भारत में यूरोपियों का आगमन (The Arrival of Europeans in India)

भारत में यूरोपियों का आगमन (The Arrival of Europeans in India)

भारत में यूरोपियों का आगमन

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यूरोपीय देशों के साथ भारत का अत्यंत प्राचीन काल से संबंध चला आ रहा है। यूरोपीय देशों के साथ यह व्यापार प्रायः तीन मार्गों से होता था। उत्तरी मार्ग अफ़ग़ानिस्तान तथा मध्य एशिया से होता हुआ कैस्पियन सागर और काला सागर की ओर जाता था तथा कुस्तुंतुनिया (इस्तांबुल) जाकर समाप्त होता था। मध्यम मार्ग फ़ारस (ईरान) तथा सीरिया से होता हुआ भूमध्य सागर के तट पर स्थित लेवांत तक पहुँचता था। दक्षिणी मार्ग प्रायः जलमार्ग था, जो अरब सागर, फ़ारस की खाड़ी तथा लाल सागर से मिस्र होता हुआ भूमध्य सागर के तट पर स्थित सिकंदरिया तक जाता था। इसके आगे इटली के व्यापारी इस भारतीय माल को खरीदकर यूरोप के अन्य देशों में पहुँचाते थे। परंतु पंद्रहवीं शताब्दी के मध्य में भारत तथा यूरोपीय देशों के बीच होने वाले व्यापार में व्यवधान उत्पन्न हो गया। इस व्यवधान का प्रमुख कारण ओटोमन साम्राज्य की स्थापना और उसका विस्तार था, जो पश्चिमी एशिया, अफ्रीका तथा दक्षिण-पूर्वी यूरोप के विस्तृत क्षेत्रों तक फैल गया था। अतः ओटोमन शासक यूरोपीय व्यापारियों को अपने साम्राज्य से होकर पूर्वी देशों के साथ व्यापार करने की सुविधा देने के इच्छुक नहीं थे। इसी कारण पश्चिमी देशों को एक नए व्यापारिक मार्ग की खोज की आवश्यकता महसूस हुई।

नए समुद्री मार्गों की खोज के कारण
पारंपरिक व्यापार मार्गों का अवरुद्ध होना

मध्यकाल के उत्तरार्ध में यूरोप और एशिया के बीच स्थापित पारंपरिक व्यापारिक मार्ग धीरे-धीरे अवरुद्ध होने लगे, जबकि भारतीय मसाले, वस्त्र, रत्न तथा अन्य विलासिता की वस्तुओं की यूरोपीय बाजारों में अत्यधिक माँग थी। इन वस्तुओं का व्यापार मुख्यतः अरब और फारसी व्यापारियों के माध्यम से होता था, जिसके कारण यूरोपीय व्यापारियों को भारतीय वस्तुएँ अप्रत्यक्ष मार्गों से अधिक मूल्य पर प्राप्त होती थीं।

1453 ई. में कुस्तुंतुनिया पर उस्मानी तुर्कों के अधिकार के बाद यूरोप और एशिया के मध्य स्थल मार्गों तथा लाल सागर के व्यापारिक मार्गों पर तुर्कों और मुस्लिम व्यापारियों का प्रभाव बढ़ गया, जिसके परिणामस्वरूप भारत तथा पूर्वी देशों तक यूरोपीय व्यापारियों की पहुँच कठिन हो गई। इस स्थिति ने यूरोपीय शक्तियों को भारत के लिए नए समुद्री मार्ग की खोज करने के लिए प्रेरित किया। उनका उद्देश्य अरब और तुर्क व्यापारियों के एकाधिकार को समाप्त कर मसाला व्यापार पर प्रत्यक्ष नियंत्रण स्थापित करना था।

पुनर्जागरण का प्रभाव

पंद्रहवीं शताब्दी में पुनर्जागरण ने यूरोप में वैज्ञानिक दृष्टिकोण, जिज्ञासा, साहस तथा नवीन ज्ञान की खोज की भावना को प्रोत्साहित किया। पुराने भौगोलिक ज्ञान को चुनौती दी गई और नए क्षेत्रों की खोज के प्रति रुचि बढ़ी। परिणामस्वरूप दूरस्थ देशों की यात्राएँ करने, नई भूमियों की खोज करने तथा व्यापार का विस्तार करने की प्रवृत्ति विकसित हुई।

तेरहवीं शताब्दी से ही भारतीय महासागर क्षेत्र के प्रति यूरोपीय यात्रियों की रुचि बढ़ने लगी थी। वेनिस के निकोलो कॉन्टी, रूसी यात्री अफानासी निकितिन तथा अन्य यात्रियों ने भारत की यात्रा कर यहाँ के समाज, व्यापार और आर्थिक समृद्धि का परिचय यूरोप को कराया। इन विवरणों ने भारत के साथ प्रत्यक्ष संपर्क स्थापित करने की यूरोपीय आकांक्षा को और अधिक प्रबल बनाया।

जहाज निर्माण और नौवहन तकनीक में प्रगति

पंद्रहवीं शताब्दी में यूरोप में जहाज निर्माण तथा नौवहन तकनीक में उल्लेखनीय प्रगति हुई। कैरवेल जैसे उन्नत जहाजों के निर्माण, कुतुबनुमा (कंपास), एस्ट्रोलैब तथा अधिक सटीक समुद्री मानचित्रों के विकास से लंबी समुद्री यात्राएँ पहले की अपेक्षा अधिक सुरक्षित और सफल होने लगीं। इन तकनीकी उपलब्धियों ने नाविकों का आत्मविश्वास बढ़ाया तथा उन्हें अज्ञात समुद्री मार्गों की खोज के लिए प्रेरित किया।

यूरोप का आर्थिक विकास और मसालों की बढ़ती माँग

पंद्रहवीं शताब्दी में यूरोप की अर्थव्यवस्था तीव्र गति से विकसित हो रही थी। कृषि उत्पादन में वृद्धि, बेहतर कृषि उपकरणों तथा फसल-चक्र जैसी नई तकनीकों के प्रयोग से आर्थिक समृद्धि बढ़ी। इसके साथ ही पूर्वी देशों की विलासिता की वस्तुओं, विशेषकर भारतीय मसालों, की माँग में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई।

काली मिर्च, दालचीनी, लौंग तथा अन्य मसालों का उपयोग भोजन को स्वादिष्ट बनाने के साथ-साथ मांस को लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए किया जाता था। यूरोप में सर्दियों के दौरान पशुओं के लिए पर्याप्त चारे का अभाव होने के कारण बड़ी संख्या में उनका वध कर मांस को नमक लगाकर संरक्षित किया जाता था। ऐसे मांस के स्वाद और गुणवत्ता को बनाए रखने के लिए भारतीय मसालों की आवश्यकता अत्यधिक बढ़ गई। परिणामस्वरूप मसाला व्यापार अत्यंत लाभदायक बन गया और भारत तक प्रत्यक्ष समुद्री मार्ग खोजने की प्रेरणा और अधिक प्रबल हुई।

धार्मिक और राजनीतिक उद्देश्य

नए समुद्री मार्गों की खोज केवल आर्थिक कारणों से प्रेरित नहीं थी। इसके पीछे धार्मिक और राजनीतिक उद्देश्य भी समान रूप से महत्त्वपूर्ण थे। उस समय यूरोप में ईसाई और इस्लामी शक्तियों के बीच लंबे समय से संघर्ष चल रहा था। पुर्तगाली शासकों को आशा थी कि अफ्रीका और एशिया की खोज के माध्यम से वे प्रसिद्ध ईसाई शासक ‘प्रेस्टर जॉन’ के राज्य तक पहुँचकर मुस्लिम शक्तियों के विरुद्ध उसका सहयोग प्राप्त कर सकेंगे। इसके साथ ही, ईसाई धर्म के प्रचार की भावना भी समुद्री अभियानों का एक प्रमुख उद्देश्य थी। विशेषकर पुर्तगाली शासक और मिशनरी नए क्षेत्रों में पहुँचकर ईसाई धर्म का विस्तार करना चाहते थे। इसी संदर्भ में 1455 ई. में पोप निकोलस पंचम द्वारा जारी पापल बुल ने पुर्तगाल को अफ्रीका के पश्चिमी तट तथा केप क्षेत्र से आगे खोज और अधिकार स्थापित करने का धार्मिक समर्थन प्रदान किया। इसका उद्देश्य व्यापारिक विस्तार के साथ-साथ गैर-ईसाई क्षेत्रों में ईसाई धर्म का प्रचार करना भी था।

इस प्रकार व्यापारिक, आर्थिक, वैज्ञानिक, धार्मिक और राजनीतिक कारणों के संयुक्त प्रभाव से पंद्रहवीं शताब्दी में नवीन समुद्री मार्गों की खोज का युग प्रारंभ हुआ, जिसने आगे चलकर विश्व व्यापार और औपनिवेशिक विस्तार के इतिहास को नई दिशा प्रदान की।

भारत के लिए नए समुद्री मार्ग की खोज

पंद्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में यूरोपीय देशों ने एशिया, विशेषकर भारत तक पहुँचने के नए समुद्री मार्गों की खोज का अभियान प्रारंभ किया। पारंपरिक स्थल एवं समुद्री व्यापारिक मार्गों के अवरुद्ध हो जाने के कारण स्पेन और पुर्तगाल जैसे समुद्री राष्ट्रों ने साहसिक नौवहन अभियानों को प्रोत्साहित किया। इन अभियानों ने विश्व इतिहास, व्यापार और भूगोल को नई दिशा प्रदान की।

जेनोआ और समुद्री खोजों में सहयोग

इटली का जेनोआ नगर मध्यकालीन यूरोप का एक प्रमुख व्यापारिक केंद्र था। जेनोई व्यापारी पूर्वी वस्तुओं के व्यापार में सक्रिय थे, किंतु वे वेनिस के व्यापारिक प्रभुत्व के कारण अपेक्षाकृत पीछे रह गए। 1453 ई. में कॉन्स्टेंटिनोपल (इस्तांबुल) पर उस्मानी तुर्कों के अधिकार के बाद काला सागर के व्यापारिक मार्गों पर उनका प्रभाव भी कमजोर पड़ गया। व्यापारिक कठिनाइयों और वेनिस से प्रतिस्पर्धा के कारण जेनोआ ने स्पेन और पुर्तगाल की समुद्री खोजों में सक्रिय सहयोग दिया। जेनोई व्यापारियों ने जहाज, वित्तीय सहायता तथा नौवहन संबंधी ज्ञान उपलब्ध कराया।

इसी पृष्ठभूमि में प्रसिद्ध जेनोई नाविक क्रिस्टोफर कोलंबस ने स्पेन के संरक्षण में 1492 ई. में पश्चिमी समुद्री मार्ग से भारत पहुँचने का प्रयास किया। वह भारत तक नहीं पहुँच सका और अटलांटिक महासागर पार करके अमेरिका पहुँच गया। यद्यपि उसका उद्देश्य भारत पहुँचना था, फिर भी उसकी इस यात्रा ने यूरोप को एक नए महाद्वीप से परिचित कराया और भौगोलिक खोजों के युग का सूत्रपात किया।

प्रिंस हेनरी और पुर्तगाली समुद्री अन्वेषण

पुर्तगाल के राजकुमार प्रिंस हेनरी द नेविगेटर (नौचालक हेनरी) ने समुद्री अन्वेषण को संगठित रूप से प्रोत्साहित किया। उसने नाविकों के प्रशिक्षण के लिए विद्यालय स्थापित करवाए, मानचित्र-निर्माण तथा नौवहन तकनीकों के विकास को बढ़ावा दिया और अफ्रीका के पश्चिमी तट की खोज के लिए अनेक अभियानों को संरक्षण प्रदान किया। यद्यपि 1460 ई. में उसकी मृत्यु हो गई, फिर भी उसके प्रयासों ने पुर्तगाल की समुद्री खोजों के लिए एक सुदृढ़ आधार तैयार कर दिया।

बार्थोलोम्यू डायस और कुमारी आशा अंतरीप

हेनरी के प्रयासों को आगे बढ़ाते हुए पुर्तगाली नाविक बार्थोलोम्यू डायस 1488 ई. में अफ्रीका के दक्षिणी सिरे तक पहुँचने में सफल हुआ। यात्रा के दौरान उसे भीषण तूफ़ानों का सामना करना पड़ा, इसलिए उसने उस स्थान का नाम ‘तूफ़ानों का अंतरीप’ रखा। बाद में पुर्तगाल के राजा जॉन द्वितीय ने इसे शुभ संकेत मानते हुए ‘कुमारी आशा अंतरीप’ नाम दिया, क्योंकि इससे भारत तक समुद्री मार्ग मिलने की संभावना स्पष्ट हो गई थी।

वास्को डी गामा और भारत का समुद्री मार्ग

अंततः 1498 ई. में पुर्तगाली नाविक वास्को डी गामा कुमारी आशा अंतरीप का चक्कर लगाकर भारत के कालीकट (कोझिकोड) पहुँचा और भारत के लिए प्रत्यक्ष समुद्री मार्ग की खोज करने में सफल हुआ। इस ऐतिहासिक उपलब्धि ने यूरोप और एशिया के बीच प्रत्यक्ष समुद्री व्यापार का मार्ग खोल दिया। इसके परिणामस्वरूप विश्व व्यापार का तीव्र विस्तार हुआ तथा आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों में व्यापक परिवर्तन आए।

भारत में पुर्तगालियों का आगमन

भारत में पुर्तगालियों का आगमन विश्व इतिहास की एक महत्त्वपूर्ण घटना थी, जिसने एशिया और यूरोप के बीच व्यापारिक तथा राजनीतिक संबंधों को नई दिशा प्रदान की। भारत में यूरोपीय शक्तियों के प्रवेश का इतिहास 1498 ई. में पुर्तगालियों के आगमन से प्रारंभ होता है। भारत के लिए प्रत्यक्ष समुद्री मार्ग की खोज ने न केवल यूरोप और एशिया के मध्य व्यापारिक संपर्कों का नया युग आरंभ किया, बल्कि भारत में यूरोपीय औपनिवेशिक प्रभुत्व की भी आधारशिला रखी। अपनी सुदृढ़ नौसैनिक शक्ति, संगठित प्रशासन तथा स्थानीय राजनीतिक परिस्थितियों का लाभ उठाने की नीति के कारण पुर्तगाली शीघ्र ही भारतीय महासागर के व्यापार और राजनीति में एक प्रभावशाली शक्ति बन गए।

वास्को डी गामा का भारत आगमन (1498 ई.)

