भीमदेव (Bhimdev)

भीमदेव (Bhimdev)

भीमदेव (लगभग 912–964 ई.) : हिंदूशाही वंश के महान शासक

दसवीं शताब्दी का उत्तर-पश्चिम भारत और अफ़ग़ानिस्तान राजनीतिक संघर्षों, सामरिक प्रतिस्पर्धा और सांस्कृतिक परिवर्तन का युग था। इस काल में हिंदूकुश पर्वत से लेकर पंजाब के मैदानों तक फैले हिंदूशाही राज्य को पश्चिम से उभरती इस्लामी शक्तियों तथा पूर्व में भारतीय राजवंशों के बदलते राजनीतिक समीकरणों का सामना करना पड़ रहा था। ऐसे संक्रमणकाल में हिंदूशाही वंश ने अनेक सक्षम शासक उत्पन्न किए, जिनमें भीमदेव का स्थान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। भीमदेव की गणना हिंदूशाही वंश के सर्वाधिक शक्तिशाली, दूरदर्शी और प्रभावशाली शासकों में की जाती है। उनके शासनकाल में राज्य ने राजनीतिक स्थिरता, सैन्य प्रतिष्ठा तथा सांस्कृतिक समृद्धि के उच्च स्तर को प्राप्त किया। यही कारण है कि इतिहासकार अब्दुर रहमान ने लल्लिय के साथ उन्हें हिंदूशाही वंश का सबसे सक्षम शासक माना है।

हिंदूशाही वंश की राजनीतिक पृष्ठभूमि

हिंदूशाही वंश का उदय काबुलशाही शासन के उत्तराधिकारी के रूप में हुआ था। नौवीं शताब्दी के मध्य में कल्लर ने अंतिम तुर्कशाही शासक लघतुरमान को पदच्युत कर एक नए हिंदू राजवंश की स्थापना की। इसके पश्चात् हिंदूशाही सत्ता का विस्तार काबुल, ज़ाबुल, गंधार, पेशावर तथा पंजाब के विस्तृत भूभाग तक हो गया। कल्लर के उत्तराधिकारियों ने पश्चिम से आने वाली मुस्लिम शक्तियों का निरंतर प्रतिरोध किया। इस काल में सफ़्फ़ारिद शासक पूर्व की ओर अपना प्रभाव बढ़ाने का प्रयास कर रहे थे, जबकि बाद में सामानी साम्राज्य मध्य एशिया की सबसे शक्तिशाली शक्ति बनकर उभरा। परिणामस्वरूप हिंदूशाही राज्य को अपनी पश्चिमी सीमाओं की रक्षा के लिए निरंतर संघर्ष करना पड़ा।

भीमदेव का राज्यारोहण

 भीमदेव ने लगभग 950 ईस्वी के आसपास हिंदूशाही सिंहासन ग्रहण किया, जो संभवतः कमलुक के पुत्र थे। अभिलेखीय स्रोतों में उनका पूरा राजकीय विरुद “परमभट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर श्री भीमदेव शाही” प्राप्त होता है, जो उनकी सार्वभौम सत्ता और राजनीतिक प्रतिष्ठा का प्रमाण है। समकालीन विद्वान अल-बिरूनी ने उनका उल्लेख ‘भीम’ के नाम से किया है, जबकि उनके नाम से प्राप्त सिक्के उनके ऐतिहासिक अस्तित्व की पुष्टि करते हैं। उनके शासनकाल में हिंदूशाही राज्य ने राजनीतिक संगठन, सैन्य शक्ति तथा सांस्कृतिक संरक्षण के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की।

राज्य का विस्तार और प्रशासन

भीमदेव का राज्य अफ़ग़ानिस्तान के पूर्वी भागों से लेकर गंधार, पेशावर और पंजाब तक विस्तृत था। उनका प्रमुख राजधानी नगर उद्भांडपुर अथवा ओहिंद (वर्तमान हुंड) था, जो सिंधु नदी के तट पर स्थित था। उद्भांडपुर केवल राजनीतिक राजधानी ही नहीं था, बल्कि शिक्षा, संस्कृति और व्यापार का भी एक प्रमुख केंद्र था। बाद में जयपाल के हुंड शिलालेख में इस नगर की तुलना मेरु पर्वत से की गई है और इसे विद्वानों तथा धार्मिक आचार्यों का निवासस्थान बताया गया है। भीमदेव ने प्रशासन को सुदृढ़ बनाने, सीमांत सुरक्षा को संगठित करने तथा प्रांतीय अभिजात वर्ग को राज्य व्यवस्था से जोड़ने का प्रयास किया। उनके शासनकाल में हिंदूशाही सत्ता अपेक्षाकृत स्थिर और संगठित दिखाई देती है।

