प्राचीन भारतीय इतिहास के ऐतिहासिक स्रोत के रूप में विदेशी यात्रियों के विवरण (Accounts of Foreign Travellers as Historical Sources of Ancient Indian History)

प्राचीन भारतीय इतिहास के ऐतिहासिक स्रोत के रूप में विदेशी यात्रियों के विवरण (Accounts of Foreign Travellers as Historical Sources of Ancient Indian History)

प्राचीन भारतीय इतिहास के ऐतिहासिक स्रोत के रूप में विदेशी यात्रियों के विवरण

प्राचीन भारतीय इतिहास के पुनर्निर्माण में विदेशी यात्रियों, राजदूतों, विद्वानों और लेखकों के विवरणों का अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान है। भारतीय साहित्य, पुरातात्त्विक अवशेषों, अभिलेखों और सिक्कों के साथ-साथ विदेशी लेखकों द्वारा लिखे गए यात्रा-वृत्तांत भारतीय इतिहास के महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक स्रोत माने जाते हैं। अनेक विदेशी यात्री व्यापार, धार्मिक तीर्थयात्रा, कूटनीतिक दायित्व, सैन्य अभियानों अथवा ज्ञानार्जन के उद्देश्य से भारत आए। उन्होंने यहाँ के राजनीतिक संगठन, प्रशासन, सामाजिक व्यवस्था, धार्मिक जीवन, आर्थिक गतिविधियों, व्यापार, नगरों, शिक्षा, संस्कृति तथा जनजीवन का विस्तृत वर्णन किया। यद्यपि उनके विवरणों में अनेक स्थानों पर अतिशयोक्ति, कल्पना अथवा सीमित जानकारी के कारण त्रुटियाँ भी मिलती हैं, फिर भी भारतीय इतिहास के पुनर्निर्माण में उनका योगदान अत्यंत मूल्यवान है।

विदेशी लेखकों के विवरणों से अनेक ऐसे ऐतिहासिक तथ्यों की जानकारी प्राप्त होती है, जिनका उल्लेख भारतीय स्रोतों में या तो बहुत संक्षेप में मिलता है अथवा बिल्कुल नहीं मिलता। विशेष रूप से मौर्यकाल, उत्तर-पश्चिम भारत, भारत-यूनान संबंध, अंतरराष्ट्रीय व्यापार तथा भारतीय समाज के अध्ययन में इन स्रोतों का विशेष महत्त्व है। विदेशी यात्रियों एवं लेखकों के विवरणों को सामान्यतः तीन प्रमुख वर्गों में विभाजित किया जाता है—

  1. यूनानी-रोमन लेखक
  2. चीनी यात्री
  3. अरबी एवं फारसी लेखक
यूनानी-रोमन लेखक

प्राचीन भारत के संबंध में सर्वप्रथम व्यवस्थित जानकारी यूनानी एवं रोमन लेखकों के विवरणों से प्राप्त होती है। इन लेखकों ने भारत के भूगोल, समाज, प्रशासन, व्यापार तथा राजनीतिक परिस्थितियों का वर्णन किया है। इनके विवरणों को सामान्यतः तीन भागों में विभाजित किया जाता है—

  1. सिकंदर के पूर्व के लेखक
  2. सिकंदर के समकालीन लेखक
  3. सिकंदर के बाद के लेखक
सिकंदर के पूर्व के यूनानी लेखक

सबसे पहले स्काइलेक्स ने भारत का उल्लेख किया। वह फारसी सम्राट डेरियस प्रथम के आदेश पर लगभग 515 ईसा पूर्व सिंधु नदी की खोज एवं उसके नौवहन का अध्ययन करने भारत आया था। उसके विवरण से सिंधु प्रदेश के भूगोल तथा वहाँ के निवासियों के संबंध में प्रारम्भिक जानकारी प्राप्त होती है। यद्यपि उसका मूल ग्रंथ उपलब्ध नहीं है,परंतु बाद के यूनानी लेखकों ने उसके विवरणों का उपयोग किया।

