अशोक महान् का मूल्यांकन (Evaluation of Asoka the Great)

अशोक महान् का मूल्यांकन (Evaluation of Asoka the Great)
अशोक महान : प्राचीन भारत का सबसे महान शासक प्रस्तावना सम्राट अशोक महान प्राचीन भारत […]

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अशोक महान : प्राचीन भारत का सबसे महान शासक

प्रस्तावना

सम्राट अशोक महान प्राचीन भारत के मौर्य वंश का तीसरा और सबसे शक्तिशाली शासक था, जिसने लगभग 268 से 232 ईसा पूर्व तक शासन किया। वह मौर्य वंश के संस्थापक चंद्रगुप्त मौर्य का पौत्र और बिंदुसार का पुत्र था तथा उसकी राजधानी पाटलिपुत्र (पटना, बिहार) थी। उसकी माता का नाम सुभद्रांगी (कुछ स्रोतों में धर्मा) बताया जाता है, जो चंपा (भागलपुर, बिहार) के एक ब्राह्मण परिवार से संबंधित थीं। उसके शासनकाल में मौर्य साम्राज्य का विस्तार भारतीय उपमहाद्वीप के विशाल क्षेत्र तक हुआ, जो पश्चिम में वर्तमान अफगानिस्तान और ईरान की सीमाओं से लेकर पूर्व में बंगाल तक तथा उत्तर में कश्मीर से दक्षिण में मैसूर तक फैला हुआ था।

कलिंग युद्ध (लगभग 261 ई. पू.) उसके जीवन का महत्त्वपूर्ण परिवर्तन-बिंदु सिद्ध हुआ। युद्ध की भयंकर हिंसा और जनहानि से प्रभावित होकर उसने हिंसक विजय की नीति का त्याग किया और धम्म, अहिंसा, शांति, सहिष्णुता तथा जनकल्याण को अपने शासन का आधार बनाया। उसने प्रजा के कल्याण के लिए अनेक कार्य किए और अपने धम्म के संदेश को शिलालेखों तथा स्तंभलेखों के माध्यम से प्रचारित किया। अशोक ने बौद्ध धर्म के प्रसार में भी महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। इस प्रकार वह भारतीय इतिहास में एक ऐसे महान शासक के रूप में स्मरण किया जाता है, जिसने शक्ति और साम्राज्य-विस्तार के साथ-साथ मानवता, नैतिकता और लोककल्याण को विशेष महत्त्व दिया।

अशोक न केवल भारतीय इतिहास, बल्कि विश्व इतिहास के महानतम शासकों में से एक है। एक विजिगीषु शासक, महान् विजेता, साम्राज्य-निर्माता, धर्म-परायण, धर्म-सहिष्णु, दयालु, उदार, लोकहित-चिंतक और मानवता के अनन्य पोषक के रूप में सुप्रसिद्ध अशोक अपने उन्नत धार्मिक विचारों, उच्च आदर्शों, आध्यात्मिक चिंतन, त्याग, सुव्यवस्थित प्रशासन, प्रजा के इहलौकिक और पारलौकिक सुख की हार्दिक कामना, तथा संपूर्ण विश्व के प्राणियों के हित-साधन की विराट् चेष्टा के कारण न केवल भारत, बल्कि विश्व के महान् सम्राटों में अद्वितीय है। नामतः ‘देवानांप्रिय’, किंतु व्यवहारतः ‘प्रियदर्शी’ अशोक का चाहे जिस दृष्टि से मूल्यांकन किया जाए, वह सर्वथा योग्य सिद्ध होता है। उसकी महानता उसके साम्राज्य की विशालता, उसकी सेना की अजेयता, साम्राज्य की धन-संपन्नता या विपुल वैभव पर अवलंबित नहीं है, अपितु उसका स्वच्छ और निर्मल चरित्र, महान नैतिक आदर्श, अटल धर्मनिष्ठा, कर्तव्य-परायणता और महान् उदारता उसकी अमिट कीर्ति के प्रकाशमान आधार हैं। उसमें चंद्रगुप्त मौर्य जैसी शक्ति, समुद्रगुप्त जैसी बहुमुखी प्रतिभा और अकबर जैसी सहिष्णुता थी।

