का भारत आगमन
1488 ई. में बार्थोलोम्यू डियाज़ ने अफ्रीका के दक्षिणी सिरे केप ऑफ गुड होप तक पहुँचकर भारत के समुद्री मार्ग की संभावना सिद्ध की। इसी उपलब्धि के आधार पर वास्को डी गामा ने 1497–1499 ई. के अभियान के दौरान उसने केप ऑफ गुड होप का चक्कर लगाया, पूर्वी अफ्रीका के तट से होते हुए हिंद महासागर पार किया और 20 मई 1498 ई. को मालाबार तट के कालीकट (कोझिकोड) पहुँचा, जिसके परिणामस्वरूप यूरोप तथा भारत के बीच प्रत्यक्ष समुद्री संपर्क स्थापित हुआ और विश्व व्यापार के इतिहास में एक नए युग का आरंभ हुआ।
भारत पहुँचने के बाद पुर्तगालियों ने पश्चिमी तट पर अपने व्यापारिक केंद्र स्थापित करने प्रारंभ किए। 1503 ई. में उन्होंने कोचीन में अपना पहला स्थायी दुर्ग और व्यापारिक केंद्र स्थापित किया। इसके बाद हिंद महासागर में उनका राजनीतिक और व्यापारिक प्रभाव तीव्र गति से बढ़ने लगा। भारत में सफलता के बाद पुर्तगालियों की व्यापारिक गतिविधियाँ पूर्वी एशिया तक फैल गईं। 1557 ई. में उन्हें दक्षिणी चीन के मकाऊ में स्थायी व्यापारिक केंद्र स्थापित करने की अनुमति मिली तथा जापान के नागासाकी के साथ भी उनके व्यापारिक संबंध विकसित हुए। गोवा, कोचीन, मलक्का, होर्मुज़ और मकाऊ जैसे बंदरगाह उनके समुद्री साम्राज्य के प्रमुख केंद्र बने।
पुर्तगाली साम्राज्य क्षेत्रफल की दृष्टि से सीमित था, किंतु समुद्री व्यापार के कारण उसका प्रभाव अत्यंत व्यापक था। उनके विशाल कैराक जहाज मसाले, रेशम, बहुमूल्य रत्न, सोना, चाँदी तथा चीनी मिट्टी के बर्तन एशिया से यूरोप ले जाते थे। विशेष रूप से मसाला व्यापार उनकी आर्थिक समृद्धि और समुद्री प्रभुत्व का प्रमुख आधार था।
एस्तादो दा इंडिया का ऐतिहासिक स्वरूप
एस्तादो दा इंडिया मूलतः एक समुद्री व्यापारिक साम्राज्य था, जिसकी शक्ति का आधार नौसैनिक प्रभुत्व, व्यापारिक केंद्रों का जाल और सामरिक किले थे। लिस्बन से गोवा तक चलने वाले नियमित व्यापारिक बेड़े, जिन्हें ‘करिएरा दा इंडिया’ कहा जाता था, इस व्यवस्था की जीवनरेखा थे। इन जहाजों के माध्यम से मसाले, वस्त्र, बहुमूल्य पत्थर, धातुएँ और अन्य व्यापारिक वस्तुएँ यूरोप पहुँचाई जाती थीं।
यद्यपि सत्रहवीं शताब्दी के बाद इसका प्रभाव क्रमशः घटता गया, फिर भी गोवा, दमन, दीव और मकाऊ जैसे केंद्र लंबे समय तक पुर्तगाली शासन के अधीन बने रहे। अंततः 1961 ई. में भारत द्वारा गोवा, दमन और दीव के विलय के साथ भारत में एस्तादो दा इंडिया का इतिहास समाप्त हो गया।
एस्तादो दा इंडिया का विस्तार
‘एस्तादो दा इंडिया’ के पूर्वी साम्राज्य का प्रारंभ भारत के पश्चिमी तट स्थित कोचीन (वर्तमान कोच्चि) से हुआ। 1503 ई. में स्थापित यह पुर्तगाली केंद्र प्रारंभ में व्यापारिक तथा प्रशासनिक गतिविधियों का प्रमुख आधार बना। 1505 ई. में फ़्रांसिस्को डी अल्मीडा को भारत का प्रथम वायसराय नियुक्त किया गया और कोचीन को पुर्तगाली सत्ता का मुख्यालय बनाया गया।