इसके बाद हेकेटियस ऑफ मिलेटस ने भारत तथा सिंधु प्रदेश के भूगोल का वर्णन किया। उसने पारसी स्रोतों तथा उपलब्ध सूचनाओं के आधार पर भारत के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्रों का परिचय दिया।

टेसियस, जो फारसी सम्राट आर्टाक्सर्क्सीज़ द्वितीय का राजवैद्य था, ने इंडिका नामक ग्रंथ की रचना की। उसने स्वयं भारत की यात्रा नहीं की थी, बल्कि फारसी दरबार में आए व्यापारियों तथा अधिकारियों से प्राप्त सूचनाओं के आधार पर भारत का वर्णन किया। उसके विवरणों में अनेक काल्पनिक एवं अतिरंजित कथाएँ मिलती हैं, इसलिए उन्हें पूर्णतः विश्वसनीय नहीं माना जाता।

हेरोडोटस, जिसे ‘इतिहास का जनक’ कहा जाता है, ने अपनी प्रसिद्ध कृति हिस्ट्रीज़ में भारत और फारस के संबंधों, उत्तर-पश्चिम भारत की जनजातियों तथा भारतीय सैनिकों का उल्लेख किया है। उसने भारत की यात्रा नहीं की थी,परंतु उसके विवरण तत्कालीन भारत-फारस संबंधों को समझने में उपयोगी हैं।

सिकंदर के समकालीन लेखक

326 ईसा पूर्व सिकंदर के भारत आक्रमण के समय उसकी सेना के साथ अनेक सैनिक अधिकारी, भूगोलवेत्ता, लेखक तथा इतिहासकार भारत आए। उन्होंने अपने प्रत्यक्ष अनुभवों के आधार पर भारत के भूगोल, जनजीवन तथा राजनीतिक परिस्थितियों का वर्णन किया। नियार्कस सिकंदर का नौसेनाध्यक्ष था, जिसने सिंधु नदी से फारस की खाड़ी तक समुद्री मार्ग का वर्णन किया।  ओनेसिक्रिटस ने सिकंदर की यात्राओं का विवरण प्रस्तुत किया, जबकि अरिस्टोबुलस ने भारत के प्राकृतिक संसाधनों, वनस्पतियों तथा नगरों का वर्णन किया। चारेस तथा यूमेनीस ने सिकंदर के अभियान से संबंधित उपयोगी विवरण दिए हैं।

यद्यपि इन लेखकों के मूल ग्रंथ आज उपलब्ध नहीं हैं,परंतु बाद के यूनानी इतिहासकारों ने इनके उद्धरण सुरक्षित रखे हैं। इनके विवरणों से तत्कालीन भारतीय राज्यों, नगरों, युद्धनीति तथा सामाजिक जीवन का ज्ञान प्राप्त होता है।

सिकंदर के बाद के यूनानी-रोमन लेखक

सिकंदर के पश्चात अनेक यूनानी और रोमन लेखक भारत के विषय में लिखते रहे। इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण नाम मेगस्थनीज का है। मेगस्थनीज सेल्यूकस निकेटर का राजदूत था, जिसे चंद्रगुप्त मौर्य के दरबार में भेजा गया था। वह कई वर्षों तक पाटलिपुत्र में रहा और उसने ‘इंडिका’ नामक प्रसिद्ध ग्रंथ की रचना की। यद्यपि इसका मूल ग्रंथ उपलब्ध नहीं है, फिर भी इसके अंश स्ट्रैबो, एरियन, डायोडोरस तथा अन्य लेखकों के ग्रंथों में सुरक्षित हैं।