20 मई 1498 ई. को पुर्तगाली नाविक वास्को डी गामा तीन जहाज़ों के साथ भारत के पश्चिमी तट पर स्थित मलाबार तट के कालीकट पहुँचा। उसकी समुद्री यात्रा में एक गुजराती नाविक अब्दुल मजीद ने मार्गदर्शन किया था। कालीकट के शासक ज़मोरिन (समूथिरि) ने प्रारंभ में पुर्तगालियों का स्वागत किया और उन्हें व्यापार की अनुमति दी, क्योंकि वह विदेशी व्यापार को प्रोत्साहित करना चाहता था। किंतु वहाँ पहले से सक्रिय अरब व्यापारियों ने पुर्तगालियों का विरोध किया, क्योंकि वे लंबे समय से मसाला व्यापार में प्रभावशाली थे। सीमा-शुल्क, व्यापारिक शर्तों तथा मसाला व्यापार पर नियंत्रण को लेकर शीघ्र ही दोनों पक्षों में मतभेद उत्पन्न हो गए। वास्तव में पुर्तगालियों का उद्देश्य केवल व्यापार करना नहीं, बल्कि हिंद महासागर के मसाला व्यापार पर अपना प्रभुत्व स्थापित करना था।

कालीकट में व्यापार करने के बाद वास्को डी गामा बहुमूल्य मसालों के साथ पुर्तगाल लौटा। उसके द्वारा लाए गए माल का मूल्य अभियान की लागत से लगभग 60 गुना अधिक था। इस सफलता ने भारत के साथ प्रत्यक्ष समुद्री व्यापार की अपार संभावनाओं को सिद्ध कर दिया और पुर्तगाल को आगे के अभियानों के लिए प्रेरित किया।

1500 ई. में पेड्रो अल्वारेस कैब्राल भारत पहुँचा। कालीकट में व्यापारिक केंद्र स्थापित करने का उसका प्रयास स्थानीय संघर्षों के कारण असफल रहा, इसलिए उसने कोचीन में अपना केंद्र स्थापित किया। कोचीन के शासक के सहयोग से वहाँ पुर्तगालियों की पहली स्थायी फैक्ट्री स्थापित हुई। इसके बाद उन्होंने कन्नूर और क्विलोन (कोल्लम) सहित अन्य तटीय नगरों में भी व्यापारिक केंद्र और किले बनाए।

1502 ई. में वास्को डी गामा दूसरी बार भारत आया। इस बार उसका उद्देश्य केवल व्यापार करना नहीं, बल्कि हिंद महासागर में पुर्तगाली प्रभुत्व स्थापित करना था। उसने ज़मोरिन से अरब व्यापारियों को हटाने की माँग की और अस्वीकार किए जाने पर कालीकट के विरुद्ध सैन्य कार्रवाई की। इसके साथ ही पुर्तगालियों ने अपने व्यापारिक केंद्रों की किलेबंदी की तथा समुद्री शक्ति के बल पर व्यापार को नियंत्रित करने की नीति अपनाई। आगे चलकर फ्रांसिस्को डी अल्मीडा की नौसैनिक नीति और अल्फांसो डी अल्बुकर्क की सामरिक एवं प्रशासनिक नीतियों ने भारत में पुर्तगाली सत्ता को सुदृढ़ आधार प्रदान किया। इस प्रकार पुर्तगालियों के आगमन ने भारतीय महासागर की पारंपरिक व्यापारिक व्यवस्था को बदल दिया और भारत में यूरोपीय औपनिवेशिक प्रभुत्व की नींव रखी।

फ्रांसिस्को डी अल्मीडा (1505–1509 ई.)

1505 ई. में पुर्तगाल के राजा मैनुअल प्रथम ने फ्रांसिस्को डी अल्मीडा को भारत का प्रथम पुर्तगाली वायसरॉय नियुक्त किया। उसे तीन वर्षों के लिए भारत भेजा गया तथा अंजेदीव द्वीप, कन्नूर, कोचीन और क्विलोन (कोल्लम) जैसे दक्षिण-पश्चिमी तट के प्रमुख केंद्रों पर किलों की स्थापना, पुर्तगाली व्यापारिक हितों की रक्षा तथा हिंद महासागर में समुद्री शक्ति को सुदृढ़ करने का दायित्व सौंपा गया। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए उसे एक शक्तिशाली नौसैनिक बेड़ा और पर्याप्त सैन्य बल प्रदान किया गया।

अल्मीडा का मुख्य उद्देश्य भारत में विशाल भू-भागों पर अधिकार स्थापित करना नहीं, बल्कि हिंद महासागर में पुर्तगाल की नौसैनिक सर्वोच्चता कायम करना था। इसी विचार के आधार पर उसने ‘ब्लू वाटर पॉलिसी’ अथवा ‘नीले जल की नीति’ अपनाई। इस नीति का मूल सिद्धांत था कि भारत और पूर्वी देशों के साथ होने वाले लाभदायक समुद्री व्यापार, विशेषकर मसाला व्यापार, पर नियंत्रण तभी संभव है जब समुद्री मार्गों और बंदरगाहों पर पुर्तगाल का प्रभुत्व हो। अल्मीडा का प्रसिद्ध कथन था—“जब तक समुद्र पर तुम्हारा प्रभुत्व रहेगा, तब तक भारत पर तुम्हारा अधिकार बना रहेगा; यदि समुद्र पर शक्ति नहीं रही, तो तट के किले भी किसी काम के नहीं रहेंगे।”

ब्लू वाटर पॉलिसी के अंतर्गत अल्मीडा ने सुदृढ़ नौसेना के निर्माण, समुद्री किलों और नौसैनिक अड्डों की स्थापना, व्यापारिक मार्गों की सुरक्षा तथा नियमित नौसैनिक गश्त पर विशेष बल दिया। उसका उद्देश्य केवल पुर्तगाली व्यापार की रक्षा करना नहीं था, बल्कि अरब, मिस्री तथा अन्य एशियाई व्यापारियों की प्रतिस्पर्धा को सीमित कर हिंद महासागर के व्यापार पर पुर्तगाल का प्रभुत्व स्थापित करना भी था।

इसी नीति को प्रभावी बनाने के लिए अल्मीडा ने कार्ताज़ नामक समुद्री व्यापार-लाइसेंस प्रणाली को संगठित रूप प्रदान किया। इस व्यवस्था के अनुसार हिंद महासागर में व्यापार करने वाले प्रत्येक जहाज़ के लिए पुर्तगाली अधिकारियों से अनुमति-पत्र प्राप्त करना आवश्यक था। कार्ताज़ में जहाज़, उसके कप्तान, चालक दल, गंतव्य और माल का विवरण अंकित रहता था तथा इसके लिए शुल्क लिया जाता था। बिना कार्ताज़ के समुद्र में पाए जाने वाले जहाज़ों को रोक लिया जाता, उनका माल जब्त कर लिया जाता और आवश्यकता पड़ने पर जहाज़ भी अपने अधिकार में ले लिया जाता था। काली मिर्च, घोड़ों, हथियारों तथा गोला-बारूद जैसी महत्त्वपूर्ण वस्तुओं के व्यापार पर विशेष निगरानी रखी जाती थी। इस प्रकार कार्ताज़ व्यवस्था पुर्तगाल के समुद्री, आर्थिक और राजनीतिक प्रभुत्व का प्रभावी साधन बन गई।

पुर्तगालियों की बढ़ती शक्ति से चिंतित होकर मिस्र के ममलूक सुल्तान, गुजरात के सुल्तान महमूद बेगड़ा, कालीकट के ज़मोरिन तथा कुछ अन्य शक्तियों ने उनके विरुद्ध संयुक्त मोर्चा बनाया। 1508 ई. में चौल के निकट हुए संघर्ष में अल्मीडा का पुत्र लॉरेंसो डी अल्मीडा मारा गया। इसके प्रतिशोध और पुर्तगाली प्रभुत्व को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से अल्मीडा ने 1509 ई. के दीव के नौसैनिक युद्ध में संयुक्त बेड़े को निर्णायक रूप से पराजित किया। इस विजय ने हिंद महासागर में पुर्तगाल की नौसैनिक श्रेष्ठता स्थापित कर दी तथा अरब सागर, फ़ारस की खाड़ी और लाल सागर क्षेत्र में उसके व्यापारिक प्रभाव के विस्तार का मार्ग प्रशस्त किया। इसी वर्ष 1509 ई. में फ्रांसिस्को डी अल्मीडा का कार्यकाल समाप्त हुआ और उसके उत्तराधिकारी के रूप में अल्फांसो डी अल्बुकर्क ने पुर्तगाली साम्राज्य के विस्तार की नई नीति अपनाई।

अल्फांसो डी अल्बुकर्क (1509–1515 ई.)

1509 ई. में अल्फांसो डी अल्बुकर्क फ्रांसिस्को डी अल्मीडा के बाद भारत का दूसरा पुर्तगाली गवर्नर बना। उसे भारत में पुर्तगाली साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक माना जाता है। जहाँ अल्मीडा ने हिंद महासागर में नौसैनिक सर्वोच्चता स्थापित करने के लिए ‘ब्लू वाटर पॉलिसी’ अपनाई थी, वहीं अल्बुकर्क ने स्थायी औपनिवेशिक साम्राज्य की स्थापना के उद्देश्य से सामरिक बंदरगाहों, जलडमरूमध्यों और किलों पर अधिकार करने की नीति अपनाई। उसका विश्वास था कि केवल समुद्र पर प्रभुत्व पर्याप्त नहीं है; व्यापारिक और राजनीतिक नियंत्रण बनाए रखने के लिए प्रमुख बंदरगाहों पर स्थायी किले, प्रशासनिक केंद्र तथा सैनिक छावनियाँ स्थापित करना आवश्यक है।

इसी उद्देश्य से अल्बुकर्क ने हिंद महासागर के प्रमुख व्यापारिक मार्गों और सामरिक जलडमरूमध्यों पर पुर्तगाली नियंत्रण स्थापित करने का प्रयास किया। उसने कार्ताज़ व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाया, जिससे समुद्री व्यापार पर पुर्तगालियों का नियंत्रण और सुदृढ़ हुआ। साथ ही, जहाज़ निर्माण केंद्रों, नौसैनिक अड्डों और व्यापारिक बंदरगाहों को विकसित कर पुर्तगाल की समुद्री शक्ति को नई दिशा दी।

अल्बुकर्क की सबसे महत्त्वपूर्ण उपलब्धि 1510 ई. में गोवा पर अधिकार स्थापित करना थी। उस समय गोवा बीजापुर के आदिलशाही राज्य के अधीन था। प्रारंभिक सफलता के बाद उसे कुछ समय के लिए गोवा छोड़ना पड़ा, किंतु उसी वर्ष उसने पुनः आक्रमण कर उस पर स्थायी अधिकार स्थापित कर लिया। गोवा का प्राकृतिक बंदरगाह सुरक्षित था और उसकी भौगोलिक स्थिति अरब सागर तथा मलाबार तट के व्यापारिक मार्गों पर नियंत्रण के लिए अत्यंत उपयुक्त थी। बाद में गोवा भारत में पुर्तगाली साम्राज्य की राजधानी तथा प्रशासन, व्यापार और धर्म-प्रचार का प्रमुख केंद्र बन गया। गोवा को आधार बनाकर अल्बुकर्क ने बीजापुर के प्रमुख बंदरगाहों दाभोल और दांडा-राजापुरी की नाकाबंदी कर उनके समुद्री व्यापार को गंभीर क्षति पहुँचाई।

अल्बुकर्क ने भारत तक अपनी नीति सीमित नहीं रखी। 1511 ई. में उसने मलक्का पर विजय प्राप्त की, जिससे भारत, चीन और दक्षिण-पूर्व एशिया को जोड़ने वाले मलक्का जलडमरूमध्य पर पुर्तगाल का नियंत्रण स्थापित हो गया। इसके परिणामस्वरूप मसाला व्यापार में पुर्तगाल की स्थिति अत्यंत सुदृढ़ हुई। उसने सोकोत्रा द्वीप पर भी अधिकार बनाए रखा और लाल सागर के प्रवेश-द्वार अदन पर अधिकार करने का प्रयास किया, यद्यपि इसमें सफलता नहीं मिली। 1515 ई. में होर्मुज़ (ओरमूज़) के शासक को संधि के लिए विवश कर वहाँ एक सुदृढ़ किला बनवाया, जिससे फ़ारस की खाड़ी के प्रवेश मार्ग पर पुर्तगाल का प्रभाव स्थापित हो गया।

अल्बुकर्क की दृष्टि गुजरात के समृद्ध व्यापारिक केंद्रों दीव और खंभात (कंबे) पर भी थी, क्योंकि ये पश्चिमी भारत के महत्त्वपूर्ण समुद्री व्यापारिक केंद्र थे। यद्यपि उसके जीवनकाल में इन पर स्थायी अधिकार स्थापित नहीं हो सका, फिर भी उसकी नीतियों ने आगे चलकर गुजरात में पुर्तगाली प्रभाव बढ़ाने का मार्ग प्रशस्त किया।

अल्बुकर्क एक कुशल प्रशासक भी था। उसने गोवा में संगठित प्रशासन की स्थापना की, स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप शासन-व्यवस्था विकसित की तथा पुर्तगाली सैनिकों और अधिकारियों को भारतीय महिलाओं से विवाह करने के लिए प्रोत्साहित किया। उसका उद्देश्य भारत में एक स्थायी लूसो-भारतीय (इंडो-पुर्तगाली) समाज का निर्माण करना था, जिससे पुर्तगाली सत्ता की जड़ें मजबूत हो सकें। उसने स्थानीय लोगों को सीमित स्तर पर प्रशासन में स्थान दिया तथा गोवा में सती प्रथा पर रोक लगाने का प्रयास किया। यद्यपि उसने ईसाई धर्म के प्रचार को संरक्षण दिया, फिर भी अनेक अवसरों पर मुस्लिम व्यापारियों के प्रति कठोर नीति अपनाई।

निनो दा कुन्हा (1529–1538 ई.)

