मध्यपाषाणकाल
मध्यपाषाणकाल प्रागैतिहासिक मानव विकास का वह संक्रमणकाल है, जिसने पुरापाषाणकालीन आखेट एवं खाद्य-संग्रह पर आधारित जीवन तथा नवपाषाणकालीन कृषि एवं पशुपालन पर आधारित जीवन के मध्य सेतु का कार्य किया। प्रारंभिक विद्वानों ने पाषाण युग को केवल पुरापाषाण और नवपाषाण दो भागों में विभाजित किया था, किंतु उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध तथा बीसवीं शताब्दी के पुरातात्त्विक अनुसंधानों से स्पष्ट हुआ कि इन दोनों के बीच एक विशिष्ट सांस्कृतिक अवस्था विद्यमान थी, जिसे मध्यपाषाणकाल कहा गया है। सामान्यतः इसका काल लगभग 10,000 ईसा पूर्व से 6000 अथवा 5000 ईसा पूर्व तक माना जाता है, यद्यपि विभिन्न क्षेत्रों में इसकी समय-सीमा भिन्न रही। यूरोप के कुछ उत्तरी भागों में यह संस्कृति लगभग 2000 ईसा पूर्व तक विद्यमान रही, जबकि पश्चिमी एशिया के अनेक क्षेत्रों में इसका स्थान अपेक्षाकृत शीघ्र नवपाषाण संस्कृति ने ले लिया।
जलवायु परिवर्तन
मध्यपाषाणकाल का उद्भव अंतिम हिमयुग की समाप्ति और उसके परिणामस्वरूप उत्पन्न जलवायु परिवर्तन से जुड़ा हुआ था। लगभग 10,000 ईसा पूर्व के बाद हिमनदों के पीछे हटने से यूरोप, एशिया तथा अन्य क्षेत्रों में अपेक्षाकृत गर्म और आर्द्र जलवायु विकसित हुई। घास के विशाल मैदानों के स्थान पर वनों और झाड़ियों का विस्तार होने लगा तथा मैमथ, ऊनी गैंडे और विशाल बारहसिंगा जैसे हिमयुगीन जीव या तो विलुप्त हो गए अथवा उत्तरी क्षेत्रों की ओर चले गए।
इस परिवर्तन ने मानव की जीवन-पद्धति को गहराई से प्रभावित किया। अब बड़े पशुओं के स्थान पर छोटे एवं तीव्र गति से चलने वाले पशुओं का शिकार अधिक महत्त्वपूर्ण हो गया। फलस्वरूप हल्के, तीक्ष्ण और अधिक प्रभावी हथियारों तथा उपकरणों की आवश्यकता अनुभव की गई। यही कारण है कि इस काल में सूक्ष्म पाषाण उपकरणों, धनुष-बाण तथा संग्रथित औजारों का व्यापक विकास हुआ।
क्षेत्रीय संस्कृतियाँ
मध्यपाषाणकालीन संस्कृतियों में पर्याप्त क्षेत्रीय विविधता दिखाई देती है। यूरोप के विभिन्न भागों में स्थानीय पर्यावरण और उपलब्ध संसाधनों के अनुसार अलग-अलग सांस्कृतिक परंपराएँ विकसित हुईं। पश्चिमी यूरोप में एजीलियन, टार्डेनोसियन, एस्टूरियन तथा सॉवेटेरियन संस्कृतियाँ प्रमुख थीं, जबकि उत्तरी यूरोप में मैग्लेमोसियन, कोंगेमोसे और एर्टेबोले संस्कृतियों का विकास हुआ।
इन सभी संस्कृतियों की सामान्य विशेषता सूक्ष्म पाषाण उपकरणों का व्यापक उपयोग, मत्स्य-शिकार की उन्नत तकनीक तथा विविध आखेट साधनों का विकास था। आधुनिक पुरातत्त्व इन्हें किसी एक सार्वभौमिक सांस्कृतिक क्रम के स्थान पर स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप विकसित क्षेत्रीय परंपराओं के रूप में देखता है।
भारतीय मध्यपाषाणकाल
भारतीय उपमहाद्वीप में मध्यपाषाणकाल का व्यापक विस्तार था। इसके पुरातात्त्विक अवशेष उत्तर-पश्चिम में पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान की सीमा से लेकर दक्षिण भारत तथा पूर्व में बिहार और झारखंड तक प्राप्त हुए हैं। उत्तर प्रदेश की बेलन घाटी, सरायनाहर राय, महदहा, दमदमा, चोपनीमांडो, लेखहिया, बघईखोर तथा मोरहना पहाड़ भारतीय मध्यपाषाणकाल के प्रमुख स्थल हैं।
