चोलकालीन आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन
चोल साम्राज्य दक्षिण भारत के इतिहास में राजनीतिक शक्ति, आर्थिक समृद्धि और सांस्कृतिक वैभव का एक उत्कृष्ट अध्याय है। नौवीं से तेरहवीं शताब्दी के मध्य चोल शासकों ने न केवल एक विशाल और सुदृढ़ साम्राज्य की स्थापना की, बल्कि ऐसी प्रशासनिक, सामाजिक और आर्थिक व्यवस्थाओं का विकास भी किया, जिससे दक्षिण भारत के इतिहास को एक नई दिशा मिली।
इस काल में कृषि, व्यापार, उद्योग तथा समुद्री वाणिज्य के अभूतपूर्व विस्तार से आर्थिक जीवन में समृद्धि आई, जबकि ग्राम सभाओं और स्थानीय संस्थाओं की सक्रियता ने सामाजिक संगठन को सुदृढ़ आधार प्रदान किया, जिससे साहित्य, कला, स्थापत्य, मूर्तिकला और धार्मिक गतिविधियों का आशातीत विकास हुआ। इस प्रकार चोलकालीन समाज, अर्थव्यवस्था और संस्कृति एक-दूसरे से घनिष्ठ रूप से संबद्ध थे तथा साम्राज्य की स्थिरता, समृद्धि और गौरव के प्रमुख आधार थे। यही कारण है कि चोल काल को दक्षिण भारत के इतिहास का स्वर्णिम युग माना जाता है।
आर्थिक जीवन
चोल साम्राज्य की अर्थव्यवस्था अत्यधिक समृद्ध, सुव्यवस्थित और संतुलित थी, जिसका आधार कृषि, व्यापार और सुदृढ़ राजस्व प्रणाली थी। इस काल में राज्य की आय का प्रमुख स्रोत भू-राजस्व और व्यापार कर थे, जिनका उपयोग मंदिरों, सिंचाई व्यवस्था, अस्पतालों और प्रशासनिक संरचनाओं के निर्माण में किया जाता था।
कृषि एवं सिंचाई व्यवस्था
चोल अर्थव्यवस्था का सबसे महत्त्वपूर्ण आधार कृषि थी, जिसे कावेरी नदी घाटी ने उपजाऊ बनाया था। कृषि के विकास हेतु जंगलों को साफ करके कृषि-योग्य भूमि में परिवर्तित किया गया तथा सिंचाई की व्यवस्था के लिए कुएँ खोदने, तालाब (एरि) बनाने से लेकर कावेरी और दूसरी नदियों पर बड़े-बड़े पत्थर के बाँध बनवाए गए। ज़मीन के बड़े हिस्से तक पानी पहुँचाने के लिए नहरें खोदी गईं और उन्नत जल-प्रबंधन के लिए झीलें बनवाई गईं। राजेंद्र प्रथम ने अपनी राजधानी गंगईकोंडचोलपुरम् में ‘चोलगंगम्’ (पोन्नेरी) नामक एक विशाल तालाब बनवाया, जिसे ‘तरल जयस्तंभ’ कहा गया है। इस समय की एक और बड़ी झील कट्टुमन्नारकोइल के निकट ‘वीरनारायणपुरम्’ (वीरानम) जलाशय है, जिसका निर्माण चोल राजकुमार राजादित्य ने अपने पिता परांतक प्रथम की उपाधि ‘वीरनारायण’ के नाम पर करवाया था।
कृषि में मुख्य उपज धान (पैडी) थी, लेकिन कपास, गन्ना, मसाले, नारियल और सुपारी जैसी फसलें भी उगाई जाती थीं। भूमि-मापन की प्रमुख इकाइयाँ कुलि, मा, वेलि, पट्टि तथा पडगम् थीं। भूमि का वर्गीकरण भी किया गया था, जिसमें सामान्य कृषि भूमि के साथ-साथ ब्राह्मणों को दान दी गई भूमि (चतुर्वेदीमंगलम्) और मंदिरों की भूमि (देवदान) प्रमुख थीं। स्वतंत्र किसान वर्ग वेल्लार इस कृषि व्यवस्था की रीढ़ थे।
चोलकालीन भूराजस्व व्यवस्था सुव्यवस्थित थी, जिसका संचालन केंद्रीय राजस्व विभाग द्वारा किया जाता था। सामान्य भूमिकर ‘इरै’ कहलाता था। कृषकों से प्राप्त उपहार अथवा कर को ‘कनिक्कडन’, पट्टेदार कृषकों पर लगाए जाने वाले कर को ‘कुडिमै’ तथा राजा अथवा स्थानीय सरदारों द्वारा लगाए गए अतिरिक्त अधिभार को ‘ओपति’ कहा जाता था। इसके अतिरिक्त सिंचाई-सुविधाओं के रख-रखाव एवं विकास हेतु ‘एरियायम’ नामक विशेष कर भी वसूल किया जाता था।
व्यापार एवं वाणिज्य
चोल काल में व्यापार और वाणिज्य अत्यंत विकसित अवस्था में थे, जो चोल अर्थव्यवस्था के महत्त्वपूर्ण आधार थे। ‘पेरुवळि’ (पेरुवाझि) नामक राजमार्गों तथा संगठित व्यापारी संघों ने आंतरिक व्यापार को प्रोत्साहित किया।
दक्षिण भारत की अनुकूल भौगोलिक स्थिति तथा विस्तृत समुद्री तटरेखा ने चोलों को समुद्री व्यापार के विकास में विशेष लाभ पहुँचाया। चोल शासकों की शक्तिशाली नौसेना ने बंगाल की खाड़ी और हिंद महासागर के प्रमुख व्यापारिक मार्गों पर अपना प्रभाव स्थापित किया, जिसके परिणामस्वरूप चोलों का व्यापारिक संबंध चीन, दक्षिण-पूर्व एशिया, श्रीविजय साम्राज्य, अरब देशों तथा अब्बासी खिलाफत सहित अनेक विदेशी देशों से स्थापित हुआ। चोल जहाज नियमित रूप से बंगाल की खाड़ी, अरब सागर तथा हिंद महासागर के व्यापारिक मार्गों पर संचालित होते थे।
महाबलीपुरम, कावेरीपट्टनम (पुहार), कोरकई, तंजावुर, उरैयूर और कुदंथई जैसे नगर व्यापार के प्रमुख केंद्र थे। कावेरी डेल्टा के पास समुद्र तट पर स्थित कावेरीपूमपट्टिनम एक प्रमुख बंदरगाह शहर था, जिसे टॉलेमी ने ‘खाबेरिस’ के रूप में उल्लेखित किया है। नागपट्टिनम भी एक महत्त्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र था, जहाँ चीन, अरब और दक्षिण-पूर्व एशिया से व्यापारियों का आवागमन होता था। कावेरी डेल्टा के पास से शुरुआती शताब्दियों के रोमन सिक्के मिले हैं, जो अंतरराष्ट्रीय व्यापार के प्रमाण हैं।
इस काल में उच्च गुणवत्ता के सूती एवं रेशमी वस्त्र, धातु-निर्मित वस्तुएँ तथा मिट्टी के उत्कृष्ट बर्तन निर्यात किए जाते थे। इसके अतिरिक्त, मसाले, बहुमूल्य रत्न, मोती, हाथीदाँत, चंदन तथा अन्य विलासिता की वस्तुओं का भी बड़े पैमाने पर निर्यात होता था। बदले में चीन, दक्षिण-पूर्व एशिया तथा पश्चिमी एशिया से विभिन्न प्रकार की विलासिता की वस्तुएँ और अन्य आवश्यक सामग्री आयात की जाती थीं। अरब देशों से अच्छी नस्ल के घोड़ें आयात किए जाते थे।
