चोल प्रशासन (Chola Administration)

चोल प्रशासन (Chola Administration)

सुदूर दक्षिण भारत के इतिहास में चोल केवल एक विशाल साम्राज्य के संस्थापक और शासक ही नहीं थे, बल्कि वे एक सुव्यवस्थित, सुदृढ़ तथा आदर्श प्रशासनिक व्यवस्था के निर्माता भी थे। दक्षिण भारत में चोल साम्राज्य की दीर्घकालिक स्थिरता का प्रमुख आधार उसका सुनियोजित शासन-तंत्र था और इसी सुव्यवस्थित प्रशासन के कारण साम्राज्य में शांति, सुरक्षा तथा आर्थिक समृद्धि बनी रही, जिसके फलस्वरूप चोल संस्कृति, कला, साहित्य, स्थापत्य और व्यापार का अभूतपूर्व विकास हुआ।

चोल प्रशासन के अध्ययन का मुख्य आधार उनके अभिलेख, साहित्यिक ग्रंथ तथा विदेशी यात्रियों के वृत्तांत हैं। इनमें अभिलेख सर्वाधिक विश्वसनीय और प्रामाणिक स्रोत हैं, क्योंकि जिनसे तत्कालीन प्रशासनिक व्यवस्था, राजस्व प्रणाली, स्थानीय स्वशासन तथा शासन-संगठन के बारे में प्रत्यक्ष सूचना मिलती है। स्थानीय स्वशासन की जानकारी की दृष्टि से उत्तरमेरूर के शिलालेख विशेष महत्त्वपूर्ण हैं।

साहित्यिक स्रोतों से भी उपयोगी सूचनाएँ प्राप्त होती हैं, यद्यपि उनकी ऐतिहासिकता का मूल्यांकन सावधानीपूर्वक करना पड़ता है। इसी प्रकार दक्षिण भारत की यात्रा करने वाले विदेशी यात्रियों के विवरणों से भी तत्कालीन समाज और शासन के संबंध में कुछ जानकारी प्राप्त होती है, किंतु प्रशासनिक संस्थाओं का विस्तृत विवरण नहीं मिलता है।

मुद्राशास्त्रीय प्रमाण सामान्यतः प्राचीन राजवंशों के इतिहास और संस्कृति के पुनर्निर्माण में सहायक होते हैं, किंतु चोलों के संदर्भ में इनका योगदान अपेक्षाकृत सीमित है क्योंकि चोल सिक्के अपेक्षाकृत कम संख्या में प्राप्त हुए हैं। इसलिए चोल प्रशासन के पुनर्निर्माण में अभिलेखीय साक्ष्यों का महत्त्व सर्वाधिक माना जाता है।

यद्यपि चोल शासन-प्रणाली दक्षिण भारत की समकालीन राजनीतिक परंपराओं से पूर्णतः भिन्न नहीं थी, फिर भी चोल प्रशासन का भारतीय इतिहास की विकसित प्रशासनिक व्यवस्थाओं में एक विशिष्ट स्थान है। चोल प्रशासन को मुख्यतः तीन भागों में बाँटा जा सकता है : केंद्रीय प्रशासन, प्रांतीय प्रशासन और स्थानीय प्रशासन। तंजौर चोलों की राजधानी थी। चोलों की कुशल प्रशासनिक प्रणाली की अनेक इतिहासकारों और शासकों ने प्रशंसा की है।

केंद्रीय प्रशासन

चोल साम्राज्य में केंद्रीय प्रशासन का स्वरूप राजतंत्रात्मक था, जिसमें राजा को सर्वोच्च एवं सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त था। वह अपनी सार्वभौमिक सत्ता को व्यक्त करने के लिए विभिन्न गौरवपूर्ण उपाधियों का प्रयोग करता था। राज्य के विस्तार तथा प्रशासन की निगरानी के लिए राजा समय-समय पर राज्य का दौरा करता था। प्रशासन संचालन में मंत्रियों और अधिकारियों की एक परिषद् राजा की सहायता करती थी। उच्च अधिकारियों को ‘पेरुंतारम’ तथा निम्न अधिकारियों को ‘सिरुंतारम’ कहा जाता था। चोल राजाओं का शाही चिह्न बाघ था।

चोल राजाओं की प्रतिष्ठा इतनी अधिक थी कि उनके नाम पर मंदिरों, नगरों तथा देवप्रतिमाओं का नामकरण किया जाता था। चोल राजाओं और रानियों को ईश्वर का प्रतिनिधि माना जाता था और उनकी मूर्तियाँ मंदिरों में स्थापित की जाती थीं। उदाहरणार्थ, तंजावूर के मंदिर में सुंदर चोल (परांतक द्वितीय) की प्रतिमा स्थापित थी, जिसकी पूजा-व्यवस्था उसकी पुत्री कुंदवै ने करवाई थी। इसी प्रकार तंजावूर और कालहस्ती के मंदिरों में राजेंद्र चोल तथा चोल महादेवी की प्रतिमाएँ प्रतिष्ठित थीं।

चोल प्रशासन में राजा की स्थिति निर्विवाद, सर्वोच्च और सर्वाधिकार-संपन्न थी। विधि, प्रशासन और न्याय का अंतिम स्रोत राजा ही था, तथापि चोल शासक सामान्यतः निरंकुश नहीं थे। वे स्वयं को प्रजा का संरक्षक मानते थे और लोककल्याण को राजधर्म का अनिवार्य अंग समझते थे। इसलिए उन्होंने प्रजाहित, धर्म, सिंचाई, कृषि तथा सार्वजनिक निर्माण कार्यों में विशेष रुचि दिखाई।

राजपद

चोल साम्राज्य में राजपद सामान्यतः वंशानुगत था और राजा के पश्चात् उसका पुत्र उत्तराधिकारी होता था। उत्तराधिकारी को ‘युवराज’ कहा जाता था। कभी-कभी शासक अपने जीवनकाल में ही राजपरिवार के योग्यतम् सदस्य को युवराज नियुक्त कर देता था, चाहे वह उसका ज्येष्ठ पुत्र हो अथवा किसी अन्य शाखा का राजकुमार।

सामान्यतः उत्तराधिकार की व्यवस्था सफल रही, फिर भी चोल इतिहास में उत्तराधिकार को लेकर अनेक विवाद और राजनीतिक षड्यंत्र की सूचना मिलती है। आदित्य द्वितीय की हत्या को भी कुछ इतिहासकार उत्तराधिकार-संघर्ष से जोड़ते हैं, यद्यपि इस विषय में निश्चित रूप से कुछ कहना कठिन है।

