मार्कस टुलियस सिसरो : जीवन, कार्य एवं योगदान
मार्कस टुलियस सिसरो (3 जनवरी 106 ई.पू.–7 दिसंबर 43 ई. पू.) प्राचीन रोम के महानतम राजनेताओं, अधिवक्ताओं, दार्शनिकों, लेखकों और वक्ताओं में गिने जाते हैं। वे रोमन गणराज्य के अंतिम चरण में सक्रिय रहे, जब राजनीतिक संघर्ष, गृहयुद्ध और महत्त्वाकांक्षी सेनानायकों की प्रतिस्पर्धा ने गणतांत्रिक व्यवस्था को गहरे संकट में डाल दिया था। इटली के अर्पिनुम (वर्तमान अर्पीनो) में एक प्रतिष्ठित इक्वेस्ट्रियन परिवार में जन्मे सिसरो ने रोम तथा यूनान में विधि, दर्शन और वक्तृत्व-कला की उच्च शिक्षा प्राप्त की। अपनी असाधारण प्रतिभा, प्रभावशाली वाणी और विधिक ज्ञान के बल पर वे शीघ्र ही रोम के प्रमुख अधिवक्ताओं में प्रतिष्ठित हो गए। 70 ईसा पूर्व में गाइयस वेर्रेस के विरुद्ध भ्रष्टाचार का ऐतिहासिक मुकदमा जीतने के बाद उनकी ख्याति पूरे रोम में फैल गई। इसके पश्चात वे क्रमशः क्वेस्टर, एडाइल और प्रेटर जैसे महत्त्वपूर्ण पदों पर नियुक्त हुए तथा 63 ईसा पूर्व में रोमन गणराज्य के सर्वोच्च निर्वाचित पद कॉन्सुल बने। अपने कॉन्सुल काल में उन्होंने कैटिलिन षड्यंत्र का सफलतापूर्वक दमन किया, जिसके लिए उन्हें ‘पाटर पैट्रिये’ (राष्ट्रपिता) की उपाधि प्राप्त हुई। यद्यपि षड्यंत्रकारियों को बिना नियमित न्यायिक प्रक्रिया के मृत्युदंड दिए जाने के कारण उन्हें बाद में निर्वासन भी झेलना पड़ा, फिर भी उनकी राजनीतिक प्रतिष्ठा और सार्वजनिक प्रभाव लंबे समय तक कायम रहे।
निर्वासन से लौटने के बाद सिसरो ने पुनः सार्वजनिक जीवन में सक्रिय भूमिका निभाई तथा 51–50 ईसा पूर्व में सिलिसिया के प्रांतीय राज्यपाल के रूप में ईमानदार और न्यायपूर्ण प्रशासन का परिचय दिया। जूलियस सीज़र और पॉम्पी के मध्य गृहयुद्ध में उन्होंने पॉम्पी का समर्थन किया, किंतु सीज़र की विजय के बाद उन्हें क्षमा कर दिया गया। 44 ईसा पूर्व में सीज़र की हत्या के उपरांत उन्होंने मार्क एंटनी के विरुद्ध अपने प्रसिद्ध ‘फिलिपिकाएँ’ भाषणों के माध्यम से गणराज्य की रक्षा का अभियान चलाया। अंततः द्वितीय त्रिमूर्व की स्थापना के बाद उनका नाम प्रोस्क्रिप्शन सूची में सम्मिलित कर दिया गया और 7 दिसंबर 43 ईसा पूर्व को उनकी हत्या कर दी गई। सिसरो का सबसे स्थायी योगदान राजनीति से अधिक उनके साहित्यिक, दार्शनिक और विधिक लेखन में निहित है। उन्होंने यूनानी दर्शन को लैटिन भाषा में व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत किया, अनेक दार्शनिक शब्दों को प्रचलित किया तथा दे रे पब्लिका, दे लेगीबस, दे ऑफ़ीकीइस, दे ओरातोरे और तुस्कुलाने डिस्पुतातियोनेस जैसी कालजयी कृतियों की रचना की। उनके भाषण, पत्र और दार्शनिक ग्रंथ आज भी प्राचीन रोम के इतिहास, राजनीति और संस्कृति के प्रमुख स्रोत माने जाते हैं। पुनर्जागरण, ज्ञानोदय और आधुनिक राजनीतिक चिंतन पर उनके विचारों का गहरा प्रभाव पड़ा तथा वे आज भी विधि के शासन, गणतांत्रिक आदर्शों, नैतिक राजनीति और उत्कृष्ट वक्तृत्व-कला के सार्वकालिक प्रतीक के रूप में स्मरण किए जाते हैं।
सिसरो का पारिवारिक उपनाम एवं शिक्षा
मार्कस टुलियस सिसरो का पारिवारिक उपनाम (कोग्नोमेन) ‘सिसरो’ लैटिन शब्द ‘सिसर’ से बना है, जिसका अर्थ ‘चना’ होता है। यूनानी जीवनीकार प्लूटार्क के अनुसार यह उपनाम उनके किसी पूर्वज को इसलिए प्राप्त हुआ था क्योंकि उसकी नाक के अग्रभाग पर चने के दाने के समान एक उभार था। प्राचीन रोम में इस प्रकार के उपनाम सामान्य थे और अनेक कुलों के नाम भी इसी प्रकार कृषि या वनस्पतियों से जुड़े हुए थे। उदाहरणस्वरूप फैबियस का संबंध (सेम), लेंटुलस का संबंध मसूर तथा पिसो का संबंध मटर से माना जाता है।
प्लूटार्क के अनुसार जब सिसरो सार्वजनिक जीवन में प्रवेश करने वाले थे, तब उनके कुछ मित्रों ने उन्हें यह उपनाम बदलने की सलाह दी, क्योंकि उन्हें यह साधारण और उपहास का विषय प्रतीत होता था। किंतु सिसरो ने इस सुझाव को दृढ़ता से अस्वीकार करते हुए कहा कि वे अपने इसी नाम को इतना सम्मानित बनाएँगे कि वह स्कॉरस और कैटुलस जैसे प्रतिष्ठित रोमन कुलनामों से भी अधिक प्रसिद्ध होगा। उनका यह आत्मविश्वास बाद में पूर्णतः सत्य सिद्ध हुआ और ‘सिसरो’ नाम रोमन इतिहास में अमर हो गया।
लगभग 90 ईसा पूर्व, जब सिसरो लगभग सोलह वर्ष के थे, उन्होंने सोशल वॉर (91–88 ईसा पूर्व) के दौरान सैन्य सेवा आरंभ की। इस युद्ध में उन्होंने पहले ग्नेयस पॉम्पियस स्ट्रैबो तथा बाद में लूसियस कॉर्नेलियस सुल्ला के अधीन कार्य किया। यद्यपि उनका सैनिक जीवन अधिक लंबा नहीं रहा, फिर भी इस अनुभव ने उन्हें रोमन सेना, प्रशासन और तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों को निकट से समझने का अवसर प्रदान किया। 88 ईसा पूर्व में रोम में प्लेबियन ट्रिब्यून पब्लियस सुल्पिसियस रूफस और कौंसल सुल्ला के बीच तीव्र राजनीतिक संघर्ष हुआ। सिसरो सुल्पिसियस की नीतियों से सहमत नहीं थे, किंतु उनकी विलक्षण वक्तृत्व-कला से अत्यधिक प्रभावित हुए। इसी अनुभव ने उन्हें यह समझाया कि रोमन राजनीति में प्रभावशाली भाषण-कला का कितना महत्त्व है।
सैन्य सेवा समाप्त होने के बाद सिसरो ने स्वयं को विधि, साहित्य, दर्शन तथा वक्तृत्व-कला के अध्ययन के लिए समर्पित कर दिया। इसी काल में उन्होंने वक्तृत्व-कला पर अपना प्रारंभिक ग्रंथ ‘दे इन्वेंतियोने’ लिखा। यद्यपि बाद में उन्होंने इसे अपनी अपरिपक्व रचना माना, फिर भी यह उनके आरंभिक बौद्धिक विकास का महत्त्वपूर्ण प्रमाण है।
सिसरो ने यूनानी भाषा, साहित्य और दर्शन का भी गहन अध्ययन किया। उन्होंने प्रसिद्ध यूनानी कवि और शिक्षक औलुस लिसिनियुस आर्कियास से शिक्षा प्राप्त की तथा यूनानी दार्शनिक परंपरा को लैटिन भाषा में सरल एवं प्रभावशाली रूप में प्रस्तुत किया। उनके दार्शनिक विकास में लारिसा के फिलो का विशेष योगदान था, जिनसे उन्होंने अकादमिक संशयवाद का अध्ययन किया। बाद में उन्होंने यूनानी दर्शन को रोमन समाज के अनुरूप प्रस्तुत करते हुए लैटिन दार्शनिक शब्दावली को समृद्ध किया। इस प्रकार सिसरो केवल महान वक्ता ही नहीं, बल्कि प्राचीन रोम के प्रमुख दार्शनिक, शिक्षाविद् और बौद्धिक परंपरा के निर्माता भी सिद्ध हुए।

विधि का अध्ययन एवं यूनान–एशिया माइनर की यात्रा
मार्कस टुलियस सिसरो अपनी असाधारण बुद्धिमत्ता, अध्ययनशीलता और वक्तृत्व-कौशल के कारण युवावस्था में ही रोम के विद्वानों का ध्यान आकर्षित करने लगे थे। यूनानी जीवनीकार प्लूटार्क के अनुसार वे अत्यंत मेधावी विद्यार्थी थे और अल्पायु में ही उनकी प्रतिभा सर्वत्र चर्चित हो गई थी। इसी कारण उन्हें अपने समय के महान विधिवेत्ता क्विंटस म्यूसियस स्केवोला के संरक्षण में रोमन विधि का अध्ययन करने का अवसर प्राप्त हुआ। स्केवोला उस समय रोमन न्यायशास्त्र के सर्वाधिक प्रतिष्ठित विद्वानों में गिने जाते थे। उनके मार्गदर्शन में सिसरो ने रोमन विधि, न्याय-व्यवस्था, संवैधानिक परंपराओं तथा प्रशासनिक सिद्धांतों का गहन अध्ययन किया। यही विधिक प्रशिक्षण आगे चलकर उनके सफल अधिवक्ता, प्रभावशाली वक्ता और दूरदर्शी राजनीतिक विचारक बनने की आधारशिला सिद्ध हुआ।
सिसरो के सहपाठियों में अनेक प्रतिभाशाली युवक सम्मिलित थे, जिनमें गाइउस मारियस माइनर, सर्वियस सुल्पिसियस रूफस तथा टाइटस पोम्पोनियस विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। सर्वियस सुल्पिसियस रूफस आगे चलकर रोम के महानतम विधिवेत्ताओं में गिने गए और स्वयं सिसरो भी उन्हें विधिशास्त्र में अपने से श्रेष्ठ मानते थे। टाइटस पोम्पोनियस, जिन्हें बाद में ‘एटिकस’ के नाम से प्रसिद्धि मिली, सिसरो के आजीवन घनिष्ठ मित्र बने। दोनों के बीच जीवनभर व्यापक पत्राचार होता रहा, जो आज रोमन गणराज्य के अंतिम वर्षों के राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक इतिहास का अत्यंत महत्त्वपूर्ण प्राथमिक स्रोत माना जाता है। इस प्रकार विधि, दर्शन और साहित्य के समन्वित अध्ययन ने सिसरो के व्यक्तित्व को व्यापक बौद्धिक आधार प्रदान किया।
सिसरो की यूनान और एशिया माइनर की यात्रा
79 ईसा पूर्व में सिसरो ने अध्ययन, आत्म-विकास तथा स्वास्थ्य-सुधार के उद्देश्य से यूनान, एशिया माइनर और रोड्स की यात्रा आरंभ की। यह यात्रा उनके जीवन का निर्णायक मोड़ सिद्ध हुई। कुछ प्राचीन लेखकों, विशेषकर प्लूटार्क, का मत है कि उन्होंने यह यात्रा तानाशाह लूसियस कॉर्नेलियस सुल्ला की संभावित अप्रसन्नता से बचने के लिए की थी। किंतु स्वयं सिसरो ने स्पष्ट लिखा है कि उनका मुख्य उद्देश्य अपनी वक्तृत्व-कला को अधिक परिष्कृत करना, दर्शन का गहन अध्ययन करना तथा न्यायालयों में निरंतर कार्य करने से प्रभावित स्वास्थ्य को सुधारना था। लगातार वकालत और भाषण देने के कारण उनका स्वास्थ्य कमजोर पड़ गया था, इसलिए उन्होंने कुछ समय अध्ययन और विश्राम को समर्पित किया।
एथेंस
यात्रा का पहला प्रमुख पड़ाव एथेंस था, जो उस समय यूनानी दर्शन और उच्च शिक्षा का सबसे प्रतिष्ठित केंद्र माना जाता था। वहाँ उन्होंने प्रसिद्ध दार्शनिक एंटिओकस ऑफ़ एस्कलोन के निर्देशन में दर्शनशास्त्र का अध्ययन किया। एंटिओकस प्लेटो की अकादमी की उस परंपरा के प्रतिनिधि थे, जिसने प्लेटोनिक, स्टोइक और पेरिपेटेटिक विचारधाराओं का समन्वय करने का प्रयास किया था। उनके मार्गदर्शन में सिसरो ने विभिन्न दार्शनिक मतों का तुलनात्मक अध्ययन किया। यही कारण है कि उनकी बाद की दार्शनिक रचनाओं में विभिन्न विचारधाराओं के प्रति संतुलित और विवेकपूर्ण दृष्टिकोण दिखाई देता है। एथेंस में रहते हुए सिसरो ने केवल दर्शन ही नहीं, बल्कि यूनानी साहित्य, इतिहास और वक्तृत्व-कला का भी गंभीर अध्ययन किया। उन्होंने वहाँ के प्रसिद्ध पुस्तकालयों तथा विद्वानों के संपर्क का भरपूर लाभ उठाया। यूनानी भाषा पर उनकी पहले से अच्छी पकड़ थी, किंतु इस यात्रा ने उनके ज्ञान को और अधिक व्यापक तथा परिष्कृत बना दिया।
एशिया माइनर