1515 ई. में अल्फांसो डी अल्बुकर्क की मृत्यु के बाद कुछ समय तक पुर्तगाली प्रशासन में अस्थिरता रही। इसके पश्चात 1529 ई. में निनो दा कुन्हा भारत का पुर्तगाली गवर्नर नियुक्त हुआ। उसका शासनकाल 1538 ई. तक चला और इसी अवधि में भारत में पुर्तगाली साम्राज्य का सर्वाधिक संगठित विस्तार हुआ। उसने प्रशासन को अधिक व्यवस्थित बनाया, पश्चिमी तट पर पुर्तगाली सत्ता को सुदृढ़ किया तथा व्यापारिक और सामरिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण बंदरगाहों पर नियंत्रण स्थापित करने की नीति अपनाई।

निनो दा कुन्हा की सबसे महत्त्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक पुर्तगाली प्रशासनिक केंद्र को कोचीन से गोवा स्थानांतरित करना था। गोवा की सुरक्षित प्राकृतिक बंदरगाह, अरब सागर के प्रमुख व्यापारिक मार्गों से निकटता तथा सामरिक स्थिति के कारण इसे भारत में पुर्तगाली शासन की स्थायी राजधानी बनाया गया। इसके बाद गोवा प्रशासन, व्यापार, नौसैनिक गतिविधियों तथा ईसाई मिशनरी कार्यों का प्रमुख केंद्र बन गया और यहीं से ‘एस्तादो दा इंडिया’ का संचालन होने लगा। उसके शासनकाल में पुर्तगालियों ने पश्चिमी तथा पूर्वी दोनों तटों पर अपना प्रभाव बढ़ाया। पश्चिमी तट पर गोवा के अतिरिक्त बसेइन (वसई), दीव, चौल तथा दमन जैसे केंद्रों को सुदृढ़ किया गया, जबकि पूर्वी तट पर सेंट थोम (मायलापुर) और नागपट्टनम में व्यापारिक गतिविधियों का विस्तार हुआ। बंगाल में हुगली, चटगाँव तथा अराकान तक पुर्तगाली व्यापारियों की पहुँच बढ़ी।

गुजरात के साथ संबंध

निनो दा कुन्हा के शासनकाल में गुजरात की राजनीतिक परिस्थितियों ने पुर्तगालियों को विस्तार का महत्त्वपूर्ण अवसर प्रदान किया। मुगल सम्राट हुमायूँ के आक्रमण से चिंतित गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह ने 1534 ई. में पुर्तगालियों से संधि की। इसके परिणामस्वरूप बसेइन (वसई) तथा उससे संबद्ध क्षेत्र पुर्तगालियों को प्राप्त हुए और उन्हें दीव में किला बनाने की अनुमति मिली। 1535 ई. में दीव के सुदृढ़ दुर्ग का निर्माण प्रारंभ हुआ, जिससे अरब सागर के व्यापारिक मार्गों पर पुर्तगालियों की सामरिक स्थिति अत्यंत मजबूत हो गई।

हुमायूँ के गुजरात से लौटने के बाद बहादुर शाह और पुर्तगालियों के संबंध बिगड़ने लगे। उसने उस्मानी (ऑटोमन) सुल्तान से सहायता प्राप्त करने का प्रयास किया। 1537 ई. में दीव के निकट पुर्तगालियों के साथ वार्ता के दौरान बहादुर शाह की मृत्यु हो गई। इसके बाद गुजरात ने कई बार दीव को पुनः प्राप्त करने का प्रयास किया, किंतु सफलता नहीं मिली और वहाँ पुर्तगालियों का अधिकार बना रहा।

पुर्तगाली क्षेत्रों का विस्तार

निनो दा कुन्हा के समय पश्चिमी भारत में पुर्तगाली साम्राज्य का उल्लेखनीय विस्तार हुआ। 1531 ई. में पुर्तगालियों ने दमन पर आक्रमण किया और बाद के वर्षों में वहाँ अपना प्रभाव स्थापित किया। 1534 ई. की बसेइन संधि के परिणामस्वरूप वसई, सल्सेट तथा बंबई (मुंबई) द्वीप भी पुर्तगालियों के अधिकार में आए। चौल में किलेबंदी तथा दीव के दुर्ग ने पश्चिमी तट पर उनकी सामरिक शक्ति को और अधिक सुदृढ़ कर दिया।

बंगाल में पुर्तगाली गतिविधियाँ

निनो दा कुन्हा ने बंगाल के साथ व्यापारिक संबंधों का भी विस्तार किया। उसने अनेक पुर्तगाली व्यापारियों और बसने वालों को बंगाल भेजा तथा हुगली को एक प्रमुख व्यापारिक केंद्र के रूप में विकसित किया। शीघ्र ही हुगली पूर्वी भारत में पुर्तगाली व्यापार, ईसाई मिशनरी गतिविधियों तथा समुद्री संपर्क का प्रमुख केंद्र बन गया। यहीं से वे बंगाल, दक्षिण-पूर्व एशिया और चीन के साथ व्यापार संचालित करते थे।

तुर्क–पुर्तगाली संघर्ष

सोलहवीं शताब्दी में सुल्तान सुलेमान महान के नेतृत्व में उस्मानी (ऑटोमन) साम्राज्य पश्चिम एशिया की सबसे शक्तिशाली शक्ति बन गया। 1514 ई. के चालदिरान युद्ध तथा बाद में सीरिया, मिस्र और अरब पर अधिकार स्थापित होने के बाद उसका प्रभाव हिंद महासागर तक पहुँच गया। फलस्वरूप उस्मानी साम्राज्य ने पुर्तगालियों के बढ़ते समुद्री प्रभुत्व को चुनौती देने का निश्चय किया। गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह ने भी इसी उद्देश्य से उस्मानी सुल्तान से सहायता की माँग की।

1529 ई. के बाद उस्मानी साम्राज्य ने सुलेमान रईस के नेतृत्व में एक नौसैनिक बेड़ा गुजरात भेजा। बहादुर शाह ने उसका स्वागत किया तथा प्रसिद्ध तोपची रूमी ख़ाँ सहित कई तुर्क अधिकारियों को अपनी सेवा में नियुक्त किया। 1531 ई. में पुर्तगालियों ने दमन और दीव पर आक्रमण किया, किंतु रूमी ख़ाँ के प्रभावी प्रतिरोध के कारण उन्हें तत्काल सफलता नहीं मिली।

1538 ई. का दीव अभियान

निनो दा कुन्हा के शासनकाल की सबसे महत्त्वपूर्ण घटना 1538 ई. का दीव अभियान था। उस्मानी साम्राज्य ने काहिरा के गवर्नर सुलेमान पाशा के नेतृत्व में एक विशाल नौसैनिक बेड़ा भेजकर दीव के पुर्तगाली किले की घेराबंदी की। इस बेड़े में अनुभवी नाविकों और शक्तिशाली तोपखाने का समावेश था। लगभग दो महीने तक घेराबंदी चलती रही, किंतु उस्मानियों को अपेक्षित स्थानीय सहयोग नहीं मिला। इसी बीच एक शक्तिशाली पुर्तगाली सहायता-सेना के आने का समाचार मिलने पर सुलेमान पाशा ने घेराबंदी समाप्त कर दी और वापस लौट गया।

दीव की असफल घेराबंदी के बाद भी उस्मानी और पुर्तगालियों के बीच हिंद महासागर में संघर्ष जारी रहा, किंतु पश्चिमी भारत में गोवा, दीव और वसई जैसे प्रमुख केंद्रों पर पुर्तगालियों का नियंत्रण बना रहा। 1554 ई. में अली रईस के नेतृत्व में उस्मानियों ने अंतिम महत्त्वपूर्ण अभियान चलाया, किंतु वह भी पुर्तगाली नौसैनिक प्रभुत्व को समाप्त नहीं कर सका। परिणामस्वरूप सोलहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध तक हिंद महासागर के पश्चिमी भाग में पुर्तगालियों की समुद्री श्रेष्ठता बनी रही।

भारत में पुर्तगालियों की सफलता के कारण

भारत में पुर्तगालियों की सफलता केवल उनकी सैन्य शक्ति का परिणाम नहीं थी, बल्कि उस समय की भारतीय राजनीतिक परिस्थितियों, उनकी उन्नत नौसैनिक तकनीक, संगठित प्रशासन तथा व्यावहारिक कूटनीति का संयुक्त प्रभाव थी। इन कारणों ने सोलहवीं शताब्दी के प्रारंभ में उन्हें हिंद महासागर के व्यापार में प्रमुख यूरोपीय शक्ति बनने में सहायता प्रदान की।

सबसे प्रमुख कारण भारत की राजनीतिक विखंडन की स्थिति थी। उत्तर भारत में मुगल साम्राज्य का विस्तार अभी प्रारंभिक अवस्था में था, जबकि दक्षिण भारत में बहमनी सल्तनत के विघटन के बाद बीजापुर, अहमदनगर, गोलकुंडा, बरार और बीदर जैसे स्वतंत्र दक्कनी राज्यों का उदय हो चुका था। इन राज्यों के बीच निरंतर संघर्ष चलता रहता था, जिससे वे समुद्री सुरक्षा और नौसैनिक संगठन पर पर्याप्त ध्यान नहीं दे सके। गुजरात को छोड़कर अधिकांश तटीय राज्यों के पास प्रभावी नौसेना का अभाव था। इस परिस्थिति का लाभ उठाकर पुर्तगालियों ने कोचीन, कन्नूर, गोवा, दीव तथा अन्य सामरिक बंदरगाहों पर अपना प्रभाव स्थापित कर लिया।

पुर्तगालियों की सफलता का दूसरा प्रमुख कारण उनकी आधुनिक और संगठित नौसेना थी। उनके कैरावेल और कैरेक जैसे युद्धपोत भारी तोपों से सुसज्जित थे तथा समुद्री युद्ध के लिए विशेष रूप से निर्मित किए गए थे। इसके विपरीत भारतीय और अरब जहाज़ मुख्यतः व्यापारिक उद्देश्यों के लिए प्रयुक्त होते थे। आधुनिक तोपखाने, प्रशिक्षित नाविकों, नियमित नौसैनिक गश्त और तटीय किलों के कारण पुर्तगालियों ने समुद्री मार्गों पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित किया। 1502 ई. में लागू कार्ताज़ (समुद्री पास) प्रणाली ने भी उनके व्यापारिक प्रभुत्व को सुदृढ़ किया।

संगठित प्रशासन और सामरिक नीति भी उनकी सफलता का महत्त्वपूर्ण कारण थी। उन्होंने गोवा, कोचीन, दीव और मलक्का जैसे सामरिक बंदरगाहों पर किले बनाकर स्थायी प्रशासन स्थापित किया तथा एस्तादो दा इंडिया के माध्यम से व्यापार, प्रशासन और नौसैनिक शक्ति का समन्वय किया। समुद्री मार्गों और बंदरगाहों पर नियंत्रण स्थापित कर उन्होंने मसाला व्यापार पर प्रभाव बढ़ाया तथा सीमा-शुल्क और कार्ताज़ व्यवस्था से पर्याप्त राजस्व प्राप्त किया।

भारतीय शासकों की व्यावहारिक नीति ने भी पुर्तगालियों को लाभ पहुँचाया। कोचीन, कन्नूर तथा अन्य तटीय राज्यों ने अपने व्यापारिक हितों की रक्षा के लिए उनसे संधियाँ कीं, जबकि अनेक भारतीय शासकों और व्यापारियों ने अपने जहाज़ों के लिए कार्ताज़ प्राप्त किए। इससे पुर्तगालियों को स्थानीय सहयोग मिला और उनके व्यापारिक केंद्र अधिक सुरक्षित बने।

भारतीय व्यापार पर पुर्तगालियों का एकाधिकार

भारत में पुर्तगालियों के आगमन ने हिंद महासागर के पारंपरिक समुद्री व्यापार की प्रकृति में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन किया। उनके आने से पहले अरब, भारतीय, फ़ारसी तथा अन्य एशियाई व्यापारी अपेक्षाकृत स्वतंत्र वातावरण में व्यापार करते थे और समुद्री व्यापार किसी एक राज्य या व्यापारी समुदाय के नियंत्रण में नहीं था। 1498 ई. में वास्को डी गामा के कालीकट आगमन के समय हिंद महासागर का व्यापारिक तंत्र अत्यंत विकसित, खुला और बहुराष्ट्रीय था। कालीकट, कन्नूर, कोचीन, खंभात तथा अन्य प्रमुख बंदरगाहों पर अरब, फ़ारसी, मिस्री, तुर्क, इथियोपियाई, श्रीलंकाई, मलय, पेगू (बर्मा) तथा चीनी व्यापारी नियमित रूप से व्यापार करते थे। स्वयं वास्को डी गामा ने कालीकट को एक अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक केंद्र बताया, जहाँ विभिन्न देशों के व्यापारी बिना किसी विशेष प्रतिबंध के स्वतंत्र रूप से व्यापार करते थे।

भारत पहुँचने के बाद पुर्तगालियों ने इस मुक्त व्यापार व्यवस्था को समाप्त कर हिंद महासागर के समुद्री व्यापार, विशेषकर मसालों के व्यापार पर अपना एकाधिकार स्थापित करने का प्रयास किया। उनका उद्देश्य अरब तथा अन्य एशियाई व्यापारियों की प्रतिस्पर्धा समाप्त कर समुद्री व्यापार को अपने नियंत्रण में लाना था। इसके लिए उन्होंने सामरिक बंदरगाहों पर किले बनाए, सशस्त्र नौसैनिक गश्त प्रारंभ की तथा आधुनिक युद्धपोतों और शक्तिशाली तोपों से युक्त नौसेना के बल पर प्रमुख समुद्री मार्गों को नियंत्रित करने की नीति अपनाई।

इसी उद्देश्य से 1502 ई. में कार्ताज़ नामक समुद्री पास प्रणाली लागू की गई। इसके अंतर्गत प्रत्येक व्यापारी जहाज़ के लिए पुर्तगाली अधिकारियों से अनुमति-पत्र प्राप्त करना अनिवार्य था। बिना कार्ताज़ के चलने वाले जहाज़ों को रोका जाता, उनकी तलाशी ली जाती, माल जब्त कर लिया जाता और आवश्यकता पड़ने पर जहाज़ भी अपने अधिकार में ले लिए जाते थे। कालीकट के ज़ामोरिन द्वारा इस व्यवस्था का विरोध किए जाने पर पुर्तगालियों ने सैन्य कार्रवाई तेज कर दी। परिणामस्वरूप हिंद महासागर में पहली बार संगठित रूप से सशस्त्र व्यापार की नीति का विकास हुआ।

अपने नियंत्रण को और सुदृढ़ करने के लिए पुर्तगाली शासन ने मसाले, औषधियाँ, नील, ताँबा, सोना, चाँदी, हथियार, बारूद तथा युद्ध-घोड़ों जैसी महत्त्वपूर्ण वस्तुओं पर शाही एकाधिकार स्थापित किया। इन वस्तुओं का व्यापार सरकारी अनुमति के बिना निषिद्ध था और यह नियम विदेशी व्यापारियों के साथ-साथ पुर्तगाली निजी व्यापारियों पर भी समान रूप से लागू होता था।

