पाषाण युग (Stone Age)

पाषाण युग (Stone Age)

पाषाण युग

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पाषाण युग मानव इतिहास का सबसे प्राचीन एवं सबसे लंबा काल है। इसे सामान्यतः प्रागैतिहासिक काल का पर्याय माना जाता है, क्योंकि इस समय मानव द्वारा निर्मित अधिकांश उपकरण पत्थर के थे। यद्यपि हड्डी, सींग, लकड़ी तथा हाथीदाँत से भी उपकरण बनाए जाते थे, फिर भी पुरातात्त्विक उत्खननों में सर्वाधिक संख्या में पत्थर के उपकरण ही प्राप्त हुए हैं। इसी आधार पर इस काल को पाषाण युग कहा गया। पत्थर के उपकरणों की बनावट, निर्माण तकनीक तथा उपयोग में समय के साथ हुए परिवर्तनों के आधार पर पुरातत्त्वविदों ने इस युग को विभिन्न चरणों में विभाजित किया है, जिससे मानव विकास की क्रमिक प्रक्रिया को समझना अधिक सरल हो गया है।

पाषाण युग का वर्गीकरण

ब्रिटिश पुरातत्त्वविद् सर जॉन लुबॉक ने 1865 ई. में सर्वप्रथम पाषाण युग को दो भागों—पुरापाषाण और नवपाषाण में विभाजित किया। बाद के अनुसंधानों से इन दोनों के मध्य एक संक्रमणकालीन संस्कृति के प्रमाण प्राप्त हुए, जिसके उपकरण न तो पूर्णतः पुरापाषाणीय थे और न ही नवपाषाणीय। परिणामस्वरूप इस मध्यवर्ती अवस्था को मध्यपाषाण नाम दिया गया। वर्तमान में यही त्रिस्तरीय वर्गीकरण सर्वाधिक मान्य माना जाता है।

  1. पुरापाषाण काल
  2. नवपाषाण काल
  3. मध्यपाषाण काल
क्षेत्रीय भिन्नताएँ

विश्व के विभिन्न भागों में पाषाण युग की समय-सीमा और शब्दावली समान नहीं रही है। अफ्रीका में अनेक विद्वान प्रारंभिक, मध्य और उत्तर पाषाण युग की संज्ञाओं का प्रयोग करते हैं, जबकि यूरोप और एशिया में पुरापाषाण, मध्यपाषाण और नवपाषाण शब्द अधिक प्रचलित हैं। यह अंतर स्थानीय सांस्कृतिक विकास एवं पुरातात्त्विक परंपराओं के कारण है। आधुनिक पुरातत्त्व किसी एक प्रणाली को सार्वभौमिक न मानकर प्रत्येक क्षेत्र के स्थानीय विकासक्रम को अधिक महत्त्व देता है।

आर्थिक एवं सामाजिक परिवर्तन

बीसवीं शताब्दी में प्रागैतिहासिक अध्ययन में आर्थिक और सामाजिक दृष्टिकोण को भी महत्त्व मिला। प्रसिद्ध पुरातत्त्वविद् वी. गॉर्डन चाइल्ड ने मानव विकास को भोजन प्राप्त करने की पद्धति के आधार पर समझाया। उनके अनुसार प्रारंभिक मानव शिकारी एवं खाद्य-संग्राहक था, जबकि नवपाषाण काल में कृषि और पशुपालन के विकास के साथ वह खाद्य-उत्पादक बन गया। इस ऐतिहासिक परिवर्तन को उन्होंने ‘नवपाषाण क्रांति’ की संज्ञा दी। इसी परिवर्तन के परिणामस्वरूप स्थायी बस्तियों, ग्रामों तथा आगे चलकर नगर सभ्यताओं के विकास का मार्ग प्रशस्त हुआ।

समय-सीमा

पाषाण युग के विभिन्न चरणों की समय-सीमा विश्व के सभी क्षेत्रों में समान नहीं रही। सामान्यतः पुरापाषाण काल का आरंभ लगभग 33 लाख वर्ष पूर्व पूर्वी अफ्रीका में सबसे प्राचीन पत्थर के उपकरणों के निर्माण से माना जाता है और इसका अंत लगभग 10,000 ईसा पूर्व के आसपास हुआ। मध्यपाषाण काल लगभग 10,000 ईसा पूर्व से 8,000 अथवा 6,000 ईसा पूर्व तक माना जाता है। नवपाषाण काल का आरंभ पश्चिमी एशिया में लगभग 10,000 ईसा पूर्व तथा भारतीय उपमहाद्वीप में लगभग 7000 ईसा पूर्व मेहरगढ़ से प्राप्त प्रमाणों के आधार पर माना जाता है। इससे स्पष्ट होता है कि पाषाण युग का अध्ययन किसी निश्चित तिथि के आधार पर नहीं, बल्कि प्रत्येक क्षेत्र के सांस्कृतिक और तकनीकी विकास के संदर्भ में किया जाता है।

पुरापाषाणकाल

पुरापाषाणकाल मानव इतिहास का सबसे प्राचीन तथा सबसे लंबा सांस्कृतिक चरण है। ‘पैलियोलिथिक’ शब्द यूनानी भाषा के दो शब्दों—पैलाइओस अर्थात् प्राचीन तथा लिथोस अर्थात् पत्थर से मिलकर बना है, जिसका शाब्दिक अर्थ ‘प्राचीन पाषाण युग’ है। इस काल में मानव ने मुख्यतः पत्थर के उपकरणों का निर्माण एवं उपयोग किया। प्रारंभिक उपकरण अत्यंत साधारण और अपरिष्कृत थे, किंतु समय के साथ उनकी बनावट, तकनीक और उपयोगिता में निरंतर सुधार होता गया।

आधुनिक पुरातत्त्व के अनुसार पुरापाषाणकाल का प्रारंभ लगभग 33 लाख वर्ष पूर्व पूर्वी अफ्रीका में सबसे प्राचीन पत्थर के उपकरणों के निर्माण से माना जाता है, जबकि इसका अंत लगभग 10,000 ईसा पूर्व के आसपास हुआ, जब विश्व के अनेक क्षेत्रों में कृषि तथा नवपाषाण संस्कृति का विकास प्रारंभ हुआ। मानव विकास, उपकरण निर्माण तथा सांस्कृतिक परिवर्तनों के आधार पर पुरापाषाणकाल को तीन भागों—निम्न पुरापाषाण, मध्य पुरापाषाण तथा उच्च पुरापाषाण में विभाजित किया गया है।

पाषाण युग (Stone Age)
पाषाण काल
प्रारंभिक मानव का विकास

पुरापाषाणकाल का अध्ययन मुख्यतः जीवाश्मों, पत्थर के उपकरणों, पुरातात्त्विक स्थलों तथा वैज्ञानिक तिथि-निर्धारण के आधार पर किया जाता है। प्रारंभिक मानव के विकास को समझने के लिए आधुनिक मानवविज्ञान जीवाश्मों का वर्गीकरण उनकी शारीरिक संरचना, आनुवंशिक विशेषताओं तथा विकासक्रम के आधार पर करता है। पूर्व में जिन जीवों को ‘आदिम मानव’ या ‘मानवसम प्राणी’ कहा जाता था, उन्हें आज क्रमशः प्रारंभिक होमिनिन तथा होमो वंश के सदस्य के रूप में वर्गीकृत किया जाता है। आधुनिक जीवाश्म विज्ञान, डीएनए अनुसंधान तथा आनुवंशिक अध्ययनों से यह व्यापक रूप से प्रमाणित हो चुका है कि मानव विकास का उद्गम अफ्रीका में हुआ, जहाँ से विभिन्न मानव प्रजातियाँ समय-समय पर एशिया, यूरोप तथा अन्य महाद्वीपों में फैलती गईं। इसे आधुनिक विज्ञान में ‘आउट ऑफ अफ्रीका’ सिद्धांत के रूप में स्वीकार किया जाता है।

रामापिथेकस

मानव विकास के अध्ययन में रामापिथेकस का उल्लेख लंबे समय तक मानव के संभावित पूर्वज के रूप में किया जाता रहा। इसके जीवाश्म भारत की शिवालिक पर्वतमाला सहित यूरोप और अफ्रीका के कुछ क्षेत्रों से प्राप्त हुए थे। प्रारंभिक शोधकर्ताओं ने इसके जबड़ों और दाँतों की संरचना के आधार पर इसे मानव वंश का सदस्य माना था।

किंतु आधुनिक जीवाश्म विज्ञान तथा आणविक अध्ययनों से यह स्पष्ट हो चुका है कि रामापिथेकस वास्तव में सिवापिथेकस नामक वानर समूह का सदस्य था तथा आधुनिक ओरंगुटान का निकट संबंधी था। इसलिए वर्तमान मानवविज्ञान में इसे मानव का प्रत्यक्ष पूर्वज नहीं माना जाता और यह मानव विकास की मुख्य शाखा से बाहर रखा जाता है।

आस्ट्रेलोपिथेकस

मानव विकास के वास्तविक प्रारंभिक प्रतिनिधियों में आस्ट्रेलोपिथेकस का विशेष स्थान है। इसके जीवाश्म मुख्यतः पूर्वी और दक्षिणी अफ्रीका से प्राप्त हुए हैं। 1924 ई. में दक्षिण अफ्रीका के टाउंग क्षेत्र से प्राप्त एक बालक की खोपड़ी का अध्ययन प्रसिद्ध शरीररचनाशास्त्री रेमंड डार्ट ने किया और उसे आस्ट्रेलोपिथेकस अफ्रीकानस नाम दिया।

