पूर्वीय समस्या का अंतिम चरण : बोस्निया-हर्जेगोविना कांड (The Final Phase of the Eastern Question: The Bosnia-Herzegovina Crisis)

पूर्वीय समस्या का अंतिम चरण : बोस्निया-हर्जेगोविना कांड (The Final Phase of the Eastern Question: The Bosnia-Herzegovina Crisis)

पूर्वीय समस्या का अंतिम चरण : बोस्निया-हर्जेगोविना कांड

एक रूसी राजनेता ने कहा था : ‘निकट-पूर्व की यह घृणित समस्या गठिया के रोग के समान है। कभी यह घुटनों को पीड़ा देती है, तो कभी हाथों को। सौभाग्य है कि यह अभी उदर तक नहीं पहुँची।’ निकट-पूर्व (पूर्वीय) समस्या की जटिलता को देखते हुए उसका यह कथन अक्षरशः सत्य प्रतीत होता है। 1878 ई. की बर्लिन संधि के बाद शायद ही कोई ऐसा वर्ष बीता हो, जब इस क्षेत्र में कोई गंभीर अंतरराष्ट्रीय संकट उत्पन्न न हुआ हो। रूमेलिया का प्रश्न, आर्मेनियाई हत्याकांड, महान यूनान (ग्रेट ग्रीस) आंदोलन, ‘अखिल स्लाव आंदोलन’ (पैन-स्लाववाद) तथा ऑस्ट्रिया-हंगरी की ‘पूर्व की ओर विस्तार’ की नीति जैसी घटनाओं ने बाल्कन क्षेत्र को यूरोपीय राजनीति का सबसे संवेदनशील और विस्फोटक क्षेत्र बना दिया था। यह अनुमान लगाना कठिन था कि इन घटनाओं में से कौन-सी घटना पूरे यूरोप को युद्ध की आग में झोंक देगी। फिर भी, उस समय तक जो कुछ घटित हुआ था, वह आगे होने वाली घटनाओं की तुलना में बहुत कम भयावह था। वस्तुतः तुर्की साम्राज्य और बाल्कन प्रायद्वीप की राजनीति ऐसे ज्वालामुखी के शिखर पर खड़ी थी, जो किसी भी क्षण भयंकर विस्फोट कर सकता था।

7 अक्टूबर 1908 ई. को ऑस्ट्रिया-हंगरी ने औपचारिक रूप से बोस्निया और हर्जेगोविना नामक दो स्लाव-बहुल प्रांतों को अपने साम्राज्य में मिला लिया। यह घटना केवल क्षेत्रीय विस्तार का प्रश्न नहीं थी, बल्कि यूरोप की शक्ति-संतुलन व्यवस्था को चुनौती देने वाली घटना सिद्ध हुई। इसके पीछे सबसे महत्त्वपूर्ण कारण ऑस्ट्रिया-हंगरी और सर्बिया के बीच बढ़ता हुआ वैर था, जो बीसवीं शताब्दी के प्रथम दशक तक अपनी चरम सीमा पर पहुँच चुका था।

पूर्व की ओर साम्राज्यवादी विस्तार ऑस्ट्रिया-हंगरी की विदेश नीति का प्रमुख आधार था। इसके पीछे अनेक राजनीतिक तथा आर्थिक कारण थे। आर्थिक दृष्टि से ऑस्ट्रिया के लिए यह आवश्यक था कि उसके साम्राज्य का समुद्र तक सुगम और सुरक्षित संपर्क बना रहे। किंतु एड्रियाटिक सागर का तट उसके अधिकार में बहुत सीमित था। दूसरी ओर इटली और सर्बिया दोनों ही इस तट पर अपना प्रभाव स्थापित करना चाहते थे। विशेष रूप से सर्बिया, जो आकार में छोटा राज्य था, एड्रियाटिक सागर तक पहुँचने के लिए निरंतर प्रयासरत था। ऑस्ट्रिया-हंगरी इसे अपनी सामरिक तथा आर्थिक सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती मानता था और किसी भी परिस्थिति में सर्बिया की इन आकांक्षाओं को सफल नहीं होने देना चाहता था।

ऑस्ट्रिया-हंगरी और सर्बिया के बीच तनाव का एक अन्य प्रमुख कारण बोस्निया और हर्जेगोविना का प्रश्न था। 1878 ई. की बर्लिन संधि के अनुसार इन दोनों प्रांतों का प्रशासन ऑस्ट्रिया-हंगरी को सौंप दिया गया था, यद्यपि वे औपचारिक रूप से अब भी उस्मानी (ऑटोमन) साम्राज्य का भाग माने जाते थे। इन प्रांतों की अधिकांश जनसंख्या दक्षिणी स्लाव जातियों से संबंधित थी, जिनमें बड़ी संख्या सर्बों की थी। सर्बिया नहीं चाहता था कि इन क्षेत्रों पर ऑस्ट्रिया का स्थायी अधिकार स्थापित हो। इसके विपरीत, सर्ब राष्ट्रवादियों का उद्देश्य इन प्रदेशों को ऑस्ट्रिया के शासन से मुक्त कराकर सर्बिया के साथ मिलाना तथा समस्त दक्षिणी स्लावों का एक शक्तिशाली राज्य स्थापित करना था। यही विचार आगे चलकर ‘महान सर्बिया’ की अवधारणा के रूप में विकसित हुआ।

पूर्वीय समस्या का अंतिम चरण : बोस्निया-हर्जेगोविना कांड (The Final Phase of the Eastern Question: The Bosnia-Herzegovina Crisis)
पूर्वीय समस्या का अंतिम चरण