अशोक का प्रारंभिक जीवन और सिंहासनारोहण

अशोक का जन्म लगभग 304 ईसा पूर्व हुआ था। वह बिंदुसार के अनेक पुत्रों में से एक था। सिंहासन पर बैठने से पूर्व अशोक को उज्जैन (अवंति) और तक्षशिला जैसे महत्त्वपूर्ण प्रांतों का राज्यपाल (कुमार-महामात्र) नियुक्त किया गया था, जहाँ उसने प्रशासनिक अनुभव प्राप्त किया। बौद्ध परंपरा के ग्रंथ ‘अशोकावदान’ और सिंहली इतिहास-ग्रंथ ‘महावंश’ तथा ‘दीपवंश’ के अनुसार बिंदुसार की मृत्यु के पश्चात् उत्तराधिकार के लिए भाइयों के मध्य संघर्ष हुआ, जिसमें अशोक विजयी होकर सिंहासनारूढ़ हु । किंतु इन ग्रंथों में वर्णित घटनाओं में अर्ध-ऐतिहासिक और अर्ध-पौराणिक तत्त्व मिश्रित हैं, अतः इन्हें सावधानीपूर्वक ऐतिहासिक साक्ष्यों के साथ जोड़कर देखा जाना चाहिए। माना जाता है कि अशोक का राज्याभिषेक (अभिषेक) सिंहासन पर बैठने के लगभग चार वर्ष बाद यानी 269-268 ईसा पूर्व के आसपास हुआ था, जिसका उल्लेख स्वयं अशोक ने अपने अभिलेखों में किया है।

अशोक की अनेक रानियाँ थीं, जिनमें विदिशा की देवी (महेंद्र और संघमित्रा की माता थीं), कारुवाकी (जिसका उल्लेख रानी का अभिलेख नामक स्तंभलेख में मिलता है) और असंधिमित्रा प्रमुख हैं।

अशोक महान् (Asoka the Great)
अशोक महान्

कलिंग युद्ध: हृदय-परिवर्तन का ऐतिहासिक क्षण

अशोक के शासनकाल में भारतवर्ष ने अभूतपूर्व राजनीतिक एकता और स्थायित्व का साक्षात्कार किया। उसने तक्षशिला के विद्रोहों का दमन कर और कलिंग जैसे शक्तिशाली राज्य को विजित कर अपनी सैनिक निपुणता का परिचय दिया। कलिंग (ओडिशा का अधिकांश भाग) उस समय एक समृद्ध और स्वतंत्र राज्य था, जो व्यापारिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण था। अशोक के तेरहवें शिलालेख के अनुसार इस युद्ध में लगभग एक लाख लोग मारे गए, डेढ़ लाख से अधिक बंदी बनाए गए तथा उससे कई गुना अधिक लोग युद्ध के परिणामस्वरूप भूख, बीमारी और विस्थापन से मृत्यु को प्राप्त हुए। इस भीषण नरसंहार को देखकर अशोक का हृदय पश्चाताप से भर उठा और यहीं से उसके जीवन में वह क्रांतिकारी परिवर्तन आया, जिसने उसे विश्व इतिहास में अमर बना दिया।

आदर्श प्रजापालक सम्राट के रूप में उसने प्रशासन के क्षेत्र में सुधार कर पितृवत् राजत्व की अवधारणा को साकार किया। अपने छठे शिलालेख में वह अपने राजत्व-संबंधी विचारों को व्यक्त करते हुए कहता है : “सर्वलोकहित मेरा कर्तव्य है। सर्वलोकहित से बढ़कर कोई दूसरा कर्म नहीं है। मैं जो कुछ पराक्रम करता हूँ, वह इसलिए कि प्राणियों के ऋण से मुक्त हो जाऊँ।” अशोक ने संपूर्ण साम्राज्य में एक भाषा, एक लिपि (मुख्यतः ब्राह्मी) और एकसमान नियम-कानून लागू कर राष्ट्रीय एकता की समस्या का समाधान किया। न्याय-प्रशासन के क्षेत्र में ‘दंड-समता’ और ‘व्यवहार-समता’ की स्थापना निश्चित रूप से अशोक का क्रांतिकारी कार्य था।

