मुगल चित्रकला (Mughal Painting)

मुगल चित्रकला (Mughal Painting)

मुगल चित्रकला

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पूर्व में इतिहासकारों के बीच यह धारणा प्रचलित थी कि दिल्ली सल्तनत के काल में चित्रकला का विकास लगभग समाप्त हो गया था और इसका वास्तविक पुनरुत्थान मुगल काल में हुआ। किंतु आधुनिक ऐतिहासिक शोधों से अब यह स्पष्ट हो चुका है कि तेरहवीं से पंद्रहवीं शताब्दी के मध्य भारत में चित्रकला की परंपरा निरंतर विकसित होती रही। मंदिरों, राजमहलों तथा सार्वजनिक भवनों की दीवारों पर भित्ति-चित्रों की परंपरा विद्यमान थी। इसके अतिरिक्त, वस्त्रों पर चित्रांकन तथा पांडुलिपियों के सचित्र निर्माण की कला भी प्रचलित थी। चौदहवीं शताब्दी में कुरआन की आयतों की अलंकृत सुलेख शैली तथा पंद्रहवीं शताब्दी में फ़ारसी और अवधी भाषा की सचित्र पांडुलिपियाँ इस बात का प्रमाण हैं कि चित्रकला की परंपरा निरंतर गतिशील थी। इसलिए मुगल चित्रकला का विकास किसी नवीन शुरुआत के रूप में नहीं, बल्कि पूर्ववर्ती भारतीय और इस्लामी कला परंपराओं के समन्वित रूप में हुआ।

मुगल चित्रकला का विकास

1526 ई. में प्रथम पानीपत के युद्ध में बाबर द्वारा इब्राहिम लोदी को पराजित करने के साथ भारत में मुगल साम्राज्य की स्थापना हुई। मुगल शासकों ने केवल राजनीतिक सत्ता को सुदृढ़ नहीं किया, बल्कि कला, साहित्य और संस्कृति के संरक्षण को भी विशेष महत्त्व दिया। उनके शासनकाल में चित्रकला, स्थापत्य और संगीत जैसी ललित कलाओं को व्यापक राजकीय संरक्षण प्राप्त हुआ।

मुगल चित्रकला का प्रारंभ बाबर के समय से माना जाता है, किंतु इसकी वास्तविक आधारशिला हुमायूँ के शासनकाल में पड़ी। शेरशाह सूरी से पराजित होकर हुमायूँ जब ईरान पहुँचा, तब वह वहाँ की विकसित फ़ारसी चित्रकला शैली से प्रभावित हुआ। वहीं उसकी भेंट प्रसिद्ध चित्रकार मीर सैय्यद अली और ख्वाजा अब्दुस्समद से हुई। भारत लौटने पर हुमायूँ इन दोनों कलाकारों को अपने साथ लाया, जिन्होंने मुगल चित्रकला की प्रारंभिक परंपरा को स्थापित किया।

अकबर ने फ़ारसी कलाकारों के साथ भारतीय चित्रकारों को भी संरक्षण देकर चित्रकला को संस्थागत स्वरूप प्रदान किया। इसके परिणामस्वरूप भारतीय और फ़ारसी परंपराओं के समन्वय से एक नवीन एवं विशिष्ट मुगल शैली का विकास हुआ। जहाँगीर के शासनकाल में प्राकृतिक सौंदर्य, यथार्थवाद तथा व्यक्तिचित्रण के कारण मुगल चित्रकला अपने चरम उत्कर्ष पर पहुँची। शाहजहाँ के समय इसमें तकनीकी परिष्कार, सूक्ष्मता और सजावटी सौंदर्य का और अधिक विकास हुआ। किंतु औरंगज़ेब के शासनकाल में राजकीय संरक्षण घटने से मुगल चित्रकला का पतन प्रारंभ हो गया। फलस्वरूप अनेक चित्रकार मुगल दरबार छोड़कर राजपूत, पहाड़ी और दक्कनी राज्यों में चले गए, जहाँ उन्होंने क्षेत्रीय चित्रकला शैलियों के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।

मुगल चित्रकला की विशेषताएँ

मुगल चित्रकला भारतीय, फ़ारसी (ईरानी), मध्य एशियाई तथा आंशिक रूप से यूरोपीय कला-परंपराओं के समन्वय से विकसित एक विशिष्ट चित्रकला शैली थी। प्रारंभिक अवस्था में इस पर फ़ारसी लघुचित्र शैली का गहरा प्रभाव था, क्योंकि मुगल शासकों के सांस्कृतिक संबंध मध्य एशिया और ईरान से जुड़े हुए थे। हुमायूँ अपने साथ ईरान से प्रसिद्ध चित्रकार मीर सैय्यद अली और ख्वाजा अब्दुस्समद को भारत लाया, जिन्होंने इस परंपरा की आधारशिला रखी। अकबर के काल में भारतीय कलाकारों के सहयोग से यह शैली धीरे-धीरे भारतीय स्वरूप ग्रहण करने लगी। फलस्वरूप भारतीय प्रकृति-प्रेम, भावाभिव्यक्ति, रंग-संयोजन और यथार्थ चित्रण का समावेश हुआ तथा मुगल चित्रकला एक स्वतंत्र एवं परिष्कृत शैली के रूप में विकसित हुई।

मुगल चित्रकला का विकास भारतीय चित्रकला की पूर्ववर्ती परंपराओं से भी प्रभावित था। पंद्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में जैन अपभ्रंश शैली में परिवर्तन आरंभ हो चुके थे तथा मालवा, गुजरात और राजस्थान क्षेत्रों में अनेक नई चित्रकला शैलियाँ विकसित हो रही थीं। नियामतनामा, आरण्यकपर्व, लौरचंदा, महापुराण तथा चौरपंचाशिका जैसी सचित्र पांडुलिपियों ने मुगल कलाकारों को भारतीय विषय-वस्तु, रंग-योजना और रचनात्मक अभिव्यक्ति की नई दिशाएँ प्रदान कीं। इस प्रकार मुगल चित्रकला भारतीय और विदेशी परंपराओं के सृजनात्मक समन्वय का उत्कृष्ट उदाहरण बन गई।

मुगल चित्रकला मुख्यतः लघुचित्र शैली पर आधारित थी। अधिकांश चित्र सचित्र ग्रंथों के लिए बनाए जाते थे या स्वतंत्र चित्रों के रूप में तैयार कर मुरक्का (एल्बम) में सुरक्षित रखे जाते थे। चित्र निर्माण की प्रक्रिया अत्यंत श्रमसाध्य थी। सबसे पहले कागज़ को कई बार घिसकर चिकना एवं चमकदार बनाया जाता था, फिर प्रारंभिक रेखांकन तैयार किया जाता था। एक ही चित्र के निर्माण में अनेक कलाकार सम्मिलित होते थे—एक कलाकार रेखांकन करता, दूसरा रंग भरता और तीसरा अलंकरण तथा अंतिम परिष्कार करता था। इस सामूहिक कार्य-पद्धति ने मुगल चित्रकला को विशिष्ट गुणवत्ता और कलात्मक उत्कृष्टता प्रदान की।

मुगल चित्रों के विषय मुख्यतः शाही जीवन, प्रशासन और तत्कालीन समाज से संबंधित थे। इनमें राजदरबार, राज्याभिषेक, युद्ध, आखेट, राजकीय यात्राएँ, ऐतिहासिक घटनाएँ, धार्मिक एवं पौराणिक प्रसंग, व्यक्ति-चित्र (शबीह), उत्सव तथा प्राकृतिक दृश्य प्रमुख थे। जहाँगीर के शासनकाल में पशु-पक्षियों, वृक्षों, पुष्पों और दुर्लभ जीव-जंतुओं के वैज्ञानिक एवं यथार्थ चित्रण को विशेष प्रोत्साहन मिला, जिससे प्रकृति-अध्ययन मुगल चित्रकला की प्रमुख विशेषता बन गया।

मुगल चित्रकला की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता उसका यथार्थवाद था। कलाकारों ने मानव आकृतियों, चेहरे की भाव-भंगिमाओं, वस्त्रों, आभूषणों तथा प्राकृतिक दृश्यों का अत्यंत सूक्ष्म और सजीव चित्रण किया। फ़ारसी चित्रकला की अपेक्षा मुगल शैली अधिक वास्तविक, संतुलित और जीवन के निकट थी। छाया-प्रकाश, परिप्रेक्ष्य, अनुपात तथा सूक्ष्म रेखांकन के प्रभावी प्रयोग से चित्रों में गहराई, गतिशीलता और जीवंतता उत्पन्न की गई। व्यक्ति-चित्रण और प्रकृति-अध्ययन इस शैली की सर्वश्रेष्ठ उपलब्धियाँ मानी जाती हैं।

इस प्रकार मुगल चित्रकला भारतीय कला इतिहास की एक महान उपलब्धि है। यह केवल राजदरबार की कलात्मक अभिरुचि का प्रतीक नहीं थी, बल्कि तत्कालीन राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक जीवन का प्रामाणिक दृश्य दस्तावेज भी थी। भारतीय, फ़ारसी, मध्य एशियाई तथा यूरोपीय कलात्मक तत्वों के समन्वय से विकसित इस शैली ने न केवल भारतीय चित्रकला को नई दिशा प्रदान की, बल्कि आगे चलकर राजस्थानी, पहाड़ी और दक्कनी चित्रकला के विकास को भी गहराई से प्रभावित किया। अपनी सूक्ष्मता, यथार्थवाद, रंग-सौंदर्य और कलात्मक उत्कृष्टता के कारण मुगल चित्रकला आज भी विश्व कला परंपरा में विशिष्ट स्थान रखती है।

मुगल चित्रकला (Mughal Painting)
मुगल चित्रकला
बाबर के काल में मुगल चित्रकला

भारत में मुगल साम्राज्य की स्थापना 1526 ई. में बाबर ने की। यद्यपि उसका शासनकाल (1526–1530 ई.) अल्पकालीन था, फिर भी वह कला, साहित्य और चित्रकला का उत्कृष्ट पारखी था। उसकी आत्मकथा ‘तुज़ुक-ए-बाबरी’ (बाबरनामा) से स्पष्ट होता है कि उसे चित्रकला का गहरा ज्ञान था तथा वह श्रेष्ठ चित्रकारों और कलाकृतियों का सूक्ष्म मूल्यांकन करने की क्षमता रखता था।

बाबर ने प्रसिद्ध ईरानी चित्रकार बिहज़ाद की अत्यधिक प्रशंसा की और उसे ‘पूर्व का राफेल’ कहा। तैमूरी चित्रकला शैली को चरमोत्कर्ष तक पहुँचाने का श्रेय भी बिहज़ाद को दिया जाता है। बाबर ने शाह मुज़फ़्फ़र जैसे अन्य प्रसिद्ध चित्रकारों की भी सराहना की। यद्यपि बाबर के शासनकाल के चित्र उपलब्ध नहीं हैं और उसे चित्रकला के संरक्षण का पर्याप्त अवसर भी नहीं मिला, फिर भी उसकी कलात्मक दृष्टि और सौंदर्यबोध ने आगे चलकर मुगल चित्रकला के विकास की आधारभूमि तैयार की।

हुमायूँ के काल में मुगल चित्रकला

बाबर के पश्चात् उसके ज्येष्ठ पुत्र हुमायूँ (1530–1556 ई.) ने शासन सँभाला। राजनीतिक दृष्टि से उसका शासन संघर्षपूर्ण रहा, किंतु सांस्कृतिक और कलात्मक दृष्टि से उसका योगदान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। 1540 ई. में शेरशाह सूरी से पराजित होकर हुमायूँ ईरान पहुँचा, जहाँ उसका परिचय फ़ारसी चित्रकला की विकसित परंपरा से हुआ। वहीं उसकी भेंट दो प्रसिद्ध चित्रकारों—मीर सैय्यद अली तथा ख्वाजा अब्दुस्समद शीराज़ी से हुई। मीर सैय्यद अली, हेरात के महान चित्रकार बिहज़ाद का शिष्य था।

1555 ई. में पुनः भारत लौटने पर हुमायूँ इन दोनों कलाकारों को अपने साथ लाया और उन्हें शाही संरक्षण प्रदान किया। इनके नेतृत्व में मुगल दरबार में संगठित चित्रशाला (तस्वीरखाना) की स्थापना हुई, जिसने मुगल चित्रकला की वास्तविक आधारशिला रखी। बालक अकबर ने भी इन्हीं दोनों कलाकारों से चित्रकला का प्रारंभिक प्रशिक्षण प्राप्त किया।