सर्बिया में राष्ट्रीय चेतना और पैन-स्लाववाद के प्रभाव के साथ-साथ रूस के प्रति उसका बढ़ता झुकाव ऑस्ट्रिया-हंगरी के शासकों के लिए अत्यंत चिंताजनक था। उन्हें यह भय सताने लगा कि यदि इस आंदोलन को समय रहते नहीं रोका गया, तो उनके बहुजातीय साम्राज्य की अखंडता संकट में पड़ जाएगी। ऑस्ट्रिया-हंगरी के अधीन केवल सर्ब ही नहीं, बल्कि चेक, स्लोवाक, क्रोएट, स्लोवेन, रोमानियाई तथा अन्य अनेक जातियाँ भी निवास करती थीं। यदि सर्बिया के नेतृत्व में दक्षिणी स्लाव एकत्रित होकर स्वतंत्रता प्राप्त कर लेते, तो अन्य राष्ट्रीयताएँ भी स्वतंत्रता की माँग करने लगतीं। ऐसी स्थिति में हाप्सबुर्ग साम्राज्य का विघटन लगभग निश्चित था। इसलिए ऑस्ट्रिया-हंगरी के शासकों ने यह निश्चय किया कि ‘महान सर्बिया’ आंदोलन को प्रारंभिक अवस्था में ही कठोरता से दबा दिया जाए।

इस परिस्थिति ने ऑस्ट्रिया को सर्ब राष्ट्रवादी आंदोलन के विरुद्ध निर्णायक कदम उठाने के लिए प्रेरित किया। 1905 ई. के रूस-जापान युद्ध में रूस की पराजय तथा उसके बाद 1905 ई. की क्रांति के कारण रूस आंतरिक और बाह्य दोनों दृष्टियों से कमजोर हो चुका था। ऐसी स्थिति में उसके लिए सर्बिया को प्रभावी सैन्य सहायता देना संभव नहीं था। ऑस्ट्रिया-हंगरी ने इसे अपने लिए अत्यंत अनुकूल अवसर माना। उसने निश्चय किया कि सर्वप्रथम बोस्निया और हर्जेगोविना को औपचारिक रूप से अपने साम्राज्य में मिला लिया जाए, जिससे वहाँ पनप रहे सर्ब राष्ट्रवादी आंदोलन का स्थायी समाधान किया जा सके। चूँकि इन दोनों प्रांतों की अधिकांश जनसंख्या स्लाव थी और वे ‘महान सर्बिया’ आंदोलन के प्रति सहानुभूति रखती थी, इसलिए ऑस्ट्रिया के लिए उनका विलय साम्राज्य की सुरक्षा का प्रश्न बन गया था।

यद्यपि रूस उस समय सैन्य दृष्टि से दुर्बल था, फिर भी उसकी शक्ति पूरी तरह समाप्त नहीं हुई थी। वह अब भी यूरोप की प्रमुख शक्तियों में गिना जाता था तथा ब्रिटेन और फ्रांस के साथ उसके मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित हो चुके थे। दूसरी ओर, बोस्निया-हर्जेगोविना का औपचारिक विलय 1878 ई. की बर्लिन संधि की भावना और शर्तों का स्पष्ट उल्लंघन था। इसलिए रूस स्वाभाविक रूप से इस कदम का विरोध करने के लिए तैयार था, भले ही तत्काल युद्ध छेड़ने की स्थिति में वह न हो।

उस समय रूस का विदेश मंत्री अलेक्ज़ेंडर इस्वोल्स्की था। वह अत्यंत महत्त्वाकांक्षी और दूरदर्शी राजनेता माना जाता था। रूस-जापान युद्ध की पराजय के बाद रूस की अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा को पुनः स्थापित करना उसकी विदेश नीति का प्रमुख उद्देश्य था। इसी लक्ष्य की पूर्ति के लिए उसने 1907 ई. में ब्रिटेन के साथ समझौता कर त्रि-मित्र संधि को सुदृढ़ बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

इस्वोल्स्की की एक अन्य महत्त्वपूर्ण अभिलाषा बोस्पोरस और डार्डेनल्स नामक जलडमरूमध्यों के प्रश्न से जुड़ी हुई थी। ये जलमार्ग काला सागर को भूमध्यसागर से जोड़ते थे और रूस की सामरिक तथा व्यापारिक सुरक्षा की दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण थे। बर्लिन संधि के अनुसार इन जलडमरूमध्यों से किसी भी विदेशी युद्धपोत के आवागमन पर प्रतिबंध था। यद्यपि यह व्यवस्था रूस की सुरक्षा के लिए कुछ सीमा तक लाभदायक थी, फिर भी उसी प्रतिबंध के कारण रूसी युद्धपोत भी स्वतंत्र रूप से इन मार्गों का उपयोग नहीं कर सकते थे। रूस इस स्थिति से संतुष्ट नहीं था। उसकी इच्छा थी कि उसके युद्धपोतों को इन जलमार्गों से निर्बाध आवागमन का अधिकार प्राप्त हो, जबकि अन्य देशों के युद्धपोतों पर प्रतिबंध बना रहे। अतः बोस्पोरस और डार्डेनल्स के प्रश्न का अपने पक्ष में समाधान करना इस्वोल्स्की की परराष्ट्र नीति का एक प्रमुख उद्देश्य बन गया था।