मेगस्थनीज ने भारत के भूगोल, प्रशासन, कृषि, समाज, अर्थव्यवस्था तथा राजधानी पाटलिपुत्र का अत्यंत विस्तृत वर्णन किया है। उसके अनुसार पाटलिपुत्र उस समय भारत का सबसे विशाल एवं सुव्यवस्थित नगर था। उसने नगर प्रशासन के लिए छह समितियों की व्यवस्था का उल्लेख किया है। उसने भारतीय कृषि, सिंचाई व्यवस्था, गन्ने एवं कपास की खेती तथा भारतीयों की सत्यनिष्ठा एवं वीरता की भी प्रशंसा की है।

मेगस्थनीज ने भारतीय समाज को सात वर्गों में विभाजित किया है—दार्शनिक एवं ब्राह्मण, कृषक, पशुपालक एवं आखेटक, व्यापारी एवं शिल्पकार, सैनिक, निरीक्षक तथा मंत्री एवं परामर्शदाता। आधुनिक इतिहासकार मानते हैं कि यह वर्गीकरण भारतीय वर्ण एवं जाति व्यवस्था का सही चित्रण नहीं है, बल्कि मेगस्थनीज की व्यक्तिगत समझ पर आधारित था। इस प्रकार मेगस्थनीज का विवरण मौर्यकालीन भारत के अध्ययन का सबसे महत्त्वपूर्ण विदेशी स्रोत है।

अन्य यूनानी एवं रोमन लेखक

डाइमेकस सीरिया के शासक अंतियोकस प्रथम का राजदूत था, जिसे बिन्दुसार के दरबार में भेजा गया था। उसने अपने समय की राजनीतिक एवं सामाजिक परिस्थितियों का वर्णन किया, यद्यपि उसकी मूल रचना उपलब्ध नहीं है। डायोनिसियस मिस्र के शासक टॉलेमी द्वितीय फिलाडेल्फस का राजदूत था। उसने भी भारत के संबंध में उपयोगी जानकारी प्रदान की।

स्ट्रैबो ने अपनी प्रसिद्ध कृति जियोग्राफिका में भारत के भूगोल तथा मेगस्थनीज सहित अनेक पूर्ववर्ती लेखकों के विवरणों का समालोचनात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया। प्लिनी ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘नेचुरल हिस्ट्री’ में भारत की वनस्पतियों, पशुओं, खनिजों, रत्नों तथा भारत-रोम व्यापार का विस्तृत वर्णन किया। उसने लिखा है कि रोम भारत से विलासिता की वस्तुएँ आयात करने में प्रतिवर्ष अत्यधिक धन व्यय करता था। टॉलेमी ने दूसरी शताब्दी ईस्वी में ‘जियोग्राफिया’ की रचना की, जिसमें भारत के अनेक नगरों, बंदरगाहों तथा समुद्री व्यापार मार्गों का उल्लेख मिलता है। एरियन ने एनाबेसिस ऑफ अलेक्ज़ेंडर तथा इंडिका नामक ग्रंथों की रचना की। उसने सिकंदर के अभियानों का व्यवस्थित एवं अपेक्षाकृत विश्वसनीय विवरण प्रस्तुत किया तथा मेगस्थनीज एवं अन्य समकालीन लेखकों के आधार पर भारत का वर्णन किया।

डायोडोरस सिक्युलस, प्लूटार्क, कर्टियस रुफस तथा जस्टिन के विवरण भी सिकंदर के अभियान तथा प्राचीन भारत के राजनीतिक इतिहास के अध्ययन में अत्यंत उपयोगी हैं। इसी प्रकार पेरिप्लस ऑफ द एरिथ्रियन सी नामक अज्ञात लेखक का ग्रंथ पहली शताब्दी ईस्वी का महत्त्वपूर्ण व्यापारिक स्रोत है। इसमें भारतीय समुद्री बंदरगाहों, व्यापारिक मार्गों तथा निर्यात-आयात की वस्तुओं का विस्तृत वर्णन मिलता है।