इसके बाद वे एशिया माइनर पहुँचे, जहाँ उन्होंने अनेक प्रसिद्ध वक्ताओं और शिक्षकों से शिक्षा ग्रहण की। उस समय यह क्षेत्र यूनानी संस्कृति और अलंकारशास्त्र का प्रमुख केंद्र था। यहाँ उन्होंने विभिन्न वक्तृत्व-परंपराओं का अध्ययन किया तथा प्रभावशाली भाषण देने की अनेक विधियों का व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त किया। इससे उनकी तर्कशक्ति, अभिव्यक्ति और न्यायालय में प्रभावशाली ढंग से अपने पक्ष को प्रस्तुत करने की क्षमता और अधिक विकसित हुई।
रोड्स
यात्रा का अंतिम तथा सबसे महत्त्वपूर्ण पड़ाव रोड्स था। वहाँ उन्होंने अपने पूर्व गुरु अपोलोनियस मोलोन से पुनः शिक्षा प्राप्त की। मोलोन उस युग के सर्वश्रेष्ठ वक्तृत्व-शिक्षकों में गिने जाते थे। उन्होंने सिसरो की भाषण-शैली का सूक्ष्म विश्लेषण करते हुए स्वर, गति, श्वास-नियंत्रण, शारीरिक मुद्राओं और भावाभिव्यक्ति में आवश्यक सुधार कराया। साथ ही उन्होंने उन्हें अत्यधिक अलंकृत और भावुक शैली से बचते हुए स्पष्ट, संतुलित तथा व्यावहारिक अभिव्यक्ति अपनाने की सलाह दी। अपोलोनियस मोलोन के मार्गदर्शन में सिसरो ने यूनानी अटिक शैली की सादगी और तार्किकता का सफल समन्वय एशियाई शैली की प्रभावशीलता और भावपूर्ण अभिव्यक्ति के साथ किया। यही संतुलित शैली आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी पहचान बनी और उन्हें रोमन इतिहास का सर्वश्रेष्ठ वक्ता बना दिया। लगभग दो वर्षों तक अध्ययन और यात्रा करने के बाद 77 ईसा पूर्व में वे रोम लौटे। तब तक उनकी विद्वत्ता, आत्मविश्वास और वक्तृत्व-कला पहले की अपेक्षा कहीं अधिक विकसित हो चुकी थी। यही शिक्षा, विधिक प्रशिक्षण और अंतरराष्ट्रीय बौद्धिक अनुभव आगे चलकर उन्हें रोमन गणराज्य के महानतम अधिवक्ताओं, प्रभावशाली राजनेताओं और विश्वप्रसिद्ध दार्शनिकों में प्रतिष्ठित करने का आधार बना।
सिसरो का प्रारंभिक राजनीतिक जीवन
कानूनी गतिविधियाँ
लूसियस कॉर्नेलियस सुल्ला द्वारा गृहयुद्ध में विजय प्राप्त करने तथा राजनीतिक विरोधियों के विरुद्ध चलाए गए प्रोस्क्रिप्शन अभियान के पश्चात जब रोम की राजनीतिक और न्यायिक व्यवस्था धीरे-धीरे सामान्य होने लगी, तब प्रतिभाशाली युवा अधिवक्ताओं के लिए सार्वजनिक जीवन में आगे बढ़ने के नए अवसर उत्पन्न हुए। जिन वरिष्ठ अधिवक्ताओं और वक्ताओं को सिसरो अपनी युवावस्था से आदर्श मानते थे, उनमें से अनेक या तो वृद्ध हो चुके थे अथवा राजनीतिक संघर्षों में मारे जा चुके थे। ऐसी परिस्थितियों का लाभ उठाते हुए सिसरो ने अपनी विधिक प्रतिभा, तार्किक क्षमता और वक्तृत्व-कौशल के बल पर शीघ्र ही रोमन न्यायालयों में अपनी विशिष्ट पहचान बनानी प्रारंभ कर दी।
लगभग 81 ईसा पूर्व में, जब उनकी आयु लगभग 25–26 वर्ष थी, उन्होंने ‘प्रो क्विंक्टियो’ नामक भाषण के माध्यम से न्यायालय में अपनी पहली उल्लेखनीय उपस्थिति दर्ज कराई। यह एक दीवानी मुकदमा था, जिसमें उन्होंने पब्लियस क्विंक्टियस का पक्ष रखा। यद्यपि यह मुकदमा उनके जीवन की सबसे प्रसिद्ध सफलता नहीं था, फिर भी इससे उनकी विधिक योग्यता, तर्कशक्ति और प्रभावशाली अभिव्यक्ति की व्यापक चर्चा होने लगी। इस मुकदमे ने उन्हें रोम के उभरते हुए प्रतिभाशाली अधिवक्ताओं की श्रेणी में स्थापित कर दिया।
इसके अगले वर्ष, 80 ईसा पूर्व में, सिसरो ने ‘प्रो रोस्कियो अमेरिनो’ नामक अपने प्रसिद्ध भाषण के माध्यम से सेक्स्टस रोस्कियस का बचाव किया, जिस पर अपने पिता की हत्या का आरोप लगाया गया था। यह उनका पहला महत्त्वपूर्ण आपराधिक मुकदमा था। सिसरो ने न्यायालय में यह तर्क प्रस्तुत किया कि वास्तविक षड्यंत्र संपत्ति पर अवैध अधिकार प्राप्त करने के उद्देश्य से रचा गया था। उन्होंने सुल्ला के प्रभावशाली मुक्तदास क्राइसोगोनस पर आरोप लगाया कि उसने रोस्कियस के पिता का नाम अनुचित रूप से प्रोस्क्रिप्शन सूची में शामिल करवाकर उनकी संपत्ति पर अवैध कब्ज़ा कर लिया था।
सिसरो की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने क्राइसोगोनस की कठोर आलोचना की, किंतु अत्यंत सावधानी के साथ तानाशाह सुल्ला पर कोई प्रत्यक्ष आरोप नहीं लगाया। उनके संतुलित, तार्किक और प्रभावशाली तर्कों के परिणामस्वरूप सेक्स्टस रोस्कियस निर्दोष सिद्ध हुआ। इस मुकदमे ने सिसरो को रोम के सबसे साहसी और प्रतिभाशाली युवा अधिवक्ताओं में प्रतिष्ठित कर दिया।
यूनानी जीवनीकार प्लूटार्क ने लिखा है कि इस मुकदमे के बाद सिसरो संभावित राजनीतिक प्रतिशोध से बचने के लिए रोम छोड़कर चले गए थे। किंतु अधिकांश आधुनिक इतिहासकार इस मत को पूर्णतः स्वीकार नहीं करते। उनका मानना है कि सिसरो ने रोम तब छोड़ा, जब सुल्ला तानाशाह का पद त्याग चुके थे। स्वयं सिसरो ने भी अपनी रचनाओं में स्पष्ट लिखा है कि विदेश-यात्रा का उद्देश्य अपनी वक्तृत्व-कला को और अधिक परिष्कृत करना, दार्शनिक अध्ययन को आगे बढ़ाना तथा लंबे समय तक न्यायालयों में कार्य करने से प्रभावित स्वास्थ्य में सुधार करना था। इसी अवधि में 80 ईसा पूर्व में सिसरो का विवाह टेरेंटिया से हुआ। विवाह के कुछ समय बाद वे अपने छोटे भाई क्विंटस टुलियस सिसरो, घनिष्ठ मित्र टाइटस पोम्पोनियस एटिकस तथा अन्य साथियों के साथ यूनान, एशिया माइनर और रोड्स की लगभग दो वर्ष लंबी अध्ययन-यात्रा पर निकल पड़े। 77 ईसा पूर्व में रोम लौटने के बाद उन्होंने पुनः वकालत आरंभ की और शीघ्र ही राजधानी के प्रमुख अधिवक्ताओं में उनकी गणना होने लगी।
राजनीतिक जीवन
सिसरो की बढ़ती प्रतिष्ठा ने उन्हें राजनीति में प्रवेश का मार्ग भी प्रशस्त किया। 76 ईसा पूर्व में वे न्यूनतम वैधानिक आयु में क्वेस्टर निर्वाचित हुए। रोमन गणराज्य में क्वेस्टर का पद प्रशासनिक और वित्तीय सेवा का प्रथम उच्च पद माना जाता था। इस पद पर निर्वाचित होने के साथ ही व्यक्ति को रोमन सीनेट की सदस्यता प्राप्त हो जाती थी, जिससे सार्वजनिक जीवन में उसका महत्त्व अत्यधिक बढ़ जाता था।
75 ईसा पूर्व में सिसरो को सिसिली प्रांत में क्वेस्टर नियुक्त किया गया। वहाँ उनका प्रमुख दायित्व प्रांतीय वित्त का संचालन, कर-संग्रह की निगरानी तथा गवर्नर की प्रशासनिक सहायता करना था। उन्होंने अत्यंत ईमानदारी, निष्पक्षता और दक्षता के साथ अपने कर्तव्यों का निर्वहन किया। उन्होंने रोम के लिए अनाज की नियमित आपूर्ति सुनिश्चित की तथा स्थानीय किसानों, व्यापारियों और नागरिकों के हितों की भी रक्षा की। उनके न्यायपूर्ण व्यवहार और प्रशासनिक क्षमता के कारण सिसिली की जनता का उन पर गहरा विश्वास स्थापित हुआ।
सिसिली प्रवास के दौरान सिसरो ने केवल प्रशासनिक कार्यों तक स्वयं को सीमित नहीं रखा। सिराक्यूज़ में उन्होंने महान यूनानी वैज्ञानिक आर्किमिडीज़ की उपेक्षित कब्र की खोज कर उसकी पहचान पुनः स्थापित की तथा उसके संरक्षण की व्यवस्था कराई। इस कार्य से उनकी विद्वत्ता, इतिहास-प्रेम और सांस्कृतिक चेतना का परिचय मिलता है तथा स्थानीय जनता में उनकी प्रतिष्ठा और अधिक बढ़ी। सिसरो के सफल प्रशासन का परिणाम यह हुआ कि सिसिली के निवासी उन्हें अपना विश्वसनीय संरक्षक मानने लगे। कुछ वर्षों बाद जब सिसिली के पूर्व गवर्नर गायुस वेरिस पर भ्रष्टाचार, सत्ता के दुरुपयोग, अवैध धन-संग्रह और प्रांतीय जनता के शोषण के गंभीर आरोप लगे, तब सिसिली के लोगों ने सिसरो से आग्रह किया कि वे न्यायालय में उनका पक्ष रखें। यही मुकदमा आगे चलकर उनके सार्वजनिक जीवन की सबसे महत्त्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक सिद्ध हुआ।
वेरिस का मुकदमा
70 ईसा पूर्व में लगभग 36 वर्ष की आयु में सिसरो ने गायुस वेरिस के विरुद्ध अभियोजन का दायित्व स्वीकार किया। वेरिस ने 73 से 71 ईसा पूर्व तक सिसिली के प्रांतपाल के रूप में शासन किया था। उस पर भ्रष्टाचार, जबरन धन-वसूली, न्यायिक अनियमितताओं, धार्मिक स्थलों की लूट, कलाकृतियों और मूर्तियों की चोरी तथा प्रांतीय जनता के शोषण जैसे अनेक गंभीर आरोप लगाए गए थे।
वेरिस को रोम के प्रभावशाली कुलीन वर्ग का संरक्षण प्राप्त था और उसकी ओर से उस समय के सबसे प्रसिद्ध अधिवक्ता क्विंटस हॉर्टेंसियस होर्टालुस पैरवी कर रहे थे। अधिकांश लोगों का विश्वास था कि हॉर्टेंसियस अपनी वक्तृत्व-कला के बल पर वेरिस को दंड से बचा लेंगे। किंतु सिसरो ने मुकदमे की तैयारी अत्यंत सूक्ष्मता और परिश्रम से की। वे स्वयं सिसिली गए, प्रशासनिक अभिलेखों की जाँच की, प्रत्यक्षदर्शियों और अधिकारियों के बयान दर्ज किए तथा पर्याप्त दस्तावेज़ी प्रमाण एकत्र किए। उन्होंने यह भी सुनिश्चित किया कि सभी प्रमुख गवाह समय पर रोम पहुँचकर न्यायालय में साक्ष्य प्रस्तुत कर सकें।
मुकदमे की सुनवाई आरंभ होने पर सिसरो ने परंपरा से हटकर लंबा प्रारंभिक भाषण देने के स्थान पर संक्षिप्त उद्घाटन वक्तव्य प्रस्तुत किया और तुरंत गवाहों तथा दस्तावेज़ी प्रमाणों को न्यायालय के समक्ष रखना शुरू कर दिया। यह रणनीति अत्यंत प्रभावी सिद्ध हुई। प्रस्तुत साक्ष्य इतने स्पष्ट और प्रबल थे कि वेरिस को अपनी पराजय निश्चित दिखाई देने लगी। परिणामस्वरूप अंतिम निर्णय आने से पहले ही वह रोम छोड़कर मैसिलिया (वर्तमान मार्सेय) चला गया। उसके अनुपस्थित रहने पर न्यायालय ने उसे दोषी ठहराया और उसकी संपत्ति का बड़ा भाग जब्त कर लिया।
यद्यपि मुकदमे की संपूर्ण मौखिक बहस न्यायालय में नहीं हो सकी, फिर भी सिसरो ने इसके लिए तैयार किए गए अपने विस्तृत भाषणों को बाद में ‘इन वेर्रेम’ शीर्षक से प्रकाशित किया। इन भाषणों में उन्होंने रोमन प्रांतीय प्रशासन में व्याप्त भ्रष्टाचार, आर्थिक शोषण, प्रशासनिक दुरुपयोग तथा न्यायिक अनियमितताओं का विस्तृत और सशक्त चित्रण किया। आज भी ये भाषण रोमन प्रांतीय शासन और न्यायिक व्यवस्था के अध्ययन के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक स्रोत माने जाते हैं।