बुशलाउ की वार्ता

27 जनवरी 1908 ई. को अलोइस ऐरेन्थाल ऑस्ट्रिया-हंगरी का विदेश मंत्री नियुक्त हुआ। वह एक कुशल, दूरदर्शी और महत्त्वाकांक्षी कूटनीतिज्ञ था तथा ‘महान सर्बिया’ आंदोलन का कट्टर विरोधी माना जाता था। उसका विश्वास था कि यदि इस आंदोलन को समय रहते नहीं रोका गया, तो यह हाप्सबुर्ग साम्राज्य की एकता और अस्तित्व के लिए गंभीर संकट बन जाएगा। इसलिए विदेश मंत्री का पद ग्रहण करते ही उसने बोस्निया और हर्जेगोविना को औपचारिक रूप से ऑस्ट्रिया-हंगरी के साम्राज्य में सम्मिलित करने का निश्चय कर लिया। किंतु यह कार्य बिना रूस की सहमति या कम-से-कम उसकी निष्क्रिय स्वीकृति के संभव नहीं था। इसलिए ऐरेन्थाल ने रूस को अपने पक्ष में करने के लिए गुप्त कूटनीतिक प्रयास प्रारंभ किए।

इसी उद्देश्य से ऑस्ट्रिया-हंगरी के विदेश मंत्री ऐरेन्थाल तथा रूस के विदेश मंत्री अलेक्ज़ेंडर इस्वोल्स्की के बीच सितंबर 1908 ई. में बुशलाउ में एक गुप्त वार्ता हुई। इतिहास में इसे बुशलाउ समझौता अथवा बुशलाउ वार्ता के नाम से जाना जाता है। वस्तुतः यह बर्लिन संधि (1878 ई.) की व्यवस्था को परिवर्तित करने का एक गुप्त कूटनीतिक प्रयास था। इस वार्ता में इस्वोल्स्की ने संकेत दिया कि यदि ऑस्ट्रिया-हंगरी बोस्निया और हर्जेगोविना का औपचारिक विलय कर ले, तो रूस उसका विरोध नहीं करेगा। इसके बदले ऐरेन्थाल ने रूस की उस माँग के प्रति सहानुभूति व्यक्त की, जिसके अनुसार रूस बोस्पोरस और डार्डेनल्स जलडमरूमध्यों से अपने युद्धपोतों के आवागमन पर लगे प्रतिबंध को समाप्त कराना चाहता था।

यद्यपि दोनों मंत्रियों के बीच सिद्धांततः सहमति बन गई थी, फिर भी इस वार्ता में न तो बोस्निया-हर्जेगोविना के विलय की कोई निश्चित तिथि निर्धारित की गई और न ही जलडमरूमध्यों के प्रश्न के समाधान के लिए कोई स्पष्ट कार्यक्रम बनाया गया। यही अस्पष्टता आगे चलकर दोनों देशों के बीच गंभीर विवाद का कारण बनी। इस्वोल्स्की का अनुमान था कि ऑस्ट्रिया-हंगरी किसी भी कदम से पहले यूरोप की अन्य महाशक्तियों से विचार-विमर्श करेगा और अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन बुलाया जाएगा। दूसरी ओर ऐरेन्थाल ने इस मौखिक सहमति को तत्काल कार्रवाई की अनुमति के रूप में ग्रहण कर लिया।

बुशलाउ वार्ता के बाद इस्वोल्स्की सीधे रूस वापस नहीं लौटा। वह पहले पेरिस, लंदन और रोम गया, जहाँ उसने फ्रांस, ब्रिटेन और इटली के नेताओं से जलडमरूमध्यों के प्रश्न पर समर्थन प्राप्त करने का प्रयास किया। उसकी योजना थी कि पहले यूरोप की महाशक्तियों की सहमति प्राप्त कर ली जाए और उसके बाद ही बर्लिन संधि में संशोधन का प्रश्न उठाया जाए। किंतु जब वह इस कूटनीतिक यात्रा में व्यस्त था, उसी समय ऐरेन्थाल ने अवसर का लाभ उठाते हुए अपेक्षा से कहीं अधिक शीघ्रता दिखाई।

6 अक्टूबर 1908 ई. को सम्राट फ्रांसिस जोज़ेफ़ प्रथम ने घोषणा कर दी कि बोस्निया और हर्जेगोविना अब औपचारिक रूप से ऑस्ट्रिया-हंगरी के अभिन्न अंग हैं। यह घोषणा पूरे यूरोप के लिए अत्यंत चौंकाने वाली थी। रूस और सर्बिया दोनों इस कदम से स्तब्ध रह गए, क्योंकि उन्हें बुशलाउ वार्ता की वास्तविक परिस्थितियों का कोई ज्ञान नहीं था। सर्बिया में इस घोषणा के विरुद्ध तीव्र आक्रोश फैल गया। वहाँ के समाचार-पत्रों ने ऑस्ट्रिया-हंगरी पर बर्लिन संधि का उल्लंघन करने का आरोप लगाया तथा सरकार से युद्ध की तैयारी करने की माँग की।

सर्बिया के लिए यह केवल क्षेत्रीय विवाद नहीं था, बल्कि राष्ट्रीय सम्मान और दक्षिणी स्लावों की एकता का प्रश्न था। बोस्निया और हर्जेगोविना में बड़ी संख्या में सर्ब जाति के लोग निवास करते थे, जिन्हें सर्बिया अपने राष्ट्रीय समुदाय का अंग मानता था। ऐसे प्रदेशों का ऑस्ट्रिया-हंगरी में विलय सर्ब राष्ट्रवादियों के लिए असहनीय था। फलतः सर्बिया ने सैन्य तैयारियाँ आरंभ कर दीं और रूस से सहायता की प्रार्थना की।