पुर्तगालियों का मुख्य लक्ष्य विशेष रूप से काली मिर्च के व्यापार पर प्रभुत्व स्थापित करना था। उन्होंने स्थानीय उत्पादकों पर दबाव डाला कि वे अपना उत्पादन केवल उन्हें बेचें, किंतु निर्धारित मूल्य कम होने के कारण अनेक उत्पादक और व्यापारी अन्य बंदरगाहों के माध्यम से गुप्त रूप से व्यापार करते रहे। परिणामस्वरूप कठोर नियंत्रण, कार्ताज़ व्यवस्था और सैन्य शक्ति के बावजूद पुर्तगाली हिंद महासागर के व्यापार तथा मसाला व्यापार पर पूर्ण एकाधिकार स्थापित करने में सफल नहीं हो सके।

भारतीय शासकों और व्यापारियों की प्रतिक्रिया

यद्यपि पुर्तगालियों ने हिंद महासागर के समुद्री व्यापार पर एकाधिकार स्थापित करने का प्रयास किया, फिर भी भारतीय शासकों और व्यापारियों ने परिस्थितियों के अनुसार व्यावहारिक नीति अपनाई। व्यापारिक हितों की रक्षा के लिए अनेक भारतीय शासकों—जैसे मुगल सम्राट अकबर, अहमदनगर के निज़ामशाही शासक, बीजापुर के आदिलशाही शासक, कोचीन के राजा, कालीकट के ज़ामोरिन तथा कन्नूर के शासकों ने अपने व्यापारिक जहाज़ों के लिए पुर्तगालियों से कार्ताज़ प्राप्त किए। इससे स्पष्ट होता है कि सोलहवीं शताब्दी में पुर्तगालियों का प्रभाव व्यापक था, किंतु उनका नियंत्रण पूर्ण नहीं था।

कन्नूर के शासक ने कार्ताज़ लेकर अपने जहाज़ों को खंभात और होर्मुज़ भेजना जारी रखा तथा वहाँ से घोड़ों सहित अन्य वस्तुओं का आयात किया। मलाबार तट के तानूर, चालीयम और कालीकट के ज़ामोरिन ने भी समय-समय पर ऐसी ही व्यवस्था अपनाई। गुजरात के प्रमुख व्यापारी और अधिकारी—जैसे मलिक अयाज़, मलिक गोपी तथा ख़्वाजा सफ़र भी पुर्तगाली प्रतिबंधों के बावजूद समुद्री व्यापार में सक्रिय रहे। अनेक व्यापारी कार्ताज़ लेकर व्यापार करते थे, जबकि कुछ बिना अनुमति-पत्र के भी वैकल्पिक समुद्री मार्गों से अपना व्यापार जारी रखते थे।

अरब और गुजराती व्यापारी हिंद महासागर के पारंपरिक व्यापार के अनुभवी संचालक थे। उन्होंने स्थानीय शासकों के सहयोग और वैकल्पिक मार्गों के माध्यम से पुर्तगाली नियंत्रण को काफी हद तक निष्प्रभावी बना दिया। दूसरी ओर, पुर्तगाली प्रशासन के भीतर भी भ्रष्टाचार बढ़ने लगा। कम वेतन के कारण अनेक अधिकारी रिश्वत लेकर निजी व्यापारियों को संरक्षण देते थे तथा स्वयं भी मसालों, घोड़ों, वस्त्रों और अन्य मूल्यवान वस्तुओं के निजी व्यापार में संलग्न रहते थे। परिणामस्वरूप प्रशासनिक भ्रष्टाचार, निजी व्यापार और भारतीय-एशियाई व्यापारियों के सतत प्रतिरोध के कारण पुर्तगालियों की एकाधिकारवादी नीति व्यवहार में पूर्णतः सफल नहीं हो सकी।

पुर्तगाली नियंत्रण की सीमाएँ

यद्यपि पुर्तगालियों ने हिंद महासागर के प्रमुख समुद्री मार्गों पर प्रभुत्व स्थापित करने का प्रयास किया, फिर भी वे व्यापार पर पूर्ण एकाधिकार स्थापित नहीं कर सके। इसका प्रमुख कारण यह था कि हिंद महासागर का व्यापारिक तंत्र अत्यंत व्यापक, सुव्यवस्थित और बहुकेंद्रीय था, जिस पर सदियों से अरब, गुजराती, तमिल, मलय तथा अन्य एशियाई व्यापारी समुदायों का प्रभाव था। स्थानीय शासकों का सहयोग, वैकल्पिक व्यापारिक मार्गों का अस्तित्व तथा पुर्तगाल के सीमित संसाधनों के कारण उनका नियंत्रण व्यावहारिक रूप से सीमित रहा।

पुर्तगालियों की सबसे बड़ी सामरिक विफलता अदन पर अधिकार प्राप्त न कर पाना थी। अदन लाल सागर का प्रवेश-द्वार था। इस पर नियंत्रण न होने के कारण मिस्र तथा पश्चिम एशिया के साथ होने वाला पारंपरिक व्यापार निर्बाध रूप से चलता रहा। 1517 ई. में सीरिया, मिस्र और अरब पर उस्मानी (ऑटोमन) साम्राज्य का अधिकार स्थापित होने के बाद पुर्तगालियों की स्थिति और कठिन हो गई। उस्मानी नौसेना ने लाल सागर तथा पूर्वी भूमध्यसागर में उनके प्रभाव को प्रभावी रूप से सीमित रखा।

दक्षिण-पूर्व एशिया में भी पुर्तगालियों को निरंतर प्रतिरोध का सामना करना पड़ा। सोलहवीं शताब्दी में सुमात्रा के अचेह राज्य ने सुल्तान अली मुगायत शाह के नेतृत्व में एक शक्तिशाली नौसेना विकसित की। उस्मानी सुल्तानों से प्राप्त सैन्य सहायता और कांस्य तोपों के बल पर अचेह ने पुर्तगाली बेड़ों को चुनौती दी तथा मसाला व्यापार का प्रमुख केंद्र बन गया। फलस्वरूप अरब और गुजराती व्यापारी मलक्का के स्थान पर अचेह तथा लक्काद्वीप मार्गों का उपयोग करते हुए लाल सागर और पश्चिम एशिया के साथ अपना व्यापार करते रहे। समय के साथ मसाला द्वीपों (मोलुक्का) पर भी पुर्तगालियों का नियंत्रण कमजोर पड़ गया।

पुर्तगालियों द्वारा लागू की गई कार्ताज़ प्रणाली भी व्यवहार में पूर्णतः सफल नहीं हो सकी। इसका उद्देश्य प्रत्येक व्यापारी जहाज़ को पुर्तगाली अनुमति-पत्र के अधीन लाकर समुद्री व्यापार पर नियंत्रण स्थापित करना था। किंतु विशाल समुद्री क्षेत्र, सीमित नौसैनिक क्षमता और स्थानीय व्यापारिक नेटवर्क की सुदृढ़ता के कारण इस व्यवस्था को पूरी तरह लागू करना संभव नहीं था। अंततः पुर्तगालियों को अनेक भारतीय, अरब और अन्य मुस्लिम व्यापारियों को भी कार्ताज़ जारी करने पड़े।

व्यापारिक आवश्यकताओं ने भी उनकी नीतियों को व्यावहारिक बनाया। घोड़ों का व्यापार मुख्यतः मुस्लिम व्यापारियों के नियंत्रण में था और यह अत्यंत लाभदायक व्यवसाय था। वस्त्र, मसाले, इत्र, काँच तथा अन्य विलासिता की वस्तुओं के व्यापार में भी उनका महत्त्वपूर्ण स्थान था। पुर्तगालियों के पास न तो पर्याप्त पूँजी थी और न ही इतने जहाज़ कि वे संपूर्ण व्यापार स्वयं संचालित कर सकें। परिणामस्वरूप उन्हें उन्हीं व्यापारियों के सहयोग पर निर्भर होना पड़ा, जिन्हें प्रारंभ में वे व्यापार से बाहर करना चाहते थे।

पुर्तगालियों की प्रशासनिक कमजोरियाँ भी उनके नियंत्रण की बड़ी सीमा थीं। सीमित वित्तीय और मानवीय संसाधनों के कारण वे समस्त समुद्री मार्गों तथा बंदरगाहों की प्रभावी निगरानी नहीं कर सके। स्थानीय व्यापारियों द्वारा वैकल्पिक मार्गों का उपयोग, समुद्री तस्करी, निजी व्यापार तथा अधिकारियों में व्याप्त भ्रष्टाचार ने उनकी एकाधिकारवादी नीति को कमजोर कर दिया। अनेक अधिकारी कम वेतन के कारण रिश्वत लेकर निजी व्यापारियों को संरक्षण देते थे और स्वयं भी सरकारी नियमों का उल्लंघन कर निजी व्यापार में संलग्न रहते थे।

इन सीमाओं का एक प्रमुख कारण स्वयं पुर्तगाल की आर्थिक स्थिति भी थी। पुर्तगाल एक छोटा यूरोपीय राज्य था, जिसके वित्तीय और मानवीय संसाधन सीमित थे। पूर्वी व्यापार के विस्तार के लिए उसे जर्मन और इतालवी बैंकरों की पूँजी पर निर्भर रहना पड़ा। एशियाई बाज़ारों में यूरोपीय वस्तुओं की सीमित माँग के कारण व्यापार का भुगतान प्रायः चाँदी जैसी बहुमूल्य धातुओं से करना पड़ता था। स्पेन के विपरीत उसके पास अमेरिका की समृद्ध चाँदी की खदानें नहीं थीं, जिससे विदेशी पूँजी पर उसकी निर्भरता बनी रही।

इन्हीं कारणों से पुर्तगाली व्यापारिक व्यवस्था प्रत्यक्ष व्यापार की अपेक्षा पुनर्वितरणात्मक स्वरूप की बन गई। उनका मुख्य उद्देश्य स्वयं समस्त व्यापार करना नहीं, बल्कि समुद्री मार्गों, बंदरगाहों और व्यापारिक केंद्रों पर नियंत्रण स्थापित कर कार्ताज़ शुल्क, सीमा-शुल्क तथा अन्य करों के माध्यम से राजस्व प्राप्त करना था। राजनीतिक दृष्टि से भी उनका प्रभाव तटीय नगरों, द्वीपों और किलों तक ही सीमित रहा। गोवा को उन्होंने अपने प्रशासनिक केंद्र के रूप में विकसित किया, जबकि कोचीन, कन्नूर और अन्य तटीय राज्यों के साथ संधियों के माध्यम से अपने व्यापारिक हितों की रक्षा की।

इन सभी सीमाओं के बावजूद पुर्तगालियों ने हिंद महासागर की व्यापारिक संरचना को स्थायी रूप से प्रभावित किया। उन्होंने पहली बार समुद्री व्यापार को संगठित नौसैनिक शक्ति, किलों, कार्ताज़ व्यवस्था और राजकीय एकाधिकार से जोड़ दिया। यद्यपि वे हिंद महासागर के व्यापार पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित नहीं कर सके, फिर भी उन्होंने यूरोप और एशिया के बीच समुद्री व्यापार की नई संरचना विकसित की, जिसे आगे चलकर डच, अंग्रेज़ और फ़्रांसीसी ईस्ट इंडिया कंपनियों ने अपनाया और अपने औपनिवेशिक साम्राज्यों के विस्तार का आधार बनाया।

पुर्तगालियों की धार्मिक नीति

भारत में पुर्तगालियों की धार्मिक नीति का मुख्य उद्देश्य कैथोलिक ईसाई धर्म का प्रचार-प्रसार तथा राजनीतिक विस्तार के साथ धार्मिक प्रभाव स्थापित करना था। प्रारंभिक काल में उनकी नीति विशेष रूप से मुसलमानों के प्रति कठोर थी, क्योंकि वे उन्हें हिंद महासागर के व्यापार में अपना प्रमुख प्रतिद्वंद्वी मानते थे। हिंदुओं के प्रति आरंभ में अपेक्षाकृत सहिष्णु दृष्टिकोण अपनाया गया, किंतु समय के साथ यह नीति अधिक कठोर होती गई। 1560 ई. में गोवा इन्क्विज़िशन की स्थापना के बाद धार्मिक असहिष्णुता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। धर्मांतरण को प्रोत्साहन, कुछ स्थानीय धार्मिक प्रथाओं पर प्रतिबंध तथा ईसाई मत के विरोधियों के विरुद्ध दंडात्मक कार्रवाई इस नीति के प्रमुख अंग थे। इसके परिणामस्वरूप गोवा पुर्तगाली धार्मिक गतिविधियों और हस्तक्षेप का प्रमुख केंद्र बन गया।

पुर्तगाली शासन में कैथोलिक चर्च केवल धार्मिक संस्था नहीं था, बल्कि सामाजिक, शैक्षिक और राजनीतिक जीवन का भी महत्त्वपूर्ण अंग था। मिशनरियों ने गिरजाघरों, विद्यालयों और अन्य धार्मिक संस्थाओं की स्थापना कर ईसाई धर्म के प्रचार को बढ़ावा दिया। दूसरी ओर, गोवा इन्क्विज़िशन के अंतर्गत विधर्म के आरोपित व्यक्तियों पर मुकदमे चलाए गए तथा ऑटो-दा-फे जैसी दंडात्मक प्रक्रियाओं का प्रयोग किया गया, जिससे पुर्तगाली धार्मिक नीति की व्यापक आलोचना हुई।

पुर्तगाली धार्मिक नीति का एक उल्लेखनीय पक्ष मुगल सम्राट अकबर के साथ उनका धार्मिक संवाद था। अकबर के निमंत्रण पर 1580 ई. में जेसुइट पादरी—रुडोल्फ़ो अक्वावीवा, एंटोनियो मोंसेर्राते तथा उनके सहयोगी—फतेहपुर सीकरी पहुँचे और इबादतखाने की चर्चाओं में भाग लिया। यद्यपि अकबर ने ईसाई धर्म स्वीकार नहीं किया, फिर भी उसने मिशनरियों को सम्मान दिया और धार्मिक संवाद को प्रोत्साहित किया। यह संपर्क आगे जहाँगीर के शासनकाल तक भी बना रहा।

पुर्तगालियों का योगदान

भारत में पुर्तगालियों का आगमन केवल एक व्यापारिक घटना नहीं था, बल्कि इसने भारतीय इतिहास, समुद्री व्यापार, कृषि, प्रौद्योगिकी और संस्कृति पर दूरगामी प्रभाव डाला। 1498 ई. में वास्को डी गामा द्वारा भारत के लिए प्रत्यक्ष समुद्री मार्ग की खोज ने यूरोप और भारत के बीच नियमित समुद्री संपर्क स्थापित किया। इससे भारतीय मसालों, वस्त्रों, नील तथा अन्य उत्पादों का यूरोपीय बाज़ारों से सीधा संबंध बना और भारत वैश्विक व्यापारिक व्यवस्था का महत्त्वपूर्ण भाग बन गया। साथ ही, समुद्री शक्ति के महत्त्व में वृद्धि हुई तथा भारत में यूरोपीय औपनिवेशिक युग की शुरुआत हुई।