युवराज प्रशासन का महत्त्वपूर्ण अंग था। वह सैन्य अभियानों का नेतृत्व करता था तथा राजा की अनुपस्थिति में शासन-कार्य का संचालन भी करता था। कई बार युवराज को सह-शासक के रूप में भी अधिकार प्रदान कर दिए जाते थे। यही कारण है कि कुछ परवर्ती चोल शासकों के अभिलेखों में उनके शासनकाल की गणना युवराजकाल से ही की गई है। कुछ अभिलेखों से यह भी ज्ञात होता है कि कभी-कभार सह-शासक स्वतंत्र रूप से भी प्रशासनिक अधिकारों का प्रयोग करते थे।

राजकीय जीवन

चोल राजाओं का जीवन वैभव, प्रतिष्ठा और राजसी ऐश्वर्य से परिपूर्ण था। राजमहलों में अनेक प्रकार के सेवक, परिचारक तथा अंगरक्षक नियुक्त रहते थे। राजा के व्यक्तिगत अंगरक्षकों को ‘तिरुमेयकाप्पार’ कहा जाता था। इसके साथ ही राजा और राजपरिवार के प्रति एक अत्यंत निष्ठावान अंगरक्षक-सैनिकों का दल भी था, जिसे ‘वेलाइक्करार’ कहते थे।

स्नानागार, भोजनालय तथा राजमहल के अन्य विभागों की देखरेख में स्त्रियों की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। राजमहल में ‘वेलम’ नामक सेवक वर्ग का उल्लेख मिलता है। इनमें युद्धबंदी पुरुष और स्त्रियाँ भी सम्मिलित थे।

तेरहवीं शताब्दी के चीनी लेखक झाओ रुगुआ के विवरण से ज्ञात होता है कि राजकीय समारोहों और विशेष अवसरों पर राजकुमार, मंत्री तथा उच्च अधिकारी राजा के प्रति सम्मान प्रकट करते थे। इन अवसरों पर संगीत, नृत्य और अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता था। चोल शासक कला और संगीत के संरक्षक थे, इसलिए दरबार में नर्तकियों और संगीतज्ञों की भी व्यवस्था रहती थी।

लोकोपकारी एवं धार्मिक कार्य

यद्यपि चोल शासक भव्य जीवन व्यतीत करते थे, तथापि वे राजधर्म और लोककल्याण के प्रति अत्यंत सजग थे। सार्वजनिक हित को शासन का मूल उद्देश्य माना जाता था। सिंचाई, कृषि-विस्तार, जलाशयों के निर्माण, मंदिरों के संरक्षण, पाठशालाओं और चिकित्सालयों की स्थापना जैसे कार्यों में राज्य सक्रिय भूमिका निभाता था।

राजा के अतिरिक्त रानियाँ, राजकुमार, मंत्री, अधिकारी तथा धनी व्यापारी भी लोककल्याण के कार्यों में योगदान देते थे। उदाहरणस्वरूप, कुलोत्तुंग तृतीय के शासनकाल में भीषण अकाल के दौरान राहत कार्यों के लिए नए तालाबों तथा तटबंधों का निर्माण कराया गया और श्रमिकों को धान, स्वर्ण तथा अन्य वस्तुओं के रूप में पारिश्रमिक दिया गया।

चोल काल में वैदिक यज्ञों की अपेक्षा दान और धार्मिक संस्थाओं के संरक्षण को अधिक महत्त्व दिया गया। अश्वमेध यज्ञ का उल्लेख विरले ही मिलता है। इसके विपरीत मंदिरों को भूमि-दान, अग्रहार तथा अन्य प्रकार की सहायता नियमित रूप से प्रदान की जाती थी। ब्राह्मणों को दिए गए दान-ग्रामों को प्रायः ‘चतुर्वेदिमंगलम्’ कहा जाता था।

चोल शासक मुख्यतः शैव धर्म के अनुयायी थे। उनके धार्मिक जीवन में राजगुरुओं की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। ईशान शिव, शर्वशिव, गुरुदेवर, उदैयार तथा स्वामिदेवर जैसे राजगुरुओं का उल्लेख अभिलेखों में मिलता है। धार्मिक मामलों में राजा प्रायः उनकी सलाह का सम्मान करता था। कुलोत्तुंग तृतीय और उसके राजगुरु स्वामिदेवर से संबंधित प्रसंग इस तथ्य की पुष्टि करता है कि धार्मिक संस्थाओं के प्रशासन में राजगुरुओं का प्रभाव था।

राजस्व व्यवस्था

प्राचीन भारतीय राजनीतिक चिंतन में राजकोष को राज्य की शक्ति, स्थिरता और प्रशासनिक दक्षता का आधार माना गया है। कौटिल्य  ने अर्थशास्त्र में स्पष्ट कहा है कि राज्य के समस्त कार्य कोष पर निर्भर करते हैं, इसलिए राजा का प्रमुख दायित्व एक सुदृढ़ राजकोष की स्थापना और संरक्षण करना है। इसी प्रकार कामंदक ने भी अपनी कृति नीतिसार में राजशक्ति का आधार कोष को बताया है। इन सिद्धांतों के आधार पर चोल शासकों ने एक संगठित, विस्तृत और प्रभावी राजस्व-व्यवस्था का विकास किया, जिसने उनके विशाल साम्राज्य की प्रशासनिक और सैन्य शक्ति को सुदृढ़ आधार प्रदान किया।

कर-व्यवस्था

चोल काल में राज्य की आय के विभिन्न स्रोत थे, जिनमें भूमिकर, गृहकर, व्यापारिक कर, चुंगी, सीमाशुल्क, व्यावसायिक कर, खानों की आय, वनसंपदा, नमक उत्पादन, विविध उपकर तथा बेगार प्रमुख थे। इसके अतिरिक्त, स्थानीय सभाएँ और ग्राम संगठन भी अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए पृथक् कर एवं चंदे वसूल करते थे। चोल अभिलेखों में करों के लिए इरै, कडमै, कुडिमै, आयम्, दंडम्, शित्तायम् तथा शिल्लिरै जैसे अनेक शब्दों का प्रयोग मिलता है, जिससे स्पष्ट होता है कि राजस्व-व्यवस्था अत्यंत विकसित और बहुआयामी थी।

भूमिकर

भूमिकर चोल राज्य की आय का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण स्रोत था। भूमिकर के निर्धारण के लिए समय-समय पर भूमि का सर्वेक्षण, मापन और वर्गीकरण कराया जाता था, जिससे भूमि के वास्तविक क्षेत्रफल, उत्पादकता तथा स्वामित्व का सही आकलन किया जाता था। राजराज प्रथम के शासनकाल में व्यापक भूमि-सर्वेक्षण कराया गया था और बाद के शासकों ने भी इस परंपरा को जारी रखा। कुलोत्तुंग प्रथम के समय दो बार भूमि-मापन कराकर राजस्व अभिलेखों को अद्यतन किया गया था।