दूसरी ओर, 6 अक्टूबर की घोषणा के बाद रूस के विदेश मंत्री इस्वोल्स्की की स्थिति अत्यंत दयनीय हो गई। यूरोप में यह धारणा बनने लगी कि रूस ने ऑस्ट्रिया-हंगरी के इस कदम की मौन स्वीकृति दे दी थी। अपनी प्रतिष्ठा बचाने तथा रूस के हितों की रक्षा करने के लिए इस्वोल्स्की ने प्रस्ताव रखा कि इस पूरे विवाद का समाधान यूरोप की महाशक्तियों के एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में किया जाए। उसे आशा थी कि सम्मेलन में एक ओर बोस्निया-हर्जेगोविना के विलय को औपचारिक मान्यता मिल जाएगी, तो दूसरी ओर रूस को जलडमरूमध्यों के संबंध में भी कुछ रियायतें प्राप्त हो जाएँगी। उसके विचार में यही एकमात्र ऐसा मार्ग था, जिससे रूस अपनी कूटनीतिक पराजय को कुछ सीमा तक संतुलित कर सकता था।

इसी उद्देश्य से इस्वोल्स्की यूरोप की विभिन्न राजधानियों में लगातार दौरा करता रहा और सम्मेलन बुलाने के पक्ष में समर्थन जुटाने का प्रयास करता रहा। किंतु ऐरेन्थाल किसी भी प्रकार के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का प्रबल विरोधी था। वह नहीं चाहता था कि ऑस्ट्रिया-हंगरी द्वारा किए गए कार्य की पुनः समीक्षा हो या महाशक्तियाँ उसके निर्णय में हस्तक्षेप करें।

22 अक्टूबर 1908 ई. को ऐरेन्थाल ने स्पष्ट कर दिया कि यदि सम्मेलन बुलाया भी जाए, तो उसकी एकमात्र शर्त यह होगी कि सम्मेलन प्रारंभ होने से पहले ही सभी महाशक्तियाँ बोस्निया और हर्जेगोविना पर ऑस्ट्रिया-हंगरी के अधिकार को बिना किसी चर्चा के स्वीकार कर लें। स्पष्ट था कि ऐसी स्थिति में सम्मेलन बुलाने का कोई वास्तविक औचित्य नहीं रह जाता, क्योंकि जिस विषय पर विचार होना था, उसी का निर्णय पहले से निर्धारित कर दिया जाता।

इस संकट के दौरान जर्मनी ने अपने सहयोगी ऑस्ट्रिया-हंगरी का पूर्ण समर्थन किया। जर्मन साम्राज्य के चांसलर प्रिंस बर्नहार्ड फ़ॉन बुलो ने ऐसा कदम उठाया, जिसने अंततः यूरोप को तत्काल युद्ध से बचा लिया। 22 मार्च 1909 ई. को जर्मन सरकार ने रूस को एक कठोर संदेश भेजा। उसमें कहा गया कि जर्मनी ऑस्ट्रिया-हंगरी का समर्थन करता है और वह जानना चाहता है कि क्या रूस ऑस्ट्रिया के प्रस्ताव को स्वीकार करेगा। जर्मनी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि उसे केवल ‘हाँ’ या ‘नहीं’ में उत्तर चाहिए; किसी प्रकार का अस्पष्ट उत्तर अस्वीकार माना जाएगा। यदि रूस ने प्रस्ताव अस्वीकार किया, तो उसके परिणामों की समस्त जिम्मेदारी उसी पर होगी।

यद्यपि यह पत्र औपचारिक रूप से युद्ध की घोषणा नहीं था, फिर भी उसकी भाषा अत्यंत कठोर और धमकीपूर्ण थी। वस्तुतः यह रूस पर तीव्र कूटनीतिक दबाव डालने का प्रयास था। उस समय रूस अभी भी सैन्य दृष्टि से पर्याप्त सशक्त नहीं हुआ था और वह जर्मनी तथा ऑस्ट्रिया-हंगरी से युद्ध का जोखिम उठाने की स्थिति में नहीं था। परिणामस्वरूप इस्वोल्स्की ने विवश होकर जर्मनी के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया।

रूस ने यह मान लिया कि बोस्निया और हर्जेगोविना के विलय से उसके प्रत्यक्ष अधिकारों का कोई उल्लंघन नहीं हुआ है। रूस के पीछे हटने के बाद सर्बिया भी अलग-थलग पड़ गया। यूरोप की महाशक्तियों की सलाह पर उसने भी बोस्निया-हर्जेगोविना के विलय को स्वीकार कर लिया तथा यह आश्वासन दिया कि भविष्य में वह ऑस्ट्रिया-हंगरी के विरुद्ध शत्रुतापूर्ण नीति नहीं अपनाएगा और एक अच्छे पड़ोसी राज्य की भाँति व्यवहार करेगा। इस प्रकार 1909 ई. तक बोस्निया संकट का तत्काल समाधान हो गया।

बोस्निया कांड का महत्त्व

इतिहासकार प्रोफेसर जी. पी. गूच के अनुसार बोस्निया संकट यूरोपीय विदेश मंत्रालयों के बीच लड़ा गया एक ‘रक्तहीन युद्ध’ था। यद्यपि इसमें तत्काल कोई व्यापक सैन्य संघर्ष नहीं हुआ, फिर भी इसने यूरोप की कूटनीतिक व्यवस्था को गहरे स्तर पर प्रभावित किया। इस संकट ने रूस का गंभीर अपमान किया, सर्बिया के भीतर प्रतिशोध की भावना को तीव्र किया और ऑस्ट्रिया-हंगरी तथा जर्मनी के आत्मविश्वास को अत्यधिक बढ़ा दिया। यही कारण है कि इतिहासकार इसे प्रथम विश्वयुद्ध की पृष्ठभूमि तैयार करने वाली सबसे महत्त्वपूर्ण घटनाओं में गिनते हैं।

