लुसियस कॉर्नेलियस सुल्ला फेलिक्स (Lucius Cornelius Sulla Felix)

लुसियस कॉर्नेलियस सुल्ला फेलिक्स (Lucius Cornelius Sulla Felix)

लुसियस कॉर्नेलियस सुल्ला फेलिक्स (138 ई. पू.–78 ई. पू.)

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रोमन गणराज्य के इतिहास में कुछ व्यक्तित्व ऐसे हैं जिन्होंने केवल अपने युग को ही नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की राजनीति की दिशा भी बदल दी। लुसियस कॉर्नेलियस सुल्ला फेलिक्स उन्हीं असाधारण व्यक्तियों में से एक थे। वे एक अद्वितीय सेनानायक, कुशल राजनीतिज्ञ और विवादास्पद शासक थे, जिनकी तलवार ने रोम की सीमाओं का विस्तार किया तो उनकी राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा ने स्वयं रोमन गणराज्य की नींव को भी झकझोर दिया। अपनी सैन्य प्रतिभा, अदम्य साहस और कठोर निर्णयों के बल पर उन्होंने जुगुरथा युद्ध, सिम्ब्रियन युद्ध, सामाजिक युद्ध तथा मिथ्रिडेट्स के विरुद्ध अभियानों में उल्लेखनीय विजय प्राप्त की। किंतु उनकी सबसे बड़ी ऐतिहासिक पहचान उस अभूतपूर्व घटना से बनी, जब उन्होंने अपनी ही सेना के साथ रोम पर चढ़ाई कर गृहयुद्ध में विजय प्राप्त की और रोमन इतिहास में पहली बार सेना की शक्ति को प्रत्यक्ष रूप से राजनीतिक सत्ता प्राप्त करने का साधन बना दिया।

सुल्ला का जीवन विरोधाभासों से भरा हुआ था। एक ओर वे अपने राजनीतिक विरोधियों के प्रति अत्यंत कठोर थे और उनकी कुख्यात प्रोस्क्रिप्शन्स ने रोम को रक्तरंजित कर दिया, तो दूसरी ओर वही व्यक्ति सत्ता के सर्वोच्च शिखर पर पहुँचने के बाद स्वेच्छा से डिक्टेटर पद का त्याग कर निजी जीवन में लौट गया। उन्होंने रोमन संविधान में व्यापक सुधार कर सीनेट की प्रतिष्ठा पुनः स्थापित करने तथा गणतांत्रिक संस्थाओं को सुदृढ़ बनाने का प्रयास किया, यद्यपि उनके अनेक उपाय विवादास्पद रहे। सुल्ला ने यह सिद्ध कर दिया कि एक सेनानायक केवल युद्धभूमि ही नहीं, बल्कि राज्य की राजनीति का भी निर्णायक निर्माता बन सकता है। उनके द्वारा स्थापित परंपराओं ने आगे चलकर पोम्पी, जूलियस सीज़र और अंततः रोमन गणराज्य के पतन तथा साम्राज्य की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया। इस प्रकार सुल्ला का जीवन केवल एक व्यक्ति की जीवनी नहीं, बल्कि रोमन इतिहास के सबसे निर्णायक संक्रमणकाल की गाथा है।

परिवार और युवावस्था

लुसियस कॉर्नेलियस सुल्ला, लुसियस कॉर्नेलियस सुल्ला के पुत्र तथा पब्लियस कॉर्नेलियस सुल्ला के पौत्र थे। उनका जन्म रोमन पैट्रिशियन जेन्स कॉर्नेलिया की एक शाखा में हुआ था। उनके पूर्वजों में से एक तथा उनके परिवार के अंतिम प्रमुख सदस्य पब्लियस कॉर्नेलियस रूफिनस को अत्यधिक विलासिता के आरोप में, विशेष रूप से निर्धारित सीमा से अधिक चाँदी के बर्तन रखने के कारण, सीनेट से निष्कासित कर दिया गया था। इसके बाद सुल्ला के परिवार का कोई सदस्य रोमन राज्य के सर्वोच्च पदों तक नहीं पहुँच सका, जब तक कि स्वयं सुल्ला ने अपने सैन्य और राजनीतिक कौशल के बल पर यह प्रतिष्ठा पुनः प्राप्त नहीं कर ली।

ऐसा माना जाता है कि उनके पिता ने संभवतः प्रेटोर के पद पर कार्य किया था। उन्होंने दो विवाह किए थे, जिसके परिणामस्वरूप सुल्ला को एक अत्यंत समृद्ध सौतेली माता मिली। उनकी संपत्ति ने सुल्ला के प्रारंभिक जीवन, शिक्षा तथा राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं को आगे बढ़ाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई और उन्हें अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत करने के लिए आवश्यक आर्थिक आधार प्रदान किया।

सुल्ला का प्रारंभिक जीवन

सुल्ला के प्रारंभिक जीवन के संबंध में अनेक कथाएँ प्रचलित हैं, जिनमें से कई को बाद के लेखकों ने किंवदंती का रूप दे दिया है। सबसे प्रसिद्ध कथा के अनुसार जब सुल्ला बालक थे और उनकी धाय उन्हें रोम की सड़कों पर घुमा रही थी, तब एक रहस्यमयी स्त्री ने उन्हें देखकर कहा : ‘पुएर, तिबी एत रेई पब्लिकाए तुए फेलिक्स’(बालक, तुम स्वयं तथा अपने गणराज्य के लिए सौभाग्यशाली सिद्ध होगे)। यद्यपि अधिकांश इतिहासकार इस घटना को ऐतिहासिक तथ्य के बजाय लोककथा मानते हैं, फिर भी यह सुल्ला के जीवन से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध भविष्यवाणियों में गिनी जाती है। पिता की मृत्यु के बाद सुल्ला को आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। संभवतः उन्हें पैतृक संपत्ति बहुत कम या बिल्कुल नहीं मिली। निर्धनता के कारण उनका युवाकाल रोम के कलाकारों, अभिनेताओं, वीणा-वादकों और नर्तकियों की संगति में बीता। रंगमंच और मनोरंजन की दुनिया से उनका गहरा लगाव हो गया तथा उन्होंने एटेलन फ़ार्स नामक पारंपरिक रोमन हास्य-नाटकों की रचना भी की। बाद के जीवन में भी यह रुचि बनी रही। इतिहासकार प्लूटार्क के अनुसार, अंतिम पत्नी वेलेरिया से विवाह के पश्चात भी सुल्ला अभिनेत्रियों, संगीतकारों और नर्तकियों के साथ समय बिताते थे। वे अभिनेता मेट्रोबियस के अत्यंत निकट थे और जीवन के अंतिम समय तक उससे उनका घनिष्ठ संबंध बना रहा।

यद्यपि आर्थिक दृष्टि से सुल्ला अपने समकालीन अभिजातों की तुलना में अपेक्षाकृत साधारण स्थिति में थे, फिर भी उन्होंने अपने सामाजिक स्तर के अनुरूप उत्कृष्ट शिक्षा प्राप्त की। वे यूनानी और लैटिन साहित्य के अच्छे ज्ञाता थे तथा इतिहास, दर्शन और साहित्य में विशेष रुचि रखते थे। इतिहासकार सल्लस्ट ने उन्हें विद्वान, बुद्धिमान और यूनानी भाषा का उत्कृष्ट जानकार बताया है। उनके निजी जीवन में भी कई विवाह हुए। उनकी प्रथम पत्नी का नाम इलिया अथवा जूलिया माना जाता है, जबकि बाद में उन्होंने एलिया से विवाह किया। इसी काल में उनका निकोपोलिस नामक एक समृद्ध हेटैरा (उच्चवर्गीय गणिका) से भी घनिष्ठ संबंध था। सुल्ला की आर्थिक उन्नति का आधार दो महत्त्वपूर्ण विरासतें बनीं—एक उनकी धनी सौतेली माता से और दूसरी निकोपोलिस से। आधुनिक इतिहासकार आर्थर कीवेनी के अनुसार लगभग तीस वर्ष की आयु में प्राप्त इन्हीं विरासतों ने सुल्ला को वह आर्थिक स्थिरता प्रदान की, जिसने उन्हें सार्वजनिक जीवन में प्रवेश करने और आगे चलकर रोमन राजनीति के सर्वोच्च शिखर तक पहुँचने का अवसर दिया।

क्वेस्टर पद के लिए निर्धारित न्यूनतम आयु पूरी करने के बाद सुल्ला ने 108 ईसा पूर्व में क्वेस्टर पद का चुनाव लड़ा। सामान्यतः इस पद के उम्मीदवार के लिए लगभग दस वर्ष की सैन्य सेवा अपेक्षित मानी जाती थी, किंतु सुल्ला के समय तक यह परंपरा कठोर रूप से लागू नहीं रह गई थी और न्यूनतम आयु की शर्त को अधिक महत्त्व दिया जाने लगा था। चुनाव में सफल होने के बाद लॉटरी प्रणाली के माध्यम से उनकी नियुक्ति कौंसल गेयस मारियस के अधीन क्वेस्टर के रूप में हुई।

जुगुरथाइन युद्ध (107–106 ई. पू.)

जुगुरथाइन युद्ध की शुरुआत 112 ईसा पूर्व में हुई, जब न्यूमिडिया के राजा मासिनिस्सा के पौत्र जुगुरथा ने रोमन सीनेट के उस निर्णय की अवहेलना करते हुए पूरे न्यूमिडिया पर अधिकार कर लिया, जिसके अनुसार राज्य का विभाजन शाही परिवार के विभिन्न सदस्यों के बीच किया जाना था। जुगुरथा ने अपने प्रतिद्वंद्वियों का समर्थन करने वाले अनेक इतालवी व्यापारियों की हत्या कर दी और बाद में रोमन अधिकारियों को रिश्वत देकर अपने पक्ष में शांति संधि भी करा ली। इस भ्रष्टाचार से रोम में व्यापक आक्रोश फैल गया। जब उसे रिश्वत के आरोपों पर गवाही देने के लिए रोम बुलाया गया, तब उसने वहीं अपने एक अन्य प्रतिद्वंद्वी की हत्या का षड्यंत्र रचवाया और फिर न्यूमिडिया लौट गया। इसके परिणामस्वरूप रोम ने उसके विरुद्ध युद्ध जारी रखा, किंतु प्रारंभिक वर्षों में कई रोमन सेनानायक रिश्वत लेकर निष्क्रिय बने रहे या पराजित हुए।

109 ईसा पूर्व में क्विंटस कैसिलियस मेटेलस को युद्ध का नेतृत्व सौंपा गया। उनके अधीन लेगेट के रूप में गेयस मारियस कार्यरत थे, जो 107 ईसा पूर्व में कौंसल निर्वाचित होने के बाद जुगुरथाइन युद्ध की सर्वोच्च कमान प्राप्त करने में सफल रहे। इसी अभियान में सुल्ला ने मारियस के अधीन सेवा आरंभ की। यद्यपि वे अपेक्षाकृत कम अनुभवी थे, फिर भी अपनी नेतृत्व क्षमता, मिलनसार स्वभाव और साहस के कारण उन्होंने सैनिकों तथा वरिष्ठ अधिकारियों का विश्वास शीघ्र ही जीत लिया। मारियस ने मेटेलस की पूर्व रणनीति को अपनाते हुए न्यूमिडिया के दुर्गों और किलों पर क्रमशः अधिकार करना प्रारंभ किया, जिससे जुगुरथा की शक्ति लगातार कमजोर होती गई।

106 ईसा पूर्व में निर्णायक मोड़ तब आया, जब पराजित जुगुरथा अपने श्वसुर बोक्खुस प्रथम, मॉरिटानिया के राजा, के पास शरण लेने पहुँचा। प्रारंभ में बोक्खुस ने उसका साथ दिया, किंतु रोमन सैन्य दबाव और कूटनीतिक प्रयासों के कारण उसकी नीति बदल गई। रोमन सीनेट की अनुमति से मारियस ने अपने प्रतिनिधि के रूप में सुल्ला को बोक्खुस के पास भेजा। सुल्ला ने अपनी असाधारण कूटनीतिक योग्यता का परिचय देते हुए बोक्खुस का विश्वास अर्जित किया और उसे जुगुरथा को रोम के हवाले करने के लिए राज़ी कर लिया। अंततः बोक्खुस ने छलपूर्वक जुगुरथा को बंदी बनाकर सुल्ला को सौंप दिया, जिससे जुगुरथाइन युद्ध का प्रभावी अंत हो गया।

युद्ध की औपचारिक विजय का श्रेय कौंसल मारियस को मिला, किंतु जुगुरथा की गिरफ्तारी का वास्तविक श्रेय व्यापक रूप से सुल्ला को दिया गया। इस सफलता ने उनकी प्रतिष्ठा और राजनीतिक प्रभाव में उल्लेखनीय वृद्धि की तथा उन्हें रोमन राजनीति के उभरते हुए नेता के रूप में स्थापित कर दिया। यही घटना आगे चलकर मारियस और सुल्ला के बीच तीव्र राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता का आधार बनी। 91 ईसा पूर्व में बोक्खुस प्रथम ने जुगुरथा के आत्मसमर्पण को दर्शाने वाली स्वर्णमयी अश्वारोही प्रतिमा स्थापित कर इस घटना का स्मरण कराया। यह स्मारक सुल्ला की बढ़ती प्रतिष्ठा का प्रतीक बन गया और दोनों नेताओं के बीच पहले से विद्यमान तनाव को और अधिक गहरा कर गया।

सिम्ब्रियन युद्ध (104–101 ई. पू.)