1184 ई. के तंजावूर क्षेत्र के एक अभिलेख से ज्ञात होता है कि समय के साथ सरकारी अभिलेखों और वास्तविक भूमि-स्वामित्व में पर्याप्त अंतर उत्पन्न हो गया था। कुछ व्यक्तियों ने सार्वजनिक भूमि पर अतिक्रमण कर लिया था, अनेक परिवर्तन अभिलेखों में दर्ज नहीं किए गए थे तथा नदियों की धारा बदलने से भूमि की प्रकृति भी परिवर्तित हो गई थी। इसलिए पुनः सर्वेक्षण करके ग्राम-सीमाओं, मंदिरों की भूमि तथा विभिन्न वर्गों को प्राप्त भूमि का विस्तृत विवरण तैयार किया गया।

भूमिकर निर्धारण में भूमि की उर्वरता, सिंचाई की उपलब्धता तथा उसकी उत्पादकता को विशेष महत्त्व दिया जाता था। चोल राजाओं ने सिंचाई के लिए तालाबों और नहरों का निर्माण करवाया, जिससे कृषि को भारी प्रोत्साहन मिला।

अभिलेखों से ज्ञात होता है कि करयोग्य भूमि की कई श्रेणियाँ थीं और उनकी कर की दरें भी भिन्न थीं। कुछ क्षेत्रों में प्रति वेलि भूमि पर 28 कलम धान कर के रूप में वसूल किया जाता था, जबकि अन्य क्षेत्रों में यह मात्रा 19 कलम थी। सामान्यतः भूमि की उपज का 1/6 भाग कर के रूप में नकद, वस्तु अथवा दोनों रूपों में लिया जाता था, किंतु विभिन्न क्षेत्रों और परिस्थितियों के अनुसार इसमें परिवर्तन संभव था।

करमुक्त भूमि : इरैयिल और नींगल भूमि

चोलकालीन गाँवों में कुछ भूमियाँ करमुक्त थीं, जिन्हें ‘इरैयिल’ कहा जाता था। राजराज प्रथम के अभिलेखों से ज्ञात होता है कि मंदिर, तालाब, नहरें, श्मशान, परैच्चेरी (अंत्यजों की बस्ती) तथा कम्माणच्चेरी (शिल्पकारों की बस्ती) जैसी भूमि से कर नहीं लिया जाता था। इसके अतिरिक्त नाई, कुम्हार, लुहार, बढ़ई, स्वर्णकार और धोबी जैसे समुदायों को भी कुछ करमुक्त भूमि प्रदान की जाती थी।

जहाँ इरैयिल भूमि पर कोई कर नहीं लगाया जाता था, वहीं नींगल भूमि से प्राप्त कर को राजकोष में न जमा करके किसी विशेष संस्था, जैसे मंदिर या ब्राह्मण-सभा को दे दिया जाता था।

चोल अभिलेखों में भूमिकर के अतिरिक्त अनेक प्रकार के करों का उल्लेख मिलता है। राज्य द्वारा सीमाशुल्क, चुंगी, खदानों, बंदरगाहों, वनों तथा नमक-उत्पादन से संबंधित कर भी वसूले जाते थे। इसके अतिरिक्त गृहकर, व्यापारिक कर तथा विभिन्न व्यवसायों पर लगाए जाने वाले कर राजस्व के महत्त्वपूर्ण स्रोत थे। मरमंजाडि उपयोगी वृक्षों पर लगाया जाने वाला कर था, जबकि पाडिकावल ग्राम रक्षा अथवा चौकीदारी शुल्क के रूप में लिया जाता था। किडाकुकाशु पशुओं पर लगाया जाने वाला कर था। वासल्तिरमम् द्वार-कर, मनैइरै गृहकर तथा कडैइरै दुकानकर के रूप में वसूल किए जाते थे। इसी प्रकार मगन्मै शिल्पियों और कारीगरों पर लगाया जाने वाला कर था, जबकि मीन्पाट्टम् मत्स्य व्यवसाय से संबंधित कर था। इन विविध करों से स्पष्ट है कि समाज पर करों का बोझ अधिक था।

स्थानीय कर एवं उपकर

राजकीय करों के अतिरिक्त स्थानीय सभाएँ भी सार्वजनिक कार्यों, धार्मिक गतिविधियों तथा सामुदायिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए विभिन्न प्रकार के उपकर और चंदे वसूल करती थीं। विवाह के अवसर पर वर एवं वधू पक्ष से शुल्क लिया जाता था। पशुपालकों, व्यापारियों, मजदूरों, पुष्प-उत्पादकों तथा बाहरी क्षेत्रों से आने वाले व्यापारियों पर भी कर लगाए जाते थे। इनका भुगतान नकद, वस्तु अथवा पशुओं के रूप में किया जा सकता था।

करों की वसूली मुख्यतः ग्राम सभाओं तथा स्थानीय संस्थाओं द्वारा की जाती थी, किंतु इस पूरी व्यवस्था पर राज्य का नियंत्रण रहता था। कर न देने वाले व्यक्तियों की भूमि नीलाम की जा सकती थी अथवा उनकी संपत्ति कुर्क की जा सकती थी। कुछ अभिलेखों से ज्ञात होता है कि करदाताओं को कभी-कभी कर चुकाने के लिए ऋण तक लेना पड़ता था।

महेंद्रमंगलम् के एक अभिलेख में उल्लेख मिलता है कि कुछ अधिकारियों ने कर-वसूली के लिए लोगों को शारीरिक यातनाएँ दीं, जिसकी शिकायत बाद में राजा से की गई। राजेंद्र द्वितीय के काल के एक अभिलेख में एक महिला का उल्लेख मिलता है, जिसने अतिरिक्त कर देने से इनकार कर दिया। अधिकारियों के कठोर व्यवहार से व्यथित होकर उसने आत्महत्या कर ली, जिसके बाद संबंधित अधिकारी को दंडित किया गया।

परवर्ती चोल काल में केंद्रीय सत्ता के कमजोर पड़ने पर कुछ स्थानीय अधिकारियों ने परंपरा-विरुद्ध कर लगाने प्रारंभ कर दिए। 1213 ई. के एक अभिलेख से ज्ञात होता है कि यादवराय नामक स्थानीय शासक ने नए कर आरोपित किए तथा कर-वसूली के लिए ग्राम सभाओं के सदस्यों को बंदी बना लिया। अंततः सभा को कर चुकाने के लिए अपनी 80 वेलि भूमि बेचनी पड़ी।

इन घटनाओं से स्पष्ट है कि चोल राजस्व-व्यवस्था अत्यंत संगठित और प्रभावी थी, किंतु कई अवसरों पर इसकी कठोरता जनता के लिए कष्टदायक भी सिद्ध होती थी। फिर भी, उपलब्ध स्रोतों से स्पष्ट है कि जनता अनुचित करों का विरोध करती थी और कुछ अवसरों पर कर की दरों में कमी कराने में सफल भी हुई।