1509 ई. में अफोंसो डी अल्बुकर्क (लगभग 1453–1515 ई.) के सत्ता संभालने के बाद पुर्तगाली विस्तार को नई दिशा मिली। अल्बुकर्क ने सैन्य शक्ति, कूटनीति तथा समुद्री प्रभुत्व के आधार पर हिंद महासागर में पुर्तगाली प्रभाव को सुदृढ़ किया। 1510 ई. में उसने बीजापुर सल्तनत से गोवा पर अधिकार कर लिया। इसके बाद गोवा शीघ्र ही पुर्तगाली साम्राज्य का प्रमुख प्रशासनिक, सैन्य तथा व्यापारिक केंद्र बन गया और कुछ ही वर्षों में उसने कोचीन का स्थान लेकर ‘एस्तादो दा इंडिया’ की राजधानी का रूप धारण कर लिया।
हिंद महासागर में पुर्तगाली विस्तार
पुर्तगालियों ने एशियाई व्यापार पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए शक्तिशाली नौसेना का निर्माण किया। उन्होंने समुद्री मार्गों की निगरानी हेतु सशस्त्र जहाजों का उपयोग किया तथा व्यापारिक केंद्रों की सुरक्षा के लिए अनेक किलों का निर्माण कराया। उनकी नीति विशाल भू-भागों पर अधिकार करने की नहीं, बल्कि प्रमुख समुद्री मार्गों, जलडमरूमध्यों और व्यापारिक बंदरगाहों को नियंत्रित करने की थी।
अल्बुकर्क के नेतृत्व में पुर्तगाली साम्राज्य का विस्तार भारत से आगे दक्षिण-पूर्व एशिया तक हुआ। 1511 ई. में उसने मलक्का पर अधिकार कर लिया, जो भारत, चीन और दक्षिण-पूर्व एशिया के मध्य व्यापार का प्रमुख केंद्र था। 1515 ई. में पुर्तगालियों ने होर्मुज़ पर अधिकार स्थापित किया, जो फारस की खाड़ी का प्रवेश-द्वार था। यहाँ निर्मित विशाल दुर्ग के माध्यम से उन्होंने लंबे समय तक इस सामरिक समुद्री मार्ग पर नियंत्रण बनाए रखा।
एशिया और अफ्रीका में पुर्तगाली केंद्र
हिंद महासागर क्षेत्र में पुर्तगालियों ने अनेक सामरिक और व्यापारिक केंद्र स्थापित किए। यद्यपि अदन पर अधिकार करने का उनका प्रयास असफल रहा, फिर भी उन्होंने कोलंबो (1518 ई.), कोल्लम (1519 ई.) तथा चौल (1521 ई.) में अपने किले और व्यापारिक केंद्र स्थापित किए। पूर्वी अफ्रीका में मोज़ाम्बीक द्वीप पर उन्होंने एक सुदृढ़ दुर्ग का निर्माण किया, जो अफ्रीका, अरब और भारत के मध्य समुद्री संपर्क का महत्त्वपूर्ण केंद्र बन गया।
1516–1517 ई. में मिस्र और सीरिया पर ऑटोमन तुर्कों के अधिकार के बाद अरब क्षेत्र में पुर्तगालियों की विस्तारवादी योजनाओं को झटका लगा। परिणामस्वरूप उन्होंने अपना ध्यान पूर्वी एशिया की ओर मोड़ा और चीन तथा जापान के साथ व्यापारिक संबंधों को विकसित करने का प्रयास किया।
औपनिवेशिक प्रशासनिक व्यवस्था
‘एस्तादो दा इंडिया’ की प्रशासनिक व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य समुद्री व्यापार की सुरक्षा, बंदरगाहों का नियंत्रण तथा सामरिक हितों की रक्षा था। भारत स्थित पुर्तगाली प्रशासन का सर्वोच्च अधिकारी वायसराय होता था, जो नागरिक और सैन्य दोनों अधिकारों का प्रमुख था तथा सीधे पुर्तगाल के राजा के प्रति उत्तरदायी रहता था।
लिस्बन स्थित कासा दा इंडिया एशिया के साथ व्यापार, जहाजों के संचालन तथा समुद्री संचार का प्रमुख शाही विभाग था। इसके अतिरिक्त, पुर्तगाल की राजकीय परिषद उपनिवेशों से संबंधित नीतियों के निर्माण में सहयोग देती थी। इसी प्रशासनिक ढाँचे और सुदृढ़ नौसैनिक शक्ति के आधार पर पुर्तगाल ने लगभग एक शताब्दी तक हिंद महासागर के व्यापारिक क्षेत्र में प्रभावशाली स्थान बनाए रखा।