बाद में रॉबर्ट ब्रूम, लुई लीकी तथा मैरी लीकी ने पूर्वी अफ्रीका के ओल्डुवाई गर्त सहित अनेक स्थलों से इस समूह के जीवाश्म खोजे। आस्ट्रेलोपिथेकस लगभग 42 लाख से 20 लाख वर्ष पूर्व के बीच विद्यमान था। यह पूर्णतः आधुनिक मानव नहीं था, किंतु दो पैरों पर चलने (द्विपाद गमन) की क्षमता विकसित कर चुका था। इसका मस्तिष्क वानरों की अपेक्षा अधिक विकसित था, किंतु आधुनिक मानव से छोटा था। मानव विकास के इतिहास में यह एक महत्त्वपूर्ण संक्रमणकालीन अवस्था का प्रतिनिधित्व करता है।

होमो हैबिलिस

आस्ट्रेलोपिथेकस के बाद होमो वंश का विकास हुआ। इसकी प्रारंभिक प्रजातियों में होमो हैबिलिस का विशेष महत्त्व है, जिसका अर्थ है ‘कुशल मानव’। इसके जीवाश्म 1960 के दशक में लुई और मैरी लीकी के नेतृत्व में तंज़ानिया के ओल्डुवाई गर्त से प्राप्त हुए। यह लगभग 24 लाख से 14 लाख वर्ष पूर्व तक अस्तित्व में रहा। इसके साथ सबसे प्रारंभिक ओल्डोवान प्रस्तर उपकरण प्राप्त हुए हैं, जिससे यह प्रमाणित होता है कि यह व्यवस्थित रूप से उपकरण बनाने और उनका उपयोग करने में सक्षम था। इसी कारण अनेक विद्वान इसे मानव विकास की वास्तविक प्रारंभिक अवस्था मानते हैं।

होमो इरेक्टस

होमो हैबिलिस के बाद होमो इरेक्टस का विकास हुआ, जिसने अफ्रीका से निकलकर एशिया और यूरोप तक विस्तार किया। यह मानव विकास की पहली ऐसी प्रजाति थी, जिसने व्यापक भौगोलिक प्रसार प्राप्त किया। 1891 ई. में डच वैज्ञानिक यूजीन डुबोआ ने इंडोनेशिया के जावा द्वीप के त्रिनिल क्षेत्र से इसके जीवाश्म खोजे। प्रारंभ में इन्हें पिथेकैंथ्रोपस इरेक्टस (जावा मानव) कहा गया, किंतु आधुनिक वर्गीकरण में इन्हें होमो इरेक्टस की क्षेत्रीय आबादी माना जाता है। चीन के झोउकोउदियान क्षेत्र से प्राप्त जीवाश्म, जिन्हें पहले सिनैंथ्रोपस पेकिनेंसिस (पेकिंग मानव) कहा जाता था, उन्हें भी आज होमो इरेक्टस के अंतर्गत रखा जाता है। होमो इरेक्टस लगभग 19 लाख से 1.5 लाख वर्ष पूर्व तक विद्यमान रहा। इसका शरीर आधुनिक मानव के समान सीधा था तथा इसका मस्तिष्क पूर्ववर्ती मानवों की अपेक्षा अधिक विकसित था। यह विशेष रूप से अशूलियन संस्कृति के हस्तकुठारों तथा अन्य परिष्कृत प्रस्तर उपकरणों के उपयोग के लिए प्रसिद्ध है। झोउकोउदियान से प्राप्त प्रमाणों से यह भी स्पष्ट होता है कि होमो इरेक्टस आग के नियंत्रित उपयोग से परिचित था। आग के उपयोग ने भोजन पकाने, सुरक्षा प्राप्त करने, शीत प्रदेशों में रहने तथा सामाजिक जीवन के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह सामूहिक रूप से शिकार करता था और समूहों में निवास करता था।

होमो हीडलबर्गेन्सिस (हीडलबर्ग मानव)

मानव विकास के इतिहास में होमो हीडलबर्गेन्सिस का भी महत्त्वपूर्ण स्थान है। 1907 ई. में जर्मनी के हीडलबर्ग नगर के निकट माउर क्षेत्र से इसका विशाल निचला जबड़ा प्राप्त हुआ। बाद के अनुसंधानों में अफ्रीका तथा यूरोप के अनेक भागों से भी इसके जीवाश्म प्राप्त हुए। आधुनिक वैज्ञानिक इसे लगभग 7 लाख से 2 लाख वर्ष पूर्व का मानव मानते हैं। इसकी शारीरिक संरचना होमो इरेक्टस की अपेक्षा अधिक विकसित तथा आधुनिक मानव के अधिक निकट थी। अधिकांश मानवविज्ञानी इसे यूरोप के निएंडरथल तथा अफ्रीका के होमो सेपियंस दोनों का साझा पूर्वज मानते हैं।

तथाकथित पिल्टडाउन मानव

बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में इंग्लैंड के पिल्टडाउन क्षेत्र से प्राप्त तथाकथित ‘पिल्टडाउन मानव’ को कभी मानव विकास की अत्यंत महत्त्वपूर्ण कड़ी माना गया था। 1912 ई. में चार्ल्स डॉसन ने इसकी खोज का दावा किया और इसे मानव तथा वानर के मध्यवर्ती रूप के रूप में प्रस्तुत किया।

किंतु 1953 ई. में आधुनिक रासायनिक परीक्षणों और वैज्ञानिक विश्लेषणों से यह सिद्ध हो गया कि यह एक सुनियोजित वैज्ञानिक जालसाजी थी। इसमें आधुनिक मानव की खोपड़ी तथा ओरंगुटान के जबड़े को कृत्रिम रूप से जोड़कर प्राचीन जीवाश्म का रूप दिया गया था। इसके बाद पिल्टडाउन मानव को मानव विकास के इतिहास से पूरी तरह हटा दिया गया और यह वैज्ञानिक अनुसंधान में प्रमाणों की महत्ता का महत्त्वपूर्ण उदाहरण बन गया।

पुरापाषाणकालीन मानव की विशेषताएँ

पुरापाषाणकालीन मानव का जीवन पूर्णतः प्रकृति पर निर्भर था। वह मुख्यतः शिकार और खाद्य-संग्रह पर आधारित जीवन व्यतीत करता था। गुफाएँ, शैलाश्रय तथा वृक्षों के नीचे उसके प्रमुख निवास-स्थल थे। उसने समय के साथ पत्थर के उपकरणों को अधिक उपयोगी बनाया तथा धीरे-धीरे सामूहिक जीवन, शिकार की संगठित पद्धति और आग के नियंत्रित उपयोग को अपनाया।

मानव विकास के इस दीर्घकालीन क्रम में प्रारंभिक होमिनिनों से लेकर आस्ट्रेलोपिथेकस, होमो हैबिलिस, होमो इरेक्टस और होमो हीडलबर्गेन्सिस तक शारीरिक संरचना, मस्तिष्क क्षमता, उपकरण निर्माण, सामाजिक संगठन तथा पर्यावरण के प्रति अनुकूलन क्षमता में निरंतर विकास हुआ। आधुनिक जीवाश्म विज्ञान, आनुवंशिकी, रेडियोमेट्रिक तिथि-निर्धारण तथा डीएनए अनुसंधानों ने यह स्थापित कर दिया है कि मानव का विकास करोड़ों वर्षों तक चलने वाली क्रमिक जैविक और सांस्कृतिक प्रक्रिया का परिणाम था तथा इसी प्रक्रिया से आगे चलकर आधुनिक होमो सेपियंस और मानव सभ्यता के विकास की नींव पड़ी।

पुरामानव

पुरामानव मानव विकास की उस अवस्था का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिसमें प्रारंभिक होमो प्रजातियों से विकसित होकर मानव आधुनिक होमो सेपियंस के अधिक निकट पहुँच चुका था। इस चरण में मस्तिष्क का आकार, उपकरण निर्माण की क्षमता, सामाजिक संगठन, आग का नियंत्रित उपयोग तथा सांस्कृतिक व्यवहार पहले की तुलना में अधिक विकसित हो चुके थे। आधुनिक मानवविज्ञान में पुरामानवों के अंतर्गत मुख्यतः निएंडरथल, रोडेशियन (काब्वे) मानव तथा कुछ संक्रमणकालीन मानव समूहों को सम्मिलित किया जाता है। आधुनिक अनुसंधानों के परिणामस्वरूप पहले पृथक मानी जाने वाली अनेक मानव प्रजातियों को अब होमो सेपियंस अथवा होमो हाइडेलबर्गेन्सिस की क्षेत्रीय आबादियों के रूप में पुनर्वर्गीकृत किया गया है।

निएंडरथल मानव

निएंडरथल पुरामानवों में सर्वाधिक प्रसिद्ध तथा सर्वाधिक अध्ययन की गई मानव प्रजाति है। इसके जीवाश्म सर्वप्रथम 1856 ई. में जर्मनी के डसेलडॉर्फ नगर के निकट निएंडर घाटी से प्राप्त हुए, जिसके आधार पर इसका नाम निएंडरथल रखा गया। बाद में फ्रांस, बेल्जियम, स्पेन, इटली, क्रोएशिया, रूस, मध्य एशिया तथा पश्चिमी एशिया के अनेक स्थलों से इनके सैकड़ों जीवाश्म प्राप्त हुए।