कुल मिलाकर यूनानी-रोमन लेखकों के विवरण प्राचीन भारतीय इतिहास के अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं। इनसे विशेष रूप से मौर्यकालीन प्रशासन, भारत के भूगोल, नगर व्यवस्था, समाज, कृषि, व्यापार, विदेशी संबंध तथा अंतरराष्ट्रीय वाणिज्य के विषय में बहुमूल्य जानकारी प्राप्त होती है। यद्यपि इन लेखकों ने अनेक बार सुनी-सुनाई बातों को भी अपने विवरणों में सम्मिलित किया तथा कुछ स्थानों पर अतिशयोक्ति या त्रुटियाँ भी कीं, फिर भी भारतीय साहित्यिक एवं पुरातात्त्विक स्रोतों के साथ इनका तुलनात्मक अध्ययन करने पर ये अत्यंत विश्वसनीय एवं उपयोगी ऐतिहासिक स्रोत सिद्ध होते हैं। विदेशी यात्रियों के विवरणों ने प्राचीन भारतीय इतिहास के अनेक अस्पष्ट पक्षों को स्पष्ट करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है और इतिहासकार आज भी इनके आधार पर भारतीय इतिहास के विभिन्न आयामों का पुनर्निर्माण करते हैं।

चीनी लेखक

प्राचीन भारतीय इतिहास के पुनर्निर्माण में चीनी यात्रियों और विद्वानों के यात्रा-वृत्तांत अत्यंत महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक स्रोत हैं। भारत और चीन के मध्य प्राचीन काल से ही धार्मिक एवं सांस्कृतिक संबंध स्थापित थे। विशेष रूप से बौद्ध धर्म के प्रसार के बाद इन दोनों देशों के बीच संपर्क और अधिक सुदृढ़ हुआ। बौद्ध धर्म के मूल सिद्धांतों का अध्ययन करने, पवित्र बौद्ध स्थलों के दर्शन करने, संस्कृत एवं पालि ग्रंथों का संग्रह करने तथा बौद्ध आचार्यों से शिक्षा प्राप्त करने के उद्देश्य से अनेक चीनी भिक्षु भारत आए। उन्होंने यहाँ के राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक जीवन का विस्तृत एवं प्रत्यक्ष विवरण प्रस्तुत किया। इन यात्रियों के वृत्तांत भारतीय इतिहास के उन पक्षों पर प्रकाश डालते हैं, जिनका उल्लेख भारतीय स्रोतों में बहुत संक्षेप में मिलता है।

चीन के प्रारम्भिक इतिहासकार सिमा चियेन ने पहली शताब्दी ईसा पूर्व के आसपास अपनी प्रसिद्ध ऐतिहासिक कृति ‘शि-ची’ की रचना की। यद्यपि उसने भारत की यात्रा नहीं की थी, फिर भी उसके ग्रंथ से भारत और मध्य एशिया के संबंधों के विषय में महत्त्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है। इसके पश्चात भारत आने वाले अधिकांश चीनी यात्री बौद्ध भिक्षु थे। इनमें फाह्यान (399–414 ई.), सुंगयुन (518–521 ई.), ह्वेनसांग (629–645 ई.) तथा इत्सिंग (671–695 ई.) विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

फाह्यान

फाह्यान भारत आने वाला प्रथम प्रमुख चीनी बौद्ध यात्री था। वह 399 ईस्वी में गुप्त सम्राट चंद्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य के शासनकाल में भारत आया। उसका मुख्य उद्देश्य बौद्ध धर्म के मूल ग्रंथों का संग्रह करना, पवित्र बौद्ध स्थलों की यात्रा करना तथा बौद्ध संघों की वास्तविक स्थिति का अध्ययन करना था। उसने अत्यंत कठिन पर्वतीय एवं मरुस्थलीय मार्गों को पार करते हुए भारत की यात्रा की और लगभग पन्द्रह वर्षों तक विभिन्न क्षेत्रों का भ्रमण किया।