चोल काल में व्यापार और शहरीकरण के विकास के साथ व्यापारी संघों (गिल्डों) का महत्त्व बढ़ा। व्यापार का संचालन अनेक शक्तिशाली व्यापारी संगठनों द्वारा किया जाता था, जिनमें मणिग्रामम्, अंजुवन्नम्, नानादेशी, वलंजियर तथा अय्यावोलु-500 (ऐनूर्रुवर) प्रमुख थे। ये संगठन केवल व्यापारिक गतिविधियों तक सीमित नहीं थे, बल्कि उत्पादन, बैंकिंग, साख व्यवस्था तथा व्यापार मार्गों की सुरक्षा का कार्य भी करते थे। देश-विदेश के व्यापार में इनकी सक्रिय भूमिका थी और इनका व्यापारिक संपर्क दक्षिण भारत से लेकर दक्षिण-पूर्व एशिया तक से था।
स्थानीय व्यापारिक संस्थाएँ ‘नगरम्’ कहलाती थीं, जो व्यापारिक गतिविधियों का संचालन एवं नियंत्रण करती थीं। व्यापार और वाणिज्य के विस्तार के साथ-साथ किलेबंद व्यापारिक बस्तियों तथा नगरों का भी विकास हुआ।
चोल काल में लेन-देन में वस्तु-विनिमय प्रणाली का प्रचलन बना रहा, जिसमें धान विनिमय के प्रमुख माध्यमों में से एक था। किंतु बड़े लेन-देन के लिए सोने, चाँदी तथा ताँबे के सिक्कों का उपयोग किया जाता था।
उद्योग और हस्तशिल्प
व्यापार के विस्तार के साथ-साथ उद्योग और हस्तशिल्प का भी विकास हुआ, जिसमें वस्त्र निर्माण, धातु उद्योग, जहाज निर्माण तथा शिल्प उद्योग विशेष महत्त्वपूर्ण थे। काँची का रेशम उद्योग अपनी उत्कृष्ट गुणवत्ता के लिए प्रसिद्ध था। मंदिरों में काँस्य-मूर्तियों, धातु-पात्रों और धार्मिक उपकरणों की बढ़ती माँग के कारण धातु उद्योग को पर्याप्त प्रोत्साहन मिला। चोलकालीन काँस्य-प्रतिमाएँ भारतीय मूर्तिकला की सर्वोत्तम उपलब्धियाँ हैं, जिनका प्रसिद्ध उदाहरण नटराज की काँस्य प्रतिमाएँ है।
सिक्के (मुद्राएँ)
मुद्रा प्रणाली भी विकसित थी, जिसमें सोने, चाँदी और ताँबे के विभिन्न मूल्यवर्गों के सिक्के, जैसे कलंजु प्रचलित थे, जिससे व्यापार और वाणिज्य का सुचारू रूप से संचालन संभव हुआ। चोलकालीन मुद्राएँ उस युग की आर्थिक समृद्धि, राजनीतिक शक्ति और व्यापारिक गतिविधियों के महत्त्वपूर्ण प्रमाण हैं।
इस प्रकार चोल साम्राज्य की अर्थव्यवस्था कृषि, व्यापार, उद्योग और मंदिर-केंद्रित व्यवस्था के संतुलन पर आधारित थी, जिसने इसे उस समय की एक अत्यंत समृद्ध और संगठित आर्थिक तंत्र बना दिया।
सामाजिक जीवन
जाति व्यवस्था
चोल काल की सामाजिक व्यवस्था मुख्यतः वर्ण एवं जाति-प्रथा पर आधारित थी। समाज अनेक जातियों और सामाजिक समूहों में विभाजित था तथा प्रत्येक जाति वंशानुगत होने के साथ प्रायः किसी विशिष्ट व्यवसाय से संबद्ध होती थी। ब्राह्मणों और क्षत्रियों को विशेष सामाजिक प्रतिष्ठा एवं विशेषाधिकार प्राप्त थे, जिसके कारण धार्मिक, सामाजिक और प्रशासनिक जीवन में उनका प्रमुख स्थान था।
ब्राह्मण समाज का सर्वाधिक सम्मानित वर्ग था। उनके पास धार्मिक अधिकारों के साथ-साथ पर्याप्त आर्थिक शक्ति भी थी। उन्हें अनेक करों से छूट प्राप्त थी और न्यायिक मामलों में भी उन्हें अपेक्षाकृत कम दंड दिया जाता था। उनका प्रमुख कार्य वेदों का अध्ययन एवं अध्यापन, धार्मिक अनुष्ठानों का संचालन तथा मंदिरों में पुरोहितीय सेवाएँ प्रदान करना था। कुछ ब्राह्मण व्यापारिक गतिविधियों में भी संलग्न थे।
चोल काल में क्षत्रिय संस्थाओं के अपेक्षाकृत कमजोर होने के कारण ब्राह्मणों और प्रमुख कृषक वर्गों के बीच एक प्रकार का सहजीवी संबंध विकसित हुआ। इस सामाजिक-आर्थिक संरचना में नत्तर (नट्टार) स्थानीय भू-स्वामी तथा कृषक अभिजात वर्ग के प्रतिनिधि थे, जो ग्राम प्रशासन और संसाधनों पर नियंत्रण रखते थे। इसके विपरीत, अन्य कृषक समुदाय प्रायः उनके अधीनस्थ अथवा आश्रित स्थिति में रहते थे।
समाज में वैश्य वर्ग का भी अस्तित्व था, जिसमें कमाटी और चेट्टियार जैसे व्यापारी समुदाय प्रमुख थे। शूद्र वर्ग को भी सामाजिक संरचना में स्थान प्राप्त था, जिसे सत् शूद्र और असत् शूद्र में विभाजित किया गया था। सत् शूद्रों में वेल्लाल किसान, सालिया बुनकर और कैक्कोला जैसे वर्ग शामिल थे। यद्यपि जातियों में भेदभाव स्पष्ट था, फिर भी सामाजिक और धार्मिक जीवन में विभिन्न जातियों के बीच सहयोग भी देखने को मिलता था।
चोल काल की सामान्य आर्थिक समृद्धि के परिणामस्वरूप कुछ जातियों की आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ। उत्तरकालीन चोल अभिलेखों में जातियों के दो प्रमुख समूहों-वलंगई (दक्षिणहस्त जातियाँ) तथा इदंगई (वामहस्त जातियाँ) का उल्लेख मिलता है। सीमांत क्षेत्रों से सम्मिलित नई जातियों को प्रायः इन दोनों समूहों में संगठित किया जाता था।
यद्यपि विभिन्न जातियों और उपजातियों के बीच सामाजिक तथा धार्मिक जीवन में सहयोग की भावना विद्यमान थी, फिर भी समाज में असमानता बनी रही। इन समूहों के बीच समय-समय पर संघर्ष भी हुए, जो कुलोतुंग प्रथम के शासनकाल में विशेष रूप से उग्र हो गए थे। चोल शासक इन सामाजिक तनावों का स्थायी समाधान करने में सफल नहीं हुए और उनकी नीतियाँ मुख्यतः सामाजिक संघर्षों को नियंत्रित करने तक ही तक सीमित रहीं।
महिलाओं की स्थिति