राजस्व का व्यय

राज्य द्वारा संकलित राजस्व का उपयोग प्रशासन, सेना, सार्वजनिक निर्माण और राजपरिवार के व्यय के लिए किया जाता था। अधिकारियों और कर्मचारियों के वेतन, सेना तथा नौसेना के रख-रखाव, सड़कों, तालाबों, नहरों, पुलों, राजप्रासादों तथा नगरों के विकास पर पर्याप्त धन व्यय किया जाता था।

सिंचाई-व्यवस्था, जलाशयों का निर्माण, मंदिरों का संरक्षण, शैक्षणिक संस्थाओं और चिकित्सालयों की सहायता तथा धार्मिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों का पोषण भी राजकीय व्यय के महत्त्वपूर्ण क्षेत्र थे। राजदरबार, अंतःपुर, राजपरिवार तथा शाही समारोहों का व्यय भी इसी आय से पूरा किया जाता था।

इस प्रकार चोलकालीन कर-व्यवस्था केवल राजस्व-संग्रह का साधन नहीं थी, बल्कि वह साम्राज्य की प्रशासनिक, आर्थिक और सांस्कृतिक संरचना को बनाए रखने का प्रमुख आधार भी थी।

न्याय व्यवस्था एवं दंड-विधान

प्राचीन भारतीय राजनीतिक चिंतन में न्याय को राजधर्म का एक अनिवार्य अंग माना गया है। चोल शासकों ने भी न्याय-व्यवस्था को शासन का महत्त्वपूर्ण आधार माना और एक सुव्यवस्थित न्यायिक प्रणाली विकसित की। यद्यपि न्याय का अंतिम स्रोत राजा था और गंभीर अपराधों तथा  बड़े मामलों की सुनवाई स्वयं करता था, फिर भी व्यवहार में अधिकांश न्यायिक कार्य स्थानीय संस्थाओं द्वारा संपन्न किए जाते थे। ग्राम सभाएँ, नगर-सभाएँ, व्यापारिक संघ तथा अन्य स्थानीय निकाय अपने-अपने अधिकार क्षेत्र के विवादों का साक्ष्यों के आधार पर निपटारा करते थे। स्थानीय विवादों के समाधान में ग्राम सभाओं को पर्याप्त न्यायिक अधिकार प्राप्त थे।

न्याय

न्यायिक कार्यों के संचालन के लिए विशेष समितियों का गठन किया जाता था, जिन्हें ‘न्यायत्तार’ कहा जाता था। अनेक अभिलेखों में ‘धर्मासन’ का उल्लेख मिलता है, जो राजा के सर्वोच्च न्यायालय अथवा राजकीय न्यायपीठ का द्योतक था। जटिल मामलों में धर्मशास्त्रों के विद्वानों से परामर्श लिया जाता था। ऐसे विद्वानों को अभिलेखों में ‘धर्मासन भट्ट’ कहा गया है। सामान्यतः अधिकांश विवाद स्थानीय स्तर पर ही सुलझा लिए जाते थे। यदि कोई पक्ष ग्राम सभा के निर्णय से असंतुष्ट होता था, तो वह मामले को नाडु स्तर के अधिकारियों के समक्ष प्रस्तुत कर सकता था। वहाँ भी समाधान न होने पर अंतिम अपील राजा के पास की जा सकती थी, यद्यपि ऐसे मामलों की संख्या अपेक्षाकृत कम थी।

चोल अभिलेखों में न्यायालयों की कार्यवाही का विस्तृत विवरण नहीं मिलता, किंतु उपलब्ध स्रोतों से न्यायिक प्रक्रिया की कुछ प्रमुख विशेषताओं का ज्ञान होता है। इस संदर्भ में शैव संत सुंदरमूर्ति नायनार से संबंधित कथा विशेष रूप से उल्लेखनीय है, जिसका वर्णन पेरियपुराणम् में मिलता है। कथा के अनुसार एक वृद्ध ब्राह्मण ने सुंदरमूर्ति को अपना दास बताते हुए न्यायालय में दावा प्रस्तुत किया। न्यायालय ने दोनों पक्षों की बातें सुनने के बाद प्रमाण प्रस्तुत करने का आदेश दिया। वादी द्वारा प्रस्तुत लिखित दस्तावेज की लिपि, हस्ताक्षरों, गवाहों तथा प्रामाणिकता की सावधानीपूर्वक जाँच की गई। अभिलेखागार में सुरक्षित प्रतियों से उसकी तुलना की गई और तत्पश्चात् निर्णय सुनाया गया।

यद्यपि यह विवरण धार्मिक साहित्य का अंग है, फिर भी इससे चोलकालीन न्याय-प्रक्रिया की कुछ महत्त्वपूर्ण विशेषताएँ स्पष्ट होती हैं। वादी और प्रतिवादी स्वयं अपना पक्ष प्रस्तुत करते थे। लिखित दस्तावेजों और अभिलेखों को अत्यधिक महत्त्व दिया जाता था। साक्ष्य, गवाह, स्थानीय परंपराएँ तथा व्यवहारिक परिस्थितियाँ न्यायिक निर्णय का आधार होती थीं। इस प्रकार न्यायिक प्रक्रिया में प्रमाण और स्थानीय प्रथाओं दोनों को महत्त्व प्राप्त था।

कभी-कभी विवाद लंबे समय तक चलते रहते थे। उदाहरणस्वरूप, श्रीकंठचतुर्वेदिमंगलम् की सभा और तिरुवैराम्बियूर के ऊर के मध्य सीमा-विवाद लंबे समय तक बना रहा। अंततः राजा ने हस्तक्षेप करते हुए विवादित भूमि दोनों पक्षों से खरीद कर एक मंदिर को दान कर दिया और  विवाद का स्थायी समाधान किया।

चोलकालीन अभिलेखों से ज्ञात होता है कि दंड व्यवस्था में आर्थिक दंड, क्षतिपूर्ति तथा धार्मिक प्रायश्चित्त को विशेष महत्त्व दिया जाता था। अनेक मामलों में हत्या जैसे गंभीर अपराधों के लिए भी अपराधियों को मंदिरों में दीपदान करने, पशुदान करने अथवा धनराशि जमा कराने का आदेश दिया गया। एक अभिलेख में सेनापति की हत्या के अपराधी को मंदिर में दीप प्-ज्वलन हेतु छियानबे भेड़ें दान करने का आदेश दिए जाने का उल्लेख मिलता है। इसी प्रकार आत्महत्या के लिए उत्तरदायी अधिकारियों पर जुर्माना लगाए जाने के उदाहरण भी मिलते हैं।