फाह्यान ने उत्तर भारत, मध्य गंगा घाटी, पाटलिपुत्र, कौशाम्बी, श्रावस्ती, कपिलवस्तु, कुशीनगर, वैशाली तथा ताम्रलिप्ति सहित अनेक बौद्ध तीर्थस्थलों का भ्रमण किया। उसने भारत से समुद्री मार्ग द्वारा श्रीलंका होते हुए चीन वापसी की। उसकी प्रसिद्ध कृति ‘फा-हियेन-की’ भारतीय इतिहास का अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्रोत है। इसमें गुप्तकालीन समाज, प्रशासन, धर्म तथा जनजीवन का विस्तृत वर्णन मिलता है। फाह्यान ने भारतीयों की धार्मिक सहिष्णुता, दानशीलता तथा नैतिक जीवन की प्रशंसा की है। उसने नगरों में स्थापित दातव्य चिकित्सालयों, धर्मशालाओं, यात्रियों की सुविधाओं तथा सामाजिक कल्याण की व्यवस्था का उल्लेख किया है। उसने कौड़ियों के प्रचलन तथा चाण्डाल समुदाय की सामाजिक स्थिति का भी वर्णन किया है। यद्यपि उसने चंद्रगुप्त द्वितीय के राजनीतिक कार्यों का विशेष उल्लेख नहीं किया, फिर भी उसका यात्रा-वृत्तांत गुप्तकालीन भारत की सामाजिक एवं धार्मिक परिस्थितियों का विश्वसनीय चित्र प्रस्तुत करता है।

सुंगयुन

फाह्यान के लगभग एक शताब्दी बाद सुंगयुन 518 ईस्वी में भारत आया। उसे उत्तरी वेई साम्राज्य की महारानी ने बौद्ध ग्रंथों के संग्रह के उद्देश्य से भारत भेजा था। वह लगभग तीन वर्षों तक भारत में रहा और अनेक बौद्ध ग्रंथों का संग्रह कर चीन ले गया। सुंगयुन के यात्रा-वृत्तांत का विशेष महत्त्व इस कारण है कि उसने उत्तर-पश्चिम भारत की तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों का वर्णन किया है। उसने हूण शासक मिहिरकुल का उल्लेख किया है तथा उसके शासन और धार्मिक नीति के संबंध में महत्त्वपूर्ण जानकारी दी है। यद्यपि उसका विवरण अपेक्षाकृत संक्षिप्त है, फिर भी गुप्तोत्तर काल के इतिहास के अध्ययन में उसका विशेष स्थान है।

ह्वेनसांग

चीनी यात्रियों में ह्वेनसांग सर्वाधिक प्रसिद्ध और विश्वसनीय माना जाता है। उसे ‘यात्रियों का राजकुमार’ की उपाधि दी गई है। वह महायान बौद्ध सम्प्रदाय का विद्वान भिक्षु था। 629 ईस्वी में वह भारत आया और लगभग सोलह वर्षों तक यहाँ रहा। उसने लगभग छह वर्षों तक नालंदा विश्वविद्यालय में अध्ययन किया तथा महान बौद्ध आचार्य शीलभद्र से शिक्षा प्राप्त की।

ह्वेनसांग भारत में सम्राट हर्षवर्धन के शासनकाल में आया था। उसने उत्तर भारत से लेकर दक्षिण भारत के कांचीपुरम् तक विस्तृत यात्रा की तथा अनेक राज्यों का भ्रमण किया। उसने कन्नौज की धर्मसभा में भाग लिया, जहाँ हर्षवर्धन ने उसे अध्यक्ष बनाया। उसने पल्लव शासक नरसिंहवर्मन प्रथम (महामल्ल) का भी उल्लेख किया है। ह्वेनसांग की प्रसिद्ध कृति ‘सी-यू-की’ भारतीय इतिहास का अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्रोत है। इसमें लगभग 138 राज्यों का वर्णन मिलता है। उसने तत्कालीन प्रशासन, शिक्षा, धर्म, नगरों, कृषि, व्यापार, सामाजिक जीवन तथा बौद्ध धर्म की स्थिति का विस्तृत एवं प्रामाणिक चित्र प्रस्तुत किया है। उसके विवरण से नालंदा विश्वविद्यालय, हर्षवर्धन के शासन, भारतीय शिक्षा व्यवस्था तथा सातवीं शताब्दी के भारतीय समाज के संबंध में अमूल्य जानकारी प्राप्त होती है। उसके शिष्य हुई-ली द्वारा रचित ‘ह्वेनसांग की जीवनी’ भी हर्षकालीन भारत के अध्ययन का महत्त्वपूर्ण स्रोत है।