इस काल में महिलाओं की स्थिति में कोई विशेष सुधार नहीं हुआ। राजपरिवारों में सतीप्रथा का प्रचलन था। इसी काल में मंदिरों से संबद्ध देवदासी प्रथा को संस्थागत स्वरूप प्राप्त हुआ। देवदासियाँ नृत्य, संगीत और धार्मिक अनुष्ठानों में दक्ष होती थीं तथा मंदिरों की सांस्कृतिक गतिविधियों में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती थीं। प्रारंभ में इस व्यवस्था का उद्देश्य धार्मिक सेवा तथा कला और संस्कृति का संरक्षण था, किंतु समय के साथ यह अपनी मूल भावना से दूर होती गई और इसके कुछ रूप शोषणात्मक बन गए। इसी कारण अनेक इतिहासकार देवदासी व्यवस्था को चोलकालीन समाज की एक विवादास्पद सामाजिक संस्था मानते हैं।
धार्मिक जीवन
छठी से नौवीं शताब्दी ईस्वी के बीच दक्षिण भारत, विशेषकर तमिल प्रदेश में भक्ति आंदोलन का व्यापक प्रसार हुआ, जिसके अंतर्गत शैव और वैष्णव जैसे भक्ति संप्रदायों का व्यापक प्रसार हुआ। इस प्रक्रिया के कारण बौद्ध धर्म का प्रभाव लगभग समाप्त हो गया, यद्यपि जैन धर्म इस क्षेत्र में कुछ सीमा तक बना रहा।
चोल काल में शैव और वैष्णव दोनों संप्रदायों का विकास हुआ, किंतु चोल शासकों ने मुख्यतः शैव धर्म को संरक्षण प्रदान किया और भगवान शिव के अनेक मंदिरों का निर्माण करवाया। आदित्य प्रथम ने कावेरी नदी के तट पर शिव के विशाल मंदिर बनवाए। उसका उत्तराधिकारी परांतक भी शैव था, जो चिदंबरम् स्थित नटराज मंदिर को स्वर्ण आभूषणों से सजाने के कारण प्रसिद्ध था। चोल सम्राट राजाराज प्रथम ने ‘शिवपाद शेखर’ की उपाधि धारण की और तंजौर में भगवान शिव को समर्पित भव्य बृहदीश्वर मंदिर (राजराजेश्वर मंदिर) का निर्माण करवाया। उसके पुत्र तथा उत्तराधिकारी राजेंद्र चोल ने संभवतः गंगा के तटवर्ती प्रदेशों से अनेक शैव संतों को लाकर अपने राज्य में बसाया। चोल नरेश कुलोत्तुंग प्रथम शिव का अनन्य उपासक था और कहा जाता है कि शिव के प्रति अतिशय भक्ति के कारण उसने चिदंबरम् मंदिर में रखी गई गोविंदराज विष्णु की मूर्ति को उखाड़कर समुद्र में फेंकवा दिया था। चोल शासकों ने शैव संतों को ही अपना राजगुरु मनोनीत किया था। राजराज प्रथम तथा राजेंद्र चोल के समय में क्रमशः ईशानशिव और सर्वशिव राजगुरु नियुक्त किए गए थे।

इस काल में शिव की उपासना में भक्ति-गीत लिखे गए, जिन्हें मंदिरों में गाया जाता था। इस समय उत्तर तथा दक्षिण के शैव सिद्धांतों में समन्वय स्थापित हुआ। इसी समय शुद्धशैव संप्रदाय का भी विकास हुआ, जिसे वेल्लाल समुदाय का समर्थन प्राप्त था। इसके साथ ही, कापालिक और कालमुख जैसे शैव संप्रदायों का भी समाज पर प्रभाव था।
चोल काल में वैष्णव परंपरा का भी प्रचार-प्रसार हुआ और शिव के समान विष्णु के सम्मान में भी मंदिर बनवाए गए एवं मठों की स्थापना की गई। कुछ शासकों और वैष्णव संतों के बीच मतभेद भी थे, जैसे कुलोत्तुंग प्रथम रामानुज जैसे वैष्णव संतों के प्रति अनुकूल नहीं थे। किंतु कहा जाता है कि अंतिम आलवार मधुरकवि के शिष्य आचार्य नाथमुनि श्रीरंगम् मंदिर की मूर्ति में प्रवेश कर ईश्वर में समाहित हो गए थे।
यद्यपि चोल काल में शैव एवं वैष्णव धर्मों का व्यापक प्रचार था, तथापि अधिकांश चोल शासक धर्मसहिष्णु थे। इस काल में नागपट्टिनम्, काँची तथा श्रीमूलवासम् में बौद्ध विहार स्थित थे। कुलोत्तुंग प्रथम ने नागपट्टिनम् के विहार को दान भी दिया था।
जैन धर्म को भी चोल शासकों तथा जनता ने संरक्षण प्रदान किया। इस काल में जैन मंदिरों की भूमि के कर माफ कर दिए गए। कहते हैं कि राजराज प्रथम की बहन कुंदवै ने एक ही स्थान पर शैव, वैष्णव तथा जैन मंदिरों का निर्माण करवाया था।
शिक्षा एवं साहित्य
शिक्षा
चोल शासक शिक्षा के महान् संरक्षक थे। शिलालेखों से ज्ञात होता है कि उस समय शिक्षा और साक्षरता का व्यापक प्रसार था। इस काल में मंदिर, मठ और घटिका केवल पूजा के स्थान नहीं थे, बल्कि शिक्षा के भी प्रमुख केंद्र थे, जहाँ छात्रों को विभिन्न विषयों की शिक्षा निःशुल्क प्रदान की जाती थी। हिंदू संतों और आचार्यों द्वारा स्थापित मठों में छात्रों को शिक्षा के साथ-साथ निःशुल्क भोजन और आवास की सुविधा भी दी जाती थी।
इस काल में मंदिरों और मठों के साथ-साथ अनेक शिक्षण संस्थाएँ एवं महाविद्यालय भी स्थापित किए गए। अभिलेखों से पता चलता है कि राजेंद्र प्रथम ने दक्षिण अर्काट जिले के एन्नयिरम में एक वैदिक महाविद्यालय की स्थापना की थी, जिसमें प्रसिद्ध आचार्यों के मार्गदर्शन में वेद, व्याकरण और वेदांत का अध्ययन-अध्यापन होता था। बाद में उसके उत्तराधिकारियों ने भी इस शैक्षिक परंपरा को आगे बढ़ाया, जिसके फलस्वरूप 1048 ई. में पांडिचेरी के निकट त्रिभुवनै तथा 1067 ई. में तिरुमुक्कुडल (चेंगलपट्टु क्षेत्र) में अन्य शिक्षण संस्थानों की स्थापना की गई। अभिलेखीय साक्ष्यों से ज्ञात होता है कि इन शिक्षण-केंद्रों में से एक में 14 आचार्य लगभग 340 विद्यार्थियों को शिक्षा प्रदान करते थे। उच्च शिक्षा के लिए संस्कृत भाषा का प्रयोग अधिक होता था, जबकि सामान्य जन के लिए तमिल भाषा शिक्षा का माध्यम थी।
शिक्षा-केंद्रों के सुचारु संचालन के लिए राज्य द्वारा भूमि-अनुदान और अन्य आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई जाती थी। शिक्षकों को ‘भट्ट’ कहा जाता था, जिन्हें शिक्षण कार्य के पारिश्रमिक के रूप में राजा या मंदिर द्वारा कर-मुक्त भूमि (भट्टवृत्ति) दान दी जाती थी। इस प्रकार चोल काल में शिक्षा व्यवस्था संगठित एवं विकसित स्वरूप में विद्यमान थी।