एस्तादो दा इंडिया का प्रशासनिक ढाँचा
1505 ई. में पुर्तगाल के राजा मैनुअल प्रथम ने फ़्रांसिस्को डी अल्मीडा को भारत का प्रथम वायसराय नियुक्त किया और उसी वर्ष ‘एस्तादो दा इंडिया’ की औपचारिक स्थापना की गई। वायसराय को हिंद महासागर क्षेत्र में पुर्तगाली अधिकारों की रक्षा, व्यापारिक गतिविधियों के संचालन तथा सामरिक केंद्रों के प्रशासन की सर्वोच्च जिम्मेदारी सौंपी गई। प्रशासन का प्रमुख केंद्र प्रारंभ में कोचीन था, किंतु 1510 ई. में गोवा पर अधिकार के बाद शीघ्र ही गोवा ‘एस्तादो दा इंडिया’ की राजधानी और प्रशासनिक मुख्यालय बन गया।
गोवा में निवास करने वाला वायसराय भारत तथा पूर्व में स्थित सभी पुर्तगाली अधिकार क्षेत्रों का सर्वोच्च प्रतिनिधि था। वह नागरिक, सैन्य और प्रशासनिक कार्यों का प्रधान अधिकारी होता था तथा सीधे पुर्तगाल के राजा के प्रति उत्तरदायी रहता था। अपने पद की प्रतिष्ठा प्रदर्शित करने के लिए वह विशेष राजकीय वेशभूषा धारण करता था। गहरे लाल रंग का लबादा, हाथ में राजदंड (बैटन), सिर के ऊपर जरीदार छत्र तथा बड़ी संख्या में अनुचरों के साथ उसका सार्वजनिक आगमन पुर्तगाली सत्ता और गौरव का प्रतीक माना जाता था।
विभिन्न बंदरगाहों, किलों और व्यापारिक केंद्रों पर नियुक्त गवर्नर, कप्तान तथा अन्य अधिकारी वायसराय के अधीन कार्य करते थे। लिस्बन स्थित कासा दा इंडिया एशियाई व्यापार, जहाजों की आवाजाही तथा उपनिवेशों से संबंधित प्रशासनिक और आर्थिक गतिविधियों का समन्वय करती थी। पुर्तगालियों की नीति विशाल भू-भागों पर अधिकार करने की अपेक्षा प्रमुख समुद्री मार्गों, सामरिक जलडमरूमध्यों और व्यापारिक बंदरगाहों पर नियंत्रण स्थापित करने की थी। इसी कारण उनका साम्राज्य मुख्यतः गोवा, कोचीन, दमन, दीव, होर्मुज़, मलक्का और मकाऊ जैसे तटीय केंद्रों तक सीमित रहा।
वायसराय की सहायता के लिए एक शासक परिषद कार्य करती थी। सोलहवीं शताब्दी के प्रारंभ में यह कोई स्थायी संस्था नहीं थी, बल्कि आवश्यकता के अनुसार वायसराय प्रमुख अधिकारियों और विशेषज्ञों को बुलाकर इसका गठन करता था। प्रशासनिक आवश्यकताओं के अनुसार इसकी संरचना बदलती रहती थी। बाद में 1604 ई. में गोवा में औपचारिक स्टेट काउंसिल (राज्य परिषद) की स्थापना की गई, जिसने प्रशासनिक तथा नीतिगत निर्णयों में अधिक संगठित भूमिका निभाई।
एस्तादो दा इंडिया की चुनौतियाँ
सोलहवीं शताब्दी में पुर्तगालियों ने हिंद महासागर के व्यापार पर उल्लेखनीय नियंत्रण स्थापित कर लिया था, किंतु यह प्रभुत्व स्थायी सिद्ध नहीं हुआ। स्थानीय हिंदू, मुस्लिम, अरब तथा गुजराती व्यापारियों ने उनके व्यापारिक एकाधिकार का निरंतर विरोध किया और भारतीय शासकों ने समय-समय पर उनकी विस्तारवादी नीति का प्रतिरोध किया।
सत्रहवीं शताब्दी से डच और अंग्रेज़ जैसी नई यूरोपीय शक्तियों के उदय ने पुर्तगालियों की स्थिति को और अधिक कमजोर कर दिया। इन शक्तियों के पास अधिक पूँजी, आधुनिक जहाज़, संगठित व्यापारिक कंपनियाँ तथा शक्तिशाली नौसेनाएँ थीं। परिणामस्वरूप हिंद महासागर के व्यापार में पुर्तगालियों का प्रभुत्व धीरे-धीरे समाप्त होने लगा।