वेरिस मुकदमे से सिसरो को अभूतपूर्व प्रसिद्धि मिली। वे केवल एक सफल अधिवक्ता ही नहीं, बल्कि न्याय, विधि के शासन और प्रांतीय जनता के अधिकारों के समर्थक के रूप में भी प्रतिष्ठित हुए। इस सफलता के बाद उनकी गणना रोम के सर्वश्रेष्ठ वक्ताओं में होने लगी और उन्होंने धीरे-धीरे हॉर्टेंसियस की प्रतिष्ठा को भी पीछे छोड़ दिया। उनकी सफलता का आधार केवल प्रभावशाली वक्तृत्व-कला नहीं था, बल्कि तथ्यों, दस्तावेज़ों, प्रत्यक्ष साक्ष्यों, तार्किक विश्लेषण और नैतिक तर्कों का संतुलित एवं प्रभावी प्रयोग भी था। उन्होंने सिद्ध किया कि न्यायालय में प्रभाव केवल अलंकारपूर्ण भाषा से नहीं, बल्कि सत्य, प्रमाण और विधिक तर्कों से स्थापित होता है। यही गुण आगे चलकर उन्हें रोमन गणराज्य का महानतम अधिवक्ता, अप्रतिम वक्ता और प्रभावशाली राजनीतिक विचारक बनाने का आधार बना।
सिसरो की राजनीतिक प्रतिष्ठा
मार्कस टुलियस सिसरो का राजनीतिक जीवन रोमन गणराज्य के इतिहास में असाधारण उपलब्धि का उदाहरण माना जाता है। वे न तो किसी प्राचीन पैट्रिशियन (कुलीन) परिवार से संबंधित थे और न ही उनका संबंध किसी प्रतिष्ठित राजनीतिक वंश से था। वे नोवुस होमो अर्थात् ऐसे व्यक्ति थे, जिन्होंने अपने परिवार में पहली बार रोमन गणराज्य के सर्वोच्च राजनीतिक पदों तक पहुँच प्राप्त की। उनकी उन्नति जन्म, वंश अथवा पारिवारिक प्रभाव के कारण नहीं, बल्कि उनकी असाधारण प्रतिभा, गहन शिक्षा, विधिक ज्ञान, कठोर परिश्रम तथा अद्वितीय वक्तृत्व-कला के बल पर हुई। यही कारण है कि सिसरो रोमन गणराज्य में योग्यता और प्रतिभा के आधार पर सफलता प्राप्त करने वाले सबसे उत्कृष्ट व्यक्तित्वों में गिने जाते हैं।
सिसरो ने रोमन गणराज्य की पारंपरिक राजनीतिक पदानुक्रम कुर्सुस होनोरुम का पूरी निष्ठा और सफलता के साथ पालन किया। इस व्यवस्था के अंतर्गत प्रत्येक राजनेता को निर्धारित क्रम में विभिन्न सार्वजनिक पदों पर कार्य करना पड़ता था। 75 ईसा पूर्व में वे क्वेस्टर निर्वाचित हुए, जहाँ उन्होंने सिसिली प्रांत में वित्तीय प्रशासन और राजकोषीय व्यवस्था का कुशल संचालन किया। उनकी ईमानदारी और प्रशासनिक दक्षता ने उन्हें स्थानीय जनता तथा रोमन सीनेट दोनों का विश्वास दिलाया। इसके बाद 69 ईसा पूर्व में वे एडाइल और 66 ईसा पूर्व में प्रेटर चुने गए। प्रेटर के रूप में उन्होंने विशेष रूप से जबरन वसूली, वित्तीय अनियमितताओं तथा प्रांतीय भ्रष्टाचार से संबंधित न्यायालयों की अध्यक्षता की। इन पदों पर उनके निष्पक्ष, न्यायप्रिय और कुशल कार्य ने उनकी राजनीतिक प्रतिष्ठा को अत्यधिक बढ़ाया।
उनकी बढ़ती लोकप्रियता और सार्वजनिक विश्वास का परिणाम यह हुआ कि 63 ईसा पूर्व के लिए वे रोमन गणराज्य के सर्वोच्च वार्षिक निर्वाचित पद कौंसल के लिए चुने गए। उनका निर्वाचन सेंचुरियेट सभा द्वारा व्यापक समर्थन से हुआ। उन्हें विशेष रूप से इतालवी नगरों के प्रभावशाली वर्ग, इक्वेस्ट्रियन समुदाय तथा गणतांत्रिक संविधान के समर्थकों का सहयोग प्राप्त हुआ। उनके सह-कौंसल गायुस एंटोनियस हाइब्रिडा थे, किंतु पूरे कार्यकाल में वास्तविक राजनीतिक नेतृत्व सिसरो के हाथों में ही रहा।
कौंसल बनने के बाद सिसरो ने सबसे पहले पब्लियस सर्विलियस रुल्लुस द्वारा प्रस्तुत भूमि-वितरण विधेयक का विरोध किया। इस प्रस्ताव के अनुसार भूमि के पुनर्वितरण के लिए अत्यधिक अधिकारों से संपन्न दस आयुक्तों की नियुक्ति की जानी थी। सिसरो ने सीनेट और जनसभा में अपने प्रभावशाली भाषणों द्वारा यह तर्क दिया कि इतनी व्यापक शक्तियाँ कुछ व्यक्तियों को सौंपना गणराज्य की संवैधानिक व्यवस्था, सत्ता-संतुलन और नागरिक स्वतंत्रता के लिए हानिकारक सिद्ध हो सकता है। उनके तार्किक और प्रभावशाली तर्कों के कारण यह विधेयक पारित नहीं हो सका। इस घटना ने सिसरो को संविधान और गणराज्य के दृढ़ समर्थक के रूप में स्थापित कर दिया।
इसी वर्ष उन्होंने न्यायालय में गायुस राबिरियस का भी सफलतापूर्वक बचाव किया। राबिरियस पर 100 ईसा पूर्व में प्लेबियन ट्रिब्यून लूसियस एपुलेयस सैटुर्निनुस की मृत्यु से संबंधित आरोप लगाए गए थे। इस मुकदमे में सिसरो ने यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि उस समय की कार्रवाई सेनातुस कन्सुल्तुम उल्तिमुम अर्थात् सीनेट द्वारा जारी विशेष आपातकालीन आदेश के अंतर्गत की गई थी। उन्होंने तर्क दिया कि जब राज्य गंभीर संकट में हो, तब गणराज्य की रक्षा सर्वोच्च दायित्व होती है। यही संवैधानिक सिद्धांत आगे चलकर कैटिलिन के षड्यंत्र के विरुद्ध उनके कठोर कदमों का भी आधार बना।
कैटिलिन का षड्यंत्र
सिसरो के राजनीतिक जीवन की सबसे प्रसिद्ध और निर्णायक घटना 63 ईसा पूर्व का कैटिलिन षड्यंत्र थी। इस घटना ने उन्हें रोमन गणराज्य का रक्षक और संविधान का समर्थक बना दिया, यद्यपि यही निर्णय बाद में उनके राजनीतिक निर्वासन का कारण भी बना।
लूसियस सर्जियस कैटिलिना (कैटिलिन) लगातार कई बार कौंसल के चुनाव में पराजित हो चुका था। आर्थिक कठिनाइयों, राजनीतिक असफलताओं और व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षा के कारण उसने असंतुष्ट लोगों का एक समूह संगठित कर लिया। उसके समर्थकों में ऋणग्रस्त अभिजात, आर्थिक संकट से जूझ रहे नागरिक, कुछ पूर्व सैनिक तथा राजनीतिक रूप से असंतुष्ट व्यक्ति शामिल थे। उन्होंने रोमन सरकार को बलपूर्वक हटाकर सत्ता पर अधिकार करने की योजना बनाई। षड्यंत्र के अंतर्गत रोम में आगज़नी, प्रमुख नेताओं की हत्या, जनविद्रोह तथा इटली के विभिन्न भागों में सशस्त्र विद्रोह की तैयारी की गई थी।
सिसरो को अपने गुप्त सूत्रों और विश्वसनीय सहयोगियों के माध्यम से इस षड्यंत्र की जानकारी प्राप्त हुई। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए उन्होंने सीनेट की आपात बैठक बुलाई। सीनेट ने ‘सेनातुस कन्सुल्तुम उल्तिमुम’ नामक विशेष आपातकालीन आदेश पारित किया, जिसके अंतर्गत कौंसलों को राज्य की सुरक्षा के लिए आवश्यक सभी उपाय करने का अधिकार प्रदान किया गया। सिसरो ने कैटिलिन के विरुद्ध चार ऐतिहासिक भाषण दिए, जिन्हें सामूहिक रूप से ‘ओरेशनेस इन कैटिलिनाम’ अथवा ‘कैटिलिन के विरुद्ध भाषण’ कहा जाता है। पहला भाषण 8 नवंबर 63 ईसा पूर्व को जुपिटर स्टेटर के मंदिर में सीनेट की बैठक के दौरान दिया गया। उन्होंने अपने भाषण का प्रसिद्ध आरंभ इन शब्दों से किया : ‘कब तक, कैटिलिन, तुम हमारे धैर्य का दुरुपयोग करते रहोगे?’ इस भाषण में उन्होंने कैटिलिन पर गणराज्य के विरुद्ध षड्यंत्र, हिंसक विद्रोह और सत्ता पर बलपूर्वक अधिकार करने की योजना बनाने का आरोप लगाया।
इस भाषण के तुरंत बाद कैटिलिन रोम छोड़कर एट्रूरिया चला गया, जहाँ वह विद्रोही सेना में शामिल हो गया। इसके बाद सिसरो ने दूसरा भाषण रोमन जनता को संबोधित करते हुए दिया और स्पष्ट किया कि कैटिलिन का नगर छोड़ना पलायन नहीं, बल्कि खुले विद्रोह की शुरुआत है। तीसरे भाषण में उन्होंने षड्यंत्र के नए प्रमाण जनता के समक्ष प्रस्तुत किए, जबकि चौथे भाषण में सीनेट के सामने गिरफ्तार षड्यंत्रकारियों को दंडित करने के प्रश्न पर विचार रखा। कैटिलिन षड्यंत्र का सफलतापूर्वक दमन सिसरो के राजनीतिक जीवन की सर्वोच्च उपलब्धि माना जाता है। यद्यपि बाद में षड्यंत्रकारियों को बिना नियमित न्यायिक प्रक्रिया के मृत्युदंड देने के कारण उनके इस निर्णय की आलोचना भी हुई, फिर भी रोमन इतिहास में वे गणराज्य, विधि के शासन और संवैधानिक व्यवस्था के सबसे दृढ़ समर्थकों में गिने जाते हैं।
षड्यंत्रकारियों की गिरफ्तारी एवं षड्यंत्र का अंत
कैटिलिन के रोम छोड़ने के बाद भी उसके सहयोगियों ने राजधानी के भीतर विद्रोह की योजना को जारी रखा। उन्होंने ट्रांसअल्पाइन गॉल की एलोब्रोज जनजाति के प्रतिनिधियों को अपने पक्ष में मिलाकर सैन्य सहायता प्राप्त करने का प्रयास किया। किंतु एलोब्रोज के प्रतिनिधियों ने इस प्रस्ताव को स्वीकार करने के बजाय उसकी सूचना गुप्त रूप से कौंसल मार्कस टुलियस सिसरो को दे दी। इस सूचना ने षड्यंत्र का पर्दाफाश करने में निर्णायक भूमिका निभाई।
सिसरो ने अत्यंत सावधानी और रणनीति के साथ कार्रवाई की। उनके निर्देश पर षड्यंत्रकारियों द्वारा एलोब्रोज के प्रतिनिधियों को भेजे गए पत्रों और अन्य लिखित प्रमाणों को रोम के निकट स्थित मिल्वियन पुल पर जब्त कर लिया गया। इन दस्तावेज़ों में विद्रोह की विस्तृत योजना के साथ प्रमुख षड्यंत्रकारियों की मुहरें और हस्ताक्षर भी मौजूद थे। इन साक्ष्यों के आधार पर पब्लियस कॉर्नेलियस लेंटुलुस सुरा, गायुस केथेगुस, स्टेटिलियस, गैबिनियस तथा सेप्टिमियस कैपारियस सहित प्रमुख षड्यंत्रकारियों को गिरफ्तार कर सीनेट के समक्ष प्रस्तुत किया गया। ठोस प्रमाणों के सामने वे अपने अपराधों का संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दे सके।
गिरफ्तार षड्यंत्रकारियों को दिए जाने वाले दंड पर सीनेट में गंभीर बहस हुई। यद्यपि सीनेट औपचारिक न्यायालय नहीं थी, फिर भी राज्य पर आए इस असाधारण संकट में कौंसल सिसरो ने उसका परामर्श लिया। प्रारंभ में निर्वाचित कौंसल डेसिमस जूनियस सिलानुस ने मृत्युदंड का समर्थन किया। इसके बाद जूलियस सीज़र ने अधिक संयमित मत प्रस्तुत करते हुए कहा कि बिना नियमित न्यायिक प्रक्रिया के रोमन नागरिकों को मृत्युदंड देना भविष्य के लिए खतरनाक उदाहरण सिद्ध हो सकता है। उन्होंने सुझाव दिया कि षड्यंत्रकारियों की संपत्ति जब्त कर उन्हें इटली के विभिन्न नगरों में आजीवन कारावास में रखा जाए।
इसके विपरीत मार्कस पोर्शियस कैटो (कैटो द यंगर) ने कठोर दंड का समर्थन किया। उनका तर्क था कि गणराज्य की सुरक्षा सर्वोच्च है और ऐसे षड्यंत्रकारियों को जीवित छोड़ना राज्य के लिए स्थायी खतरा बन सकता है। कैटो के प्रभावशाली भाषण के बाद सीनेट का बहुमत मृत्युदंड के पक्ष में हो गया। निर्णय के अनुसार सिसरो स्वयं गिरफ्तार षड्यंत्रकारियों को रोम की प्राचीन कारागार टुल्लियानुम ले गए, जहाँ लेंटुलुस सुरा सहित पाँच प्रमुख षड्यंत्रकारियों का गला घोंटकर मृत्युदंड दिया गया। दंड दिए जाने के बाद सिसरो ने बाहर उपस्थित लोगों को केवल इतना कहा—‘वे जीवित नहीं रहे।‘