साहित्य
तमिल साहित्य
चोल राजाओं ने तमिल भाषा एवं साहित्य को प्रोत्साहन दिया, जिसके परिणामस्वरूप तमिल साहित्य का अभूतपूर्व विकास हुआ। चोल अभिलेखों में अनेक साहित्यिक कृतियों का उल्लेख मिलता है, जिनमें ‘राजराजेश्वर नाटकम्’, ‘वीरणुक्कवियम्’ तथा ‘कन्निवन पुराणम्’ प्रमुख हैं।
चोल शासकों ने अनेक तमिल विद्वानों, कवियों और साहित्यकारों को संरक्षण प्रदान किया, जिसके फलस्वरूप तिरुत्तक्कदेवर, तोलामोलि, जयंकोंडार, कल्लादनार, ओट्टाकूत्तर, सेक्किलार, कंबन, पुगलेंदी और अव्वैयार जैसे महान कवियों एवं साहित्यकारों ने महाकाव्य, परणी, कोवै, उला, कलंबकम तथा पिल्लैतमिल जैसी साहित्यिक विधाओं के साथ व्याकरण ग्रंथों, प्रशस्ति-लेखों (मेइक्कीर्ति) तथा ऐतिहासिक एवं धार्मिक साहित्य की रचना की।
प्रारंभिक चोल काल की उत्कृष्ट साहित्यिक कृतियों में तिरुत्तक्कतेवर की ‘जीवक-चिंतामणि’ तथा तोलामोलि की ‘शूलामणि’ विशेष महत्त्वपूर्ण हैं। उत्तरवर्ती चोल काल में साहित्यिक गतिविधियाँ और अधिक समृद्ध हुईं। कुलोत्तुंग प्रथम के राजकवि जयंकोंडार ने ‘कलिंगत्तुप्परणि’ की रचना की, जिसमें कुलोत्तुंग प्रथम के कलिंग अभियान का वर्णन मिलता है। यह रचना इतिहास और काल्पनिक परंपराओं के बीच एक स्पष्ट रेखा खींचती है। इसी काल के प्रसिद्ध कवि ओट्टाकूत्तर ने ‘मूवरुला’ की रचना की, जिसमें विक्रम चोलन उला, कुलोत्तुंग चोलन उला तथा राजराजन उला सम्मिलित हैं। इसके अतिरिक्त उसने कुलोत्तुंग द्वितीय के सम्मान में ‘कुलोत्तुंगन पिल्लैतमिल’ तथा देवी सरस्वती की स्तुति में ‘सरस्वती अंधाधि’ की भी रचना की।
कुलोत्तुंग तृतीय के काल में कवि कंबन ने तमिल में ‘कंब रामायणम्’ (रामावतारम्) की रचना की, जिसकी गणना तमिल साहित्य की सर्वोच्च कृतियों में की जाती है। कंबन की प्रतिभा से प्रभावित होकर कुलोत्तुंग तृतीय ने उसे कंबनाडु नामक क्षेत्र उपहारस्वरूप प्रदान किया और ‘कविचक्रवर्ती’ की उपाधि से सम्मानित किया। ‘सदगोपर अंधाधि’ भी उसकी प्रसिद्ध कृतियों में एक है।
चोलकालीन साहित्य की महत्त्वपूर्ण उपलब्धियों में सेक्किलार द्वारा रचित ‘पेरियपुराणम्’ (तिरुत्तोंडरपुराणम्) का विशेष स्थान है। तमिलों के इस राष्ट्रीय महाकाव्य में 63 ऐसे नयनार संतों के जीवन और कार्यों का वर्णन है, जो समाज के विभिन्न वर्गों-पुरुष और महिला, उच्च और निम्न, शिक्षित और अशिक्षित से संबंधित थे।
इस काल की प्रसिद्ध साहित्यिक रचनाएँ ‘कुलोत्तुंगन कोवै’ तथा ‘तंजैवानन कोवै’ हैं। ‘तेवरम्’ शैव संत तिरुग्नानसंबंदर, अप्पर तथा सुंदरर की भक्ति रचनाओं का महत्त्वपूर्ण संकलन है। इसके अतिरिक्त, चोलकालीन तमिल कवि पुगलेंदि द्वारा रचित ‘नलवेण्बा’ और अव्वैयार द्वारा रचित ‘आत्तिचूड़ी’ तथा ‘कोंड्रै वेंधन’ तमिल साहित्य की प्रसिद्ध नीतिपरक कृतियाँ हैं। ‘नंदिकलम्बगम्’, ‘भरत वेण्बा’ तथा ‘शिवज्ञानबोधम्’ चोलकालीन तमिल साहित्य की प्रमुख कृतियाँ हैं। इसके अतिरिक्त ‘वलयपति’, तथा ‘कुंडलकेशी’ जैसे महत्त्वपूर्ण ग्रंथों की भी प्रतिष्ठा थी।
यद्यपि चोल शासकों ने संस्कृत भाषा को भी संरक्षण प्रदान किया, तथापि इस काल में संस्कृत की मौलिक रचनाएँ अपेक्षाकृत कम हुईं। अधिकांश संस्कृत ग्रंथ प्राचीन रचनाओं पर लिखी गई टीकाएँ और व्याख्याएँ थीं। दूसरी ओर तमिल, तेलुगु और कन्नड़ जैसी द्रविड़ भाषाएँ संस्कृत के प्रभाव में निरंतर विकसित होती रहीं।
व्याकरण ग्रंथ
चोल काल में व्याकरणाचार्य बुद्धमित्र ने तमिल व्याकरण पर ‘वीरचोलियम्’ नामक प्रसिद्ध ग्रंथ की रचना की। यह ग्रंथ केवल व्याकरण तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें युद्ध-संबंधी नैतिक नियमों का भी उल्लेख मिलता है। इस समय प्राचीन तमिल व्याकरण ग्रंथ तोल्काप्पियर के ‘तोल्काप्पियम्’ पर भी अनेक टीकाएँ लिखी गईं। तमिल व्याकरण पर आधारित पवनंदि की रचना ‘नन्नूल’ में व्याकरण की सभी पाँच शाखाओं पर चर्चा की गई है, जो तमिल के सबसे प्रतिष्ठित मानक व्याकरण ग्रंथों में से एक है। इसके साथ ही कल्लादनार का ‘कल्लाडम्’, जैन विद्वान् अमृतसागर का ‘याप्पेरुंगलम्’ और इसका टीकाग्रंथ ‘याप्पेरुंगलक्कारिगै’ भी तमिल भाषा के व्याकरणिक ढाँचे और छंदशास्त्र की दृष्टि से विशेष महत्त्वपूर्ण हैं।
तेलुगु साहित्य
चोल शासकों के संरक्षण में तेलुगु साहित्य का भी विकास हुआ। विशेष रूप से तेलुगु चोड शासकों के काल में तिक्कना, केतना, मरना और पालकुरिकी सोमनाथ ने अपने योगदान से तेलुगु साहित्य को समृद्ध किया। तिक्कना सोमयाजी ने ‘निर्वचनोत्तर रामायणमु’ तथा ‘आंध्र महाभारतमु’ की रचना की। तिक्कना उन ‘कवि-त्रय’ (तीन कवियों) में से एक है, जिन्होंने महाभारत का तेलुगु भाषा में अनुवाद किया। अभिनव दंडी केतना ने ‘दशकुमारचरित्रमु’, ‘विज्ञानेश्वरमु’ तथा ‘आंध्र भाषाभूषणमु’ लिखी। मरना ने ‘मार्कंडेय पुराण’ का तेलुगु रूपांतरण किया, जबकि पालकुरिकी सोमनाथ ने ‘बसव पुराण’ की रचना की।
भक्ति साहित्य के क्षेत्र में आंडार नंबि ने शैव संतों की रचनाओं को संकलित कर ‘तिरुमुरै’ के रूप में व्यवस्थित किया, जिससे शैव भक्ति साहित्य को एक संगठित स्वरूप प्राप्त हुआ। अंतिम आलवार मधुरकवि के शिष्य आचार्य नाथमुनि ने आलवारों के भक्तिगीतों को व्यवस्थित किया और संभवतः ‘न्यायतत्त्व’ की रचना की। संभवतः उत्तरवर्ती चोल काल में वैष्णव साहित्य की रचनाएँ अपेक्षाकृत कम लिखी गईं।