पुर्तगाली साम्राज्य की एक अन्य प्रमुख कमजोरी उसकी सीमित जनशक्ति और आर्थिक संसाधन थे। विशाल समुद्री क्षेत्र में फैले बंदरगाहों और किलों की सुरक्षा तथा प्रशासन पर अत्यधिक व्यय होता था। 1500 ई. में ब्राज़ील की खोज के बाद पुर्तगाल का ध्यान क्रमशः दक्षिण अमेरिका की ओर केंद्रित होने लगा, जिससे एशियाई उपनिवेशों की उपेक्षा बढ़ गई। स्थानीय प्रतिरोध, यूरोपीय प्रतिस्पर्धा और संसाधनों की कमी के कारण ‘एस्तादो दा इंडिया’ की शक्ति समय के साथ निरंतर क्षीण होती गई।
स्थानीय प्रशासन और ‘कैमारा’ व्यवस्था
पुर्तगाली उपनिवेशों में स्थानीय प्रशासन के लिए कैमारा नामक नगर परिषदों की व्यवस्था थी। इन परिषदों में मुख्यतः पुर्तगाली तथा यूरोपीय मूल के स्थानीय नागरिक (लुसो-भारतीय/यूरेशियन समुदाय सहित) सम्मिलित होते थे। कैमारा स्थानीय प्रशासन, नगर व्यवस्था, कर निर्धारण तथा प्रारंभिक न्यायिक कार्यों का संचालन करती थी।
यद्यपि विभिन्न उपनिवेशों में स्थानीय प्रशासनिक संस्थाएँ कार्यरत थीं, फिर भी पूर्वी अफ्रीका से लेकर भारत, मलक्का और मकाऊ तक के सभी प्रमुख अधिकारी अंततः गोवा स्थित वायसराय के अधीन थे। सत्रहवीं शताब्दी में गोवा तथा कुछ अन्य प्रमुख उपनिवेशों को पुर्तगाल की संसद कोर्टेस में प्रतिनिधि भेजने का अधिकार भी प्राप्त हुआ। जब तक ब्राज़ील पुर्तगाली साम्राज्य का प्रमुख केंद्र नहीं बना, तब तक ‘एस्तादो दा इंडिया’ में उच्च प्रशासनिक पद पर नियुक्ति अत्यंत प्रतिष्ठित मानी जाती थी।
न्याय, सैन्य एवं आर्थिक प्रशासन
पुर्तगाली उपनिवेशों में न्यायिक व्यवस्था का संचालन उच्च न्यायालयों द्वारा किया जाता था, जिनकी आधिकारिक भाषा पुर्तगाली थी। यूरोपीय विधि मुख्यतः पुर्तगाली तथा मिश्रित मूल की आबादी पर लागू होती थी, जबकि स्थानीय भारतीय समुदायों को अधिकांश मामलों में उनकी पारंपरिक सामाजिक एवं न्यायिक व्यवस्थाओं के अनुसार जीवन-यापन करने की अनुमति दी जाती थी।
गोवा, मलक्का तथा कुछ अन्य प्रमुख केंद्रों में पुर्तगालियों ने अपनी टकसालें स्थापित कीं, जहाँ शाही सिक्के ढाले जाते थे। प्रत्येक प्रमुख बंदरगाह और किले की सुरक्षा के लिए स्थायी सैनिक दल तैनात रहता था। बंदरगाहों का प्रशासन एक कप्तान के अधीन होता था, जबकि व्यापारिक गतिविधियों की देखरेख के लिए फैक्टर नियुक्त किए जाते थे। उनका कार्य शाही व्यापार का प्रबंधन, सीमा शुल्क की वसूली तथा व्यापारिक आय का लेखा-जोखा रखना था।
गोवा अभिलेखागार और ऐतिहासिक स्रोत
गोवा ‘एस्तादो दा इंडिया’ की राजधानी होने के कारण पुर्तगाली प्रशासनिक अभिलेखों का प्रमुख केंद्र था। यहाँ सुरक्षित दस्तावेज़ प्रशासन, कूटनीति, व्यापार तथा औपनिवेशिक नीतियों के अध्ययन के महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं। गोवा अभिलेखागार में संरक्षित ‘लिव्रोस दास पाज़ेस ई त्रातादोस दा इंडिया’ पाँच हस्तलिखित ग्रंथों का संग्रह है, जिसमें 1571 ई. से 1856 ई. के बीच गोवा, पूर्वी अफ्रीका, भारत तथा अन्य एशियाई