यह संकट ऐरेन्थाल की व्यक्तिगत कूटनीतिक विजय भी माना जाता है। उसने अत्यंत चतुराई से बर्लिन संधि की व्यवस्था को निष्प्रभावी बना दिया और बिना किसी युद्ध के बोस्निया तथा हर्जेगोविना को ऑस्ट्रिया-हंगरी में मिला लिया। इससे हाप्सबुर्ग साम्राज्य का आत्मविश्वास बढ़ा और यूरोप को यह संदेश मिला कि ऑस्ट्रिया-हंगरी अब भी एक प्रभावशाली महाशक्ति है।

किंतु दीर्घकालीन दृष्टि से यह विजय उतनी लाभकारी सिद्ध नहीं हुई। ऑस्ट्रिया-हंगरी ने सर्बिया को अपमानित अवश्य कर दिया, परंतु उसके राष्ट्रवादी आंदोलन को समाप्त नहीं कर सका। ऐरेन्थाल का यह विश्वास कि ‘महान सर्बिया’ आंदोलन अब समाप्त हो जाएगा, उसकी सबसे बड़ी राजनीतिक भूल सिद्ध हुई। सर्बिया ने परिस्थितियों के कारण अस्थायी रूप से समझौता कर लिया, किंतु उसके भीतर प्रतिशोध की भावना और अधिक प्रबल हो गई। कुछ ही वर्षों में सर्बिया ऑस्ट्रिया-विरोधी गुप्त संगठनों और षड्यंत्रों का प्रमुख केंद्र बन गया। अंततः इसी वातावरण में 28 जून 1914 ई. को सारायेवो में ऑस्ट्रिया के युवराज आर्कड्यूक फ्रांज़ फर्डिनांड की हत्या हुई, जिसने प्रथम विश्वयुद्ध की चिनगारी को जन्म दिया। इस प्रकार बोस्निया-कांड केवल एक कूटनीतिक विवाद नहीं था, बल्कि वह घटना थी जिसने यूरोप को विश्वयुद्ध की दिशा में निर्णायक रूप से आगे बढ़ा दिया।

पूर्वीय समस्या का अंतिम चरण : बोस्निया-हर्जेगोविना कांड (The Final Phase of the Eastern Question: The Bosnia-Herzegovina Crisis)
सारायेवो में ऑस्ट्रिया के युवराज आर्कड्यूक फ्रांज़ फर्डिनांड की हत्या
बाल्कन युद्ध
बाल्कन संघ की स्थापना

1908 ई. के बोस्निया संकट ने बाल्कन क्षेत्र की राजनीति को पूरी तरह बदल दिया। ऑस्ट्रिया-हंगरी द्वारा बोस्निया और हर्जेगोविना के विलय ने केवल सर्बिया को ही नहीं, बल्कि समस्त स्लाव जगत को गहरे आक्रोश से भर दिया। विशेष रूप से सर्बों के बीच यह भावना प्रबल हो गई कि यदि बाल्कन के स्वतंत्र ईसाई राज्य संगठित नहीं हुए, तो न तो वे अपने पराधीन जातीय बंधुओं को मुक्त करा सकेंगे और न ही ऑस्ट्रिया-हंगरी तथा उस्मानी (ऑटोमन) साम्राज्य जैसी महाशक्तियों का सामना कर पाएँगे।

उस समय बाल्कन के प्रमुख स्वतंत्र राज्य—सर्बिया, बुल्गारिया, यूनान (ग्रीस) और मोंटेनेग्रो अलग-अलग कार्य कर रहे थे। इन राज्यों के बीच अनेक सीमा-विवाद और परस्पर अविश्वास भी था। परिणामस्वरूप वे अपनी सामूहिक शक्ति का उपयोग नहीं कर पाते थे। दूसरी ओर उनके विरोधी, ऑस्ट्रिया-हंगरी और उस्मानी साम्राज्य, सैन्य एवं राजनीतिक दृष्टि से उनसे कहीं अधिक शक्तिशाली थे। ऐसी परिस्थिति में यह अनुभव किया गया कि यदि बाल्कन के स्वतंत्र राज्य आपसी मतभेद भुलाकर एक संयुक्त संगठन बना लें, तो वे अपने साझा शत्रुओं का अधिक प्रभावी ढंग से सामना कर सकते हैं। इसी विचार से बाल्कन संघ की स्थापना का मार्ग प्रशस्त हुआ।

बाल्कन संघ के निर्माण में रूस की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण थी। बोस्निया संकट के समय रूस को ऑस्ट्रिया-हंगरी और जर्मनी के सामने गंभीर कूटनीतिक अपमान सहना पड़ा था। रूस इस पराजय को भूला नहीं था और अवसर मिलने पर ऑस्ट्रिया-हंगरी को चुनौती देना चाहता था। साथ ही, रूस स्वयं को समस्त स्लाव जातियों का संरक्षक मानता था। पैन-स्लाववाद की भावना तथा अपने सामरिक हितों के कारण वह बाल्कन के ईसाई राज्यों को संगठित कर अपने प्रभाव क्षेत्र में रखना चाहता था। रूस को आशा थी कि यदि बाल्कन के छोटे-छोटे राज्य उसके नेतृत्व में एकजुट हो जाएँ, तो वे उसके विश्वसनीय सहयोगी बनेंगे और वह बाल्कन की राजनीति में निर्णायक प्रभाव स्थापित कर सकेगा।