हुमायूँ के शासनकाल की सबसे महत्त्वपूर्ण कलात्मक परियोजना ‘दास्तान-ए-अमीर हम्ज़ा’ (हम्ज़ानामा) थी। यह पैगंबर मुहम्मद के चाचा अमीर हम्ज़ा के वीरतापूर्ण कारनामों पर आधारित विशाल सचित्र ग्रंथ था। इसकी योजना हुमायूँ के समय बनाई गई, जबकि अधिकांश चित्रांकन अकबर के शासनकाल में पूरा हुआ। परंपरागत रूप से इसमें लगभग 1,200–1,400 चित्रों का उल्लेख मिलता है। इतिहासकार मुल्ला अलाउद्दीन कज़वीनी ने अपने ग्रंथ ‘नफ़ाइस-उल-मआसिर’ में हम्ज़ानामा को हुमायूँ की कल्पना और संरक्षण का परिणाम बताया है।

हुमायूँ ने अब्दुस्समद को विशेष सम्मान दिया और बाद में अकबर ने उन्हें ‘शीरीं-कलम’ की उपाधि प्रदान की। इस काल में निर्मित चित्रों पर फ़ारसी (ईरानी) शैली का स्पष्ट प्रभाव था; भारतीय तत्वों का समावेश अभी प्रारंभिक अवस्था में था। यही शैली आगे चलकर अकबर के समय भारतीय कलाकारों के सहयोग से विकसित होकर एक विशिष्ट मुगल चित्रकला शैली के रूप में स्थापित हुई।

अकबर के काल में मुगल चित्रकला

1556 ई. में हुमायूँ की आकस्मिक मृत्यु के पश्चात् मात्र तेरह वर्ष की आयु में अकबर (1556–1605 ई.) मुगल साम्राज्य के सिंहासन पर बैठा। बाबर और हुमायूँ का अधिकांश समय राजनीतिक संघर्षों और साम्राज्य की स्थापना में व्यतीत हुआ, जिसके कारण वे कला के संरक्षण के लिए पर्याप्त ध्यान नहीं दे सके। इसके विपरीत अकबर ने अपने दीर्घकालीन और स्थिर शासन, उदार धार्मिक नीति तथा सांस्कृतिक समन्वय की भावना के माध्यम से कला एवं साहित्य के विकास के लिए अनुकूल वातावरण तैयार किया। इसी कारण अकबर का शासनकाल मुगल चित्रकला के वास्तविक विकास, संगठन और विस्तार का युग माना जाता है। अकबर ने चित्रकला को केवल मनोरंजन का साधन नहीं समझा, बल्कि इसे इतिहास, साहित्य, धर्म और संस्कृति के संरक्षण का प्रभावी माध्यम माना। उसके संरक्षण में मुगल चित्रकला ने फ़ारसी परंपरा से आगे बढ़कर एक विशिष्ट भारतीय-फ़ारसी समन्वित शैली का रूप ग्रहण किया।

शाही चित्रशाला (तस्वीरखाना) की स्थापना

अकबर ने चित्रकला को राजकीय संरक्षण प्रदान करते हुए आगरा तथा बाद में फतेहपुर सीकरी में शाही चित्रशाला (तस्वीरखाना) की स्थापना की। इस चित्रशाला में भारत के विभिन्न क्षेत्रों से आए हिंदू, मुस्लिम तथा फ़ारसी कलाकार एक साथ कार्य करते थे। यहाँ चित्र निर्माण एक सामूहिक प्रक्रिया के रूप में किया जाता था। सामान्यतः एक कलाकार प्रारंभिक रेखांकन करता था, दूसरा उसमें रंग भरता था और तीसरा कलाकार उसमें अलंकरण एवं अंतिम परिष्कार का कार्य करता था। इस संगठित कार्य-पद्धति ने मुगल चित्रकला को तकनीकी उत्कृष्टता और कलात्मक परिपक्वता प्रदान की।

मुगल इतिहासकार अबुल फ़ज़ल ने अपनी प्रसिद्ध कृति ‘आइन-ए-अकबरी’ में उल्लेख किया है कि अकबर स्वयं चित्रशाला का निरीक्षण करता था और कलाकारों की प्रतिभा का मूल्यांकन करता था। वह योग्य कलाकारों को उचित वेतन, पुरस्कार और सम्मान प्रदान करता था। उत्कृष्ट कलाकारों को ‘नादिर-उल-मुल्क’ तथा ‘शिरीं-कलम’ जैसी उपाधियों से सम्मानित किया जाता था। इससे स्पष्ट होता है कि अकबर चित्रकला को अत्यंत महत्त्वपूर्ण कला के रूप में देखता था।

मुगल चित्रकला का स्वरूप और विकास

अकबर के शासनकाल में मुगल चित्रकला ने अपनी प्रारंभिक फ़ारसी सीमाओं को पार कर एक स्वतंत्र शैली का रूप प्राप्त किया। आरंभिक चित्रों में ईरानी प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता था, किंतु धीरे-धीरे भारतीय कलाकारों के योगदान से इसमें राजस्थानी, अपभ्रंश और अन्य भारतीय चित्र परंपराओं के तत्व सम्मिलित होने लगे। परिणामस्वरूप चित्रों में भारतीय जीवन, प्रकृति, भावनाओं, गतिशीलता और यथार्थवाद का समावेश हुआ।

अकबर की धार्मिक सहिष्णुता और ‘सुलह-ए-कुल’ की नीति ने विभिन्न सांस्कृतिक परंपराओं के समन्वय को प्रोत्साहित किया। इसी कारण उसके काल में फ़ारसी साहित्य, भारतीय महाकाव्यों, ऐतिहासिक ग्रंथों और धार्मिक कथाओं के सचित्र संस्करण तैयार किए गए। इस प्रक्रिया ने मुगल चित्रकला को एक व्यापक सांस्कृतिक आधार प्रदान किया।

अकबर की चित्रकला में रुचि

अकबर को बचपन से ही चित्रकला में विशेष रुचि थी। वह चित्रों को प्रकृति और ईश्वर की सृष्टि को समझने का माध्यम मानता था। उसके विचार में चित्रकार अपनी कला के माध्यम से संसार की सूक्ष्मताओं को समझने और उन्हें अभिव्यक्त करने का प्रयास करता है। इसी दृष्टिकोण के कारण उसने चित्रकला को राजकीय संरक्षण दिया और इसे दरबार के एक संगठित विभाग के रूप में विकसित किया।

अकबर को विशेष रूप से ऐतिहासिक घटनाओं, वीरगाथाओं और महाकाव्यों में रुचि थी। इसलिए उसके आदेश पर रामायण, महाभारत, फ़ारसी महाकाव्यों तथा ऐतिहासिक ग्रंथों के चित्रित संस्करण तैयार किए गए। इन परियोजनाओं का उद्देश्य केवल कलात्मक सौंदर्य नहीं था, बल्कि ज्ञान और सांस्कृतिक परंपराओं का संरक्षण भी था।

प्रमुख सचित्र ग्रंथ और चित्रांकन परियोजनाएँ

अकबरकालीन चित्रकला की सबसे बड़ी उपलब्धि सचित्र पांडुलिपियों का निर्माण थी। इन ग्रंथों के माध्यम से साहित्य, इतिहास और धार्मिक कथाओं को चित्रों के माध्यम से प्रस्तुत किया गया।

तूतीनामा अकबरकाल की प्रारंभिक चित्रांकन परियोजनाओं में से एक था। यह फ़ारसी भाषा में रचित कथाओं का संग्रह है, जिसमें एक तोते द्वारा सुनाई गई नैतिक और मनोरंजक कहानियों का वर्णन मिलता है। इसमें लगभग 52 कथाएँ सम्मिलित थीं। इसके चित्रों में प्रारंभिक मुगल शैली दिखाई देती है, जिसमें फ़ारसी प्रभाव के साथ भारतीय तत्वों का समावेश प्रारंभ हो चुका था।

अकबरकालीन चित्रकला की सर्वश्रेष्ठ उपलब्धि ‘दास्तान-ए-अमीर हम्ज़ा’ (हम्ज़ानामा) थी। यह अमीर हम्ज़ा के वीरतापूर्ण और रोमांचकारी जीवन पर आधारित विशाल सचित्र ग्रंथ था। इसका निर्माण लगभग 1562 से 1577 ई. के मध्य हुआ। इसमें लगभग 1400 बड़े आकार के चित्र बनाए गए थे। इन चित्रों का निर्माण सूती कपड़े पर किया गया था और लगभग सौ कलाकारों ने मिलकर इस परियोजना को पूरा किया। हम्ज़ानामा के चित्रों में युद्ध, संघर्ष, साहस, गति, नाटकीयता और प्रकृति का अत्यंत प्रभावशाली चित्रण मिलता है। तिरछी रेखाओं, बहु-पात्रीय संयोजन और चटकीले रंगों के प्रयोग ने इन्हें विशिष्ट पहचान प्रदान की।

रज़्मनामा अकबर की सांस्कृतिक समन्वय नीति का उत्कृष्ट उदाहरण था। यह संस्कृत महाभारत का फ़ारसी अनुवाद था, जिसका सचित्र संस्करण तैयार कराया गया। इसमें युद्ध, राजदरबार, धार्मिक प्रसंगों और पात्रों की भावनाओं का प्रभावशाली चित्रण मिलता है। इसके चित्रांकन का पर्यवेक्षण मुहम्मद शरीफ़ ने किया था। यह पांडुलिपि भारतीय विषयवस्तु और मुगल शैली के समन्वय का श्रेष्ठ उदाहरण है।

अकबर ने रामायण का भी फ़ारसी अनुवाद करवाकर उसका सचित्र संस्करण तैयार कराया। इसमें राम, सीता, लक्ष्मण, हनुमान और रावण से संबंधित घटनाओं को मुगल शैली में चित्रित किया गया।

अकबरनामा अबुल फ़ज़ल द्वारा रचित अकबर के शासनकाल का आधिकारिक इतिहास था। इसके चित्रों में अकबर के युद्ध, विजय अभियान, दरबारी समारोह, शिकार और प्रशासनिक गतिविधियों का यथार्थ चित्रण मिलता है। यह तत्कालीन राजनीतिक और सामाजिक जीवन का महत्त्वपूर्ण दृश्यात्मक दस्तावेज़ है।

इसके अतिरिक्त बाबरनामा, तैमूरनामा, शाहनामा, ख़म्सा-ए-निज़ामी, अनवार-ए-सुहैली, दाराबनामा, योगवसिष्ठ, नल-दमयंती, अभिज्ञानशाकुन्तलम्, कथासरित्सागर और कृष्ण-चरित जैसे अनेक ग्रंथों के सचित्र संस्करण तैयार किए गए। इन परियोजनाओं ने भारतीय और फ़ारसी साहित्य को एक साझा सांस्कृतिक मंच प्रदान किया।

यूरोपीय प्रभाव

अकबर के शासनकाल में पुर्तगाली पादरियों के माध्यम से यूरोपीय चित्रकला का परिचय मुगल दरबार को हुआ। इसके प्रभाव से मुगल चित्रों में छाया-प्रकाश, परिप्रेक्ष्य तथा त्रि-आयामी प्रभाव जैसी तकनीकों का प्रयोग प्रारंभ हुआ। यद्यपि मुगल चित्रकला का मूल स्वरूप भारतीय-फ़ारसी ही रहा, लेकिन यूरोपीय तकनीकों ने इसमें यथार्थवाद और गहराई को बढ़ाने में सहायता की।

रंग योजना और तकनीकी विशेषताएँ

अकबरकालीन चित्रों में लाल, पीला, नीला, हरा, गुलाबी, सिंदूरी और केसरिया रंगों का व्यापक प्रयोग हुआ। स्वर्ण रंग के प्रयोग से चित्रों में राजसी वैभव और अलंकरण का प्रभाव उत्पन्न किया गया। रेखांकन अत्यंत सशक्त, सूक्ष्म और लयात्मक था। वस्त्रों की सलवटों, आभूषणों, स्थापत्य, वृक्षों, पशु-पक्षियों और प्राकृतिक दृश्यों का अत्यंत बारीकी से चित्रण किया गया।

इस काल में व्यक्ति-चित्र (शबीह) अधिक यथार्थवादी बनने लगे। चेहरे की भाव-भंगिमा, शारीरिक अनुपात और मुद्राओं को अत्यंत सूक्ष्मता से अंकित किया गया। प्रकृति का चित्रण भी मुगल कला की प्रमुख विशेषता बन गया। पर्वत, नदियाँ, वृक्ष, वनस्पतियाँ और पशु-पक्षी केवल पृष्ठभूमि तक सीमित नहीं रहे, बल्कि चित्रों के कथानक का महत्त्वपूर्ण हिस्सा बन गए।

चित्र निर्माण के लिए उच्च गुणवत्ता वाले कागज़ का प्रयोग किया जाता था। सियालकोट में निर्मित कागज़ ‘सियालकोटी’ या ‘मुगलिया कागज़’ के नाम से प्रसिद्ध था। चित्रकार की तूलिका को ‘कलम’ कहा जाता था और कलाकारों को ‘कलमकार’ कहा जाता था। तूलिकाएँ प्रायः गिलहरी या अन्य पशुओं के मुलायम बालों से बनाई जाती थीं, जिससे अत्यंत सूक्ष्म रेखांकन संभव हो पाता था।