इत्सिंग

सातवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में इत्सिंग समुद्री मार्ग से भारत आया। वह 671 ईस्वी में भारत पहुँचा और लगभग दस वर्षों तक नालंदा सहित विभिन्न बौद्ध शिक्षा केंद्रों  में अध्ययन करता रहा। उसने संस्कृत भाषा का गहन अध्ययन किया तथा अनेक बौद्ध ग्रंथों का चीनी भाषा में अनुवाद किया। इत्सिंग ने अपनी रचनाओं में भारतीय शिक्षा-पद्धति, बौद्ध मठों, धार्मिक अनुष्ठानों, भारतीय वेशभूषा, भोजन, सामाजिक जीवन तथा विद्वानों की परम्परा का विस्तृत वर्णन किया है। उसने भारत को ‘आर्यदेश’ कहा है। उसने उल्लेख किया है कि श्रीगुप्त ने नालंदा के निकट एक चीनी मंदिर का निर्माण कराया था। इत्सिंग ने संस्कृत विद्वान भर्तृहरि की प्रसिद्धि का भी उल्लेख किया है। उसके विवरण से नालंदा विश्वविद्यालय तथा बौद्ध शिक्षा व्यवस्था के स्वरूप की महत्त्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है।

अन्य चीनी लेखक

इन प्रमुख यात्रियों के अतिरिक्त मा-त्वा-लिन तथा चाऊ-जू-कुआ की रचनाएँ भी भारतीय इतिहास के अध्ययन में उपयोगी हैं। मा-त्वा-लिन ने हर्षवर्धन के पूर्वी अभियानों का उल्लेख किया है, जबकि चाऊ-जू-कुआ ने दक्षिण भारत के चोल साम्राज्य, समुद्री व्यापार तथा भारत-चीन संबंधों पर महत्त्वपूर्ण प्रकाश डाला है।

इस प्रकार चीनी यात्रियों के विवरण प्राचीन भारतीय इतिहास के सबसे विश्वसनीय विदेशी स्रोत हैं। इन यात्रियों ने अधिकांश सूचनाएँ अपने प्रत्यक्ष अनुभवों के आधार पर प्रस्तुत कीं। इनके यात्रा-वृत्तांतों से गुप्तकाल, हर्षकाल, बौद्ध धर्म, नालंदा विश्वविद्यालय, भारतीय समाज, शिक्षा, धर्म, प्रशासन तथा संस्कृति का विस्तृत और प्रामाणिक चित्र प्राप्त होता है। यद्यपि इनका मुख्य उद्देश्य बौद्ध धर्म का अध्ययन था, फिर भी इनके विवरण भारतीय इतिहास के पुनर्निर्माण में अमूल्य एवं अपरिहार्य स्रोत सिद्ध होते हैं।