105 ईसा पूर्व में सिम्ब्री और ट्यूटोनी नामक जर्मनिक जनजातियाँ, जो इससे पहले कई बार रोमन सेनाओं को पराजित कर चुकी थीं, पुनः इटली की ओर बढ़ने लगीं। इस संकट ने रोमन गणराज्य की सुरक्षा को गंभीर चुनौती दी। ऐसी परिस्थिति में गेयस मारियस को लगातार कई बार कौंसल निर्वाचित किया गया। यद्यपि सीनेट के परंपरावादी और अभिजात वर्ग के अनेक सदस्य इस असाधारण स्थिति से असंतुष्ट थे, फिर भी वे स्वीकार करते थे कि जर्मनिक आक्रमण का सामना करने के लिए मारियस जैसा अनुभवी सेनानायक आवश्यक था। इसी समय सीनेट के रूढ़िवादी वर्ग ने अपेक्षाकृत निर्धन पैट्रिशियन सुल्ला को मारियस के संभावित राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी के रूप में उभरने का अवसर देना प्रारंभ किया।

104 ईसा पूर्व से मारियस ने दक्षिणी गॉल में पराजित रोमन सेनाओं का पुनर्गठन आरंभ किया। इस अभियान में सुल्ला ने उनके अधीन लेगेट के रूप में सेवा की। उन्होंने एक विद्रोही गैलिक जनजाति का सफलतापूर्वक दमन किया, जिसने रोमन पराजयों का लाभ उठाकर विद्रोह कर दिया था। अगले वर्ष वे सैन्य ट्रिब्यून चुने गए और पुनः मारियस के साथ कार्य करते रहे। इस दौरान उन्हें जर्मनिक संघ के सहयोगी कुछ कबीलों के साथ कूटनीतिक संपर्क स्थापित करने का दायित्व सौंपा गया। अपनी बुद्धिमत्ता और व्यवहार-कुशलता के बल पर उन्होंने कई कबीलों को रोम के पक्ष में कर लिया, जिससे उनकी कूटनीतिक प्रतिभा भी उजागर हुई। धीरे-धीरे सुल्ला को यह अनुभव होने लगा कि मारियस के अधीन रहते हुए उनकी व्यक्तिगत उपलब्धियों को अपेक्षित मान्यता नहीं मिल रही है। परिणामस्वरूप उन्होंने मारियस के सह-कौंसल क्विंटस लुटाटियस कैटुलस की सेना में स्थानांतरण का अनुरोध किया, जिसे स्वीकार कर लिया गया।

102 ईसा पूर्व में जर्मनिक जनजातियाँ पुनः आल्प्स पार कर इटली में प्रवेश करने लगीं। कैटुलस और सुल्ला ने मिलकर उनके अग्रगमन को रोकने का प्रयास किया, किंतु पूर्वी आल्प्स क्षेत्र में कैटुलस की सेना को पीछे हटना पड़ा। इस कठिन समय में सुल्ला ने रसद और आपूर्ति की व्यवस्था का दायित्व अत्यंत कुशलता से निभाया। उन्होंने सैनिकों के लिए भोजन, हथियार और अन्य आवश्यक सामग्री की निरंतर उपलब्धता सुनिश्चित की, जिससे सेना का मनोबल बना रहा और वह पुनर्गठन करने में सफल हुई। इसके बाद रोमन सेनाओं ने पुनः संगठित होकर पो नदी पार की और सिम्ब्री का सामना किया। दोनों पक्षों के बीच वार्ता का प्रयास असफल रहा, जिसके बाद राउडियन मैदान, जिसे सामान्यतः वर्सेलाए का युद्ध कहा जाता है, में निर्णायक संघर्ष हुआ। इस युद्ध में रोमन सेना ने सिम्ब्री को पूर्णतः पराजित कर दिया और जर्मनिक आक्रमण का स्थायी अंत कर दिया। इस महान विजय का सार्वजनिक श्रेय मारियस और कैटुलस को मिला, किंतु सुल्ला की सैन्य क्षमता, संगठन-कौशल और नेतृत्व ने उनकी प्रतिष्ठा में उल्लेखनीय वृद्धि की तथा वे रोमन राजनीति के उभरते हुए नेता के रूप में स्थापित हो गए।

सुल्ला का उदय (105–97 ईसा पूर्व)

युद्ध के बाद सुल्ला ने एडाइल पद के लिए चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया, क्योंकि इस पद पर भव्य सार्वजनिक खेलों के आयोजन के लिए अत्यधिक धन की आवश्यकता होती थी। इसके स्थान पर उन्होंने 99 ईसा पूर्व में सीधे प्रेटर बनने का प्रयास किया, किंतु उन्हें पराजय मिली। प्लूटार्क के अनुसार सुल्ला का विश्वास था कि मतदाता उनसे पहले एडाइल बनने और भव्य खेल आयोजित करने की अपेक्षा रखते थे, विशेषकर इसलिए कि उनकी मित्रता मॉरिटानिया के समृद्ध राजा बोक्खुस से थी। अगले वर्ष उन्होंने पुनः प्रेटर पद के लिए चुनाव लड़ा और निर्वाचित होने पर भव्य खेल आयोजित करने का वचन दिया। इस बार उन्हें सफलता मिली और वे 97 ईसा पूर्व के लिए प्रेटर निर्वाचित हुए। बाद में लॉटरी प्रणाली द्वारा उनका चयन शहरी प्रेटर के पद के लिए किया गया, जो रोम नगर के भीतर न्यायिक मामलों का सर्वोच्च प्रेटोरियन पद था। यह सफलता सुल्ला के राजनीतिक जीवन में एक महत्त्वपूर्ण पड़ाव सिद्ध हुई और आगे चलकर उनके तेज़ी से उभरते सार्वजनिक जीवन की आधारशिला बनी।

सिलिसिया का शासन (96–93 ई. पू.)

97 ईसा पूर्व में प्रेटर निर्वाचित होने के बाद सुल्ला का कार्यकाल अधिकांशतः शांतिपूर्ण रहा। इस अवधि की प्रमुख घटनाओं में गेयस जूलियस सीज़र स्ट्रैबो के साथ उनका एक सार्वजनिक विवाद तथा लुडी अपोलिनारेस का अत्यंत भव्य आयोजन शामिल था। अगले वर्ष रोमन परंपरा के अनुसार उन्हें प्रोप्रेटर के रूप में एशिया माइनर के सिलिसिया प्रांत का शासन सौंपा गया। इसी पद पर रहते हुए उन्हें अपने राजनीतिक और सैन्य कौशल का प्रदर्शन करने का महत्त्वपूर्ण अवसर मिला। रोमन सीनेट ने उन्हें कप्पाडोसिया के वैध राजा एरियोबार्ज़नेस प्रथम को पुनः सिंहासन पर स्थापित करने का आदेश दिया, जिन्हें पोंटस के शक्तिशाली राजा मिथ्रिडेट्स षष्ठ यूएपेटर ने अपदस्थ कर अपने समर्थक आरियाराथेस को राजा बनाने का प्रयास किया था। सीमित संसाधनों और अपेक्षाकृत छोटी सेना के बावजूद सुल्ला ने स्थानीय सहयोगी शासकों तथा जनजातियों की सहायता प्राप्त की और दुर्गम पर्वतीय मार्गों का लाभ उठाकर शत्रु को पराजित किया। परिणामस्वरूप एरियोबार्ज़नेस प्रथम पुनः कप्पाडोसिया के सिंहासन पर आसीन हुए। इस उल्लेखनीय सफलता से प्रभावित होकर उनके सैनिकों ने उन्हें इम्पेरेटर की उपाधि प्रदान की, जो किसी विजयी रोमन सेनानायक के लिए अत्यंत प्रतिष्ठित सम्मान माना जाता था।

कप्पाडोसिया अभियान के दौरान सुल्ला यूफ्रेट्स नदी तक पहुँचे, जहाँ उनकी भेंट पार्थियन साम्राज्य के एक राजदूतमंडल से हुई। इस प्रकार वे पार्थियनों के साथ औपचारिक राजनयिक वार्ता करने वाले पहले रोमन मजिस्ट्रेट बने। वार्ता के समय उन्होंने स्वयं को पार्थियन प्रतिनिधि ओरोबाज़स और एरियोबार्ज़नेस प्रथम के बीच बैठाकर यह संकेत दिया कि रोम दोनों राज्यों से श्रेष्ठ और मध्यस्थ शक्ति है। परंपरा के अनुसार, पार्थिया लौटने पर ओरोबाज़स को इस कथित अपमान के कारण मृत्युदंड दिया गया, यद्यपि इस विवरण की ऐतिहासिक पुष्टि पूर्णतः निश्चित नहीं है। दोनों पक्षों के बीच हुए समझौते में यूफ्रेट्स नदी को रोम और पार्थिया के प्रभाव-क्षेत्रों की सीमा स्वीकार किया गया। इसी भेंट के दौरान एक काल्डियाई ज्योतिषी ने भविष्यवाणी की कि सुल्ला की मृत्यु उनकी शक्ति और कीर्ति के चरम पर होगी। इस भविष्यवाणी ने उनके व्यक्तित्व और अपने भाग्य के प्रति उनके विश्वास को गहराई से प्रभावित किया। इसके बाद 94 ईसा पूर्व में उन्होंने आर्मेनिया के राजा टाइग्रेन्स महान की सेनाओं को कप्पाडोसिया से बाहर खदेड़कर वहाँ रोमन प्रभाव को और सुदृढ़ किया। पूर्व में उनका पूरा कार्यकाल सैन्य, राजनीतिक और कूटनीतिक दृष्टि से अत्यंत सफल सिद्ध हुआ और उनका राजनीतिक भविष्य उज्ज्वल दिखाई देने लगा। रोम लौटने पर उन पर एरियोबार्ज़नेस प्रथम से अवैध धन लेने का आरोप लगाया गया, किंतु अभियोग लगाने वाला व्यक्ति न्यायालय में उपस्थित नहीं हुआ, जिससे सुल्ला दोषमुक्त हो गए। यद्यपि यह विवाद अल्पकालिक था, फिर भी उसने कुछ समय के लिए उनकी राजनीतिक प्रतिष्ठा और महत्त्वाकांक्षाओं को प्रभावित किया।

सामाजिक युद्ध (सोशल वॉर)

91 ईसा पूर्व तक रोम और उसके इतालवी सहयोगी राज्यों (सोसी) के संबंध अत्यंत तनावपूर्ण हो चुके थे। कई दशकों से सहयोगी राज्य रोमन गणराज्य के लिए सैनिक और संसाधन उपलब्ध कराते थे, किंतु उन्हें रोमन नागरिकों के समान अधिकार प्राप्त नहीं थे। 133 ईसा पूर्व में टिबेरियस ग्रैकस के भूमि-सुधार कार्यक्रमों के बाद अनेक इतालवी समुदाय उन सार्वजनिक भूमियों (आगर पब्लिकुस) पर अपने पारंपरिक अधिकारों से वंचित होने लगे, जिनका वे पीढ़ियों से उपयोग करते आए थे। साथ ही, रोमन नागरिकता प्रदान करने के अनेक प्रयास राजनीतिक विरोध के कारण विफल हो गए। सिम्ब्रियन युद्धों ने समूचे इटली में साझा राजनीतिक और सांस्कृतिक पहचान को और मजबूत कर दिया, जिससे सहयोगी राज्यों में समान अधिकारों की मांग तीव्र होती गई। 91 ईसा पूर्व में प्लेबीयन ट्रिब्यून मार्कस लिवियस ड्रूसस, जो सहयोगियों को रोमन नागरिकता दिलाने का प्रयास कर रहे थे, की हत्या कर दी गई। इस घटना ने व्यापक असंतोष को विद्रोह में बदल दिया और रोम के विरुद्ध सामाजिक युद्ध (सोशल वॉर) का आरंभ हुआ।

इसी वर्ष मॉरिटानिया के राजा बोक्खुस प्रथम ने जुगुरथा के आत्मसमर्पण को दर्शाने वाली एक प्रतिमा स्थापित कर सुल्ला का सम्मान किया। यह स्मारक उनकी बढ़ती प्रतिष्ठा का प्रतीक था, किंतु युद्ध के आरंभ ने उनकी तत्कालीन राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं को पीछे धकेल दिया। युद्ध के दो प्रमुख मोर्चे थे—उत्तरी मोर्चा, जो पिकेनम से फ्यूसीन झील तक फैला था, और दक्षिणी मोर्चा, जहाँ मुख्य संघर्ष सैमनियम क्षेत्र में हो रहा था। सुल्ला ने दक्षिणी मोर्चे पर कौंसल लुसियस जूलियस सीज़र के अधीन लेगेट के रूप में सेवा आरंभ की। युद्ध के प्रथम वर्ष में रोमन रणनीति मुख्यतः रक्षात्मक रही, ताकि विद्रोह रोमन नियंत्रण वाले अन्य क्षेत्रों में न फैल सके। इस दौरान सुल्ला ने दक्षिणी इटली में महत्त्वपूर्ण रक्षात्मक अभियानों का नेतृत्व किया। वर्ष के अंत में उन्हें उत्तरी मोर्चे पर गेयस मारियस के साथ मार्सी जनजाति के विरुद्ध अभियान में भेजा गया। मारियस ने शत्रु को पीछे हटने के लिए विवश किया, जहाँ वे सुल्ला की सेनाओं से टकराए। इसी समय सुल्ला और लुसियस जूलियस सीज़र ने घिरे हुए एसेर्निया नगर को बचाने का प्रयास भी किया, यद्यपि इसमें उन्हें सफलता नहीं मिली।

89 ईसा पूर्व में सुल्ला ने कौंसल लुसियस पोर्सियस कैटो के अधीन लेगेट के रूप में कार्य किया। मार्सी के विरुद्ध युद्ध में कैटो की मृत्यु के बाद दक्षिणी मोर्चे की सर्वोच्च कमान सुल्ला को सौंप दी गई। उन्होंने तुरंत आक्रामक रणनीति अपनाते हुए पोम्पेई नगर की घेराबंदी कर दी। जब नगर से भेजे गए दूतों में से एक की उनके सैनिकों ने हत्या कर दी, तब सुल्ला ने कठोर दंड देने के बजाय सैनिकों को आदेश दिया कि वे अपना साहस और युद्ध-कौशल शत्रु के विरुद्ध प्रदर्शित करें। कुछ ही समय बाद लुसियस क्लुएंटियस के नेतृत्व में एक इतालवी राहत सेना पोम्पेई की सहायता के लिए पहुँची, किंतु सुल्ला ने उसे निर्णायक रूप से पराजित कर नोला की ओर खदेड़ दिया। नगर की दीवारों के सामने हुए संघर्ष में क्लुएंटियस मारा गया और सुल्ला ने पुनः घेराबंदी जारी रखी। इस अभियान में उनके अद्वितीय साहस और नेतृत्व के लिए उन्हें ग्रास क्राउन (कोरोना ग्रामिनिया) से सम्मानित किया गया, जो रोमन सेना का सर्वोच्च सैन्य सम्मान था।

इसके बाद सुल्ला ने लगातार सफल अभियान चलाए। पोम्पेई के अतिरिक्त स्टाबिए और एक्लेनम भी पुनः रोमन नियंत्रण में आ गए। एक्लेनम के पतन के बाद हिरपिनी लोगों ने आत्मसमर्पण कर दिया। इसके पश्चात उन्होंने सैमनाइटों के विरुद्ध निर्णायक अभियान चलाया, एसेर्निया के निकट उनकी सेना को पराजित किया और अंततः उनकी नई राजधानी बोवियानुम उंडेसीमानोरुम पर अधिकार कर लिया। इन लगातार विजयों ने सुल्ला को सामाजिक युद्ध का सबसे सफल रोमन सेनानायक बना दिया। अक्टूबर 89 ईसा पूर्व में होने वाले कौंसल चुनावों से पहले प्राप्त इन सैन्य सफलताओं ने उनकी प्रतिष्ठा और लोकप्रियता को अभूतपूर्व ऊँचाई पर पहुँचा दिया तथा उन्हें रोम के प्रमुख राजनीतिक नेताओं की श्रेणी में स्थापित कर दिया।

सामाजिक युद्ध का अंत और सुल्ला का प्रथम कौंसल पद (88 ई. पू.)

