भारत में अंग्रेजों की सफलता और फ्रांसीसियों की असफलता के कारण (Causes of the Success of the British and the Failure of the French in India)

भारत में अंग्रेजों की सफलता और फ्रांसीसियों की असफलता के कारण (Causes of the Success of the British and the Failure of the French in India)

भारत में अंग्रेजों की सफलता और फ्रांसीसियों की असफलता के कारण

अठारहवीं शताब्दी के मध्य भारत में अंग्रेजों और फ्रांसीसियों के बीच राजनीतिक एवं व्यापारिक प्रभुत्व स्थापित करने के लिए लंबा संघर्ष हुआ, जिसे मुख्यतः कर्नाटक के तीन युद्धों के रूप में जाना जाता है। इन युद्धों का अंतिम परिणाम अंग्रेजों की निर्णायक विजय तथा फ्रांसीसी राजनीतिक शक्ति के पतन के रूप में सामने आया। यद्यपि प्रारंभिक वर्षों में फ्रांसीसी गवर्नर डूप्ले ने उल्लेखनीय सफलताएँ प्राप्त कीं, फिर भी अंततः अंग्रेजों ने भारत में अपनी सर्वोच्चता स्थापित कर ली। अंग्रेजों की सफलता और फ्रांसीसियों की असफलता के पीछे अनेक आर्थिक, राजनीतिक, सैन्य, प्रशासनिक तथा कूटनीतिक कारण उत्तरदायी थे।

व्यापारिक श्रेष्ठता एवं सुदृढ़ आर्थिक स्थिति

अंग्रेजों की सफलता का सबसे महत्त्वपूर्ण कारण उनकी मजबूत आर्थिक स्थिति थी। अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी का व्यापार फ्रांसीसी ईस्ट इंडिया कंपनी की तुलना में कहीं अधिक व्यापक और लाभदायक था। भारत तथा एशिया के अन्य भागों में उसके व्यापारिक केंद्र सुव्यवस्थित थे, जिससे उसे निरंतर आय प्राप्त होती थी। युद्धों के दौरान भी अंग्रेज व्यापार को जारी रखने में सफल रहे और व्यापार से अर्जित धन का उपयोग सैनिक अभियानों, किलेबंदी तथा प्रशासनिक व्यवस्था पर किया।

इसके विपरीत फ्रांसीसी ईस्ट इंडिया कंपनी लगातार आर्थिक संकट से जूझती रही। उसके पास न तो पर्याप्त पूँजी थी और न ही दीर्घकालीन युद्धों का व्यय वहन करने की क्षमता। धन के अभाव में सैनिकों का वेतन, युद्ध सामग्री तथा नौसैनिक अभियानों का संचालन प्रभावित हुआ। परिणामस्वरूप डूप्ले और काउंट डी लाली जैसे योग्य अधिकारियों को भी अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। आर्थिक दृष्टि से अंग्रेजों की यह श्रेष्ठता उनकी विजय का सबसे मजबूत आधार सिद्ध हुई।

अंग्रेजी कंपनी का निजी स्वरूप

अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी एक निजी व्यापारिक संस्था थी। उसके संचालकों, भागीदारों और अधिकारियों का व्यक्तिगत लाभ कंपनी की उन्नति से जुड़ा हुआ था। इसलिए वे व्यापार के विस्तार, प्रशासनिक सुधार तथा सैन्य सफलता के प्रति अधिक उत्साही और उत्तरदायी थे। कंपनी के अधिकारी परिस्थितियों के अनुसार त्वरित निर्णय लेने में सक्षम थे और उन्हें पर्याप्त प्रशासनिक स्वतंत्रता भी प्राप्त थी। इसके विपरीत, फ्रांसीसी ईस्ट इंडिया कंपनी पर फ्रांस सरकार का प्रत्यक्ष नियंत्रण था। सरकारी नियंत्रण के कारण उसके निर्णयों में विलंब होता था तथा अधिकारियों को स्वतंत्र रूप से कार्य करने का अवसर कम मिलता था। निश्चित वेतन पाने वाले कर्मचारियों में निजी लाभ की भावना अपेक्षाकृत कम थी, जिससे कार्यकुशलता भी प्रभावित हुई।

अंग्रेजी सरकार का सहयोग

यद्यपि अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी एक निजी संस्था थी, फिर भी आवश्यकता पड़ने पर उसे इंग्लैंड की सरकार, संसद और व्यापारिक वर्ग का पूरा सहयोग प्राप्त होता था। इंग्लैंड की सरकार भारत में कंपनी के विस्तार को राष्ट्रीय हित से जोड़कर देखती थी। इसलिए युद्ध के समय उसे सैनिक, नौसैनिक तथा आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई जाती थी।