अकबरकालीन चित्रकला का वर्गीकरण

कला इतिहासकार रायकृष्ण दास ने अकबरकालीन चित्रों को मुख्यतः चार वर्गों में विभाजित किया है। प्रथम वर्ग में फ़ारसी और मध्य एशियाई कथाओं पर आधारित चित्र आते हैं, जैसे हम्ज़ानामा और ख़म्सा-ए-निज़ामी। द्वितीय वर्ग में भारतीय कथाओं और धार्मिक ग्रंथों पर आधारित चित्र सम्मिलित हैं, जैसे रामायण, रज़्मनामा और नल-दमयंती। तृतीय वर्ग में ऐतिहासिक ग्रंथों से संबंधित चित्र आते हैं, जैसे अकबरनामा, बाबरनामा और तैमूरनामा। चतुर्थ वर्ग में व्यक्ति-चित्र और सामाजिक जीवन से संबंधित चित्र सम्मिलित हैं।

अकबरकालीन प्रमुख चित्रकार

अकबर के शासनकाल में मुगल चित्रकला ने अभूतपूर्व विकास प्राप्त किया। इसका मुख्य कारण सम्राट अकबर द्वारा स्थापित शाही चित्रशाला (तस्वीरखाना) और कलाकारों को दिया गया व्यापक राजकीय संरक्षण था। अकबर ने फ़ारसी, भारतीय तथा अन्य क्षेत्रों से आए कलाकारों को एक साथ कार्य करने का अवसर प्रदान किया, जिससे मुगल चित्रकला में विभिन्न कलात्मक परंपराओं का समन्वय हुआ। इस काल में चित्रकला केवल दरबारी मनोरंजन का साधन नहीं रही, बल्कि इतिहास, साहित्य, धर्म और तत्कालीन सामाजिक जीवन के संरक्षण का माध्यम बन गई।

मुगल इतिहासकार अबुल फ़ज़ल ने अपनी प्रसिद्ध कृति ‘आइन-ए-अकबरी’ में अकबरकालीन चित्रकारों का उल्लेख किया है और भारतीय कलाकारों की सूक्ष्म निरीक्षण क्षमता, भावाभिव्यक्ति तथा यथार्थवादी चित्रण की प्रशंसा की है। अकबर की चित्रशाला में मीर सैय्यद अली, ख्वाजा अब्दुस्समद, दसवंत, बसावन, केसू दास, मिस्किन, फ़ारुख़ बेग, सांवलदास, ताराचंद, हरिवंश, जगन्नाथ, मुकुंद, माधव, महेश और लाल जैसे अनेक प्रतिभाशाली कलाकारों ने कार्य किया।

इनमें मीर सैय्यद अली और ख्वाजा अब्दुस्समद ने फ़ारसी चित्रकला की परंपरा को भारत में स्थापित किया, जबकि दसवंत और बसावन जैसे भारतीय कलाकारों ने उसमें भारतीय जीवन, प्रकृति और भावनात्मक अभिव्यक्ति का समावेश कर इसे एक स्वतंत्र शैली का रूप प्रदान किया।

मीर सैय्यद अली

मीर सैय्यद अली मुगल चित्रकला के प्रारंभिक महान फ़ारसी कलाकारों में से एक था। वह हेरात की तैमूरी चित्रकला परंपरा से संबंधित था और प्रसिद्ध फ़ारसी चित्रकार बिहज़ाद की शैली से प्रभावित था। हुमायूँ के निर्वासन काल में ईरान में उससे भेंट हुई और 1555 ई. में हुमायूँ उसे भारत लेकर आया।

भारत आने के बाद मीर सैय्यद अली ने मुगल चित्रकला की आधारशिला मजबूत करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। उसने ख्वाजा अब्दुस्समद के साथ मिलकर शाही चित्रशाला के संचालन में योगदान दिया और दास्तान-ए-अमीर हम्ज़ा (हम्ज़ानामा) के चित्रांकन का प्रारंभिक निर्देशन किया। उसके चित्रों में फ़ारसी शैली की कोमलता, सूक्ष्म रेखांकन, संतुलित रंग योजना और सजावटी सौंदर्य दिखाई देता है। मीर सैय्यद अली की कला में हेरात शैली की विशेषताएँ स्पष्ट थीं, किंतु भारत में आने के बाद उसकी शैली में भारतीय तत्वों का भी समावेश हुआ। उसे मुगल चित्रकला का प्रथम महान गुरु माना जाता है।

ख्वाजा अब्दुस्समद शीराज़ी

ख्वाजा अब्दुस्समद शीराज़ी का जन्म ईरान के शीराज़ नगर में हुआ था। वह एक कुशल चित्रकार और सुलेखक था। हुमायूँ उसे भी ईरान से भारत लेकर आया। उसकी उत्कृष्ट कला के कारण अकबर ने उसे ‘शिरीं-कलम’ की उपाधि प्रदान की। अकबर के शासनकाल में अब्दुस्समद को शाही चित्रशाला का प्रमुख बनाया गया। उसने मीर सैय्यद अली के साथ मिलकर हम्ज़ानामा परियोजना का संचालन किया। वह केवल चित्रकार ही नहीं, बल्कि एक श्रेष्ठ शिक्षक भी था। उसके निर्देशन में अनेक भारतीय कलाकारों ने प्रशिक्षण प्राप्त किया। प्रसिद्ध चित्रकार दसवंत भी उसके शिष्यों में था। मुगल चित्रकला के संगठन, प्रशिक्षण और प्रशासनिक व्यवस्था में अब्दुस्समद का योगदान अत्यंत महत्त्वपूर्ण था।

दसवंत

दसवंत अकबरकाल का महान भारतीय चित्रकार माना जाता है। वह सामान्य परिवार से संबंधित था, किंतु उसकी असाधारण प्रतिभा से प्रभावित होकर अकबर ने उसे शाही चित्रशाला में स्थान दिया। उसने ख्वाजा अब्दुस्समद से चित्रकला की शिक्षा प्राप्त की।

दसवंत ने रज़्मनामा, रामायण और अकबरनामा जैसे महत्त्वपूर्ण ग्रंथों के चित्रांकन में योगदान दिया। उसके चित्रों में भारतीय विषयों, धार्मिक कथाओं और मानवीय भावनाओं का प्रभावशाली चित्रण मिलता है। उसकी कला में गति, भावाभिव्यक्ति और स्वाभाविकता प्रमुख विशेषताएँ थीं।

अकबर उसकी प्रतिभा से अत्यधिक प्रभावित था और उसे साम्राज्य के प्रमुख कलाकारों में स्थान दिया। यद्यपि उसका जीवन अल्पकालिक रहा, फिर भी उसने मुगल चित्रकला को भारतीय स्वरूप प्रदान करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

बसावन

बसावन अकबरकालीन मुगल चित्रकला का सर्वश्रेष्ठ और सबसे प्रतिभाशाली भारतीय कलाकार माना जाता है। अबुल फ़ज़ल ने भी उसकी कला की अत्यधिक प्रशंसा की है। वह रंग संयोजन, रेखांकन, प्रकाश-छाया, परिप्रेक्ष्य और मानवीय भावों के चित्रण में अत्यंत कुशल था।

बसावन ने अकबरनामा, रज़्मनामा और दाराबनामा जैसे ग्रंथों के चित्रांकन में योगदान दिया। उसकी प्रसिद्ध कृति ‘मजनूँ का निर्जन प्रदेश में भटकना’ मानी जाती है, जिसमें प्रकृति और मानवीय पीड़ा का अत्यंत प्रभावशाली चित्रण मिलता है।

उसने यूरोपीय चित्रकला से प्रभावित होकर छाया-प्रकाश और त्रि-आयामी प्रभाव का प्रयोग किया। उसके चित्रों में चेहरे की भाव-भंगिमा और प्राकृतिक दृश्यों का यथार्थ चित्रण मिलता है। इस कारण उसे मुगल चित्रकला के महानतम कलाकारों में गिना जाता है।

केसू दास (केसू)

केसू दास अकबरकाल का प्रसिद्ध चित्रकार था। वह व्यक्ति-चित्र (शबीह), प्राकृतिक दृश्यों और रंग-संयोजन में दक्ष था। उसके चित्रों में यथार्थवाद और रंगों की गहराई दिखाई देती है। उसने अनेक ऐतिहासिक और साहित्यिक ग्रंथों के चित्रांकन में योगदान दिया।

मिस्किन

मिस्किन अकबर की चित्रशाला का प्रमुख कलाकार था। वह विशेष रूप से पशु-पक्षियों और वन्यजीवन के चित्रण में निपुण था। उसके चित्रों में जीव-जंतुओं का अत्यंत स्वाभाविक और सूक्ष्म अंकन मिलता है। प्रकृति के वैज्ञानिक निरीक्षण और यथार्थवादी प्रस्तुति के कारण उसे विशेष स्थान प्राप्त हुआ।

फ़ारुख़ बेग

फ़ारुख़ बेग मूलतः फ़ारसी परंपरा का कलाकार था। उसने अकबर के दरबार में कार्य किया और बाद में जहाँगीर के समय भी सक्रिय रहा। उसके चित्रों में फ़ारसी शैली की परिष्कृत रेखाएँ, सुंदर रंग-संतुलन और दरबारी सौंदर्य दिखाई देता है। वह विशेष रूप से व्यक्ति-चित्रों और राजकीय दृश्यों के निर्माण में कुशल था।

अन्य प्रमुख चित्रकार

मुकुंद ने धार्मिक और ऐतिहासिक विषयों पर आधारित चित्रों में योगदान दिया। उसके चित्रों में भारतीय जीवन और सामाजिक वातावरण का सुंदर चित्रण मिलता है। माधव ने सचित्र पांडुलिपियों के निर्माण में भाग लिया। उसकी शैली में सूक्ष्म रेखांकन और संतुलित रंग योजना दिखाई देती है। महेश अपने संतुलित मानवीय चित्रण और सजावटी शैली के लिए प्रसिद्ध था। उसने अनेक धार्मिक और ऐतिहासिक चित्र बनाए। जगन्नाथ ने दरबारी जीवन, धार्मिक प्रसंगों और व्यक्ति-चित्रों के निर्माण में योगदान दिया। उसकी शैली में भारतीय भावनात्मकता स्पष्ट दिखाई देती है। हरिवंश ने धार्मिक और पौराणिक विषयों पर आधारित चित्र बनाए, जिनमें भारतीय कथात्मक शैली और मुगल तकनीक का सुंदर समन्वय मिलता है।

सांवलदास ने विभिन्न सचित्र ग्रंथों और दरबारी चित्रों में सहयोग दिया। उसके चित्रों में आकर्षक रंगों और सूक्ष्म रेखांकन का प्रयोग मिलता है। ताराचंद ने ऐतिहासिक घटनाओं, धार्मिक कथाओं और व्यक्ति-चित्रों के निर्माण में योगदान दिया। उसकी कला में भारतीय विषयवस्तु और मुगल शैली का संतुलित मेल दिखाई देता है।

लाल भी अकबरकालीन चित्रशाला का प्रमुख कलाकार था। उसने अनेक पांडुलिपियों के चित्रांकन में योगदान दिया और उसके चित्रों में सूक्ष्म रेखांकन तथा सजावटी सौंदर्य मिलता है।

अकबरकालीन चित्रकारों का महत्त्व

अकबरकालीन चित्रकारों की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने फ़ारसी चित्रकला की तकनीकी उत्कृष्टता को भारतीय विषयवस्तु, प्रकृति, भावाभिव्यक्ति और यथार्थवादी दृष्टिकोण के साथ समन्वित किया। शाही चित्रशाला में सामूहिक कार्य-पद्धति के माध्यम से उन्होंने सचित्र पांडुलिपियों की ऐसी समृद्ध परंपरा विकसित की, जिसने आगे चलकर जहाँगीर और शाहजहाँ के शासनकाल में मुगल चित्रकला को उसके चरम उत्कर्ष तक पहुँचाया। इन कलाकारों के कारण ही मुगल चित्रकला भारतीय कला-इतिहास की सर्वाधिक परिष्कृत, प्रभावशाली और विश्वविख्यात चित्रशैलियों में सम्मिलित हुई।

जहाँगीरकालीन मुगल चित्रकला (1605–1627 ई.)