आधुनिक अनुसंधानों के अनुसार निएंडरथल लगभग 4 लाख वर्ष पूर्व विकसित हुए और लगभग 40 हजार वर्ष पूर्व विलुप्त हो गए। इनकी संस्कृति मुख्यतः मूस्टेरियन संस्कृति से संबंधित थी, जिसमें अत्यधिक परिष्कृत प्रस्तर उपकरणों का निर्माण किया जाता था। निएंडरथल शारीरिक रूप से अत्यंत सुदृढ़ तथा हिमयुग की ठंडी जलवायु के अनुकूल विकसित मानव थे। इनकी औसत ऊँचाई लगभग 160–170 सेंटीमीटर थी, किंतु शरीर गठीला एवं मांसल था। इनकी खोपड़ी लंबी, भौंहों के ऊपर मोटी अस्थियाँ, चौड़ी नाक तथा अपेक्षाकृत कम विकसित ठोड़ी इनकी प्रमुख शारीरिक विशेषताएँ थीं। इनके मस्तिष्क का औसत आयतन लगभग 1450–1600 घन सेंटीमीटर था, जो आधुनिक मानव के बराबर अथवा कई मामलों में उससे भी अधिक था। निएंडरथल केवल कुशल शिकारी ही नहीं थे, बल्कि वे आग का नियमित उपयोग, पशुओं की खाल से वस्त्र निर्माण, गुफाओं में निवास तथा उन्नत प्रस्तर उपकरणों के निर्माण में भी दक्ष थे। अनेक पुरातात्त्विक स्थलों से उनके द्वारा मृतकों को विधिपूर्वक दफनाने के प्रमाण प्राप्त हुए हैं। कब्रों में भोजन, उपकरण तथा कुछ स्थानों पर फूलों के अवशेष मिलने से यह अनुमान लगाया जाता है कि उनमें धार्मिक या आध्यात्मिक विश्वास विकसित हो चुके थे। घायल तथा वृद्ध व्यक्तियों की देखभाल के प्रमाण उनके सामाजिक सहयोग और पारिवारिक संगठन को भी स्पष्ट करते हैं। आधुनिक आनुवंशिक तथा शरीररचनात्मक अध्ययनों से यह संभावना भी व्यक्त की जाती है कि वे किसी विकसित भाषा या संप्रेषण प्रणाली का उपयोग करते थे।

बीसवीं शताब्दी तक यह माना जाता था कि निएंडरथल आधुनिक मानव के प्रत्यक्ष पूर्वज थे, किंतु आधुनिक डीएनए तथा आनुवंशिक अनुसंधानों ने इस धारणा में संशोधन किया है। अब यह स्वीकार किया जाता है कि निएंडरथल और होमो सेपियंस दोनों का विकास लगभग 6–7 लाख वर्ष पूर्व किसी समान पूर्वज, संभवतः होमो हाइडेलबर्गेन्सिस, से हुआ था। आधुनिक मानव सीधे निएंडरथलों से उत्पन्न नहीं हुआ, बल्कि दोनों मानव विकास की अलग-अलग शाखाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। फिर भी यूरोप और एशिया के आधुनिक मनुष्यों के जीनोम में लगभग 1–2 प्रतिशत निएंडरथल डीएनए पाया जाता है, जिससे सिद्ध होता है कि दोनों समूहों के बीच सीमित स्तर पर अंतःप्रजनन हुआ था।

फिलिस्तीन मानव

पश्चिमी एशिया के वर्तमान इज़राइल (प्राचीन फिलिस्तीन) क्षेत्र से प्राप्त मानव जीवाश्म मानव विकास के अध्ययन में अत्यंत महत्त्वपूर्ण माने जाते हैं। माउंट कार्मेल की स्कहूल तथा तबून गुफाओं से प्राप्त कंकालों में निएंडरथल तथा प्रारंभिक आधुनिक मानव दोनों के लक्षण पाए गए हैं। इन जीवाश्मों की आयु लगभग 1.2 लाख से 90 हजार वर्ष मानी जाती है। इन खोजों से यह स्पष्ट हुआ कि पश्चिमी एशिया वह महत्त्वपूर्ण क्षेत्र था, जहाँ निएंडरथल और आधुनिक होमो सेपियंस का प्रत्यक्ष संपर्क हुआ तथा संभवतः दोनों के बीच आनुवंशिक आदान-प्रदान भी हुआ। प्रारंभ में इन जीवाश्मों को संक्रमणकालीन मानव माना जाता था, किंतु आधुनिक अनुसंधानों के आधार पर अधिकांश विद्वान इन्हें प्रारंभिक होमो सेपियंस अथवा मिश्रित शारीरिक विशेषताओं वाले मानव समूहों के रूप में स्वीकार करते हैं। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि मानव विकास एक जटिल और बहु-शाखीय प्रक्रिया थी, जिसमें विभिन्न मानव समूहों के बीच प्रवासन, संपर्क और अंतःप्रजनन की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही।

रोडेशियन (काब्वे) मानव

रोडेशियन मानव, जिसे सामान्यतः काब्वे मानव भी कहा जाता है, का जीवाश्म 1921 ई. में वर्तमान जाम्बिया के काब्वे (ब्रोकन हिल) क्षेत्र की एक खदान से प्राप्त हुआ था। प्रारंभ में इसे होमो रोडेशिएन्सिस नाम दिया गया, किंतु आधुनिक वर्गीकरण में अधिकांश वैज्ञानिक इसे होमो हाइडेलबर्गेन्सिस अथवा प्रारंभिक पुरातन होमो सेपियंस का प्रतिनिधि मानते हैं। इसका समय लगभग 3 लाख से 2 लाख वर्ष पूर्व माना जाता है। इसकी खोपड़ी में कुछ लक्षण निएंडरथलों से मिलते हैं, जबकि कुछ विशेषताएँ आधुनिक मानव के अधिक निकट हैं। इसलिए इसे मानव विकास की एक महत्त्वपूर्ण संक्रमणकालीन अवस्था का प्रतिनिधि माना जाता है। पहले इसे आधुनिक अफ्रीकी मानव समूहों का पूर्वज माना जाता था, किंतु आधुनिक आनुवंशिकी तथा जीवाश्म विज्ञान इस मत का समर्थन नहीं करते।

सोलो मानव

दक्षिण-पूर्व एशिया से प्राप्त सोलो मानव के जीवाश्म भी मानव विकास की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हैं। ये जीवाश्म इंडोनेशिया के जावा द्वीप पर सोलो नदी के तट से 1930 के दशक में प्राप्त हुए थे। प्रारंभ में इन्हें होमो सोलोएन्सिस अथवा जावान्थ्रोपस कहा गया था। आधुनिक अनुसंधानों के अनुसार सोलो मानव वास्तव में होमो इरेक्टस की अंतिम क्षेत्रीय आबादियों का प्रतिनिधित्व करता है। इसकी आयु लगभग 1.2 लाख से 1 लाख वर्ष पूर्व मानी जाती है। इन जीवाश्मों से यह ज्ञात होता है कि एशिया में होमो इरेक्टस की कुछ आबादियाँ आधुनिक मानव के आगमन तक लंबे समय तक जीवित रहीं। यह खोज एशिया में मानव विकास की निरंतरता तथा विभिन्न मानव समूहों के सह-अस्तित्व का महत्त्वपूर्ण प्रमाण है।

आधुनिक मानव (होमो सेपियंस)

आधुनिक मानव (होमो सेपियंस) मानव विकास की नवीनतम तथा सर्वाधिक विकसित प्रजाति है। आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधानों के अनुसार इसका उद्भव लगभग 3 लाख वर्ष पूर्व अफ्रीका में हुआ था। मोरक्को के जेबेल इरहूद, इथियोपिया के ओमो किबिश तथा हर्टो जैसे स्थलों से प्राप्त जीवाश्म इस तथ्य की पुष्टि करते हैं। आनुवंशिक अध्ययनों ने भी सिद्ध किया है कि आधुनिक मानव का मूल उद्गम अफ्रीका में हुआ और वहीं से विभिन्न मानव समूह विश्व के अन्य भागों में फैल गए। लगभग 70–60 हजार वर्ष पूर्व आधुनिक मानव अफ्रीका से निकलकर एशिया, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया तथा अंततः अमेरिका तक पहुँच गया। यूरोप में इसका व्यापक प्रसार लगभग 45–40 हजार वर्ष पूर्व हुआ, जहाँ कुछ समय तक इसका सह-अस्तित्व निएंडरथल मानव के साथ रहा। आधुनिक डीएनए अध्ययनों से ज्ञात हुआ है कि दोनों समूहों के बीच सीमित स्तर पर अंतःप्रजनन भी हुआ था। इसी कारण आज यूरोप और एशिया के अधिकांश लोगों के जीनोम में लगभग 1–2 प्रतिशत निएंडरथल डीएनए पाया जाता है।

क्रो-मैग्नन मानव

यूरोप में प्रारंभिक आधुनिक मानव के सबसे प्रसिद्ध प्रतिनिधि क्रो-मैग्नन मानव हैं। इनके जीवाश्म 1868 ई. में फ्रांस के डॉरदोन क्षेत्र स्थित लेज़ एज़ी के निकट क्रो-मैग्नन शैलाश्रय से प्राप्त हुए, जिसके आधार पर इन्हें यह नाम दिया गया। आधुनिक मानवविज्ञान में ‘क्रो-मैग्नन’ किसी पृथक मानव प्रजाति का नाम नहीं है, बल्कि यूरोप के प्रारंभिक होमो सेपियंस के लिए प्रयुक्त एक ऐतिहासिक नाम है।