राज्यों और यूरोपीय शक्तियों के साथ संपन्न संधियों एवं समझौतों का विवरण मिलता है। इसके अतिरिक्त 25 खंडों में संकलित अभिलेखीय संग्रह में 1619 ई. से 1842 ई. तक पुर्तगाली अधिकारियों और भारतीय शासकों के मध्य हुए आधिकारिक पत्राचार सुरक्षित हैं। ये अभिलेख पुर्तगाली प्रशासन, कूटनीतिक संबंधों तथा औपनिवेशिक शासन-व्यवस्था के अध्ययन के अत्यंत विश्वसनीय और महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक स्रोत हैं।
व्यापार पर पुर्तगाली एकाधिकार की नीति
पुर्तगालियों का उद्देश्य एशिया और यूरोप के मध्य समुद्री व्यापार तथा हिंद महासागर के आंतरिक व्यापार पर अपना प्रभुत्व स्थापित करना था। मसालों और अन्य मूल्यवान वस्तुओं के व्यापार से अधिकतम लाभ प्राप्त करने तथा प्रतिस्पर्धियों को नियंत्रित करने के लिए उन्होंने कठोर प्रशासनिक व्यवस्था विकसित की। बिना सरकारी अनुमति व्यापार करने वाले निजी व्यापारियों के विरुद्ध दंडात्मक कार्रवाई की जाती थी।
इसी उद्देश्य से कार्ताज़ नामक समुद्री अनुमति-पत्र प्रणाली लागू की गई। पुर्तगाली नियंत्रण वाले समुद्री क्षेत्रों में व्यापार करने वाले प्रत्येक व्यापारी जहाज के लिए कार्ताज़ प्राप्त करना अनिवार्य था। जिन जहाजों के पास यह अनुमति-पत्र नहीं होता था, उन्हें अवैध घोषित कर उनका माल तथा जहाज जब्त कर लिया जाता था। अनेक अवसरों पर, विशेषकर मुस्लिम व्यापारियों के साथ, इस व्यवस्था का कठोरता से पालन कराया गया। इसके अतिरिक्त पुर्तगालियों ने अपने बंदरगाहों पर सीमा शुल्क लगाया तथा व्यापारिक जहाजों को अपने संरक्षित काफिलों (कॉन्वॉय) के साथ यात्रा करने के लिए बाध्य किया।
इस व्यापारिक व्यवस्था से ‘एस्तादो दा इंडिया’ को पर्याप्त आर्थिक लाभ प्राप्त हुआ। सीमा शुल्क, बंदरगाह कर तथा व्यापारिक नियंत्रण से प्राप्त आय पूर्वी पुर्तगाली साम्राज्य के राजस्व का प्रमुख स्रोत थी और अनुमानतः उसकी कुल आय का लगभग 60 प्रतिशत भाग इसी माध्यम से प्राप्त होता
पुर्तगाली नियंत्रण की सीमाएँ
यद्यपि पुर्तगालियों ने हिंद महासागर के समुद्री व्यापार पर प्रभुत्व स्थापित करने का प्रयास किया, फिर भी वे संपूर्ण व्यापारिक तंत्र को अपने नियंत्रण में नहीं ला सके। अरब, भारतीय, फ़ारसी तथा अन्य एशियाई व्यापारी अपने पारंपरिक व्यापारिक मार्गों पर सक्रिय रहे और आवश्यकता पड़ने पर पुर्तगाली नियंत्रण वाले बंदरगाहों से बचते हुए वैकल्पिक मार्गों का उपयोग करते रहे। विशेष रूप से छोटे जहाजों द्वारा संचालित स्थानीय एवं तटीय व्यापार का विशाल नेटवर्क पुर्तगालियों के प्रभाव से लगभग बाहर रहा।
समय के साथ पुर्तगाली अधिकारियों को यह अनुभव हुआ कि कठोर नियंत्रण और पूर्ण व्यापारिक एकाधिकार दीर्घकाल में व्यवहारिक नहीं है। अत्यधिक सीमा शुल्क और प्रतिबंधों से व्यापार प्रभावित होने लगा। परिणामस्वरूप ‘एस्तादो दा इंडिया’ की व्यापारिक नीति में परिवर्तन किया गया और गैर-पुर्तगाली व्यापारियों के प्रति अपेक्षाकृत उदार दृष्टिकोण अपनाया गया।
ईसाई धर्म और पुर्तगाली मिशनरी गतिविधियाँ