सामाजिक युद्ध केवल सैन्य अभियानों से ही नहीं, बल्कि महत्त्वपूर्ण राजनीतिक सुधारों के कारण भी समाप्त हुआ। 90 ईसा पूर्व में कौंसल लुसियस जूलियस सीज़र ने लेक्स जूलिया नामक कानून पारित कराया, जिसके अंतर्गत उन इतालवी सहयोगी राज्यों को रोमन नागरिकता प्रदान की गई जो युद्ध के दौरान रोम के प्रति निष्ठावान बने रहे थे। इसके अगले वर्ष 89 ईसा पूर्व में लेक्स प्लौटिया पापिरिया पारित हुई, जिसके द्वारा उन सभी सहयोगी राज्यों के निवासियों को भी रोमन नागरिकता दे दी गई जिन्होंने विद्रोह समाप्त कर हथियार डाल दिए थे। केवल सैमनाइट और लुकानियन इससे बाहर रहे, क्योंकि वे अभी भी रोम के विरुद्ध संघर्ष कर रहे थे। इन कानूनों ने विद्रोह का प्रमुख कारण समाप्त कर दिया और अधिकांश इतालवी राज्यों ने रोम के साथ समझौता कर लिया। इस प्रकार सामाजिक युद्ध का अंत संभव हुआ और रोमन गणराज्य में नागरिकता का दायरा पहले की अपेक्षा कहीं अधिक व्यापक हो गया।

युद्ध के दौरान सुल्ला ने सैमनाइटों तथा अन्य विद्रोही जनजातियों के विरुद्ध लगातार उल्लेखनीय सफलताएँ प्राप्त की थीं। उनकी सैन्य प्रतिभा, साहस और नेतृत्व ने उन्हें रोम के सबसे प्रतिष्ठित सेनानायकों में शामिल कर दिया। परिणामस्वरूप वे 88 ईसा पूर्व के लिए कौंसल निर्वाचित हुए। उनके सह-कौंसल क्विंटस पोम्पेयस रूफस थे। यद्यपि उनकी विजय मुख्यतः सामाजिक युद्ध में प्राप्त सफलताओं का परिणाम थी, फिर भी चुनाव पूरी तरह निर्विरोध नहीं था। उनके पुराने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी गेयस जूलियस सीज़र स्ट्रैबो ने भी कौंसल बनने का प्रयास किया। इसी समय पोंटस के शक्तिशाली राजा मिथ्रिडेट्स षष्ठ यूएपेटर के साथ रोम के संबंध तेजी से बिगड़ रहे थे और यह स्पष्ट था कि आगामी कौंसल को उसके विरुद्ध एक अत्यंत प्रतिष्ठित सैन्य अभियान का नेतृत्व मिलेगा। यही कारण था कि कई महत्त्वाकांक्षी नेता इस पद के इच्छुक थे। ग्नेयस पोम्पेयुस स्ट्राबो भी संभवतः इसी सैन्य कमान की आशा में पुनः कौंसल बनना चाहते थे। अंततः मिथ्रिडेट्स के विरुद्ध अभियान का नेतृत्व किसे मिले, यही प्रश्न आगे चलकर रोमन राजनीति के सबसे गंभीर संकटों में से एक का कारण बना।

कौंसल निर्वाचित होने के तुरंत बाद सुल्ला ने अपने राजनीतिक संबंधों को और मजबूत करने के लिए अपनी पुत्री कॉर्नेलिया का विवाह अपने सह-कौंसल क्विंटस पोम्पेयस रूफस के पुत्र से कराया। इसके कुछ समय बाद उन्होंने अपनी पत्नी क्लोएलिया को तलाक देकर हाल ही में दिवंगत मार्कस एमिलियस स्कॉरस की विधवा कैसिलिया मेटेला से विवाह किया। इस विवाह ने उन्हें रोम के सबसे प्रभावशाली अभिजात परिवारों में से एक से जोड़ दिया और उनकी राजनीतिक स्थिति को और अधिक सुदृढ़ बना दिया। इस प्रकार 88 ईसा पूर्व तक सुल्ला केवल एक सफल सेनानायक ही नहीं, बल्कि रोमन गणराज्य के सबसे शक्तिशाली राजनीतिक नेताओं में भी गिने जाने लगे।

सुल्पिसियस के साथ संघर्ष

88 ईसा पूर्व में कौंसल बनने के बाद सुल्ला का सबसे गंभीर राजनीतिक संघर्ष प्लेबीयन ट्रिब्यून पब्लियस सुल्पिसियस रूफुस के साथ हुआ। विवाद का प्रमुख कारण सामाजिक युद्ध के बाद रोमन नागरिकता प्राप्त करने वाले इतालवी सहयोगियों के मतदान अधिकार थे। प्रश्न यह था कि इन नए नागरिकों को रोमन जनजातियों (ट्राइब्स) में किस प्रकार सम्मिलित किया जाए। यदि उन्हें सभी जनजातियों में समान रूप से बाँट दिया जाता, तो वे रोमन चुनावों और जनसभाओं में निर्णायक राजनीतिक प्रभाव प्राप्त कर सकते थे। सुल्ला और उनके सह-कौंसल क्विंटस पोम्पेयस रूफस ने इस प्रस्ताव का विरोध किया, क्योंकि उन्हें आशंका थी कि इससे पारंपरिक राजनीतिक संतुलन बदल जाएगा। सुल्पिसियस ने इसे अपने राजनीतिक कार्यक्रम के साथ विश्वासघात माना और कौंसलों का समर्थन न मिलने पर नए सहयोगियों की तलाश शुरू कर दी।

इसी उद्देश्य से सुल्पिसियस ने गुप्त रूप से गेयस मारियस के साथ एक राजनीतिक समझौता किया। मारियस लंबे समय से एक और प्रतिष्ठित सैन्य अभियान का नेतृत्व करना चाहते थे। दोनों नेताओं के बीच यह सहमति बनी कि मारियस सुल्पिसियस के नागरिकता संबंधी विधेयकों का समर्थन करेंगे, जबकि सुल्पिसियस ऐसा कानून पारित कराएगा जिसके द्वारा पोंटस के राजा मिथ्रिडेट्स षष्ठ के विरुद्ध युद्ध की सर्वोच्च कमान सुल्ला से लेकर मारियस को सौंप दी जाएगी। यह समझौता सुल्ला के राजनीतिक और सैन्य भविष्य के लिए सीधी चुनौती था, क्योंकि पूर्वी अभियान असाधारण प्रतिष्ठा, धन और यश प्रदान करने वाला माना जाता था।

नए नागरिकों को पूर्ण मतदान अधिकार देने का प्रस्ताव रोम के पुराने नागरिकों में लोकप्रिय नहीं था। इसलिए सुल्पिसियस ने अपने विधेयकों को पारित कराने के लिए सशस्त्र समर्थकों का सहारा लिया। शीघ्र ही रोम की सड़कों पर हिंसक संघर्ष आरंभ हो गया। स्थिति को नियंत्रित करने के लिए दोनों कौंसलों ने इयूस्टिटियम की घोषणा कर सार्वजनिक कार्यों और न्यायिक गतिविधियों को अस्थायी रूप से स्थगित कर दिया। यद्यपि इससे सुल्पिसियस के समर्थक कुछ समय के लिए पीछे हटे, लेकिन शीघ्र ही परिस्थितियाँ उनके पक्ष में हो गईं। उस समय सुल्ला मारियस के घर में शरण लेने को विवश हुए, जहाँ वे सुल्पिसियस के सशस्त्र समर्थकों से घिरे हुए थे। अंततः सुरक्षित रूप से नगर छोड़ने की अनुमति प्राप्त करने के बदले उन्हें समझौता स्वीकार करना पड़ा। इसके बाद वे रोम से निकलकर कैपुआ पहुँचे और वहाँ से नोला के निकट स्थित अपनी सेना का नेतृत्व संभालने चले गए।

सैन्य कमान छिन जाने की संभावना और राजनीतिक अपमान ने सुल्ला को यह विश्वास दिलाया कि अपनी प्रतिष्ठा और भविष्य की रक्षा का एकमात्र उपाय मिथ्रिडेट्स के विरुद्ध अभियान का नेतृत्व अपने हाथ में बनाए रखना है। यही संकट आगे चलकर रोमन इतिहास की उस अभूतपूर्व घटना का कारण बना, जब सुल्ला ने अपनी सेना के साथ स्वयं रोम पर चढ़ाई की और रोमन गणराज्य के प्रथम गृहयुद्ध का सूत्रपात किया।

रोम पर पहला मार्च (88 ईसा पूर्व)
राजनीतिक संकट और सैन्य कमान का विवाद

88 ईसा पूर्व में रोमन गणराज्य एक अभूतपूर्व राजनीतिक संकट से गुजर रहा था। सामाजिक युद्ध समाप्त हो चुका था, किंतु उसके परिणामस्वरूप उत्पन्न राजनीतिक मतभेद अभी भी बने हुए थे। इसी समय पोंटस के शक्तिशाली राजा मिथ्रिडेट्स षष्ठ यूएपेटर ने एशिया माइनर में रोमन प्रभुत्व को चुनौती दे दी। उसके विरुद्ध होने वाला अभियान अत्यंत प्रतिष्ठित, लाभदायक और राजनीतिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण माना जा रहा था। रोमन सीनेट ने इस अभियान की सर्वोच्च सैन्य कमान कौंसल लुसियस कॉर्नेलियस सुल्ला को सौंपी थी।

किंतु प्लेबीयन ट्रिब्यून पब्लियस सुल्पिसियस रूफुस ने गुप्त रूप से गेयस मारियस के साथ राजनीतिक समझौता कर लिया। सुल्पिसियस ने अपने सशस्त्र समर्थकों के बल पर अनेक विधेयक पारित कराए, जिनमें सबसे महत्त्वपूर्ण वह कानून था जिसके द्वारा मिथ्रिडेट्स के विरुद्ध अभियान की कमान सुल्ला से लेकर मारियस को सौंप दी गई। जब यह समाचार सुल्ला तक पहुँचा, तब उसे स्पष्ट हो गया कि मारियस ने राजनीतिक समझौते के माध्यम से उसके साथ विश्वासघात किया है।

सुल्ला का ऐतिहासिक निर्णय

इस परिस्थिति में सुल्ला के सामने केवल दो विकल्प थे। पहला, वह नए कानून को स्वीकार कर ले, जिससे उसका राजनीतिक जीवन लगभग समाप्त हो जाता और उसकी प्रतिष्ठा को गहरा आघात पहुँचता। साथ ही, उसके जीवन और संपत्ति पर भी संकट उत्पन्न हो सकता था। दूसरा विकल्प था बल प्रयोग करके अपनी वैधानिक सैन्य कमान पुनः प्राप्त करना। अंततः सुल्ला ने दूसरा मार्ग चुना। आधुनिक इतिहासकारों का मत है कि उसने यह साहसिक निर्णय तभी लिया जब उसे पूर्ण विश्वास हो गया कि उसकी सेना उसके प्रति निष्ठावान है और किसी भी परिस्थिति में उसका साथ नहीं छोड़ेगी।

सुल्ला ने अपने सैनिकों को संबोधित करते हुए मारियस और सुल्पिसियस के विरुद्ध प्रभावशाली भाषण दिया। उसने कहा कि यदि मिथ्रिडेट्स के विरुद्ध अभियान की कमान मारियस को मिल गई, तो वर्तमान सेना को युद्ध में भाग लेने का अवसर नहीं मिलेगा और वे विजय, यश, धन तथा युद्ध-लाभ से वंचित रह जाएँगे। यद्यपि आधुनिक इतिहासकार इन तर्कों की पूर्ण ऐतिहासिक सत्यता पर प्रश्न उठाते हैं, फिर भी इतना निश्चित है कि इनका सैनिकों पर गहरा प्रभाव पड़ा। परिणामस्वरूप अधिकांश सैनिकों ने सुल्ला के साथ रोम की ओर बढ़ने का निश्चय कर लिया।