बाद में फ्रांस, स्पेन, इटली, चेक गणराज्य तथा रूस के अनेक स्थलों से भी इनके जीवाश्म प्राप्त हुए। रूस के सुंगीर तथा कोस्त्योंकी जैसे पुरातात्त्विक स्थलों ने उच्च पुरापाषाणकालीन संस्कृति के विकास पर महत्वपूर्ण प्रकाश डाला है।

क्रो-मैग्नन मानव शारीरिक रूप से आधुनिक मानव के समान थे। इनकी औसत ऊँचाई लगभग 170–185 सेंटीमीटर थी। इनका कपाल ऊँचा, ठोड़ी स्पष्ट विकसित, चेहरा अपेक्षाकृत सपाट तथा शरीर सुगठित था। ये कुशल शिकारी थे और पत्थर, हड्डी तथा सींग से बने अत्यंत परिष्कृत उपकरणों का उपयोग करते थे। इनके द्वारा निर्मित भाले, हारपून, सुइयाँ तथा अन्य उपकरण इस बात का प्रमाण हैं कि इनमें तकनीकी दक्षता और योजना बनाकर कार्य करने की क्षमता विकसित हो चुकी थी।

आधुनिक मानव की सबसे बड़ी उपलब्धि उसका सांस्कृतिक विकास था। उच्च पुरापाषाणकाल में उसने कला, संगीत, आभूषण निर्माण तथा प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति की समृद्ध परंपरा विकसित की। फ्रांस की लास्को तथा स्पेन की अल्तामीरा गुफाओं के भित्तिचित्र विश्व की प्राचीनतम और उत्कृष्ट कलाकृतियों में गिने जाते हैं। इन चित्रों में पशुओं, शिकार तथा प्राकृतिक दृश्यों का अत्यंत जीवंत चित्रण मिलता है। पुरातात्त्विक उत्खननों से हाथीदाँत, हड्डी और सीप से बने आभूषण, सुइयाँ, हारपून तथा प्रारंभिक संगीत वाद्यों के अवशेष भी प्राप्त हुए हैं। मृतकों को विधिपूर्वक दफनाने तथा उनके साथ उपकरण, आभूषण और अन्य वस्तुएँ रखने की परंपरा से स्पष्ट होता है कि आधुनिक मानव में धार्मिक विश्वास, प्रतीकात्मक चिंतन तथा परलोक संबंधी धारणाएँ विकसित हो चुकी थीं।

यूरोप के अन्य प्रारंभिक मानव समूह

बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में यूरोप से प्राप्त कुछ जीवाश्मों को कोम्ब-कापेल, ग्रिमाल्डी तथा शाँसलाद मानव जैसे पृथक समूहों के रूप में वर्गीकृत किया गया था। बाद के अनुसंधानों से स्पष्ट हुआ कि ये किसी अलग मानव प्रजाति के प्रतिनिधि नहीं थे, बल्कि प्रारंभिक होमो सेपियंस की क्षेत्रीय विविधताओं का ही भाग थे।  इसी प्रकार ग्रिमाल्डी मानव को कभी तथाकथित नस्लीय विशेषताओं के आधार पर अलग माना गया था, किंतु आधुनिक मानवविज्ञान ने ऐसे वर्गीकरणों को अस्वीकार कर दिया है। वर्तमान दृष्टिकोण के अनुसार ये सभी जीवाश्म प्रारंभिक आधुनिक मानव की सामान्य जैविक विविधता को प्रदर्शित करते हैं।

अफ्रीका में आधुनिक मानव के प्रमाण

अफ्रीका आधुनिक मानव का उद्भव-स्थल होने के कारण यहाँ से अनेक महत्वपूर्ण जीवाश्म प्राप्त हुए हैं। उत्तर अफ्रीका के अफालू-बू-रुम्मेल, दक्षिण अफ्रीका के फ्लोरिसबाड तथा पूर्वी अफ्रीका के ओमो क्षेत्र से प्राप्त अवशेष आधुनिक मानव के क्रमिक विकास को समझने में अत्यंत सहायक सिद्ध हुए हैं। प्रारंभिक मानवविज्ञान में बोस्कोप मानव को एक पृथक एवं अत्यधिक विकसित मानव प्रकार माना जाता था, किंतु आधुनिक अनुसंधानों ने स्पष्ट कर दिया कि यह भी आधुनिक मानव की सामान्य शारीरिक विविधता का ही उदाहरण था। इन खोजों से यह सिद्ध होता है कि अफ्रीका में प्रारंभिक होमो सेपियंस की अनेक क्षेत्रीय आबादियाँ विद्यमान थीं।

एशिया और ऑस्ट्रेलिया में विस्तार

एशिया तथा ऑस्ट्रेलिया से भी प्रारंभिक आधुनिक मानव के अनेक जीवाश्म प्राप्त हुए हैं। इंडोनेशिया के जावा द्वीप के वाडजाक क्षेत्र से प्राप्त जीवाश्मों को पहले ‘आद्य-ऑस्ट्रेलॉयड’ कहा जाता था, किंतु आधुनिक अनुसंधानों के अनुसार वे भी प्रारंभिक होमो सेपियंस के प्रतिनिधि हैं। ऑस्ट्रेलिया में आधुनिक मानव के लगभग 65 हजार वर्ष पूर्व पहुँचने के प्रमाण प्राप्त हो चुके हैं। दक्षिण तथा पूर्वी एशिया के अनेक पुरातात्त्विक स्थलों से भी इसी काल के जीवाश्म और सांस्कृतिक अवशेष मिले हैं। इन खोजों से स्पष्ट होता है कि आधुनिक मानव ने अपेक्षाकृत कम समय में विश्व के अधिकांश भागों में अपना विस्तार कर लिया था।

आधुनिक मानव की प्रमुख विशेषताएँ

आधुनिक मानव की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता उसकी विकसित बौद्धिक क्षमता, भाषा, प्रतीकात्मक चिंतन, सामाजिक संगठन तथा तकनीकी नवाचार की योग्यता थी। इन गुणों के कारण वह बदलती जलवायु, विविध प्राकृतिक परिस्थितियों तथा नए पर्यावरण के अनुरूप स्वयं को सफलतापूर्वक ढाल सका।

उच्च पुरापाषाणकाल में विकसित कला, संस्कृति, उपकरण निर्माण तथा सामाजिक संगठन ने आगे चलकर मध्यपाषाण, नवपाषाण तथा धातु युग की सभ्यताओं के विकास की आधारशिला रखी। इसी काल में मानव ने संगठित जीवन, सांस्कृतिक परंपराओं और ज्ञान के क्रमिक संचय की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति की, जिसने आगे चलकर सभ्यता और संस्कृति के विकास को नई दिशा प्रदान की।

पुरापाषाणकालीन उपकरण

पुरापाषाणकाल मानव इतिहास का सबसे लंबा सांस्कृतिक चरण था, जिसमें पत्थर के उपकरण मानव जीवन का प्रमुख आधार थे। प्रारंभिक मानव तथा अन्य होमिनिन इन उपकरणों की सहायता से शिकार करते थे, भोजन एकत्रित करते थे, पशुओं की खाल उतारते थे, लकड़ी और हड्डियों को काटते-छाँटते थे तथा हिंसक पशुओं से अपनी रक्षा करते थे। यद्यपि लकड़ी, हड्डी, सींग और हाथीदाँत से बने उपकरणों का भी उपयोग किया जाता था, परंतु वे समय के साथ नष्ट हो गए। इसके विपरीत पत्थर के उपकरण बड़ी संख्या में सुरक्षित मिले हैं, इसलिए पुरापाषाणकाल के अध्ययन का प्रमुख आधार यही उपकरण हैं। इनके माध्यम से उस समय के मानव की तकनीकी दक्षता, आर्थिक गतिविधियों तथा सांस्कृतिक विकास का ज्ञान प्राप्त होता है।

उपकरण निर्माण की सामग्री एवं तकनीक

पुरापाषाणकालीन उपकरणों के निर्माण में सामान्यतः कठोर तथा महीन दानेदार पत्थरों का उपयोग किया जाता था। इनमें चकमक, चर्ट, क्वार्ट्जाइट, बेसाल्ट तथा अन्य उपयुक्त शिलाएँ प्रमुख थीं। ऐसे पत्थरों का चयन किया जाता था जो आघात करने पर नियंत्रित रूप से टूटकर तीक्ष्ण धार उत्पन्न करें। विभिन्न क्षेत्रों में स्थानीय रूप से उपलब्ध पत्थरों के प्रयोग के कारण उपकरणों की बनावट और सामग्री में क्षेत्रीय विविधता दिखाई देती है।

उपकरण निर्माण की दो प्रमुख तकनीकें प्रचलित थीं—कोर तकनीक तथा फ्लेक तकनीक। कोर उस मूल पत्थर को कहा जाता है, जिससे प्रहार करके टुकड़े निकाले जाते थे, जबकि अलग किए गए तीक्ष्ण टुकड़ों को फ्लेक कहा जाता था। कई बार स्वयं कोर को तराशकर उपकरण बनाया जाता था और कई बार फ्लेक को परिष्कृत करके उपयोगी औजार तैयार किए जाते थे। प्रारंभ में कठोर पत्थर से प्रहार किया जाता था, जबकि बाद में अधिक नियंत्रित आकार प्राप्त करने के लिए मुलायम हथौड़ों का भी उपयोग होने लगा।