व्यापार के क्षेत्र में पुर्तगालियों ने भारत के संबंधों का विस्तार जापान, दक्षिण-पूर्व एशिया, अफ्रीका और ब्राज़ील तक किया। उन्होंने गोवा को अपने प्रमुख व्यापारिक एवं प्रशासनिक केंद्र के रूप में विकसित किया तथा मुद्रा-व्यवस्था, बंदरगाह प्रशासन और समुद्री व्यापार को अधिक संगठित रूप प्रदान किया। यद्यपि उनका राजनीतिक साम्राज्य सीमित था, फिर भी उन्होंने हिंद महासागर को यूरोप के समुद्री व्यापारिक मार्गों से जोड़ने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में पुर्तगालियों ने उन्नत नौवहन कला, समुद्री मानचित्रण, जहाज़ निर्माण तथा आधुनिक नौसैनिक युद्ध-पद्धति का परिचय कराया। उनके कैरेक और कैरावेल जैसे जहाज़ भारी तोपों से सुसज्जित होते थे और समुद्री युद्धों में अत्यधिक प्रभावी सिद्ध हुए। उन्होंने मैचलॉक बंदूकें, आधुनिक तोपें तथा संगठित नौसैनिक रणनीति के उपयोग को भी बढ़ावा दिया। गोवा में 1556 ई. में एशिया का पहला मुद्रणालय स्थापित हुआ, जिसने भारत में मुद्रण और ज्ञान-प्रसार के नए युग का आरंभ किया।

भारतीय कृषि पर भी पुर्तगालियों का स्थायी प्रभाव पड़ा। वे अमेरिका और अपने अन्य उपनिवेशों से अनेक नई फसलें भारत लाए, जिनमें मक्का, तंबाकू, लाल मिर्च, काजू, अनानास, पपीता और अमरूद प्रमुख थे। बाद के काल में आलू का भी व्यापक प्रसार हुआ। विशेष रूप से लाल मिर्च, तंबाकू और काजू भारतीय कृषि तथा भोजन का अभिन्न अंग बन गए। उन्होंने बागवानी की उन्नत पद्धतियों और फलदार वृक्षों की नई किस्मों के विकास को भी प्रोत्साहित किया।

सांस्कृतिक क्षेत्र में पुर्तगालियों का प्रभाव विशेष रूप से गोवा और पश्चिमी तट पर दिखाई देता है। ईसाई मिशनरियों ने विद्यालयों, पुस्तकालयों और चर्चों की स्थापना की तथा शिक्षा के प्रसार में योगदान दिया। यूरोपीय स्थापत्य कला, चित्रकला, मूर्तिकला, लकड़ी की नक्काशी और चर्च वास्तुकला का विकास हुआ। संगीत के क्षेत्र में पश्चिमी वाद्ययंत्रों और बहुस्वर गायन की परंपरा का परिचय हुआ। इन संपर्कों से भारतीय और यूरोपीय सांस्कृतिक परंपराओं का समन्वय विकसित हुआ।

पुर्तगाली शक्ति का पतन

1498 ई. में वास्को डी गामा के कालीकट आगमन के साथ भारत में यूरोपीय समुद्री साम्राज्यवाद का प्रारंभ हुआ। पुर्तगाली भारत पहुँचने वाली पहली यूरोपीय शक्ति थे, जिन्होंने हिंद महासागर के व्यापार पर नियंत्रण स्थापित करने का प्रयास किया। अफोंसो डी अल्बुकर्क (1509–1515 ई.) के नेतृत्व में गोवा, मलक्का और होर्मुज़ जैसे सामरिक केंद्रों पर अधिकार स्थापित कर उन्होंने एक सुदृढ़ समुद्री साम्राज्य की नींव रखी। सोलहवीं शताब्दी के मध्य तक मसाला व्यापार तथा समुद्री मार्गों पर उनका प्रभाव अपने चरम पर था, किंतु इसके बाद अनेक आंतरिक और बाह्य कारणों से उनकी शक्ति का क्रमिक पतन आरंभ हो गया।

पुर्तगाली शक्ति के पतन का पहला प्रमुख कारण भारतीय तथा एशियाई शक्तियों का पुनरुत्थान था। प्रारंभ में उन्होंने भारतीय राज्यों की राजनीतिक विखंडन की स्थिति का लाभ उठाया, किंतु मुगल साम्राज्य के सुदृढ़ होने, फ़ारस के सफ़वीद शासकों, उस्मानी (ऑटोमन) साम्राज्य तथा दक्कन की शक्तियों के उभार ने उनकी राजनीतिक और सामरिक स्थिति को कमजोर कर दिया। 1622 ई. में शाह अब्बास प्रथम ने अंग्रेज़ों की सहायता से होर्मुज़ पर अधिकार कर लिया, जिससे फ़ारस की खाड़ी में पुर्तगालियों की प्रभुता को गहरा आघात पहुँचा। आगे चलकर 1739 ई. में मराठा सेनापति चिमाजी अप्पा ने वसई (बसेइन) और सालसेट पर अधिकार कर पश्चिमी भारत में उनकी शक्ति को गंभीर क्षति पहुँचाई।

दूसरा महत्त्वपूर्ण कारण अन्य यूरोपीय शक्तियों का उदय था। 1600 ई. में अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कंपनी तथा 1602 ई. में डच ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना के बाद हिंद महासागर के व्यापार में तीव्र प्रतिस्पर्धा प्रारंभ हुई। डच और अंग्रेज़ों के पास अधिक पूँजी, आधुनिक जहाज़, संगठित व्यापारिक संगठन तथा शक्तिशाली नौसेना थी। डचों ने 1641 ई. में मलक्का पर अधिकार कर लिया और श्रीलंका तथा इंडोनेशिया के अधिकांश क्षेत्रों से पुर्तगालियों को बाहर कर दिया। अंग्रेज़ों ने सूरत, मद्रास और बंगाल में अपने व्यापारिक केंद्र स्थापित कर धीरे-धीरे पुर्तगालियों के व्यापारिक एकाधिकार को समाप्त कर दिया।

धार्मिक असहिष्णुता भी उनके पतन का एक प्रमुख कारण बनी। पुर्तगाली शासकों ने कैथोलिक ईसाई धर्म के प्रचार को राज्य-नीति का अंग बनाया। 1560 ई. में गोवा इन्क्विज़िशन की स्थापना के बाद बलपूर्वक धर्मांतरण, स्थानीय धार्मिक परंपराओं में हस्तक्षेप तथा कठोर दंडात्मक उपायों से हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों में असंतोष फैल गया। इससे भारतीय शासकों और जनता का सहयोग कम होने लगा तथा पुर्तगालियों की राजनीतिक स्थिति कमजोर होती गई।

प्रशासनिक और आर्थिक कमजोरियों ने भी उनके साम्राज्य को भीतर से दुर्बल कर दिया। अधिकारियों को कम वेतन मिलने के कारण रिश्वतखोरी, भ्रष्टाचार और निजी व्यापार की प्रवृत्ति बढ़ी। अनेक अधिकारी शाही हितों की उपेक्षा कर व्यक्तिगत लाभ कमाने लगे। कार्ताज़ व्यवस्था का दुरुपयोग, समुद्री लूट तथा व्यापारिक जहाज़ों की जब्ती से उनकी प्रतिष्ठा को गंभीर क्षति पहुँची। सीमित जनसंख्या, अल्प वित्तीय संसाधन और कमजोर प्रशासनिक ढाँचे के कारण वे अपने विस्तृत समुद्री साम्राज्य का प्रभावी संचालन नहीं कर सके।

1580 से 1640 ई. तक स्पेन और पुर्तगाल के राजवंशीय संघ ने भी उनके पतन को तेज कर दिया। स्पेन के अधीन आने के बाद पुर्तगाल अपनी स्वतंत्र विदेश-नीति से वंचित हो गया और स्पेन के शत्रु—विशेषकर डच और अंग्रेज़—सीधे पुर्तगाली उपनिवेशों पर आक्रमण करने लगे। दूसरी ओर, भारत के समुद्री मार्ग का रहस्य भी समाप्त हो गया। डच, अंग्रेज़ और अन्य यूरोपीय देशों ने अफ्रीका के दक्षिणी सिरे से होकर भारत आने वाले समुद्री मार्गों तथा नौवहन तकनीकों में दक्षता प्राप्त कर ली, जिससे पुर्तगालियों का व्यापारिक एकाधिकार समाप्त हो गया।

ब्राज़ील की खोज (1500 ई.) के बाद पुर्तगाल का ध्यान धीरे-धीरे दक्षिण अमेरिका की ओर केंद्रित होने लगा। भारत और पूर्वी उपनिवेशों में निवेश तथा सैनिक सहायता घटती गई। साथ ही, अफोंसो डी अल्बुकर्क के बाद योग्य नेतृत्व का अभाव भी स्पष्ट दिखाई दिया। उसके अधिकांश उत्तराधिकारी प्रशासनिक क्षमता और दूरदर्शिता से वंचित थे, जिसके कारण शासन-व्यवस्था शिथिल होती गई।

इन सभी कारणों के परिणामस्वरूप सत्रहवीं शताब्दी तक पुर्तगालियों का समुद्री व्यापार पर एकाधिकार समाप्त हो गया और उनका प्रभाव केवल गोवा, दमन, दीव तथा कुछ छोटे तटीय क्षेत्रों तक सीमित रह गया। अंततः 18 दिसंबर 1961 को भारत सरकार ने ऑपरेशन विजय प्रारंभ किया और 19 दिसंबर 1961 तक गोवा, दमन तथा दीव भारतीय संघ में सम्मिलित हो गए। इस प्रकार भारत में लगभग 463 वर्षों से चला आ रहा पुर्तगाली शासन समाप्त हो गया।

भारत में डचों का आगमन

हॉलैंड (नीदरलैंड) के व्यापारियों के पूर्वी देशों के साथ प्रत्यक्ष एवं परोक्ष व्यापारिक संबंध प्राचीन काल से ही स्थापित थे। प्रारंभ में वे लिस्बन बंदरगाह के माध्यम से एशिया से आने वाले मसाले तथा अन्य मूल्यवान वस्तुओं का व्यापार करते थे। किंतु 1580 ई. में स्पेन के सम्राट फिलिप द्वितीय द्वारा पुर्तगाल पर अधिकार स्थापित किए जाने के बाद लिस्बन का व्यापार डचों के लिए बाधित हो गया। इसके पश्चात् 1581 ई. में स्पेन से स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद डचों ने पूर्वी देशों के साथ प्रत्यक्ष व्यापार स्थापित करने का निश्चय किया।

डच स्वभावतः कुशल व्यापारी और दक्ष नाविक थे। समुद्रतटीय क्षेत्र में निवास करने के कारण उन्हें समुद्री यात्राओं का व्यापक अनुभव था, जिससे वे लंबी समुद्री यात्राएँ करने और नए व्यापारिक केंद्र स्थापित करने में सफल रहे। डच यात्री जान ह्यूगेन वान लिन्शोटेन के यात्रा-वृत्तांतों ने भी पूर्वी देशों के समुद्री मार्गों और व्यापारिक संभावनाओं की जानकारी देकर डच व्यापारियों को एशिया की ओर अग्रसर होने के लिए प्रेरित किया।

यूनाइटेड डच ईस्ट इंडिया कंपनी (1602 ई.)

पूर्वी देशों के साथ व्यापार को संगठित करने के उद्देश्य से हॉलैंड में विभिन्न व्यापारिक कंपनियों की स्थापना की गई। अंततः 1602 ई. में इन आठ प्रमुख कंपनियों का विलय कर यूनाइटेड डच ईस्ट इंडिया कंपनी (वेरेनिग्डे ओस्ट-इंडिशे कंपनी) की स्थापना की गई। इस कंपनी को पूर्वी देशों के साथ व्यापार का एकाधिकार प्रदान किया गया। साथ ही, इसे युद्ध और संधि करने, किलों का निर्माण करने, उपनिवेश स्थापित करने तथा विजित क्षेत्रों का प्रशासन संचालित करने जैसे व्यापक अधिकार भी प्राप्त हुए। इन विशेषाधिकारों के कारण डच ईस्ट इंडिया कंपनी शीघ्र ही एशिया की सबसे शक्तिशाली व्यापारिक संस्थाओं में सम्मिलित हो गई और भारत सहित पूर्वी देशों में अपना प्रभाव स्थापित करने लगी।

डच-पुर्तगाली संघर्ष

सत्रहवीं शताब्दी के प्रारंभ तक पूर्वी देशों के समुद्री व्यापार पर पुर्तगालियों का लगभग एकाधिकार स्थापित था। इसलिए एशिया में व्यापारिक प्रभुत्व प्राप्त करने के लिए डचों को सबसे पहले पुर्तगालियों से संघर्ष करना पड़ा। 1602 ई. में यूनाइटेड डच ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना के बाद डचों ने संगठित रूप से पुर्तगाली शक्ति को चुनौती देना प्रारंभ किया। उसी वर्ष उन्होंने बैंटम में पुर्तगालियों को पराजित किया और धीरे-धीरे मसाला द्वीपों पर अपना प्रभाव स्थापित करने लगे। 1605 ई. में उन्होंने अंबोयना पर अधिकार कर पुर्तगालियों को वहाँ से निष्कासित कर दिया। इसके बाद मलक्का, श्रीलंका, जावा, सुमात्रा तथा मलाया प्रायद्वीप के अनेक भागों पर भी उनका नियंत्रण स्थापित हो गया। 1619 ई. में डचों ने जकार्ता पर अधिकार कर उसके स्थान पर बटाविया (वर्तमान जकार्ता) को अपनी राजधानी बनाया, जो आगे चलकर एशिया में डच साम्राज्य का प्रमुख प्रशासनिक एवं व्यापारिक केंद्र बन गया।

भारत में भी डचों ने अपने व्यापार का विस्तार किया। उन्होंने पुलीकट, सूरत, चिनसुरा, कासिमबाज़ार, पटना, बालासोर, नागापट्टनम तथा कोचीन जैसे प्रमुख व्यापारिक केंद्रों में अपनी फैक्ट्रियाँ और बस्तियाँ स्थापित कीं। उनका मुख्य उद्देश्य भारतीय वस्त्र, नील, शोरा तथा अन्य व्यापारिक वस्तुओं को प्राप्त कर दक्षिण-पूर्व एशिया के मसाला व्यापार से जोड़ना था।