इसके विपरीत फ्रांसीसी सरकार यूरोप के युद्धों और आंतरिक समस्याओं में अधिक उलझी रही। परिणामस्वरूप भारत में स्थित फ्रांसीसी कंपनी को पर्याप्त धन, सैनिक सहायता और नौसैनिक समर्थन नहीं मिल सका। इस उपेक्षा का प्रतिकूल प्रभाव भारत में फ्रांसीसी शक्ति पर पड़ा।

बंगाल विजय का महत्त्व

1757 ई. में प्लासी के युद्ध में अंग्रेजों की विजय भारत में उनके राजनीतिक उत्थान का निर्णायक मोड़ सिद्ध हुई। बंगाल उस समय भारत का सबसे समृद्ध प्रांत था। इस प्रदेश पर प्रभाव स्थापित करने के बाद अंग्रेजों को विशाल आर्थिक संसाधन, नियमित राजस्व तथा सैनिक सहायता प्राप्त हुई। इन्हीं संसाधनों का उपयोग उन्होंने दक्षिण भारत में फ्रांसीसियों के विरुद्ध युद्धों में किया। इतिहासकार एच. एच. डॉडवेल के अनुसार जब मद्रास में अंग्रेज कठिन परिस्थितियों का सामना कर रहे थे, तब बंगाल से प्राप्त धन और संसाधनों ने उनकी स्थिति को सुदृढ़ बनाया। इतिहासकार वी. ए. स्मिथ का मत था कि जिस शक्ति के पास बंगाल जैसा समृद्ध प्रदेश हो, उसके विरुद्ध दक्षिण भारत से साम्राज्य स्थापित करना अत्यंत कठिन था। मैरियट ने भी टिप्पणी की कि डूप्ले ने भारत की शक्ति की कुंजी मद्रास में खोजी, जबकि क्लाइव ने उसे बंगाल में खोज लिया।

डूप्ले को वापस बुलाना

फ्रांसीसी सरकार द्वारा 1754 ई. में जोसेफ फ्रांस्वा डूप्ले को वापस बुलाना फ्रांस की सबसे बड़ी राजनीतिक भूलों में से एक माना जाता है। डूप्ले दूरदर्शी, महत्त्वाकांक्षी और भारतीय राजनीति का गहरा जानकार था। उसने भारतीय उत्तराधिकार विवादों का लाभ उठाकर फ्रांसीसी प्रभाव बढ़ाने की सफल रणनीति बनाई थी। डूप्ले की प्रारंभिक सफलताओं से स्पष्ट था कि यदि उसे पर्याप्त आर्थिक और राजनीतिक समर्थन प्राप्त होता तथा कुछ समय और कार्य करने का अवसर मिलता, तो भारत में फ्रांसीसी स्थिति अधिक मजबूत हो सकती थी। उसके हटने के बाद फ्रांसीसी नेतृत्व में वह क्षमता नहीं रही, जो अंग्रेजों की बढ़ती शक्ति का प्रभावी ढंग से सामना कर सके।

अंग्रेज अधिकारियों की योग्यता और एकता

अंग्रेजों की सफलता का एक प्रमुख कारण उनके अधिकारियों की योग्यता, अनुशासन और पारस्परिक सहयोग था। रॉबर्ट क्लाइव, स्ट्रिंगर लॉरेंस और सर आयर कूट जैसे सेनानायकों ने परिस्थितियों के अनुसार साहसपूर्ण निर्णय लिए और एक-दूसरे के साथ समन्वय बनाकर कार्य किया। उनके बीच संगठन, अनुशासन और साझा उद्देश्य की भावना स्पष्ट दिखाई देती है। इसके विपरीत, फ्रांसीसी अधिकारियों में निरंतर मतभेद बने रहे। ला बोर्दोने और डूप्ले के बीच मद्रास के प्रश्न पर गंभीर विवाद उत्पन्न हुआ। बाद में काउंट डी लाली का भी बूसी तथा अन्य अधिकारियों से समन्वय नहीं बन पाया। नौसेना और थलसेना के अधिकारियों के बीच भी सहयोग का अभाव था, जिससे फ्रांसीसी शक्ति कमजोर होती गई।

काउंट डी लाली की त्रुटियाँ

काउंट डी लाली एक साहसी और निडर सैनिक था, किंतु वह भारत की राजनीतिक परिस्थितियों और स्थानीय समाज से परिचित नहीं था। उसका व्यवहार कठोर तथा क्रोधपूर्ण था, जिसके कारण वह अपने सहयोगियों और भारतीय शासकों का विश्वास अर्जित नहीं कर सका। उसकी सबसे बड़ी भूल बूसी को हैदराबाद से वापस बुलाना थी। इससे हैदराबाद में वर्षों से स्थापित फ्रांसीसी प्रभाव समाप्त हो गया और अंग्रेजों को वहाँ अपना प्रभाव बढ़ाने का अवसर मिल गया। इसके अतिरिक्त तंजावुर अभियान तथा मद्रास की असफल घेराबंदी ने भी फ्रांसीसी शक्ति को कमजोर कर दिया।