रूस की इस नीति के प्रमुख समर्थक बेलग्रेड में रूसी राजदूत निकोलाई हार्टविग तथा सोफिया में रूसी राजदूत नेकल्यूदोव थे। इन दोनों राजनयिकों के प्रयासों से 13 मार्च 1912 ई. को सर्बिया और बुल्गारिया के बीच एक महत्त्वपूर्ण संधि हुई। इस संधि के अनुसार यदि कोई महाशक्ति बाल्कन प्रायद्वीप के किसी भाग पर अधिकार स्थापित करने का प्रयास करेगी, तो दोनों देश एक-दूसरे की सहायता करेंगे और संयुक्त रूप से उसका विरोध करेंगे। औपचारिक रूप से यह संधि रक्षात्मक थी, किंतु इसमें एक गुप्त धारा भी सम्मिलित थी। इस गुप्त प्रावधान के अनुसार यदि तुर्की साम्राज्य में आंतरिक अव्यवस्था फैल जाए अथवा वह किसी युद्ध में उलझ जाए, जिससे बाल्कन की राजनीतिक स्थिति में परिवर्तन की संभावना उत्पन्न हो, तो रूस की सहमति से दोनों देश संयुक्त सैनिक कार्रवाई कर सकते थे।

इसके बाद 29 मई 1912 ई. को बुल्गारिया और यूनान के बीच भी एक समान संधि संपन्न हुई। यद्यपि सर्बिया और बुल्गारिया की संधि का मुख्य उद्देश्य ऑस्ट्रिया-हंगरी की संभावित नीति का सामना करना था, जबकि बुल्गारिया और यूनान की संधि मुख्यतः तुर्की के विरुद्ध थी, फिर भी इन दोनों समझौतों ने मिलकर बाल्कन संघ की आधारशिला रखी। अगस्त 1912 ई. में मोंटेनेग्रो भी इस संगठन में सम्मिलित हो गया। इस प्रकार सर्बिया, बुल्गारिया, यूनान और मोंटेनेग्रो—इन चार राज्यों का संयुक्त संगठन बाल्कन संघ कहलाया। अगले दो वर्षों तक यही संघ यूरोप की राजनीति का सबसे सक्रिय और विस्फोटक शक्ति-समूह बना रहा।

पूर्वीय समस्या का अंतिम चरण : बोस्निया-हर्जेगोविना कांड (The Final Phase of the Eastern Question: The Bosnia-Herzegovina Crisis)
बाल्कन संघ की स्थापना
प्रथम बाल्कन युद्ध (1912–1913 ई.)

बाल्कन संघ की स्थापना का वास्तविक उद्देश्य तुर्की की दुर्बलता का लाभ उठाकर यूरोप में उसके शेष प्रदेशों पर अधिकार करना था। उस समय उस्मानी साम्राज्य आंतरिक विद्रोहों, प्रशासनिक भ्रष्टाचार तथा राजनीतिक अस्थिरता से जूझ रहा था। बाल्कन संघ के सदस्य राज्यों ने यह निष्कर्ष निकाला कि यदि इस अवसर का लाभ नहीं उठाया गया, तो भविष्य में ऐसा अवसर पुनः प्राप्त नहीं होगा। इसलिए उन्होंने तुर्की के विरुद्ध युद्ध की तैयारी प्रारंभ कर दी।

युद्ध का तात्कालिक कारण मैसिडोनिया का प्रश्न था। 1878 ई. की बर्लिन संधि के अनुसार मैसिडोनिया उस्मानी साम्राज्य के अधीन बना रहा। यह प्रदेश जातीय दृष्टि से अत्यंत मिश्रित था। यहाँ बुल्गार, सर्ब, यूनानी, अल्बानियाई तथा अन्य समुदाय निवास करते थे। इसी कारण सर्बिया, बुल्गारिया और यूनान तीनों इस क्षेत्र पर अपना अधिकार स्थापित करना चाहते थे।

मैसिडोनिया पर प्रभुत्व स्थापित करने के प्रयास में बुल्गारिया सबसे अधिक सक्रिय था। उसने वहाँ अनेक क्रांतिकारी संगठनों को प्रोत्साहित किया, जो तुर्की शासन के विरुद्ध आंदोलन चलाते थे। इन आंदोलनों को दबाने के लिए उस्मानी सरकार ने कठोर दमन की नीति अपनाई। तुर्की की इस क्रूरता से यूरोप की महाशक्तियाँ चिंतित हो उठीं और 1903 ई. में उन्होंने हस्तक्षेप कर मैसिडोनिया में कुछ प्रशासनिक सुधार लागू करवाए। इन सुधारों से कुछ समय के लिए शांति स्थापित हुई, किंतु 1908 ई. में ‘युवा तुर्क आंदोलन’ के सत्ता में आने के बाद इन सुधारों की उपेक्षा कर दी गई। परिणामस्वरूप मैसिडोनिया में पुनः अशांति फैल गई।

अब बुल्गारिया, सर्बिया और यूनान—तीनों अपने-अपने समर्थकों के माध्यम से मैसिडोनिया में प्रभाव बढ़ाने लगे। इससे वहाँ की स्थिति और अधिक विस्फोटक हो गई। युवा तुर्क सरकार ने विद्रोहों को समाप्त करने के लिए कठोर सैन्य दमन प्रारंभ किया। बाल्कन संघ ने इसका विरोध करते हुए माँग की कि तुर्की 1903 ई. के सुधारों को पुनः लागू करे तथा मैसिडोनिया के ईसाई निवासियों को पर्याप्त अधिकार प्रदान करे। किंतु तुर्की सरकार ने इन माँगों को अस्वीकार कर दिया।