इस प्रकार चोलकाल तमिल और तेलुगु साहित्य के उत्कर्ष का युग था। इस काल में धार्मिक, लौकिक, व्याकरणिक और ऐतिहासिक साहित्य की एक समृद्ध परंपरा विकसित हुई, जिसने दक्षिण भारतीय साहित्य और संस्कृति को स्थायी रूप से प्रभावित किया।
कला एवं स्थापत्य
मंदिर निर्माण
मंदिर निर्माण चोल शासकों की सबसे महत्त्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक था। इस काल में भारत ने वास्तुकला में भव्य पाषाण मंदिरों के साथ ही पत्थर एवं काँस्य की मूर्तिकला में ऐसी निपुणता प्राप्त की, जो पहले कभी नहीं देखी गई थी।
चोल वास्तुकला का विकास पल्लव स्थापत्य परंपरा के आधार पर हुआ, किंतु चोल शासकों ने उसमें अनेक नवीन तत्त्व जोड़कर उसे अधिक भव्य, विशाल और परिपक्व स्वरूप प्रदान किया, जिससे द्रविड़ स्थापत्य कला अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँच गई। चोल शासकों की एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि यह थी कि उन्होंने ईंटों के स्थान पर विशाल पत्थरों, विशेषकर ग्रेनाइट का व्यापक प्रयोग किया, जिसके परिणामस्वरूप उनके द्वारा निर्मित मंदिर अधिक स्थायी, भव्य और कलात्मक बन सके।
मंदिर वास्तु की प्रमुख विशेषताएँ
चोल मंदिर द्रविड़ शैली के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। इन मंदिरों के चारों ओर प्रायः ऊँची दीवारें बनाई जाती थीं, जिनसे मंदिर परिसर को सुरक्षित और विशिष्ट स्वरूप प्राप्त होता था। मंदिर का सबसे महत्त्वपूर्ण भाग गर्भगृह था, जिसके ऊपर ऊँचा विमान निर्मित किया जाता था। चोल विमानों की विशेषता यह थी कि वे अनेक मंजिलों वाले सीधे उठते हुए पिरामिडाकार होते थे। पल्लव काल की तुलना में चोलकाल में विमान अधिक ऊँचे और भव्य बनाए गए। विमान के शीर्ष पर स्थित अष्टकोणीय अथवा गोलाकार भाग को शिखर (शिखरम्) कहा जाता था, जिसके ऊपर कलश स्थापित किया जाता था।
मंदिर के प्रवेशद्वार पर विशाल गोपुरम् निर्मित किए जाते थे। यद्यपि प्रारंभिक चोल काल में विमान की तुलना में गोपुरम् अपेक्षाकृत छोटे थे, परंतु उत्तरवर्ती चोल काल में गोपुरमों का आकार निरंतर बढ़ता गया। गर्भगृह और मंडप के मध्य स्थित भाग को अंतराल (अंतरालम्) कहा जाता था। गर्भगृह की बाहरी दीवारों पर शिव, विष्णु, देवी तथा अन्य देवताओं की सुंदर प्रतिमाएँ उत्कीर्ण की जाती थीं। इसके अतिरिक्त, मंदिरों में विभिन्न प्रकार के मंडप बनाए जाते थे, जिनका उपयोग धार्मिक अनुष्ठानों, सभाओं तथा सांस्कृतिक गतिविधियों के लिए किया जाता था। इन मंडपों के स्तंभों पर सुंदर नक्काशी की जाती थी।
मंदिरों के प्रवेशद्वार पर द्वारपालों की विशाल मूर्तियाँ स्थापित की जाती थीं। मंदिर परिसर में प्रायः एक जलाशय या पुष्करिणी भी बनवाई जाती थी, जो चोल मंदिरों की एक खास विशेषता थी।
कई चोल मंदिर पंचायतन शैली में निर्मित थे, जिनमें एक मुख्य मंदिर के चारों ओर चार सहायक मंदिर बनाए जाते थे। मंदिरों की दीवारों, स्तंभों तथा अधिष्ठान (आधार भाग) पर धार्मिक कथाओं, पुराणों और महाकाव्यों से संबंधित दृश्य उत्कीर्ण किए जाते थे।
चोलकालीन प्रमुख मंदिर
चोल शासकों ने अपनी राजधानी में बहुसंख्यक पाषाण मंदिरों का निर्माण करवाया। प्रारंभिक चोल काल के स्मारकों में विजयालय चोल द्वारा पुडुक्कोट्टै के नार्त्तामलाई में बनवाया गया चोलेश्वर मंदिर है, जिसमें एक वर्गाकार प्राकार के अंतर्गत एक वृत्ताकार गर्भगृह बना हुआ है। प्राकार तथा गर्भगृह के ऊपर विमान है, जो चार मंजिला है और प्रत्येक मंजिल एक-दूसरे के ऊपर क्रमशः छोटा है। नीचे की तीन मंजिलें वर्गाकार तथा सबसे ऊपरी मंजिल गोलाकार हैं, जिसके ऊपर गुंबदाकार शिखर तथा सबसे ऊपरी भाग में गोल कलश है। मुख्य द्वार के दोनों ओर ताखों (आलों) में दो द्वारपालों की मूर्तियाँ उत्कीर्ण हैं।
इस प्रकार का दूसरा मंदिर आदित्य प्रथम द्वारा बनवाया गया कन्ननूर का बालसुब्रह्मण्य मंदिर है, जिसकी छतों के चारों कोनों पर हाथियों की मूर्तियाँ हैं। इसी समय का एक अन्य मंदिर कुंबकोणम् का नागश्वरस्वामी मंदिर है, जो प्रारंभिक चोल वास्तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण है। भगवान शिव को समर्पित इस मंदिर की मुख्य विशेषता इसकी वैज्ञानिक योजना है। तमिल महीने चिथिरै (अप्रैलदृमई) के दौरान सूर्य की किरणें सीधे गर्भगृह तक पहुँचती हैं, जिससे चोल स्थापत्यकारों के खगोल एवं वास्तु संबंधी ज्ञान का परिचय मिलता है। आदित्य प्रथम के ही समय में तिरुक्कट्टलै का सुंदरेश्वर मंदिर भी प्रारंभिक चोल स्थापत्य का एक अन्य महत्त्वपूर्ण उदाहरण है। इस मंदिर का गर्भगृह वर्गाकार है, जिसके ऊपर द्वितल (दो-मंजिला) विमान है। मुख्य मंदिर के चारों ओर सात छोटे उप-मंदिर (परिवार-देवताओं के मंदिर) हैं, जो संभवतः अष्ट-परिवार से संबंधित हैं।
चोल मंदिर निर्माण-कला के विकास के द्वितीय चरण का आरंभ परांतक प्रथम के राज्यकाल में निर्मित श्रीनिवासनल्लूर के कोरंगनाथ (कोरंगनाथर) मंदिर से माना जा सकता है। यह मंदिर लगभग 50 फीट लंबा है। इसका वर्गाकार गर्भगृह 25 फीट का है और सामने की ओर 25×20 फीट के आकार का मंडप है। मंदिर का शिखर 50 फीट ऊँचा है। मंदिर का विमान नागर शैली से प्रभावित द्वितल (दो-मंजिला) है। मंदिर में दक्षिणामूर्ति, भिक्षाटन, वराह आदि की उत्कृष्ट मूर्तियाँ अंकित हैं।