प्रारंभ में डचों और अंग्रेजों के संबंध मैत्रीपूर्ण थे, किंतु व्यापारिक प्रतिस्पर्धा के कारण दोनों के बीच शीघ्र ही संघर्ष आरंभ हो गया। यह प्रतिद्वंद्विता 1623 ई. की अंबोयना घटना के बाद अत्यंत कटु हो गई, जब डच अधिकारियों ने षड्यंत्र के आरोप में अनेक अंग्रेज व्यापारियों की हत्या कर दी। इस घटना ने दोनों देशों के संबंधों को लंबे समय तक प्रभावित किया और अंग्रेजों ने धीरे-धीरे अपना ध्यान भारत में राजनीतिक एवं व्यापारिक शक्ति के विस्तार पर केंद्रित कर दिया।

भारत में डच शक्ति का पतन

यद्यपि डचों का दक्षिण-पूर्व एशिया के अनेक द्वीपों पर लगभग तीन शताब्दियों तक प्रभाव बना रहा, फिर भी वे भारत में स्थायी प्रभुत्व स्थापित नहीं कर सके। इसका प्रमुख कारण डच ईस्ट इंडिया कंपनी की प्रशासनिक कमजोरियाँ थीं। कंपनी के अधिकारियों को अपेक्षाकृत कम वेतन मिलता था, जिसके कारण वे निजी व्यापार में अधिक रुचि लेते थे और कंपनी के हितों की उपेक्षा करते थे। इससे संगठनात्मक अनुशासन कमजोर होता गया और कंपनी की कार्यक्षमता प्रभावित हुई।

डचों की असफलता का एक अन्य कारण यह था कि उन्होंने भारत की अपेक्षा इंडोनेशिया के मसाला द्वीपों को अधिक महत्त्व दिया। फलस्वरूप भारत में उनके व्यापारिक केंद्र अपेक्षित संरक्षण और संसाधन प्राप्त नहीं कर सके। दूसरी ओर, अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत को अपनी गतिविधियों का मुख्य केंद्र बनाया और स्थानीय शासकों से संबंध स्थापित कर अपनी राजनीतिक तथा सैन्य शक्ति को निरंतर सुदृढ़ किया।

इसके अतिरिक्त, हॉलैंड के आर्थिक एवं सैन्य संसाधन इंग्लैंड की तुलना में सीमित थे। यूरोप में फ्रांस और इंग्लैंड के साथ निरंतर युद्धों ने उसकी शक्ति को कमजोर कर दिया, जिसका प्रतिकूल प्रभाव एशिया में उसके व्यापारिक साम्राज्य पर भी पड़ा। इतिहासकार डॉ. ईश्वरी प्रसाद के अनुसार “यूरोप में अपनी शक्ति तथा समुद्री प्रभुत्व खो देने के पश्चात् कोई भी राष्ट्र पूर्व में अपनी श्रेष्ठता को लंबे समय तक बनाए नहीं रख सकता।” अंततः 1759 ई. के बेदरा के युद्ध में अंग्रेजों द्वारा डचों की पराजय के साथ भारत में उनकी राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं का अंत हो गया। इसके बाद डचों का प्रभाव मुख्यतः व्यापार तक सीमित रह गया, जबकि भारत में अंग्रेजों का प्रभुत्व निरंतर सुदृढ़ होता गया।

भारत में अंग्रेजों का आगमन

सोलहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में भारत और पूर्वी देशों के साथ होने वाला लाभदायक व्यापार यूरोपीय शक्तियों के लिए अत्यंत आकर्षण का केंद्र बन चुका था। पुर्तगाली, डच और फ्रांसीसियों की भाँति अंग्रेज भी मसालों, रेशम, सूती वस्त्रों तथा अन्य मूल्यवान वस्तुओं के व्यापार में भागीदारी चाहते थे। प्रारंभ में हिंद महासागर के समुद्री मार्गों पर पुर्तगालियों का एकाधिकार था, किंतु इंग्लैंड ने धीरे-धीरे इस प्रभुत्व को चुनौती देना प्रारंभ किया। 1582 ई. में एडवर्ड फेंटन के नेतृत्व में अंग्रेजी अभियान ने अफ्रीका के दक्षिणी किनारे केप ऑफ़ गुड होप (आशा अंतरीप) के मार्ग से पूर्व की ओर समुद्री यात्रा कर पुर्तगालियों के एकाधिकार को चुनौती दी। इतिहासकार पी. ई. रॉबर्ट्स के अनुसार ‘थॉमस स्टीफेंस पहला अंग्रेज था जिसे भारत की भूमि पर निवास करने का अवसर प्राप्त हुआ।’ वह 1579 ई. में गोवा के जेसुइट कॉलेज से संबद्ध हुआ और भारत के सामाजिक तथा सांस्कृतिक जीवन का विस्तृत विवरण यूरोप भेजता रहा।

1583 ई. में राल्फ फिच, जॉन न्यूबेरी, विलियम लीड्स तथा जेम्स स्टोरी स्थल मार्ग से भारत के लिए रवाना हुए। ओरमुज़ पहुँचने पर पुर्तगालियों ने उन्हें बंदी बनाकर गोवा भेज दिया। बाद में रिहा होने पर स्टोरी ने ईसाई पादरी का जीवन अपना लिया, न्यूबेरी की यात्रा के दौरान उसकी मृत्यु हो गई तथा विलियम लीड्स मुगल सम्राट अकबर की सेवा में नियुक्त हो गया। राल्फ फिच ने बंगाल, बर्मा, मलाया और श्रीलंका की यात्रा कर 1591 ई. में इंग्लैंड लौटकर भारत की समृद्धि, विकसित व्यापार तथा अपार आर्थिक संभावनाओं का विस्तृत वर्णन किया। उसके यात्रा-वृत्तांतों ने अंग्रेज व्यापारियों को पूर्वी देशों की ओर आकर्षित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

अंग्रेजों के समुद्री विस्तार को 1588 ई. की एक ऐतिहासिक घटना ने नई दिशा प्रदान की। इसी वर्ष इंग्लैंड ने स्पेन के शक्तिशाली स्पेनिश आर्माडा को पराजित किया, जिससे अंग्रेजी नौसैनिक शक्ति की प्रतिष्ठा स्थापित हुई और समुद्रों पर पुर्तगाल तथा स्पेन के प्रभुत्व को चुनौती मिली। इस विजय ने इंग्लैंड की महारानी एलिजाबेथ प्रथम तथा अंग्रेज व्यापारियों का आत्मविश्वास बढ़ाया और पूर्वी देशों के साथ प्रत्यक्ष व्यापार की योजनाओं को बल मिला।

सरकारी संरक्षण प्राप्त होने के बाद अनेक अंग्रेज नाविकों ने पूर्व की ओर समुद्री यात्राएँ आरंभ कीं। 1591–1593 ई. के बीच जेम्स लैंकेस्टर ने पूर्वी समुद्री मार्गों का अन्वेषण किया। इसके पश्चात् 1596 ई. में बेंजामिन वुड के नेतृत्व में एक अन्य व्यापारिक अभियान भेजा गया। 1599 ई. में जॉन मिल्डेनहॉल स्थल मार्ग से भारत पहुँचा और लगभग सात वर्षों तक भारत तथा मध्य एशिया के व्यापारिक मार्गों का अध्ययन करता रहा। इन यात्राओं से प्राप्त अनुभवों ने इंग्लैंड को पूर्वी व्यापार के महत्त्व का स्पष्ट बोध कराया।

अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी (1600 ई.)

अंततः 31 दिसंबर 1600 ई. को लंदन के प्रमुख व्यापारियों ने ‘द गवर्नर एंड कंपनी ऑफ़ मर्चेंट्स ऑफ़ लंदन ट्रेडिंग इंटू द ईस्ट इंडीज़’ (अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कंपनी) की स्थापना की। महारानी एलिजाबेथ प्रथम ने इस कंपनी को शाही चार्टर प्रदान करते हुए पंद्रह वर्षों के लिए पूर्वी देशों के साथ व्यापार का एकाधिकार प्रदान किया। यह चार्टर अंग्रेजी व्यापारिक इतिहास की एक निर्णायक घटना सिद्ध हुआ। इतिहासकार वी. ए. स्मिथ के अनुसार, ‘ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना ने भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की आधारशिला रखी।’ प्रारंभ में कंपनी का उद्देश्य केवल व्यापार था, किंतु समय के साथ उसने भारतीय राजनीति में हस्तक्षेप करना आरंभ किया और अंततः भारत में एक विशाल ब्रिटिश साम्राज्य की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया।

अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी का विकास
कैप्टन हॉकिंस का भारत आगमन (1608 ई.)

अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना (1600 ई.) के बाद भारत में व्यापारिक अधिकार प्राप्त करने के उद्देश्य से अंग्रेजों ने अपने प्रतिनिधियों को मुगल दरबार में भेजना प्रारंभ किया। इसी क्रम में कैप्टन विलियम हॉकिंस भारत आने वाला पहला महत्त्वपूर्ण अंग्रेज दूत था, जिसने मुगल सम्राट के दरबार में अंग्रेजों के लिए व्यापारिक सुविधाएँ प्राप्त करने का प्रयास किया।

1608 ई. में कैप्टन हॉकिंस ईस्ट इंडिया कंपनी के जहाज ‘हेक्टर’ से भारत पहुँचा। वह सूरत के बंदरगाह पर उतरा, जो उस समय पश्चिमी भारत का एक प्रमुख व्यापारिक केंद्र था। उस समय सूरत पर पुर्तगालियों का प्रभाव था और वे नहीं चाहते थे कि अंग्रेज भारत में व्यापारिक गतिविधियाँ प्रारंभ करें। पुर्तगालियों ने अंग्रेजों के आगमन का विरोध किया और मुगल अधिकारियों पर भी दबाव डालने का प्रयास किया।

हॉकिंस का मुख्य उद्देश्य मुगल सम्राट जहाँगीर (1605–1627 ई.) से व्यापारिक अनुमति प्राप्त करना था। वह 1609 ई. में आगरा स्थित मुगल दरबार पहुँचा। हॉकिंस ने जहाँगीर से मुलाकात की और अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए भारत में व्यापार करने की अनुमति माँगी। जहाँगीर हॉकिंस से काफी प्रभावित हुआ। हॉकिंस को तुर्की भाषा का अच्छा ज्ञान था, जिसके कारण वह मुगल दरबार में प्रभावशाली संवाद स्थापित करने में सफल रहा। जहाँगीर ने उसे सम्मान के साथ ‘इंग्लिश ख़ाँ’ की उपाधि प्रदान की। उसे मनसब भी दिया गया तथा मुगल दरबार में रहने की अनुमति दी गई।

हॉकिंस ने जहाँगीर से सूरत में अंग्रेजी व्यापारिक फैक्टरी स्थापित करने की अनुमति प्राप्त करने का प्रयास किया, किंतु पुर्तगालियों के विरोध और दरबार में उनके प्रभाव के कारण वह अपने उद्देश्य में पूर्ण रूप से सफल नहीं हो सका। पुर्तगालियों ने मुगल अधिकारियों को अंग्रेजों के विरुद्ध भड़काया और हॉकिंस को अपेक्षित व्यापारिक फ़रमान प्राप्त नहीं हो सका।

लगभग तीन वर्षों तक मुगल दरबार में रहने के बाद हॉकिंस ने 1611 ई. के आसपास भारत छोड़ दिया। यद्यपि उसका मिशन तत्कालीन परिस्थितियों में पूरी तरह सफल नहीं हुआ, फिर भी उसका भारत आगमन महत्त्वपूर्ण था। उसने मुगल दरबार में अंग्रेजों की उपस्थिति दर्ज कराई और भविष्य में अंग्रेजों को भारत में व्यापारिक अधिकार प्राप्त करने के लिए मार्ग प्रशस्त किया।

सर टॉमस रो का मिशन (1615–1619 ई.)

कैप्टन विलियम हॉकिंस के असफल प्रयास के बाद अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी ने यह अनुभव किया कि केवल व्यापारिक प्रतिनिधि भेजने से मुगल साम्राज्य से स्थायी व्यापारिक अधिकार प्राप्त नहीं किए जा सकते। इसलिए कंपनी ने इंग्लैंड के राजा जेम्स प्रथम से एक आधिकारिक राजदूत भेजने का अनुरोध किया। इसी उद्देश्य से सर टॉमस रो को मुगल सम्राट जहाँगीर के दरबार में राजदूत नियुक्त किया गया। यह मिशन भारत में अंग्रेजों की व्यापारिक स्थिति सुदृढ़ करने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण राजनयिक प्रयास था।

सत्रहवीं शताब्दी के प्रारंभ में भारत के समुद्री व्यापार पर पुर्तगालियों का प्रभुत्व था। वे मुगल दरबार में भी पर्याप्त प्रभाव रखते थे और अंग्रेजों को व्यापारिक सुविधाएँ मिलने का लगातार विरोध करते थे। दूसरी ओर, अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी भारतीय व्यापार में स्थायी स्थान बनाना चाहती थी। 1612 ई. में स्वाली (सुवाली) के युद्ध में अंग्रेजों ने पुर्तगालियों को पराजित कर अपनी समुद्री शक्ति का परिचय दिया। इस विजय से मुगल अधिकारियों का विश्वास अंग्रेजों के प्रति बढ़ा और उनके लिए अनुकूल परिस्थितियाँ बनीं। इसी पृष्ठभूमि में सर टॉमस रो का राजनयिक मिशन आरंभ हुआ।

स्वाली का युद्ध (1612 ई.)