निम्न पुरापाषाणकाल के प्रमुख उपकरण

निम्न पुरापाषाणकाल में बड़े आकार के उपकरणों का निर्माण किया जाता था। इनमें हस्तकुठार, क्लीवर, चॉपर तथा चॉपिंग टूल प्रमुख थे। हस्तकुठार इस काल का सबसे विशिष्ट उपकरण माना जाता है। यह दोनों ओर से तराशा हुआ, बादाम या अश्रु के आकार का होता था। इसका उपयोग पशुओं का मांस काटने, लकड़ी को आकार देने, खोदने तथा अन्य अनेक कार्यों में किया जाता था। क्लीवर की धार चौड़ी और सीधी होती थी। इसका उपयोग बड़े पशुओं के मांस और हड्डियों को काटने के लिए किया जाता था। चॉपर तथा चॉपिंग टूल अपेक्षाकृत सरल उपकरण थे, जिनसे लकड़ी काटने, हड्डियाँ तोड़ने तथा अन्य सामान्य कार्य संपन्न किए जाते थे।

यूरोप में निम्न पुरापाषाणकालीन उपकरणों के विकास के आधार पर अनेक तकनीकी परंपराओं की पहचान की गई है। प्रारंभ में एबेविलियन परंपरा का विकास हुआ, किंतु बाद में अशूलियन परंपरा ने अत्यधिक उन्नति प्राप्त की। अशूलियन संस्कृति का नाम फ्रांस के सेंट-अशूल स्थल के आधार पर रखा गया है।

अशूलियन हस्तकुठार अत्यंत संतुलित, सममित तथा सुव्यवस्थित होते थे। इन्हें निम्न पुरापाषाणकाल की सर्वोच्च तकनीकी उपलब्धियों में गिना जाता है। इस परंपरा के उपकरण अफ्रीका, यूरोप, पश्चिमी एशिया तथा भारतीय उपमहाद्वीप के अनेक स्थलों से प्राप्त हुए हैं, जिससे इसकी व्यापकता का पता चलता है।

यूरोप में फ्लेक आधारित उपकरणों की दो प्रमुख परंपराएँ विकसित हुईं—क्लैक्टोनियन तथा लेवाल्वा तकनीक। क्लैक्टोनियन संस्कृति का नाम इंग्लैंड के क्लैक्टन-ऑन-सी से प्राप्त उपकरणों के आधार पर रखा गया है। इसमें बड़े फ्लेक तथा सरल चॉपर उपकरण प्रमुख थे। इसके बाद विकसित लेवाल्वा तकनीक में पहले कोर को योजनाबद्ध ढंग से तैयार किया जाता था और फिर उससे निश्चित आकार के फ्लेक निकाले जाते थे। इस विधि से अधिक तीक्ष्ण, हल्के और उपयोगी उपकरण बनाए जा सकते थे। यही तकनीक आगे चलकर मध्य पुरापाषाणकाल में और अधिक विकसित हुई।

भारत में पुरापाषाणकालीन उपकरण

भारत में निम्न पुरापाषाणकाल के अनेक महत्वपूर्ण स्थल प्राप्त हुए हैं। उत्तर-पश्चिम भारत की सोहन घाटी से प्राप्त पेबल उपकरणों के आधार पर इसे सोहन संस्कृति कहा जाता है। इन उपकरणों का निर्माण गोल पत्थरों के एक या दोनों किनारों को तोड़कर धार बनाकर किया जाता था। इसके अतिरिक्त बेलन घाटी (उत्तर प्रदेश), नर्मदा घाटी, हुंसगी (कर्नाटक) तथा अत्तिरमपक्कम (तमिलनाडु) जैसे स्थलों से भी बड़ी संख्या में निम्न पुरापाषाणकालीन उपकरण प्राप्त हुए हैं। विशेष रूप से अत्तिरमपक्कम से प्राप्त अशूलियन उपकरणों के वैज्ञानिक तिथि-निर्धारण से ज्ञात होता है कि भारत में यह परंपरा लगभग 15 लाख वर्ष पूर्व तक विकसित हो चुकी थी। ये खोजें भारतीय उपमहाद्वीप में प्रारंभिक मानव की तकनीकी दक्षता और सांस्कृतिक विकास का महत्वपूर्ण प्रमाण प्रस्तुत करती हैं।

मध्य पुरापाषाणकालीन उपकरण

मध्य पुरापाषाणकाल मानव तकनीक के विकास का एक महत्त्वपूर्ण चरण था। इस काल में उपकरणों की निर्माण-विधि, आकार तथा उपयोग में उल्लेखनीय परिवर्तन दिखाई देता है। इसका संबंध मुख्यतः निएंडरथल मानव तथा प्रारंभिक होमो सेपियंस से माना जाता है। निम्न पुरापाषाणकाल की अपेक्षा इस युग में उपकरण अधिक छोटे, हल्के, तीक्ष्ण तथा विशिष्ट कार्यों के लिए बनाए जाने लगे। इससे मानव की बढ़ती तकनीकी दक्षता और योजनाबद्ध कार्य-प्रणाली का परिचय मिलता है।

यूरोप में इस काल की प्रमुख उपकरण परंपरा मूस्टेरियन संस्कृति कहलाती है। इसका नाम फ्रांस के डॉरदोन क्षेत्र स्थित ले मूस्टिए शैलाश्रय से प्राप्त उपकरणों के आधार पर रखा गया है। यह संस्कृति लगभग 3 लाख से 40 हजार वर्ष पूर्व तक विद्यमान रही। इसकी सबसे प्रमुख विशेषता लेवाल्वा तकनीक द्वारा निर्मित फ्लेक उपकरण थे। इस तकनीक में पहले पत्थर के कोर को योजनाबद्ध ढंग से तैयार किया जाता था और फिर उससे निश्चित आकार के फ्लेक निकालकर उपयोगी उपकरण बनाए जाते थे।

मूस्टेरियन संस्कृति के प्रमुख उपकरण

मूस्टेरियन संस्कृति में विभिन्न प्रकार के विशेषीकृत उपकरणों का विकास हुआ। इनमें साइड स्क्रेपर, पॉइंट, बोरर, डेंटिकुलेट, नॉच्ड उपकरण, लेवाल्वा फ्लेक तथा डिस्काकार कोर प्रमुख थे। इन उपकरणों का उपयोग पशुओं की खाल उतारने, मांस काटने, लकड़ी तथा हड्डी को आकार देने, भालों के अग्रभाग तैयार करने तथा अन्य दैनिक कार्यों में किया जाता था। निम्न पुरापाषाणकाल के बड़े हस्तकुठार का प्रयोग पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ था, किंतु उसका महत्त्व कम हो गया और उसकी जगह छोटे तथा अधिक कार्यक्षम फ्लेक उपकरणों ने ले ली। इससे स्पष्ट होता है कि मानव अब सामान्य प्रयोजन के बजाय अलग-अलग कार्यों के लिए विशिष्ट प्रकार के उपकरण बनाने लगा था।

प्रारंभिक पुरातत्त्वविदों ने मूस्टेरियन संस्कृति को विभिन्न उपवर्गों—जैसे निम्न, मध्य और उच्च मूस्टेरियन अथवा अशूलियन-परंपरित, विशिष्ट मूस्टेरियन तथा दंतुरित मूस्टेरियन—में विभाजित किया था। किंतु आधुनिक अनुसंधानों में इन वर्गीकरणों का महत्त्व सीमित हो गया है, क्योंकि अब यह माना जाता है कि उपकरणों की विविधता केवल समय के परिवर्तन का परिणाम नहीं थी, बल्कि स्थानीय पर्यावरण, उपलब्ध कच्चे पत्थर तथा मानव समूहों की आवश्यकताओं से भी प्रभावित थी।

मध्य पुरापाषाणकालीन उपकरण केवल यूरोप तक सीमित नहीं थे। इनके प्रमाण पश्चिमी एशिया, उत्तरी अफ्रीका, मध्य एशिया तथा भारतीय उपमहाद्वीप के अनेक स्थलों से प्राप्त हुए हैं। भारत में बेलन घाटी, सोन घाटी, नर्मदा घाटी, भीमबेटका, नेवासा, पाटन तथा ज्वालापुरम जैसे स्थलों से बड़ी संख्या में मध्य पुरापाषाणकालीन फ्लेक उपकरण प्राप्त हुए हैं। इन खोजों से स्पष्ट होता है कि भारतीय उपमहाद्वीप में भी इस तकनीकी परंपरा का स्वतंत्र और दीर्घकालीन विकास हुआ।

उच्च पुरापाषाणकालीन उपकरण

लगभग 50 हजार वर्ष पूर्व उच्च पुरापाषाणकाल के प्रारंभ के साथ मानव तकनीक ने नई ऊँचाइयाँ प्राप्त कीं। इस काल का संबंध मुख्यतः आधुनिक मानव (होमो सेपियंस) से है। इस समय उपकरण निर्माण में फ्लेक तकनीक के स्थान पर ब्लेड तकनीक का व्यापक विकास हुआ। ब्लेड लंबे, पतले और अत्यंत तीक्ष्ण पत्थर के टुकड़े होते थे, जिनसे अनेक प्रकार के विशिष्ट उपकरण बनाए जाते थे।