इनके अतिरिक्त राजस्थान का बागोर, गुजरात का लंघनाज, मध्य प्रदेश का आदमगढ़ तथा भीमबेटका, महाराष्ट्र का नेवासा और आंध्र प्रदेश के कुछ स्थल भी इस संस्कृति के महत्त्वपूर्ण केंद्र रहे हैं। विशेष रूप से प्रोफेसर जी. आर. शर्मा तथा अन्य भारतीय पुरातत्त्वविदों द्वारा किए गए उत्खननों से यह स्पष्ट है कि इस काल में मानव का जीवन पहले की अपेक्षा अधिक संगठित, स्थिर और पर्यावरण के अनुकूल हो चुका था।
सूक्ष्म पाषाण उपकरणों का विकास
मध्यपाषाणकाल की सबसे महत्त्वपूर्ण तकनीकी उपलब्धि सूक्ष्म पाषाण उपकरणों का विकास था। उच्च पुरापाषाणकाल में प्रारंभ हुई छोटे ब्लेड बनाने की परंपरा इस काल में पूर्ण विकसित हो गई। ये उपकरण सामान्यतः 1 से 5 सेंटीमीटर लंबे होते थे तथा फ्लिंट, चर्ट, जैस्पर, अगेट, चल्सेडोनी और क्वार्ट्ज जैसे कठोर पत्थरों से बनाए जाते थे।
इनमें बैक्ड ब्लेड, स्क्रेपर, प्वाइंट, बोरर, त्रिकोण, अर्धचंद्राकार (ल्यूनेट), समलंबाकार (ट्रेपेज़) तथा तीरों के अग्रभाग प्रमुख थे। इन सूक्ष्म उपकरणों को लकड़ी, हड्डी या सींग की डंडियों में जड़कर संग्रथित औजार तैयार किए जाते थे। यदि किसी औजार का एक भाग टूट जाता था तो केवल वही भाग बदलना पड़ता था; संपूर्ण औजार पुनः बनाने की आवश्यकता नहीं होती थी। इससे समय, श्रम और संसाधनों की बचत होती थी तथा आखेट अधिक प्रभावी बन जाता था।
आर्थिक जीवन और आजीविका
मध्यपाषाणकालीन मानव की अर्थव्यवस्था मुख्यतः आखेट, मत्स्य-शिकार तथा खाद्य-संग्रह पर आधारित थी, किंतु उसकी आजीविका पुरापाषाणकाल की अपेक्षा अधिक विविध और संतुलित हो चुकी थी। जलवायु और ऋतुओं के अनुसार लोग अपने निवास स्थान बदलते थे। गर्मियों में खुले स्थानों अथवा अस्थायी शिविरों में रहते थे, जबकि शीतकाल में गुफाओं, शैलाश्रयों या झोपड़ीनुमा आवासों का उपयोग करते थे। अनेक स्थलों से चार-पाँच झोपड़ियों के समूह प्राप्त हुए हैं, जो छोटे मौसमी शिविरों अथवा प्रारंभिक बस्तियों का संकेत देते हैं। यद्यपि इन्हें पूर्ण विकसित ग्राम नहीं कहा जा सकता, फिर भी ये स्थायी निवास की दिशा में बढ़ते हुए महत्त्वपूर्ण कदम थे।
खाद्य-संग्रह और प्रारंभिक कृषि
इस काल में व्यवस्थित कृषि का विकास नहीं हुआ था, किंतु खाद्य-संग्रह की पद्धतियाँ पहले की अपेक्षा कहीं अधिक उन्नत हो चुकी थीं। मानव जंगली अनाज, फल, मेवे, कंद-मूल तथा अन्य वनस्पतियों का सुनियोजित ढंग से संग्रह करने लगा था। अनेक स्थलों से पीसने के पत्थर, ओखली तथा मूसल जैसे उपकरण प्राप्त हुए हैं, जिनसे अनाज को संसाधित करने की जानकारी मिलती है।
पश्चिमी एशिया की नतूफियन संस्कृति तथा जेरिको क्षेत्र से प्राप्त हंसिया जैसे उपकरण इस बात का संकेत देते हैं कि मध्यपाषाणकाल के उत्तरार्द्ध में कुछ समुदाय जंगली अनाज के सुनियोजित संग्रह और प्रारंभिक खेती के प्रयोग करने लगे थे। इस प्रकार कृषि का वास्तविक विकास भले ही नवपाषाणकाल में हुआ, किंतु उसकी आधारभूमि मध्यपाषाणकाल में तैयार होने लगी थी।