1605 ई. में अकबर की मृत्यु के पश्चात् उसका पुत्र जहाँगीर मुगल साम्राज्य के सिंहासन पर बैठा। वह विद्वान, सहृदय, प्रकृति-प्रेमी तथा चित्रकला का अत्यंत उत्कृष्ट पारखी था। उसके शासनकाल (1605–1627 ई.) को मुगल चित्रकला का स्वर्णयुग अथवा चरमोत्कर्ष का काल माना जाता है। जहाँ अकबर के समय चित्रकला का व्यापक संगठन और विस्तार हुआ था, वहीं जहाँगीर के समय उसमें कलात्मक परिपक्वता, यथार्थवाद तथा तकनीकी उत्कृष्टता का विकास हुआ।

प्रारंभिक वर्षों में अकबरकालीन शैली का अनुसरण किया गया, किंतु शीघ्र ही एक स्वतंत्र जहाँगीरकालीन शैली विकसित हुई। इस शैली में प्रकृति, पशु-पक्षियों, पुष्पों, व्यक्ति-चित्रों तथा मानवीय भावों का अत्यंत सूक्ष्म एवं वैज्ञानिक अध्ययन दिखाई देता है। जहाँगीर स्वयं चित्रकला का गहन ज्ञाता था और उसका दावा था कि वह किसी चित्र को देखकर यह पहचान सकता है कि उसका कौन-सा भाग किस चित्रकार ने बनाया है।

जहाँगीर का चित्रकला संरक्षण

जहाँगीर ने चित्रकला को राजकीय संरक्षण प्रदान किया और आगरा स्थित शाही चित्रशाला का पुनर्गठन किया। चित्रशाला के प्रमुख आक़ा रज़ा (आक़ा रज़ा हेराती) थे, जिनके नेतृत्व में अनेक श्रेष्ठ कलाकार कार्य करते थे। उसने चित्रकारों को केवल दरबारी विषयों तक सीमित न रखकर प्रकृति, पशु-पक्षियों, वनस्पतियों तथा मानवीय भावों का प्रत्यक्ष अध्ययन करने के लिए प्रेरित किया।

जहाँगीर की आत्मकथा ‘तुज़ुक-ए-जहाँगीरी’ से उसकी कलात्मक दृष्टि, सौंदर्यबोध तथा चित्रकला के प्रति उसकी गहरी रुचि का स्पष्ट परिचय मिलता है। वह समय-समय पर चित्रशाला का निरीक्षण करता था और कलाकारों को उनकी योग्यता के अनुसार सम्मानित करता था।

चित्रकला की नई दिशा

जहाँगीर के समय मुगल चित्रकला में एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुआ। अकबरकाल में जिन सचित्र ग्रंथों और पांडुलिपियों का निर्माण प्रमुख था, उनकी अपेक्षा इस काल में व्यक्ति-चित्र (शबीह), प्राकृतिक दृश्य तथा स्वतंत्र चित्रों को अधिक महत्त्व दिया जाने लगा।

चित्रों में सम्राट, राजकुमारों, अमीरों, सूफ़ी संतों, विदेशी राजदूतों तथा विशिष्ट व्यक्तियों के यथार्थ चित्र बनाए गए। प्रकृति, पशु-पक्षियों, दुर्लभ जीवों, पुष्पों तथा वृक्षों का वैज्ञानिक अध्ययन इस काल की सबसे विशिष्ट उपलब्धि बन गया।

यूरोपीय प्रभाव एवं भारतीयता

अकबर के समय आरंभ हुआ यूरोपीय चित्रकला का प्रभाव जहाँगीर के शासनकाल में और अधिक स्पष्ट हो गया। जेसुइट मिशनरियों द्वारा लाए गए चित्रों और उत्कीर्णनों से प्रेरित होकर कलाकारों ने छाया-प्रकाश, परिप्रेक्ष्य तथा त्रि-आयामी प्रभाव का सफल प्रयोग किया।

यद्यपि यूरोपीय तकनीकों का प्रभाव बढ़ा, फिर भी इस काल में मुगल चित्रकला फ़ारसी प्रभाव से काफी हद तक मुक्त होकर अधिक भारतीय और यथार्थवादी बन गई। कला इतिहासकार पर्सी ब्राउन के अनुसार जहाँगीरकाल में मुगल चित्रकला ने अपनी स्वतंत्र पहचान स्थापित कर ली थी।

जहाँगीरकालीन चित्रों की विषय-वस्तु

जहाँगीरकालीन चित्रकला की विषय-वस्तु अत्यंत व्यापक और विविधतापूर्ण थी। इस काल में अकबरकालीन ऐतिहासिक एवं ग्रंथ-चित्रण की परंपरा की अपेक्षा स्वतंत्र चित्रों, व्यक्ति-चित्रों तथा प्राकृतिक विषयों को अधिक महत्त्व दिया गया। जहाँगीर स्वयं प्रकृति और कला का महान पारखी था, इसलिए उसके समय में चित्रकारों ने सूक्ष्म अवलोकन और यथार्थवादी शैली को अपनाया।

इस काल में सम्राट जहाँगीर तथा शाही परिवार के सदस्यों के व्यक्ति-चित्र (शबीह) प्रमुख विषय रहे। चित्रकारों ने सम्राट, राजकुमारों, दरबारियों तथा उच्च पदाधिकारियों के चेहरे, वेशभूषा, आभूषण और व्यक्तित्व का अत्यंत सूक्ष्म एवं यथार्थ चित्रण किया। इन चित्रों में व्यक्तियों की भाव-भंगिमा और स्वभाव को भी प्रभावशाली ढंग से प्रदर्शित किया गया।

जहाँगीरकालीन चित्रों में दरबार और राजकीय समारोहों का भी प्रमुख स्थान था। इनमें सम्राट का दरबार लगाना, अमीरों एवं दरबारियों से भेंट करना, राजकीय उत्सव, पुरस्कार वितरण तथा शाही आयोजनों के दृश्य अत्यंत कलात्मक ढंग से चित्रित किए गए।

शिकार एवं आखेट के दृश्य भी इस काल की चित्रकला के महत्त्वपूर्ण विषय थे। हाथी, घोड़े, शेर, चीते तथा अन्य जंगली पशुओं के शिकार के दृश्यों में गति, शक्ति और रोमांच का प्रभावशाली चित्रण मिलता है। इन चित्रों में पशुओं की शारीरिक संरचना और प्राकृतिक व्यवहार का सूक्ष्म अध्ययन दिखाई देता है।

युद्ध एवं विजय यात्राओं से संबंधित चित्रों का भी निर्माण हुआ। इनमें सैनिक अभियान, युद्ध के दृश्य, विजयी जुलूस तथा सम्राट की सैन्य शक्ति को प्रदर्शित करने वाले चित्र शामिल थे। इन चित्रों के माध्यम से मुगल साम्राज्य की शक्ति और प्रतिष्ठा को दर्शाया गया।

जुलूसों तथा राजनयिक भेंटों का चित्रण भी जहाँगीरकालीन चित्रकला की प्रमुख विशेषता थी। विदेशी दूतों का स्वागत, विभिन्न शासकों के साथ मुलाकात तथा राजनीतिक संबंधों से जुड़े प्रसंगों को चित्रों में स्थान दिया गया।

इस काल में सूफ़ी संतों, विद्वानों और आध्यात्मिक व्यक्तियों के चित्र भी बनाए गए। इन चित्रों में संतों की गंभीरता, आध्यात्मिक भाव तथा विद्वत्ता को अत्यंत प्रभावशाली रूप में प्रस्तुत किया गया।

प्रकृति-चित्रण जहाँगीरकालीन चित्रकला की सबसे विशिष्ट उपलब्धियों में से एक था। चित्रकारों ने पुष्पों, वृक्षों, वनस्पतियों और प्राकृतिक दृश्यों का अत्यंत सूक्ष्म एवं वैज्ञानिक अध्ययन करके चित्र बनाए। विशेष रूप से उस्ताद मंसूर ने दुर्लभ पशु-पक्षियों और वनस्पतियों के चित्रण में अद्वितीय ख्याति प्राप्त की।

दुर्लभ पशु-पक्षियों का वैज्ञानिक चित्रण इस काल की प्रमुख विशेषता थी। विदेशी तथा भारतीय जीव-जंतुओं, जैसे सारस, मोर, टर्की, चीता आदि के चित्र अत्यंत वास्तविक रूप में बनाए गए। इन चित्रों में कलाकारों की निरीक्षण शक्ति और प्रकृति के प्रति रुचि स्पष्ट दिखाई देती है।

जहाँगीरकालीन चित्रों में ईसाई विषयों और यूरोपीय प्रसंगों का भी समावेश हुआ। जेसुइट मिशनरियों द्वारा लाए गए यूरोपीय चित्रों और उत्कीर्णनों से प्रभावित होकर कलाकारों ने ईसाई धार्मिक विषयों, मदर मैरी, ईसा मसीह तथा यूरोपीय शैली के प्रतीकों का चित्रण किया।

प्राकृतिक दृश्यों और उद्यानों का चित्रण भी इस काल में लोकप्रिय हुआ। बाग-बगीचे, झरने, नदियाँ, पर्वत तथा शांत प्राकृतिक वातावरण को अत्यंत सौंदर्यपूर्ण ढंग से चित्रित किया गया। इससे चित्रों में सौम्यता और जीवंतता का विकास हुआ।

जहाँगीर के समय ग्रंथ-चित्रण की परंपरा अपेक्षाकृत कम हो गई और स्वतंत्र चित्रों तथा एल्बमों (मुरक्का) का विकास अधिक हुआ। इन एल्बमों में सम्राट, दरबारियों, संतों, प्रकृति तथा पशु-पक्षियों के उत्कृष्ट चित्र संकलित किए जाते थे। इस प्रकार जहाँगीरकालीन चित्रकला विषय-वस्तु की विविधता, यथार्थवाद और कलात्मक परिष्कार के कारण मुगल चित्रकला के इतिहास में विशिष्ट स्थान रखती है।

जहाँगीरकालीन चित्रशैली की विशेषताएँ

जहाँगीरकालीन चित्रकला में यथार्थवाद अपने सर्वोच्च स्तर पर पहुँचा। चित्रों में चेहरे की भाव-भंगिमा, शरीर की बनावट, वस्त्रों की सलवटें तथा प्राकृतिक वातावरण का अत्यंत सूक्ष्म चित्रण मिलता है। चित्रों में हल्के एवं संतुलित रंगों का प्रयोग किया गया। गुलाबी, सफेद, सुनहरा तथा रजत रंगों का विशेष उपयोग हुआ। रेखांकन अत्यंत महीन, नियंत्रित तथा सजीव है। अधिकांश व्यक्ति-चित्र एक-चश्म (प्रोफ़ाइल) शैली में बनाए गए, किंतु उनमें भावाभिव्यक्ति अत्यंत स्वाभाविक है।

इस काल में चित्रों के चारों ओर पुष्पों, पक्षियों तथा ज्यामितीय अलंकरणों से युक्त अत्यंत आकर्षक हाशियों का निर्माण किया जाने लगा। कई बार हाशियों की सजावट स्वयं मुख्य चित्र जितनी कलात्मक प्रतीत होती है। छाया उत्पन्न करने के लिए ‘ख़त-परदाज़’ (महीन रेखाओं द्वारा छाया) तथा ‘दाना-परदाज़’ (बिंदुओं द्वारा छाया) जैसी उन्नत तकनीकों का प्रयोग भी किया गया।

मुरक्का (एल्बम) परंपरा का विकास

जहाँगीरकाल में मुरक्का शैली का विशेष विकास हुआ। इन एल्बमों में श्रेष्ठ व्यक्ति-चित्र, प्राकृतिक चित्र तथा सुलेख को अत्यंत सुंदर ढंग से संकलित किया जाता था। इसी काल में छोटे आकार के चित्र बनाने की परंपरा भी लोकप्रिय हुई, जिन्हें पगड़ी, आभूषण या व्यक्तिगत संग्रह में सुरक्षित रखा जा सकता था।

जहाँगीरकालीन प्रमुख चित्रकार

जहाँगीर के शासनकाल में मुगल चित्रकला अपने चरम उत्कर्ष पर पहुँची। सम्राट स्वयं चित्रकला का महान पारखी था और कलाकारों की प्रतिभा को पहचानकर उन्हें विशेष सम्मान प्रदान करता था। उसके संरक्षण में अनेक प्रतिभाशाली चित्रकारों ने कार्य किया, जिन्होंने व्यक्ति-चित्रण, प्रकृति-चित्रण तथा यथार्थवादी शैली को नई ऊँचाइयाँ प्रदान कीं। जहाँगीरकालीन प्रमुख चित्रकारों में आक़ा रज़ा, अबुल हसन, उस्ताद मंसूर, विशनदास, गोवर्धन, मनोहर, दौलत, फ़ारुख़ बेग और मिश्किन उल्लेखनीय हैं।

आक़ा रज़ा (आक़ा रज़ा हेराती) जहाँगीर की चित्रशाला के प्रमुख कलाकारों में से एक थे। उन्होंने शाही चित्रशाला के संगठन और कलाकारों के मार्गदर्शन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी कला में फ़ारसी परंपरा के साथ भारतीय तत्वों का सुंदर समन्वय दिखाई देता है।