मंदिरों की संपत्ति के दुरुपयोग, राजस्व गबन तथा सार्वजनिक संपत्ति की चोरी जैसे अपराधों में दोषियों की संपत्ति जब्त कर ली जाती थी। राजराज तृतीय के काल के एक अभिलेख से ज्ञात होता है कि मंदिर की संपत्ति का दुरुपयोग करने वाले अधिकारियों की संपत्ति अधिगृहीत कर उससे प्राप्त धन मंदिर को लौटा दिया गया था। राजद्रोह और राजनीतिक अपराधों के मामलों में भी संपत्ति की जब्ती का प्रावधान था।

कुछ अपराधों को विशेष रूप से निंदनीय माना जाता था। चोरी, जालसाजी तथा सार्वजनिक विश्वासघात के दोषियों को ग्राम सभाओं की सदस्यता से वंचित किया जा सकता था और उनका सामाजिक बहिष्कार भी किया जाता था। कुछ मामलों में अपराधियों को सार्वजनिक रूप से अपमानित करने के दंड भी दिए जाते थे।

इस प्रकार चोलकालीन न्याय-व्यवस्था व्यवहारिक, साक्ष्य-आधारित तथा स्थानीय संस्थाओं पर आधारित थी। दंड-विधान का उद्देश्य केवल अपराधी को दंडित करना नहीं, बल्कि सामाजिक व्यवस्था की पुनर्स्थापना, क्षतिपूर्ति तथा सामुदायिक संतुलन बनाए रखना भी था।

सैन्य प्रशासन

चोल राजवंश अपनी विशाल और संगठित सैन्य व्यवस्था के लिए प्रसिद्ध था। उनके पास एक कुशल सेना और शक्तिशाली नौसेना थी। इन्हीं सेनाओं के बल पर चोल राजाओं ने केवल दक्षिण भारत ही नहीं, बल्कि श्रीलंका और दक्षिण-पूर्व एशिया तक अपने साम्राज्य का विस्तार किया।

चोल सेना में मुख्यतः पैदल सेना, अश्वारोही सेना, हस्ति सेना और शक्तिशाली नौसेना सम्मिलित थीं। सेना को संभवतः 70 रेजिमेंटों में विभाजित किया गया था। सेना की सबसे बड़ी इकाई पैदल सेना (कैक्कोलर/कैलैगल) थी, जिसमें धनुष-बाण, तलवार और भाले से सुसज्जित सैनिक होते थे। अश्वारोही सेना में उत्तम नस्ल के घोड़ों का उपयोग किया जाता था, जिन्हें अरब तथा अन्य देशों से महँगे दामों पर आयात किया जाता था। हस्ति सेना (यानैपडै) का एक पृथक विभाग था, जिसमें लगभग 60,000 हाथी थे। किंतु चोलों की सबसे बड़ी उपलब्धि उनकी नौसेना थी। उन्होंने बंगाल की खाड़ी को ‘चोल झील’ में परिवर्तित कर दिया था। इस नौसेना ने मालदीव, श्रीलंका तथा मलय प्रायद्वीप तक अभियानों और विजयों में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। चोल सेना की एक प्रतिष्ठित और संगठित सैन्य टुकड़ी ‘कैक्कोलापेरुमपडाई’ भी थी, जो राजा के प्रति विशेष निष्ठा रखती थी और युद्धों में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती थी। चोल सेना और नौसेना में कुल मिलाकर लगभग 1,50,000 प्रशिक्षित सैनिक थे। आवश्यकता पड़ने पर अधीनस्थ सरदारों की सेनाएँ भी चोल सेना में सम्मिलित हो जाती थीं। सामान्यतः चोल सेना का नेतृत्व राजा अथवा युवराज करते थे। चोल सेनापतियों को महादंडनायक तथा वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों को ‘पेरुंतारम्’ कहा जाता था।

चोल सेना में सैनिकों की भर्ती वंशानुगत सैनिकों, विभिन्न जनजातियों के लोगों, व्यापारियों द्वारा उपलब्ध कराए गए कर्मियों तथा भाड़े के सैनिकों के रूप में की जाती थी। सैनिकों के निवास और प्रशिक्षण के लिए स्थायी सैन्य छावनियाँ थीं, जिन्हें ‘पडैवीडु’ कहा जाता था। युद्ध के दौरान सैनिकों और हथियारों की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए एक पृथक ‘पयानम्’ (रसद एवं परिवहन विभाग) भी था।

प्रांतीय प्रशासन

चोल साम्राज्य का विस्तार उत्तर में कलिंग (वर्तमान ओडिशा) से लेकर दक्षिण में श्रीलंका तक तथा पूर्व में बंगाल की खाड़ी से लेकर पश्चिम में अरब सागर के तटीय क्षेत्रों तक फैला हुआ था। इस विशाल साम्राज्य को सामान्यतः ‘राज्यम्’ अथवा ‘राष्ट्र’ कहा जाता था। प्रशासनिक सुविधा के लिए इसे अनेक प्रांतों में विभाजित किया गया था, जिन्हें ‘मंडलम्’ कहा जाता था। प्रारंभिक चोल अभिलेखों से छह मंडलों के अस्तित्व का संकेत मिलता है, जबकि राजराज प्रथम के शासनकाल में मंडलों की संख्या नौ थी।

मंडलों का नामकरण प्रायः चोल सम्राटों की उपाधियों, विजयों अथवा राजकीय गौरव से संबंधित उपनामों के आधार पर किया जाता था। अभिलेखों में जयंगोंड चोलमंडलम्, गंगैकोंड चोलमंडलम्, राजराज मंडलम् तथा अधिराज मंडलम् जैसे नाम प्राप्त होते हैं। इसी प्रकार गंगवाड़ी तथा पांड्य प्रदेशों को कभी-कभी मुम्मुडि-चोलमंडलम् भी कहा गया है। साम्राज्य के विस्तार, विजय-अभियानों तथा राजनीतिक परिस्थितियों के अनुसार मंडलों की सीमाएँ और नाम समय-समय पर बदलते रहते थे।

प्रशासनिक विभाजन

प्रशासनिक सुविधा के लिए‘राष्ट्र’ को  ‘मंडलम्’ (प्रांत) में और प्रत्येक मंडल को आगे ‘वलनाडु’ (कोट्टम) में विभाजित किया गया था। वलनाडु को प्रशासनिक दृष्टि से एक बड़े जिले के समकक्ष माना जा सकता है। प्रत्येक वलनाडु के अंतर्गत अनेक ‘नाडु’ होते थे, जो आधुनिक तहसील अथवा परगने के समान थे। नाडु के अंतर्गत अनेक ‘कुर्रम’ अथवा ग्राम-समूह होते थे और कुर्रम का विभाजन ‘उर’ (गाँव) में किया गया था। उर (गाँव) प्रशासन की सबसे छोटी तथा आधारभूत इकाई था। इस प्रकार केंद्रीय सत्ता और स्थानीय प्रशासन के बीच प्रभावी समन्वय स्थापित किया गया था।