उधर कैटिलिन एट्रूरिया में विद्रोही सेना का नेतृत्व कर रहा था। 62 ईसा पूर्व के प्रारंभ में पिस्टोरिया (वर्तमान पिस्तोइया) के निकट हुए निर्णायक युद्ध में रोमन सेना ने विद्रोह को पूरी तरह पराजित कर दिया। कैटिलिन अंतिम क्षण तक युद्ध करता रहा और रणभूमि में मारा गया। उसकी मृत्यु के साथ ही षड्यंत्र का पूर्णतः अंत हो गया।
कैटिलिन षड्यंत्र को विफल करने के कारण सिसरो को ‘पाटर पाट्रिए’ (राष्ट्रपिता) की सम्मानजनक उपाधि प्रदान की गई। यह उनके सार्वजनिक जीवन का सर्वोच्च सम्मान था। यद्यपि पाँच रोमन नागरिकों को बिना नियमित न्यायिक प्रक्रिया के मृत्युदंड देने के कारण उनके इस निर्णय की व्यापक आलोचना भी हुई। सिसरो ने अपने कदम का औचित्य सिद्ध करते हुए कहा कि सेनातुस कन्सुल्तुम उल्तिमुम के अंतर्गत उन्हें गणराज्य की रक्षा के लिए आवश्यक कार्रवाई करने का अधिकार प्राप्त था। यह विवाद आगे चलकर उनके राजनीतिक जीवन और निर्वासन का एक प्रमुख कारण बना।
सिसरो का राजनीतिक प्रभाव तथा निर्वासन
कैटिलिन के षड्यंत्र के सफल दमन के बाद मार्कस टुलियस सिसरो की प्रतिष्ठा रोमन गणराज्य में अपने सर्वोच्च स्तर पर पहुँच गई। समकालीन रोमन समाज ने उन्हें गणराज्य का रक्षक, संविधान का समर्थक और असाधारण साहस वाले राजनेता के रूप में सम्मानित किया। उन्हें ‘पाटर पाट्रिए’ (राष्ट्रपिता) की उपाधि प्रदान की गई, जिसे उनके सार्वजनिक जीवन का सर्वोच्च सम्मान माना जाता है। सिसरो ने स्वयं भी अपने अनेक भाषणों और निजी पत्रों में कैटिलिन षड्यंत्र के दमन को अपने राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि बताया और इसे रोमन गणराज्य की रक्षा के लिए किया गया अपना सर्वोच्च योगदान माना। दूसरी ओर, उनके विरोधियों ने उन पर इस सफलता का अत्यधिक प्रचार करने तथा अपनी भूमिका को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करने का आरोप लगाया।
यद्यपि तत्कालीन अधिकांश नागरिकों ने उनके कार्य की प्रशंसा की, फिर भी पाँच षड्यंत्रकारियों को बिना नियमित न्यायिक प्रक्रिया के मृत्युदंड दिए जाने का प्रश्न भविष्य में उनके राजनीतिक विरोधियों के लिए सबसे प्रभावी हथियार बन गया। सिसरो का तर्क था कि उन्होंने सेनातुस कन्सुल्तुम उल्तिमुम अर्थात् सीनेट के आपातकालीन आदेश के अंतर्गत राज्य की सुरक्षा के लिए आवश्यक कार्रवाई की थी। किंतु उनके विरोधियों का मत था कि किसी भी रोमन नागरिक को बिना विधिसम्मत मुकदमे के मृत्युदंड देना नागरिक अधिकारों का उल्लंघन था। यही विवाद आगे चलकर उनके राजनीतिक जीवन का सबसे बड़ा संकट सिद्ध हुआ।
पैलेटाइन पहाड़ी पर नया निवास
कौंसल के रूप में सफलता और बढ़ती प्रतिष्ठा के बाद सिसरो ने 62 ईसा पूर्व के अंत में रोम की प्रतिष्ठित पैलेटाइन पहाड़ी पर एक भव्य भवन खरीदा। यह क्षेत्र रोमन गणराज्य के सबसे प्रभावशाली राजनेताओं, सेनापतियों और कुलीन परिवारों का निवास-स्थान था। इस भवन का पूर्व स्वामी मार्कस लिसिनियस क्रैसस था, जो रोम के सबसे धनी व्यक्तियों में गिना जाता था और बाद में जूलियस सीज़र तथा पॉम्पी के साथ प्रथम त्रिमूर्व का सदस्य बना।
भवन का मूल्य लगभग 35 लाख सेस्टर्स था, जो उस समय अत्यंत विशाल धनराशि मानी जाती थी। इतनी बड़ी राशि की व्यवस्था करने के लिए सिसरो ने अपने मित्र तथा पूर्व मुवक्किल पब्लियस कॉर्नेलियस सुल्ला से लगभग 20 लाख सेस्टर्स का ऋण लिया तथा शेष धन अन्य स्रोतों से प्राप्त किया। उनके सह-कौंसल गायुस एंटोनियस हाइब्रिडा ने भी उन्हें आर्थिक सहायता दी। यह भवन केवल उनका निवास नहीं था, बल्कि उनकी राजनीतिक प्रतिष्ठा और सामाजिक सम्मान का भी प्रतीक था। सिसरो ने अपने पत्रों में गर्व के साथ लिखा कि उनका घर लगभग पूरे रोम की दृष्टि में स्थित था और राजधानी के राजनीतिक जीवन के केंद्र के निकट था।
सिसरो का प्रथम त्रिमूर्व का प्रस्ताव
60 ईसा पूर्व में जूलियस सीज़र ने सिसरो को अपने, ग्नेयस पॉम्पियस मैग्नस (पॉम्पी) तथा क्रैसस के बीच बने अनौपचारिक राजनीतिक गठबंधन में सम्मिलित होने का प्रस्ताव दिया। यह गठबंधन बाद में प्रथम त्रिमूर्व (फर्स्ट ट्रायमविरेट) के नाम से प्रसिद्ध हुआ। सिसरो ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। उनका विश्वास था कि कुछ शक्तिशाली व्यक्तियों के बीच बना ऐसा निजी राजनीतिक समझौता रोमन गणराज्य की संवैधानिक व्यवस्था, सीनेट की सर्वोच्चता और विधि के शासन को कमजोर करेगा। उन्होंने गणतांत्रिक परंपराओं के प्रति अपनी निष्ठा बनाए रखते हुए इस गठबंधन से दूरी बनाए रखी, यद्यपि वे जानते थे कि इससे उनकी राजनीतिक स्थिति कठिन हो सकती है।
क्लोडियस का उदय और सिसरो के विरुद्ध कानून
59 ईसा पूर्व में सीज़र के कौंसल रहते हुए प्रथम त्रिमूर्व ने अपने अनेक राजनीतिक उद्देश्य पूरे कर लिए। इसके बाद जब सीज़र गॉल के प्रांतीय शासन के लिए रोम से चले गए, तब उन्होंने राजधानी में अपना प्रभाव बनाए रखने के लिए पब्लियस क्लोडियस पुल्खर का समर्थन किया। क्लोडियस मूलतः पैट्रिशियन परिवार से था, किंतु उसे विधिक प्रक्रिया द्वारा एक प्लेबियन परिवार में गोद दिलाया गया, जिससे वह प्लेब्स का ट्रिब्यून बनने के योग्य हो गया। 58 ईसा पूर्व में ट्रिब्यून निर्वाचित होने के बाद उसने अनेक लोकप्रिय कानून पारित कराए, जिन्हें सामूहिक रूप से लेजेस क्लोडियाए कहा जाता है।
क्लोडियस का प्रमुख राजनीतिक लक्ष्य सिसरो थे। उसने ऐसा कानून पारित कराया जिसके अनुसार यदि किसी रोमन नागरिक को बिना विधिक मुकदमे के मृत्युदंड दिया गया हो, तो ऐसा आदेश देने वाला व्यक्ति निर्वासन का पात्र होगा। यद्यपि इस कानून में सिसरो का नाम नहीं था, फिर भी यह स्पष्ट रूप से कैटिलिन षड्यंत्र के समय उनके द्वारा कराई गई कार्रवाई को लक्ष्य बनाकर बनाया गया था। अनेक इतिहासकारों का मत है कि इस कदम को प्रथम त्रिमूर्व के प्रमुख नेताओं का मौन समर्थन प्राप्त था, क्योंकि उन्हें आशंका थी कि सिसरो भविष्य में भी उनकी नीतियों का विरोध करते रहेंगे।
सिसरो का निर्वासन
सिसरो ने अपने बचाव में तर्क दिया कि उन्होंने सीनेट के आपातकालीन आदेश के अंतर्गत राज्य की रक्षा के लिए आवश्यक कदम उठाए थे। उन्होंने सीनेट, अनेक प्रभावशाली सीनेटरों तथा विशेष रूप से पॉम्पी से सहायता प्राप्त करने का प्रयास किया, किंतु उन्हें अपेक्षित समर्थन नहीं मिला। राजनीतिक संकट बढ़ने पर उन्होंने शोक-वस्त्र धारण कर लिए, दाढ़ी और बाल बढ़ा लिए तथा रोम की सड़कों पर घूम-घूमकर जनता से सहानुभूति की अपील की। दूसरी ओर, क्लोडियस के समर्थक उनका उपहास करते, उन पर गंदगी और पत्थर फेंकते तथा सार्वजनिक रूप से उनका अपमान करते थे। उनके पुराने प्रतिद्वंद्वी क्विंटस हॉर्टेंसियस ने भी उनका समर्थन किया, किंतु वे स्वयं भी विरोध का सामना करने लगे।
सीनेट और तत्कालीन कौंसल सिसरो को प्रभावी संरक्षण देने में असफल रहे। जूलियस सीज़र ने व्यक्तिगत सहानुभूति तो व्यक्त की, किंतु उन्होंने भी हस्तक्षेप नहीं किया। अंततः जब क्लोडियस का कानून लागू हो गया और रोम से लगभग 400 मील के भीतर सिसरो को आश्रय, जल या अग्नि—अर्थात् जीवन-निर्वाह की मूल सुविधाएँ—उपलब्ध कराना भी दंडनीय घोषित कर दिया गया, तब उन्होंने स्वेच्छा से निर्वासन स्वीकार कर लिया। 23 मई 58 ईसा पूर्व को वे रोम छोड़कर मैसेडोनिया के थेसालोनिकी पहुँच गए। इस प्रकार जिस निर्णय ने उन्हें रोमन गणराज्य का महान रक्षक बनाया था, वही आगे चलकर उनके राजनीतिक जीवन के सबसे कठिन और पीड़ादायक अध्याय का कारण भी सिद्ध हुआ।
संपत्ति की जब्ती, पुनर्वापसी और पुनः राजनीतिक सक्रियता
संपत्ति की जब्ती
58 ईसा पूर्व में मार्कस टुलियस सिसरो के निर्वासन के बाद उनके राजनीतिक शत्रु पब्लियस क्लोडियस पुल्खर ने उनके विरुद्ध कठोर कार्रवाई की। क्लोडियस ने अपने प्रभाव का उपयोग करते हुए सिसरो की समस्त संपत्तियों को राज्य के अधिकार में दिलवा दिया। उनकी ग्रामीण जागीरों और अन्य संपत्तियों के साथ-साथ रोम की पैलेटाइन पहाड़ी पर स्थित उनका भव्य निवास भी जब्त कर लिया गया। यह भवन केवल उनका निजी आवास नहीं था, बल्कि उनके राजनीतिक सम्मान, सामाजिक प्रतिष्ठा और सार्वजनिक जीवन में प्राप्त सफलता का प्रतीक भी माना जाता था।
क्लोडियस ने सिसरो के पैलेटाइन स्थित घर को ध्वस्त करा दिया और उस भूमि को धार्मिक रूप से पवित्र घोषित कर वहाँ प्रतीकात्मक रूप से लिबर्टास अर्थात् स्वतंत्रता की देवी का एक मंदिर स्थापित कराया। इस धार्मिक घोषणा का उद्देश्य केवल धार्मिक आस्था नहीं था, बल्कि एक राजनीतिक रणनीति भी थी। रोमन धार्मिक परंपरा के अनुसार किसी भूमि को देवता को समर्पित कर दिए जाने के बाद उसका निजी स्वामित्व पुनः स्थापित करना अत्यंत कठिन हो जाता था। इस प्रकार क्लोडियस यह सुनिश्चित करना चाहता था कि सिसरो भविष्य में कभी भी उस स्थान पर अपना घर पुनर्निर्मित न करा सकें। यह कदम सिसरो के राजनीतिक प्रभाव को समाप्त करने और उनके सार्वजनिक सम्मान को स्थायी रूप से क्षति पहुँचाने का प्रयास था।
निर्वासन के दौरान मानसिक स्थिति
निर्वासन सिसरो के जीवन का सबसे कठिन, पीड़ादायक और निराशाजनक काल सिद्ध हुआ। सार्वजनिक सम्मान, राजनीतिक प्रभाव और पारिवारिक जीवन से अचानक दूर हो जाने के कारण वे गहरे मानसिक अवसाद में चले गए। मैसेडोनिया के थेसालोनिकी और अन्य स्थानों से अपने मित्रों को लिखे गए पत्रों में उन्होंने बार-बार अपनी निराशा, अकेलेपन और असहायता की भावना व्यक्त की। विशेष रूप से अपने घनिष्ठ मित्र टाइटस पोम्पोनियस एटिकस को लिखे पत्रों से स्पष्ट होता है कि वे अपने भविष्य को लेकर अत्यंत चिंतित थे।
सिसरो ने स्वीकार किया कि यदि एटिकस उन्हें निरंतर धैर्य, आशा और सांत्वना न देते, तो वे आत्महत्या तक करने का विचार कर सकते थे। उन्होंने यह भी लिखा कि निर्वासन ने उनसे केवल उनका घर और संपत्ति ही नहीं छीनी, बल्कि उनका सम्मान, सामाजिक प्रतिष्ठा और सार्वजनिक जीवन का उद्देश्य भी छीन लिया। उनके पत्रों से उनके संवेदनशील व्यक्तित्व तथा राजनीतिक पराजय से उत्पन्न मानसिक संघर्ष का स्पष्ट परिचय मिलता है। यही कारण है कि उनके निर्वासन काल का पत्र-साहित्य रोमन इतिहास और प्राचीन मनोवैज्ञानिक अध्ययन का एक महत्त्वपूर्ण स्रोत माना जाता है।