अबुल हसन जहाँगीर का सर्वाधिक प्रिय चित्रकार था। उसकी अद्भुत प्रतिभा से प्रभावित होकर जहाँगीर ने उसे ‘नादिर-उज़्-ज़माँ’ की उपाधि प्रदान की। उसने सम्राट के अनेक उत्कृष्ट व्यक्ति-चित्र बनाए। चेहरे की सूक्ष्म भाव-भंगिमाओं, राजसी व्यक्तित्व और मनोवैज्ञानिक अभिव्यक्ति के चित्रण में उसे विशेष दक्षता प्राप्त थी।

उस्ताद मंसूर जहाँगीरकाल का महान प्राकृतिक चित्रकार माना जाता है। उसे ‘नादिर-उल-असर’ की उपाधि दी गई थी। उसने दुर्लभ पशु-पक्षियों, विदेशी जीवों और वनस्पतियों का अत्यंत सूक्ष्म एवं वैज्ञानिक चित्रण किया। साइबेरियन सारस, टर्की, मोर, चीता तथा विभिन्न दुर्लभ पक्षियों के उसके चित्र प्राकृतिक अध्ययन की उत्कृष्ट मिसाल हैं।

मुगल चित्रकला (Mughal Painting)
दुर्लभ पशु-पक्षियों, विदेशी जीवों और वनस्पतियों का अत्यंत सूक्ष्म एवं वैज्ञानिक चित्रण

विशनदास (बिसनदास) व्यक्ति-चित्र निर्माण में अत्यंत कुशल था। जहाँगीर ने उसे ईरान भेजा, जहाँ उसने शाह अब्बास और उसके दरबारियों के यथार्थ चित्र बनाए। उसके चित्रों में स्वाभाविकता और सूक्ष्म निरीक्षण शक्ति दिखाई देती है। गोवर्धन ने साधुओं, तपस्वियों, सामान्य व्यक्तियों तथा भारतीय समाज के विभिन्न वर्गों का जीवंत चित्रण किया। उसके चित्रों में मानवीय भावनाओं और मनोवैज्ञानिक गहराई का सुंदर समन्वय मिलता है। मनोहर और दौलत भी जहाँगीरकाल के प्रसिद्ध चित्रकार थे। मनोहर ने दरबारी दृश्यों और राजपरिवार के व्यक्ति-चित्रों में विशेष दक्षता प्राप्त की। दौलत ने अपने समकालीन चित्रकारों के सामूहिक चित्र बनाकर मुगल चित्रकला में विशेष योगदान दिया। फ़ारुख़ बेग मूलतः फ़ारसी परंपरा का कलाकार था। उसके चित्रों में फ़ारसी सौंदर्यबोध और मुगल यथार्थवाद का उत्कृष्ट मेल दिखाई देता है। उसने अनेक प्रतिष्ठित व्यक्तियों के चित्र बनाए।

इस प्रकार जहाँगीरकालीन चित्रकारों ने यथार्थवाद, प्रकृति-चित्रण और व्यक्ति-चित्रण को नई दिशा प्रदान की तथा मुगल चित्रकला को कलात्मक पूर्णता के उच्चतम स्तर तक पहुँचाया।

जहाँगीरकालीन प्रसिद्ध चित्र

जहाँगीरकाल में अनेक उत्कृष्ट स्वतंत्र चित्रों का निर्माण हुआ, जिनमें सम्राट के व्यक्तित्व, राजनीतिक उपलब्धियों, धार्मिक दृष्टिकोण तथा प्रकृति-प्रेम का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। इन चित्रों में यथार्थवाद, सूक्ष्म रेखांकन और प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति का सुंदर समन्वय मिलता है।

जहाँगीर का शाह अब्बास का स्वागत करते हुए चित्र इस काल की प्रसिद्ध कृतियों में से एक है। इस चित्र में मुगल सम्राट जहाँगीर और ईरान के शासक शाह अब्बास के मध्य मैत्रीपूर्ण संबंधों को प्रदर्शित किया गया है। चित्र में दोनों शासकों की भव्य वेशभूषा, राजसी गरिमा और राजनीतिक प्रतिष्ठा को अत्यंत सूक्ष्मता से दर्शाया गया है। जहाँगीर द्वारा वर्जिन मेरी का चित्र धारण किए हुए चित्र भी इस काल की उल्लेखनीय कृति है। इसमें यूरोपीय ईसाई कला के प्रभाव को देखा जा सकता है। यह चित्र जहाँगीर की धार्मिक सहिष्णुता तथा यूरोपीय कला के प्रति उसकी रुचि को प्रदर्शित करता है। मलिक अम्बर के कटे हुए सिर को लात मारते हुए जहाँगीर का प्रतीकात्मक चित्र भी प्रसिद्ध है। इस चित्र में जहाँगीर की राजनीतिक विजय और शत्रुओं पर प्रभुत्व को प्रतीकात्मक रूप से प्रस्तुत किया गया है। इसमें सम्राट की शक्ति और साम्राज्यवादी भावना को दर्शाने का प्रयास किया गया है।

जहाँगीर के दरबार के भव्य दृश्यों का चित्रण भी इस काल की प्रमुख उपलब्धियों में शामिल है। इन चित्रों में सम्राट को दरबारियों, अमीरों और राजकीय अधिकारियों से घिरा हुआ दिखाया गया है। इनसे मुगल दरबार की भव्यता, अनुशासन और शाही जीवन का परिचय मिलता है। दुर्लभ पशु-पक्षियों तथा पुष्पों के प्राकृतिक अध्ययन पर आधारित चित्र भी जहाँगीरकालीन चित्रकला की विशेष उपलब्धि हैं। उस्ताद मंसूर जैसे चित्रकारों ने विभिन्न पशु-पक्षियों और वनस्पतियों का अत्यंत सूक्ष्म एवं वैज्ञानिक चित्रण किया। इन चित्रों में प्रकृति के प्रति जहाँगीर की गहरी रुचि और कलाकारों की निरीक्षण क्षमता स्पष्ट दिखाई देती है।

जहाँगीरकालीन चित्रकला की प्रमुख विशेषताएँ

जहाँगीर का शासनकाल मुगल चित्रकला के इतिहास में स्वर्णयुग अथवा चरमोत्कर्ष का काल माना जाता है। जहाँगीर स्वयं कला, साहित्य और प्रकृति का अत्यंत ज्ञाता था। उसने चित्रकला को केवल राजकीय प्रतिष्ठा का साधन न मानकर सौंदर्य, वैज्ञानिक निरीक्षण और यथार्थ अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया। उसके समय में अकबरकालीन चित्रकला की कथात्मक परम्परा में परिवर्तन आया और स्वतंत्र चित्रों, व्यक्ति-चित्रों तथा प्राकृतिक विषयों को विशेष महत्त्व प्राप्त हुआ।

जहाँगीरकालीन चित्रकला की सबसे प्रमुख विशेषता व्यक्ति-चित्र (शबीह) का विकास था। अकबरकाल में जहाँ बड़े सचित्र ग्रंथों के निर्माण पर अधिक बल दिया गया था, वहीं जहाँगीर के समय सम्राट, शाही परिवार, दरबारियों, अमीरों और विद्वानों के वास्तविक चित्र बनाने की परम्परा अत्यधिक विकसित हुई। चित्रकारों ने व्यक्तियों की मुखाकृति, भाव-भंगिमा, वेशभूषा और व्यक्तित्व का अत्यंत सूक्ष्म एवं यथार्थ चित्रण किया। जहाँगीर स्वयं चित्र देखकर कलाकार की पहचान करने की क्षमता रखता था।

इस काल में प्रकृति-चित्रण को अभूतपूर्व प्रोत्साहन मिला। जहाँगीर को पशु-पक्षियों, फूलों, वृक्षों और वनस्पतियों के अध्ययन में विशेष रुचि थी। चित्रकारों ने प्रकृति को केवल पृष्ठभूमि के रूप में नहीं, बल्कि चित्र के मुख्य विषय के रूप में प्रस्तुत किया। उस्ताद मंसूर जैसे कलाकारों ने दुर्लभ पशु-पक्षियों और विदेशी जीवों का अत्यंत वैज्ञानिक एवं सूक्ष्म चित्रण किया। उनके बनाए सारस, टर्की, मोर, चीता आदि के चित्र प्राकृतिक अध्ययन की दृष्टि से उत्कृष्ट माने जाते हैं।

जहाँगीरकालीन चित्रकला में छाया-प्रकाश, परिप्रेक्ष्य और त्रि-आयामी प्रभाव का सफल प्रयोग हुआ। यूरोपीय चित्रकला के प्रभाव के कारण कलाकारों ने प्रकाश और छाया के माध्यम से चित्रों में गहराई और वास्तविकता उत्पन्न करने का प्रयास किया। इससे चित्र अधिक जीवंत और प्राकृतिक दिखाई देने लगे। यूरोपीय कला के प्रभाव से चित्रों में यथार्थवादी दृष्टिकोण का विकास हुआ।

जहाँगीरकाल में फ़ारसी प्रभाव धीरे-धीरे कम हुआ और भारतीय शैली की विशेषताओं का विकास हुआ। प्रारंभिक मुगल चित्रकला में ईरानी शैली की कोमलता और सजावटी प्रवृत्ति प्रमुख थी, किंतु जहाँगीर के समय भारतीय प्रकृति, भावनाओं और यथार्थ जीवन का अधिक प्रभाव दिखाई देने लगा। इस प्रकार मुगल चित्रकला में भारतीय तत्वों की प्रधानता बढ़ी।

इस काल में मुरक्का (एल्बम) शैली का विशेष विकास हुआ। मुरक्कों में सम्राट, दरबारियों, संतों, पशु-पक्षियों और प्राकृतिक दृश्यों के स्वतंत्र चित्रों को संकलित किया जाता था। इन एल्बमों के चारों ओर बने हाशियों (Borders) को पुष्पों, बेल-बूटों और ज्यामितीय आकृतियों से अत्यंत आकर्षक ढंग से सजाया जाता था। हाशियों की सजावट भी चित्रकला का महत्त्वपूर्ण भाग बन गई।

जहाँगीरकालीन चित्रों में अत्यंत सूक्ष्म रेखांकन और नियंत्रित रंग-योजना देखने को मिलती है। कलाकारों ने महीन तूलिका द्वारा चेहरे के भाव, वस्त्रों की सलवटों, आभूषणों और प्राकृतिक तत्वों का बारीकी से चित्रण किया। हल्के गुलाबी, सफेद, सुनहरे और रजत रंगों का संतुलित प्रयोग चित्रों में सौम्यता और आकर्षण उत्पन्न करता था।

इस काल में एक-चश्म मुखाकृतियों (प्रोफाइल) का विशेष प्रचलन था। इन चित्रों में चेहरे की बनावट, आँखों की अभिव्यक्ति और व्यक्तित्व को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया। नारी-चित्रों तथा स्वतंत्र चित्रों की संख्या में भी वृद्धि हुई। स्त्रियों के सौंदर्य, वेशभूषा और भावनात्मक पक्ष को कलात्मक रूप से प्रदर्शित किया गया।

जहाँगीरकालीन चित्रों के प्रमुख विषयों में दरबार, शिकार, राजकीय जुलूस, राजनयिक भेंट, उत्सव, धार्मिक व्यक्ति तथा सूफ़ी संतों के चित्र शामिल थे। इन सभी विषयों का चित्रण अत्यंत यथार्थ और संतुलित रूप में किया गया।

इस प्रकार जहाँगीरकालीन चित्रकला ने यथार्थवाद, प्राकृतिक अध्ययन, सूक्ष्म रेखांकन, भावाभिव्यक्ति और तकनीकी परिष्कार की दृष्टि से मुगल चित्रकला को सर्वोच्च स्थान प्रदान किया। इसी कारण जहाँगीर का शासनकाल भारतीय चित्रकला इतिहास में मुगल चित्रकला के स्वर्णिम युग के रूप में प्रतिष्ठित है।

शाहजहाँकालीन मुगल चित्रकला (1628–1658 ई.)