धम्म नीति: अशोक की धार्मिक और नैतिक क्रांति

अशोक की ख्याति महान् विजेता के रूप में उतनी नहीं है, जितनी धर्मविजेता के रूप में। उसने कलिंग युद्ध के पश्चात् युद्ध का विचार त्याग दिया और भेरीघोष के स्थान पर ‘धर्मघोष’ का जयनाद कर धर्म के क्षेत्र में विजय-ध्वज फहराने का संकल्प लिया। ‘धर्मविजय’ कोई सरल कार्य नहीं था, क्योंकि यह विजय बाहुबल की नहीं, आत्मबल और प्रेमबल की थी। यह विजय राज्य या भूखंड पर नहीं, प्राणिमात्र के मस्तिष्क और भावना पर थी। यह अशांति की नहीं, शांति की विजय थी। सत्य, सत्कर्म, सद्भावना और सद्व्यवहार की उसकी धर्मविजयी चतुरंगिणी सेना ने विभिन्न दिशाओं में जाकर न केवल भारतीयों, बल्कि विदेशियों को भी नतमस्तक कर दिया। उसने धम्म-महामात्रों, राजुकों और प्रादेशिकों की नियुक्ति कर धर्म का ध्वज अनेक देशों में फहराया और धम्म-विजय प्राप्त की। यह आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विजय स्थायी सिद्ध हुई। ऐसे महान आदर्शवादी सम्राट विश्व इतिहास में विरले ही मिलते हैं।

अशोक का ‘धम्म’ किसी संकीर्ण अर्थ में बौद्ध धर्म का पर्याय नहीं था, बल्कि यह एक सार्वभौमिक नैतिक आचार-संहिता थी, जिसमें माता-पिता तथा गुरुजनों का सम्मान, सत्य-भाषण, अहिंसा, दान, सहिष्णुता, दास-नौकरों के प्रति उदार व्यवहार तथा सभी धर्मों और संप्रदायों के प्रति समान आदर जैसे सार्वभौमिक मूल्य सम्मिलित थे। अशोक स्वयं उपासक (गृहस्थ बौद्ध अनुयायी) बन गया, किंतु उसने कभी भी अन्य धर्मों, जैसे ब्राह्मण धर्म, जैन धर्म तथा आजीवक संप्रदाय के प्रति असहिष्णुता नहीं दिखाई। उसके बारहवें शिलालेख में स्पष्ट रूप से सभी संप्रदायों के प्रति समभाव और परस्पर सम्मान की शिक्षा दी गई है।

धम्म-प्रचार हेतु प्रशासनिक व्यवस्था

धम्म के प्रचार-प्रसार के लिए अशोक ने विशेष अधिकारियों- धम्म-महामात्रों की नियुक्ति की, जिनका कार्य समाज के विभिन्न वर्गों में नैतिक शिक्षा का प्रसार करना तथा प्रजा के कल्याण की देखभाल करना था। इसके अतिरिक्त राजुक और प्रादेशिक जैसे अधिकारी स्थानीय प्रशासन और न्याय-व्यवस्था का संचालन करते थे। हर पाँच वर्ष में अधिकारियों को धम्म-यात्रा (धार्मिक भ्रमण) पर भेजा जाता था, ताकि वे प्रजा की स्थिति का प्रत्यक्ष निरीक्षण कर सकें।

अशोक के अभिलेख : शिलालेख और स्तंभलेख

अशोक की नीतियों और विचारों के प्रत्यक्ष प्रमाण उसके अभिलेखों से प्राप्त होते हैं, जो भारतीय उपमहाद्वीप के विभिन्न भागों में उत्कीर्ण कराए गए। इन्हें मुख्यतः निम्नलिखित श्रेणियों में विभाजित किया जाता है:

चौदह वृहद् शिलालेख : शाहबाजगढ़ी, मानसेहरा, कालसी, गिरनार, सोपारा, येरागुड़ी तथा धौली और जौगड़ (कलिंग के पृथक् शिलालेख) जैसे स्थानों पर मिलते हैं।

लघु शिलालेख : इनमें मास्की अभिलेख विशेष महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें सम्राट का व्यक्तिगत नाम ‘अशोक’ स्पष्ट रूप से अंकित है।

सात स्तंभलेख : दिल्ली-टोपरा, दिल्ली-मेरठ, इलाहाबाद-कौशांबी, लौरिया-नंदनगढ़, लौरिया-अरेराज तथा रामपुरवा में स्थित हैं।

पृथक् कलिंग शिलालेख : धौली और जौगड़ में मिलते हैं, जिनमें स्थानीय प्रजा के प्रति विशेष स्नेह और चिंता व्यक्त की गई है।

गुफा-अभिलेख : बराबर की पहाड़ियों (बिहार) में आजीवक संप्रदाय को दान में दी गई गुफाओं पर उत्कीर्ण।