सिसरो की रोम में पुनर्वापसी
58 ईसा पूर्व के अंत और 57 ईसा पूर्व के प्रारंभ में रोम की राजनीतिक परिस्थितियाँ बदलने लगीं। क्लोडियस के बढ़ते प्रभाव से अनेक राजनेता असंतुष्ट हो गए थे। इसी समय नव-निर्वाचित ट्रिब्यून टाइटस एनियस मिलो ने सिसरो की पुनर्वापसी का दृढ़ समर्थन किया। धीरे-धीरे सीनेट के अधिकांश सदस्य भी उनके पक्ष में आने लगे। सबसे महत्त्वपूर्ण परिवर्तन तब हुआ जब ग्नेयस पॉम्पियस मैग्नस (पॉम्पी) ने भी सिसरो की वापसी का समर्थन कर दिया।
सीनेट ने सिसरो को निर्वासन से वापस बुलाने के पक्ष में मतदान किया, जिसका विरोध केवल क्लोडियस ने किया। अंततः पुनर्वापसी का प्रस्ताव स्वीकृत हो गया। 5 अगस्त 57 ईसा पूर्व को सिसरो इटली लौटे और ब्रुंडिसियम (वर्तमान ब्रिंडिसी) के बंदरगाह पर पहुँचे। वहाँ उनका अत्यंत भव्य स्वागत किया गया। इटली के अनेक नगरों के नागरिक उनका अभिनंदन करते हुए उनके साथ रोम तक आए। रोम में उनके प्रवेश के समय जनता ने उनका उत्साहपूर्वक स्वागत किया। अपनी प्रिय पुत्री टुलिया से पुनर्मिलन उनके जीवन के सबसे भावनात्मक क्षणों में से एक माना जाता है।
संपत्ति की पुनर्प्राप्ति
रोम लौटने के बाद सिसरो ने अपनी संपत्ति वापस प्राप्त करने के लिए विधिक और धार्मिक दोनों स्तरों पर संघर्ष किया। उन्होंने पोन्टिफ़्स के महाविद्यालय के समक्ष अपना प्रसिद्ध भाषण ‘दे डोमो सुआ आद पोन्टिफिकेस’ प्रस्तुत किया। इस भाषण में उन्होंने तर्क दिया कि क्लोडियस द्वारा उनकी भूमि को धार्मिक रूप से पवित्र घोषित करने की प्रक्रिया रोमन विधि और धार्मिक परंपराओं के अनुरूप नहीं थी, इसलिए उसे वैध नहीं माना जा सकता।
सिसरो के प्रभावशाली तर्कों और प्रस्तुत प्रमाणों से पोन्टिफ़्स सहमत हो गए। उन्होंने निर्णय दिया कि भूमि का धार्मिक समर्पण विधिसम्मत नहीं था। परिणामस्वरूप सिसरो को उनकी भूमि और संपत्ति वापस कर दी गई तथा पैलेटाइन पहाड़ी पर अपने निवास के पुनर्निर्माण की अनुमति भी प्रदान कर दी गई। इसके बाद उन्होंने अपने घर का पुनर्निर्माण कराया और पुनः रोम के सार्वजनिक जीवन में सक्रिय हो गए। यह निर्णय उनकी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा की पुनर्स्थापना के साथ-साथ उनके राजनीतिक पुनर्वास का भी प्रतीक था।
राजनीति में पुनः सक्रियता
57 ईसा पूर्व में रोम लौटने के बाद सिसरो ने पुनः सक्रिय राजनीति में भाग लेना आरंभ किया। उनका उद्देश्य केवल अपनी प्रतिष्ठा पुनः प्राप्त करना नहीं था, बल्कि रोमन गणराज्य की पारंपरिक संवैधानिक व्यवस्था और सीनेट की सर्वोच्चता की रक्षा करना भी था। किंतु उनके निर्वासन के दौरान रोम की राजनीति में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हो चुके थे। जूलियस सीज़र, पॉम्पी और मार्कस लिसिनियस क्रैसस के बीच बना प्रथम त्रिमूर्व पहले से कहीं अधिक शक्तिशाली हो चुका था। ऐसी परिस्थितियों में सिसरो के लिए स्वतंत्र राजनीतिक नेतृत्व स्थापित करना कठिन था।
प्रारंभ में उन्होंने सीज़र की कुछ नीतियों तथा प्रथम त्रिमूर्व के बढ़ते प्रभाव का विरोध किया, किंतु शीघ्र ही उन्हें यह अनुभव हो गया कि प्रत्यक्ष टकराव व्यावहारिक नहीं होगा। 56 ईसा पूर्व में लूका में हुई प्रसिद्ध बैठक के बाद प्रथम त्रिमूर्व की शक्ति और अधिक सुदृढ़ हो गई। इसके परिणामस्वरूप सिसरो ने अपनी राजनीतिक नीति में व्यावहारिक परिवर्तन किया। उन्होंने सार्वजनिक रूप से सीज़र की गॉल में प्राप्त सैन्य सफलताओं की प्रशंसा की तथा सीनेट में उनके समर्थन में भाषण दिए। अपने प्रसिद्ध भाषण ‘दे प्रोविन्सियिस कोंसुलारिबुस’ में उन्होंने गॉल के प्रांतों पर सीज़र के अधिकार को बनाए रखने का समर्थन किया। अधिकांश इतिहासकार इसे सिद्धांतों से विचलन नहीं, बल्कि तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों के अनुरूप अपनाई गई व्यावहारिक नीति मानते हैं।
सिसरो के साहित्य और विधिक कार्य
राजनीतिक प्रभाव सीमित होने के बाद सिसरो ने अपना अधिक समय साहित्य, दर्शन और न्यायिक कार्यों को समर्पित किया। यह उनके जीवन का अत्यंत उत्पादक बौद्धिक काल था। उन्होंने अनेक महत्त्वपूर्ण दार्शनिक ग्रंथों की रचना प्रारंभ की और न्यायालयों में प्रमुख अधिवक्ता के रूप में अपनी प्रतिष्ठा बनाए रखी।
56 ईसा पूर्व में उन्होंने अपने पूर्व शिष्य मार्कस कैलियस रूफुस का प्रसिद्ध भाषण ‘प्रो कैलियो’ देकर सफलतापूर्वक बचाव किया। इस भाषण में उनकी तार्किक शक्ति, व्यंग्यपूर्ण शैली और मनोवैज्ञानिक विश्लेषण का उत्कृष्ट समन्वय दिखाई देता है। इसके अतिरिक्त उन्होंने पब्लियस वाटिनियुस, मार्कस एमिलियस स्कौरुस तथा ग्नेयस प्लान्सियुस जैसे अनेक व्यक्तियों का भी न्यायालय में बचाव किया। यद्यपि इनमें से कुछ उनके पूर्व राजनीतिक विरोधी थे, फिर भी उन्होंने अधिवक्ता के रूप में अपने पेशेवर दायित्व का निर्वाह किया। इसी कारण कुछ समकालीन आलोचकों ने उनकी राजनीतिक स्थिरता पर प्रश्न उठाए, जबकि अन्य विद्वानों ने इसे रोमन विधि-व्यवस्था के अनुरूप एक निष्पक्ष अधिवक्ता की भूमिका माना। इस प्रकार निर्वासन के बाद का काल सिसरो के राजनीतिक पुनर्स्थापन के साथ-साथ उनकी साहित्यिक और विधिक प्रतिभा के पुनः उत्कर्ष का भी महत्त्वपूर्ण चरण सिद्ध हुआ।
सिलिसिया का प्रांतीय शासन
प्रोकौंसल के रूप में नियुक्ति
51 ईसा पूर्व में मार्कस टुलियस सिसरो ने अनिच्छा के साथ रोमन प्रांत सिलिसिया के प्रोकौंसल का पद स्वीकार किया। उनका स्वभाव प्रशासनिक या सैन्य जीवन की अपेक्षा सार्वजनिक, न्यायिक और बौद्धिक गतिविधियों की ओर अधिक था। वे रोम में रहकर सीनेट की कार्यवाही, न्यायालयों और साहित्यिक लेखन में सक्रिय रहना चाहते थे, किंतु तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों के कारण उन्हें प्रांतीय शासन का दायित्व ग्रहण करना पड़ा।
इस नियुक्ति का प्रमुख कारण 52 ईसा पूर्व में ग्नेयस पॉम्पियस मैग्नस (पॉम्पी) द्वारा पारित वह कानून था, जिसके अनुसार किसी व्यक्ति के कौंसल अथवा प्रेटर पद छोड़ने और किसी प्रांत का प्रोकौंसल या प्रोप्रेटर बनने के बीच कम-से-कम पाँच वर्ष का अंतर होना आवश्यक था। इस व्यवस्था से योग्य पूर्व कौंसलों की संख्या सीमित हो गई और कई वरिष्ठ राजनेताओं को अनिवार्य रूप से प्रांतीय शासन स्वीकार करना पड़ा। इसी क्रम में सिसरो को भी सिलिसिया भेजा गया। उन्होंने मई 51 ईसा पूर्व में औपचारिक रूप से पद ग्रहण किया और लंबी यात्रा के बाद अगस्त 51 ईसा पूर्व के लगभग सिलिसिया पहुँचकर प्रशासनिक कार्य प्रारंभ किए।
प्रांत की राजनीतिक स्थिति
सिसरो के सिलिसिया पहुँचने के समय रोमन साम्राज्य की पूर्वी सीमा अत्यंत अस्थिर थी। 53 ईसा पूर्व में मार्कस लिसिनियस क्रैसस की कर्रे (Carrhae) के युद्ध में पार्थियन साम्राज्य के हाथों हुई पराजय और मृत्यु ने रोम की प्रतिष्ठा को गंभीर आघात पहुँचाया था। इस पराजय के बाद पार्थियन साम्राज्य ने अपनी शक्ति का विस्तार प्रारंभ किया और सीरिया तथा सिलिसिया जैसे सीमावर्ती प्रांत निरंतर आक्रमण के भय में रहने लगे। ऐसी परिस्थितियों में सिसरो को केवल प्रशासन ही नहीं, बल्कि सीमाओं की सुरक्षा का दायित्व भी निभाना पड़ा। उन्होंने शासन की शुरुआत कठोर दमन के स्थान पर न्यायपूर्ण, संयमित और विधिसम्मत प्रशासन से की। उनका उद्देश्य कानून-व्यवस्था को सुदृढ़ करना, प्रशासनिक भ्रष्टाचार को नियंत्रित करना तथा स्थानीय जनता का विश्वास पुनः प्राप्त करना था। उनका विश्वास था कि किसी भी प्रांत में स्थायी शांति केवल न्यायपूर्ण शासन से ही स्थापित की जा सकती है।
प्रशासनिक सुधार
सिलिसिया का निरीक्षण करने पर सिसरो ने पाया कि पूर्ववर्ती गवर्नरों और उनके अधिकारियों ने सार्वजनिक धन तथा सरकारी संपत्ति का व्यापक दुरुपयोग किया था। अनेक स्थानों पर कर-वसूली में अनियमितताएँ थीं और प्रशासनिक भ्रष्टाचार सामान्य बात बन चुका था। सिसरो ने इन मामलों की निष्पक्ष जाँच करवाई तथा जहाँ तक संभव हुआ, गबन की गई सरकारी संपत्ति को पुनः राज्य के अधिकार में लाने का प्रयास किया। उन्होंने दंड और उदारता के बीच संतुलित नीति अपनाई। जिन अधिकारियों या व्यक्तियों ने स्वेच्छा से अवैध रूप से प्राप्त संपत्ति लौटा दी, उनके प्रति अपेक्षाकृत उदार व्यवहार किया गया। उन्होंने कठोर दंड देने के बजाय सुधार और प्रशासनिक अनुशासन पर बल दिया। इससे स्थानीय जनता में प्रशासन के प्रति विश्वास बढ़ा और अनेक अधिकारियों ने बिना विरोध के सरकारी धन वापस कर दिया।
सिसरो स्वयं भी अत्यंत सादगीपूर्ण जीवन व्यतीत करते थे। उन्होंने गवर्नर के रूप में अपने निजी तथा प्रशासनिक व्यय को न्यूनतम रखा और अपने पद का उपयोग व्यक्तिगत संपत्ति अर्जित करने के लिए कभी नहीं किया। उस समय अधिकांश रोमन प्रांतीय गवर्नर अपने कार्यकाल में अत्यधिक धन अर्जित करने का प्रयास करते थे, किंतु सिसरो ने ईमानदारी, मितव्ययिता और निष्पक्षता का आदर्श प्रस्तुत किया। उनके न्यायपूर्ण प्रशासन के कारण स्थानीय नागरिकों, व्यापारियों तथा नगर-समुदायों में उनके प्रति सम्मान और विश्वास स्थापित हुआ।
पार्थियन संकट
सिसरो के शासनकाल की सबसे गंभीर चुनौती पार्थियन साम्राज्य से उत्पन्न हुई। पार्थियन राजा ओरोड्स द्वितीय के पुत्र राजकुमार पैकोरस ने यूफ्रेट्स नदी पार कर रोमन सीमावर्ती क्षेत्रों में प्रवेश किया। उसकी सेना ने सीरिया के अनेक भागों में आक्रमण किए और एंटिओक के निकट रोमन सेनापति गाइउस कैसियस लॉन्गिनस पर दबाव बनाया।
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए सिसरो अपने अधीन उपलब्ध दो रोमन लीजियनों तथा सहायक घुड़सवार सेना के साथ कैसियस की सहायता के लिए आगे बढ़े। जब तक वे वहाँ पहुँचे, तब तक पैकोरस एंटिओक की घेराबंदी समाप्त कर दक्षिण की ओर बढ़ चुका था और ग्रामीण क्षेत्रों में लूटपाट कर रहा था। कैसियस ने उसका पीछा किया और एंटीगोनिया के निकट पार्थियन सेना को पराजित कर पीछे हटने के लिए विवश कर दिया। इस पूरे अभियान के दौरान सिसरो ने सीमाओं की रक्षा, सेना के संगठन और रसद व्यवस्था को बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके समय में सिलिसिया पर कोई बड़ा पार्थियन आक्रमण सफल नहीं हो सका।