आदित्य प्रथम तथा परांतक प्रथम के काल में निर्मित प्रारंभिक चोल मंदिर अपेक्षाकृत छोटे आकार के थे, किंतु बाद के काल में विशाल और अलंकृत मंदिरों और विहारों के निर्माण करवाए गए, जिनमें तिरुवालिस्वरम् शिव मंदिर (ब्रह्मदेशम्), उत्तर कैलाश मंदिर (मयिलादुथुर) और वैद्यनाथस्वामी मंदिर (तिरुमलवाडी) भी चोलकालीन द्रविड वास्तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण हैं। चोलकालीन कुछ अति विशिष्ठ चोल मंदिरों का विवरण निम्नलिखित है-
बृहदीश्वर मंदिर (तंजावुर)
चोल वास्तुकला की सर्वोच्च उपलब्धि तंजावुर स्थित बृहदीश्वर मंदिर है, जिसे राजराजश्वरम् अथवा पेरिया कोविल भी कहा जाता है। इसका निर्माण सम्राट राजराज प्रथम ने करवाया और यह लगभग 1010 ईस्वी में पूर्ण हुआ था। यह मंदिर चोल साम्राज्य की शक्ति, समृद्धि और स्थापत्य-कौशल का भव्य प्रतीक है।

बृहदीश्वर मंदिर सुव्यवस्थित स्थापत्य योजना के अनुसार पूर्णतः ग्रेनाइट पत्थरों से निर्मित है और द्रविड़ स्थापत्य शैली का उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है। इसका विशाल प्रांगण 500’×250’ के आकार का है, जो चारों ओर से एक ऊँची दीवार से घिरा है। मंदिर का मुख्य आकर्षण गर्भगृह के ऊपर लगभग 60 मीटर से अधिक ऊँचा बना हुआ विशाल विमान है, जो न केवल द्रविड़ शैली की सर्वोत्तम रचना है, अपितु इसे समस्त भारतीय स्थापत्य की कसौटी भी कहा जा सकता है। इसका आधार 82 वर्ग फीट है, जिसके ऊपर तेरह मंजिला पिरामिडाकार शिखर 190 फीट ऊँचा है। मंदिर का गर्भगृह 44 वर्ग फीट का है, जिसमें एक विशाल शिवलिंग स्थापित है, जिसे अब ‘बृहदीश्वर’ कहा जाता है। गर्भगृह के चारों ओर 9 फीट चौड़ा प्रदक्षिणापथ निर्मित है, जिसकी दीवारों पर सुंदर भित्तिचित्र बने हैं। प्रवेशद्वार पर दोनों ओर ताखों में दो द्वारपालों की मूर्तियाँ बनी हैं। मंदिर के बहिर्भाग में विशाल नंदी की एकाश्मक मूर्ति बनी है। मंदिर की दीवारों में बने ताखों में अनेक देवी-देवताओं की मूर्तियाँ बनी हुई हैं। अपनी प्राचीनता, भव्यता तथा कलात्मक सौंदर्य के कारण यह मंदिर यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल है।
गंगैकोंडचोलिश्वरम् मंदिर (गंगैकोंडचोलपुरम्)
गंगैकोंडचोलिश्वरम् शिव मंदिर चोल स्थापत्य का एक अन्य उत्कृष्ट उदाहरण है। इसका निर्माण राजराज के पुत्र राजेंद्र चोल प्रथम ने गंगा अभियान की सफलता के उपलक्ष्य में अपनी नई राजधानी गंगैकोंडचोलपुरम् में करवाया था। यह मंदिर तंजावुर के बृहदीश्वर मंदिर से प्रेरित है, किंतु इसकी स्थापत्य योजना अधिक सौम्य और कलात्मक है।
गंगैकोंडचोलिश्वरम् 340 फीट लंबा तथा 110 फीट चौड़ा है। इसका आठ मंजिला पिरामिडाकार विमान 100 वर्गफीट के आधार पर बना है तथा 186 फीट ऊँचा है। मंदिर का मुख्य प्रवेशद्वार पूर्व की ओर है, जिसके बाद 175× 95 के आकार का महामंडप है। मंडप तथा गर्भगृह को जोड़ते हुए अंतराल बनाया गया है, जिनकी छतें सपाट हैं। अंतराल के उत्तर तथा दक्षिण की ओर दो प्रवेशद्वार बने हैं, जिनसे होकर गर्भगृह में पहुँचा जाता है। मंडप के स्तंभ अलंकृत तथा आकर्षक हैं। मंदिर की दीवारों के आले (ताखे) अनेक सुंदर देवी-देवताओं की मूर्तियों से अलंकृत हैं। यह मंदिर भी यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल है।
ऐरावतेश्वर तथा कंपहारेश्वर मंदिर
बारहवीं शताब्दी में राजराज द्वितीय तथा कुलोत्तुंग तृतीय द्वारा बनवाए गए क्रमशः दारासुरम् का ऐरावतेश्वर मंदिर तथा त्रिभुवनम् का कंपहारेश्वर मंदिर द्रविड़ स्थापत्य कला और मूर्तिकला का अनुपम उदाहरण हैं और यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में सम्मिलित हैं।
इन मंदिरों का निर्माण भी तंजौर मंदिर की योजना पर किया गया है। ऐरावतेश्वर मंदिर में महामंडप के सामने अग्रमंडप बनाए गए हैं, जो पहियेदार रथ की भाँति हैं, जिन्हें हाथी खींच रहे हैं। मंदिर की दीवारों पर शैव, वैष्णव तथा शाक्त परंपराओं से संबंधित मूर्तियाँ अंकित हैं। विशेष रूप से गर्भगृह के आधार भाग पर ‘पेरियपुराणम्’ की कथाओं को लघु मूर्तियों के रूप में प्रदर्शित किया गया है।
कंपहारेश्वर मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। परंपरा के अनुसार शिव ने एक राजा को भय और कंपकंपी से मुक्ति दिलाई थी, इसलिए यह नाम प्रचलित हुआ था। कंपहारेश्वर को त्रिभुवनश्वर भी कहा जाता है। इस मंदिर की योजना भी ऐरावतेश्वर मंदिर के ही समान है। इसमें मूर्तिकारी की अधिकता है, जिसके कारण इसे ‘मूर्तिदीर्घा’ कहा गया है। यह मंदिर उत्तरवर्ती चोल वास्तुकला की विकसित और अलंकृत शैली का उत्कृष्ट उदाहरण है।
चोल काल के प्रमुख मंदिर एवं विहार
| मंदिर | स्थान | निर्माता/शासक |
| विजयालय-चोलेश्वर मंदिर | नर्त्तमलाई | विजयालय चोल |
| बालसुब्रह्मण्य मंदिर | कन्ननूर | आदित्य प्रथम |
| नागेश्वर मंदिर | कुंभकोणम् | आदित्य प्रथम |
| कोरंगनाथ मंदिर | श्रीनिवासनल्लूर | परांतक प्रथम |
| तिरुवालिस्वरम् मंदिर | ब्रह्मदेशम् | राजराज प्रथम |
| उत्तर कैलाश मंदिर | तिरुवादुथुरै | राजराज प्रथम |
| वैद्यनाथस्वामी मंदिर | तिरुमलवाडी | राजराज प्रथम |