अधिकांश अभिलेख प्राकृत भाषा और ब्राह्मी लिपि में हैं। उत्तर-पश्चिमी क्षेत्रों (पाकिस्तान-अफगानिस्तान सीमा क्षेत्र) में खरोष्ठी लिपि का प्रयोग हुआ, जबकि कंधार (अफगानिस्तान) से कुछ अभिलेख यूनानी (ग्रीक) और अरामाइक भाषाओं में भी प्राप्त हुए हैं, जिससे पता चलता है कि अशोक का साम्राज्य बहु-भाषी और बहु-सांस्कृतिक जनसंख्या तक फैला हुआ था। सदियों तक विस्मृत रहने के बाद ब्राह्मी लिपि को 1837 ईस्वी में ब्रिटिश विद्वान जेम्स प्रिंसेप ने सफलतापूर्वक पढ़ा, जिसके पश्चात् ही अशोक के व्यक्तित्व और नीतियों का वास्तविक ऐतिहासिक ज्ञान संभव हो सका।

बौद्ध धर्म के प्रसार में अशोक का योगदान

अशोक ने बौद्ध धर्म को संरक्षण दिया और उसके प्रचार-प्रसार को प्रोत्साहित किया। परंपरा के अनुसार अशोक के शासनकाल में लगभग 250 ईसा पूर्व पाटलिपुत्र में तृतीय बौद्ध संगीति (बौद्ध परिषद) का आयोजन हुआ, जिसकी अध्यक्षता स्थविर मोग्गलिपुत्त तिस्स ने की। इस संगीति में बौद्ध धर्म-ग्रंथों को व्यवस्थित रूप दिया गया और विभिन्न देशों में धर्म-प्रचारक भेजने का निर्णय लिया गया।

इसी क्रम में अशोक ने अपने पुत्र महेंद्र (महिंद) और पुत्री संघमित्रा को श्रीलंका भेजा, जहाँ उन्होंने बौद्ध धर्म की स्थापना की। कहा जाता है कि संघमित्रा अपने साथ बोधगया के पवित्र बोधि-वृक्ष की एक शाखा भी श्रीलंका ले गई थीं, जिसे अनुराधापुरा में रोपित किया गया और जो आज भी वहाँ विद्यमान है। इसके अतिरिक्त अशोक ने मिस्र, सीरिया, मकदूनिया (यूनान), साइरीन तथा एपाइरस जैसे दूरस्थ हेलेनिस्टिक राज्यों में भी धर्म-दूत भेजे, जिनका उल्लेख उसके तेरहवें शिलालेख में मिलता है। उसके शासनकाल में बौद्ध धर्म भारत के विभिन्न क्षेत्रों के साथ-साथ श्रीलंका तक भी पहुँचा और आगे चलकर मध्य एशिया व पूर्वी एशिया तक इसके प्रसार की नींव पड़ी।

अशोक ने अनेक स्तूपों और विहारों का निर्माण भी करवाया। परंपरा के अनुसार उसने चौरासी हजार स्तूपों का निर्माण कराया, जिनमें साँची का स्तूप (मध्य प्रदेश) आज भी सर्वाधिक सुरक्षित और प्रसिद्ध है। सारनाथ में उसके द्वारा स्थापित स्तंभ, जिसके शीर्ष पर चार सिंह पीठ से पीठ जोड़कर बैठे हैं, भारतीय कला के इतिहास की अनुपम कृति है।

अशोक की प्रशासनिक नीति और प्रजा-कल्याण

अशोक ने प्रशासन में प्रजा के कल्याण, न्याय, नैतिक आचरण और अधिकारियों की जवाबदेही पर विशेष बल दिया। उसने प्रजा की समस्याओं को सुनने और उनके हितों की रक्षा करने को शासक का दायित्व माना। उसके अभिलेखों से ज्ञात होता है कि उसने मनुष्यों और पशुओं दोनों के लिए चिकित्सा-व्यवस्था स्थापित की, सड़कों के किनारे छायादार वृक्ष लगवाए, कुएँ खुदवाए तथा यात्रियों के विश्राम हेतु सराय (धर्मशालाएँ) बनवाईं। उसने पशु-बलि तथा अनावश्यक पशु-वध पर भी प्रतिबंध लगाया और राजकीय रसोई में पशु-वध को काफी सीमित कर दिया।

द्वितीय शिलालेख के अनुसार अशोक ने न केवल अपने साम्राज्य में, बल्कि चोल, पांड्य, सत्यपुत्र, केरलपुत्र जैसे दक्षिण भारतीय राज्यों तथा श्रीलंका (ताम्रपर्णी) में भी मनुष्यों और पशुओं की चिकित्सा हेतु व्यवस्था करवाई। यह प्राचीन विश्व में लोक-कल्याणकारी राज्य की अवधारणा का एक अत्यंत प्रारंभिक और उल्लेखनीय उदाहरण है।