चोल साम्राज्य के मंडलों का प्रशासन का संचालन राजा द्वारा नियुक्त प्रांतीय अधिकारियों द्वारा किया जाता था, जिन्हें ‘मंडल मुदलि’ कहा जाता था। इन अधिकारियों की नियुक्ति प्रायः राजपरिवार के सदस्यों, युवराजों अथवा चोलों के अधीनस्थ स्थानीय राजवंशों के शासकों में से की जाती थी, ताकि प्रांतों पर केंद्रीय सत्ता का प्रभावी नियंत्रण बना रहे। प्रांतीय प्रशासकों का प्रमुख दायित्व अपने-अपने क्षेत्रों में प्रशासन, कानून-व्यवस्था तथा राजस्व-व्यवस्था का संचालन और पर्यवेक्षण करना था। वे शाही आदेशों के क्रियान्वयन, कर-संग्रह की व्यवस्था तथा स्थानीय अधिकारियों की गतिविधियों की निगरानी भी करते थे। उनके सहयोग के लिए विभिन्न स्तरों पर अनेक अधिकारी और कर्मचारी होते थे।

तनियूर

कुछ बड़े ग्रामों अथवा नगरों को विशेष प्रशासनिक दर्जा प्राप्त था, जिन्हें ‘तनियूर’ कहा जाता था। ऐसे क्षेत्रों को सामान्य नाडु प्रशासन से पृथक् रखकर विशेष प्रशासनिक स्वायत्तता प्रदान की जाती थी। इनकी राजस्व तथा प्रशासनिक व्यवस्था सामान्य ग्रामों की अपेक्षा अधिक स्वतंत्र होती थी।

नाडु स्तर पर दो प्रकार के अधिकारी कार्यरत थे। प्रथम, वे अधिकारी जो राज्य द्वारा नियुक्त किए जाते थे; द्वितीय, स्थानीय वंशानुगत सरदार, भूमिपति अथवा प्रभावशाली ग्रामीण अभिजात वर्ग के प्रतिनिधि, जो प्रशासनिक कार्यों में भाग लेते थे। ये स्थानीय प्रमुख न केवल राजस्व और प्रशासनिक कार्यों में सहयोग करते थे, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर राज्य को सैनिक सहायता भी प्रदान करते थे। इस प्रकार चोल प्रशासन ने स्थानीय शक्तियों और केंद्रीय सत्ता के मध्य संतुलन स्थापित करने का प्रयास किया था।

चोल प्रशासन की बहुस्तरीय व्यवस्था साम्राज्य के विशाल क्षेत्र पर प्रभावी नियंत्रण बनाए रखने में सहायक सिद्ध हुई। मंडलम् से लेकर ग्राम तक प्रशासनिक इकाइयों की स्पष्ट संरचना ने राजस्व-संग्रह, कानून-व्यवस्था, सिंचाई-प्रबंधन तथा स्थानीय शासन को सुव्यवस्थित बनाया। साथ ही, स्थानीय संस्थाओं को पर्याप्त अधिकार देकर चोल शासकों ने प्रशासनिक विकेंद्रीकरण और केंद्रीय नियंत्रण के बीच एक संतुलित व्यवस्था विकसित की, जो चोल शासन की प्रमुख विशेषताओं में से एक थी।

स्थानीय स्वशासन

चोल प्रशासन की सबसे उल्लेखनीय विशेषता उसकी विकसित स्थानीय स्वशासन व्यवस्था थी, जिसका स्पष्ट प्रमाण उत्तरमेरूर अभिलेख से प्राप्त होता है। यद्यपि दक्षिण भारत में स्थानीय स्वशासन की परंपरा अत्यंत प्राचीन थी और उसके प्रारंभिक स्वरूप संगम युग से ही विद्यमान थे, तथापि चोल शासकों ने इस व्यवस्था को जो संगठनात्मक परिपक्वता, प्रशासनिक स्वायत्तता और संस्थागत स्वरूप प्रदान किया, वह भारतीय प्रशासनिक इतिहास में विशेष महत्त्वपूर्ण है। उनकी ग्राम-स्वशासन की प्रणाली इतनी विकसित थी कि अनेक इतिहासकारों ने इसे मध्यकालीन भारत की सर्वाधिक उन्नत स्थानीय प्रशासनिक व्यवस्था बताया है।

स्थानीय प्रशासन मुख्यतः ग्राम सभाओं (ऊर तथा सभा/महासभा), नगर सभाओं (नगरम्) तथा नाडु सभाओं के माध्यम से संचालित होता था। इनमें ग्राम और नगर सभाएँ वास्तविक स्थानीय प्रशासनिक इकाइयाँ थीं, जबकि नाडु सभा मुख्यतः समन्वयकारी तथा प्रतिनिधिक संस्था के रूप में कार्य करती थी।

चोल शासन की विशेषता यह थी कि स्थानीय संस्थाओं को केवल प्रशासनिक दायित्व ही नहीं सौंपे गए थे, बल्कि उन्हें वित्तीय, न्यायिक तथा सार्वजनिक निर्माण संबंधी पर्याप्त अधिकार भी दिए गए थे। राजा के अधिकारी इन संस्थाओं की गतिविधियों पर सामान्य निगरानी रखते थे, किंतु दैनिक कार्यों में सामान्यतः हस्तक्षेप नहीं करते थे।

स्थानीय सभाओं का आधार ग्राम समुदाय था। प्रत्येक गाँव में विभिन्न सामाजिक, धार्मिक तथा व्यावसायिक समूह संगठित रूप से कार्य करते थे, जो स्थानीय जीवन के विविध पक्षों का संचालन करते थे।

समाज के संपन्न वर्ग, स्थानीय भूमिपति, व्यापारी तथा धार्मिक संस्थाएँ भी सार्वजनिक जीवन में सक्रिय भूमिका निभाते थे और सामाजिक प्रतिष्ठा तथा धार्मिक पुण्य की प्राप्ति के लिए मंदिरों, तालाबों, धर्मशालाओं तथा अन्य लोकोपकारी संस्थाओं का निर्माण करवाते थे। अनेक व्यक्ति और समुदाय अपनी धनराशि मंदिरों में अक्षयनिधि के रूप में जमा करते थे, जिसकी आय का उपयोग धार्मिक, शैक्षिक तथा सामाजिक कार्यों में किया जाता था। अकाल, बाढ़ अथवा अन्य संकटों के समय इन निधियों से जनता की सहायता भी की जाती थीं।