पशुपालन का प्रारंभ
पशुपालन की दृष्टि से मध्यपाषाणकाल की सबसे उल्लेखनीय उपलब्धि कुत्ते का पालतू बनाया जाना थी। पुरातात्त्विक साक्ष्यों से ज्ञात होता है कि कुत्ता मानव का प्रथम पालतू पशु था। वह शिकार में सहायता करता, शिविरों की रक्षा करता तथा हिंसक पशुओं की उपस्थिति का संकेत देता था। बदले में उसे भोजन के अवशेष प्राप्त होते थे। मानव और कुत्ते के बीच विकसित यह सहजीवी संबंध आगे चलकर अन्य पशुओं के पालतूकरण की दिशा में पहला महत्त्वपूर्ण कदम सिद्ध हुआ।
मत्स्य-शिकार और परिवहन
मध्यपाषाणकाल में मत्स्य-शिकार का महत्त्व अत्यधिक बढ़ गया। नदियों, झीलों और समुद्री तटों के निकट बड़ी मात्रा में मछलियों, शंखों तथा अन्य जलीय जीवों के अवशेष प्राप्त हुए हैं। यूरोप के तटीय क्षेत्रों में विशाल शंख-ढेर इस बात के प्रमाण हैं कि समुद्री संसाधन इन समुदायों के भोजन का महत्त्वपूर्ण अंग बन चुके थे।
मत्स्य-शिकार के लिए काँटे, हारपून, जाल तथा हड्डी से बने भाले प्रयुक्त होते थे। इसी काल में लकड़ी की डोंगियाँ, चमड़े की नावें तथा हिमाच्छादित क्षेत्रों में बिना पहियों वाली स्लेज जैसी परिवहन तकनीकों का विकास हुआ, जिससे मानव की गतिशीलता तथा संसाधनों के उपयोग की क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई।
आवास और सामाजिक जीवन
मध्यपाषाणकालीन समाज छोटे-छोटे परिवारों अथवा कुल-समूहों में संगठित था। सहयोग, सामूहिक आखेट तथा संसाधनों के साझे उपयोग की परंपरा पहले से अधिक सुदृढ़ हो चुकी थी। झोपड़ियों और मौसमी शिविरों की स्थापना से सामाजिक संगठन अधिक व्यवस्थित हुआ तथा समूहों के बीच परस्पर संपर्क भी बढ़ा।
कुछ पुरास्थलों से व्यवस्थित कब्रिस्तान प्राप्त हुए हैं, जहाँ मृतकों को निश्चित विधि से दफनाया गया था। कई कब्रों में लाल गेरू, उपकरण तथा आभूषण भी मिले हैं, जो धार्मिक विश्वासों तथा मृतकों के प्रति सम्मान की भावना को व्यक्त करते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि इस काल में सामाजिक और सांस्कृतिक चेतना का निरंतर विकास हो रहा था।
कला और सांस्कृतिक कार्यकलाप
सांस्कृतिक दृष्टि से मध्यपाषाणकाल उच्च पुरापाषाणकाल की विशाल गुफा-चित्र परंपरा से कुछ भिन्न दिखाई देता है। यूरोप में भव्य भित्तिचित्रों की संख्या घट जाती है, किंतु भारत सहित अनेक क्षेत्रों में शैलचित्रों की परंपरा निरंतर बनी रहती है। विशेष रूप से मध्य प्रदेश के भीमबेटका शैलाश्रयों में मध्यपाषाणकालीन चित्रों में आखेट, नृत्य, सामूहिक उत्सव, पशु-पक्षियों तथा दैनिक जीवन के विविध दृश्य अंकित हैं। इन चित्रों से स्पष्ट होता है कि कला का स्वरूप बदल गया था, परंतु उसकी परंपरा समाप्त नहीं हुई। मानव अब केवल पशुओं का चित्रण ही नहीं करता था, बल्कि स्वयं को और अपने सामाजिक जीवन को भी कलात्मक अभिव्यक्ति का विषय बनाने लगा था। इससे उसके विकसित सामाजिक संगठन, सांस्कृतिक चेतना तथा प्रतीकात्मक विचारों का परिचय मिलता है।