वरिष्ठ अधिकारियों का विरोध

सैनिकों ने तो सुल्ला का साथ दिया, किंतु उसके अधिकांश वरिष्ठ अधिकारियों ने उसका समर्थन करने से इनकार कर दिया। उनका मानना था कि किसी भी रोमन सेनापति द्वारा अपनी ही राजधानी पर सेना चढ़ाना गणराज्य की परंपराओं के विरुद्ध था। केवल उसका क्वेस्टर तथा निकट सहयोगी, संभवतः लुसियस लिसिनियस लुकुल्लुस, अंत तक उसके साथ बना रहा।

इसी बीच मारियस ने मार्कुस ग्रेटिडियस को सेना का नियंत्रण अपने हाथ में लेने के लिए सुल्ला के शिविर में भेजा। किंतु सैनिकों ने उसे अपना नया सेनापति स्वीकार करने से इनकार कर दिया और क्रोधित होकर उसकी हत्या कर दी। इससे स्पष्ट हो गया कि सेना पूरी तरह सुल्ला के प्रति निष्ठावान थी।

रोम की ओर प्रयाण

सुल्ला अपनी छह सेनाओं के साथ रोम की ओर बढ़ चला। यह रोमन इतिहास की अभूतपूर्व घटना थी। इससे पहले किसी रोमन सेनापति ने अपनी ही राजधानी पर अपनी सेना के साथ चढ़ाई करने का साहस नहीं किया था। जब यह समाचार रोम पहुँचा, तो सीनेट और नगर के निवासी स्तब्ध रह गए।

सीनेट ने तुरंत एक दूतमंडल भेजकर सुल्ला से पूछा कि वह अपनी ही राजधानी पर सेना लेकर क्यों बढ़ रहा है। सुल्ला ने उत्तर दिया कि उसका उद्देश्य रोम पर अधिकार करना नहीं, बल्कि उसे उन लोगों से मुक्त कराना है जिन्होंने हिंसा और अवैध उपायों से सत्ता पर कब्ज़ा कर लिया है। उसके अनुसार वह गणराज्य की रक्षा के लिए आगे बढ़ रहा था।

रोम पर अधिकार

उस समय रोम की रक्षा के लिए कोई नियमित सेना उपलब्ध नहीं थी, क्योंकि अधिकांश रोमन सेनाएँ सामाजिक युद्ध के बाद इटली के विभिन्न क्षेत्रों में तैनात थीं। इस कारण सुल्ला को संगठित सैन्य प्रतिरोध का सामना नहीं करना पड़ा। जब उसकी सेना नगर में प्रवेश कर रही थी, तब अनेक नागरिकों ने अपने घरों की छतों से सैनिकों पर पत्थर, ईंटें, टाइलें तथा अन्य वस्तुएँ फेंककर विरोध किया। कुछ स्थानों पर संघर्ष भी हुआ, किंतु प्रशिक्षित सैनिकों के सामने यह प्रतिरोध अधिक देर तक टिक नहीं सका। सुल्ला ने तुरंत अपने सैनिकों को नगर के प्रमुख स्थानों पर तैनात कर दिया और कुछ ही समय में पूरे रोम पर नियंत्रण स्थापित कर लिया। इस प्रकार वह अपनी सेना के साथ रोम में प्रवेश करने वाला पहला रोमन सेनापति बना। इस घटना ने रोमन गणराज्य की उन सभी राजनीतिक परंपराओं को तोड़ दिया, जिनके अनुसार किसी भी सेनापति को अपनी सेना सहित नगर की सीमा में प्रवेश करने की अनुमति नहीं थी।

नगर पर नियंत्रण स्थापित करने के बाद सुल्ला ने सीनेट की बैठक बुलाई। इस बैठक में गेयस मारियस, उनके पुत्र, पब्लियस सुल्पिसियस रूफुस तथा उनके नौ अन्य प्रमुख समर्थकों को राज्य का शत्रु और राज्यद्रोही घोषित किया गया। इसके बाद एक विधेयक पारित कर इस निर्णय को वैधानिक स्वरूप प्रदान किया गया। इसी कानून के माध्यम से सुल्ला द्वारा सेना के साथ रोम पर किए गए मार्च को भी पूर्वव्यापी प्रभाव से वैध घोषित कर दिया गया। इन सभी व्यक्तियों के नागरिक अधिकार समाप्त कर दिए गए और उन्हें पकड़ने या मार डालने की अनुमति दे दी गई। पब्लियस सुल्पिसियस रूफुस को शीघ्र ही पकड़ लिया गया। उसके एक दास ने विश्वासघात कर उसका ठिकाना बता दिया, जिसके बाद उसकी हत्या कर दी गई। दूसरी ओर गेयस मारियस, उनका पुत्र तथा उनके कुछ अन्य समर्थक रोम से भाग निकलने में सफल रहे और अंततः अफ्रीका में शरण लेने पहुँचे।

सुल्ला की राजनीतिक व्यवस्था

सत्ता अपने हाथ में लेने के बाद सुल्ला ने सुल्पिसियस द्वारा पारित सभी कानूनों को इस आधार पर निरस्त करा दिया कि वे हिंसा और बलपूर्वक पारित कराए गए थे। इतिहासकार अप्पियन के अनुसार इसी समय सुल्ला ने कुछ संवैधानिक परिवर्तन भी किए, जिनका उद्देश्य सीनेट की सर्वोच्चता स्थापित करना तथा जनसभाओं की शक्तियों को सीमित करना था। हालांकि अधिकांश आधुनिक इतिहासकार इस विवरण को पूरी तरह स्वीकार नहीं करते। उनका मत है कि अप्पियन ने संभवतः इन घटनाओं को बाद में डिक्टेटर बनने के पश्चात किए गए सुधारों के साथ मिला दिया है।

इन व्यवस्थाओं के बाद सुल्ला ने अपनी सेना को वापस कैपुआ भेज दिया और उसी वर्ष नए चुनाव कराए। किंतु चुनावों के परिणाम उसके अनुकूल नहीं रहे। उसका प्रमुख राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी लुसियस कॉर्नेलियस सिन्ना 87 ईसा पूर्व के लिए कौंसल निर्वाचित हो गया, जबकि सुल्ला का समर्थित उम्मीदवार पराजित हो गया। सिन्ना ने सार्वजनिक रूप से घोषणा कर दी कि सुल्ला का कार्यकाल समाप्त होते ही उसके विरुद्ध मुकदमा चलाया जाएगा।

इटली से प्रस्थान

चुनावों के बाद सुल्ला ने नवनिर्वाचित कौंसलों से अपनी व्यवस्थाओं का पालन करने की शपथ दिलवाई। उसने अपने सह-कौंसल क्विंटस पोम्पेयस रूफस को ग्नेयस पोम्पियस स्ट्राबो की सेना की कमान दिलाने का भी प्रयास किया। यद्यपि सीनेट ने इसका समर्थन किया, किंतु सेना में पहुँचते ही क्विंटस पोम्पेयस रूफस की हत्या कर दी गई। अधिकांश प्राचीन तथा आधुनिक इतिहासकार इस घटना के लिए ग्नेयस पोम्पियस स्ट्राबो को उत्तरदायी मानते हैं, यद्यपि उनके विरुद्ध कोई कार्रवाई नहीं की गई।

इसके बाद सुल्ला ने अपने विरुद्ध जारी कानूनी समन की उपेक्षा की और अपनी सेना के साथ इटली छोड़कर मैसेडोनिया चला गया। वहाँ उसने पूर्व में तैनात रोमन सेनाओं की कमान संभाली और मिथ्रिडेट्स षष्ठ के विरुद्ध अभियान की तैयारियाँ प्रारंभ कर दीं।

ऐतिहासिक महत्त्व और परिणाम

आधुनिक इतिहासकारों का मत है कि रोम पर सुल्ला का पहला मार्च रोमन इतिहास का निर्णायक मोड़ था। सामाजिक युद्ध के दौरान सैनिकों की निष्ठा राज्य के बजाय अपने सेनापति के प्रति अधिक मजबूत हो चुकी थी। इसी परिस्थिति ने पहली बार किसी रोमन सेनानायक को अपनी ही राजधानी पर सेना चढ़ाने का साहस दिया। इतिहासकार मैरी बियर्ड के अनुसार यह घटना सामाजिक युद्ध की स्वाभाविक परिणति थी, जिसमें पूर्व सहयोगियों के बीच का संघर्ष धीरे-धीरे रोमन नागरिकों के बीच गृहयुद्ध में बदल गया।

सुल्ला के पूर्व की ओर प्रस्थान करते ही रोम में पुनः राजनीतिक संघर्ष आरंभ हो गया। कौंसल ग्नेयस ऑक्टावियस ने सिन्ना को राज्यद्रोही घोषित कराया, किंतु सिन्ना ने नोला की सेना को अपने पक्ष में कर लिया और गेयस मारियस भी अपने समर्थकों सहित उससे आ मिले। 87 ईसा पूर्व के अंत तक सिन्ना और मारियस ने रोम पर पुनः अधिकार कर लिया। उन्होंने अपने अनेक राजनीतिक विरोधियों की हत्या कर दी और 86 ईसा पूर्व के लिए स्वयं को कौंसल निर्वाचित करा लिया। इसी समय सुल्ला को भी औपचारिक रूप से राज्य का शत्रु घोषित कर दिया गया।

यद्यपि कुछ ही समय बाद मारियस की मृत्यु हो गई, फिर भी सिन्ना का शासन बना रहा। अंततः 82 ईसा पूर्व में मिथ्रिडेट्स के विरुद्ध विजय प्राप्त करने के बाद सुल्ला रोम लौटा और दूसरे गृहयुद्ध में अपने विरोधियों को पराजित कर पुनः सत्ता पर अधिकार कर लिया। इस प्रकार रोम पर उसका पहला मार्च केवल एक सैन्य अभियान नहीं था, बल्कि वह रोमन गणराज्य के पतन और सैन्य शक्ति आधारित राजनीति के उदय का प्रारंभिक बिंदु सिद्ध हुआ।

प्रोकौंसल की कमान और गृहयुद्ध
प्रथम मिथ्रिडेटिक युद्ध का आरंभ

सामाजिक युद्ध के अंतिम चरण में, 89 ईसा पूर्व में पोंटस के शक्तिशाली राजा मिथ्रिडेट्स षष्ठ यूएपेटर ने रोमन एशिया प्रांत पर आक्रमण कर दिया। कुछ ही महीनों में उसने एशिया माइनर के अधिकांश भाग पर अधिकार स्थापित कर लिया और वहाँ के प्रशासन का पुनर्गठन किया। इसके बाद उसने रणनीतिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण रोड्स द्वीप की घेराबंदी की, किंतु वहाँ उसे सफलता नहीं मिली। मिथ्रिडेट्स की इन प्रारंभिक विजयों ने रोमन प्रभुत्व को गंभीर चुनौती दी और पूर्वी भूमध्यसागरीय क्षेत्र में रोम की प्रतिष्ठा को गहरा आघात पहुँचाया।

इन घटनाओं का समाचार 89 ईसा पूर्व के अंत तक रोम पहुँचा। रोमन सीनेट और जनसभा ने शीघ्र ही पोंटस के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। यद्यपि युद्ध की घोषणा तत्काल कर दी गई थी, परंतु उसकी तैयारियों में काफी समय लगा। सुल्ला को इस अभियान का सर्वोच्च सेनापति नियुक्त किया गया, किंतु पाँच रोमन सेनाओं को संगठित कर पूर्व की ओर भेजने में लगभग अठारह महीने लग गए। इस विलंब का एक प्रमुख कारण रोम की गंभीर आर्थिक कठिनाइयाँ थीं, जिनसे युद्ध की व्यवस्था, सैनिकों के वेतन और रसद की आपूर्ति प्रभावित हो रही थी।

एशियाई वेस्पर्स और यूनानी नगरों का विद्रोह

रोम की तैयारी पूरी होने से पहले ही मिथ्रिडेट्स ने एक अत्यंत कठोर और दूरगामी निर्णय लिया। उसने एशिया प्रांत में रहने वाले लगभग अस्सी हजार रोमन और इतालवी नागरिकों तथा उनके परिवारों की एक ही दिन सामूहिक हत्या कराने का आदेश दिया। यह घटना इतिहास में एशियाई वेस्पर्स के नाम से प्रसिद्ध है। इस नरसंहार के बाद मृतकों की संपत्ति भी जब्त कर ली गई, जिससे मिथ्रिडेट्स को भारी आर्थिक लाभ प्राप्त हुआ और एशिया में रोमन प्रभाव लगभग समाप्त हो गया।

मिथ्रिडेट्स की सफलताओं ने अनेक यूनानी नगरों को भी रोम के विरुद्ध विद्रोह करने के लिए प्रेरित किया। एथेंस में राजनेता एरिस्टियन ने स्वयं को सर्वोच्च सैन्य अधिकारी घोषित किया और खुलकर मिथ्रिडेट्स का समर्थन स्वीकार कर लिया। कुछ प्राचीन लेखकों ने यह तर्क दिया कि एथेंस परिस्थितियों के कारण ऐसा करने के लिए विवश था, किंतु अधिकांश आधुनिक इतिहासकारों का मत है कि एथेंस ने स्वेच्छा से रोम का विरोध किया। इस बीच डेलोस द्वीप पर भी एथेंस और पोंटस की संयुक्त सेनाओं ने अधिकार कर लिया। दूसरी ओर, रोमन सेनाएँ मैसेडोनिया पर अपना नियंत्रण बनाए रखने में सफल रहीं। वहाँ प्रोप्रेटर गेयस सेंटियस सैटर्निनस और उनके लेगेट क्विंटस ब्रूटियस सूरा ने मिथ्रिडेट्स की प्रगति को सीमित रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

