शैलोद्भव वंश  (Shailodbhava Dynasty, c. 553 CE – 736 CE)

शैलोद्भव वंश  (Shailodbhava Dynasty, c. 553 CE – 736 CE)

शैलोद्भव वंश (लगभग 553 ईस्वी-736 ईस्वी)

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शैलोद्भव राजवंश ने छठी शताब्दी ईस्वी के मध्य से लेकर आठवीं शताब्दी ईस्वी के मध्य पूर्वी भारत के प्राचीन कलिंग के कोंगोद-मंडल क्षेत्र पर शासन किया। ‘कोंगोद-मंडल’ उत्तर में महानदी से लेकर दक्षिण में महेंद्रगिरि तक फैला हुआ था, जिसमें वर्तमान उड़ीसा के गंजाम, खुर्दा और पुरी जिलों के कुछ भाग सम्मिलित थे। इस वंश की राजधानी कोंगोदवासक (कोंगोद) में थी, जिसकी पहचान पुरी जिले में सालिया नदी के तट पर स्थित बानपुर से की जाती है। कोंगोद एक पहाड़ी प्रदेश था, जो पूर्व में बंगाल की खाड़ी से घिरा हुआ था। इसके दक्षिण में कलिंग, दक्षिण-पश्चिम में श्वेतक और कोसल स्थित थे।

शैलोद्भव राजवंश की स्थापना धर्मराज प्रथम रणभित ने लगभग 553 ईस्वी में की थी, जिसके बाद माधवराज प्रथम उर्फ सैन्यभित प्रथम ने शासन किया। प्रारंभिक शैलोद्भव शासक गुप्त, विग्रह, मुद्गल तथा गौड़ (शशांक) जैसे शासकों की अधीनता स्वीकार करते थे और उनकी प्रारंभिक गतिविधियाँ मुख्यतः भूमिदान, धार्मिक कार्यों और स्थानीय प्रशासन तक सीमित थीं। बाद में, शैलोद्भव शासक माधवराज द्वितीय ने लगभग 620 ईस्वी के आसपास सत्ता संभाली और आगे चलकर अपने राज्य का विस्तार और सुदृढ़ीकरण करके अपनी स्वतंत्र सत्ता की स्थापना की। आठवीं शताब्दी तक आते-आते मध्यमराज तृतीय (लगभग 736 ईस्वी) के समय तक कोंगोद क्षेत्र भौम-कर वंश के अधीन हो गया और शैलोद्भव शासक पूर्वी गंग वंश के अधीन सामंत बन गए।

शैलोद्भवों ने केवल राजनीति के साथ-साथ कोंगोद के सांस्कृतिक विकास में भी महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। शैलोद्भव शासक शैव धर्म और ब्राह्मणवाद के संरक्षक थे। उन्होंने वैदिक यज्ञों और अनुष्ठानों का संपादन करवाया तथा ब्राह्मणों को ग्रामदान और भूमि-दान दिए। इसके साथ ही, उन्होंने प्रारंभिक मंदिरों का निर्माण करवाया और धार्मिक सहिष्णुता का भी परिचय दिया। यही नहीं, उन्होंने ‘धर्मराज-कलिंगमार्ग’ जैसी सड़कों का निर्माण कराया, जिससे कलिंग का दक्षिण-पूर्व एशिया, सीलोन (श्रीलंका), बर्मा एवं चीन के साथ समुद्री संपर्क मजबूत हुए और सुवर्णद्वीप जैसे क्षेत्रों तक इनके प्रभाव का विस्तार हुआ। कोंगोद की आर्थिक समृद्धि और राजनीतिक स्थिरता के कारण शैलोद्भव काल में कला और साहित्य का भी विकास हुआ।

ऐतिहासिक स्रोत

शैलोद्भव वंश के इतिहास की जानकारी विभिन्न प्रकार के स्रोतों से मिलती है, जिन्हें मुख्यतः अभिलेखीय, साहित्यिक और विदेशी स्रोतों में विभाजित किया जा सकता है। अभिलेखीय स्रोत मुख्यतः ताम्रपत्रों और शिलालेखों के रूप में प्राप्त हुए हैं।