तिब्बती लेखक

प्राचीन भारतीय इतिहास के अध्ययन में तिब्बती लेखकों का भी महत्त्वपूर्ण योगदान है। यद्यपि तिब्बती इतिहासकार लामा तारानाथ (1575–1634 ई.) प्राचीन काल के नहीं, बल्कि उत्तरकालीन विद्वान थे, फिर भी उन्होंने अपने ग्रंथों के माध्यम से प्राचीन भारत, विशेषकर बौद्ध धर्म के इतिहास पर मूल्यवान जानकारी प्रदान की। उनकी प्रसिद्ध कृति ‘बौद्ध धर्म का इतिहास’ में मौर्य, शुंग, कुषाण तथा गुप्त वंशों से संबंधित अनेक ऐतिहासिक तथ्यों का उल्लेख मिलता है। तारानाथ स्वयं बौद्ध भिक्षु थे, इसलिए उन्होंने घटनाओं का वर्णन मुख्यतः बौद्ध दृष्टिकोण से किया है। इसी कारण कुछ स्थानों पर उनके विवरणों में पक्षपात दिखाई देता है, जैसे उन्होंने पुष्यमित्र शुंग को बौद्ध धर्म का विरोधी शासक बताया है, जबकि इस विषय में इतिहासकारों के मत भिन्न हैं।

तिब्बती यात्री धर्मस्वामी (चाग लोत्सावा) के यात्रा-वृत्तांत से तेरहवीं शताब्दी के भारत की राजनीतिक एवं धार्मिक परिस्थितियों की महत्त्वपूर्ण जानकारी मिलती है। उनके विवरण से स्पष्ट होता है कि तुर्क आक्रमणों के बाद भी नालंदा महाविहार पूर्णतः नष्ट नहीं हुआ था। इस प्रकार तिब्बती लेखकों के विवरण भारतीय इतिहास के पुनर्निर्माण में उपयोगी ऐतिहासिक स्रोत हैं।

अरबी लेखक

प्राचीन एवं पूर्व-मध्यकालीन भारतीय इतिहास के अध्ययन में अरबी लेखकों और यात्रियों के विवरण अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्रोत माने जाते हैं। आठवीं शताब्दी ईस्वी से भारत और पश्चिमी एशिया के बीच व्यापारिक, सांस्कृतिक तथा राजनीतिक संबंध निरंतर सुदृढ़ होने लगे। अरब व्यापारी भारत के पश्चिमी तटों पर नियमित रूप से आने लगे और 712 ईस्वी में मुहम्मद बिन कासिम द्वारा सिंध विजय के बाद भारत में अरबों का राजनीतिक संपर्क भी स्थापित हो गया। इसके पश्चात् अनेक अरब यात्री, भूगोलवेत्ता, इतिहासकार और विद्वान भारत आए तथा उन्होंने यहाँ की सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक और राजनीतिक परिस्थितियों का विस्तृत वर्णन किया। उनके विवरण भारतीय इतिहास के पुनर्निर्माण में अत्यंत उपयोगी सिद्ध होते हैं।

अरबी लेखकों में अल-बिलादुरी, सुलेमान, अल-मसूदी, अलबरूनी तथा अल-तबरी विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। अल-बिलादुरी ने अपनी प्रसिद्ध कृति ‘फुतूह-उल-बुलदान’ में अरबों की विजयों का वर्णन किया है। इस ग्रंथ से सिंध पर मुहम्मद बिन कासिम के आक्रमण तथा प्रारम्भिक अरब शासन की जानकारी प्राप्त होती है। यह ग्रंथ भारत और अरबों के प्रारम्भिक राजनीतिक संबंधों का महत्त्वपूर्ण स्रोत माना जाता है। सुलेमान नौवीं शताब्दी का प्रसिद्ध अरब व्यापारी एवं यात्री था। उसने भारत की यात्रा करके तत्कालीन प्रतिहार, पाल तथा अन्य भारतीय राज्यों की आर्थिक, राजनीतिक और व्यापारिक स्थिति का वर्णन किया। उसके विवरण से ज्ञात होता है कि उस समय भारत अंतरराष्ट्रीय व्यापार का प्रमुख केंद्र था तथा भारतीय शासकों की समृद्धि और सैन्य शक्ति अत्यंत प्रभावशाली थी। अल-मसूदी ने 915–916 ईस्वी के आसपास भारत की यात्रा की। अपनी प्रसिद्ध कृति ‘मुरूज-अज़-ज़हब’ (स्वर्ण-उद्यान) में उसने भारत के भूगोल, समाज, व्यापार तथा विशेष रूप से राष्ट्रकूट और गुर्जर-प्रतिहार शासकों के विषय में उपयोगी जानकारी दी है। उसके विवरण से तत्कालीन भारत की राजनीतिक शक्ति तथा समुद्री व्यापार का भी ज्ञान प्राप्त होता है।