तुर्की के इनकार के बाद अक्टूबर 1912 ई. में बाल्कन संघ के चारों सदस्य राज्यों—सर्बिया, बुल्गारिया, यूनान और मोंटेनेग्रो—ने संयुक्त रूप से उस्मानी साम्राज्य पर आक्रमण कर दिया। यही प्रथम बाल्कन युद्ध कहलाता है।

युद्ध के प्रारंभ से ही बाल्कन संघ की संयुक्त सेनाओं ने उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की। चारों दिशाओं से हुए आक्रमण का सामना करने में तुर्की की सेना असमर्थ सिद्ध हुई। बुल्गारिया की सेना ने पूर्वी थ्रेस में तुर्की को पराजित करते हुए चाताल्जा तक पहुँचकर कॉन्स्टेंटिनोपल (इस्तांबुल) को गंभीर खतरे में डाल दिया। यूनान ने महत्वपूर्ण बंदरगाह सेलोनिका (थेसालोनिकी) पर अधिकार कर लिया। मोंटेनेग्रो ने उत्तरी अल्बानिया की ओर सफल अभियान चलाया। सबसे उल्लेखनीय सफलता सर्बिया को मिली, जिसने मैसिडोनिया के बड़े भाग पर अधिकार करने के साथ-साथ अल्बानिया की ओर बढ़ते हुए एड्रियाटिक सागर तक पहुँचने का प्रयास किया।

लगातार पराजयों से विवश होकर तुर्की ने युद्धविराम और शांति वार्ता का प्रस्ताव रखा। किंतु विजयी बाल्कन राज्यों ने अत्यधिक क्षेत्रीय माँगें प्रस्तुत कीं, जिन्हें तुर्की स्वीकार करने को तैयार नहीं था। परिणामस्वरूप वार्ता विफल हो गई और युद्ध पुनः प्रारंभ हो गया। दूसरी बार भी तुर्की को गंभीर पराजय का सामना करना पड़ा और अंततः उसे पुनः शांति की याचना करनी पड़ी।

युद्ध से उत्पन्न गंभीर अंतरराष्ट्रीय स्थिति पर विचार करने के लिए यूरोप की महाशक्तियों ने दिसंबर 1912 ई. में लंदन सम्मेलन आयोजित किया। ब्रिटेन के विदेश मंत्री सर एडवर्ड ग्रे की अध्यक्षता में राजदूतों का यह सम्मेलन प्रारंभ हुआ, जिसमें बाल्कन क्षेत्र की नई राजनीतिक व्यवस्था पर विचार किया गया। इसके परिणामस्वरूप बाल्कन प्रायद्वीप का राजनीतिक मानचित्र पुनः निर्धारित किया गया। अंततः 30 मई 1913 ई. की लंदन संधि द्वारा उस्मानी साम्राज्य ने एनोस–मिडिया रेखा के पश्चिम स्थित लगभग सभी यूरोपीय प्रदेशों का त्याग कर दिया।

प्रथम बाल्कन युद्ध का सबसे महत्त्वपूर्ण परिणाम यह था कि यूरोप में उस्मानी साम्राज्य का प्रभुत्व लगभग समाप्त हो गया। तुर्की के पास केवल पूर्वी थ्रेस और कॉन्स्टेंटिनोपल का सीमित क्षेत्र ही शेष रह गया, जबकि मैसिडोनिया, कोसोवो तथा अन्य अधिकांश यूरोपीय प्रदेश बाल्कन राज्यों के अधिकार में आ गए। यद्यपि यह युद्ध तुर्की के विरुद्ध संयुक्त विजय के रूप में समाप्त हुआ, परंतु विजित प्रदेशों के बँटवारे को लेकर बाल्कन संघ के सदस्यों के बीच शीघ्र ही गंभीर मतभेद उत्पन्न हो गए। यही मतभेद आगे चलकर द्वितीय बाल्कन युद्ध (1913 ई.) का कारण बने।

द्वितीय बाल्कन युद्ध (1913 ई.)

प्रथम बाल्कन युद्ध की समाप्ति के बाद आयोजित लंदन सम्मेलन (1912–1913 ई.) तुर्की और बाल्कन राज्यों के बीच युद्ध तो समाप्त कराने में सफल रहा, किंतु वह बाल्कन समस्या का स्थायी और संतोषजनक समाधान प्रस्तुत नहीं कर सका। विशेष रूप से मैसिडोनिया के विभाजन का प्रश्न अनिर्णीत छोड़ दिया गया। सम्मेलन ने केवल यह निश्चित किया कि मैसिडोनिया अब उस्मानी (ऑटोमन) साम्राज्य के अधीन नहीं रहेगा, परंतु उसके विभिन्न भाग किस राज्य को दिए जाएँगे, इसका निर्णय बाल्कन राज्यों पर छोड़ दिया गया। यही अनिश्चितता आगे चलकर द्वितीय बाल्कन युद्ध का मुख्य कारण बनी।

मैसिडोनिया एक बहुजातीय प्रदेश था, जहाँ बुल्गार, सर्ब, यूनानी तथा अन्य जातियाँ निवास करती थीं। इस कारण बुल्गारिया, सर्बिया और यूनान—तीनों इस क्षेत्र पर अपना अधिकार स्थापित करना चाहते थे। बुल्गारिया का दावा था कि मैसिडोनिया की अधिकांश जनसंख्या बुल्गार थी, इसलिए उस पर उसका स्वाभाविक अधिकार है। दूसरी ओर सर्बिया प्रथम बाल्कन युद्ध में अपनी सैन्य सफलताओं के आधार पर अधिक क्षेत्र चाहता था, जबकि यूनान भी अपने जातीय तथा सामरिक हितों के कारण दक्षिणी मैसिडोनिया और सेलोनिका (थेसालोनिकी) पर अधिकार बनाए रखना चाहता था। इन परस्पर विरोधी दावों के कारण बाल्कन संघ के सदस्य राज्यों के बीच मतभेद तेजी से बढ़ने लगे।