सुल्ला का यूनान अभियान

87 ईसा पूर्व के प्रारंभ में सुल्ला अपनी पाँच सेनाओं के साथ एड्रियाटिक सागर पार कर थेसली पहुँचे। वहाँ पहुँचते ही उन्होंने यूनान में तैनात रोमन सेनाओं की कमान अपने हाथों में ले ली। उन्होंने अपने विश्वस्त क्वेस्टर लुसियस लिसिनियस लुकुल्लुस को निर्देश दिया कि वे क्विंटस ब्रूटियस सूरा को मैसेडोनिया लौटने का आदेश दें, जिससे समस्त रोमन सेना का संचालन एक ही नेतृत्व के अधीन किया जा सके। इसके बाद सुल्ला ने अपनी संपूर्ण शक्ति एथेंस और उसके प्रमुख बंदरगाह पिराएउस पर केंद्रित कर दी। उस समय एथेंस और पिराएउस को जोड़ने वाली प्रसिद्ध लॉन्ग वॉल्स पहले ही नष्ट की जा चुकी थीं। पोंटस की शक्तिशाली नौसेना समुद्र पर नियंत्रण बनाए हुए थी, इसलिए सुल्ला ने लुकुल्लुस को मित्र राज्यों से नौसैनिक सहायता जुटाने के लिए भेजा। इसी बीच मिथ्रिडेट्स ने हेल्सपोंट पार कर एक नई सेना यूनान भेज दी, जिससे घेराबंदी लंबी खिंच गई। परिणामस्वरूप एथेंस और पिराएउस दोनों की घेराबंदी लगभग एक वर्ष तक चलती रही।

एथेंस पर विजय

86 ईसा पूर्व के वसंत में सुल्ला को एथेंस की रक्षा-व्यवस्था में एक कमजोर स्थान का पता चला। साथ ही नगर के अनेक निवासी तानाशाह एरिस्टियन के शासन से असंतुष्ट हो चुके थे। इन परिस्थितियों का लाभ उठाते हुए सुल्ला ने 1 मार्च 86 ईसा पूर्व को नगर पर निर्णायक आक्रमण किया। भीषण युद्ध के बाद रोमन सेना ने एक्रोपोलिस को छोड़कर पूरे एथेंस पर अधिकार कर लिया। इसके बाद एक्रोपोलिस की अलग से घेराबंदी की गई, जहाँ एरिस्टियन और उसके समर्थकों ने कुछ समय तक प्रतिरोध जारी रखा, किंतु अंततः उन्हें भी आत्मसमर्पण करना पड़ा।

यद्यपि एथेंस यूनानी सभ्यता, दर्शन और शिक्षा का महान केंद्र था, फिर भी विजय के बाद नगर को भारी क्षति उठानी पड़ी। सुल्ला ने नगर का पूर्ण विनाश नहीं कराया, किंतु उसने अपने सैनिकों को लूटपाट की अनुमति दे दी। परिणामस्वरूप अनेक सार्वजनिक भवन, निजी संपत्तियाँ और कलात्मक धरोहरें नष्ट हो गईं। युद्ध के व्यय की पूर्ति के लिए सुल्ला ने एपिडॉरस, डेल्फी और ओलम्पिया जैसे प्रसिद्ध मंदिरों में संचित स्वर्ण, रजत और अन्य बहुमूल्य धातुओं को भी अपने अधिकार में ले लिया। यह निर्णय विवादास्पद अवश्य था, किंतु इससे उन्हें आगे के सैन्य अभियानों के लिए आवश्यक आर्थिक संसाधन प्राप्त हो गए।

पिराएउस का पतन

एथेंस पर अधिकार करने के बाद सुल्ला ने अपना ध्यान पिराएउस की ओर केंद्रित किया, जहाँ मिथ्रिडेट्स के प्रमुख सेनापति आर्केलाओस ने सुदृढ़ रक्षा-व्यवस्था स्थापित कर रखी थी। दोनों पक्षों के बीच कई सप्ताह तक भीषण संघर्ष चलता रहा। अंततः रोमन सेना ने पोंटिक प्रतिरोध को तोड़ दिया और आर्केलाओस समुद्र मार्ग से पीछे हटने के लिए विवश हो गया। इसके बाद सुल्ला ने पिराएउस पर अधिकार कर लिया और भविष्य में उसके पुनः सैन्य अड्डे के रूप में उपयोग को रोकने के लिए नगर के अधिकांश दुर्गों और सैन्य संरचनाओं को ध्वस्त करा दिया।

एथेंस और पिराएउस की विजय ने प्रथम मिथ्रिडेटिक युद्ध की दिशा बदल दी। इन सफलताओं से यूनान में रोमन प्रभुत्व पुनः स्थापित हुआ और सुल्ला की प्रतिष्ठा एक असाधारण सेनानायक के रूप में और अधिक सुदृढ़ हो गई। यही विजय आगे चलकर चेरोनिया और ऑर्कोमेनोस जैसे निर्णायक युद्धों की आधारशिला सिद्ध हुई, जिनमें मिथ्रिडेट्स की शक्ति को निर्णायक आघात पहुँचा।

बोयोटिया के युद्ध और प्रथम मिथ्रिडेटिक युद्ध का समापन
बोयोटिया में निर्णायक अभियान

86 ईसा पूर्व की गर्मियों में मध्य यूनान का बोयोटिया क्षेत्र प्रथम मिथ्रिडेटिक युद्ध का निर्णायक रणक्षेत्र बन गया। इस समय तक सुल्ला एथेंस और पिराएउस पर अधिकार स्थापित कर चुका था, किंतु मिथ्रिडेट्स षष्ठ यूएपेटर की सेनाएँ अभी भी यूनान में सक्रिय थीं। पोंटस के प्रमुख सेनापति आर्केलाओस ने विशाल सेना के साथ बोयोटिया में अपनी स्थिति मजबूत कर ली थी। इसलिए यूनान में रोमन प्रभुत्व पुनः स्थापित करने के लिए सुल्ला को एक निर्णायक विजय की आवश्यकता थी।

86 ईसा पूर्व में बोयोटिया में दो महान युद्ध लड़े गए—पहला चैरोनिया का युद्ध और दूसरा ऑर्कोमेनोस का युद्ध। इन दोनों युद्धों ने न केवल यूनान में मिथ्रिडेट्स की शक्ति का अंत कर दिया, बल्कि सुल्ला को अपने युग का सर्वश्रेष्ठ रोमन सेनानायक भी सिद्ध कर दिया। इन युद्धों का विस्तृत वर्णन प्राचीन इतिहासकार प्लूटार्क और अप्पियन ने किया है। यद्यपि दोनों लेखकों ने पोंटस की सेना की संख्या तथा उसकी क्षति को अत्यधिक बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया है, फिर भी इस बात पर सभी इतिहासकार सहमत हैं कि दोनों युद्ध रोमन इतिहास की अत्यंत महत्त्वपूर्ण सैन्य घटनाएँ थीं।

चैरोनिया का युद्ध

एथेंस पर अधिकार स्थापित करने के बाद सुल्ला के सामने सबसे बड़ी समस्या रसद की थी। एटिका क्षेत्र युद्ध से पूरी तरह उजड़ चुका था और वहाँ सेना के लिए पर्याप्त भोजन तथा अन्य आवश्यक सामग्री उपलब्ध नहीं थी। परिणामस्वरूप सुल्ला ने अपनी सेना को मध्य यूनान की ओर बढ़ाया, जहाँ उसे अधिक सुरक्षित आपूर्ति मार्ग प्राप्त हो सकते थे। साथ ही वह थेसली में तैनात लगभग छह हजार रोमन सैनिकों से भी संपर्क स्थापित करना चाहता था।

चैरोनिया के निकट पहुँचकर सुल्ला ने तत्काल युद्ध करने के स्थान पर अत्यंत सावधानी से अपनी स्थिति मजबूत की। उसने सामरिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण फिलोबेटस पहाड़ी पर अधिकार कर लिया और वहाँ मिट्टी के प्राचीर, खाइयाँ तथा अन्य रक्षात्मक निर्माण करवाए। इससे उसकी अपेक्षाकृत छोटी सेना को प्राकृतिक सुरक्षा प्राप्त हुई और पोंटस की विशाल सेना की संख्या का लाभ काफी हद तक कम हो गया। कई दिनों तक दोनों सेनाएँ एक-दूसरे के सामने डटी रहीं और उपयुक्त अवसर की प्रतीक्षा करती रहीं।

निर्णायक संघर्ष प्रारंभ होने पर पोंटिक सेना ने सबसे पहले अपने प्रसिद्ध दराँती लगे रथों (साइथ्ड चैरियट्स) से आक्रमण किया। इन रथों का उद्देश्य रोमन पैदल सेना की पंक्तियों को तोड़ना था। किंतु सुल्ला ने पहले से ही सैनिकों को इनके विरुद्ध प्रशिक्षित कर रखा था। अनुशासित रोमन सैनिकों ने इन रथों को निष्प्रभावी कर दिया और उनके आक्रमण को विफल कर दिया। इसके बाद रोमन लीजनों ने संगठित ढंग से आगे बढ़ते हुए पोंटिक फ़ैलेंक्स पर धावा बोल दिया। लंबी और भीषण लड़ाई के बाद रोमन सेना ने पोंटस की पंक्तियों को तोड़ दिया। आर्केलाओस की सेना अव्यवस्थित होकर पीछे हटने लगी और अंततः निर्णायक रूप से पराजित हुई। प्राचीन स्रोतों में पोंटस की सेना की संख्या 60,000 से 120,000 सैनिकों तक बताई गई है, जबकि आधुनिक इतिहासकार इन आँकड़ों को अतिरंजित मानते हैं। फिर भी यह निर्विवाद है कि आर्केलाओस की सेना संख्या में रोमन सेना से कहीं अधिक थी। इसी कारण चैरोनिया की विजय सुल्ला की सबसे उल्लेखनीय सैन्य सफलताओं में गिनी जाती है।

रोम की राजनीति और नई चुनौती

चैरोनिया की विजय के तुरंत बाद सुल्ला को सूचना मिली कि रोम में सिन्ना के नेतृत्व वाली सरकार ने कौंसल लुसियस वेलेरियस फ्लैक्कुस को पूर्व भेज दिया है, ताकि वह सुल्ला की सेना की कमान अपने हाथ में ले सके। चूँकि सिन्ना की सरकार सुल्ला को पहले ही राज्यद्रोही घोषित कर चुकी थी, इसलिए उसकी दृष्टि में फ्लैक्कुस ही वैध रोमन सेनापति था। इस परिस्थिति ने सुल्ला की स्थिति को अत्यंत जटिल बना दिया। अब उसे केवल मिथ्रिडेट्स की सेनाओं से ही नहीं, बल्कि रोम की प्रतिद्वंद्वी सरकार द्वारा भेजी गई सेना से भी संभावित संघर्ष का सामना करना पड़ सकता था। फिर भी उसने अपना पूरा ध्यान पहले पोंटस की सेना को पूर्णतः पराजित करने पर केंद्रित रखा।

ऑर्कोमेनोस का युद्ध

चैरोनिया की पराजय के बाद मिथ्रिडेट्स ने आर्केलाओस को नई सेना भेजी। इसके परिणामस्वरूप दोनों सेनाएँ बोयोटिया के ऑर्कोमेनोस के विस्तृत मैदान में आमने-सामने आईं। प्राचीन स्रोतों के अनुसार पोंटस की सेना लगभग 90,000 सैनिकों की थी, यद्यपि आधुनिक इतिहासकार इस संख्या को भी अत्यधिक बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया गया मानते हैं।

युद्ध प्रारंभ होने से पहले सुल्ला ने अपनी अद्भुत सामरिक क्षमता का परिचय दिया। उसने अपने सैनिकों से युद्धभूमि पर तीन समानांतर खाइयाँ खुदवाईं, जिनका उद्देश्य पोंटस की शक्तिशाली घुड़सवार सेना की गति को सीमित करना था। इस प्रकार उसने भूगोल और इंजीनियरिंग दोनों का उपयोग युद्धनीति के रूप में किया।

जब पोंटिक घुड़सवारों ने इन निर्माण कार्यों को रोकने के लिए आक्रमण किया, तब कुछ समय के लिए रोमन सैनिकों की पंक्तियाँ डगमगा गईं। अनेक सैनिक पीछे हटने लगे और पराजय की आशंका उत्पन्न हो गई।

ऐसे संकटपूर्ण क्षण में सुल्ला स्वयं घोड़े से उतरकर अग्रिम पंक्ति में पहुँचा। उसने अपने सैनिकों को लज्जित करते हुए कहा कि यदि वे पीछे हटना चाहते हैं तो इतिहास में यह अवश्य लिखा जाएगा कि उन्होंने अपने सेनापति को शत्रु के सामने अकेला छोड़ दिया था। उसके इस साहसिक नेतृत्व ने सैनिकों का मनोबल पुनः ऊँचा कर दिया। उन्होंने फिर से संगठित होकर आक्रमण किया और पोंटस की सेना को पीछे धकेलना प्रारंभ कर दिया।

इसके बाद रोमन सेना ने पोंटिक शिविर को चारों ओर से घेर लिया। आर्केलाओस ने अपनी सेना को बचाने का प्रयास किया, किंतु उसकी अधिकांश सेना युद्धभूमि में नष्ट हो गई। अंततः वह स्वयं किसी प्रकार निकटवर्ती दलदलों के मार्ग से भागकर चाल्सिस पहुँचने में सफल हुआ। ऑर्कोमेनोस की विजय ने यूनान में मिथ्रिडेट्स की सैन्य शक्ति का लगभग पूर्ण अंत कर दिया।

मिथ्रिडेट्स के साथ डार्डानुस की संधि

बोयोटिया की दोनों पराजयों के बाद मिथ्रिडेट्स की स्थिति तेजी से कमजोर होने लगी। दूसरी ओर एशिया में भी उसके विरुद्ध विद्रोह फैलने लगे थे। इसी समय लुकुल्लुस के नेतृत्व में रोमन नौसेना सक्रिय हो गई, जबकि फ्लैक्कुस की सेना भी एशिया की ओर बढ़ रही थी। बाद में फ्लैक्कुस की हत्या उसके लेगेट गेयस फ्लेवियस फिम्ब्रिया ने कर दी और सेना की कमान अपने हाथ में ले ली। इस प्रकार मिथ्रिडेट्स एक साथ कई दिशाओं से घिर गया।