शैलोद्भव शासकों के लगभग सोलह ताम्रपत्र अभिलेख वर्तमान उड़ीसा के तटीय क्षेत्रों—जैसे गंजाम, पुरी, बानपुर, खुर्दा, बुगुद और पारिकुद से प्राप्त हुए हैं, जो लगभग छठी से आठवीं शताब्दी ईस्वी के बीच के हैं और संस्कृत भाषा तथा पूर्वी गुप्त ब्राह्मी लिपि में लिखे गए हैं।

इस वंश के अभिलेखों में सुमंडल ताम्रपत्र, कनसा अनुदान, सोरो चार्टर, खुर्दा अनुदान, टेक्कली चार्टर तथा माधवराज द्वितीय के गंजाम ताम्रपत्र (गुप्त संवत 300, अर्थात् 619 ईस्वी) विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण हैं, जिनमें मुख्यतः शैलोद्भव शासकों की वंशावली, प्रशस्तियाँ, ब्राह्मणों को दान में दी गई भूमि, गाँव अथवा प्रशासनिक क्षेत्र (विषय) के साथ-साथ शिव और विष्णु जैसे देवताओं की उपासना का विवरण मिलता है।

सुमंडल ताम्रपत्र शैलोद्भव वंश का प्रारंभिक और अत्यंत महत्त्वपूर्ण अभिलेख है, जिसमें धर्मराज प्रथम का उल्लेख है, जिसे ‘रणभित’ जैसी उपाधियों से विभूषित किया गया है। कनसा अनुदानपत्र में वंशावली तथा ब्राह्मण धर्म के प्रति आस्था का वर्णन मिलता है। सोरो चार्टर में वंशावली, उपाधियों और धार्मिक कार्यों का विस्तृत विवरण मिलता है। खुर्दा अनुदानपत्र (लगभग 610–630 ईस्वी) और टेक्कली चार्टर (लगभग 620–640 ईस्वी) से शैलोद्भव शासकों की भूमि-दान, प्रशासनिक व्यवस्था और ब्राह्मण संरक्षण की नीति पर प्रकाश पड़ता है।

माधवराज द्वितीय का गंजाम ताम्रपत्र (गुप्त संवत 300 = 619 ईस्वी) इस वंश का सबसे महत्त्वपूर्ण और दिनांकित अभिलेख है, जिसमें विस्तृत वंशावली और ग्राम-दान के साथ-साथ माधवराज की ‘महासामंत’ स्थिति का भी उल्लेख है। बुगुद अभिलेख में भी शैलोद्भव वंश की उत्पत्ति तथा वंशावली का विस्तृत वर्णन मिलता है। इनके अतिरिक्त, पुरी, पारिकुद ताम्रपत्र, निविना तथा कोणार्क क्षेत्र के अभिलेखों में भी भूमि-अनुदान, स्थानीय शासन-व्यवस्था, समुद्रतटीय क्षेत्रों पर नियंत्रण तथा धार्मिक गतिविधियों का विस्तृत विवरण मिलता है। यद्यपि इन अभिलेखों में मुख्यतः वंशावली, दान-प्रणाली तथा प्रशासनिक व्यवस्था का उल्लेख मिलता है, फिर भी शैलोद्भव वंश के इतिहास-लेखन में इनसे महत्त्वपूर्ण सहायता मिलती है।

शैलोद्भव वंश के अभिलेखों के साथ-साथ पूर्वी गंग वंश के शासक इंद्रवर्मन तृतीय के चिकाकोल अभिलेख से भी शैलोद्भव वंश के दक्षिणी विस्तार की जानकारी मिलती है। धर्मराज प्रथम के सुमंडल और माधवराज द्वितीय के गंजाम ताम्रपत्र में प्रयुक्त समान ‘प्रशस्ति’ वाक्यों से यह संकेत मिलता है कि इस वंश ने लगभग छठी शताब्दी ईस्वी के मध्य से आठवीं शताब्दी ईस्वी के प्रारंभ तक निरंतर शासन किया।

अभिलेखीय स्रोतों के अतिरिक्त, कुछ साहित्यिक ग्रंथ भी शैलोद्भवों के इतिहास के पुनर्निर्माण में पूरक स्रोत के रूप में उपयोगी हैं। इस श्रेणी में एकाम्र पुराण, कपिल संहिता और स्वर्णाद्रि महोदय प्रमुख हैं। इन ग्रंथों में उड़ीसा क्षेत्र की धार्मिक परंपराओं, मंदिरों तथा शैव धर्म के प्रभाव का वर्णन मिलता है, जिससे शैलोद्भवकालीन समाज की पृष्ठभूमि को समझने में सहायता मिलती है। विदेशी यात्रियों में बौद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग का यात्रा-वृत्तांत ‘सी-यू-की’ भी एक महत्त्वपूर्ण सहायक स्रोत है, जिसमें कोंगोद (कुंग-उ-तो) का वर्णन मिलता है।