अशोक बनाम विश्व के अन्य विजेता शासक

कुछ विद्वानों ने अशोक की धार्मिक और शांतिवादी नीति की यह कहकर आलोचना की है कि इसने मगध साम्राज्य की सैनिक शक्ति को कुंठित कर दिया, जिससे अंततः उसका पतन हो गया। किंतु इसका कोई प्रमाण नहीं है कि अशोक की धार्मिकता और शांतिवादिता की नीति से मगध की सामरिक कुशलता का किसी भी प्रकार से ह्रास हुआ। उसने शांतिवादी नीति का अनुसरण इसलिए किया, क्योंकि उसके संपूर्ण साम्राज्य में पूर्णरूपेण शांति और समरसता का वातावरण व्याप्त था और उसकी बाह्य सीमाएँ भी पूर्णतः सुरक्षित थीं। सीमांत और जंगली जातियों को वह जिस प्रकार कठोर शब्दों में चेतावनी देता है, उससे स्वतः सिद्ध होता है कि साम्राज्य में किसी भी प्रकार की सैनिक शिथिलता नहीं आई थी।

विश्व में अनेक विजेता शासक हुए हैं, जिनकी कृतियों से इतिहास के पन्ने भरे पड़े हैं। इनमें सिकंदर, सीज़र और नेपोलियन के नाम अग्रगण्य हैं। यह सही है कि ये तीनों योद्धा और प्रशासक के रूप में कुशल थे, किंतु किसी सम्राट की महानता का मापदंड केवल युद्ध और साम्राज्य-विस्तार नहीं है; वह मानवता के प्रति अपने दृष्टिकोण और उसके लिए किए गए कार्यों के कारण महान बनता है। ये तीनों विजेता क्रूर, निर्दयी और रक्त-पिपासु थे। उनके द्वारा स्थापित साम्राज्य उनके साथ ही छिन्न-भिन्न हो गए और मानवजाति के लिए उनकी कोई स्थायी देन नहीं है।

सिकंदर, सीज़र और नेपोलियन से तुलना

इतिहासकार एच.जी. वेल्स सिकंदर के संबंध में लिखते हैं : “ज्यों-ज्यों उसकी शक्ति बढ़ी, त्यों-त्यों उसकी मदांधता और प्रचंडता भी बढ़ती गई। वह खूब शराब पीता था और निर्दयतापूर्वक हत्याएँ करता था। तैंतीस वर्ष की आयु में ही वह चल बसा। लगभग तुरंत ही उसका साम्राज्य टुकड़े-टुकड़े होने लगा।” इसी प्रकार सीज़र अत्यंत लंपट और उच्छृंखल व्यक्ति था। जब वह अपनी शक्ति की पराकाष्ठा पर था और विश्व का भला कर सकता था, तब वह लगभग एक वर्ष तक मिस्र में क्लियोपेट्रा के साथ रंगरेलियाँ मनाता रहा, यद्यपि उसकी आयु चौवन वर्ष थी। इससे वह निम्नकोटि का विषयासक्त दिखाई देता है, न कि श्रेष्ठ शासक।

जहाँ तक नेपोलियन का प्रश्न है, वेल्स सही कहते हैं कि यदि उसमें तनिक भी दृष्टि की गंभीरता, सृजनात्मक कल्पना-शक्ति और निःस्वार्थ आकांक्षा होती, तो उसने मानवजाति के लिए ऐसा कार्य किया होता, जो इतिहास में उसे सूर्य बना देता। उसने अपने देश का चाहे जितना भला किया हो, मानव-कल्याण के प्रति उसके कार्य प्रायः शून्य हैं। अशोक के व्यक्तित्व में इन विजेता शासकों के कोई भी दुर्गुण नहीं मिलते। यह अशोक ही है, जिसके लोकोपकारी कृतियों और उदात्त आदर्शों के प्रति आज भी विश्व में सम्मान है। निःसंदेह अशोक अपनी प्रजा के भौतिक और आत्मिक कल्याण के लिए किए गए लोकहितकारी कार्यों के कारण विश्वव्यापी और शाश्वत यश का अधिकारी है।