‘एस्तादो दा इंडिया’ के धार्मिक प्रशासन का प्रमुख उद्देश्य एशिया में ईसाई धर्म का प्रचार-प्रसार था। प्रत्येक प्रमुख पुर्तगाली उपनिवेश में धार्मिक व्यवस्था के लिए बिशप या आर्कबिशप नियुक्त किए जाते थे। 1533 ई. में पोप के आदेश से गोवा के आर्कडायोसिस की स्थापना हुई और गोवा के आर्कबिशप को ‘एस्तादो दा इंडिया’ का सर्वोच्च धार्मिक अधिकारी बनाया गया। बाद में कोचीन, मलक्का, मकाऊ, नागासाकी, क्रंगानोर, मेलियापोर, बीजिंग, नानजिंग तथा मोज़ाम्बिक में भी धार्मिक प्रशासनिक इकाइयाँ स्थापित की गईं।
पुर्तगाली शासन के साथ फ्रांसिस्कन, डोमिनिकन, जेसुइट तथा ऑगस्टीनियन जैसे ईसाई धार्मिक संघों का विस्तार हुआ। इन संगठनों ने चर्च, मठ, विद्यालय और अस्पताल स्थापित किए तथा धर्म-प्रचार के साथ शिक्षा और सामाजिक सेवा के कार्य भी किए। 1542 ई. में संत फ्रांसिस जेवियर के गोवा आगमन के बाद मिशनरी गतिविधियों को विशेष गति मिली। पुर्तगाली सरकार अनेक अवसरों पर मिशनरियों का उपयोग फ़ारस से जापान तक के शासकों के साथ कूटनीतिक संपर्क स्थापित करने के लिए भी करती थी।
धार्मिक नीति सभी क्षेत्रों में समान नहीं थी। कुछ स्थानों पर स्थानीय समुदायों को अपने धार्मिक विश्वासों और परंपराओं का पालन करने की अनुमति दी गई, जबकि अन्य क्षेत्रों में मंदिरों को ध्वस्त किया गया, उनकी संपत्ति जब्त की गई तथा पारंपरिक धार्मिक प्रथाओं पर प्रतिबंध लगाए गए। विशेष रूप से गोवा में 1560 ई. में स्थापित इन्क्विज़िशन (धार्मिक न्यायालय) की कठोर कार्यवाही ने स्थानीय समाज में व्यापक असंतोष उत्पन्न किया।
औपनिवेशिक समाज की सामाजिक संरचना
पुर्तगाली उपनिवेशों का समाज स्पष्ट रूप से नस्लीय और सामाजिक श्रेणियों में विभाजित था। यूरोपीय मूल के लोगों को सर्वोच्च सामाजिक स्थान प्राप्त था। उच्च प्रशासनिक एवं सैन्य पदों पर सामान्यतः पुर्तगाली कुलीन वर्ग के लोगों की नियुक्ति की जाती थी। न्यायिक और प्रशासनिक पदों के लिए विशेष शिक्षा आवश्यक मानी जाती थी। मजिस्ट्रेट बनने हेतु सामान्यतः कोयम्ब्रा विश्वविद्यालय से कैनन लॉ अथवा सिविल लॉ की शिक्षा अपेक्षित थी। प्रशासक, सैनिक अधिकारी, चिकित्सक और सैन्य अभियंता समय-समय पर विभिन्न उपनिवेशों में स्थानांतरित किए जाते थे।
औपनिवेशिक व्यवस्था में कुशल कारीगरों का भी विशेष महत्त्व था, जिन्हें पुर्तगाली भाषा में ‘मेस्तेइराइस’ कहा जाता था। इनमें पत्थर तराशने वाले, लोहार, बढ़ई, टाइल निर्माता तथा जहाज और किले बनाने में दक्ष शिल्पकार सम्मिलित थे। जहाज निर्माण, दुर्ग-निर्माण और तोपखाने के विकास में उनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। स्थायी रूप से उपनिवेशों में बसने वाले पुर्तगाली नागरिक ‘कासाडोस’ कहलाते थे।
पुर्तगाली समाज के विभिन्न वर्ग
पुर्तगाली औपनिवेशिक समाज में जन्म और वंश के आधार पर अनेक सामाजिक वर्ग विकसित हुए। पुर्तगाल में जन्मे यूरोपीय रेइनोइस, उपनिवेशों में जन्मे यूरोपीय क्रियोलो तथा मिश्रित यूरोपीय-स्थानीय वंश के लोग मेस्टिसो कहलाते थे। इनके अतिरिक्त कुलीन वर्ग (फिदाल्गो), पादरी, सैनिक, व्यापारी, कारीगर तथा सामान्य नागरिक समाज के प्रमुख वर्ग थे। अफ्रीकी और एशियाई व्यापारी तथा स्थानीय कृषक भी औपनिवेशिक समाज का महत्त्वपूर्ण अंग थे।