सिसरो के सैन्य अभियान
पार्थियन संकट के अतिरिक्त सिसरो को सिलिसिया के पर्वतीय क्षेत्रों में सक्रिय डाकुओं और विद्रोही जनजातियों का भी सामना करना पड़ा। इन समूहों के कारण व्यापारिक मार्ग असुरक्षित हो गए थे और रोमन प्रशासन की प्रतिष्ठा प्रभावित हो रही थी। सिसरो ने अपनी सेना के साथ उनके विरुद्ध अभियान चलाया तथा सीमा का निरीक्षण करने आई पार्थियन अश्वारोही टुकड़ी को भी पराजित किया।
इसके बाद उन्होंने अमानुस पर्वत क्षेत्र में सक्रिय विद्रोही जनजातियों और लुटेरों के विरुद्ध सफल सैन्य अभियान चलाया। इस विजय से प्रभावित होकर उनकी सेना ने उन्हें ‘इम्पेरेटर’ की सम्मानजनक उपाधि प्रदान की। रोमन परंपरा में यह उपाधि किसी विजयी सेनापति को उसके सैनिकों द्वारा दी जाती थी और इसके आधार पर भविष्य में रोम में विजय-उत्सव (ट्रायम्फ़) की माँग की जा सकती थी।
इसके पश्चात सिसरो ने स्वतंत्र सिलिसियाई पर्वतीय जनजातियों के प्रमुख दुर्ग पिंडेनिस्सुम का घेराव किया। लगभग 47 दिनों तक चले अभियान के बाद दिसंबर 51 ईसा पूर्व में रोमन सेना ने इस दुर्ग पर अधिकार कर लिया। इस विजय के साथ क्षेत्र में विद्रोह का प्रभावी रूप से दमन हुआ और सिलिसिया में रोमन शासन की स्थिति पहले की अपेक्षा अधिक सुदृढ़ हो गई। यद्यपि सिसरो स्वयं को मुख्यतः सैनिक नहीं मानते थे, फिर भी उन्होंने आवश्यकता पड़ने पर एक सक्षम और सफल प्रांतीय सेनापति होने का परिचय दिया।
प्रांत से प्रस्थान
50 ईसा पूर्व में सिलिसिया के प्रोकौंसल के रूप में अपना एक वर्ष का कार्यकाल पूरा करने के बाद सिसरो ने 30 जुलाई को प्रांत का प्रशासन अपने छोटे भाई क्विंटस टुलियस सिसरो को सौंप दिया, जो पूरे कार्यकाल में उनके लेगेट (वरिष्ठ सहायक अधिकारी) के रूप में कार्य कर रहे थे। प्रशासन का विधिवत हस्तांतरण करने के बाद उन्होंने रोम लौटने की यात्रा आरंभ की।
वापसी के मार्ग में उन्होंने पहले रोड्स द्वीप में कुछ समय बिताया, जहाँ युवावस्था में उन्होंने प्रसिद्ध वक्तृत्व-शिक्षक अपोलोनियस मोलोन से शिक्षा प्राप्त की थी। इसके बाद वे एथेंस पहुँचे, जो उस समय यूनानी दर्शन और उच्च शिक्षा का प्रमुख केंद्र था। वहाँ उनकी भेंट उनके घनिष्ठ मित्र टाइटस पोम्पोनियस एटिकस से हुई तथा उन्होंने अनेक यूनानी दार्शनिकों और विद्वानों से भी विचार-विमर्श किया। इस प्रकार सिलिसिया का उनका कार्यकाल केवल सफल प्रशासन और सीमाओं की रक्षा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने उनके राजनीतिक अनुभव, प्रशासनिक क्षमता और व्यावहारिक नेतृत्व को भी नई परिपक्वता प्रदान की। रोम लौटने पर उन्हें एक ईमानदार, न्यायप्रिय और सक्षम प्रांतीय गवर्नर के रूप में व्यापक सम्मान प्राप्त हुआ।
जूलियस सीज़र का गृहयुद्ध
गृहयुद्ध के समय सिसरो की स्थिति
50 ईसा पूर्व में सिलिसिया प्रांत का शासन सफलतापूर्वक पूरा करने के बाद मार्कस टुलियस सिसरो इटली लौटे। 4 जनवरी 49 ईसा पूर्व को वे रोम के निकट पहुँचे, किंतु उन्होंने तत्काल नगर की पवित्र सीमा (पोमेरियम) में प्रवेश नहीं किया। वे अपनी प्रोकौंसल संबंधी सैन्य शक्तियों को बनाए रखना चाहते थे। इसके दो प्रमुख कारण थे। पहला, उन्हें आशा थी कि सिलिसिया में प्राप्त सैन्य सफलताओं के लिए उन्हें रोमन परंपरा के अनुसार ट्रायम्फ (विजय-उत्सव) मनाने की अनुमति मिल सकती है। दूसरा, यदि रोम की राजनीतिक स्थिति गृहयुद्ध में परिवर्तित हो जाए, तो वे अपनी वैधानिक सैन्य स्थिति बनाए रख सकें। यह उनकी राजनीतिक दूरदर्शिता और परिस्थितियों के प्रति सजगता का परिचायक था।
उसी समय रोमन गणराज्य में जूलियस सीज़र और ग्नेयस पॉम्पियस मैग्नस (पॉम्पी) के बीच संघर्ष अपने चरम पर पहुँच चुका था। सीज़र गॉल में अपनी विजय और लोकप्रियता के बल पर अत्यंत शक्तिशाली हो चुके थे, जबकि पॉम्पी सीनेट तथा परंपरागत गणतांत्रिक व्यवस्था के प्रमुख संरक्षक माने जाते थे। सिसरो व्यक्तिगत रूप से पॉम्पी के अधिक निकट थे और उनका विश्वास था कि गणराज्य की संवैधानिक व्यवस्था की रक्षा केवल सीनेट और पॉम्पी के सहयोग से ही संभव है। फिर भी वे किसी भी पक्ष का अंध समर्थन करने के पक्षधर नहीं थे। वे दोनों नेताओं के बीच समझौते और शांतिपूर्ण समाधान की आशा करते रहे तथा अंतिम समय तक गृहयुद्ध टालने का प्रयास करते रहे।
सीज़र का इटली पर अधिकार
जनवरी 49 ईसा पूर्व में जूलियस सीज़र ने अपनी सेना के साथ रुबिकॉन नदी पार कर इटली में प्रवेश किया। रोमन परंपरा के अनुसार किसी सेनापति द्वारा सेना सहित इस सीमा को पार करना राज्य के विरुद्ध विद्रोह माना जाता था। इस घटना के साथ ही रोमन गृहयुद्ध का औपचारिक आरंभ हुआ। सीज़र ने तीव्र गति से इटली के अधिकांश भाग पर अधिकार कर लिया, जिससे पॉम्पी और सीनेट के अनेक सदस्य रोम छोड़कर दक्षिण की ओर चले गए।
जूलियस सीज़र भली-भाँति जानते थे कि सिसरो रोम के सबसे प्रतिष्ठित राजनेताओं, महान वक्ताओं और प्रभावशाली बुद्धिजीवियों में से एक हैं। इसलिए उन्होंने पत्रों और दूतों के माध्यम से सिसरो को अपने पक्ष में लाने का प्रयास किया। सिसरो ने सीज़र के प्रति व्यक्तिगत सम्मान बनाए रखा, किंतु उनके प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया। उनका मानना था कि किसी एक व्यक्ति के हाथों में असाधारण शक्ति का केंद्रीकरण रोमन गणराज्य की परंपराओं के लिए घातक सिद्ध हो सकता है। अंततः उन्होंने इटली छोड़ दिया और एड्रियाटिक सागर पार करके डिर्राखियम (वर्तमान डुर्रेस, अल्बानिया) पहुँचे, जहाँ पॉम्पी ने अपना मुख्यालय स्थापित किया था।
48 ईसा पूर्व में सिसरो मैसेडोनिया में पॉम्पी के साथ रहे। यद्यपि उन्होंने गणतंत्र समर्थक पक्ष का समर्थन किया, परंतु शीघ्र ही उन्हें पॉम्पी के नेतृत्व और उनके समर्थकों की नीति पर संदेह होने लगा। वे देखते थे कि अनेक कुलीन नेता समझौते की संभावना समाप्त कर केवल प्रतिशोध और सत्ता की पुनर्प्राप्ति के उद्देश्य से युद्ध जारी रखना चाहते थे। सिसरो इस दृष्टिकोण से सहमत नहीं थे। उनके मतभेद विशेष रूप से कट्टर गणतंत्रवादी नेता मार्कस पोर्शियस कैटो (कैटो द यंगर) से उभरकर सामने आए। कैटो का विचार था कि गणराज्य की रक्षा के लिए किसी भी प्रकार का समझौता स्वीकार नहीं किया जा सकता, जबकि सिसरो यथार्थवादी समाधान के पक्षधर थे।
फार्सालस का युद्ध और सिसरो की वापसी
9 अगस्त 48 ईसा पूर्व को फार्सालस के निर्णायक युद्ध में जूलियस सीज़र ने पॉम्पी की सेना को पराजित कर दिया। यह युद्ध रोमन इतिहास का निर्णायक मोड़ सिद्ध हुआ। पराजय के बाद पॉम्पी के अनेक समर्थकों ने सिसरो से शेष सेना का नेतृत्व संभालने और संघर्ष जारी रखने का आग्रह किया, किंतु उन्होंने इसे स्पष्ट रूप से अस्वीकार कर दिया। उनके अनुसार युद्ध अब निर्णायक रूप से सीज़र के पक्ष में जा चुका था और आगे संघर्ष केवल अनावश्यक रक्तपात तथा गणराज्य की और अधिक क्षति का कारण बनता।
47 ईसा पूर्व में सिसरो इटली लौट आए। वे अब भी अपने प्रोकौंसल संबंधी अधिकारों के साथ यात्रा कर रहे थे, किंतु रोम की पोमेरियम सीमा में प्रवेश करते ही उन्होंने विधिवत अपनी सैन्य कमान का परित्याग कर दिया और एक सामान्य नागरिक के रूप में सार्वजनिक जीवन में लौट आए। इस निर्णय से स्पष्ट होता है कि वे व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षा की अपेक्षा संवैधानिक मर्यादाओं का अधिक सम्मान करते थे।
सीज़र की तानाशाही के प्रति दृष्टिकोण
फार्सालस के बाद जूलियस सीज़र रोमन राजनीति के निर्विवाद नेता बन गए और उन्हें क्रमशः तानाशाह (डिक्टेटर) के व्यापक अधिकार प्राप्त हुए। सिसरो इस व्यवस्था से संतुष्ट नहीं थे, किंतु वे यह भी समझते थे कि तत्काल प्रत्यक्ष विरोध व्यावहारिक नहीं होगा। उन्होंने अपने मित्र मार्कस टेरेन्शियस वैरो को लिखे पत्र में स्पष्ट किया कि वर्तमान परिस्थितियों में विवेक, संयम और धैर्य ही सबसे उपयुक्त नीति है। इसलिए उन्होंने सक्रिय राजनीति से कुछ दूरी बनाकर अपना अधिकांश समय दर्शन, साहित्य और लेखन को समर्पित किया। इसी काल में उन्होंने अनेक महत्त्वपूर्ण दार्शनिक ग्रंथों की रचना आरंभ की, जिन्होंने उन्हें रोमन बौद्धिक परंपरा का सबसे प्रभावशाली लेखक बना दिया।
15 मार्च 44 ईसा पूर्व, जिसे रोमन परंपरा में ‘मार्च की आइड्स’ कहा जाता है, जूलियस सीज़र की सीनेट भवन में हत्या कर दी गई। इस षड्यंत्र में मार्कस जूनियस ब्रूटस, गाइउस कैसियस तथा अन्य गणतंत्रवादी सीनेटर सम्मिलित थे। सिसरो इस षड्यंत्र की योजना में प्रत्यक्ष रूप से शामिल नहीं थे, किंतु षड्यंत्रकारियों को विश्वास था कि वे उनके राजनीतिक उद्देश्य के प्रति सहानुभूति रखते हैं। हत्या के तुरंत बाद ब्रूटस ने सिसरो का नाम लेकर उन्हें गणराज्य की पुनर्स्थापना का नेतृत्व करने का आह्वान किया। इससे स्पष्ट होता है कि गणतंत्र समर्थक दल उन्हें अपना सबसे प्रतिष्ठित नैतिक और राजनीतिक नेता मानता था।
बाद में गाइउस ट्रेबोनियस को लिखे एक पत्र में सिसरो ने प्रसिद्ध टिप्पणी की कि यदि वे भी ‘15 मार्च के उस शानदार भोज’ में उपस्थित होते, तो संभवतः इतिहास की दिशा भिन्न होती। इस कथन से यह संकेत मिलता है कि यद्यपि वे षड्यंत्र में सहभागी नहीं थे, फिर भी उन्होंने सीज़र की हत्या को गणराज्य की पुनर्स्थापना का एक संभावित अवसर माना।
सीज़र की मृत्यु के बाद की राजनीति
जूलियस सीज़र की मृत्यु के बाद रोम पुनः राजनीतिक अस्थिरता और सत्ता-संघर्ष का केंद्र बन गया। इस समय सिसरो फिर से सक्रिय राजनीति में लौटे और सीनेट में गणतंत्र समर्थक दल के सबसे प्रभावशाली प्रवक्ता बनकर उभरे। उन्हें मार्कस एंटनी की महत्त्वाकांक्षाओं पर गहरा संदेह था और वे मानते थे कि एंटनी सीज़र के उत्तराधिकारी के रूप में व्यक्तिगत शासन स्थापित करना चाहते हैं। दूसरी ओर, वे तत्काल एक और गृहयुद्ध से भी बचना चाहते थे।