इन परिस्थितियों में उसने शांति वार्ता का मार्ग अपनाया। 85 ईसा पूर्व की शरद ऋतु में डार्डानुस में सुल्ला और मिथ्रिडेट्स की भेंट हुई। संधि के अनुसार मिथ्रिडेट्स ने रोमन एशिया प्रांत तथा पाफ्लागोनिया खाली करने, बिथिनिया और कप्पाडोसिया उनके वैध शासकों को लौटाने, 70 से 80 युद्धपोत तथा लगभग 2,000 से 3,000 टैलेंट युद्ध-क्षतिपूर्ति देने पर सहमति व्यक्त की। बदले में सुल्ला ने उसके पोंटस के राज्य को बनाए रखा और उसे रोम का “मित्र एवं सहयोगी” स्वीकार कर लिया।

फिम्ब्रिया का अंत और एशिया का पुनर्गठन

संधि के बाद सुल्ला ने अपना ध्यान फिम्ब्रिया की विद्रोही सेना की ओर लगाया। जैसे ही उसने उसके विरुद्ध अभियान प्रारंभ किया, अधिकांश सैनिक फिम्ब्रिया का साथ छोड़कर सुल्ला की सेना में सम्मिलित हो गए। अपनी स्थिति निराशाजनक देखकर फिम्ब्रिया ने पहले सुल्ला की हत्या कराने का असफल प्रयास किया और अंततः आत्महत्या कर ली। इसके बाद सुल्ला ने एशिया प्रांत के प्रशासन का व्यापक पुनर्गठन किया। मिथ्रिडेट्स का साथ देने वाले नगरों पर भारी आर्थिक दंड लगाया गया, युद्ध-क्षतिपूर्ति की व्यवस्था की गई तथा रोमन प्रशासन को पुनः संगठित किया गया। इस प्रक्रिया से सुल्ला को अपार धन-संपत्ति और एक अत्यंत अनुभवी तथा विजयी सेना प्राप्त हुई।

प्राचीन इतिहासकारों ने डार्डानुस की संधि की आलोचना करते हुए कहा कि सुल्ला ने मिथ्रिडेट्स का पूर्ण विनाश करने के स्थान पर शीघ्र इटली लौटकर अपने राजनीतिक विरोधियों से गृहयुद्ध लड़ने को अधिक महत्त्व दिया। आधुनिक इतिहासकार इस आलोचना को पूरी तरह स्वीकार नहीं करते। उनका मत है कि मिथ्रिडेट्स जैसा शक्तिशाली शासक उस समय पूर्णतः पराजित नहीं किया जा सकता था और तत्कालीन परिस्थितियों में शांति स्थापित करना एक व्यावहारिक निर्णय था।

फिर भी अधिकांश आधुनिक विद्वानों का यह भी मानना है कि एशिया में अतिरिक्त समय बिताकर सुल्ला ने न केवल युद्ध-क्षतिपूर्ति और विशाल धन अर्जित किया, बल्कि एक ऐसी अनुशासित एवं विजयी सेना भी तैयार कर ली, जिसका उपयोग उसने बाद में इटली लौटकर अपने राजनीतिक शत्रुओं के विरुद्ध निर्णायक गृहयुद्ध में अत्यंत प्रभावी ढंग से किया। इस प्रकार प्रथम मिथ्रिडेटिक युद्ध का समापन केवल पूर्व में रोमन विजय का अंत नहीं था, बल्कि रोमन गणराज्य के आगामी गृहयुद्धों की भूमिका भी सिद्ध हुआ।

गृहयुद्ध की पृष्टभूमि
सुल्ला का इटली में प्रवेश

85 ईसा पूर्व में प्रथम मिथ्रिडेटिक युद्ध की सफलता के बाद सुल्ला ने एशिया प्रांत का पुनर्गठन किया, पर्याप्त धन-संपत्ति और युद्ध-क्षतिपूर्ति प्राप्त की तथा अपनी अनुभवी सेना को संगठित रखा। 83 ईसा पूर्व के वसंत में वह अपनी पाँच विजयी रोमन सेनाओं के साथ एड्रियाटिक सागर पार करके ब्रुंडिसियम पहुँचा। नगर ने बिना किसी प्रतिरोध के उसके लिए अपने द्वार खोल दिए। यह केवल एक सैन्य सफलता नहीं थी, बल्कि इटली में उसके राजनीतिक अभियान का भी आरंभ था।

सुल्ला के आगमन से पहले ही क्विंटस कैसिलियस मेटेलस पायस उसके समर्थन की घोषणा कर चुके थे। उनके अतिरिक्त अनेक प्रभावशाली सीनेटर, अभिजात वर्ग के सदस्य तथा पूर्व मजिस्ट्रेट भी धीरे-धीरे उसके पक्ष में आने लगे। इससे स्पष्ट हो गया कि रोम का परंपरावादी सीनेट वर्ग सिन्ना–मारियन शासन से असंतुष्ट था और सुल्ला को सत्ता पुनः स्थापित करने का माध्यम मान रहा था।

इसी समय मार्कस लिसिनियस क्रैसस भी हिस्पानिया से अपनी संगठित सेना के साथ सुल्ला के शिविर में पहुँचे। वे सिन्ना के शासनकाल में रोम से भागकर अपने समर्थकों की सहायता से सेना तैयार करने में सफल हुए थे। सुल्ला ने उनका अत्यंत सम्मानपूर्वक स्वागत किया, उन्हें ‘इम्पेरेटर’ कहकर संबोधित किया तथा उनकी सेना को और अधिक सुदृढ़ करने के लिए अतिरिक्त सैनिक उपलब्ध कराए। राजनीतिक परिस्थितियों में परिवर्तन का प्रमाण यह भी था कि पब्लियस कॉर्नेलियस सेथेगस, जिसे सुल्ला ने 88 ईसा पूर्व में राज्यद्रोही घोषित किया था, अब उसके समर्थकों में सम्मिलित हो गया।

प्रारंभिक राजनीतिक और सैन्य परिस्थिति

यद्यपि रोमन अभिजात वर्ग का एक बड़ा भाग सुल्ला के पक्ष में था, फिर भी इटली की सामान्य जनता उसके प्रति पूर्णतः अनुकूल नहीं थी। अनेक नागरिकों को आशंका थी कि रोम लौटने के बाद वह अपने विरोधियों से कठोर प्रतिशोध लेगा। रोम पर उसके प्रथम सैन्य मार्च की स्मृति अभी भी लोगों के मन में विद्यमान थी। दूसरी ओर, सिन्ना की मृत्यु के बाद भी मारियन दल ने सत्ता बनाए रखी थी और रोमन सीनेट ने सुल्ला के विरुद्ध सेनातुस कन्सुल्तुम अल्तिमुम जारी कर उसके विरोध में व्यापक सैन्य तैयारी प्रारंभ कर दी थी।

किंतु एशिया से प्राप्त विशाल धन-संपत्ति ने सुल्ला को निर्णायक बढ़त प्रदान की। उसके पास सैनिकों के वेतन, रसद तथा युद्ध सामग्री की कोई कमी नहीं थी। परिणामस्वरूप उसकी सेना अनुशासित रही और इटली में आगे बढ़ते समय स्थानीय नगरों में लूटपाट करने की आवश्यकता नहीं पड़ी। इससे अनेक नगरों ने बिना संघर्ष उसके प्रति तटस्थ या सहानुभूतिपूर्ण रुख अपनाया।

टिफाटा और टीनम सिडिसिनुम के अभियान

कैपुआ की ओर बढ़ते समय सुल्ला का सामना उस वर्ष के दोनों कौंसलों—लुसियस कॉर्नेलियस स्किपियो एशियाटिकस तथा गेयस नॉरबानुस—से हुआ। दोनों ने अपनी-अपनी सेनाओं को अलग-अलग क्षेत्रों में तैनात कर रखा था। सुल्ला ने पहले माउंट टिफाटा के निकट नॉरबानुस पर आक्रमण किया। इस युद्ध में उसकी अनुभवी सेना ने निर्णायक विजय प्राप्त की और नॉरबानुस को पीछे हटने के लिए विवश होना पड़ा।

इसके बाद सुल्ला टीनम सिडिसिनुम पहुँचा, जहाँ स्किपियो की सेना उसका सामना कर रही थी। प्रारंभ में दोनों पक्षों के बीच समझौते की संभावना दिखाई दी। स्किपियो पीछे हटने के लिए भी तैयार था, किंतु उसके एक लेगेट ने सुल्ला के नियंत्रण वाले नगर पर आक्रमण कर दिया। इस घटना से वार्ता समाप्त हो गई। सुल्ला ने स्वयं को समझौता चाहने वाला तथा विरोधी पक्ष को समझौता तोड़ने वाला सिद्ध करने में सफलता प्राप्त की।

सुल्ला ने अपनी सेना को आदेश दिया कि वे स्किपियो के नवीन सैनिकों के साथ मित्रवत व्यवहार करें। उसकी इस नीति का आश्चर्यजनक परिणाम निकला। स्किपियो के अधिकांश सैनिक बिना युद्ध किए सुल्ला के पक्ष में आ गए। लगभग निराश्रित हो चुके स्किपियो को सुल्ला ने सम्मानपूर्वक जाने दिया। इस व्यवहार से उसकी उदारता का भी प्रचार हुआ और अनेक तटस्थ लोगों का विश्वास उसके प्रति बढ़ा।

निर्णायक संघर्ष की तैयारी

83 ईसा पूर्व के शेष महीनों में दोनों पक्षों ने अगले वर्ष के निर्णायक अभियान की तैयारी की। क्विंटस सेर्टोरियस ने एट्रूरिया में पर्याप्त सैन्य शक्ति एकत्र की थी, किंतु युवा गेयस मारियस को कौंसल बनाए जाने से असंतुष्ट होकर वह अपना प्रांत हिस्पानिया सिटेरियर संभालने के लिए इटली छोड़ गया। इससे मारियन दल एक अनुभवी सेनापति से वंचित हो गया। दूसरी ओर, सुल्ला ने स्पष्ट घोषणा कर दी कि वह सैमनाइटों के साथ किसी प्रकार का समझौता स्वीकार नहीं करेगा। उसके अनुसार सैमनाइट लंबे समय से रोम के शत्रु थे और उन्होंने 87 ईसा पूर्व में मारियस तथा सिन्ना का समर्थन किया था। इसलिए उनके प्रति कठोर नीति अपनाना आवश्यक था। 82 ईसा पूर्व के लिए ग्नेयस पापिरियस कार्बो तीसरी बार कौंसल निर्वाचित हुआ, जबकि उसका सह-कौंसल गेयस मारियस का युवा पुत्र गेयस मारियस बना। दोनों ने मिलकर सुल्ला का सामना करने की तैयारी की।

युवा गेयस मारियस की पराजय

82 ईसा पूर्व के अभियान का आरंभ सुल्ला के लिए अत्यंत सफल रहा। अफ्रीका और सार्डिनिया में मारियन समर्थक गवर्नरों को पदच्युत कर दिया गया। इटली में भी उसकी सेना लगातार आगे बढ़ती रही। प्रारंभिक युद्धों में उसने युवा गेयस मारियस को पीछे हटने के लिए विवश कर दिया। अंततः मारियस प्रेनेस्टे नगर में जाकर बंद हो गया। सुल्ला ने अपने विश्वस्त सेनापति क्विंटस लुक्रेटियस ऑफेला को नगर की घेराबंदी का दायित्व सौंप दिया।

मारियस की पराजय के बाद सुल्ला ने अनेक बंदी बनाए गए सैमनाइट सैनिकों का वध करवा दिया। वह उन्हें रोम का सबसे कट्टर शत्रु मानता था। इस कठोर कार्रवाई से उसके पीछे के क्षेत्रों में कुछ अशांति उत्पन्न हुई, किंतु उसने इसे अपनी सैन्य नीति का आवश्यक भाग माना।

रोम पर पुनः अधिकार

प्रेनेस्टे की घेराबंदी जारी रहने के दौरान रोम में युवा मारियस ने अपने विरोधियों का दमन करने का प्रयास किया। शहरी प्रेटर लुसियस जुनियस ब्रूटस डामासिप्पुस ने सीनेट की बैठक के दौरान चार प्रमुख सीनेटरों की हत्या करवा दी। इस घटना ने राजधानी में भय और राजनीतिक आतंक का वातावरण उत्पन्न कर दिया।

जब सुल्ला रोम पहुँचा, तो नगर ने बिना किसी संगठित प्रतिरोध के उसके लिए अपने द्वार खोल दिए। उसके अधिकांश विरोधी पहले ही शहर छोड़कर भाग चुके थे। रोम में प्रवेश करने के बाद उसने अपने प्रमुख शत्रुओं को राज्य का शत्रु (होस्तेस) घोषित किया और जनता को संबोधित करते हुए अपने अभियान को रोम की मुक्ति का अभियान बताया। इसके बाद वह कार्बो का सामना करने के लिए एट्रूरिया की ओर बढ़ गया।

कार्बो के विरुद्ध अभियान

कार्बो पहले ही मेटेलस पायस और ग्नेयस पोम्पेयुस (पोम्पी) से कई पराजय झेल चुका था। उसने प्रेनेस्टे में घिरे युवा मारियस की सहायता करने का प्रयास किया, किंतु लगातार पीछे हटते हुए क्लूसियम पहुँचा। वहाँ उसने गेयस नॉरबानुस को मेटेलस पायस का सामना करने का दायित्व सौंपा। इसी बीच सुल्ला ने कार्बो पर आक्रमण किया, किंतु यह युद्ध किसी निर्णायक परिणाम पर नहीं पहुँचा। दूसरी ओर, पोम्पी ने प्रेनेस्टे की सहायता के लिए भेजी गई आठ शत्रु सेनाओं को मार्ग में ही पराजित कर दिया। इस प्रकार मारियस की सहायता की सभी संभावनाएँ समाप्त हो गईं। सैमनाइट और लुकानियाई सेनाएँ भी घेराबंदी तोड़ने में असफल रहीं और अंततः उन्होंने अपनी रणनीति बदलते हुए सीधे रोम पर आक्रमण करने का निर्णय लिया।