पश्चिमी सीमा और इस्लामी शक्तियों का दबाव

दसवीं शताब्दी के मध्य तक काबुल और ग़ज़नी क्षेत्र की राजनीतिक स्थिति तेजी से बदल रही थी। सफ़्फ़ारिद शक्ति के पतन और सामानी साम्राज्य के उदय ने पूरे क्षेत्र के शक्ति-संतुलन को प्रभावित किया। याकूब इब्न लैथ के पश्चात् अम्र इब्न लैथ को सामानी शासकों के साथ निरंतर संघर्ष करना पड़ा। इस परिस्थिति का लाभ उठाकर हिंदूशाही समर्थक स्थानीय शक्तियों ने ग़ज़नी में पुनः अपना प्रभाव स्थापित किया। कुछ समय के लिए लाविक वंश के शासक हिंदूशाही संरक्षण में ग़ज़नी पर शासन करने लगे। पुरातात्त्विक साक्ष्यों से भी स्पष्ट होता है कि इस समय तक बन्नू और काफ़िरकोट क्षेत्र में हिंदू धार्मिक गतिविधियाँ तथा मंदिर-निर्माण जारी थे। इससे अनुमान लगाया जाता है कि इन क्षेत्रों पर हिंदूशाही प्रभाव बना हुआ था।

कश्मीर के साथ वैवाहिक संबंध

भीमदेव केवल एक योद्धा शासक ही नहीं थे, बल्कि वे एक कुशल कूटनीतिज्ञ भी थे। उन्होंने कश्मीर के लोहारा वंश के साथ वैवाहिक संबंध स्थापित कर अपनी राजनीतिक स्थिति को और अधिक मजबूत बनाया। राजतरंगिणी के अनुसार भीमदेव की पुत्री का विवाह लोहारा के शासक सिंहराज से हुआ था। इस वैवाहिक संबंध से उत्पन्न दिद्दा आगे चलकर कश्मीर की सबसे प्रभावशाली शासिकाओं में से एक बनीं। दिद्दा ने पहले अपने पति क्षेमगुप्त की रानी के रूप में तथा बाद में स्वयं शासिका के रूप में कश्मीर की राजनीति पर दीर्घकाल तक प्रभुत्व बनाए रखा। इस प्रकार भीमदेव की कूटनीतिक नीति का प्रभाव केवल हिंदूशाही राज्य तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उसने कश्मीर के राजनीतिक इतिहास को भी प्रभावित किया।

भीमकेशव मंदिर और सांस्कृतिक संरक्षण

कश्मीर में हिंदूशाही प्रभाव का एक महत्त्वपूर्ण प्रमाण भीमदेव द्वारा निर्मित माना जाने वाला विष्णु का भव्य मंदिर “भीमकेशव” है। प्रसिद्ध पुरातत्वविद् ऑरेल स्टीन ने इसके अवशेषों की पहचान मार्तंड के निकट बामज़ू क्षेत्र में स्थित अवशेषों से की थी। यह मंदिर न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र था, बल्कि हिंदूशाही सांस्कृतिक प्रभाव का भी प्रतीक था। इससे स्पष्ट होता है कि भीमदेव केवल सैन्य अभियानों तक सीमित नहीं थे, बल्कि उन्होंने कला, स्थापत्य और धर्म के संरक्षण में भी सक्रिय भूमिका निभाई।

भीमदेव की मुद्रा-व्यवस्था

भीमदेव के शासनकाल की जानकारी का सबसे विश्वसनीय स्रोत उनके द्वारा जारी सिक्के हैं। उनके सिक्के मुख्यतः चाँदी-मिश्रित धातु तथा ताँबे के बने हुए थे। चाँदी के सिक्कों के अग्रभाग पर त्रिशूल-चिह्नयुक्त लेटा हुआ कूबड़ वाला बैल अंकित है तथा उसके ऊपर नागरी लिपि में ‘श्री भीमदेव’ लिखा गया है। पृष्ठभाग पर भाला धारण किए हुए घुड़सवार की आकृति बनी हुई है। ताँबे के सिक्कों पर हाथी और सिंह की आकृतियाँ अंकित हैं। इन सिक्कों का वितरण मुख्यतः अफ़ग़ानिस्तान और पंजाब के क्षेत्रों में हुआ है। इन सिक्कों से स्पष्ट होता है कि हिंदूशाही शासकों ने पूर्ववर्ती “बैल और घुड़सवार” मुद्रा परंपरा को बनाए रखा। यह परंपरा बाद में ग़ज़नवी और ग़ुरी शासकों द्वारा भी अपनाई गई।

