कल्लर (Kallar)

कल्लर (Kallar)

कल्लर (लगभग 850–880 ई.) : हिंदूशाही (काबुलशाही) वंश के संस्थापक

हिंदूशाही अथवा ब्राह्मणशाही राजवंश की स्थापना उत्तर-पश्चिम भारत के इतिहास की एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण घटना थी। इस वंश की स्थापना सामान्यतः लगभग 850 ईस्वी में कश्मीर से संबद्ध एक ब्राह्मण मंत्री कल्लर द्वारा मानी जाती है। उसने तुर्कशाही वंश के अंतिम शासक लगतुरमान (लागतुर्मान) को अपदस्थ कर एक नवीन राजवंश की स्थापना की। हिंदूशाही राज्य का विस्तार काबुल, गांधार, उद्भांडपुर (ओहिंद), ज़ाबुलिस्तान तथा आधुनिक अफ़ग़ानिस्तान और उत्तर-पश्चिमी पाकिस्तान के विस्तृत क्षेत्रों तक था। प्रारंभ में इसकी राजधानी काबुल थी, जबकि बाद में उद्भांडपुर (ओहिंद/हुंड) प्रमुख राजधानी बना। इस वंश ने लगभग डेढ़ शताब्दी तक उत्तर-पश्चिमी भारत को मध्य एशिया से होने वाले इस्लामी आक्रमणों के विरुद्ध एक सुदृढ़ सुरक्षा-कवच प्रदान किया।

हिंदूशाही वंश की स्थापना से पूर्व इस क्षेत्र पर तुर्कशाही वंश का शासन था। नौवीं शताब्दी के प्रारंभ में अब्बासी ख़िलाफ़त के शक्तिशाली खलीफ़ा अल-मामून (813–833 ई.) ने काबुल और गांधार पर अनेक सैन्य अभियान चलाए। लगभग 815 ईस्वी में अब्बासी सेनाओं ने तुर्कशाही राज्य की काबुल शाखा को पराजित कर दिया। इस पराजय के परिणामस्वरूप तुर्कशाही शासकों को इस्लाम स्वीकार करने तथा अनेक महत्त्वपूर्ण प्रदेशों को छोड़ने के लिए विवश होना पड़ा। शीघ्र ही गांधार क्षेत्र पर भी अब्बासी आक्रमण हुए और उनकी सेनाएँ सिंधु नदी तक पहुँच गईं। विजित प्रदेशों पर भारी वार्षिक कर (खिराज) लगाया गया, जिससे तुर्कशाही राज्य की राजनीतिक तथा आर्थिक स्थिति अत्यंत दुर्बल हो गई।

इन्हीं प्रतिकूल परिस्थितियों में तुर्कशाही वंश के अंतिम शासक लगतुरमान को उसके ब्राह्मण मंत्री कल्लर ने पदच्युत कर सत्ता अपने हाथों में ले ली। इस घटना का विश्वसनीय और विस्तृत विवरण प्रसिद्ध विद्वान अल-बिरूनी की कृति किताब-अल-हिंद में मिलता है। अल-बिरूनी के अनुसार कल्लर को संयोगवश प्राप्त एक विशाल राजकोष से पर्याप्त आर्थिक संसाधन मिले, जिनके आधार पर उसने सत्ता प्राप्त की और नवीन राजवंश की स्थापना की। अन्य समकालीन स्रोतों में कल्लर का उल्लेख बहुत काम मिलता है, इसलिए उनके शासनकाल, प्रशासन तथा राज्य की सीमाओं के संबंध में निश्चित जानकारी सीमित है।

कल्लर (Kallar)
हिंदूशाही वंश के संस्थापक कल्लर

सत्ता प्राप्त करने के बाद कल्लर ने राज्य में राजनीतिक स्थिरता स्थापित करने तथा प्रशासन का पुनर्गठन करने का प्रयास किया। उन्होंने तुर्कशाही शासन की अनेक प्रशासनिक व्यवस्थाओं को बनाए रखा, जिससे शासन में निरंतरता बनी रही। उनके शासनकाल में हिंदू तथा बौद्ध धार्मिक संस्थानों को संरक्षण प्राप्त हुआ और काबुल–गांधार क्षेत्र में सांस्कृतिक परंपराओं का संरक्षण हुआ। कल्लर द्वारा स्थापित हिंदूशाही राज्य आगे चलकर उत्तर-पश्चिम भारत में भारतीय संस्कृति और राजनीतिक स्वतंत्रता का प्रमुख केंद्र बना गया।