| बृहदीश्वर (राजराजेश्वर) मंदिर | तंजावुर | राजराज प्रथम |
| गंगैकोंडचोलिश्वरम् | गंगैकोंडचोलपुरम् | राजेंद्र प्रथम |
| ऐरावतेश्वर मंदिर | दारासुरम् | राजराज द्वितीय |
| कंपहरेश्वर मंदिर | त्रिभुवनम् | कुलोत्तुंग तृतीय |
| चूड़ामणि विहार | नागपट्टिनम् | विजयोत्तुंगवर्मन (श्रीविजय) संरक्षक राजराज प्रथम |
चूड़ामणि विहार (नागपट्टिनम्)
चोलकाल केवल हिंदू मंदिरों तक सीमित नहीं था। नागपट्टिनम् स्थित चूड़ामणि विहार चोलकालीन धार्मिक सहिष्णुता का उत्कृष्ट उदाहरण है। इसका निर्माण श्रीविजय के शासक श्री मार विजयोत्तुंगवर्मन ने राजराज प्रथम के संरक्षण में कराया था। यह बौद्ध विहार दक्षिण भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया के मध्य सांस्कृतिक तथा समुद्री संपर्कों का महत्त्वपूर्ण प्रतीक था।
इस काल में मंदिर केवल धार्मिक उपासना के केंद्र नहीं थे, बल्कि सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक तथा सांस्कृतिक गतिविधियों के भी प्रमुख केंद्र थे। नगरों और व्यापारिक गतिविधियों के विकास के साथ मंदिर स्थानीय अर्थव्यवस्था के केंद्र थे। मंदिरों के पास विशाल भूमि-संपत्तियाँ थीं और वे कृषि, व्यापार तथा विभिन्न शिल्प-उद्योगों के संरक्षण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते थे।
मंदिरों से बड़ी संख्या में लोगों को प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार प्राप्त होता था। कृषक, चरवाहे, शिल्पकार, मूर्तिकार, कांस्य-निर्माता, वास्तुकार, पुजारी, संगीतज्ञ, नर्तक तथा अन्य सेवा-समूह मंदिर व्यवस्था से जुड़े हुए थे। इस प्रकार मंदिर आर्थिक गतिविधियों और सामाजिक कल्याण के महत्त्वपूर्ण केंद्र बन गए थे।
मूर्तिकला
चोलकालीन मूर्तिकला द्रविड़ कला परंपरा की परिपक्व अभिव्यक्ति थी, जो मुख्यतः वास्तुकला की सहायक थी क्योंकि अधिकांश मूर्तियों का उपयोग मंदिरों को अलंकृत करने में किया जाता था। केवल धातु, विशेषकर काँस्य मूर्तियाँ ही स्वतंत्र रूप से निर्मित हुई हैं।
तंजावुर और गंगैकोंडचोलपुरम् के मंदिरों की बाहरी और भीतरी दीवारें, मंडप, स्तंभ तथा गर्भगृह के आसपास विविध देवी-देवताओं, पौराणिक पात्रों तथा धार्मिक कथाओं से संबंधित मूर्तियाँ तत्कालीन शिल्पकला की उत्कृष्टता का प्रमाण हैं। इन मूर्तियों में कलात्मक सौंदर्य, शारीरिक संतुलन, भावाभिव्यक्ति और आध्यात्मिक गरिमा का अद्भुत समन्वय है।
चोल मूर्तिकारों की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने देवताओं को केवल प्रतीकात्मक रूप में नहीं, बल्कि जीवंत मानवीय भावनाओं और गतिशील मुद्राओं के साथ प्रस्तुत किया है। मूर्तियों के चेहरे पर शांति, करुणा, शक्ति और दिव्यता का संतुलित चित्रण मिलता है। शरीर की बनावट, वस्त्रों की रेखाएँ, आभूषणों की सूक्ष्मता तथा अंग-प्रत्यंग की स्वाभाविकता चोल मूर्तिकला को भारतीय कला की श्रेष्ठ परंपराओं में स्थान प्रदान करती है।
काँस्य प्रतिमाएँ
चोलकालीन सर्वाधिक सुंदर काँस्य प्रतिमाएँ नटराज (शिव) की हैं, जो बहुत बड़ी संख्या में मिली हैं। इन मूर्तियों का निर्माण मधुच्छिष्ट-विधि (लॉस्ट वैक्स तकनीक) द्वारा किया जाता था। इस पद्धति में पहले मोम की प्रतिमा बनाई जाती थी, फिर उसे मिट्टी से ढँककर गर्म किया जाता था जिससे मोम पिघलकर निकल जाता था। इसके बाद उस स्थान में पिघली हुई धातु डाली जाती थी। ठंडा होने पर मिट्टी हटाकर अंतिम मूर्ति प्राप्त की जाती थी। इन कांस्य प्रतिमाओं के निर्माण में सामान्यतः पंचलोह नामक मिश्रधातु का प्रयोग किया जाता था। पंचलोह में प्रायः ताँबा, टिन, जस्ता, चाँदी और सोना सम्मिलित होते थे। यह मिश्रधातु प्रतिमाओं को टिकाऊ, चमकदार और कलात्मक रूप से आकर्षक बनाती थी।
नटराज (तिरुभरंगकुलम्)
तिरुचिरापल्ली के तिरुभरंगकुलम् से नटराज की एक विशाल कांस्य प्रतिमा मिली है, जिसे भारतीय कला की सर्वोच्च उपलब्धि माना जाता है। नटराज की प्रतिमा केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं है, बल्कि भारतीय दार्शनिक चिंतन और ब्रह्मांडीय अवधारणाओं की कलात्मक अभिव्यक्ति भी है।
इस प्रतिमा में शिव को ब्रह्मांडीय नर्तक के रूप में दिखाया गया है, जो अपस्मार पुरुष नामक बौने के ऊपर नृत्य कर रहे हैं। यह बौना अज्ञान, अहंकार तथा आध्यात्मिक अंधकार का प्रतीक माना जाता है। शिव का नृत्य ज्ञान की विजय तथा अज्ञान के विनाश का द्योतक है।
नटराज की उड़ती हुई जटाएँ ब्रह्मांडीय ऊर्जा और गतिशीलता को व्यक्त करती हैं। इन जटाओं में गंगा, चंद्रमा तथा अन्य प्रतीकों का भी अंकन मिलता है। शिव के एक कान में पुरुषोचित कुंडल तथा दूसरे कान में स्त्रियोचित कुंडल प्रदर्शित किया गया है, जो उनके अर्धनारीश्वर स्वरूप की ओर संकेत करता है और स्त्री-पुरुष तत्त्वों की एकता का प्रतीक है।
उनकी भुजाओं पर लिपटा सर्प शक्ति और आध्यात्मिक चेतना का प्रतीक माना जाता है। नटराज के चारों ओर निर्मित अग्निमय प्रभामंडल (प्रभा-मंडल) सृष्टि, स्थिति और संहार के अनंत चक्र का प्रतिनिधित्व करता है। इस प्रकार नटराज प्रतिमा भारतीय दर्शन, धर्म और कला का अद्वितीय समन्वय प्रस्तुत करती है।
चित्रकला