1628 ई. में शाहजहाँ मुगल साम्राज्य के सिंहासन पर बैठा। वह कला का महान संरक्षक था, किंतु उसकी विशेष रुचि स्थापत्य कला में थी। ताजमहल, लाल किला तथा जामा मस्जिद जैसी स्थापत्य कृतियाँ उसकी कलात्मक अभिरुचि का सर्वोत्तम प्रमाण हैं। यद्यपि शाहजहाँ का नाम मुख्यतः वास्तुकला के कारण प्रसिद्ध है, फिर भी उसके शासनकाल में मुगल चित्रकला का विकास निरंतर जारी रहा। इस काल में चित्रकला ने तकनीकी दृष्टि से अत्यधिक परिष्कार प्राप्त किया, किंतु विषय-वस्तु और शैली में जहाँगीरकाल की अपेक्षा स्पष्ट परिवर्तन दिखाई देता है।

जहाँगीरकाल की स्वाभाविकता, प्रकृतिवाद और प्रयोगधर्मिता के स्थान पर शाहजहाँकालीन चित्रकला में राजसी वैभव, अलंकरण, औपचारिकता, संतुलित रचना तथा शिल्प-कौशल को अधिक महत्त्व दिया गया। चित्रों में सम्राट को आदर्श शासक, दिव्य तेज से युक्त तथा राजकीय गरिमा के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया। इसी कारण अधिकांश व्यक्ति-चित्रों में शाहजहाँ के सिर के पीछे प्रभामंडल अंकित किया गया है, जो उसकी दैवी सत्ता एवं राजकीय प्रतिष्ठा का प्रतीक था।

चित्रशाला एवं राजकीय संरक्षण

शाहजहाँ ने अपने पूर्ववर्तियों की भाँति शाही चित्रशाला का संरक्षण जारी रखा। चित्रशाला में अनेक भारतीय तथा फ़ारसी कलाकार कार्यरत थे, जो सामूहिक रूप से सचित्र ग्रंथों, व्यक्ति-चित्रों तथा दरबारी दृश्यों का निर्माण करते थे। यद्यपि चित्रकला को संरक्षण मिलता रहा, फिर भी सम्राट की प्राथमिकता स्थापत्य कला होने के कारण चित्रकला का विकास अपेक्षाकृत सीमित गति से हुआ।

इस काल में चित्रकला मुख्यतः शाही दरबार तक सीमित हो गई। कलाकारों का प्रमुख कार्य सम्राट, शहज़ादों, अमीरों तथा राजकीय समारोहों का चित्रण करना था। फलतः धार्मिक एवं पौराणिक विषयों की अपेक्षा दरबारी जीवन, शाही वैभव और औपचारिक अवसरों का चित्रण अधिक होने लगा।

विषय-वस्तु एवं चित्रांकन

शाहजहाँकालीन चित्रों में राजकीय वैभव, दरबारी सभाएँ, राजदूतों का स्वागत, शाही विवाह, आखेट (शिकार), जुलूस, राजकीय समारोह तथा प्रतिष्ठित व्यक्तियों के व्यक्ति-चित्र (शबीह) प्रमुख विषय रहे। सम्राट को प्रायः बहुमूल्य वस्त्रों, आभूषणों तथा सिंहासन पर विराजमान अवस्था में चित्रित किया गया है।

इस काल में यवन सुंदरियों, रंगमहल, विलासी जीवन तथा कुछ ईसाई विषयों का भी चित्रण हुआ। यूरोपीय प्रभाव के कारण चित्रों में गहराई, छाया-प्रकाश तथा पृष्ठभूमि में धुँधले नगर-दृश्यों का अंकन बढ़ा, जिससे चित्र अधिक यथार्थवादी प्रतीत होते हैं। एकल व्यक्ति-चित्रों में दूर स्थित भवनों, उद्यानों अथवा प्राकृतिक दृश्यों को हल्के रंगों में अंकित कर त्रि-आयामी प्रभाव उत्पन्न किया जाता था।

प्रमुख सचित्र ग्रंथ एवं चित्र

शाहजहाँकालीन चित्रकला की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण सचित्र कृति ‘पादशाहनामा’ है, जिसमें शाहजहाँ के शासनकाल के प्रारंभिक वर्षों की प्रमुख घटनाओं, राजकीय समारोहों तथा दरबारी जीवन का अत्यंत भव्य चित्रण किया गया है। इसके अतिरिक्त ‘गुलिस्तान’, ‘बोस्तान’ तथा ‘शाहनामा’ जैसी सचित्र पांडुलिपियाँ भी उल्लेखनीय हैं।

इस काल के प्रसिद्ध चित्रों में दरबारियों के मध्य सिंहासन पर विराजमान शाहजहाँ, सूफ़ी संतों के साथ शाहजहाँ, अकबर एवं जहाँगीर की उपस्थिति में शाहजहाँ, तथा शाहजहाँ के राजसी व्यक्ति-चित्र विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इन चित्रों में सम्राट की गरिमा, शाही वैभव तथा औपचारिकता का उत्कृष्ट चित्रण मिलता है।

तकनीकी विकास

शाहजहाँकालीन चित्रकला तकनीकी दृष्टि से अत्यंत परिपक्व थी। चित्रों में सूक्ष्म रेखांकन, मीनाकारी जैसी बारीकी, रंगों का संतुलित प्रयोग तथा स्वर्णलेप का व्यापक उपयोग किया गया। चौड़े एवं अलंकृत हाशिए तथा पुस्तकों के आकर्षक आवरण (बयाज़) इस काल की विशिष्ट विशेषताएँ हैं।

यूरोपीय कला के प्रभाव से छाया-प्रकाश, परिप्रेक्ष्य तथा त्रि-आयामी प्रभाव का प्रयोग और अधिक विकसित हुआ। यद्यपि चित्रों में भावाभिव्यक्ति अपेक्षाकृत कम दिखाई देती है, फिर भी उनकी कलात्मक गुणवत्ता, शिल्प-कौशल और सजावटी सौंदर्य अत्यंत उच्च कोटि का है।

स्याह-कलम शैली

शाहजहाँ के शासनकाल में ‘स्याह-कलम’ शैली का विशेष विकास हुआ। इस शैली में कागज़ पर सरेस, फिटकरी तथा अन्य पदार्थों का लेप लगाने के पश्चात् मुख्यतः काले रंग से अत्यंत सूक्ष्म रेखांकन किया जाता था। केवल होंठों अथवा कुछ विशेष भागों पर हल्के रंगों का सीमित प्रयोग किया जाता था। इस शैली की प्रमुख विशेषता अत्यंत महीन रेखांकन, दाढ़ी एवं बालों का सूक्ष्म अंकन तथा उत्कृष्ट शिल्प-कौशल था।

प्रमुख चित्रकार

शाहजहाँकालीन चित्रकला के प्रमुख कलाकारों में बिचित्र, चितरमन, मीर हाशिम, मुहम्मद नादिर, फ़कीरुल्लाह, अनूप, कल्याणदास, होनहार तथा लालचंद उल्लेखनीय हैं।

बिचित्र इस काल का सर्वाधिक प्रसिद्ध चित्रकार था। उसने शाहजहाँ के अनेक उत्कृष्ट व्यक्ति-चित्र तथा दरबारी दृश्य निर्मित किए। उसकी रचनाओं में सूक्ष्म रेखांकन, रंग-संतुलन तथा राजसी गरिमा का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है।

चितरमन ने शाही समारोहों तथा दरबारी जीवन के चित्रों में विशेष दक्षता प्राप्त की। उसके चित्रों में संतुलित संरचना तथा आकर्षक रंग-योजना देखने को मिलती है।

मीर हाशिम, मुहम्मद नादिर तथा फ़कीरुल्लाह भी उत्कृष्ट दरबारी चित्रकार थे। इन कलाकारों ने व्यक्ति-चित्रों, राजकीय आयोजनों तथा सचित्र ग्रंथों के निर्माण में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। अनूप, कल्याणदास, होनहार तथा लालचंद ने भी मुगल चित्रकला की तकनीकी उत्कृष्टता को आगे बढ़ाया।

शाहजहाँकालीन चित्रकला की प्रमुख विशेषताएँ

शाहजहाँकालीन चित्रकला में तकनीकी परिष्कार, सजावटी प्रवृत्ति तथा राजसी वैभव का उत्कृष्ट समन्वय दिखाई देता है। चित्रों में व्यक्ति-चित्र (शबीह), दरबारी जीवन, राजकीय समारोह, शाही जुलूस तथा शिकार के दृश्य प्रमुख विषय हैं। सम्राट को बहुमूल्य वस्त्रों, आभूषणों तथा प्रभामंडल के साथ आदर्श शासक के रूप में चित्रित किया गया।

चित्रों में स्वर्णलेप, चौड़े अलंकृत हाशिए, मीनाकारी जैसी सूक्ष्मता, संतुलित रंग-योजना तथा उत्कृष्ट शिल्प-कौशल का प्रयोग मिलता है। छाया-प्रकाश, परिप्रेक्ष्य तथा त्रि-आयामी प्रभाव के कारण चित्रों में गहराई उत्पन्न हुई। व्यक्ति-चित्रों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई तथा शाही परिवार और दरबारियों के यथार्थ चित्र बड़ी संख्या में बनाए गए।

इस काल में ईसाई विषयों एवं विदेशी प्रभावों का सीमित समावेश हुआ, जबकि हिंदू विषय अपेक्षाकृत कम दिखाई देते हैं। पुरुषों की वेशभूषा में लम्बा जामा, पायजामा, कमरबन्द तथा अलंकृत पगड़ी का अंकन मिलता है, जबकि स्त्रियों को पारदर्शी वस्त्रों, चुस्त पायजामों और बहुमूल्य आभूषणों के साथ चित्रित किया गया। हाथियों, घोड़ों तथा अन्य राजसी प्रतीकों का अत्यंत भव्य चित्रण इस काल की एक विशिष्ट विशेषता है।

इस प्रकार शाहजहाँकालीन मुगल चित्रकला ने तकनीकी उत्कृष्टता, अलंकरण, सौंदर्यबोध तथा राजसी वैभव की दृष्टि से उल्लेखनीय प्रगति की। यद्यपि जहाँगीरकाल की स्वाभाविकता, प्रकृतिवाद और प्रयोगशीलता में कुछ कमी दिखाई देती है, फिर भी रेखांकन, रंग-संतुलन, शिल्प-कौशल, सजावटी सौंदर्य तथा दरबारी गरिमा के कारण यह मुगल चित्रकला के विकास का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण और परिपक्व चरण माना जाता है। यही शैली आगे चलकर उत्तरवर्ती मुगल तथा अनेक क्षेत्रीय चित्रकला परंपराओं के विकास का आधार बनी।

औरंगज़ेबकालीन मुगल चित्रकला (1658–1707 ई.)

1658 ई. में शाहजहाँ के पश्चात् औरंगज़ेब मुगल साम्राज्य के सिंहासन पर बैठा। वह धार्मिक दृष्टि से रूढ़िवादी तथा सुन्नी इस्लामी परंपराओं का कट्टर समर्थक था। सत्ता प्राप्ति के लिए उसने अपने भाइयों को पराजित किया तथा अपने पिता शाहजहाँ को आगरा के किले में नज़रबंद कर दिया। औरंगज़ेब का स्वभाव अपने पूर्ववर्ती शासकों—अकबर, जहाँगीर तथा शाहजहाँ से भिन्न था। जहाँ उसके पूर्ववर्ती सम्राट चित्रकला, संगीत और अन्य ललित कलाओं के महान संरक्षक थे, वहीं औरंगज़ेब ने इन कलाओं के प्रति अपेक्षाकृत उदासीन नीति अपनाई।

यद्यपि प्रचलित धारणा यह है कि औरंगज़ेब ने चित्रकला को पूर्णतः प्रतिबंधित कर दिया था, किंतु ऐतिहासिक प्रमाण इस निष्कर्ष का पूर्ण समर्थन नहीं करते। उसने शाही संरक्षण अवश्य कम कर दिया, परंतु चित्रकला का पूर्णतः अंत नहीं हुआ। उसके शासनकाल के कुछ लघुचित्र आज भी उपलब्ध हैं, जिनमें उसे शिकार करते हुए, दरबार लगाते हुए तथा युद्ध संबंधी गतिविधियों में चित्रित किया गया है। अतः यह कहना अधिक उपयुक्त होगा कि औरंगज़ेब के काल में मुगल चित्रकला का राजकीय संरक्षण समाप्तप्राय हो गया, न कि चित्रकला स्वयं पूरी तरह समाप्त हो गई।

चित्रकला के प्रति औरंगज़ेब की नीति

औरंगज़ेब ने धार्मिक कारणों से चित्रकला तथा संगीत जैसी ललित कलाओं को विशेष संरक्षण नहीं दिया। उसके शासनकाल में शाही चित्रशाला (तस्वीरख़ाना) का महत्त्व निरंतर घटता गया और चित्रकारों को पहले की भाँति राजकीय आश्रय प्राप्त नहीं हुआ। फलस्वरूप चित्रकला का विकास धीमा पड़ गया।

इतालवी यात्री निकोलाओ मनूची ने उल्लेख किया है कि औरंगज़ेब के आदेश से अकबर के मकबरे (सिकंदरा) में बने कुछ चित्रों पर चूना फिरवा दिया गया था। यद्यपि इस कथन की ऐतिहासिक पुष्टि सभी स्रोतों से नहीं होती, फिर भी इससे यह स्पष्ट होता है कि औरंगज़ेब की सांस्कृतिक नीति अपने पूर्ववर्ती सम्राटों की अपेक्षा अधिक रूढ़िवादी थी।