इस परिस्थिति का लाभ उठाने के लिए ऑस्ट्रिया-हंगरी भी सक्रिय हो गया। उसकी नीति थी कि बाल्कन संघ के सदस्य राज्यों के बीच फूट डालकर उनकी एकता को समाप्त कर दिया जाए, जिससे भविष्य में वे ऑस्ट्रिया-हंगरी के लिए कोई संयुक्त चुनौती प्रस्तुत न कर सकें। परिणामस्वरूप मैसिडोनिया का प्रश्न और अधिक जटिल हो गया। जब कूटनीतिक वार्ताओं द्वारा कोई समाधान नहीं निकल सका, तब बुल्गारिया ने शक्ति के प्रयोग का मार्ग अपनाने का निर्णय लिया।

29 जून 1913 ई. को बुल्गारिया ने अपने पूर्व सहयोगी सर्बिया तथा यूनान की सेनाओं पर अचानक आक्रमण कर दिया। इसी घटना के साथ द्वितीय बाल्कन युद्ध का प्रारंभ हुआ। किंतु बुल्गारिया का यह निर्णय उसके लिए घातक सिद्ध हुआ। शीघ्र ही यूनान, सर्बिया, मोंटेनेग्रो और रोमानिया उसके विरुद्ध युद्ध में उतर आए। अवसर का लाभ उठाते हुए उस्मानी साम्राज्य ने भी पूर्वी थ्रेस के कुछ प्रदेशों, विशेषकर एड्रियानोपल (एदिर्ने), पर पुनः अधिकार करने के लिए बुल्गारिया पर आक्रमण कर दिया। इस प्रकार बुल्गारिया चारों ओर से शत्रुओं से घिर गया।

एक साथ अनेक मोर्चों पर युद्ध लड़ने की क्षमता बुल्गारिया में नहीं थी। उसे लगातार पराजयों का सामना करना पड़ा और अंततः उसने शांति की प्रार्थना की। युद्ध लगभग एक महीने के भीतर समाप्त हो गया। इसके बाद सभी संबंधित देशों के प्रतिनिधि रोमानिया की राजधानी बुखारेस्ट में एकत्र हुए, जहाँ 10 अगस्त 1913 ई. को बुखारेस्ट की संधि संपन्न हुई।

इस संधि में मैसिडोनिया के अधिकांश भाग का विभाजन विजयी देशों के पक्ष में किया गया। सर्बिया को उत्तरी और मध्य मैसिडोनिया का बड़ा भाग प्राप्त हुआ, जिससे उसके क्षेत्रफल और जनसंख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। यूनान को दक्षिणी मैसिडोनिया तथा महत्त्वपूर्ण बंदरगाह सेलोनिका (थेसालोनिकी) पर अधिकार मिल गया। रोमानिया को दक्षिणी डोब्रूजा का प्रदेश प्राप्त हुआ, जबकि बुल्गारिया को केवल मैसिडोनिया का अपेक्षाकृत छोटा भाग ही मिल सका। इस प्रकार प्रथम बाल्कन युद्ध की सबसे बड़ी विजेता मानी जाने वाली बुल्गारिया, द्वितीय बाल्कन युद्ध में सबसे अधिक हानि उठाने वाला देश बन गई।

बाल्कन युद्धों के परिणाम

दोनों बाल्कन युद्धों ने दक्षिण-पूर्वी यूरोप का राजनीतिक मानचित्र पूरी तरह बदल दिया। उस्मानी साम्राज्य का यूरोप में प्रभुत्व लगभग समाप्त हो गया और उसके अधिकार में केवल कॉन्स्टेंटिनोपल (इस्तांबुल) तथा उसके आसपास का पूर्वी थ्रेस का सीमित क्षेत्र ही रह गया। दूसरी ओर सर्बिया, यूनान, रोमानिया और बुल्गारिया के क्षेत्रफल तथा जनसंख्या में वृद्धि हुई और बाल्कन की अनेक राष्ट्रीय आकांक्षाएँ पूर्ण हुईं।

इन युद्धों से सर्बिया को सर्वाधिक लाभ प्राप्त हुआ। वह क्षेत्रफल, जनसंख्या तथा सैन्य शक्ति की दृष्टि से पहले की अपेक्षा कहीं अधिक सुदृढ़ राज्य बन गया। उसकी राष्ट्रीय महत्त्वाकांक्षाएँ भी काफी हद तक पूरी हो चुकी थीं। अब उसका प्रमुख लक्ष्य ऑस्ट्रिया-हंगरी का प्रभाव समाप्त करना तथा दक्षिणी स्लावों को अपने नेतृत्व में संगठित करना था। बुखारेस्ट संधि के अवसर पर सर्ब प्रतिनिधि का यह कथन अत्यंत प्रसिद्ध हुआ—‘एक बाजी हम जीत चुके हैं, अब दूसरी बाजी ऑस्ट्रिया के साथ खेलनी है।’ यह कथन ऑस्ट्रिया-हंगरी के लिए स्पष्ट चेतावनी था। चूँकि सर्बिया को रूस का पूर्ण समर्थन प्राप्त था, इसलिए यह संघर्ष आगे चलकर और अधिक गंभीर हो गया तथा अंततः 1914 ई. में प्रथम विश्वयुद्ध के रूप में इसका विस्फोट हो गया।

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