अंग्रेजों की श्रेष्ठ नौसैनिक शक्ति

अंग्रेजों की समुद्री शक्ति उनकी सफलता का अत्यंत महत्त्वपूर्ण कारण थी। ब्रिटिश नौसेना उस समय विश्व की सबसे संगठित और शक्तिशाली नौसेनाओं में से एक थी। समुद्र पर नियंत्रण होने के कारण अंग्रेज भारत में सैनिक, धन, हथियार और रसद शीघ्रता से पहुँचा सकते थे। संकट के समय उन्हें यूरोप और बंगाल दोनों स्थानों से निरंतर सहायता मिलती रही। इसके विपरीत, फ्रांसीसी नौसेना अपेक्षाकृत कमजोर थी। समुद्री मार्गों पर अंग्रेजों के नियंत्रण के कारण फ्रांस से भारत तक सहायता पहुँचाना कठिन हो गया। परिणामस्वरूप फ्रांसीसी सेनाओं को आवश्यक संसाधन समय पर नहीं मिल सके। इतिहासकार डॉडवेल ने भी स्वीकार किया है कि अंग्रेजों की समुद्री शक्ति उनकी विजय का सबसे प्रभावशाली कारण थी।

यूरोपीय राजनीति का प्रभाव

भारत में अंग्रेजों और फ्रांसीसियों के संघर्ष पर यूरोप की राजनीति का भी गहरा प्रभाव पड़ा। फ्रांस एक साथ अनेक यूरोपीय युद्धों में उलझा हुआ था, विशेषकर सप्तवर्षीय युद्ध के दौरान उसे यूरोप और उत्तरी अमेरिका में भी अपनी शक्ति का उपयोग करना पड़ा। इसलिए वह भारत को पर्याप्त सहायता नहीं दे सका। इसके विपरीत, इंग्लैंड एक शक्तिशाली समुद्री राष्ट्र था। उसकी नौसैनिक श्रेष्ठता और वैश्विक व्यापारिक नेटवर्क ने उसे अपने उपनिवेशों की रक्षा और विस्तार के लिए अधिक संसाधन उपलब्ध कराए। यूरोप में फ्रांस की व्यस्तता का सीधा लाभ भारत में अंग्रेजों को मिला।

विलियम पिट की प्रभावी नीति

अंग्रेजों की सफलता में ब्रिटेन के प्रसिद्ध राजनेता विलियम पिट की नीति का भी महत्त्वपूर्ण योगदान था। उसने सप्तवर्षीय युद्ध के दौरान ऐसी वैश्विक रणनीति अपनाई, जिसके अंतर्गत ब्रिटिश नौसेना को सुदृढ़ किया गया तथा फ्रांस के उपनिवेशों पर लगातार दबाव बनाया गया। पिट का उद्देश्य केवल यूरोप में विजय प्राप्त करना नहीं था, बल्कि फ्रांस के औपनिवेशिक साम्राज्य को भी कमजोर करना था। उसकी नीति के कारण फ्रांस को अपने संसाधन अनेक मोर्चों पर विभाजित करने पड़े, जबकि अंग्रेज भारत में अधिक संगठित ढंग से अपनी शक्ति का विस्तार करने में सफल रहे।

इस प्रकार भारत में अंग्रेजों की सफलता और फ्रांसीसियों की असफलता किसी एक घटना या व्यक्ति का परिणाम नहीं थी, बल्कि अनेक अनुकूल एवं प्रतिकूल परिस्थितियों का संयुक्त प्रभाव थी। अंग्रेजों की मजबूत आर्थिक स्थिति, व्यापक व्यापार, निजी कंपनी की कार्यकुशलता, सरकार का सहयोग, बंगाल के अपार संसाधन, शक्तिशाली नौसेना, योग्य नेतृत्व तथा प्रभावी कूटनीति ने उन्हें निर्णायक बढ़त प्रदान की। दूसरी ओर, फ्रांसीसी कंपनी की आर्थिक दुर्बलता, सरकारी नियंत्रण, नौसैनिक कमजोरी, अधिकारियों के पारस्परिक मतभेद, डूप्ले की वापसी, लाली की रणनीतिक त्रुटियाँ तथा फ्रांस की यूरोपीय व्यस्तताएँ उनकी असफलता के प्रमुख कारण बनीं। कर्नाटक के तीनों युद्धों के परिणामस्वरूप भारत में फ्रांसीसी राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं का अंत हो गया और अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी भारत की सबसे प्रभावशाली यूरोपीय शक्ति बनकर उभरी। यही वह निर्णायक चरण था जिसने आगे चलकर भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की स्थापना की मजबूत आधारशिला रखी।

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