इसी कारण सिसरो ने एक व्यावहारिक समझौते का समर्थन किया, जिसके अंतर्गत सीज़र के हत्यारों को सामान्य क्षमादान दिया गया, जबकि सीज़र द्वारा किए गए प्रशासनिक निर्णयों, नियुक्तियों और कानूनों को वैध माना गया। उनका उद्देश्य प्रतिशोध की राजनीति को रोकना, राज्य में स्थिरता बनाए रखना तथा रोमन गणराज्य की संवैधानिक संस्थाओं को पुनर्जीवित करना था। यद्यपि यह प्रयास अंततः सफल नहीं हुआ, फिर भी इससे यह स्पष्ट होता है कि सिसरो जीवन के अंतिम वर्षों तक गणराज्य, विधि और संवैधानिक शासन के आदर्शों के प्रति प्रतिबद्ध रहे।
मार्क एंटनी का विरोध और सिसरो की मृत्यु
एंटनी के विरुद्ध अभियान
44 ईसा पूर्व में जूलियस सीज़र की हत्या के बाद रोमन गणराज्य पुनः गहरे राजनीतिक संकट में पड़ गया। सीज़र की मृत्यु से तानाशाही का अंत तो हुआ, किंतु सत्ता का प्रश्न और भी जटिल हो गया। सीज़र के समर्थक तथा गणतंत्रवादी सीनेटर दोनों ही राज्य की बागडोर अपने हाथों में लेना चाहते थे। ऐसी परिस्थितियों में मार्कस टुलियस सिसरो एक बार फिर रोमन राजनीति के केंद्र में आ गए। 43 ईसा पूर्व के प्रारंभ तक गणतंत्रवादी नेताओं ने उन्हें सीनेट का सबसे प्रभावशाली प्रवक्ता और नैतिक नेता स्वीकार कर लिया। यद्यपि प्रिंसेप्स सेनेटुस का पारंपरिक पद सुल्ला के संवैधानिक सुधारों के बाद अपना अधिकांश राजनीतिक महत्त्व खो चुका था, फिर भी व्यवहार में सिसरो ही सीनेट के प्रमुख नेता और गणराज्य के सबसे प्रतिष्ठित प्रतिनिधि बन गए थे।
दूसरी ओर मार्कस एंटोनियस (मार्क एंटनी), जो सीज़र के निकटतम सहयोगियों में थे, स्वयं को उनकी राजनीतिक विरासत का स्वाभाविक उत्तराधिकारी मानते थे। उन्होंने कौंसल के रूप में सीज़र की नीतियों और इच्छाओं का हवाला देकर अपने अधिकारों का निरंतर विस्तार करना प्रारंभ कर दिया। सिसरो का आरोप था कि एंटनी सीज़र की वसीयत और राजनीतिक निर्णयों की मनमानी व्याख्या करके व्यक्तिगत सत्ता स्थापित करना चाहते हैं। उनके अनुसार एंटनी का उद्देश्य गणराज्य की संस्थाओं को सुदृढ़ करना नहीं, बल्कि सीज़र के स्थान पर स्वयं को सर्वोच्च शासक बनाना था। यही मतभेद शीघ्र ही दोनों नेताओं के बीच खुले राजनीतिक संघर्ष में परिवर्तित हो गया।
ऑक्टेवियन से गठबंधन
जूलियस सीज़र की हत्या के कुछ ही समय बाद उनके दत्तक पुत्र और उत्तराधिकारी गाइउस ऑक्टावियस इटली लौटे। उस समय उनकी आयु लगभग उन्नीस वर्ष थी और वे राजनीतिक अनुभव की दृष्टि से अपेक्षाकृत अपरिपक्व थे। बाद के इतिहास में वही ऑक्टावियस “ऑक्टेवियन” तथा अंततः प्रथम रोमन सम्राट “ऑगस्टस” के नाम से प्रसिद्ध हुए। सिसरो ने प्रारंभ में ऑक्टेवियन को एंटनी के विरुद्ध एक उपयोगी सहयोगी के रूप में देखा। उन्हें विश्वास था कि युवा ऑक्टेवियन गणराज्य की संवैधानिक परंपराओं का सम्मान करेंगे और व्यक्तिगत तानाशाही स्थापित करने के स्थान पर सीनेट के साथ मिलकर शासन करेंगे। इसी आशा के आधार पर सिसरो ने सार्वजनिक रूप से ऑक्टेवियन का समर्थन किया। उन्होंने सीनेट में भी उनके पक्ष में वातावरण तैयार किया तथा उन्हें वैध राजनीतिक शक्ति के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया। उनका उद्देश्य स्पष्ट था—ऑक्टेवियन की सहायता से एंटनी के प्रभाव को सीमित करना और रोमन गणराज्य की पारंपरिक संस्थाओं की रक्षा करना। बाद की घटनाओं से स्पष्ट हुआ कि सिसरो ने ऑक्टेवियन की महत्त्वाकांक्षा का सही आकलन नहीं किया था।
फिलिप्पिकाए भाषण
मार्क एंटनी के विरुद्ध संघर्ष के दौरान सिसरो ने अपने जीवन के सबसे प्रसिद्ध राजनीतिक भाषणों की रचना की। इन भाषणों का संग्रह ‘फिलिप्पिकाए’ के नाम से प्रसिद्ध है। इनका नाम यूनान के महान वक्ता डेमोस्थनीज़ द्वारा मकदूनिया के राजा फिलिप द्वितीय के विरुद्ध दिए गए ‘फिलिप्पिक’ भाषणों से प्रेरित था। सिसरो ने कुल चौदह फिलिप्पिकाए भाषण दिए, जिनमें उन्होंने एंटनी पर संविधान की अवहेलना, सत्ता के दुरुपयोग, सीज़र की विरासत का राजनीतिक लाभ उठाने तथा गणराज्य की स्वतंत्रता के लिए गंभीर खतरा बनने का आरोप लगाया। इन भाषणों में केवल राजनीतिक आलोचना ही नहीं, बल्कि गहन संवैधानिक चिंतन भी मिलता है। सिसरो ने बार-बार यह प्रतिपादित किया कि किसी भी व्यक्ति की शक्ति विधि और संविधान से ऊपर नहीं हो सकती। उन्होंने सीनेट से आग्रह किया कि यदि समय रहते एंटनी को न रोका गया, तो रोम पुनः तानाशाही की ओर बढ़ जाएगा। साहित्यिक दृष्टि से भी फिलिप्पिकाए लैटिन गद्य की सर्वोच्च उपलब्धियों में गिने जाते हैं। इनमें तर्क, व्यंग्य, नैतिक अपील और भावनात्मक शक्ति का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है।
म्यूटीना का युद्ध
सिसरो ने सिसाल्पाइन गॉल के गवर्नर डेसिमस जूनियस ब्रूटस अल्बिनुस का खुलकर समर्थन किया। जब मार्क एंटनी ने म्यूटीना (वर्तमान मोडेना) नगर का घेराव करके डेसिमस ब्रूटस को आत्मसमर्पण के लिए विवश करने का प्रयास किया, तब सिसरो ने सीनेट में एंटनी के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की मांग की। प्रारंभ में कुछ वरिष्ठ नेताओं ने समझौते का प्रयास किया, किंतु एंटनी के अडिग रुख के कारण अंततः सीनेट ने उन्हें राज्य का शत्रु घोषित कर दिया।
43 ईसा पूर्व में फोरम गैलोरुम तथा उसके बाद म्यूटीना के युद्ध हुए। इन अभियानों में सीनेट की सेनाओं और ऑक्टेवियन की सेना ने संयुक्त रूप से एंटनी को पराजित कर पीछे हटने के लिए विवश कर दिया। यद्यपि दोनों तत्कालीन कौंसल—औलुस हिर्टियस और गायुस विबियस पांसा—युद्ध में मारे गए, फिर भी एंटनी की पराजय को गणतंत्रवादी दल की महत्त्वपूर्ण सफलता माना गया। इस विजय के बाद सिसरो को विश्वास हो गया कि अब गणराज्य की पुनर्स्थापना संभव है और ऑक्टेवियन सीनेट के सहयोग से राज्य का संचालन करेंगे। किंतु यह आशा शीघ्र ही निराशा में बदल गई।
द्वितीय त्रिमूर्व की स्थापना
म्यूटीना की विजय के कुछ ही समय बाद ऑक्टेवियन और सीनेट के बीच मतभेद उत्पन्न होने लगे। ऑक्टेवियन को अनुभव हुआ कि सीनेट उन्हें पर्याप्त सम्मान और अधिकार देने के लिए तैयार नहीं है। दूसरी ओर एंटनी ने अपनी सैन्य शक्ति पुनर्गठित कर ली थी और मार्कस एमिलियस लेपिडस भी उनके साथ आ मिले। अंततः तीनों नेताओं—ऑक्टेवियन, मार्क एंटनी और लेपिडस—ने समझौता कर लिया। 27 नवंबर 43 ईसा पूर्व को लेक्स टिटिया नामक कानून के माध्यम से द्वितीय त्रिमूर्व की औपचारिक स्थापना हुई। यह प्रथम त्रिमूर्व की भाँति केवल निजी राजनीतिक समझौता नहीं था, बल्कि विधिक रूप से मान्यता प्राप्त असाधारण शासन-व्यवस्था थी। तीनों शासकों को पाँच वर्षों के लिए व्यापक कौंसल-स्तरीय अधिकार प्रदान किए गए। उन्हें कानून बनाने, अधिकारियों की नियुक्ति करने, सेना का संचालन करने तथा राज्य के प्रशासन पर लगभग पूर्ण नियंत्रण प्राप्त हो गया।

सत्ता संभालते ही त्रिमूर्व ने अपने राजनीतिक विरोधियों के विरुद्ध व्यापक प्रोस्क्रिप्शन अर्थात् राजकीय मृत्यु-सूचियाँ जारी कीं। जिन व्यक्तियों के नाम इन सूचियों में शामिल किए जाते थे, उन्हें राज्य का शत्रु घोषित कर दिया जाता था। उनकी संपत्ति जब्त कर ली जाती थी और कोई भी व्यक्ति उन्हें दण्डमुक्त होकर मार सकता था।
मार्क एंटनी ने विशेष आग्रह के साथ सिसरो का नाम इन सूचियों में सम्मिलित कराया। प्राचीन इतिहासकार प्लूटार्क और एप्पियन के अनुसार ऑक्टेवियन ने प्रारंभ में इसका विरोध किया, किंतु अंततः उन्होंने राजनीतिक समझौते के हित में एंटनी की मांग स्वीकार कर ली। इस निर्णय ने सिसरो के जीवन का अंत निश्चित कर दिया।
सिसरो की हत्या
प्रोस्क्रिप्शन की घोषणा के बाद सिसरो ने इटली छोड़कर मैसेडोनिया जाने का निश्चय किया। 7 दिसंबर 43 ईसा पूर्व को वे फोर्मियाए स्थित अपने विला से समुद्र तट की ओर प्रस्थान कर रहे थे, जहाँ से उन्हें जहाज़ द्वारा प्रस्थान करना था। मार्ग में उन्हें ज्ञात हो गया कि एंटनी के सैनिक उनका पीछा कर रहे हैं। कहा जाता है कि स्थानीय जनता और उनके अनेक दासों ने उन्हें बचाने का प्रयास किया तथा उनके ठिकाने की जानकारी देने से इनकार कर दिया। किंतु उनके भाई क्विंटस के पूर्व दास फिलोलोगुस ने उनका छिपने का स्थान बता दिया। शीघ्र ही सेंचुरियन हेरेनियस तथा सैन्य ट्रिब्यून पॉपिलियस लेनास के नेतृत्व में सैनिक वहाँ पहुँच गए।
प्राचीन लेखक सेनेका द एल्डर तथा इतिहासकार ऑफ़िडियस बासुस के अनुसार सिसरो ने मृत्यु का सामना अद्भुत धैर्य और आत्मसंयम के साथ किया। उन्होंने किसी प्रकार का प्रतिरोध नहीं किया और कथित रूप से कहा : “मैं और आगे नहीं जाऊँगा। आओ, सैनिक, और यदि तुम अपना कार्य ठीक से कर सकते हो तो मेरी गर्दन काट दो।” इसके बाद उन्होंने शांत भाव से अपना सिर आगे बढ़ा दिया और उनका वध कर दिया गया। उनकी मृत्यु उस व्यक्ति की मृत्यु थी जिसने जीवनभर शब्दों और विधि के बल पर राजनीति की थी, न कि तलवार के बल पर।
हत्या के बाद सैनिकों ने सिसरो का सिर और दोनों हाथ काट दिए। मार्क एंटनी के आदेश पर इन्हें रोम लाकर फोरम रोमानुम के रोस्त्रा पर सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित किया गया। यह केवल एक क्रूर दंड नहीं था, बल्कि राजनीतिक प्रतीक भी था। जिन हाथों से सिसरो ने फिलिप्पिकाए लिखे थे और जिस मुख से उन्होंने एंटनी के विरुद्ध प्रखर भाषण दिए थे, उन्हीं को सार्वजनिक अपमान का साधन बनाया गया।
इतिहासकार कैसियस डियो के अनुसार एंटनी की पत्नी फुल्विया ने सिसरो का सिर अपने हाथों में लेकर उनकी जीभ बाहर निकाली और अपने केश-पिन से उस पर कई बार प्रहार किया। आधुनिक इतिहासकार इस घटना की ऐतिहासिक सत्यता को पूर्ण निश्चितता से स्वीकार नहीं करते, किंतु प्राचीन परंपरा में यह विवरण एंटनी और फुल्विया की प्रतिशोध-भावना के प्रतीक के रूप में प्रसिद्ध है।
मृत्यु के बाद की प्रतिष्ठा