पुर्तगाली उपनिवेशों में डिग्रेडाडोस नामक एक विशेष वर्ग भी था। ये वे व्यक्ति थे, जिन्हें अपराध अथवा अन्य कारणों से पुर्तगाल से निर्वासित कर उपनिवेशों में भेजा जाता था। इनमें अपराधी, निर्वासित, धर्मांतरित यहूदी (न्यू क्रिश्चियन), जिप्सी तथा अन्य वंचित समूह सम्मिलित थे। जिनके पास कोई विशेष कौशल नहीं होता था, वे सामान्य श्रमिक के रूप में कार्य करते थे।
उपनिवेशों में पुर्तगाली महिलाओं की संख्या अत्यंत कम होने के कारण स्थानीय समुदायों के साथ अंतर-विवाह की परंपरा विकसित हुई, जिससे मिश्रित लुसो-भारतीय समुदाय का उदय हुआ। गोवा में हिंदू व्यापारी और कृषक तथा मलक्का में मलय समुदाय जैसी स्थानीय आबादी कुल जनसंख्या का विशाल भाग बनी रही। अधिकांश पुर्तगाली उपनिवेशों में स्थानीय लोग कुल आबादी के लगभग 95 प्रतिशत या उससे अधिक थे।
सामाजिक श्रेणीक्रम में सबसे निम्न स्थान दासों का था। इन्हें स्थानीय क्षेत्रों से खरीदा जाता था अथवा मोज़ाम्बिक, साओ टोमे तथा एशिया और अफ्रीका के अन्य पुर्तगाली उपनिवेशों से लाया जाता था। घरेलू सेवा, कृषि, निर्माण तथा बंदरगाहों में श्रम के लिए दासों का व्यापक उपयोग किया जाता था। इस प्रकार दास-प्रथा पुर्तगाली औपनिवेशिक समाज और अर्थव्यवस्था का एक महत्त्वपूर्ण, किंतु शोषणकारी आधार थी।
यूरोपीय प्रतिद्वंद्विता और पुर्तगाली साम्राज्य का पतन
सोलहवीं शताब्दी में स्थापित ‘एस्तादो दा इंडिया’ को सत्रहवीं शताब्दी से राजनीतिक, आर्थिक और सैन्य चुनौतियों का सामना करना पड़ा। विशाल समुद्री साम्राज्य की सुरक्षा और प्रशासन पुर्तगाल जैसे सीमित संसाधनों वाले राष्ट्र के लिए कठिन होता गया। दूरस्थ किलों और व्यापारिक चौकियों का प्रभावी रखरखाव संभव नहीं रहा, जिससे वे बाहरी आक्रमणों के प्रति असुरक्षित हो गए। यूरोप में निरंतर युद्धों के कारण पुर्तगाली राजसत्ता का ध्यान बँट गया, जबकि उपनिवेशों में भ्रष्टाचार और प्रशासनिक शिथिलता बढ़ती गई। सीमित जनशक्ति, आर्थिक संसाधनों की कमी और कमजोर प्रशासन ने पुर्तगाली साम्राज्य की नींव को धीरे-धीरे कमजोर कर दिया।
डच और अन्य यूरोपीय शक्तियों का उदय
सोलहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में डच व्यापारी हिंद महासागर क्षेत्र में सक्रिय हुए। 1596 ई. में दक्षिण-पूर्व एशिया पहुँचने के बाद उन्होंने पुर्तगाली व्यापारिक प्रभुत्व को चुनौती देना प्रारंभ किया। डच ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपनी संगठित व्यापारिक व्यवस्था, पर्याप्त पूँजी और शक्तिशाली नौसेना के बल पर पुर्तगालियों के अनेक महत्त्वपूर्ण केंद्रों पर अधिकार कर लिया। 1641 ई. में मलक्का, 1656 ई. में कोलंबो और 1663 ई. में कोचीन डचों के अधीन आ गए।