कोल्लीन द्वार का निर्णायक युद्ध

सैमनाइट और लुकानियाई सेनाओं के रोम की ओर बढ़ने का समाचार मिलते ही सुल्ला अपनी समस्त उपलब्ध सेना लेकर राजधानी की ओर चल पड़ा। 1 नवंबर 82 ईसा पूर्व को रोम के कोल्लीन द्वार के निकट गृहयुद्ध का सबसे निर्णायक संघर्ष हुआ।

युद्ध के प्रारंभ में सुल्ला का बायाँ मोर्चा बुरी तरह डगमगा गया और उसे स्वयं पीछे हटकर अपने शिविर में शरण लेनी पड़ी। ऐसा प्रतीत होने लगा कि विजय उसके हाथ से निकल जाएगी। इसके विपरीत दाएँ मोर्चे पर मार्कस लिसिनियस क्रैसस ने असाधारण नेतृत्व का परिचय दिया और शत्रु की पंक्तियों को तोड़ दिया। कुछ रोमन सैनिक पीछे हटकर नगर में प्रवेश करना चाहते थे, किंतु नगर के द्वार बंद मिलने पर उन्हें पुनः युद्धभूमि में लौटना पड़ा। पूरी रात युद्ध चलता रहा। अंततः क्रैसस की सफलता और सुल्ला की सेना के पुनर्गठन के कारण सैमनाइट और लुकानियाई सेनाएँ पूरी तरह पराजित हो गईं। क्रैसस ने भागते हुए शत्रुओं का दूर तक पीछा किया और उन्हें भारी क्षति पहुँचाई। कोल्लीन द्वार की यह विजय गृहयुद्ध का निर्णायक मोड़ सिद्ध हुई और इसके साथ ही संगठित प्रतिरोध का अंत हो गया।

गृहयुद्ध का समापन

2 नवंबर 82 ईसा पूर्व को सुल्ला ने कैम्पस मार्टियस स्थित बेल्लोना के मंदिर में सीनेट की बैठक बुलाई। उसी समय उसके आदेश पर लगभग तीन से चार हजार सैमनाइट युद्धबंदियों की हत्या कर दी गई। मंदिर के बाहर से आती चीखें सुनकर सीनेटर भयभीत हो उठे, किंतु सुल्ला ने शांत स्वर में कहा कि वे केवल अपराधियों को दंडित किए जाने की आवाज़ें हैं। इसके बाद वह प्रेनेस्टे पहुँचा। नगर के पतन से पहले ही युवा गेयस मारियस ने बंदी बनने की अपेक्षा आत्महत्या कर ली। इसके पश्चात सुल्ला ने अपनी सौतेली पुत्री एमीलिया का विवाह पोम्पी से कराया और उसे सिसिली पर अधिकार करने का दायित्व सौंपा। ग्नेयस पापिरियस कार्बो सिसिली से भागकर अफ्रीका और फिर मिस्र जाने का प्रयास कर रहा था, किंतु पकड़ा गया और उसकी हत्या कर दी गई।

इस प्रकार 82 ईसा पूर्व के अंत तक मारियन दल के दोनों कौंसल—युवा गेयस मारियस और ग्नेयस पापिरियस कार्बो—समाप्त हो चुके थे। गृहयुद्ध में विजय के साथ सुल्ला रोमन गणराज्य का निर्विवाद सैन्य और राजनीतिक नेता बन गया। यही विजय आगे चलकर उसके अधिनायक (डिक्टेटर) बनने तथा व्यापक संवैधानिक सुधारों की आधारशिला सिद्ध हुई।

निषेध (प्रोस्क्रिप्शन्स) और सुल्ला के संवैधानिक सुधार
निषेध (प्रोस्क्रिप्शन्स) की शुरुआत

82 ईसा पूर्व में कोल्लीन द्वार के युद्ध में विजय प्राप्त करने के बाद सुल्ला रोमन गणराज्य का निर्विवाद शासक बन गया। किंतु उसकी विजय केवल सैन्य सफलता तक सीमित नहीं थी। वह अपने राजनीतिक विरोधियों, विशेषकर सिन्ना–मारियन दल का पूर्णतः उन्मूलन करना चाहता था। गृहयुद्ध के अंतिम चरण में युवा गेयस मारियस के समर्थकों द्वारा अपने विरोधियों की हत्या करवाए जाने के बाद सुल्ला ने भी व्यापक प्रतिशोध की नीति अपनाई। उसका उद्देश्य केवल बदला लेना नहीं था, बल्कि भविष्य में किसी भी राजनीतिक चुनौती की संभावना को समाप्त करना भी था।

औपचारिक निषेध-सूचियाँ (प्रोस्क्रिप्शन्स) प्रकाशित होने से पहले ही उसके अनेक समर्थकों ने गृहयुद्ध की अव्यवस्था का लाभ उठाकर निजी शत्रुओं से बदला लेना प्रारंभ कर दिया था। अनेक स्थानों पर व्यक्तिगत दुश्मनी, संपत्ति प्राप्त करने की लालसा तथा राजनीतिक प्रतिशोध के कारण हत्याएँ होने लगीं। इस अराजक स्थिति को नियंत्रित करने तथा उसे वैधानिक स्वरूप देने के लिए सुल्ला ने निषेध-सूचियों की व्यवस्था लागू की।

पहली निषेध-सूची

प्रारंभ में सुल्ला ने निषेध-सूची को बेल्लोना के मंदिर में एकत्रित सीनेट के समक्ष प्रस्तुत किया, किंतु सीनेटरों ने इसे स्वीकार करने से इनकार कर दिया। इसके बाद 3 नवंबर 82 ईसा पूर्व को, प्रेनेस्टे पहुँचने से पहले ही, उसने प्रोकौंसल के अधिकार का प्रयोग करते हुए पहली निषेध-सूची प्रकाशित कर दी।

इस प्रथम सूची में लगभग 80 व्यक्तियों के नाम सम्मिलित थे। इनमें सिन्ना के शासनकाल में निर्वाचित अधिकांश जीवित मजिस्ट्रेट तथा वे प्रमुख नेता शामिल थे जिन्होंने समय रहते सुल्ला का समर्थन नहीं किया था। अगले कुछ दिनों में दो और सूचियाँ प्रकाशित की गईं, जिनमें सैकड़ों अतिरिक्त व्यक्तियों के नाम जोड़ दिए गए। इस प्रकार निषेध एक सीमित राजनीतिक कार्रवाई न रहकर व्यापक दमन अभियान में बदल गया।

निषेध की प्रक्रिया और उसके परिणाम

निषिद्ध घोषित किए गए व्यक्तियों को राज्य का शत्रु माना जाता था। उनकी हत्या करने अथवा उनके ठिकाने की सूचना देने वालों को पुरस्कार दिया जाता था, जबकि उन्हें आश्रय देने, छिपाने या किसी प्रकार की सहायता करने वालों को कठोर दंड का सामना करना पड़ता था।

यद्यपि इन सूचियों का मुख्य लक्ष्य मारियस और सिन्ना के समर्थक थे, परंतु शीघ्र ही यह व्यवस्था व्यक्तिगत प्रतिशोध का माध्यम भी बन गई। अनेक प्रभावशाली व्यक्तियों ने अपने निजी शत्रुओं के नाम सूची में सम्मिलित करवाए ताकि उनकी हत्या कर उनकी संपत्ति पर अधिकार किया जा सके।

निषिद्ध व्यक्तियों की सारी संपत्ति राज्य द्वारा जब्त कर ली जाती थी। बाद में इन संपत्तियों की सरकारी नीलामी अत्यंत कम कीमतों पर की गई, जिनका अधिकांश भाग सुल्ला के समर्थकों ने खरीद लिया। इससे अनेक पुराने अभिजात परिवार नष्ट हो गए, जबकि सुल्ला के समर्थक अत्यंत समृद्ध बन गए। इस प्रक्रिया ने इटली के बड़े भाग में सामाजिक और आर्थिक संरचना को गहराई से प्रभावित किया।

निर्वासन और राजनीतिक प्रभाव

निषिद्ध व्यक्तियों में से अनेक किसी प्रकार इटली से भाग निकलने में सफल हुए। लगभग एक-चौथाई लोग हिस्पानिया पहुँचे, जहाँ उन्होंने मारियन सेनापति क्विंटस सेर्टोरियस के नेतृत्व में सशस्त्र प्रतिरोध जारी रखा। अन्य कई लोग पोंटस भाग गए और मिथ्रिडेट्स षष्ठ के संरक्षण में रहने लगे।

कुछ व्यक्तियों को सुल्ला ने दया भी दिखाई। उदाहरण के लिए, 83 ईसा पूर्व के कौंसल लुसियस कॉर्नेलियस स्किपियो एशियाटिकस को मस्सालिया में निर्वासन का जीवन बिताने की अनुमति दी गई। इसी प्रकार युवा गेयस जूलियस सीज़र को भी उनके परिवार और प्रभावशाली मित्रों के हस्तक्षेप के कारण क्षमा मिल गई। यद्यपि सुल्ला ने कथित रूप से यह चेतावनी दी थी कि “उस युवक में अनेक मारियस छिपे हुए हैं”, फिर भी उसने अंततः उसे जीवित रहने दिया।

लेक्स वैलेरिया और तानाशाह की नियुक्ति

जब निषेध की प्रक्रिया समाप्ति की ओर बढ़ी, तब सुल्ला ने रोमन राज्य के पुनर्गठन का कार्य आरंभ किया। इसके लिए उसने लगभग एक शताब्दी से अप्रयुक्त तानाशाह (डिक्टेटर) के पद को पुनर्जीवित किया। उस समय दोनों कौंसल या तो मारे जा चुके थे अथवा रोम से भाग गए थे, इसलिए सामान्य संवैधानिक प्रक्रिया का पालन संभव नहीं था। इस स्थिति में सीनेट ने वरिष्ठ प्रिन्सेप्स सेनेटस लुसियस वेलेरियस फ्लैक्कुस को इंटररेक्स नियुक्त किया। फ्लैक्कुस ने कोमितिया सेंचुरियाता के समक्ष एक विधेयक प्रस्तुत किया, जिसके परिणामस्वरूप लेक्स वैलेरिया पारित हुई। इस कानून के अंतर्गत सुल्ला को डिक्टातोर लेगीबस स्क्रिबुन्दीस एत रेई पब्लिकाए कॉन्स्टितुएन्दाए अर्थात “राज्य का पुनर्गठन करने और नए कानून बनाने हेतु तानाशाह” नियुक्त किया गया। उसके कार्यकाल की कोई निश्चित समय-सीमा निर्धारित नहीं की गई तथा उसे लगभग असीमित अधिकार प्रदान कर दिए गए। साथ ही उसके पूर्व तथा भविष्य के सभी कार्यों को भी वैधानिक संरक्षण प्राप्त हो गया।

सुल्ला के प्रमुख संवैधानिक सुधार

सुल्ला का विश्वास था कि गणराज्य की अस्थिरता का प्रमुख कारण जनप्रिय नेताओं और प्लेबीयन ट्रिब्यूनों की बढ़ती शक्ति थी। इसलिए उसने सबसे पहले सीनेट की सर्वोच्चता को सुदृढ़ करने का प्रयास किया। उसने प्लेबीयन ट्रिब्यूनों के अधिकारों को अत्यधिक सीमित कर दिया। अब कोई भी ट्रिब्यून सीनेट की स्वीकृति के बिना स्वतंत्र रूप से विधेयक प्रस्तुत नहीं कर सकता था। साथ ही यह भी निर्धारित किया गया कि जो व्यक्ति ट्रिब्यून बनेगा, वह भविष्य में किसी उच्च मजिस्ट्रेट पद के लिए उम्मीदवार नहीं बन सकेगा। इस व्यवस्था का उद्देश्य महत्त्वाकांक्षी नेताओं को ट्रिब्यून पद ग्रहण करने से हतोत्साहित करना था।

सुल्ला ने स्थायी आपराधिक न्यायालयों (क्वाएस्तियोनेस पेरपेतुए) का पुनर्गठन किया और उनकी जूरी पूरी तरह सीनेटरों से गठित की। इसके अतिरिक्त उसने प्रांतीय गवर्नरों पर नियंत्रण बढ़ाने के लिए भ्रष्टाचार, अवैध धन-संग्रह तथा राजद्रोह से संबंधित कानूनों का विस्तार किया। अब गवर्नरों को सीनेट के निर्देशों के अधीन रहकर कार्य करना पड़ता था।

प्रशासनिक पुनर्गठन

न्यायिक व्यवस्था को सुचारु रूप से संचालित करने के लिए प्रेटरों और क्वेस्टरों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि की गई। प्रत्येक प्रेटर पहले एक वर्ष तक रोम में न्यायालय की अध्यक्षता करता और उसके बाद अगले वर्ष किसी प्रांत का गवर्नर नियुक्त होता था। क्वेस्टरों की संख्या बढ़ाकर बीस कर दी गई तथा पूर्व क्वेस्टरों को स्वतः ही सीनेट की सदस्यता प्रदान की जाने लगी। इससे सीनेट का आकार बढ़ गया और न्यायालयों के लिए पर्याप्त संख्या में सीनेटर उपलब्ध होने लगे। साथ ही विभिन्न पदों के लिए आयु तथा अनुभव संबंधी कठोर नियम बनाए गए और यह निर्धारित किया गया कि कोई भी व्यक्ति दस वर्षों से पहले उसी उच्च पद पर पुनः निर्वाचित नहीं हो सकेगा।

अन्य सुधार और उनका प्रभाव

सुल्ला ने अनेक अन्य प्रशासनिक और सामाजिक परिवर्तन भी किए। उसने रोम के निर्धन नागरिकों को दिया जाने वाला राजकीय अनाज-वितरण समाप्त कर दिया। गृहयुद्ध के दौरान जब्त की गई भूमि पर उसने अपने सैनिकों को बसाया, जिससे एक ओर उन्हें पुरस्कार मिला और दूसरी ओर इटली में उसके समर्थकों का स्थायी आधार तैयार हुआ।