सिसरो की मृत्यु के साथ रोमन गणराज्य के सबसे महान वक्ता, विधिवेत्ता और राजनीतिक चिंतक का जीवन समाप्त हो गया। किंतु उनकी बौद्धिक विरासत जीवित रही। 30 ईसा पूर्व में उनके पुत्र मार्कस टुलियस सिसरो (कनिष्ठ) रोमन कौंसल बने और उन्होंने सीनेट में मार्क एंटनी तथा क्लियोपेट्रा की पराजय की घोषणा की। अनेक इतिहासकार इसे प्रतीकात्मक रूप से उनके पिता की मृत्यु का राजनीतिक प्रतिशोध मानते हैं।
बाद के वर्षों में ऑक्टेवियन, जो सम्राट ऑगस्टस बने, ने भी सिसरो की विद्वत्ता, देशभक्ति और वक्तृत्व-कला की प्रशंसा की। उन्होंने स्वीकार किया कि सिसरो रोमन गणराज्य के महानतम बुद्धिजीवियों में से एक थे। फिर भी यह ऐतिहासिक तथ्य बना रहा कि द्वितीय त्रिमूर्व की प्रोस्क्रिप्शन सूची में सिसरो का नाम सम्मिलित करने की अंतिम स्वीकृति ऑक्टेवियन ने भी दी थी।
सिसरो का जीवन और मृत्यु रोमन गणराज्य के अंतिम संघर्ष का प्रतीक है। उन्होंने अपने लेखन, भाषणों और राजनीतिक कार्यों के माध्यम से विधि के शासन, संवैधानिक मर्यादा और गणतांत्रिक स्वतंत्रता का समर्थन किया। यद्यपि वे अपने जीवनकाल में इन आदर्शों की रक्षा नहीं कर सके, फिर भी उनकी रचनाओं ने यूरोप की राजनीतिक, विधिक और दार्शनिक परंपरा पर अमिट प्रभाव छोड़ा। इस प्रकार सिसरो केवल प्राचीन रोम के महान वक्ता ही नहीं, बल्कि स्वतंत्रता, न्याय और संवैधानिक शासन के स्थायी प्रवक्ता के रूप में इतिहास में अमर हो गए।
सिसरो का ऐतिहासिक मूल्यांकन
मार्कस टुलियस सिसरो का राजनीतिक जीवन प्राचीन रोम के इतिहास के सबसे जटिल और बहुआयामी सार्वजनिक जीवनों में गिना जाता है। वे रोमन गणराज्य की संवैधानिक व्यवस्था, विधि के शासन, सीनेट की सर्वोच्चता तथा नागरिक उत्तरदायित्व के प्रबल समर्थक थे। उनका विश्वास था कि किसी भी राज्य की स्थिरता केवल सैन्य शक्ति या किसी एक व्यक्ति के प्रभाव पर नहीं, बल्कि कानून, परंपरा और संस्थागत संतुलन पर आधारित होनी चाहिए। इसी कारण उन्होंने अपने संपूर्ण राजनीतिक जीवन में रोमन गणराज्य की पारंपरिक व्यवस्था को बनाए रखने का प्रयास किया। किंतु उनके जीवनकाल में रोम निरंतर गृहयुद्धों, राजनीतिक षड्यंत्रों, आर्थिक संकटों और महत्त्वाकांक्षी सेनानायकों के बीच सत्ता-संघर्ष से गुजर रहा था। इन बदलती परिस्थितियों ने उन्हें कई बार अपनी राजनीतिक रणनीति में परिवर्तन करने के लिए विवश किया।
सिसरो के आलोचकों ने उन पर अवसरवाद, राजनीतिक अनिर्णय और परिस्थितियों के अनुसार पक्ष बदलने का आरोप लगाया। उनके अनुसार वे कभी पॉम्पी का समर्थन करते दिखाई देते हैं, तो कभी जूलियस सीज़र से समझौता करते हैं और बाद में ऑक्टेवियन के साथ मिलकर मार्क ऐंटनी का विरोध करते हैं। दूसरी ओर, उनके समर्थकों का तर्क है कि इन परिवर्तनों का उद्देश्य व्यक्तिगत लाभ प्राप्त करना नहीं, बल्कि प्रत्येक परिस्थिति में रोमन गणराज्य और उसकी संवैधानिक संस्थाओं की रक्षा करना था। उनका मानना था कि जब भी उन्हें लगा कि कोई व्यक्ति या राजनीतिक शक्ति गणराज्य के लिए अपेक्षाकृत कम हानिकारक है, उन्होंने उसी का समर्थन किया।
समकालीन इतिहासकार और राजनेता गाइउस असिनियस पोल्लियो ने सिसरो के व्यक्तित्व का मूल्यांकन करते हुए लिखा कि यदि वे समृद्धि के समय अधिक संयम और विपत्ति के समय अधिक साहस का परिचय देते, तो वे और भी महान सिद्ध होते। यह टिप्पणी उनके व्यक्तित्व की शक्तियों और सीमाओं दोनों को स्पष्ट करती है। वे असाधारण बुद्धिमत्ता, गहन विधिक ज्ञान और अद्वितीय वक्तृत्व-कला के स्वामी थे, किंतु राजनीतिक संकटों के समय कभी-कभी अत्यधिक भावुक, आत्मचिंतनशील और मानसिक रूप से विचलित भी हो जाते थे। विशेष रूप से निर्वासन के दौरान लिखे गए उनके पत्र उनके गहरे मानसिक तनाव और निराशा का प्रमाण प्रस्तुत करते हैं।
आधुनिक इतिहासलेखन में सिसरो का मूल्यांकन सामान्यतः संतुलित दृष्टि से किया जाता है। अधिकांश विद्वान उन्हें न तो पूर्णतः आदर्शवादी मानते हैं और न ही केवल व्यावहारिक अवसरवादी। वे ऐसे राजनेता थे जिन्होंने तीव्र राजनीतिक परिवर्तन के युग में गणराज्य की संस्थाओं को बचाने का प्रयास किया, किंतु बदलती शक्ति-संरचनाओं और सैन्य प्रभुत्व के सामने उनकी राजनीतिक क्षमता सीमित होती चली गई। उनकी सबसे बड़ी शक्ति उनका बौद्धिक नेतृत्व, विधिक दृष्टि, नैतिक तर्क और असाधारण वक्तृत्व-कौशल था, जबकि उनकी सबसे बड़ी कमजोरी यह थी कि वे सैन्य शक्ति और जनसमर्थन पर आधारित नई राजनीतिक वास्तविकताओं का प्रभावी ढंग से सामना नहीं कर सके।
आधुनिक इतिहासकारों का एक वर्ग यह भी मानता है कि सिसरो स्वयं को रोमन गणराज्य का रक्षक मानते थे, किंतु व्यवहार में वे मुख्यतः सीनेट और अभिजात वर्ग के हितों के प्रतिनिधि थे। वे पारंपरिक संवैधानिक व्यवस्था, निजी संपत्ति और सामाजिक पदानुक्रम की रक्षा के पक्षधर थे। इसी कारण वे उन लोकप्रिय राजनीतिक आंदोलनों (पोपुलारेस) के प्रति सशंकित रहते थे, जो व्यापक जनसमर्थन के आधार पर सत्ता-संतुलन में परिवर्तन लाना चाहते थे। उनके आलोचकों का मत है कि उन्होंने निर्धन वर्ग की सामाजिक और आर्थिक समस्याओं की अपेक्षा राज्य की संस्थाओं और अभिजात वर्ग की स्थिरता को अधिक महत्त्व दिया। परिणामस्वरूप उन्होंने जूलियस सीज़र सहित अनेक लोकप्रिय नेताओं के भूमि-वितरण, ऋण-सुधार और प्रशासनिक पुनर्गठन जैसे कार्यक्रमों का विरोध किया।
कुछ विद्वानों ने यह भी तर्क दिया है कि सिसरो का गणतंत्रवाद आधुनिक अर्थों में लोकतांत्रिक नहीं था। वे जनसत्ता की अपेक्षा मिश्रित शासन-व्यवस्था के समर्थक थे, जिसमें सीनेट, मजिस्ट्रेट और जनसभाएँ परस्पर संतुलन बनाए रखें। उनके लिए आदर्श शासन वह था जिसमें अनुभवी, शिक्षित और उत्तरदायी अभिजात वर्ग राज्य का नेतृत्व करे। आधुनिक लोकतांत्रिक मानकों से यह दृष्टिकोण सीमित प्रतीत हो सकता है, किंतु रोमन गणराज्य की संवैधानिक परंपरा में यह व्यापक रूप से स्वीकार्य और सम्मानित विचारधारा थी।
इतिहासकार माइकल पेरेंटी ने सिसरो का अपेक्षाकृत आलोचनात्मक मूल्यांकन प्रस्तुत किया है। वे उनकी असाधारण वक्तृत्व-कला, विधिक ज्ञान और साहित्यिक प्रतिभा की प्रशंसा करते हुए भी उन्हें कभी-कभी अहंकारी, आत्मप्रशंसक और अवसरवादी बताते हैं। पेरेंटी का मत है कि सिसरो सार्वजनिक भाषणों में जिन उच्च नैतिक आदर्शों का समर्थन करते थे, निजी राजनीतिक व्यवहार में वे सदैव उसी स्तर की निरंतरता नहीं दिखा सके। विशेष रूप से बदलती राजनीतिक परिस्थितियों के अनुसार उनके राजनीतिक संबंधों और रणनीतियों में आए परिवर्तनों ने उनके विरोधियों को उन्हें अवसरवादी कहने का अवसर दिया।
कैटिलिन षड्यंत्र के अभियुक्तों को बिना नियमित न्यायिक प्रक्रिया के मृत्युदंड दिलाने में सिसरो की भूमिका भी आधुनिक इतिहासलेखन में व्यापक बहस का विषय है। अनेक विद्वानों का मत है कि राज्य की सुरक्षा के नाम पर रोमन नागरिकों को बिना विधिक मुकदमे के मृत्युदंड देना नागरिक अधिकारों की परंपरा के विरुद्ध था। दूसरी ओर, कुछ इतिहासकारों का तर्क है कि उस समय गणराज्य वास्तविक संकट का सामना कर रहा था और सिसरो ने सीनेट द्वारा पारित सेनातुस कन्सुल्तुम उल्तिमुम के अंतर्गत अपने संवैधानिक अधिकारों का प्रयोग किया। इस प्रकार यह विवाद आज भी राजनीतिक दर्शन और संवैधानिक इतिहास में राज्य की सुरक्षा तथा नागरिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन के प्रश्न के रूप में देखा जाता है।
राजनेता के रूप में भी सिसरो का मूल्यांकन प्राचीन काल से लेकर आधुनिक युग तक निरंतर चर्चा का विषय रहा है। उनके समकालीनों ने उन्हें समान रूप से सराहा और आलोचना की। कुछ लोगों ने उन पर आत्मप्रशंसा, अत्यधिक महत्त्वाकांक्षा तथा बदलती परिस्थितियों के अनुसार राजनीतिक पक्ष बदलने का आरोप लगाया। दूसरी ओर, अनेक आधुनिक इतिहासकार इस बात पर बल देते हैं कि रोमन गणराज्य की राजनीति आधुनिक राजनीतिक दलों की व्यवस्था से भिन्न थी। उस समय स्थायी दलों की अपेक्षा व्यक्तिगत संबंध, पारिवारिक गठबंधन, संरक्षक–आश्रित संबंध और परिस्थितियों के अनुसार बनने वाले राजनीतिक समझौते अधिक महत्त्वपूर्ण थे। इसलिए सिसरो के राजनीतिक निर्णयों का मूल्यांकन आधुनिक दलगत राजनीति के मानकों से करना उचित नहीं माना जाता। उनका मूल उद्देश्य सत्ता प्राप्त करना नहीं, बल्कि रोमन गणराज्य की संवैधानिक व्यवस्था को यथासंभव सुरक्षित रखना था।
सिसरो स्वयं ऑप्टिमेट्स को यूनानी शब्द अरिस्टोक्रातिया अर्थात् ‘श्रेष्ठजनों के शासन’ की अवधारणा से जोड़ते थे। दूसरी ओर वे पोपुलारेस को कोई स्थायी राजनीतिक दल नहीं, बल्कि ऐसी राजनीतिक शैली के रूप में देखते थे जिसका उपयोग विभिन्न अभिजात नेता जनता का समर्थन प्राप्त करने के लिए करते थे। उनके लिए मूल प्रश्न यह नहीं था कि कौन शासन कर रहा है, बल्कि यह था कि शासन कानून, परंपरा और गणतांत्रिक संस्थाओं के अनुरूप संचालित हो रहा है या नहीं।
तुलनात्मक विधि और रोमन विधि के विद्वान गैबोर हम्ज़ा के अनुसार सिसरो का राजनीतिक दर्शन आज भी विभिन्न वैचारिक परंपराओं को आकर्षित करता है। रूढ़िवादी विचारक उनकी संवैधानिक परंपराओं, सामाजिक स्थिरता और संस्थागत निरंतरता के प्रति निष्ठा की प्रशंसा करते हैं, जबकि उदारवादी और प्रगतिशील चिंतक निरंकुश शासन के विरोध, विधि के शासन, नागरिक स्वतंत्रता, प्राकृतिक विधि, निजी संपत्ति की सुरक्षा तथा राजनीतिक और कानूनी समानता संबंधी उनके विचारों को विशेष महत्त्व देते हैं।
यद्यपि सिसरो अपने जीवनकाल में रोमन गणराज्य को उसके पतन से बचाने में सफल नहीं हो सके और अंततः द्वितीय ट्रायमविरेट की प्रोस्क्रिप्शन के दौरान उनकी हत्या कर दी गई, फिर भी उनका ऐतिहासिक महत्त्व किसी भी प्रकार कम नहीं होता। उन्होंने अपने भाषणों, पत्रों और दार्शनिक ग्रंथों के माध्यम से रोमन गणराज्य के राजनीतिक आदर्शों, विधि के शासन, प्राकृतिक विधि, नागरिक उत्तरदायित्व और संवैधानिक शासन के सिद्धांतों को स्थायी बौद्धिक आधार प्रदान किया। इसी कारण सिसरो केवल प्राचीन रोम के महान वक्ता, अधिवक्ता और राजनेता के रूप में ही नहीं, बल्कि पश्चिमी राजनीतिक चिंतन, संवैधानिक दर्शन और विधिशास्त्र के सबसे प्रभावशाली विचारकों में भी गिने जाते हैं।