उच्च पुरापाषाणकाल की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता यह थी कि पत्थर के अतिरिक्त हड्डी, सींग और हाथीदाँत से भी बड़ी संख्या में उपकरण बनाए जाने लगे। इससे उपकरणों की उपयोगिता और विविधता दोनों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई।

उच्च पुरापाषाणकाल के प्रमुख उपकरण

इस काल के प्रमुख उपकरणों में ब्लेड, ब्यूरिन, एंड स्क्रेपर, बैक्ड ब्लेड, पॉइंट, बोरर तथा अन्य सूक्ष्म काटने वाले उपकरण सम्मिलित थे। हड्डी और सींग से बने हारपून, भाले के अग्रभाग, मछली पकड़ने के काँटे, सुइयाँ तथा भाला फेंकने के यंत्र इस युग की तकनीकी उन्नति के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। इन उपकरणों ने शिकार को अधिक प्रभावी बनाया तथा वस्त्र निर्माण, चमड़ा प्रसंस्करण, मत्स्य आखेट और अन्य आर्थिक गतिविधियों को नई गति प्रदान की।

उच्च पुरापाषाणकाल की प्रमुख सांस्कृतिक परंपराएँ

पश्चिमी यूरोप में उच्च पुरापाषाणकाल को सामान्यतः पाँच प्रमुख सांस्कृतिक चरणों में विभाजित किया जाता है—शातेलपेरोनियन, औरिग्नेशियन, ग्रावेटियन, सोल्यूट्रियन तथा मैग्डलेनियन। औरिग्नेशियन संस्कृति में लंबे ब्लेड, ब्यूरिन तथा स्क्रेपर प्रमुख थे और इसे आधुनिक मानव की प्रारंभिक सांस्कृतिक उपलब्धियों का प्रतिनिधि माना जाता है। ग्रावेटियन संस्कृति में नुकीले ब्लेड और शिकार संबंधी उपकरणों का अधिक विकास हुआ। सोल्यूट्रियन संस्कृति अपने अत्यंत सुंदर लॉरेल-पत्ती आकार के द्विपार्श्वीय पत्थर के फलकों के लिए प्रसिद्ध है, जिनका निर्माण विकसित दबाव तकनीक द्वारा किया जाता था।

उच्च पुरापाषाणकालीन संस्कृति का सर्वोच्च विकास मैग्डलेनियन चरण में दिखाई देता है। इस काल में पत्थर की अपेक्षा हड्डी और सींग से बने उपकरणों का अधिक उपयोग होने लगा। बार्ब्ड हारपून, मछली पकड़ने के काँटे, सुइयाँ, भाला फेंकने के यंत्र, भाले के अग्रभाग तथा एरो स्ट्रेटनर जैसे उपकरण इसी काल की प्रमुख उपलब्धियाँ हैं। एरो स्ट्रेटनर का उपयोग तीर और भाले के डंडों को सीधा करने के लिए किया जाता था। इसी काल में गुफा-चित्रकला, मूर्तिकला, आभूषण निर्माण तथा अन्य कलात्मक गतिविधियों का भी उल्लेखनीय विकास हुआ, जिससे स्पष्ट होता है कि उच्च पुरापाषाणकाल केवल तकनीकी उन्नति का ही नहीं, बल्कि मानव की बौद्धिक, कलात्मक और सांस्कृतिक प्रगति का भी महत्वपूर्ण युग था।

पुरापाषाणकालीन मानव का जीवन

पुरापाषाणकाल मानव इतिहास का सबसे प्राचीन और सबसे दीर्घकालीन सांस्कृतिक चरण था। इस काल में मानव का जीवन पूर्णतः प्रकृति पर निर्भर था। वह न तो कृषि से परिचित था और न ही पशुपालन करता था। उसका मुख्य व्यवसाय आखेट (शिकार) तथा खाद्य-संग्रह था। जलवायु परिवर्तन, सीमित संसाधन तथा हिंसक पशुओं के निरंतर खतरे के कारण उसका जीवन अत्यंत कठिन, संघर्षपूर्ण और अनिश्चित था। फिर भी इसी काल में मानव ने उपकरण निर्माण, अग्नि के उपयोग, सामूहिक जीवन, सामाजिक संगठन तथा सांस्कृतिक व्यवहार की ऐसी आधारभूत विशेषताओं का विकास किया, जिन्होंने आगे चलकर मानव सभ्यता की नींव रखी।

निम्न पुरापाषाणकाल में जीवन

निम्न पुरापाषाणकाल के मानव का जीवन निरंतर भ्रमणशील था। वह छोटे-छोटे समूहों में रहता था और भोजन की खोज में एक स्थान से दूसरे स्थान तक घूमता रहता था। प्रारंभ में उसका शिकार छोटे जीव-जंतुओं तक सीमित था, किंतु समय के साथ उसने सामूहिक प्रयासों द्वारा हाथी, जंगली बैल, घोड़े, हिरण, बाइसन तथा अन्य बड़े स्तनधारी पशुओं का भी शिकार करना सीख लिया। भारत की बेलन घाटी, सोहन घाटी और नर्मदा क्षेत्र सहित अफ्रीका, यूरोप तथा एशिया के अनेक पुरास्थलों से प्राप्त पशु-अस्थियाँ इस बात की पुष्टि करती हैं कि बड़े पशु उस समय मानव के प्रमुख खाद्य स्रोत थे।

शिकार के लिए मानव केवल शारीरिक शक्ति पर निर्भर नहीं था, बल्कि उसने व्यावहारिक बुद्धिमत्ता और सामूहिक रणनीति का भी विकास किया। वह पशुओं को प्राकृतिक गड्ढों, दलदलों अथवा खड़ी चट्टानों की ओर हाँककर उनका शिकार करता था। इस प्रकार के संगठित आखेट से स्पष्ट होता है कि प्रारंभिक मानव में सहयोग, योजना और सामूहिक कार्य की भावना विकसित हो चुकी थी।

प्रारंभिक पुरापाषाणकाल में मानव का कोई स्थायी निवास नहीं था। वह खुले मैदानों, नदी-घाटियों, वृक्षों की आड़ या प्राकृतिक आश्रयों में अस्थायी रूप से निवास करता था। बाद के चरणों में उसने गुफाओं और शैलाश्रयों का उपयोग करना प्रारंभ किया। ये स्थान वर्षा, शीत और हिंसक पशुओं से सुरक्षा प्रदान करते थे।

चीन के झोउकोउदियान (पेकिंग मानव) जैसे पुरास्थलों से प्राप्त साक्ष्य बताते हैं कि होमो इरेक्टस के कुछ समूह गुफाओं में रहते थे तथा अग्नि का नियंत्रित उपयोग भी करते थे। यद्यपि प्रारंभिक चरण में अग्नि के नियमित उपयोग के विषय में विद्वानों में मतभेद रहे हैं, फिर भी आधुनिक अनुसंधानोंके आधार पर यह स्वीकार किया जाता है कि निम्न पुरापाषाणकाल के उत्तरार्द्ध में मानव अग्नि का सीमित रूप से प्रयोग करने लगा था।

मध्य पुरापाषाणकाल में जीवन

मध्य पुरापाषाणकाल में मानव जीवन में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए। इस काल का प्रमुख प्रतिनिधि निएंडरथल मानव था। हिमयुग की कठोर जलवायु ने उसे गुफाओं तथा शैलाश्रयों को अपेक्षाकृत स्थायी अथवा अर्द्ध-स्थायी निवास के रूप में अपनाने के लिए प्रेरित किया। फ्रांस, स्पेन, जर्मनी, इज़राइल तथा मध्य एशिया के अनेक पुरास्थलों से प्राप्त साक्ष्यों से स्पष्ट है कि निएंडरथल समूह लंबे समय तक एक ही क्षेत्र में निवास करते थे। वे संभवतः लकड़ी, पशुओं की हड्डियों और खालों से अस्थायी झोपड़ियाँ भी बनाते थे, यद्यपि इनके अवशेष सीमित मात्रा में प्राप्त हुए हैं।

मध्य पुरापाषाणकाल की सबसे महत्त्वपूर्ण उपलब्धियों में अग्नि का उपयोग था। अग्नि ने मानव जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन किया। इसके माध्यम से वह भोजन पकाने, कठोर मांस को सुपाच्य बनाने, शीत से बचने, प्रकाश प्राप्त करने तथा हिंसक पशुओं को दूर रखने में सफल हुआ। आग के चारों ओर सामूहिक रूप से रहने की प्रवृत्ति ने सामाजिक एकता और सामुदायिक जीवन को भी सुदृढ़ किया।

प्रसिद्ध पुरातत्त्वविद् वी. गॉर्डन चाइल्ड ने उचित ही कहा था कि अग्नि पर नियंत्रण मानव द्वारा प्रकृति की एक महान शक्ति पर अधिकार प्राप्त करने की ऐतिहासिक उपलब्धि थी। वास्तव में अग्नि ने मानव को प्राकृतिक परिस्थितियों के प्रति अधिक सक्षम और अनुकूलनीय बना दिया।

मध्य पुरापाषाणकालीन मानव संगठित दलों में शिकार करता था। वह बड़े पशुओं को घेरकर अथवा प्राकृतिक अवरोधों की ओर हाँककर उनका शिकार करता था। अनेक पुरास्थलों से प्राप्त पशु-अस्थियों पर कटाई के चिह्न इस बात के प्रमाण हैं कि शिकार के बाद मांस को व्यवस्थित रूप से काटकर पूरे समूह में बाँटा जाता था।