स्थानीय निगम एवं सामुदायिक संगठन

चोलकालीन ग्राम जीवन केवल ग्राम सभा तक सीमित नहीं था। उसके भीतर अनेक प्रकार के संगठन विद्यमान थे, जो निगमीय संस्थाओं की भाँति कार्य करते थे। इन संगठनों को संपत्ति रखने, भूमि खरीदने-बेचने तथा कानूनी विवादों में पक्षकार बनने का अधिकार प्राप्त था।

इनमें व्यापारिक संघों का विशेष महत्त्व था। वलञ्जीयर तथा मणिग्रामम् प्रमुख व्यापारिक संगठन थे, जबकि मूलपरुडैयार मंदिर-प्रबंधन से संबंधित संस्था थी। मूलपरुडैयार स्थानीय मंदिरों के प्रशासन का दायित्व निभाती थी, किंतु जब वह अपने कर्तव्यों का समुचित निर्वहन करने में असमर्थ हो जाती थी, तब मंदिर का प्रबंधन पुनः ग्राम सभा अथवा महासभा अपने हाथ में ले लेती थी।

ग्रामों में विभिन्न व्यवसायों से संबंधित समुदाय भी संगठित थे। बढ़ई, लुहार, स्वर्णकार, धोबी, कुम्हार तथा अन्य शिल्पकारों के पृथक संगठन होते थे। इन पेशागत समुदायों को तमिल अभिलेखों में ‘कलनै’ कहा गया है। इनमें कुछ समुदाय सामाजिक दृष्टि से उच्च माने जाते थे, जबकि कुछ निम्न सामाजिक स्तर के समझे जाते थे। निम्न श्रेणी के समुदायों को ‘किल्क-कलनैगल’ कहा जाता था।

इन संगठनों की सदस्यता सामान्यतः जन्म, निवास अथवा व्यवसाय के आधार पर प्राप्त होती थी। कुछ परिस्थितियों में व्यक्ति स्वेच्छा से भी किसी संगठन से जुड़ सकता था। इनका संचालन सामाजिक परंपराओं और पारस्परिक सहयोग से किया जाता था।

स्थानीय सभाएँ

चोल अभिलेखों में सामान्यतः तीन प्रकार की स्थानीय सभाओं का उल्लेख मिलता है—ऊर, सभा या महासभा तथा नगरम्। इनमें ऊर और सभा ग्रामीण क्षेत्रों की संस्थाएँ थीं, जबकि नगरम् मुख्यतः व्यापारिक एवं शहरी केंद्रों की संस्था थी।

ऊर (ग्राम सभा)

चोल प्रशासन की सबसे छोटी इकाई गाँव था। चोलकालीन अभिलेखों में दो प्रकार के गाँव का उल्लेख मिलता है—‘ऊर’ तथा ‘ब्रह्मदेय’। गैर-ब्रह्मदेय कृषक-बहुल गाँव की सभा को ‘ऊर’ कहा जाता था।

ऊर के लिए अभिलेखों में ‘ऊरोम्’ शब्द मिलता है, जिससे अनुमान किया जाता है कि इसके सदस्य मुख्यतः बेलाल किसान होते थे। ऊर की कार्यकारिणी को ‘आलुंगणम्’ अथवा ‘शासकगण’ कहा जाता था, जिनका चयन ग्रामीणों द्वारा किया जाता था।

ऊर का प्रमुख कार्य भूमि-प्रबंधन, लगान वसूली, कानून एवं व्यवस्था बनाए रखना, तालाबों, सड़कों, सार्वजनिक जलाशयों की देखभाल करना तथा ग्राम स्तर के विवादों के निपटारा करना था। ग्राम सभाएँ ही शिक्षा की व्यवस्था भी करती थीं, बाज़ारों का नियमन करती थीं और अकाल या बाढ़ के समय लोगों की सहायता करती थीं।

सामान्यतः ऊर स्वतंत्र रूप से कार्य करती थी, किंतु कुछ परिस्थितियों में वह महासभा के साथ भी कार्य करती थी। विशेषकर उन सामान्य ग्रामों में, जहाँ बाद में ब्राह्मणों की बस्ती (मंगलम् अथवा ब्रह्मदेय) स्थापित की गई थी, वहाँ दोनों संस्थाएँ समानांतर रूप से कार्य करती थीं। 1227 ई. के एक अभिलेख से ज्ञात होता है कि शांतमंगलम् में दो पृथक् ऊर विद्यमान थे—एक ब्राह्मणों के देवदान क्षेत्र का तथा दूसरा जैन समुदाय के पल्लिच्चंदम् का। दोनों ने मिलकर तालाब तथा पुष्पवाटिका के लिए भूमि दान की और उसे करमुक्त घोषित किया। इसी प्रकार 1245 ई. के अभिलेखों से उरत्तूर-कुर्रम तथा अमणकुंडि जैसे ग्रामों में भी दो-दो ऊरों के अस्तित्व का उल्लेख मिलता है।

सभा अथवा महासभा

‘सभा’ अथवा ‘महासभा’ मुख्यतः ब्राह्मणों की संस्था थी, जो ब्रह्मदेय अथवा अग्रहार का प्रशासन सँभालती थी। महासभा के सदस्यों का चुनाव संभवतः मतदान द्वारा किया जाता था। उत्तरमेरूर के अभिलेखों से पता चलता है कि इस स्वायत्त संस्था को अपने ग्राम के प्रशासन, वित्त, न्याय, सिंचाई, भूमि-प्रबंधन तथा सार्वजनिक कार्यों के संचालन में व्यापक अधिकार प्राप्त थे। ब्राह्मणों की बस्ती को ‘चतुर्वेदी मंगलम्’ कहा जाता था।

वारियम

सभा अथवा महासभा ‘वारियम’ नामक समितियों की सहायता से गाँव के प्रशासनिक कार्यों का संचालन करती थी। समाज के पुरुष सदस्य ही इन वारियमों के सदस्य होते थे, जो बिना वेतन (मानद) सेवा करते थे। इन वारियमों का गठन, योग्यता तथा सदस्यता की अवधि प्रत्येक गाँव में अलग-अलग होती थी। विभिन कार्यों के लिए कई वारियमों का गठन किया जाता था, जैसे—‘न्याय वारियम’ न्याय का कार्य देखता था, ‘थोट्टावारियम’ फूलों के बगीचों की देखभाल करता था। ‘धर्म वारियम’ दान-पुण्य तथा मंदिरों के कार्यों का दायित्व सँभालता था। ‘एरीवारियम’ तालाबों और जलापूर्ति की व्यवस्था करता था। ‘पोन वारियम’ वित्तीय कार्यों का संचालन करता था। ‘ग्रामकार्य वारियम’ सभी समितियों के कार्यों की देखरेख करता था। इन वारियमों के सदस्यों को ‘वारियमपेरुमक्कल’ कहा जाता था।