वास्तु और मूर्तिकला के साथ-साथ चोलकालीन चित्रकला भी अत्यंत विकसित थी। यद्यपि समय के प्रभाव से अधिकांश चित्र नष्ट हो चुके हैं, फिर भी तंजावुर, नार्थामलै और गंगैकोंडचोलपुरम् जैसे मंदिरों में सुरक्षित भित्तिचित्र तत्कालीन चित्रकला की उच्च गुणवत्ता का प्रमाण हैं।
इस काल के चित्रकारों ने मुख्यतः मंदिरों की दीवारों, मंडपों तथा आंतरिक भागों में सुंदर चित्र बनाए हैं। चित्रकारों ने प्रमुखतः पौराणिक धर्म से संबंधित विषयों को अत्यंत आकर्षक एवं जीवंत शैली में प्रस्तुत किया है। चोल चित्रकार चेहरे के भावों, नेत्रों की अभिव्यक्ति तथा हाथों की मुद्राओं के चित्रण पर विशेष ध्यान देते थे। चित्रों के माध्यम से धार्मिक कथाओं, राजकीय समारोहों तथा सामाजिक जीवन को भी अभिव्यक्त किया जाता था।
चित्रों के प्रमुख विषय शिव, विष्णु, देवी तथा उनके विभिन्न अवतार और पौराणिक प्रसंग हैं। तंजावुर के बृहदीश्वर मंदिर में प्राप्त एक प्रसिद्ध चित्र में सम्राट राजराज को अपने गुरु करुवूर देवर के साथ शिव की पूजा करते हुए प्रदर्शित किया गया है, चोल चित्रकला की उत्कृष्टता का महत्त्वपूर्ण उदाहरण है।
संगीत और नृत्य
चोल शासक संगीत और नृत्य के महान् संरक्षक थे। विशेष रूप से राजराज प्रथम ने मंदिरों में संगीत और नृत्य को संस्थागत रूप प्रदान किया। उसके प्रयासों से शैव संतों द्वारा रचित ‘तेवरम्’ भजनों के गायन की परंपरा को पुनर्जीवित किया गया।
मंदिरों में ओडुवार तथा पडिकम् पडुवार नामक गायक नियुक्त किए जाते थे, जिनका कार्य ‘तिरुमुरै’ के भजनों का गायन करना था। अभिलेखों में ‘विन्नप्पम्-सेइवर’ नामक गायकों का भी उल्लेख मिलता है, जो धार्मिक अवसरों पर स्तुतिगान करते थे।
चोल मंदिर संगीत, नृत्य और नाटक के प्रमुख केंद्र थे। मंदिरों से संबद्ध नर्तकियों को ‘तलिच्चेरी-पेंडुगल’ कहा जाता था। उन्हें संगीत और नृत्य का विशेष प्रशिक्षण दिया जाता था। इनके प्रशिक्षण हेतु संगीतज्ञों तथा नृत्याचार्यों की नियुक्ति की जाती थी।
भगवान शिव के नटराज स्वरूप ने चोलकालीन नृत्य परंपरा को विशेष प्रेरणा प्रदान की। नटराज की अवधारणा तमिल संगीत, नृत्य और नाट्य परंपराओं का केंद्रीय विषय बन गई।
मुद्रा-निर्माण
चोल मुद्राओं पर प्रायः राजवंशीय प्रतीकों का अंकन मिलता है। इनमें बाघ (चोलों का राजचिह्न), दो मछलियाँ (पांड्य प्रतीक) तथा धनुष (चेर प्रतीक) प्रमुख हैं। इन प्रतीकों का संयुक्त प्रयोग चोल शासकों की दक्षिण भारत पर प्रभुता का प्रतीक माना जाता है।
उत्तम चोल द्वारा जारी चाँदी की मुद्राओं पर एक ओर राजवंशीय चिह्न तथा दूसरी ओर नागरी लिपि में उसका नाम अंकित है। राजराज प्रथम की मुद्राओं पर एक ओर खड़े हुए राजा तथा दूसरी ओर बैठी हुई देवी की आकृति उत्कीर्ण की गई है। इन मुद्राओं पर संस्कृत भाषा के लेख भी मिलते हैं। राजेंद्र प्रथम के सिक्कों पर बाघ और मछली के चिह्नों के साथ ‘श्री राजेंद्र’ अथवा ‘गंगैकोंडचोल’ अंकित मिलता है।
इस प्रकार चोल काल मंदिर स्थापत्य, मूर्तिकला, चित्रकला, संगीत, नृत्य और मुद्रा-कला के क्षेत्र में दक्षिण भारतीय सांस्कृतिक परंपरा के उत्कर्ष का प्रतिनिधित्व करता है। विशेष रूप से कांस्य नटराज प्रतिमाएँ भारतीय कला की अमूल्य धरोहर हैं। चोल कलाकारों ने धर्म, दर्शन और सौंदर्यबोध का ऐसा समन्वय प्रस्तुत किया, जिसने भारतीय कला को विश्वस्तरीय प्रतिष्ठा प्रदान की। यही कारण है कि चोलकाल की गणना भारतीय सांस्कृतिक इतिहास के सबसे रचनात्मक और कलात्मक युगों में की जाती है।
विदेशों में भारतीय संस्कृति का प्रसार
भारत का प्राचीन काल से ही विभिन्न देशों के साथ व्यापारिक और सांस्कृतिक संबंध रहा है। इन्हीं संपर्कों के माध्यम से भारतीय भाषाएँ, धर्म, दर्शन, कला, स्थापत्य, रीति-रिवाज और सामाजिक परंपराएँ दक्षिण-पूर्व एशिया सहित एशिया के अनेक देशों में प्रसारित हुईं। आज भी दक्षिण-पूर्व एशिया के कई देशों में भारतीय, विशेषकर दक्षिण भारतीय संस्कृति के स्पष्ट प्रभाव देखे जा सकते हैं।
चोलों ने कूटनीति, व्यापार और सैन्य शक्ति के माध्यम से एशिया के विभिन्न क्षेत्रों के साथ घनिष्ठ संबंध स्थापित किए, जिससे सांस्कृतिक प्रसार को विशेष गति प्रदान की। कदारम (केदाह, मलेशिया) तथा श्रीविजय पर चोलों की विजय और चीन के साथ उनके निरंतर व्यापारिक संबंधों ने दक्षिण-पूर्व एशिया में चोल प्रभाव के विस्तार में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इन समुद्री संपर्कों और व्यापारिक गतिविधियों के परिणामस्वरूप सुमात्रा, जावा, मलय प्रायद्वीप, कंबोडिया, थाईलैंड और अन्य दक्षिण-पूर्व एशियाई क्षेत्रों में भारतीय संस्कृति के अनेक तत्त्वों का प्रसार हुआ। वहाँ की कला, वास्तुकला, धर्म, साहित्य और सामाजिक परंपराओं पर भारतीय प्रभाव आज भी स्पष्ट रूप से देखे जा सकते हैं।
मलेशिया में चोलों की स्मृति दीर्घकाल तक विद्यमान रही क्योंकि वहाँ के कुछ राजपरिवारों में ऐसे नाम प्रचलित थे, जिनका संबंध ‘चोल’ अथवा ‘चुलन’ से जोड़ा जाता है। पेराक के प्रसिद्ध शासक राजा ‘चुलन’ का नाम इस परंपरा का उदाहरण है। इससे यह स्पष्ट है कि चोल साम्राज्य का प्रभाव केवल राजनीतिक और व्यापारिक क्षेत्र तक सीमित नहीं था, बल्कि उसने दक्षिण-पूर्व एशिया की सांस्कृतिक चेतना और ऐतिहासिक स्मृति पर भी स्थायी प्रभाव छोड़ा है।
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