ग़ज़नी का संकट और अल्प-तेगिन

भीमदेव के शासनकाल की सबसे महत्त्वपूर्ण घटना ग़ज़नी के राजनीतिक संघर्षों में उनका हस्तक्षेप था। लगभग 962 ईस्वी में सामानी साम्राज्य के तुर्क सेनापति अल्प-तेगिन ने विद्रोह कर ज़ाबुलिस्तान और ग़ज़नी पर अधिकार कर लिया। इस घटना ने पूरे क्षेत्र के शक्ति-संतुलन को बदल दिया। ग़ज़नी का लाविक शासक हिंदूशाही दरबार में शरण लेने के लिए विवश हुआ और उसने भीमदेव से सैन्य सहायता की प्रार्थना की। इसके उत्तर में भीमदेव ने एक अभियान संचालित किया और लगभग 963 ईस्वी में लाविक शासक को पुनः ग़ज़नी में स्थापित करने में सहायता प्रदान की। यद्यपि यह सफलता स्थायी सिद्ध नहीं हुई, फिर भी इससे स्पष्ट होता है कि उस समय तक हिंदूशाही राज्य अफ़ग़ानिस्तान की राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाने की क्षमता रखता था।

भीमदेव की प्रतिष्ठा का सबसे महत्त्वपूर्ण प्रमाण जयपाल के काल का प्रसिद्ध हुंड शिलालेख है। इस अभिलेख में उद्भांडपुर नगर की प्रशंसा करते हुए भीमदेव को महान विजेता और पृथ्वी का रक्षक बताया गया है। अभिलेख के अनुसार ‘वहाँ राजाओं के राजा भीम निवास करते थे, जिन्होंने अपने शत्रुओं की सेनाओं को पराजित कर पृथ्वी की रक्षा की।’ इससे स्पष्ट है कि भीमदेव की स्मृति उनके उत्तराधिकारियों के समय तक वीरता और आदर्श राजत्व के प्रतीक के रूप में जीवित थी।

मृत्यु और उत्तराधिकार

कालक्रम के आधार पर भीमदेव की मृत्यु सामान्यतः 964 अथवा 965 ईस्वी के बीच मानी जाती है। हुंड शिलालेख के अनुसार उन्होंने “शिव की इच्छा से स्वयं को अग्नि को समर्पित किया” और किसी शत्रु के हाथों उनका अंत नहीं हुआ। अधिकांश इतिहासकार इस उल्लेख की व्याख्या किसी धार्मिक अथवा अनुष्ठानिक आत्मोत्सर्ग के रूप में करते हैं। यद्यपि इस विषय पर विद्वानों में मतभेद हैं, तथापि यह स्पष्ट है कि उनकी मृत्यु किसी युद्ध अथवा राजनीतिक पराजय का परिणाम नहीं थी। उनकी मृत्यु के कुछ समय बाद अल्प-तेगिन के उत्तराधिकारी अबू इशाक ने पुनः ग़ज़नी पर अधिकार स्थापित कर लिया और लाविक वंश की सत्ता का अंत हो गया। इसके साथ ही उत्तर-पश्चिम भारत और अफ़ग़ानिस्तान के राजनीतिक समीकरणों में निर्णायक परिवर्तन आरंभ हुआ।

भीमदेव का महत्त्व

भीमदेव का शासन हिंदूशाही वंश के उत्कर्ष का काल माना जाता है। उन्होंने राज्य को संगठित किया, सीमाओं की रक्षा की, कूटनीतिक संबंधों को सुदृढ़ बनाया तथा सांस्कृतिक परंपराओं का संरक्षण किया। उनकी नीतियों ने जयपाल और आनंदपाल जैसे उत्तराधिकारियों को एक सुदृढ़ राज्य की विरासत प्रदान की। यद्यपि बाद में हिंदूशाही वंश को ग़ज़नवी आक्रमणों का सामना करना पड़ा, फिर भी भीमदेव के शासनकाल ने उत्तर-पश्चिम भारत में हिंदू प्रतिरोध की एक सशक्त परंपरा स्थापित की। इस दृष्टि से भीमदेव केवल हिंदूशाही वंश के एक सफल शासक ही नहीं, बल्कि मध्यकालीन उत्तर-पश्चिम भारत के राजनीतिक इतिहास के एक निर्णायक व्यक्तित्व थे। उनकी सैन्य क्षमता, कूटनीतिक दूरदर्शिता और सांस्कृतिक संरक्षण ने उन्हें हिंदूशाही वंश के स्वर्णिम युग का निर्माता बना दिया।

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