अरबी विद्वानों में सबसे प्रसिद्ध नाम अलबरूनी (अबू रैहान अलबरूनी) का है। वह महमूद गजनवी के साथ भारत आया और उसने वर्षों तक भारत में रहकर संस्कृत भाषा का अध्ययन किया। भारतीय समाज और संस्कृति को समझने के लिए उसने भारतीय विद्वानों से संपर्क स्थापित किया तथा अनेक संस्कृत ग्रंथों का अध्ययन किया। उसकी प्रसिद्ध कृति ‘तहकीक-ए-हिन्द’ (किताब-उल-हिन्द) भारतीय इतिहास का अत्यंत विश्वसनीय और महत्त्वपूर्ण स्रोत है। इसमें भारतीय धर्म, दर्शन, गणित, ज्योतिष, भूगोल, विज्ञान, सामाजिक व्यवस्था, रीति-रिवाज, जाति-व्यवस्था, शिक्षा तथा धार्मिक परम्पराओं का निष्पक्ष और विद्वत्तापूर्ण वर्णन मिलता है। अलबरूनी ने भारतीय संस्कृति की प्रशंसा करते हुए उसकी विशिष्टताओं का वैज्ञानिक दृष्टिकोण से विश्लेषण किया। इसलिए आधुनिक इतिहासकार उसे भारत का सबसे विश्वसनीय विदेशी लेखक मानते हैं। अल-तबरी भी एक प्रसिद्ध अरब इतिहासकार और धर्मशास्त्री था। यद्यपि वह भारत नहीं आया, फिर भी उसकी ऐतिहासिक रचनाओं से भारत और अरब जगत के संबंधों के विषय में महत्त्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है।

अरबी लेखकों के अतिरिक्त कुछ फारसी इतिहासकारों की कृतियाँ भी भारतीय इतिहास के अध्ययन में अत्यंत उपयोगी हैं। इनमें फिरदौसी की शाहनामा, रशीदुद्दीन हमदानी की जामी-उत-तवारीख, अली अहमद की चचनामा, मिन्हाज-उस-सिराज की तबकात-ए-नासिरी, जियाउद्दीन बरनी की तारीख-ए-फिरोजशाही तथा अबुल फ़ज़ल की अकबरनामा विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। यद्यपि ये कृतियाँ मुख्यतः मध्यकालीन भारत से संबंधित हैं, फिर भी वे भारत के राजनीतिक और सांस्कृतिक इतिहास के अध्ययन में अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं। इसी प्रकार यूरोपीय यात्रियों में मार्को पोलो का भी उल्लेख आवश्यक है। तेरहवीं शताब्दी के अंत में भारत आने वाले इस वेनिस (इटली) के प्रसिद्ध यात्री ने दक्षिण भारत, विशेषकर पाण्ड्य राज्य, उसके व्यापार, समाज तथा आर्थिक समृद्धि का विस्तृत वर्णन किया है।

इस प्रकार अरबी और फारसी लेखकों के विवरण भारतीय इतिहास के महत्त्वपूर्ण विदेशी स्रोत हैं। इनके वृत्तांतों से पूर्व-मध्यकालीन भारत की राजनीति, समाज, अर्थव्यवस्था, व्यापार, धर्म तथा संस्कृति के अनेक ऐसे पक्षों का ज्ञान प्राप्त होता है, जिनका उल्लेख भारतीय स्रोतों में सीमित रूप से मिलता है। विशेष रूप से अलबरूनी की तहकीक-ए-हिन्द भारतीय सभ्यता और संस्कृति के अध्ययन का सर्वाधिक प्रामाणिक विदेशी ग्रंथ माना जाता है।

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