नगरम्

चोलकालीन स्थानीय स्वशासन की प्रमुख संस्थाओं में ‘नगरम्’ का महत्त्वपूर्ण स्थान था। जहाँ ऊर सामान्य ग्रामों की तथा सभा अथवा महासभा ब्राह्मदेय ग्रामों की प्रतिनिधि संस्था थी, वहीं नगरम् मुख्यतः नगरवासियों, विशेषकर व्यापारिक समुदाय के प्रतिनिधियों की संस्था थी, जो नगर के आर्थिक, प्रशासनिक और सामाजिक हितों की रक्षा करती थी।

चोलकाल में समुद्री तथा स्थलीय व्यापार के विकास के कारण अनेक नगर समृद्ध व्यापारिक केंद्रों के रूप में विकसित हुए। इन नगरों के प्रशासन तथा आर्थिक गतिविधियों के संचालन के लिए नगरम् नामक संस्थाओं का गठन किया गया था। चिदंबरम् के अभिलेख में ‘नगरम्’ का उल्लेख नगर के एक विशिष्ट भाग अथवा व्यापारिक क्षेत्र के लिए किया गया है, जिससे लगता है कि नगरम् केवल प्रशासनिक संस्था ही नहीं, बल्कि व्यापारिक समुदाय का संगठित निकाय भी था।

नगर प्रशासन से संबंधित सदस्यों के दो प्रमुख वर्गों का उल्लेख मिलता है—‘नगरत्तर’ तथा ‘व्यापारि-नगरोत्तम्’। नगरत्तर संभवतः नगर के प्रतिष्ठित व्यापारी, धनी नागरिक अथवा प्रशासनिक दायित्व निभाने वाले सदस्य थे, जबकि व्यापारि-नगरोत्तम् व्यापारिक समुदाय के प्रमुख प्रतिनिधि थे, जो नगर की नीतियों, कर-व्यवस्था, व्यापारिक नियंत्रण तथा सार्वजनिक कार्यों के संचालन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते थे।

नगरम् के लिपिकों को ‘नगर-करणत्तार’ तथा लेखाकारों को ‘नगरक्कणक्कु’ कहा जाता था। इन अधिकारियों का कार्य आय-व्यय का लेखा-जोखा रखना, करों की वसूली का अभिलेख तैयार करना तथा नगर प्रशासन के निर्णयों को लिखित रूप प्रदान करना था।

नगरम् की आय के प्रमुख स्रोत विभिन्न प्रकार के कर और शुल्क थे। नगर-सभा बाजारों में बेची जाने वाली वस्तुओं पर कर वसूल करती थी। फलों, सुपारी, केसर, गन्ने तथा अन्य व्यापारिक वस्तुओं पर लगाए जाने वाले शुल्क इसके राजस्व के महत्त्वपूर्ण स्रोत थे। इसके अतिरिक्त करघों, तेल निकालने वाले कोल्हुओं, स्वर्णकारों, दुकानों, व्यापारिक प्रतिष्ठानों, तौल एवं माप के उपकरणों, नमक तथा हाथियों के व्यापार से भी कर प्राप्त किया जाता था। व्यापारिक करों के अतिरिक्त नगरम् को कभी-कभी दान, अक्षयनिधियों तथा धार्मिक संस्थाओं से भी आय प्राप्त होती थी।

नगर सभाएँ मंदिरों, धर्मशालाओं तथा अन्य सार्वजनिक संस्थाओं को आर्थिक सहायता प्रदान करती थीं और नगर के विकास से संबंधित कार्यों में भी सहायता करती थीं। सड़कों, बाजारों, जलस्रोतों तथा व्यापारिक प्रतिष्ठानों की व्यवस्था बनाए रखना भी इनका उत्तरदायित्व था।

इस प्रकार नगरम् केवल व्यापारिक संस्था नहीं थी, बल्कि नगर-जीवन के विविध पक्षों का संचालन करने वाली एक प्रभावशाली स्वशासी संस्था थी, जिसने चोलकालीन शहरी जीवन को संगठित एवं समृद्ध बनाने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।

नाडु

‘नाडु’ चोल प्रशासन की एक महत्त्वपूर्ण मध्यवर्ती प्रशासनिक इकाई थी। यह अनेक ग्रामों का समूह होता था और स्थानीय प्रशासन और उच्च प्रशासनिक स्तरों के बीच एक महत्त्वपूर्ण कड़ी का कार्य करती थी। नाडू के प्रमुखों को ‘नाट्टार’ और उसकी परिषद को ‘नाट्टवई’ कहा जाता था। नाडु का मुख्य कार्य राजस्व प्रशासन, भूमि-प्रबंधन तथा ग्राम सभाओं के मध्य समन्वय स्थापित करना था।

अभिलेखों से ज्ञात होता है कि नाडु अपने नाम से दान देती थी तथा धार्मिक और सार्वजनिक कार्यों के लिए अक्षयनिधियाँ भी स्वीकार करती थी। इससे स्पष्ट है कि नाडु केवल प्रशासनिक इकाई ही नहीं थी, बल्कि एक निगमीय संस्था के रूप में भी कार्य करती थी।

वास्तव में, चोल शासकों ने संगठनात्मक जीवन, सामूहिक उत्तरदायित्व तथा स्थानीय प्रशासन की दृष्टि से अत्यंत विकसित शासन व्यवस्था का निर्माण किया था। उन्होंने ग्राम सभाओं, नगर सभाओं तथा नाडु सभाओं के माध्यम से ऐसी प्रशासनिक व्यवस्था विकसित की थी, जिसमें अनेक स्थानीय समस्याओं का समाधान स्थानीय स्तर पर ही हो जाता था।

महासभाओं की कार्यप्रणाली से स्पष्ट है कि उनके सदस्य प्रशासनिक दक्षता, वित्तीय अनुशासन तथा सार्वजनिक उत्तरदायित्व के प्रति सजग थे। सिंचाई, भूमि-प्रबंधन, कर-संग्रह, धार्मिक संस्थाओं का संचालन तथा न्यायिक कार्य जैसे अनेक दायित्व स्थानीय संस्थाओं द्वारा संपादित किए जाते थे। यही कारण है कि चोलकालीन स्थानीय शासन को भारतीय इतिहास में स्थानीय स्वशासन की सर्वाधिक विकसित प्रणालियों में गिना जाता है।

इस प्रकार चोलकालीन स्थानीय स्वशासन भारतीय प्रशासनिक इतिहास की एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि थी, जिसने दक्षिण भारत के सामाजिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक विकास में उल्लेखनीय योगदान दिया।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!
Scroll to Top