मानव का भोजन केवल मांस तक सीमित नहीं था। वह फल, कंद-मूल, बीज, जंगली फलियाँ, मेवे तथा अन्य वनस्पति-आधारित खाद्य पदार्थों का भी उपयोग करता था। इस प्रकार उसका आहार विविध और अपेक्षाकृत संतुलित था, जिससे बदलती प्राकृतिक परिस्थितियों में जीवित रहना संभव हो सका।

पुरापाषाणकालीन समाज रक्त-संबंधों पर आधारित छोटे-छोटे समूहों में संगठित था। इन समूहों में सहयोग, सामूहिक श्रम तथा संसाधनों के साझा उपयोग की परंपरा विकसित हो चुकी थी। अनुभव, आयु और शारीरिक क्षमता के आधार पर किसी वरिष्ठ व्यक्ति का नेतृत्व स्वीकार किया जाता होगा।

यद्यपि इस काल में सामाजिक वर्गों का विकास नहीं हुआ था, फिर भी श्रम-विभाजन के प्रारंभिक संकेत मिलते हैं। सामान्यतः पुरुष शिकार में अधिक भाग लेते थे, जबकि महिलाएँ खाद्य-संग्रह, बच्चों की देखभाल तथा दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति में योगदान देती थीं। यह श्रम-विभाजन कठोर सामाजिक नियमों पर नहीं, बल्कि व्यावहारिक आवश्यकताओं पर आधारित था।

पुरापाषाणकालीन मानव के धार्मिक अथवा आध्यात्मिक विचारों का अनुमान मुख्यतः दफन संस्कारों से लगाया जाता है। फ्रांस, इराक, इज़राइल तथा अन्य क्षेत्रों से प्राप्त निएंडरथल समाधियों में मृतकों के साथ पत्थर के उपकरण, पशु-अस्थियाँ, भोजन तथा कुछ स्थानों पर पुष्प-पराग के अवशेष भी मिले हैं।

कुछ समाधियों में शवों को विशेष मुद्रा में लिटाया गया था तथा उनके चारों ओर पत्थरों की संरचना बनाई गई थी। इन साक्ष्यों से संकेत मिलता है कि निएंडरथल मानव मृत्यु के बाद किसी प्रकार के अस्तित्व या परलोक में विश्वास करता था। मृतकों के साथ उपयोगी वस्तुएँ रखने की परंपरा यह दर्शाती है कि वे मानते थे कि मृत्यु के बाद भी इन वस्तुओं की आवश्यकता पड़ सकती है।

प्रारंभिक शोधकर्ताओं ने कुछ पुरास्थलों से प्राप्त मानव अस्थियों पर कटे चिह्नों के आधार पर पुरापाषाणकालीन मानव में नरभक्षण की संभावना व्यक्त की थी। किंतु आधुनिक अनुसंधान इसे सार्वभौमिक या सामान्य व्यवहार नहीं मानते हैं। अनेक विद्वानों का मत है कि ऐसे चिह्न भोजन, धार्मिक अनुष्ठान, शव-संस्कार अथवा अन्य सांस्कृतिक प्रक्रियाओं से भी संबंधित हो सकते हैं।

उच्च पुरापाषाणकाल में मानव जीवन

उच्च पुरापाषाणकाल में आधुनिक मानव (होमो सेपियंस) का जीवन पूर्ववर्ती मानव समूहों की तुलना में अधिक संगठित, सुरक्षित और विकसित हो गया था। इस काल में जलवायु अपेक्षाकृत अनुकूल होने लगी, जिससे मानव के लिए संसाधनों का उपयोग अधिक सरल हो गया। यद्यपि गुफाएँ और शैलाश्रय अभी भी महत्त्वपूर्ण आवास थे, फिर भी मानव ने लकड़ी, पशुओं की खाल, हड्डियों तथा शाखाओं की सहायता से झोपड़ियाँ और अस्थायी तंबू बनाना प्रारंभ कर दिया था।

उच्च पुरापाषाणकालीन मानव वस्त्र निर्माण में भी दक्ष हो गया था। हड्डी और सींग से निर्मित सुइयों के आधार पर स्पष्ट होता है कि वह पशुओं की खालों को सिलकर शरीर के अनुरूप वस्त्र तैयार करता था। इससे उसे शीत से सुरक्षा मिली और विभिन्न जलवायु क्षेत्रों में रहना संभव हुआ।

अग्नि का उपयोग अब नियमित और व्यापक हो चुका था। इसका प्रयोग भोजन पकाने, प्रकाश प्राप्त करने, आवास को गर्म रखने तथा हिंसक पशुओं से सुरक्षा के लिए किया जाता था। जिन क्षेत्रों में लकड़ी की कमी थी, वहाँ पशुओं की हड्डियों का भी ईंधन के रूप में उपयोग किया जाता था।

इस काल की अर्थव्यवस्था अभी भी आखेट और खाद्य-संग्रह पर आधारित थी, किंतु शिकार की तकनीकों में उल्लेखनीय प्रगति हो चुकी थी। मानव अब उन्नत ब्लेड, भाले, हारपून, भाला-प्रक्षेपक (स्पीयर-थ्रोवर) तथा उत्तरकाल में धनुष-बाण जैसे प्रभावी उपकरणों का उपयोग करने लगा था। उच्च पुरापाषाणकालीन समुदाय पशुओं के मौसमी प्रवास का सूक्ष्म अध्ययन करते थे और उसी के अनुसार अपने शिविर स्थापित करते थे। फ्रांस के सोल्यूत्रे क्षेत्र से प्राप्त हजारों घोड़ों की अस्थियाँ संगठित और योजनाबद्ध शिकार का महत्त्वपूर्ण प्रमाण प्रस्तुत करती हैं।

विशालकाय पशुओं का शिकार सामूहिक प्रयास से ही संभव था। अनेक व्यक्ति मिलकर पशुओं को घेरते, उन्हें प्राकृतिक अवरोधों की ओर हाँकते और योजनाबद्ध ढंग से उनका शिकार करते थे। इससे भोजन की उपलब्धता बढ़ी और सामाजिक सहयोग की भावना भी सुदृढ़ हुई। इस काल में श्रम-विभाजन और विशेषीकरण भी स्पष्ट रूप से विकसित हो चुका था। कुछ व्यक्ति उपकरण निर्माण में दक्ष थे, जबकि अन्य शिकार, अस्थि एवं सींग के शिल्प, वस्त्र निर्माण अथवा गुफा-चित्रण जैसी कलात्मक गतिविधियों में निपुण थे। विभिन्न समुदायों के बीच सीमित स्तर पर वस्तुओं का आदान-प्रदान भी होने लगा था। फ्रांस की डोर्दोन घाटी की गुफाओं से प्राप्त भूमध्यसागरीय समुद्र के सीप इस प्रकार के दूरस्थ संपर्क और विनिमय का प्रमाण हैं।

उच्च पुरापाषाणकाल में मानव की सांस्कृतिक और धार्मिक चेतना भी अधिक विकसित हो गई थी। मृतकों को विधिपूर्वक दफनाने की परंपरा व्यापक रूप से प्रचलित थी। अनेक समाधियों में शवों के साथ पत्थर के उपकरण, आभूषण, पशु-अस्थियाँ, भोजन तथा अन्य उपयोगी वस्तुएँ रखी गई हैं। कई स्थलों पर शवों पर लाल गेरू का चूर्ण छिड़का गया है, जिसे अधिकांश विद्वान जीवन, पुनर्जन्म अथवा आध्यात्मिक शक्ति का प्रतीक मानते हैं। इसी काल में गुफा-चित्रकला, मूर्तिकला, आभूषण निर्माण तथा प्रतीकात्मक कलाकृतियों का उल्लेखनीय विकास हुआ, जो मानव की विकसित बौद्धिक क्षमता, धार्मिक चेतना, कलात्मक अभिरुचि और सांस्कृतिक परिपक्वता का प्रमाण हैं।

पुरापाषाणकालीन कला

पुरापाषाणकालीन मानव की उपलब्धियों में उसकी कलात्मक अभिव्यक्ति का विशिष्ट स्थान है। यद्यपि निम्न एवं मध्य पुरापाषाणकाल में प्रतीकात्मक व्यवहार के कुछ सीमित संकेत मिलते हैं, किंतु कला का वास्तविक और व्यापक विकास उच्च पुरापाषाणकाल (लगभग 50,000–12,000 वर्ष पूर्व) में हुआ। इसी काल में मानव ने केवल उपयोगी उपकरणों के निर्माण तक स्वयं को सीमित नहीं रखा, बल्कि अपनी कल्पनाशक्ति, सौंदर्य-बोध, धार्मिक विश्वासों तथा सामाजिक अनुभवों को भी कलात्मक रूप प्रदान किया। पुरातात्त्विक साक्ष्यों से स्पष्ट है कि उस समय का मानव केवल जीविका-संग्राम में संलग्न प्राणी नहीं था, बल्कि उसमें प्रतीकात्मक चिंतन, सृजनात्मक क्षमता तथा सांस्कृतिक चेतना का भी उल्लेखनीय विकास हो चुका था। पुरापाषाणकालीन कला के प्रमुख रूपों में गुफा-चित्र, शैल-उत्कीर्णन, मूर्तिकला, हड्डी एवं सींग पर नक्काशी, मिट्टी की प्रतिमाएँ तथा अलंकृत अस्त्र-शस्त्र सम्मिलित हैं।