कॉन्स्टेंटाइन, मार्क्स ऑरेलियस, अकबर और सेंट पॉल से तुलना

विभिन्न विद्वानों ने अशोक की तुलना विश्व इतिहास की विभिन्न विभूतियों, जैसे कॉन्स्टेंटाइन, मार्क्स ऑरेलियस, अकबर, सेंट पॉल, नेपोलियन और सीज़र के साथ की है, किंतु इनमें से कोई भी अशोक की बहुमुखी प्रतिभा की बराबरी नहीं कर सकता।

रिज डेविड्स अशोक की तुलना रोमन सम्राट कॉन्स्टेंटाइन से करते हैं। अशोक और कॉन्स्टेंटाइन में केवल यही समानता है कि अशोक ने जिस प्रकार बौद्ध धर्म को ग्रहण कर उसका प्रचार-प्रसार किया, उसी प्रकार कॉन्स्टेंटाइन ने ईसाई धर्म को ग्रहण कर उसका प्रचार-प्रसार करवाया। किंतु कॉन्स्टेंटाइन के उदय से पूर्व ही ईसाई धर्म रोम में काफी लोकप्रिय हो चुका था और उसे अपनाना कॉन्स्टेंटाइन की विवशता बन गई थी। उसने राजनैतिक कारणों से प्रेरित होकर इस धर्म को संरक्षण और प्रोत्साहन दिया, जबकि अशोक के धर्म के पीछे कोई राजनैतिक चाल नहीं थी। अशोक की सहिष्णुता सच्चे हृदय की प्रेरणा थी। कॉन्स्टेंटाइन अपने जीवन के अंतिम दिनों में प्रतिक्रियावादी होकर पेगनवाद की ओर उन्मुख हुआ और उसका धर्म एक विचित्र खिचड़ी बन गया। इसके विपरीत, अशोक में कोई ऐसी गिरावट नहीं दिखाई देती।

इसी प्रकार मैकफैल अशोक की तुलना रोमन सम्राट मार्क्स ऑरेलियस से करते हैं। इसमें संदेह नहीं कि मार्क्स ऑरेलियस एक महान् दार्शनिक था, किंतु जैसा कि भंडारकर लिखते हैं : आदर्श की उदात्तता और अविचलित उत्साह की दृष्टि से अशोक रोमन सम्राट से कहीं ऊपर था। मार्क्स ऑरेलियस ईसाई धर्म के प्रचार को रोमन समृद्धि के लिए घातक मानता था और इस कारण उसने ईसाइयों पर व्यवस्थित ढंग से अत्याचार किए। दूसरी ओर अशोक में धार्मिक कट्टरता या असहिष्णुता का पूर्ण अभाव था। ऐसी स्थिति में अशोक का स्थान मार्क्स ऑरेलियस से कहीं ऊँचा है।

अनेक इतिहासकार अशोक की तुलना मुगल सम्राट अकबर से करते हैं। निःसंदेह अकबर में सहिष्णुता थी और वह सच्चे हृदय से अपनी प्रजा का कल्याण करना चाहता था। विभिन्न धर्मों और संप्रदायों की अच्छी बातों को ग्रहण कर उसने सामान्य जनता के कल्याण के लिए दीन-ए-इलाही नामक नया धर्म चलाया। किंतु जैसा कि भंडारकर ने स्पष्ट किया है, अकबर सबसे पहले एक राजनैतिक और सांसारिक व्यक्ति था। धार्मिक सत्य के लिए वह अपनी बादशाहत को संकट में डालने को तैयार नहीं था। उसने मुस्लिम प्रजा के विरोध से बचने के लिए धार्मिक वाद-विवाद बंद करवा दिए। वह सबके प्रति सहिष्णु भी नहीं था। अकबर में अशोक जैसा धार्मिक उत्साह भी नहीं था। इसी कारण उसका धर्म राजदरबार के बाहर नहीं फैल सका और उसकी मृत्यु के साथ ही समाप्त हो गया। दूसरी ओर, अशोक में कहीं भी असहिष्णुता नहीं दिखाई देती। उसका धर्म विश्वधर्म बन गया। नीलकंठ शास्त्री लिखते हैं कि अशोक को अकबर की अपेक्षा मानव प्रकृति का बेहतर ज्ञान था। इस प्रकार अशोक अकबर की अपेक्षा कहीं अधिक महान् था।

मैकफैल ने अशोक के संदर्भ में सेंट पॉल का नाम लिया है। जिस प्रकार बौद्ध धर्म के इतिहास में अशोक महान व्यक्ति है, उसी प्रकार ईसाई धर्म के इतिहास में सेंट पॉल महान हैं। दोनों ने अपने-अपने धर्मों को जन-सामान्य के लिए कल्याणकारी बनाया। किंतु इसके अतिरिक्त दोनों में कोई समानता नहीं है।