उसने निषिद्ध व्यक्तियों के लगभग दस हजार दासों को मुक्त कर उन्हें रोमन नागरिकता प्रदान की। इन मुक्त व्यक्तियों को सामान्यतः कोर्नेली कहा गया और उनसे अपेक्षा की गई कि वे जीवन भर सुल्ला तथा उसके परिवार के प्रति निष्ठावान बने रहेंगे।

80 ईसा पूर्व में सुल्ला ने क्विंटस कैसिलियस मेटेलस पायस के साथ सामान्य कौंसल के रूप में पद ग्रहण किया। इसके बाद उसने तानाशाह का पद त्याग दिया, अपनी सेना भंग कर दी और यह प्रदर्शित करने का प्रयास किया कि गणतांत्रिक व्यवस्था पुनः स्थापित हो चुकी है। वह बिना विशेष सुरक्षा के सार्वजनिक रूप से फ़ोरम में आने-जाने लगा और नागरिकों को अपने कार्यों के संबंध में प्रश्न पूछने की अनुमति भी दी।

सुधारों का मूल्यांकन

सुल्ला के सुधारों का प्रभाव मिश्रित रहा। कुछ व्यवस्थाएँ, विशेषकर न्यायिक सुधार और प्रांतीय प्रशासन पर नियंत्रण, कुछ समय तक प्रभावी रहीं। किंतु प्लेबीयन ट्रिब्यूनों पर लगाए गए प्रतिबंध अधिक समय तक टिक नहीं सके और बाद के वर्षों में अधिकांश समाप्त कर दिए गए। सीनेट का विस्तार करने से उसकी संख्या तो बढ़ गई, किंतु उसके अनेक नए सदस्य अपेक्षाकृत अनुभवहीन थे। सामाजिक युद्ध और गृहयुद्ध के कारण पुराने अनुभवी राजनीतिक वर्ग का बड़ा भाग समाप्त हो चुका था। परिणामस्वरूप सुल्ला के बाद की सीनेट पहले की तुलना में कम प्रभावशाली और कम अनुभवी सिद्ध हुई।

यद्यपि सुल्ला स्वयं यह मानता था कि उसने रोमन गणराज्य को स्थिरता प्रदान कर दी है, परंतु उसके द्वारा स्थापित व्यवस्था दीर्घकाल तक टिक नहीं सकी। उसकी मृत्यु के कुछ वर्षों के भीतर ही उसके अनेक संवैधानिक सुधार निरस्त या संशोधित कर दिए गए। फिर भी निषेध (प्रोस्क्रिप्शन्स), तानाशाही और संवैधानिक पुनर्गठन ने रोमन इतिहास पर गहरा प्रभाव डाला तथा आगे चलकर जूलियस सीज़र और अन्य शक्तिशाली सेनानायकों के उदय का मार्ग प्रशस्त किया।

सेवानिवृत्ति और मृत्यु
सार्वजनिक जीवन से निवृत्ति

80 ईसा पूर्व में कौंसल पद पर रहते हुए सुल्ला ने अपने जीवन का अंतिम विवाह किया। इसी समय उसे सिसाल्पाइन गॉल का प्रांतीय शासन सौंपने का प्रस्ताव भी दिया गया, जबकि उसके सह-कौंसल को हिस्पानिया में क्विंटस सेरटोरियस के विरुद्ध अभियान का दायित्व मिला। किंतु सुल्ला ने इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया। कौंसल का कार्यकाल समाप्त होने के बाद उसने सक्रिय राजनीतिक और सैन्य जीवन से स्वयं को अलग कर लिया तथा पुटेओली के निकट स्थित अपने ग्रामीण निवास में रहने लगा।

सेवानिवृत्ति के बाद सुल्ला ने अपेक्षाकृत विलासपूर्ण जीवन व्यतीत किया। उसे अभिनेताओं, संगीतकारों और साहित्यकारों की संगति प्रिय थी तथा वह समय का अधिकांश भाग मनोरंजन और बौद्धिक गतिविधियों में बिताता था। इसी अवधि में उसने अपने संस्मरण भी लिखे, जिनमें उसने अपने राजनीतिक जीवन, सैन्य अभियानों और उपलब्धियों का वर्णन किया। यद्यपि वह औपचारिक रूप से राजनीति से दूर हो चुका था, फिर भी अपने प्रभाव और प्रतिष्ठा के कारण समय-समय पर रोमन राजनीति में हस्तक्षेप करता रहा।

अंतिम राजनीतिक हस्तक्षेप

गृहयुद्ध समाप्त होने के बाद सुल्ला का राजनीतिक गुट धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगा। 78 ईसा पूर्व के कौंसल चुनावों में उसके विरोधी पुनः प्रभावशाली होने लगे। इस परिस्थिति में सुल्ला एक बार फिर रोम पहुँचा और अपने घनिष्ठ सहयोगी क्विंटस लुटातियस कैटुलस कैपिटोलिनस का समर्थन किया। अपने व्यक्तिगत प्रभाव और प्रतिष्ठा के बल पर उसने कैटुलस के निर्वाचन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई, यद्यपि मार्कस एमिलियस लेपिडस भी एक शक्तिशाली उम्मीदवार था।

उसी वर्ष लेपिडस और कैटुलस के बीच सुल्ला की नीतियों को लेकर तीव्र राजनीतिक संघर्ष प्रारंभ हो गया। प्रारंभ में विवाद निषिद्ध घोषित व्यक्तियों (प्रोस्क्रिप्शनों) के नागरिक अधिकारों तथा सुल्ला द्वारा किए गए भूमि-वितरण से संबंधित था। बाद में यह संघर्ष राजकीय अनाज-वितरण की पुनर्स्थापना और प्लेबीयन ट्रिब्यूनों की शक्तियों की बहाली जैसे व्यापक संवैधानिक प्रश्नों तक पहुँच गया। यद्यपि सुल्ला इस समय सक्रिय राजनीति से दूर था, फिर भी उसके द्वारा स्थापित व्यवस्था ही इस राजनीतिक विवाद का केंद्र बनी रही।

सुल्ला की मृत्यु

78 ईसा पूर्व में कुछ समय बाद पुटेओली में सुल्ला की मृत्यु हो गई। प्राचीन स्रोतों के अनुसार, मृत्यु से ठीक पहले वह नगर के सार्वजनिक कार्यों की देखरेख कर रहा था। इसी दौरान उसे पता चला कि नगर का एक मजिस्ट्रेट राजकोष के धन का गबन कर रहा है। उसने उस अधिकारी को तत्काल अपने सामने बुलवाकर कठोर शब्दों में फटकार लगाई। कहा जाता है कि अत्यधिक क्रोध और उत्तेजना के कारण उसके मुख से रक्तस्राव होने लगा। आधुनिक इतिहासकार इस घटना को तीव्र यकृत-विफलता अथवा गंभीर आंतरिक रोग के लक्षणों से जोड़ते हैं। अगले ही दिन उसकी मृत्यु हो गई।

अंतिम संस्कार और महत्त्व

सुल्ला की मृत्यु के बाद कौंसल लेपिडस और कैटुलस के बीच इस बात को लेकर विवाद उत्पन्न हुआ कि उसे राजकीय सम्मान के साथ सार्वजनिक अंतिम संस्कार दिया जाए या नहीं। अंततः ग्नियस पोम्पेयस मैग्नस के समर्थन से कैटुलस का मत स्वीकार किया गया और लेपिडस के विरोध के बावजूद सुल्ला का भव्य राजकीय अंतिम संस्कार आयोजित किया गया। उसका पार्थिव शरीर स्वर्णमंडित अर्थी पर रोम लाया गया। उसके अनुभवी सैनिक अंतिम यात्रा में सम्मिलित हुए और अनेक प्रतिष्ठित सीनेटरों ने श्रद्धांजलि अर्पित की। मुख्य शोक-भाषण संभवतः लुसियस मार्सियस फिलिप्पुस अथवा क्विंटस हॉर्टेंसियस होर्टालुस ने दिया। इसके बाद कैम्पस मार्टियस में उसका दाह संस्कार किया गया और उसकी अस्थियाँ वहीं स्थापित की गईं।

सुल्ला ने अपना समाधि-लेख स्वयं लिखा था, जिसमें अंकित था— “किसी मित्र ने कभी मुझ पर ऐसा उपकार नहीं किया जिसका प्रतिदान मैंने न दिया हो, और किसी शत्रु ने कभी मेरा ऐसा अहित नहीं किया जिसका मैंने पूरा प्रतिशोध न लिया हो।” प्लूटार्क के अनुसार, उसकी समाधि पर उसका यह आदर्श-वाक्य भी अंकित था— “न कोई मुझसे अच्छा मित्र, न कोई मुझसे बुरा शत्रु।” यह वाक्य उसके व्यक्तित्व, उसकी राजनीतिक नीति तथा उसके संपूर्ण जीवन का सबसे सटीक प्रतीक माना जाता है।

सुल्ला का व्यक्तित्व, परिवार और ऐतिहासिक महत्त्व
विवाह और संतानें

रोमन सेनानायक एवं तानाशाह लुसियस कॉर्नेलियस सुल्ला ने अपने जीवन में पाँच विवाह किए। प्राचीन इतिहासकार प्लूटार्क के अनुसार उनकी पहली पत्नी का नाम इलिया (संभवतः जूलिया) था, जिनसे दो संतानें हुईं। उनकी पुत्री कॉर्नेलिया ने पहले क्विंटस पोम्पेयस रूफस तथा बाद में मैमरकस एमिलियस लेपिडस लिवियानुस से विवाह किया। इसी वंश से आगे चलकर पोम्पेया का जन्म हुआ, जो बाद में जूलियस सीज़र की तीसरी पत्नी बनी। उनका एक पुत्र लुसियस कॉर्नेलियस सुल्ला भी था, जिसकी युवावस्था में ही मृत्यु हो गई।

सुल्ला की दूसरी पत्नी एलिया तथा तीसरी पत्नी क्लोएलिया थीं। क्लोएलिया से कोई संतान न होने के कारण उन्होंने उन्हें तलाक दे दिया। उनकी चौथी पत्नी कैसिलिया मेटेला थीं, जिनसे जुड़वाँ पुत्र फॉस्टस कॉर्नेलियस सुल्ला और जुड़वाँ पुत्री फॉस्टा कॉर्नेलिया का जन्म हुआ। फॉस्टा ने बाद में दो विवाह किए और उसके वंशज भी रोमन राजनीति में सक्रिय रहे। सुल्ला की अंतिम पत्नी वेलेरिया थीं, जिनसे उनकी एक पुत्री कॉर्नेलिया पोस्टुमा का जन्म उनकी मृत्यु के बाद हुआ।

सुल्ला का व्यक्तित्व और स्वभाव

सुल्ला का व्यक्तित्व अत्यंत विरोधाभासी था। उसका रंग गोरा-लाल, आँखें नीली तथा चेहरा लाल धब्बों से युक्त था। वह स्वयं को भाग्य का प्रिय व्यक्ति मानता था और अपने असाधारण सौभाग्य पर गहरा विश्वास रखता था। निजी जीवन में वह विनोदी, मिलनसार तथा कलाकारों और अभिनेताओं की संगति का आनंद लेने वाला व्यक्ति था, जबकि सार्वजनिक जीवन में वह कठोर, अनुशासनप्रिय और अनेक अवसरों पर अत्यंत निर्मम सिद्ध हुआ।

उसके स्वभाव की सबसे बड़ी विशेषता उसकी अप्रत्याशितता थी। वह कभी गंभीर अपराधियों को क्षमा कर देता था, तो कभी छोटे अपराधों के लिए भी कठोर दंड दे देता था। युवावस्था के आर्थिक संघर्षों और विविध सामाजिक वर्गों के संपर्क ने उसके व्यक्तित्व को व्यावहारिक तथा राजनीतिक रूप से चतुर बनाया। इतिहासकार सल्लस्ट के अनुसार सुल्ला विद्वान, कुशल वक्ता, महत्त्वाकांक्षी तथा मित्र बनाने में निपुण व्यक्ति था। वह विलासप्रिय अवश्य था, किंतु उसने अपने निजी जीवन को कभी सार्वजनिक दायित्वों में बाधा नहीं बनने दिया।

सुल्ला का ऐतिहासिक महत्त्व

रोमन इतिहास में सुल्ला का स्थान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। उसने गृहयुद्ध के बाद रोमन गणराज्य में व्यापक संवैधानिक सुधार किए, सीनेट की शक्तियों को बढ़ाया, ट्रिब्यूनों के अधिकार सीमित किए तथा प्रशासनिक एवं न्यायिक व्यवस्था का पुनर्गठन किया। यद्यपि उसके अनेक सुधार बाद में समाप्त कर दिए गए, फिर भी उन्होंने रोमन राजनीतिक संस्थाओं के विकास को गहराई से प्रभावित किया।

सुल्ला की विरासत अत्यंत विवादास्पद रही। प्राचीन लेखकों ने प्रायः उसे क्रूर, रक्तपिपासु और प्रतिशोधी शासक के रूप में चित्रित किया, क्योंकि उसकी निषेधाज्ञाओं (प्रोस्क्रिप्शन्स) में बड़ी संख्या में राजनीतिक विरोधियों की हत्या हुई। दूसरी ओर, कुछ आधुनिक इतिहासकारों का मत है कि उसका उद्देश्य व्यक्तिगत अत्याचार नहीं, बल्कि गृहयुद्ध से विघटित गणराज्य में स्थिरता स्थापित करना और सीनेट-प्रधान शासन को पुनर्स्थापित करना था।

इस प्रकार सुल्ला रोमन इतिहास का ऐसा व्यक्तित्व था जिसने असाधारण सैन्य सफलता, राजनीतिक प्रतिभा और कठोर शासन के माध्यम से गणराज्य की दिशा बदल दी। उसकी उपलब्धियाँ और उसकी क्रूरता—दोनों ही उसे प्राचीन रोम के सबसे प्रभावशाली तथा विवादास्पद नेताओं में स्थान दिलाती हैं।

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