औरंगज़ेबकालीन चित्रकला का स्वरूप

यद्यपि शाही संरक्षण में कमी आ गई थी, फिर भी चित्रकला का निर्माण पूर्णतः बंद नहीं हुआ। विशेषकर शासनकाल के उत्तरार्द्ध में कुछ लघुचित्र तैयार किए गए, जिनमें सम्राट को शिकार करते हुए, घोड़े पर सवार, दरबार लगाते हुए अथवा सैन्य अभियानों का नेतृत्व करते हुए दिखाया गया है। इन चित्रों में पूर्ववर्ती मुगल शैली की तकनीकी दक्षता तो बनी रही, किंतु उनकी संख्या अत्यंत सीमित रही।

इस काल में नए सचित्र ग्रंथों का निर्माण लगभग बंद हो गया और व्यक्ति-चित्रों तथा सीमित दरबारी दृश्यों तक ही चित्रकला सिमट गई। फलस्वरूप मुगल चित्रकला का रचनात्मक विस्तार रुक गया और उसकी पूर्ववर्ती सृजनात्मक ऊर्जा क्षीण होने लगी।

मुगल चित्रकला का पतन
शाही संरक्षण का अभाव

लगभग 1680 ई. के बाद मुगल चित्रशाला का महत्त्व निरंतर घटने लगा। कलाकारों को न तो पर्याप्त आर्थिक सहायता मिली और न ही बड़े चित्रांकन-प्रकल्पों का अवसर प्राप्त हुआ। परिणामस्वरूप चित्रकला की वह समृद्ध परंपरा, जिसे अकबर, जहाँगीर और शाहजहाँ ने विकसित किया था, धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगी।

मुगल चित्रकला का पतन किसी एक घटना का परिणाम नहीं था, बल्कि यह एक दीर्घकालिक प्रक्रिया थी, जिसका प्रमुख कारण शाही संरक्षण का अभाव था। औरंगज़ेब की व्यक्तिगत अरुचि के कारण चित्रकारों की स्थिति अस्थिर हो गई और शाही कार्यशालाएँ धीरे-धीरे निष्क्रिय होने लगीं।

चित्रकारों का पलायन

राजकीय संरक्षण समाप्त होने पर अनेक प्रतिभाशाली चित्रकार जीविका एवं संरक्षण की खोज में मुगल दरबार छोड़कर भारत के विभिन्न क्षेत्रीय राज्यों में चले गए। इनमें प्रमुख रूप से राजपूत राज्यों, पहाड़ी राज्यों तथा दक्कनी राज्यों का उल्लेख किया जा सकता है।

राजस्थान के मेवाड़, मारवाड़, आमेर (जयपुर), बूंदी, कोटा, किशनगढ़ और बीकानेर जैसे राज्यों ने इन कलाकारों को संरक्षण प्रदान किया। इसी प्रकार हिमालयी क्षेत्र के कांगड़ा, बसोहली, गुलेर, चम्बा, नूरपुर तथा मंडी जैसे पहाड़ी राज्यों में भी मुगल कलाकारों को आश्रय मिला। दक्षिण भारत के बीजापुर, गोलकुंडा और हैदराबाद जैसे दक्कनी राज्यों में भी इन कलाकारों ने नई चित्र परंपराओं के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।

क्षेत्रीय चित्रकला शैलियों का विकास
राजपूत चित्रकला

मुगल दरबार से आए कलाकारों ने स्थानीय राजस्थानी परंपराओं के साथ मुगल तकनीकों का समन्वय किया। परिणामस्वरूप राजपूत चित्रकला में सूक्ष्म रेखांकन, संतुलित संरचना तथा उत्कृष्ट रंग-संयोजन का विकास हुआ। साथ ही कृष्ण-भक्ति, रामायण, महाभारत, रागमाला, बारहमासा तथा राजस्थानी लोकजीवन जैसे विषयों को प्रमुखता मिली।

पहाड़ी चित्रकला

पहाड़ी राज्यों में पहुँचे कलाकारों ने स्थानीय सांस्कृतिक वातावरण और वैष्णव भक्ति परंपरा के प्रभाव में कांगड़ा, गुलेर, बसोहली, चम्बा तथा नूरपुर जैसी प्रसिद्ध चित्रशैलियों का विकास किया। इन चित्रों में राधा-कृष्ण, गीतगोविन्द, भागवत पुराण, नायिका-भेद तथा प्राकृतिक सौंदर्य का अत्यंत कोमल एवं भावपूर्ण चित्रण मिलता है।

दक्कनी चित्रकला

दक्षिण भारत के दक्कनी राज्यों में मुगल चित्रकारों ने स्थानीय ईरानी, तुर्की तथा भारतीय परंपराओं के साथ समन्वय स्थापित किया। परिणामस्वरूप दक्कनी चित्रकला में गहरे रंगों, अलंकृत वस्त्रों, विशिष्ट स्थापत्य तथा दरबारी वैभव का एक नवीन स्वरूप विकसित हुआ।

उत्तरवर्ती मुगल काल एवं पुनरुत्थान के प्रयास

अठारहवीं शताब्दी में मुगल साम्राज्य के राजनीतिक पतन के साथ मुगल चित्रकला का भी क्रमिक अवसान होने लगा। फिर भी मुहम्मद शाह ‘रंगीला’ (1719–1748 ई.) के शासनकाल में चित्रकला को पुनः कुछ संरक्षण प्राप्त हुआ। उसके दरबार में कलाकारों को प्रोत्साहन मिला और व्यक्ति-चित्रों तथा दरबारी दृश्यों का पुनः निर्माण आरंभ हुआ। यद्यपि यह पुनरुत्थान उल्लेखनीय था, फिर भी मुगल चित्रकला अपने अकबर, जहाँगीर और शाहजहाँकालीन वैभव को पुनः प्राप्त नहीं कर सकी।

नादिरशाह का आक्रमण और उसका प्रभाव

1739 ई. में नादिरशाह के दिल्ली आक्रमण ने मुगल कला और संस्कृति को गहरा आघात पहुँचाया। इस आक्रमण में शाही पुस्तकालयों, चित्रशालाओं तथा राजकोष को भारी क्षति पहुँची। अनेक बहुमूल्य सचित्र पांडुलिपियाँ, चित्र तथा कलाकृतियाँ लूट ली गईं और कलाकार विभिन्न क्षेत्रों में बिखर गए। इससे मुगल चित्रकला की शेष बची हुई परंपरा भी गंभीर रूप से प्रभावित हुई।

इसके बाद के मुगल सम्राट राजनीतिक रूप से दुर्बल सिद्ध हुए और भारत में अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कम्पनी का प्रभाव निरंतर बढ़ता गया। परिणामस्वरूप मुगल दरबार की सांस्कृतिक भूमिका भी क्रमशः समाप्त होती चली गई।

कंपनी शैली

अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध तथा उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में यूरोपीय प्रभाव के परिणामस्वरूप कंपनी शैली का विकास हुआ। इस शैली में मुगल चित्रकला की सूक्ष्म रेखांकन परंपरा तथा भारतीय विषयों का समन्वय यूरोपीय यथार्थवाद, छाया-प्रकाश तथा परिप्रेक्ष्य के साथ किया गया।

इस शैली के चित्रों में भारतीय जनजीवन, व्यवसाय, स्मारक, वनस्पति, पशु-पक्षी तथा स्थानीय समाज का यथार्थवादी चित्रण किया गया। इसे मुगल चित्रकला की उत्तरवर्ती एवं अंतिम विकसित अवस्था माना जाता है।

परवर्ती मुगलकालीन चित्रकला की प्रमुख विशेषताएँ

औरंगज़ेब के शासनकाल में शाही संरक्षण में कमी के कारण चित्रकला का विकास मंद पड़ गया। सचित्र ग्रंथों का निर्माण लगभग समाप्त हो गया तथा व्यक्ति-चित्रों और सीमित दरबारी दृश्यों तक चित्रकला सीमित रह गई। कलाकारों का बड़ी संख्या में राजपूत, पहाड़ी तथा दक्कनी राज्यों की ओर पलायन हुआ, जिसके परिणामस्वरूप अनेक क्षेत्रीय चित्रशैलियों का विकास हुआ।

उत्तरवर्ती काल में मुहम्मद शाह ‘रंगीला’ के समय पुनः संरक्षण मिला, किंतु मुगल चित्रकला अपना पूर्व वैभव पुनः प्राप्त नहीं कर सकी। नादिरशाह के आक्रमण ने इसकी परंपरा को गहरा आघात पहुँचाया। अंततः अंग्रेज़ी प्रभाव के परिणामस्वरूप कंपनी शैली का विकास हुआ, जिसने मुगल चित्रकला की परंपरा को एक नवीन दिशा प्रदान की।

औरंगज़ेब के शासनकाल में मुगल चित्रकला का पूर्ण अंत नहीं हुआ, बल्कि उसका राजकीय संरक्षण क्रमशः समाप्त हो गया। इसके परिणामस्वरूप मुगल चित्रकला का केन्द्र दिल्ली से हटकर भारत के विभिन्न क्षेत्रीय राज्यों में स्थानांतरित हो गया। यही कारण है कि मुगल चित्रकला का प्रभाव समाप्त होने के स्थान पर राजपूत, पहाड़ी, दक्कनी तथा आगे चलकर कंपनी शैली जैसी चित्रकला परंपराओं में जीवित रहा। इस प्रकार मुगल चित्रकला का पतन वास्तव में उसके व्यापक प्रसार और क्षेत्रीय रूपान्तरण का आधार बना तथा भारतीय चित्रकला के इतिहास में उसका योगदान स्थायी, व्यापक और अत्यंत महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुआ।

महत्त्वपूर्ण चित्र
सलीम का जन्म (1569 ई.)

‘सलीम का जन्म’ अकबरकालीन मुगल चित्रकला की सर्वाधिक प्रसिद्ध कृतियों में से एक है। इसका संबंध 30 अगस्त 1569 ई. को फतेहपुर सीकरी में सूफी संत शेख सलीम चिश्ती के आशीर्वाद से जन्मे राजकुमार सलीम (बाद में सम्राट जहाँगीर) से है। यह चित्र अपनी उत्कृष्ट संरचना, संतुलित संयोजन तथा बहुखंडी दृश्य-विन्यास के लिए विशेष प्रसिद्ध है। इसमें एक ही चित्र में अनेक घटनाओं को क्रमबद्ध रूप से प्रस्तुत किया गया है। महल के बाहर दान (खैरात) बाँटने, महल के भीतर नृत्य करती स्त्रियों, शिशु सलीम को स्नान कराते हुए तथा प्रसूति-गृह के दृश्य का अत्यंत सजीव चित्रण किया गया है। ऊपरी भाग में महल की छत पर मोर तथा पृष्ठभूमि में प्राकृतिक दृश्यों का सुंदर अंकन चित्र की कलात्मकता को और बढ़ाता है। रंगों का संतुलित सामंजस्य, सूक्ष्म रेखांकन तथा बहुआयामी रचना इस चित्र की प्रमुख विशेषताएँ हैं। इस उत्कृष्ट कृति का निर्माण प्रसिद्ध चित्रकार केसू दास (केशु दास) ने किया था।

मुगल चित्रकला (Mughal Painting)
सलीम का जन्म
कबीर और रैदास (लगभग 1640 ई.)

‘कबीर और रैदास’ शाहजहाँकालीन मुगल चित्रकला का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। इसका निर्माण उस्ताद फ़कीरुल्लाह ने लगभग 1640 ई. में किया था। चित्र में कबीर को झोंपड़ी के बाहर वस्त्र बुनते हुए तथा उनके समीप रैदास को चटाई पर बैठे हुए दर्शाया गया है। दोनों संत सांसारिक मोह-माया से विरक्त होकर आध्यात्मिक चिंतन में लीन हैं। धूसर, भूरे और मटमैले रंगों की प्रधानता चित्र के शांत एवं आध्यात्मिक वातावरण को प्रभावशाली बनाती है। ग्रामीण परिवेश, सादगी और संत-जीवन का यथार्थ चित्रण इस चित्र की प्रमुख विशेषता है।

मुगल चित्रकला (Mughal Painting)
कबीर और रैदास
दारा शिकोह की बारात (1633 ई.)

‘दारा शिकोह की बारात’ मुगलकालीन चित्रकला का एक भव्य एवं ऐतिहासिक चित्र है, जिसका संबंध 1633 ई. में दारा शिकोह के विवाह से माना जाता है। इसमें दूल्हे के वेश में घोड़ी पर सवार दारा शिकोह, उसके पीछे सम्राट शाहजहाँ, हाथियों पर राजपरिवार की स्त्रियाँ तथा शाही वाद्य-वृंद का अत्यंत आकर्षक चित्रण किया गया है। बारात के स्वागत में खड़े स्त्री-पुरुष, आतिशबाज़ी और राजकीय वैभव चित्र की भव्यता को बढ़ाते हैं। अधिकांश मुखाकृतियाँ एक-चश्म शैली में अंकित हैं। इस चित्र का निर्माण हाजी मदनी ने किया था।

मुगल चित्रकला (Mughal Painting)
दारा शिकोह की बारात
जहाँगीर का सपना (लगभग 1618 ई.)