इसी प्रकार अशोक की तुलना एल्फ्रेड, शार्लमेन, उमर खलीफा आदि शासकों से की जाती है, किंतु इनमें से कोई भी अशोक जैसी बहुमुखी प्रतिभा-संपन्न नहीं था। इतिहासकार एच.जी. वेल्स अशोक के व्यक्तित्व और चरित्र का मूल्यांकन करते हुए लिखते हैं : “इतिहास के पन्नों को भरने वाले राजाओं, सम्राटों, धर्माधिकारियों, संतों और महात्माओं के मध्य अशोक का नाम प्रकाशमान है और वह आकाश में प्रायः एकाकी नक्षत्र की भाँति देदीप्यमान है।” वोल्गा से जापान तक आज भी उसके नाम का सम्मान किया जाता है। इसी प्रकार चार्ल्स इलियट ने लिखा है कि पवित्र सम्राटों की दीर्घा में वह अकेला खड़ा है, शायद एक ऐसे व्यक्ति के समान, जिसका अनुराग दयावान और सुखद जीवन के लिए था। वह न तो महान आकांक्षाओं में लीन था, न ही अपनी आत्मा में लवलीन था; वह मानव और पशु का एक हितैषी मात्र था।

आर.सी. दत्त अशोक को भारत का महानतम सम्राट बताते हुए लिखते हैं कि भारत के किसी सम्राट ने, यहाँ तक कि विक्रमादित्य ने भी इतनी प्रतिष्ठा प्राप्त नहीं की और न ही किसी ने धार्मिकता और सदाचार के प्रति अपने उत्साह के कारण विश्व इतिहास पर इतना प्रभाव डाला, जितना मौर्य सम्राट अशोक ने।

अशोक की मृत्यु और मौर्य साम्राज्य का उत्तरकाल

अशोक की मृत्यु लगभग 232 ईसा पूर्व हुई। उसके पश्चात् मौर्य साम्राज्य में उत्तराधिकार को लेकर अस्थिरता उत्पन्न हुई तथा साम्राज्य क्रमशः कमजोर होता गया। पुराणों और अन्य परंपराओं में अशोक के उत्तराधिकारियों- जैसे दशरथ और संप्रति का उल्लेख मिलता है, किंतु इनमें से कोई भी अशोक जैसी योग्यता और दूरदर्शिता प्रदर्शित नहीं कर सका। अंततः मौर्य वंश का अंतिम शासक बृहद्रथ लगभग 185 ईसा पूर्व अपने ही सेनापति पुष्यमित्र शुंग द्वारा मारा गया, जिसके साथ ही मौर्य साम्राज्य का अंत हो गया और शुंग वंश की स्थापना हुई। किंतु साम्राज्य के इस अंतिम पतन का कारण अशोक की धम्म-नीति नहीं, बल्कि उसके उत्तराधिकारियों की अयोग्यता, प्रशासनिक शिथिलता तथा आंतरिक विभाजन को माना जाता है।

अशोक की विरासत और वर्तमान प्रासंगिकता

इस प्रकार विश्व इतिहास में अशोक का स्थान सर्वथा अद्वितीय है। सही अर्थों में वह प्रथम राष्ट्रीय शासक था। आज, जब विश्व के देश हथियारों की होड़ रोकने और युद्ध की विभीषिका को टालने के लिए सतत् प्रयासरत होकर भी सफल नहीं हो पा रहे हैं और मानवता के लिए परमाणु युद्ध का गंभीर संकट बना हुआ है, तब अशोक के कार्यों की महत्ता और प्रासंगिकता स्वयं स्पष्ट हो जाती है। अशोक के उदात्त आदर्श विश्व-शांति की स्थापना के लिए आज भी मार्गदर्शन करते हैं।

स्वतंत्र भारत की सरकार ने सारनाथ-स्तंभ के सिंह-शीर्ष को 26 जनवरी 1950 ईस्वी को राजकीय चिन्ह (राष्ट्रीय प्रतीक) के रूप में स्वीकार कर इस महान् शासक के प्रति अपनी सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित की है। इसी स्तंभ के आधार पर बने धर्मचक्र (चौबीस तीलियों वाला अशोक चक्र) को भारतीय राष्ट्रीय ध्वज के मध्य में स्थान दिया गया है, जो सत्य, धर्म और निरंतर प्रगति का प्रतीक माना जाता है। इस प्रकार अशोक का प्रभाव आज भी भारत की राष्ट्रीय पहचान का अभिन्न अंग बना हुआ है। 2001 ईस्वी में अशोक की स्मृति में ‘अशोक चक्र’ नामक सर्वोच्च शांतिकालीन वीरता पुरस्कार भी भारत सरकार द्वारा स्थापित किया गया, जो उसके शांति और अहिंसा के आदर्शों को आधुनिक संदर्भ में सम्मानित करता है।