यद्यपि गोवा, जो ‘एस्तादो दा इंडिया’ की राजधानी था, डच आक्रमणों और घेराबंदियों के बावजूद पुर्तगाली नियंत्रण में बना रहा, फिर भी इस संघर्ष ने उनकी शक्ति को गंभीर रूप से कमजोर कर दिया। इसी अवधि में 1640–1668 ई. के बीच स्पेन के साथ चले युद्धों ने पुर्तगाल की आर्थिक और सैन्य क्षमता को क्षीण कर दिया। साथ ही ब्राज़ील की रक्षा पर भारी संसाधन व्यय होने से एशियाई उपनिवेशों की उपेक्षा बढ़ती गई।
एशियाई क्षेत्रों में पुर्तगाली प्रभाव का अंत
सत्रहवीं शताब्दी में एशियाई शक्तियों ने भी पुर्तगाली प्रभुत्व को चुनौती देना प्रारंभ कर दिया। 1622 ई. में फ़ारस के सफ़वीद शासकों ने अंग्रेज़ों की सहायता से होर्मुज़ पर अधिकार कर लिया, जिससे फ़ारस की खाड़ी में पुर्तगालियों का प्रभुत्व समाप्त हो गया। पश्चिमी भारत में मराठों ने भी समय-समय पर गोवा तथा उसके आसपास के क्षेत्रों में पुर्तगाली सत्ता को चुनौती दी।
इसी काल में अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कंपनी का प्रभाव निरंतर बढ़ता गया। अंग्रेज़ों और डचों ने अधिक संगठित व्यापारिक नेटवर्क तथा आधुनिक नौसैनिक शक्ति के आधार पर हिंद महासागर के व्यापार में अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया। परिणामस्वरूप पुर्तगालियों का व्यापारिक एकाधिकार समाप्त होता गया और उनका प्रभाव क्रमशः गोवा, दमन तथा दीव जैसे सीमित क्षेत्रों तक सिमटने लगा।
जब समुद्री व्यापार पर उनका नियंत्रण कमजोर होने लगा, तब पुर्तगालियों ने गोवा के आसपास के क्षेत्रों का विस्तार कर अपने भू-आधारित अधिकार को सुदृढ़ करने का प्रयास किया। अठारहवीं शताब्दी में अधिग्रहित ये क्षेत्र ‘नई विजय’ के नाम से प्रसिद्ध हुए। साथ ही, बदलती राजनीतिक परिस्थितियों में ‘एस्तादो दा इंडिया’ ने अन्य यूरोपीय शक्तियों के प्रति अपेक्षाकृत तटस्थ नीति अपनाने का प्रयास किया, किंतु इससे उसकी गिरती स्थिति में कोई विशेष सुधार नहीं हुआ।
पुर्तगाली साम्राज्य का अंतिम चरण
सत्रहवीं और अठारहवीं शताब्दियों में पुर्तगाली साम्राज्य का अधिकांश भाग हाथ से निकल गया, यद्यपि गोवा, दमन, दीव और मकाऊ जैसे कुछ प्रमुख केंद्र लंबे समय तक उसके अधिकार में बने रहे। साम्राज्य के सीमित हो जाने तथा अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में एशियाई व्यापार के पुनः सक्रिय होने से ये उपनिवेश कुछ समय तक टिके रहे।
द्वितीय विश्व युद्ध (1939–1945 ई.) के बाद विश्वभर में उपनिवेशवाद-विरोधी आंदोलनों के प्रभाव से पुर्तगाली साम्राज्य का अंत तेज़ी से होने लगा। भारत सरकार ने दिसंबर 1961 में ‘ऑपरेशन विजय’ के माध्यम से गोवा, दमन और दीव को भारतीय संघ में सम्मिलित कर लिया। इसके साथ ही भारत में लगभग साढ़े चार शताब्दियों से चला आ रहा ‘एस्तादो दा इंडिया’ का शासन समाप्त हो गया।
एशिया में पुर्तगाल का अंतिम प्रमुख उपनिवेश मकाऊ था, जिसे 1999 ई. में चीन को सौंप दिया गया। यद्यपि पुर्तगाली साम्राज्य राजनीतिक रूप से समाप्त हो गया, फिर भी उसकी सांस्कृतिक विरासत आज भी अनेक क्षेत्रों में विद्यमान है। पुर्तगाली भाषा, औपनिवेशिक स्थापत्य, कैथोलिक धार्मिक परंपराएँ तथा यूरोपीय और एशियाई संस्कृतियों का समन्वय ‘एस्तादो दा इंडिया’ की स्थायी विरासत के रूप में आज भी देखा जा सकता है।