स्वाली (सुवाली) का युद्ध 29–30 नवंबर 1612 ई. को गुजरात के सूरत के निकट सुवाली तट पर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और पुर्तगालियों के बीच लड़ा गया एक महत्त्वपूर्ण नौसैनिक युद्ध था। इस युद्ध में कैप्टन थॉमस बेस्ट के नेतृत्व में अंग्रेजों ने पुर्तगाली बेड़े को पराजित किया। इस पराजय से भारत में पुर्तगालियों के समुद्री एवं व्यापारिक प्रभुत्व को गहरा आघात पहुँचा। युद्ध के बाद मुगल सम्राट जहाँगीर ने अंग्रेजों की नौसैनिक शक्ति को स्वीकार करते हुए उन्हें सूरत में व्यापारिक कोठी (फैक्टरी) स्थापित करने तथा व्यापार करने की अनुमति प्रदान की।

जहाँगीर के दरबार में आगमन

सर टॉमस रो 1615 ई. में सूरत के मार्ग से भारत पहुँचा। दिसंबर 1615 ई. में वह अजमेर स्थित सम्राट जहाँगीर के दरबार में उपस्थित हुआ। उस समय जहाँगीर मेवाड़ अभियान के बाद अजमेर में निवास कर रहा था। रो ने सम्राट को इंग्लैंड के राजा जेम्स प्रथम का पत्र तथा अनेक बहुमूल्य उपहार भेंट किए। उसने मुगल सम्राट के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित करने का प्रयास किया और अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी को व्यापारिक सुविधाएँ दिलाने के उद्देश्य से नियमित वार्ताएँ प्रारंभ कीं।

टॉमस रो एक कुशल, धैर्यवान और व्यवहार-कुशल राजनयिक था। उसने शीघ्र ही समझ लिया कि मुगल दरबार में सफलता केवल सम्राट से मिलने पर निर्भर नहीं है, बल्कि प्रभावशाली दरबारियों का सहयोग भी आवश्यक है। इसलिए उसने नूरजहाँ के भाई तथा शक्तिशाली मुगल अमीर आसफ़ ख़ाँ से घनिष्ठ संबंध स्थापित किए। इन संबंधों के माध्यम से उसने कंपनी के व्यापारिक हितों को आगे बढ़ाया और मुगल अधिकारियों का विश्वास अर्जित किया।

रो का प्रमुख उद्देश्य अंग्रेजों के लिए सुरक्षित एवं निर्बाध व्यापार की व्यवस्था करना था। वह चाहता था कि कंपनी को सूरत, आगरा, अहमदाबाद तथा अन्य प्रमुख व्यापारिक नगरों में फैक्ट्रियाँ स्थापित करने की अनुमति मिले। साथ ही, स्थानीय अधिकारियों को यह निर्देश दिया जाए कि वे अंग्रेज व्यापारियों को सुरक्षा प्रदान करें और अनावश्यक करों तथा प्रशासनिक बाधाओं से मुक्त रखें।

मुगल दरबार में पुर्तगाली व्यापारी अंग्रेजों के सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी थे। वे नहीं चाहते थे कि अंग्रेज भारत के लाभदायक समुद्री व्यापार में भागीदार बनें। किंतु स्वाली के युद्ध में उनकी पराजय के बाद उनकी प्रतिष्ठा और प्रभाव दोनों कमजोर पड़ चुके थे। टॉमस रो ने इस परिस्थिति का लाभ उठाया और मुगल दरबार को विश्वास दिलाया कि अंग्रेज व्यापार करना चाहते हैं, न कि धार्मिक या राजनीतिक हस्तक्षेप। उसकी संयमित नीति और व्यावहारिक दृष्टिकोण के कारण अंग्रेजों के प्रति मुगल प्रशासन का रवैया पहले की अपेक्षा अधिक अनुकूल हो गया।

सर टॉमस रो 1619 ई. में इंग्लैंड लौट गया। यद्यपि वह अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए कोई व्यापक राजनीतिक संधि या विशेषाधिकार प्राप्त नहीं कर सका, फिर भी उसका मिशन अत्यंत सफल माना जाता है। उसके प्रयासों से कंपनी को मुगल साम्राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में व्यापार करने तथा पश्चिमी भारत में अपनी व्यापारिक गतिविधियों का विस्तार करने का अवसर मिला। सूरत सहित अनेक व्यापारिक केंद्रों में अंग्रेजों की स्थिति अधिक सुरक्षित हुई और स्थानीय अधिकारियों के साथ उनके संबंध भी बेहतर बने। इस प्रकार टॉमस रो ने भारत में अंग्रेजी व्यापार के स्थायी विकास की मजबूत आधारशिला रखी।

प्रारंभिक अंग्रेजी फैक्ट्रियाँ

1600 ई. में अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना का मुख्य उद्देश्य भारत तथा पूर्वी देशों के साथ लाभदायक व्यापार करना था। प्रारंभिक वर्षों में कंपनी को पुर्तगालियों के विरोध, समुद्री प्रतिस्पर्धा तथा स्थानीय शासकों से अनुमति प्राप्त करने जैसी अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। धीरे-धीरे समुद्री शक्ति, कूटनीतिक प्रयासों और व्यापारिक दक्षता के बल पर अंग्रेजों ने भारत के विभिन्न भागों में अपनी फैक्ट्रियाँ स्थापित कर लीं। ये फैक्ट्रियाँ वस्तुतः व्यापारिक गोदाम और कार्यालय थीं, जहाँ माल का संग्रह, क्रय-विक्रय तथा निर्यात किया जाता था।

मछलीपट्टनम फैक्टरी (1611 ई.)

भारत में अंग्रेजों की पहली व्यापारिक फैक्टरी 1611 ई. में दक्षिण भारत के पूर्वी तट पर स्थित मछलीपट्टनम (मसुलीपट्टनम) में स्थापित हुई। यह गोलकुंडा राज्य का प्रमुख बंदरगाह था। यहाँ से अंग्रेज मुख्यतः सूती वस्त्रों का निर्यात करते थे। कोरोमंडल तट के उत्कृष्ट कपड़ों की यूरोप तथा दक्षिण-पूर्व एशिया में अत्यधिक माँग थी, इसलिए यह केंद्र शीघ्र ही कंपनी के लिए अत्यंत लाभदायक बन गया।

सूरत फैक्टरी (1613 ई.)

पश्चिमी भारत में अंग्रेजों की पहली स्थायी फैक्टरी 1613 ई. में सूरत में स्थापित हुई। कैप्टन विलियम हॉकिंस व्यापारिक अनुमति प्राप्त करने में सफल नहीं हो पाया था, किंतु 1612 ई. में स्वाली के युद्ध में अंग्रेजों की विजय के बाद परिस्थितियाँ बदल गईं। सम्राट जहाँगीर ने अंग्रेजों को सूरत में व्यापारिक फैक्टरी स्थापित करने की अनुमति प्रदान की। शीघ्र ही सूरत पश्चिमी भारत में अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी का प्रमुख व्यापारिक केंद्र बन गया और यूरोप तथा पश्चिम एशिया के साथ समुद्री व्यापार का महत्त्वपूर्ण आधार बना।

अन्य व्यापारिक केंद्रों का विस्तार

सर टॉमस रो के मिशन के बाद अंग्रेजों ने मुगल साम्राज्य के भीतर अपने व्यापारिक नेटवर्क का विस्तार किया। आगरा, अहमदाबाद, बुरहानपुर, पटना तथा कासिमबाज़ार जैसे प्रमुख नगरों में उनकी व्यापारिक कोठियाँ स्थापित हुईं। 1633 ई. में उड़ीसा के हरिहरपुर और बालासोर में भी फैक्ट्रियाँ स्थापित की गईं। अगले वर्ष व्यापारिक सुविधाओं और कुछ करों में छूट मिलने से इन केंद्रों की गतिविधियाँ और अधिक विकसित हुईं।

मद्रास और फोर्ट सेंट जॉर्ज

दक्षिण भारत में अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी के विस्तार की दिशा में मद्रास (वर्तमान चेन्नई) की स्थापना एक महत्त्वपूर्ण घटना थी। 1639 ई. में कंपनी के अधिकारी फ्रांसिस डे ने चंद्रगिरि के नायक शासक (दामरला वेंकटाद्रि नायक) से समुद्र तट पर भूमि प्राप्त की। इस भूमि पर अंग्रेजों ने अपना व्यापारिक केंद्र स्थापित किया और 1640 ई. में उसकी सुरक्षा के लिए फोर्ट सेंट जॉर्ज का निर्माण कराया। यह भारत में अंग्रेजों का पहला प्रमुख किलेबंद व्यापारिक केंद्र था। शीघ्र ही इसके चारों ओर यूरोपीय व्यापारियों, भारतीय कारीगरों और व्यापारियों की बस्तियाँ विकसित होने लगीं। मद्रास सूती वस्त्रों के निर्यात का प्रमुख केंद्र बन गया और दक्षिण भारत में अंग्रेजी व्यापार का आधार बना। आगे चलकर यही स्थान मद्रास प्रेसीडेंसी का मुख्यालय बना तथा अंग्रेजों की प्रशासनिक, सैन्य और राजनीतिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र बनकर दक्षिण भारत में ब्रिटिश शक्ति के विस्तार का आधार सिद्ध हुआ।

बंबई (मुंबई)

बंबई (मुंबई) अंग्रेजों को 1661 ई. में पुर्तगाल की राजकुमारी कैथरीन ऑफ ब्रगांज़ा और इंग्लैंड के राजा चार्ल्स द्वितीय के विवाह के अवसर पर दहेज के रूप में प्राप्त हुआ। प्रारंभ में इसका प्रशासन ब्रिटिश राजसत्ता के अधीन था, किंतु 1668 ई. में इसे मात्र 10 पाउंड वार्षिक किराये पर अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी को सौंप दिया गया। प्राकृतिक एवं सुरक्षित बंदरगाह, अनुकूल समुद्री स्थिति तथा पश्चिमी तट पर स्थित होने के कारण बंबई शीघ्र ही कंपनी का प्रमुख व्यापारिक और नौसैनिक केंद्र बन गया। यहाँ से कपास, वस्त्र, मसाले और अन्य वस्तुओं का व्यापार तीव्र गति से बढ़ा। 1687 ई. में बंबई ने सूरत का स्थान ले लिया और पश्चिमी भारत में अंग्रेजी सत्ता का सबसे महत्त्वपूर्ण आधार बन गया।

बंगाल में ब्रिटिश व्यापार का विस्तार

सत्रहवीं शताब्दी के मध्य तक बंगाल अंग्रेजी व्यापार का अत्यंत महत्त्वपूर्ण क्षेत्र बन चुका था। 1651 ई. में कंपनी ने हुगली में अपनी फैक्टरी स्थापित की। इसके बाद पटना और कासिमबाज़ार में भी व्यापारिक केंद्र विकसित किए गए। बंगाल से अंग्रेज रेशम, सूती वस्त्र, शोरा (साल्टपीटर), चीनी तथा अन्य मूल्यवान वस्तुओं का निर्यात करते थे। मुगल दरबार में कंपनी के हितों को सुदृढ़ करने में चिकित्सक डॉ. गेब्रियल बॉटन की भूमिका का भी उल्लेख किया जाता है, यद्यपि उनके संबंध में प्रचलित अनेक कथाएँ इतिहासकारों द्वारा विवादित मानी जाती हैं।

1650 ई. से 1700 ई. तक अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी का विकास

सत्रहवीं शताब्दी के मध्य तक अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी भारत में एक व्यापारिक संस्था के रूप में अपनी स्थिति मजबूत कर चुकी थी। 1650 ई. के बाद कंपनी के विकास में इंग्लैंड की गृह सरकार के सहयोग, राजकीय संरक्षण, व्यापारिक नीतियों में परिवर्तन तथा भारतीय राजनीतिक परिस्थितियों का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा। इसी काल में कंपनी ने धीरे-धीरे केवल व्यापारिक संस्था से एक शक्तिशाली राजनीतिक संगठन का रूप लेना प्रारंभ कर दिया।

गृह सरकार का सहयोग एवं राजकीय संरक्षण

इंग्लैंड में गृहयुद्ध (1642–1651 ई.) के कारण प्रारंभ में अंग्रेजी कंपनी को कुछ कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, किंतु ऑलिवर क्रॉमवेल (1649–1658 ई.) तथा बाद में चार्ल्स द्वितीय (1660–1685 ई.) के शासनकाल में कंपनी को पर्याप्त राजकीय संरक्षण प्राप्त हुआ। अब पूर्वी देशों के साथ व्यापार केवल कंपनी का निजी विषय नहीं रहा, बल्कि इंग्लैंड की राष्ट्रीय आर्थिक नीति का महत्त्वपूर्ण अंग बन गया।

क्रॉमवेल ने 1651 ई. में नेविगेशन एक्ट पारित किया, जिसके द्वारा इंग्लैंड में विदेशी व्यापार को अंग्रेजी जहाजों के माध्यम से नियंत्रित करने का प्रयास किया गया। इस अधिनियम के अनुसार इंग्लैंड में आने वाला विदेशी माल या तो अंग्रेजी जहाजों से आना चाहिए था अथवा उन देशों के जहाजों से, जहाँ वह वस्तु उत्पन्न हुई हो। इस नीति से अंग्रेजी जहाजरानी और व्यापार को बहुत प्रोत्साहन मिला। इसके अतिरिक्त 1652–1654 ई. में डचों के साथ युद्ध तथा 1654 ई. में पुर्तगाल के साथ संधि ने भी अंग्रेजी समुद्री शक्ति को मजबूत किया।

क्रॉमवेल की मृत्यु (1658 ई.) के बाद चार्ल्स द्वितीय के शासनकाल में भी कंपनी को राजकीय संरक्षण मिलता रहा। 1661 ई. से 1685 ई. के बीच चार्ल्स द्वितीय ने कंपनी को कई अधिकार-पत्र प्रदान किए, जिनसे उसके अधिकारों का विस्तार हुआ। अब कंपनी को सिक्के ढालने, दुर्गों का निर्माण करने, सेना रखने, युद्ध करने तथा संधियाँ करने जैसे अधिकार प्राप्त हो गए। इस प्रकार कंपनी धीरे-धीरे एक व्यापारिक संस्था से राजनीतिक शक्ति के रूप में विकसित होने लगी। 1668 ई. में बंबई केवल 10 पाउंड वार्षिक किराए पर ईस्ट इंडिया कंपनी को मिल गया, जो शीघ्र ही अंग्रेजों का प्रमुख व्यापारिक एवं नौसैनिक केंद्र बन गया। सूरत में मराठा आक्रमणों और असुरक्षा की स्थिति के कारण कंपनी ने 1687 ई. में अपनी पश्चिमी भारत की राजधानी सूरत से हटाकर बंबई कर दी।

कंपनी की नीति में परिवर्तन और मुगलों से संघर्ष

सत्रहवीं शताब्दी के अंतिम चरण तक अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी की नीति में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन आया। प्रारंभ में कंपनी का उद्देश्य केवल व्यापार और मुनाफा कमाना था, किंतु अब वह राजनीतिक प्रभाव स्थापित करने की दिशा में बढ़ने लगी। मुगल साम्राज्य और मराठों के संघर्षों से अंग्रेजों को यह विश्वास हो गया कि वे केवल मुगल संरक्षण पर निर्भर रहकर सुरक्षित व्यापार नहीं कर सकते। कंपनी के कुछ अधिकारियों ने अपने संचालकों को सुझाव देना प्रारंभ किया कि व्यापार की सुरक्षा के लिए सैन्य शक्ति आवश्यक है। धीरे-धीरे कंपनी के निदेशक भी इस विचार से सहमत होने लगे। इस परिवर्तन में कंपनी के गवर्नर सर जोशिया चाइल्ड (1681–1699 ई.) की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। वह कंपनी को एक शक्तिशाली राजनीतिक संस्था बनाना चाहता था।

जोशिया चाइल्ड का विचार था कि मुगल साम्राज्य कमजोर हो रहा है और यह अंग्रेजों के लिए अपनी शक्ति बढ़ाने का उचित समय है। उसकी नीति थी कि भारत के समुद्री तट पर अंग्रेज ऐसी शक्ति बन जाएँ, जिसका प्रभाव सभी स्वीकार करें। इसके लिए उसने व्यापारिक केंद्रों की किलेबंदी, नए दुर्गों के निर्माण और स्थायी सेना रखने पर बल दिया। इस नीति के कारण अंततः अंग्रेजों और मुगलों के बीच संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हुई।

प्रतिद्वंद्वी कंपनी की स्थापना (1698 ई.)