शैलोद्भवों की उत्पत्ति

शैलोद्भव वंश की उत्पत्ति की समस्या रहस्यपूर्ण मानी जाती है। ‘शैलोद्भव’ शब्द का शाब्दिक अर्थ है—‘चट्टानों से उत्पन्न’। शैलोद्भवों के शिलालेखों में इस वंश की उत्पत्ति से संबंधित एक पौराणिक कथा मिलती है। इसके अनुसार कलिंग में अराजकता के समय पुलिंदसेन नामक एक आदिवासी प्रमुख की प्रार्थना से प्रसन्न होकर स्वयंभू देवता (भगवान शिव) ने एक चट्टान (शैल) से ‘शैलोद्भव’ नामक एक वीर पुरुष को उत्पन्न किया, जिसे इस वंश का संस्थापक माना गया। एक शिलालेख में इस देवता की पहचान ‘हर’ (शिव) के रूप में की गई है। कुछ इतिहासकार ताम्रपत्रों में वर्णित ऐसी कथाओं को प्रतीकात्मक मानते हैं तथा उन्हें शासकों की राजनीतिक वैधता स्थापित करने का माध्यम बताते हैं।

अनेक इतिहासकार मानते हैं कि पुलिंदसेन का संबंध पुलिंद जनजाति से था और इस कथा से शैलोद्भव वंश की जनजातीय पृष्ठभूमि का संकेत मिलता है। ‘चट्टान से उत्पत्ति’ के विवरण से यह संकेत मिलता है कि इस राजवंश का उदय किसी पर्वतीय भूभाग, संभवतः महेंद्रगिरि के पर्वतीय क्षेत्र में हुआ था, क्योंकि शिलालेखों में महेंद्र पर्वत को इस वंश का ‘कुलगिरि’ ((कुल-पर्वत)) बताया गया है। शिव का उल्लेख इस बात को प्रमाणित करता है कि इस राजवंश के शासक शैव धर्म के अनुयायी थे। कई अन्य इतिहासकारों का भी मत है कि शैलौद्भव वंश के लोग जनजातीय मूल के थे।

कुछ इतिहासकार शैलोद्भव वंश को गंग वंश की शाखा मानते हैं, जबकि कुछ उन्हें मध्य प्रदेश के शैल वंश से संबद्ध बताते हैं। किंतु ये दोनों मत अधिक विश्वसनीय प्रतीत नहीं होते।

कुछ इतिहासकारों ने नाम-साम्य तथा कलिंग के समुद्री संपर्कों के आधार पर शैलोद्भवों को दक्षिण-पूर्व एशिया के शैलेंद्र वंश से संबंधित करने का प्रयास किया है, जिसने वर्तमान बालाघाट जिले में शासन किया था। किंतु किसी अभिलेखीय या साहित्यिक स्रोत से यह प्रमाणित नहीं होता कि शैलेंद्र शासक कलिंग के किसी विशेष वंश से संबंधित थे अथवा शैलोद्भवों ने कलिंग से जाकर जावा या सुमात्रा में शैलेंद्र वंश की स्थापना की थी।

शैलोद्भव मूलतः एक स्थानीय जनजातीय समुदाय थे। अभिलेखों में वर्णित पौराणिक कथाओं के अनुसार पुलिंदसेन पुलिंद जनजाति का प्रमुख था। पुलिंदों की पहचान अशोक के तेरहवें शिलालेख में उल्लिखित ‘कुलिंदों’ से की जाती है, जहाँ उन्हें आटविक क्षेत्र की जनजाति के रूप में वर्णित किया गया है। वराहमिहिर की बृहत्संहिता में भी पुलिंदों को ‘शैलज’ (अर्थात् पहाड़ से उत्पन्न) कहा गया है।