कल्लर के शासनकाल की जानकारी के लिए मुद्राशास्त्रीय स्रोतों का विशेष महत्त्व है। काबुल प्राप्त ‘स्पालपति’ श्रेणी के चाँदी के सिक्के इस काल के प्रमुख प्रमाण हैं। इन सिक्कों का भार सामान्यतः 3.1 से 3.5 ग्राम तथा शुद्धता लगभग 70 प्रतिशत थी। सिक्कों के अग्रभाग पर त्रिशूल-चिह्नयुक्त कूबड़ वाला बैल तथा नागरी लिपि में ‘श्री स्पालपतिदेव’ अंकित है, जबकि पृष्ठभाग पर घुड़सवार की आकृति तथा प्रतीकात्मक चिह्न उत्कीर्ण हैं। ‘स्पालपति’ शब्द का अर्थ ‘सेनापति’ या ‘प्रधान सैन्याधिकारी’ माना जाता है।

इन सिक्कों के संबंध में विद्वानों में मतभेद है। अलेक्ज़ेंडर कनिंघम ने ‘स्पालपति’ श्रृंखला को कल्लर द्वारा जारी बताया है, जबकि एडवर्ड क्लाइव बेली के अनुसार ‘स्पालपति’ और ‘सामंत’ दोनों प्रकार की सिक्का-श्रृंखलाएँ कल्लर के शासनकाल से संबंधित थीं। उनके मतानुसार ‘स्पालपति’ सिक्के फ़ारसी-भाषी क्षेत्रों तथा ‘सामंत’ सिक्के संस्कृत-भाषी क्षेत्रों में प्रचलित रहे होंगे। उन्होंने यह भी अनुमान व्यक्त किया कि कल्लर ने अपनी सत्ता की वैधता सुदृढ़ करने के लिए प्रत्यक्ष राजकीय उपाधि के स्थान पर सैन्य एवं प्रशासनिक उपाधियों का प्रयोग किया।

इसके विपरीत इतिहासकार अब्दुर रहमान का मत है कि ‘स्पालपति’ श्रेणी के सिक्के संभवतः तुर्कशाही वंश के अंतिम शासकों द्वारा जारी किए गए थे। उनका तर्क है कि अरबी स्रोतों में उल्लिखित ‘इस्पहबध’ उपाधि संस्कृत के ‘स्पालपति’ का समतुल्य रूप है। अतः कल्लर ने तुर्कशाही मुद्रा-प्रणाली में कोई मौलिक परिवर्तन नहीं किया, बल्कि उसे यथावत् बनाए रखा। प्र इस मत का समर्थन मुद्राशास्त्री माइकल अलराम ने भी किया है। यद्यपि कुछ विद्वान बैल–घुड़सवार प्रकार की संपूर्ण मुद्रा-प्रणाली को हिंदूशाही शासकों की देन मानते हैं, फिर भी इस विषय पर इतिहासकारों में अभी तक मतैक्य नहीं है।

इस प्रकार कल्लर केवल हिंदूशाही वंश का संस्थापक ही नहीं था, बल्कि उसने उत्तर-पश्चिम भारत में एक ऐसे राज्य की नींव रखी जिसने लगभग 150 वर्षों तक विदेशी आक्रमणों के विरुद्ध प्रभावी प्रतिरोध किया। उसके द्वारा स्थापित राजनीतिक परंपरा को उसके उत्तराधिकारियों, विशेषतः सामंतदेव, भीमदेव, जयपाल, आनंदपाल और त्रिलोचनपाल ने आगे बढ़ाया तथा भारतीय इतिहास में हिंदूशाही वंश को एक गौरवपूर्ण स्थान प्रदान किया।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!
Scroll to Top