ईस्ट इंडिया कंपनी की बढ़ती समृद्धि और व्यापारिक सफलता से इंग्लैंड के अनेक व्यापारी उससे ईर्ष्या करने लगे। 1688 ई. की गौरवपूर्ण क्रांति के बाद इंग्लैंड में व्हिग दल का प्रभाव बढ़ा। इस दल ने यह विचार प्रस्तुत किया कि पूर्वी देशों के साथ व्यापार करने का अधिकार केवल एक कंपनी तक सीमित नहीं होना चाहिए। इसी परिस्थिति में इंग्लैंड के राजा विलियम तृतीय ने आर्थिक कठिनाइयों को दूर करने के लिए 1698 ई. में पूर्वी व्यापार के एकाधिकार को नीलाम कर दिया। एक नई कंपनी ने सरकार को 20 लाख पाउंड देने का प्रस्ताव रखा, जबकि पुरानी ईस्ट इंडिया कंपनी केवल 7 लाख पाउंड देने को तैयार थी। परिणामस्वरूप संसद ने नई कंपनी को पूर्वी देशों के साथ व्यापार का अधिकार दे दिया। इस प्रकार पुरानी ईस्ट इंडिया कंपनी के सामने एक गंभीर चुनौती उत्पन्न हो गई।

दोनों कंपनियों का विलय

नई और पुरानी दोनों कंपनियों के बीच प्रतिस्पर्धा आरंभ हो गई, जिससे दोनों को आर्थिक हानि होने लगी। इसी समय इंग्लैंड का स्पेन के साथ उत्तराधिकार युद्ध प्रारंभ हो गया, जिससे सरकार ने दोनों कंपनियों के बीच समझौते का प्रयास किया। अंततः 1702 ई. में दोनों कंपनियों के बीच सहयोग की व्यवस्था की गई। 1708–1709 ई. में अर्ल ऑफ गोडोल्फिन की रिपोर्ट के आधार पर इंग्लैंड की संसद ने दोनों कंपनियों का औपचारिक विलय कर दिया। इसके बाद नई संस्था का नाम ‘यूनाइटेड कंपनी ऑफ मर्चेंट्स ऑफ इंग्लैंड ट्रेडिंग टू द ईस्ट इंडीज’ रखा गया। इस एकीकरण से अंग्रेजी व्यापारिक शक्ति और अधिक संगठित हो गई।

इस प्रकार 1650 ई. से 1700 ई. के बीच अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत में अपनी आर्थिक और राजनीतिक स्थिति को मजबूत कर लिया। राजकीय संरक्षण, व्यापारिक केंद्रों का विस्तार, बंबई और मद्रास जैसे महत्त्वपूर्ण केंद्रों की स्थापना तथा सैन्य शक्ति के विकास ने कंपनी को भविष्य के साम्राज्य विस्तार के लिए तैयार कर दिया। यद्यपि इस समय तक उसका मुख्य उद्देश्य व्यापार ही था, किंतु उसकी नीतियों में आए परिवर्तन ने आगे चलकर भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया।

भारत में डेनिश (डेनमार्क) व्यापारियों का आगमन

डेनिश ईस्ट इंडिया कंपनी

भारत में डेनिश (डेनमार्क) व्यापारियों का आगमन सत्रहवीं शताब्दी के प्रारंभ में हुआ। एशियाई व्यापार में भागीदारी के उद्देश्य से 17 मार्च 1616 ई. को डेनमार्क–नॉर्वे के राजा क्रिश्चियन चतुर्थ ने शाही चार्टर द्वारा डेनिश ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना की। इस कंपनी का मुख्य उद्देश्य भारत तथा दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों के साथ व्यापार स्थापित करना और मसाले, सूती वस्त्र, रेशम तथा अन्य बहुमूल्य वस्तुओं का आयात कर यूरोपीय बाज़ारों में लाभ कमाना था। उस समय अंग्रेज़, डच, पुर्तगाली और फ्रांसीसी कंपनियाँ एशियाई व्यापार में सक्रिय थीं, इसलिए डेनमार्क भी इस प्रतिस्पर्धा में शामिल हुआ। यद्यपि सीमित आर्थिक संसाधनों और कमजोर नौसैनिक शक्ति के कारण यह कंपनी अपने प्रतिद्वंद्वियों जितनी प्रभावशाली नहीं बन सकी।

भारत में प्रमुख व्यापारिक केंद्र

डेनिशों ने भारत में अपना पहला और सबसे महत्त्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र त्रांकेबार (थरंगमबाड़ी, तमिलनाडु) में 1620 ई. में स्थापित किया। तंजावुर के नायक शासक से संधि के बाद उन्हें यहाँ व्यापार करने का अधिकार प्राप्त हुआ। उन्होंने यहाँ फोर्ट डांसबॉर्ग का निर्माण कराया, जो डेनिश प्रशासन और व्यापार का प्रमुख मुख्यालय बना। दक्षिण भारत में डेनिश व्यापार का अधिकांश संचालन इसी केंद्र से होता था।

दूसरा प्रमुख केंद्र सेरामपुर (श्रीरामपुर, पश्चिम बंगाल) था, जिसे डेनमार्क ने 1755 ई. में बंगाल के नवाब से प्राप्त किया। कभी-कभी 1676 ई. का उल्लेख मिलता है, परंतु ऐतिहासिक रूप से 1755 ई. अधिक प्रामाणिक माना जाता है। सेरामपुर व्यापार के साथ-साथ शिक्षा, मुद्रण और ईसाई मिशनरी गतिविधियों का भी प्रमुख केंद्र बन गया। इसके अतिरिक्त डेनिशों ने निकोबार द्वीप-समूह पर भी अधिकार स्थापित करने का प्रयास किया, किंतु वहाँ उनका उपनिवेश स्थायी नहीं रह सका।

मुख्य व्यापारिक वस्तुएँ

डेनिश ईस्ट इंडिया कंपनी भारत से मुख्यतः सूती वस्त्र, रेशम, मसाले, काली मिर्च, नील, शोरा (सॉल्टपीटर) तथा अफ़ीम का निर्यात करती थी। बाद के वर्षों में चीन के साथ व्यापार बढ़ने पर चाय तथा चीनी मिट्टी के बर्तनों का व्यापार भी महत्त्वपूर्ण हो गया। इन वस्तुओं की यूरोप में अत्यधिक माँग थी, जिससे कंपनी को पर्याप्त लाभ प्राप्त होता था।

कंपनी का पुनर्गठन

डेनिश ईस्ट इंडिया कंपनी का इतिहास अनेक उतार-चढ़ावों से भरा रहा। प्रारंभिक वर्षों में वित्तीय संकट, जहाज़ों की क्षति और सीमित व्यापारिक सफलता के कारण कंपनी कमजोर पड़ गई। व्यापार को पुनर्जीवित करने के लिए 1670 ई. में नई कंपनी गठित की गई। बाद में 1732 ई. में इसका पुनर्गठन कर डेनिश एशियाटिक कंपनी की स्थापना की गई, जिसने एशिया के साथ व्यापार को आगे बढ़ाने का प्रयास किया।

पतन और भारत से प्रस्थान

डेनिश ईस्ट इंडिया कंपनी कभी भी ब्रिटिश और डच कंपनियों जैसी आर्थिक तथा सैन्य शक्ति प्राप्त नहीं कर सकी। सीमित पूँजी, कमजोर नौसैनिक क्षमता, यूरोपीय प्रतिद्वंद्वियों से कड़ी प्रतिस्पर्धा तथा नेपोलियन युद्धों के दौरान ब्रिटिश हस्तक्षेप ने इसकी स्थिति को और कमजोर कर दिया। अंततः 1845 ई. में डेनमार्क ने अपनी भारतीय बस्तियाँ—त्रांकेबार और सेरामपुर—ब्रिटिश सरकार को बेच दीं। इसके साथ ही भारत में डेनिशों की राजनीतिक और व्यापारिक उपस्थिति समाप्त हो गई। यद्यपि डेनिश भारत में बड़ा औपनिवेशिक साम्राज्य स्थापित नहीं कर सके, फिर भी उन्होंने भारत और यूरोप के बीच व्यापार, शिक्षा, मुद्रण तथा मिशनरी गतिविधियों के विकास में उल्लेखनीय योगदान दिया।

भारत में फ्रांसीसियों का आगमन

फ्रांसीसी ईस्ट इंडिया कंपनी (1664 ई.)

भारत के साथ व्यापारिक प्रतिस्पर्धा में फ्रांसीसी अन्य यूरोपीय शक्तियों की अपेक्षा अपेक्षाकृत देर से शामिल हुए। यद्यपि 1611 ई. में फ्रांस में एक व्यापारिक कंपनी की स्थापना हुई थी, जिसका मुख्य उद्देश्य मेडागास्कर में उपनिवेश स्थापित करना था, किंतु वह विभिन्न कारणों से सफल नहीं हो सकी। इसके बाद फ्रांस के सम्राट लुई चौदहवें के शक्तिशाली वित्तमंत्री जाँ-बैप्टिस्ट कोलबेर (कॉलबर्ट) के प्रयासों से 1664 ई. में फ्रांसीसी ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना की गई। इस कंपनी पर फ्रांसीसी सरकार का प्रत्यक्ष नियंत्रण था तथा इसे पूर्वी देशों के साथ व्यापार का विशेषाधिकार प्राप्त था। 1667 ई. में फ़्राँस्वा कैरॉन के नेतृत्व में फ्रांसीसी अभियान भारत पहुँचा। 1668 ई. में सूरत में फ्रांसीसियों ने अपनी पहली फैक्टरी स्थापित की तथा 1669 ई. में मछलीपट्टनम में दूसरा व्यापारिक केंद्र खोला। बाद में फ़्राँस्वा मार्टिन को भारत स्थित इन दोनों फ्रांसीसी बस्तियों का प्रमुख नियुक्त किया गया, जिसने आगे चलकर भारत में फ्रांसीसी व्यापारिक गतिविधियों के विस्तार में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।

भारत में फ्रांसीसी शक्ति का विस्तार

भारत में फ्रांसीसी शक्ति के विस्तार का वास्तविक श्रेय फ़्राँस्वा मार्टिन को प्राप्त है। भारत में फ्रांसीसी बस्तियों का प्रमुख नियुक्त होने के बाद उसने व्यापारिक गतिविधियों को संगठित किया तथा नए केंद्र स्थापित करने का प्रयास किया। 1673 ई. में तंजावुर के शासक से प्राप्त भूमि पर मद्रास के दक्षिण में पांडिचेरी की स्थापना की गई, जो शीघ्र ही भारत में फ्रांसीसी शक्ति का प्रमुख केंद्र बन गया। अपने कुशल प्रशासन और दूरदर्शिता के कारण फ़्राँस्वा मार्टिन को भारत में फ्रांसीसी उपनिवेशों का वास्तविक संस्थापक माना जाता है।

फ़्राँस्वा मार्टिन

बंगाल में फ्रांसीसियों ने मुगल सूबेदार शाइस्ता ख़ाँ से भूमि प्राप्त कर 1690–1692 ई. के बीच चंद्रनगर की स्थापना की। यह शीघ्र ही बंगाल में फ्रांसीसी व्यापार का प्रमुख केंद्र बन गया। इसी समय यूरोप में चल रहे युद्धों का प्रभाव भारत पर भी पड़ा। 1693 ई. में डचों ने पांडिचेरी पर अधिकार कर लिया, किंतु रिजविक की संधि (1697 ई.) के बाद यह पुनः फ्रांसीसियों को लौटा दिया गया। फ़्राँस्वा मार्टिन को पुनः इसका गवर्नर नियुक्त किया गया और 1706 ई. में अपनी मृत्यु तक उसने पांडिचेरी को एक समृद्ध व्यापारिक नगर के रूप में विकसित कर दिया।

1706 ई. से 1720 ई. के बीच फ्रांस की आंतरिक राजनीतिक और आर्थिक समस्याओं के कारण भारत में फ्रांसीसी व्यापार अपेक्षाकृत कमजोर पड़ गया। इस अवधि में सूरत और मछलीपट्टनम स्थित उनकी फैक्ट्रियों का महत्त्व घट गया तथा व्यापारिक गतिविधियाँ सीमित हो गईं।

डूप्ले

1720 ई. के बाद फ्रांसीसी ईस्ट इंडिया कंपनी ने पुनः प्रगति करना प्रारंभ किया। पियरे क्रिस्तोफ़ ले न्वार तथा पियरे बेनोआ ड्यूमा के नेतृत्व में कंपनी का प्रभाव बढ़ा। इस काल में मलाबार तट पर माही तथा कोरोमंडल तट पर कारीकल में नई फ्रांसीसी बस्तियाँ स्थापित की गईं। 1742 ई. तक फ्रांसीसियों का प्रमुख उद्देश्य केवल व्यापार तक सीमित था, किंतु उसी वर्ष जोज़फ़ फ़्राँस्वा डूप्ले के पांडिचेरी का गवर्नर बनने के साथ उनकी नीति में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन आया। डूप्ले ने भारत में एक शक्तिशाली फ्रांसीसी साम्राज्य की स्थापना का लक्ष्य अपनाया और भारतीय राजनीति में सक्रिय हस्तक्षेप आरंभ किया। उसकी इसी साम्राज्यवादी नीति ने अंग्रेजों और फ्रांसीसियों के बीच कर्नाटक युद्धों की पृष्ठभूमि तैयार की तथा भारत में दोनों यूरोपीय शक्तियों के बीच प्रभुत्व के संघर्ष को जन्म दिया।

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