‘जहाँगीर का सपना’ (जहाँगीर शाह अब्बास को आलिंगन करते हुए) मुगल चित्रकला की सर्वश्रेष्ठ प्रतीकात्मक कृतियों में गिना जाता है। इसका निर्माण लगभग 1618 ई. में जहाँगीर के दरबारी चित्रकार अबुल हसन ने किया था। इसमें जहाँगीर को ईरान के शाह अब्बास प्रथम के साथ आलिंगन करते हुए दर्शाया गया है, जबकि दोनों शासकों की कभी वास्तविक भेंट नहीं हुई थी। पृथ्वी (ग्लोब) के ऊपर शेर पर खड़े जहाँगीर और मेढ़े पर खड़े शाह अब्बास का चित्रण जहाँगीर की श्रेष्ठता का प्रतीक है। स्वर्णिम प्रभामंडल, टेम्परा माध्यम तथा स्वर्ण-रजत रंगों का प्रयोग इस चित्र की प्रमुख विशेषताएँ हैं। अबुल हसन को जहाँगीर ने ‘नादिर-उज़्-ज़माँ’ की उपाधि प्रदान की थी।

मुगल चित्रकला (Mughal Painting)
जहाँगीर का सपना
मुगल चित्रकला शैली की सामान्य विशेषताएँ

मुगल चित्रकला भारतीय, फ़ारसी (ईरानी) तथा मध्य एशियाई कला-परंपराओं के समन्वय से विकसित एक विशिष्ट चित्रशैली है। इसका विकास मुख्यतः सोलहवीं से अठारहवीं शताब्दी के मध्य मुगल सम्राटों के संरक्षण में हुआ। यह शैली अपनी तकनीकी उत्कृष्टता, सूक्ष्म रेखांकन, संतुलित रंग-योजना, यथार्थवादी दृष्टिकोण तथा कलात्मक परिष्कार के लिए प्रसिद्ध है। यद्यपि इसकी विषय-वस्तु अत्यंत व्यापक है, फिर भी यह मूलतः शाही दरबार और अभिजात वर्ग की कला रही। अजन्ता की चित्रकला की अपेक्षा इसमें आध्यात्मिक सहजता और भावप्रवणता कम, जबकि यथार्थवाद, शिल्प-कौशल तथा राजसी वैभव का प्रभाव अधिक दिखाई देता है।

मुगल चित्रकला का प्रारंभ बाबर के समय से माना जाता है, किंतु उसकी वास्तविक आधारशिला हुमायूँ के शासनकाल में पड़ी, जब वह ईरान से मीर सैय्यद अली और ख्वाजा अब्दुस्समद जैसे श्रेष्ठ चित्रकारों को भारत लेकर आया। अकबर ने चित्रशालाओं (तस्वीरखानों) की स्थापना कर चित्रकला को संस्थागत स्वरूप प्रदान किया तथा भारतीय और फ़ारसी कलाकारों को एक साथ कार्य करने का अवसर दिया। उसके शासनकाल में मुगल चित्रकला का सर्वाधिक विस्तार हुआ।

जहाँगीर के समय यह शैली यथार्थवाद, प्रकृति-अध्ययन तथा व्यक्ति-चित्रण की दृष्टि से अपने चरम उत्कर्ष पर पहुँची। शाहजहाँ के शासनकाल में चित्रकला तकनीकी दृष्टि से और अधिक परिष्कृत हुई तथा उसमें अलंकरण, सौंदर्य और दरबारी भव्यता की प्रधानता बढ़ी। औरंगज़ेब के शासनकाल में राजकीय संरक्षण घटने से चित्रकला का पतन प्रारंभ हुआ, किंतु कलाकारों के विभिन्न क्षेत्रीय राज्यों में चले जाने के कारण राजस्थानी, पहाड़ी तथा दक्कनी चित्रकला शैलियों का उल्लेखनीय विकास हुआ।

मुगल चित्रकला का प्रमुख विषय शाही जीवन तथा दरबारी संस्कृति रही। चित्रों में दरबार, राजकीय समारोह, शाही वैभव, आखेट (शिकार), युद्ध, ऐतिहासिक घटनाएँ, राजदूतों का स्वागत, उत्सव, धार्मिक एवं पौराणिक कथाएँ, संतों एवं फ़कीरों के चित्र तथा व्यक्ति-चित्र (शबीह) प्रमुख रूप से अंकित किए गए। इसके अतिरिक्त प्राकृतिक दृश्य, उद्यान, पशु-पक्षी, वन्यजीव तथा पुष्पों का भी अत्यंत आकर्षक चित्रण किया गया। सामान्य जनजीवन और ग्रामीण जीवन का चित्रण अपेक्षाकृत कम मिलता है।

मुगल चित्रकला की सबसे उल्लेखनीय विशेषता प्रकृति का अत्यंत सूक्ष्म एवं यथार्थवादी चित्रण है। चित्रकारों ने वृक्षों, पुष्पों, पत्तियों, वनस्पतियों, पशु-पक्षियों तथा प्राकृतिक दृश्यों का वैज्ञानिक दृष्टि से अध्ययन कर उनका चित्रण किया। हाथियों, घोड़ों, ऊँटों, बैलों, हिरणों, शेरों, चीतों तथा विभिन्न पक्षियों के चित्र अत्यंत जीवंत बनाए गए। हाथियों, घोड़ों, मुर्गों, बटेरों तथा तीतरों की लड़ाइयों का भी अत्यंत प्रभावशाली अंकन मिलता है। अनेक चित्रों में प्रकृति केवल पृष्ठभूमि न होकर कथानक का अभिन्न अंग बन जाती है।

मुगल चित्रकारों ने फ़ारसी साहित्य और भारतीय धार्मिक तथा ऐतिहासिक ग्रंथों का अत्यंत उत्कृष्ट चित्रांकन किया। फ़ारसी कृतियों में हम्ज़ानामा, शाहनामा, लैला-मजनूँ, शीरीं-फ़रहाद तथा ख़म्सा-ए-निज़ामी प्रमुख हैं। भारतीय ग्रंथों में रामायण, महाभारत (रज़्मनामा), योगवसिष्ठ, नल-दमयंती, कृष्ण-चरित, अकबरनामा, बाबरनामा तथा तारीख़-ए-खानदान-ए-तैमूरिया का उत्कृष्ट चित्रांकन किया गया। इन ग्रंथों में ऐतिहासिक घटनाओं, पौराणिक कथाओं तथा मानवीय भावों का अत्यंत प्रभावशाली समन्वय दिखाई देता है।

मुगल चित्रकला का सबसे विशिष्ट गुण उसका अत्यंत सूक्ष्म रेखांकन है। चित्रकार महीन एवं नुकीली तूलिकाओं द्वारा अत्यंत बारीक रेखाएँ अंकित करते थे। वस्त्रों की सलवटें, आभूषण, कालीन, स्थापत्य अलंकरण, बेल-बूटे, वृक्षों की शाखाएँ तथा पशु-पक्षियों के पंखों तक का अत्यंत सूक्ष्म और यथार्थ चित्रण किया जाता था।

अधिकांश चित्र कागज़ पर बनाए गए, किंतु कपड़े, भित्तियों तथा हाथी-दाँत पर भी चित्रांकन के उदाहरण मिलते हैं। चित्रों में रेखाओं की लयात्मकता, संतुलित संरचना तथा अनुपात का विशेष ध्यान रखा जाता था।

मुगल चित्रकला की रंग-योजना अत्यंत संतुलित, परिष्कृत तथा आकर्षक है। पृष्ठभूमि में सामान्यतः मृदु, शीतल तथा धुँधले रंगों का प्रयोग किया गया, जबकि राजसी वस्त्रों, कालीनों, पर्दों तथा आभूषणों में लाल, पीला, हरा, लाजवर्दी (गहरा नीला), केसरिया, गुलाबी, स्वर्ण तथा रजत रंगों का कलात्मक उपयोग किया गया।

संध्या, रात्रि तथा राजसी दृश्यों में स्वर्ण और रजत रंगों का प्रयोग विशेष आकर्षण उत्पन्न करता है। रंगों का प्रयोग केवल सजावट के लिए नहीं, बल्कि चित्रों में गहराई, संतुलन तथा वातावरण निर्माण के लिए भी किया जाता था।

व्यक्ति-चित्रण मुगल चित्रकला की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक है। कलाकारों ने सम्राटों, राजकुमारों, अमीरों, संतों तथा विदेशी राजदूतों के चित्र अत्यंत यथार्थ रूप में बनाए। मुखाकृति, भाव-भंगिमा, शारीरिक अनुपात तथा व्यक्तित्व का अत्यंत सूक्ष्म चित्रण इसकी प्रमुख विशेषता है।

प्रारंभिक चित्रों में फ़ारसी प्रभाव के कारण डेढ़-चश्म मुखाकृतियाँ मिलती हैं, जबकि बाद के अधिकांश चित्र एक-चश्म (प्रोफ़ाइल) शैली में बनाए गए। जहाँगीरकाल में व्यक्ति-चित्रण अपनी सर्वोच्च उत्कृष्टता पर पहुँचा।

मुगल चित्रों में महलों, दुर्गों, मेहराबों, स्तम्भों, बुर्जों, विशाल द्वारों, उद्यानों तथा अन्य स्थापत्य तत्वों का अत्यंत सटीक एवं कलात्मक चित्रण मिलता है। स्थापत्य केवल सजावटी पृष्ठभूमि नहीं होता, बल्कि चित्र के कथानक का महत्त्वपूर्ण अंग होता है।

चित्रों के हाशियों को पुष्पों, बेल-बूटों, पक्षियों, पशुओं तथा ज्यामितीय अलंकरणों से अत्यंत आकर्षक ढंग से सजाया जाता था। अनेक बार हाशियों की सजावट मुख्य चित्र के समान ही कलात्मक एवं प्रभावशाली प्रतीत होती है।

जहाँगीर तथा शाहजहाँ के शासनकाल में यूरोपीय चित्रकला का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। जेसुइट मिशनरियों द्वारा लाए गए चित्रों और उत्कीर्णनों से प्रेरित होकर कलाकारों ने छाया-प्रकाश, परिप्रेक्ष्य तथा त्रि-आयामी प्रभाव का सफल प्रयोग किया। इससे चित्रों में गहराई, उभार तथा यथार्थता का विकास हुआ। आकृतियों की गोलाई, रेखाओं की लयात्मकता तथा रंगों का संतुलित प्रयोग चित्रों को अत्यंत सजीव बना देता है।

मुगल चित्रकला (Mughal Painting)
मुगल चित्रकला
मुगल चित्रकला का महत्त्व

मुगल चित्रकला भारतीय कला-इतिहास की सर्वाधिक परिष्कृत और प्रभावशाली चित्रशैलियों में से एक है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता इसका समन्वयवादी स्वरूप है, जिसमें भारतीय, फ़ारसी तथा मध्य एशियाई कलात्मक परंपराओं का सफल समावेश हुआ। इस शैली ने भारतीय चित्रकला को सूक्ष्म रेखांकन, यथार्थवादी दृष्टिकोण, वैज्ञानिक प्रकृति-अध्ययन, संतुलित रंग-योजना तथा उत्कृष्ट तकनीकी कौशल प्रदान किया।

हुमायूँ द्वारा स्थापित आधार को अकबर ने संगठित एवं विकसित किया, जहाँगीर ने उसे प्रकृतिवाद और व्यक्ति-चित्रण की दृष्टि से चरम उत्कर्ष तक पहुँचाया तथा शाहजहाँ ने उसमें तकनीकी परिष्कार और सजावटी सौंदर्य का समावेश किया। यद्यपि औरंगज़ेब के शासनकाल में राजकीय संरक्षण के अभाव में इसका पतन प्रारंभ हुआ, फिर भी इसके कलाकारों ने राजपूत, पहाड़ी तथा दक्कनी चित्रकला शैलियों के विकास में अत्यंत महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।

मुगल चित्रकला ने भारतीय चित्रकला को वैज्ञानिक अवलोकन, यथार्थवादी अभिव्यक्ति, तकनीकी उत्कृष्टता तथा सांस्कृतिक समन्वय की नई दिशा प्रदान की। इसकी परंपरा आगे चलकर क्षेत्रीय चित्रशैलियों तथा कंपनी शैली में भी जीवित रही। इस प्रकार मुगल चित्रकला केवल एक राजदरबारी कला न होकर भारतीय सांस्कृतिक विरासत की अमूल्य धरोहर है, जिसने भारतीय और विश्व कला-इतिहास में स्थायी एवं विशिष्ट स्थान प्राप्त किया।

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