इस प्रकार सम्राट अशोक का जीवन इस बात का प्रमाण है कि सच्ची महानता शस्त्र-बल से नहीं, बल्कि करुणा, नैतिकता और लोक-कल्याण की भावना से प्राप्त होती है। कलिंग युद्ध के पश्चात् हुए उसके हृदय-परिवर्तन ने न केवल भारतीय इतिहास की दिशा बदली, बल्कि विश्व को शासन के एक नए आदर्श से परिचित कराया, जहाँ शक्ति का प्रयोग विजय के लिए नहीं, बल्कि प्राणिमात्र के कल्याण के लिए किया जाता है। यही कारण है कि दो हज़ार वर्षों से भी अधिक समय बीत जाने के बाद भी अशोक का नाम आज भी उतने ही सम्मान और श्रद्धा के साथ लिया जाता है।

अशोक के मूल्यांकन से संबंधित महत्त्वपूर्ण FAQs

1. अशोक के अभिलेखों का ऐतिहासिक महत्त्व क्या है?

अशोक के अभिलेख उनके शासन, प्रशासन, धम्म और लोककल्याणकारी नीतियों के प्रत्यक्ष एवं महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं। इनमें तत्कालीन समाज और शासन से संबंधित अनेक सूचनाएँ मिलती हैं।

2. अशोक के अभिलेख किन-किन भाषाओं और लिपियों में मिले हैं?

अधिकांश अभिलेख प्राकृत भाषा और ब्राह्मी लिपि में हैं। उत्तर-पश्चिमी क्षेत्रों में खरोष्ठी, जबकि कुछ अभिलेख यूनानी और अरामाइक भाषाओं में भी मिले हैं।

3. अशोक ने बौद्ध धर्म के प्रसार में क्या भूमिका निभाई?

अशोक ने बौद्ध धर्म को संरक्षण दिया और उसके प्रचार-प्रसार को प्रोत्साहित किया। उनके शासनकाल में बौद्ध धर्म भारत के विभिन्न क्षेत्रों के साथ-साथ श्रीलंका तक भी पहुँचा, जहाँ उनके पुत्र महेंद्र और पुत्री संघमित्रा ने धर्म-प्रचार किया।

4. अशोक की प्रशासनिक नीति की प्रमुख विशेषता क्या थी?

अशोक ने प्रशासन में प्रजा के कल्याण, न्याय, नैतिक आचरण और अधिकारियों की जवाबदेही पर विशेष बल दिया। उन्होंने प्रजा की समस्याओं को सुनने और उनके हितों की रक्षा करने को शासक का दायित्व माना।

5. अशोक को ‘महान्’ क्यों कहा जाता है?

अशोक को ‘महान्’ मुख्यतः उनके कलिंग युद्ध के बाद हुए नैतिक परिवर्तन, धम्म की नीति, धार्मिक सहिष्णुता, लोककल्याणकारी कार्यों और व्यापक साम्राज्य के कारण कहा जाता है। उनके अभिलेख उनकी शासन-दृष्टि के महत्त्वपूर्ण प्रमाण हैं।

6. अशोक चक्र और सारनाथ के सिंह-शीर्ष का भारतीय राष्ट्रीय प्रतीकों में क्या स्थान है?

सारनाथ स्तंभ के सिंह-शीर्ष को 1950 ईस्वी में भारत का राजकीय चिन्ह घोषित किया गया तथा इसी स्तंभ पर उत्कीर्ण धर्मचक्र को भारतीय राष्ट्रीय ध्वज में स्थान दिया गया, जो सत्य और निरंतर प्रगति का प्रतीक है।

7. अशोक के अभिलेखों को पढ़ना कैसे संभव हुआ?

सदियों तक अज्ञात रही ब्राह्मी लिपि को 1837 ईस्वी में ब्रिटिश विद्वान जेम्स प्रिंसेप ने पढ़ा, जिसके बाद ही अशोक के वास्तविक ऐतिहासिक व्यक्तित्व और उसकी नीतियों का पता चल सका।
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