वीनस प्रतिमाएँ और मूर्तिकला

उच्च पुरापाषाणकाल की प्रारंभिक औरिग्नेशियन संस्कृति से अनेक स्त्री-मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं, जिन्हें सामान्यतः ‘वीनस प्रतिमाएँ’ कहा जाता है। इनका निर्माण पत्थर, हाथीदाँत तथा कभी-कभी पकाई हुई मिट्टी से किया गया था। इन प्रतिमाओं में स्त्री के उरोज, उदर और नितंब जैसे अंगों को अत्यधिक उभारा गया है, जबकि हाथ, पैर और मुख अपेक्षाकृत छोटे तथा कम स्पष्ट बनाए गए हैं। ऑस्ट्रिया के विलेनडॉर्फ से प्राप्त लगभग 11 सेंटीमीटर ऊँची ‘वीनस ऑफ विलेनडॉर्फ’ इस परंपरा का सबसे प्रसिद्ध उदाहरण है।

अधिकांश विद्वानों का मत है कि इन प्रतिमाओं का संबंध उर्वरता, मातृत्व, प्रजनन-शक्ति अथवा समृद्धि से था। कुछ इतिहासकार इन्हें धार्मिक अथवा जादुई अनुष्ठानों से जोड़ते हैं, जबकि अन्य इन्हें स्त्री-देह के सांकेतिक आदर्श या सामाजिक प्रतीक के रूप में देखते हैं। आधुनिक शोध यह स्वीकार करता है कि इन प्रतिमाओं का उद्देश्य सभी क्षेत्रों में समान नहीं था, बल्कि स्थानीय सांस्कृतिक परंपराओं के अनुसार इनके अर्थ भिन्न-भिन्न हो सकते थे।

अलंकरण और उत्कीर्ण कला

पुरापाषाणकालीन कलाकारों ने केवल मूर्तियाँ ही नहीं बनाई, बल्कि अपने दैनिक उपयोग के उपकरणों और अस्त्र-शस्त्रों को भी अलंकृत किया। हड्डी, सींग तथा हाथीदाँत पर उकेरी गई रेखाएँ, ज्यामितीय आकृतियाँ तथा पशु-चित्र उनकी कलात्मक रुचि के उत्कृष्ट प्रमाण हैं। प्रारंभिक चरण में ये आकृतियाँ अपेक्षाकृत सरल और रेखात्मक थीं, किंतु समय के साथ इनमें यथार्थपरकता, अनुपात तथा गतिशीलता का उल्लेखनीय विकास हुआ।

कलाकारों ने पशुओं की शारीरिक बनावट, मांसपेशियों और गतियों का सूक्ष्म अध्ययन किया तथा उन्हें अत्यंत स्वाभाविक रूप में अंकित किया। इससे स्पष्ट होता है कि कला का विकास आकस्मिक नहीं था, बल्कि दीर्घकालीन अनुभव, अभ्यास और प्रकृति के गहन अवलोकन का परिणाम था।

गुफा-चित्रकला और शैल-उत्कीर्णन

पुरापाषाणकालीन कला का सर्वोच्च रूप गुफाओं की दीवारों और छतों पर निर्मित भित्तिचित्रों तथा शैल-उत्कीर्णनों में दिखाई देता है। फ्रांस की लास्को और शोवे गुफाएँ तथा स्पेन की आल्तामीरा गुफा विश्व की महानतम प्रागैतिहासिक कला-स्थलियों में गिनी जाती हैं। आल्तामीरा की खोज 1879 ई. में मार्सेलीनो सान्स दे सौतुओला ने की थी। प्रारंभ में इन चित्रों की प्रामाणिकता पर संदेह किया गया था, किंतु बाद में यूरोप की अन्य गुफाओं से समान चित्र मिलने पर इन्हें प्रागैतिहासिक कला की अनुपम धरोहर के रूप में स्वीकार कर लिया गया।

इन गुफाओं में बाइसन, घोड़े, हिरण, मैमथ, जंगली बैल, आइबेक्स तथा अन्य अनेक पशुओं के बहुरंगी चित्र अत्यंत जीवंत रूप में अंकित हैं। चित्रों में लाल, काले, पीले और भूरे रंगों का प्रयोग किया गया है, जिन्हें गेरू, मैंगनीज़ तथा चारकोल जैसे प्राकृतिक रंगद्रव्यों से तैयार किया जाता था। कलाकारों ने चट्टानों की प्राकृतिक उभारों का कुशल उपयोग कर चित्रों में त्रि-आयामी प्रभाव उत्पन्न किया, जिससे वे अत्यंत सजीव प्रतीत होते हैं।

चित्रण की तकनीक और कलात्मक विशेषताएँ

पुरापाषाणकालीन चित्रों की सबसे उल्लेखनीय विशेषता उनकी यथार्थपरकता और गतिशीलता है। पशुओं को दौड़ते, चरते, संघर्ष करते, छलाँग लगाते अथवा विश्राम करते हुए अत्यंत स्वाभाविक ढंग से चित्रित किया गया है। कहीं-कहीं समूहों में पशुओं का चित्रण तथा विभिन्न प्रतीकात्मक चिह्न भी अंकित हैं, जो केवल दृश्यांकन नहीं, बल्कि विचारों और अनुभवों की अभिव्यक्ति का संकेत देते हैं।

शैल-उत्कीर्णन के लिए पत्थर के ब्यूरिन जैसे विशेष उपकरणों का उपयोग किया जाता था। रंग भरने के लिए ब्रश, उँगलियों तथा खोखली हड्डियों के माध्यम से रंग फूँकने की तकनीक अपनाई जाती थी। गुफाओं के भीतरी अंधकारमय भागों में चित्र बनाने के लिए पशु-चर्बी से चलने वाले दीपकों का उपयोग किया जाता था, जो उस समय की तकनीकी दक्षता का परिचायक है।

कला का उद्देश्य

पुरापाषाणकालीन कला के उद्देश्य के संबंध में विद्वानों में पूर्ण सहमति नहीं है। एक मत के अनुसार यह मानव की स्वाभाविक सौंदर्यप्रियता और रचनात्मक प्रवृत्ति की अभिव्यक्ति थी। दूसरे मत के अनुसार इसका उद्देश्य गुफाओं, उपकरणों तथा अस्त्र-शस्त्रों का अलंकरण था। तीसरा और सबसे प्रभावशाली मत इसे धार्मिक अथवा जादुई विश्वासों से संबंधित मानता है।

जेम्स फ्रेज़र तथा वी. गॉर्डन चाइल्ड जैसे विद्वानों ने इन चित्रों को ‘सहानुभूतिपूर्ण जादू’ की अवधारणा से जोड़ा है। उनके अनुसार आखेट से पूर्व पशुओं का चित्र बनाकर मानव यह विश्वास करता था कि वह उनकी शक्ति अथवा आत्मा पर नियंत्रण प्राप्त कर लेगा और शिकार अधिक सफल होगा। अनेक चित्रों में घायल अथवा बाण से विद्ध पशुओं से चित्रण से इस मत का आंशिक समर्थन होता है।

धार्मिक और सामाजिक महत्त्व

अनेक गुफा-चित्र गुफाओं के उन भीतरी भागों में बनाए गए हैं जहाँ सामान्य निवास संभव नहीं था। वहाँ पहुँचने के लिए विशेष प्रयास करना पड़ता था तथा प्रकाश की व्यवस्था कृत्रिम रूप से करनी होती थी। इससे स्पष्ट होता है कि इन स्थानों का उपयोग केवल आवास के रूप में नहीं, बल्कि विशेष धार्मिक, सामुदायिक अथवा अनुष्ठानिक गतिविधियों के लिए भी किया जाता था।

कई स्थानों पर एक ही चित्र के ऊपर बार-बार नए चित्र बनाए गए हैं, जिससे लगता है कि ये गुफाएँ लंबे समय तक धार्मिक या सांस्कृतिक अनुष्ठानों के केंद्र बनी रहीं। इस प्रकार पुरापाषाणकालीन कला के उद्देश्य बहुआयामी थे और उन्हें किसी एक कारण तक सीमित नहीं किया जा सकता है।

वैज्ञानिक और तकनीकी ज्ञान का परिचय

पुरापाषाणकालीन कला मानव की वैज्ञानिक समझ और तकनीकी दक्षता का भी प्रमाण है। निरंतर आखेट और पशुओं के व्यवहार के अध्ययन से उसे शरीर-रचना का पर्याप्त ज्ञान प्राप्त हो गया था। अनेक चित्रों में पशुओं की मांसपेशियों, अस्थियों और शारीरिक अनुपात का अत्यंत सटीक चित्रण किया गया है।

प्राकृतिक रंगों की तैयारी, प्रकाश की व्यवस्था, शैल-उत्कीर्णन की तकनीक, हड्डी और पत्थर पर सूक्ष्म नक्काशी तथा गुफाओं के कठिन भागों तक पहुँचकर चित्र बनाना उस समय के मानव की व्यावहारिक बुद्धिमत्ता और तकनीकी कौशल का परिचायक है। इसी काल में हड्डी की सुइयाँ, भाला-प्रक्षेपक, हारपून तथा अन्य उन्नत उपकरणों का विकास भी हुआ, जिससे कला और तकनीक का परस्पर संबंध और अधिक सुदृढ़ हुआ।

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