वास्तव में, शैलोद्भव ‘शैलज’ थे, जिनका संबंध पुलिंद जनजाति से था। संभवतः पुलिंदसेन ने शैलज समुदाय के ‘शैलोद्भव’ नामक किसी प्रमुख की सहायता से इस राजवंश की स्थापना की। शैलोद्भवों की जनजातीय उत्पत्ति को दैवीय मान्यता प्रदान करने के लिए ही संभवतः पौराणिक कथाएँ गढ़ी गई थीं।

शैलोद्भवों की उत्पत्ति का संबंध पुलिंद जनजाति से होने का समर्थन आंशिक रूप से शिशुपालगढ़ से प्राप्त पुरातात्त्विक अवशेषों, जैसे लोहे के औजारों और पहाड़ी दुर्गों, से भी होता है। इससे संकेत मिलता है कि शैलोद्भव बाहरी न होकर स्थानीय मूल के थे। कुछ इतिहासकारों के अनुसार सुमंडल ताम्रपत्र में उल्लिखित ‘अभय’, जिसका वंशज धर्मराज था, संभवतः वही ‘शैलोद्भव’ इस वंश का संस्थापक था।

शैलोद्भव शासकों की वंशावली

शैलोद्भव राजवंश लगभग छठी शताब्दी के मध्य से आठवीं शताब्दी के मध्य तक अस्तित्व में रहा। शैलोद्भव शासकों की वंशावली और वंशक्रम का निर्धारण मुख्यतः ताम्रपत्र अभिलेखों—जैसे सुमंडल ताम्रपत्र, कनसा ताम्रपत्र, सोरो चार्टर, गंजाम अभिलेख, बुगुद (बुगुद) ताम्रपत्र तथा पारिकुद अभिलेखों के आधार पर किया जाता है। किंतु प्रारंभिक शासकों के क्रम और उत्तराधिकार को लेकर विद्वानों में मतभेद है। इसका मुख्य कारण तिथि-विहीन अभिलेखों की उपलब्धता तथा अस्पष्ट वंशावली है। गुप्त संवत् 300 (619 ईस्वी) में उत्कीर्ण माधवराज द्वितीय का गंजाम अभिलेख उसे एक ऐतिहासिक शासक के रूप में प्रमाणित करने वाला सबसे महत्त्वपूर्ण स्रोत माना जाता है।

गुप्त संवत् 250 (लगभग 569–570 ईस्वी) के सुमंडल ताम्रपत्र में इस वंश के पौराणिक संस्थापक शैलौद्भव के वंशज धर्मराज प्रथम (रणभित) का नाम मिलता है, जो शैलोद्भव वंश का प्रथम ऐतिहासिक शासक था और जिसने छठी शताब्दी के मध्य (लगभग 553 ईस्वी) में कोंगोद-मंडल में इस वंश की नींव रखी। उसके पश्चात् माधवराज प्रथम (सैन्यभित प्रथम), यशोभित (अयशोभित) और माधवराज द्वितीय (माधववर्मन/सैन्यभित द्वितीय) का नाम मिलता है। माधवराज द्वितीय के 620-21 ईस्वी (गुप्त संवत 300) के  गंजाम शिलालेख से पता चलता है कि वह गौड़ाधिपति शशांक का सामंत था।

माधवराज द्वितीय (सैन्यभित द्वितीय) के तीन अथवा चार पूर्वज संभवतः साम्राज्यवादी गुप्तों के उन वंशजों के सामंत प्रतीत होते हैं, जो संभवतः बंगाल या कलिंग में कहीं शासन करते थे। कुछ इतिहासकार यशोभित (अयशोभित)  की पहचान चरमपराज के रूप में करते  हैं।

माधवराज द्वितीय (सैन्यभित द्वितीय) के बाद मध्यमराज प्रथम (अयशोभित द्वितीय) गद्दी पर बैठा। उसकी मृत्यु के बाद उसके ज्येष्ठ पुत्र माधवराज तृतीय ने शासन संभाला, किंतु छोटे भाई धर्मराज द्वितीय (मानभित) ने उसका विरोध किया, जिससे उत्तराधिकार-संबंधी युद्ध छिड़ गया। अंततः धर्मराज द्वितीय (श्रीमानभित) ने माधव  (माधवराज तृतीय) को पराजित कर कोंगोद-मंडल के सिंहासन पर अधिकार कर लिया।

धर्मराज द्वितीय (मानभित) के बाद उसका पुत्र और उत्तराधिकारी मध्यमराज द्वितीय (अयशोभित तृतीय) राजा बना। चूंकि मध्यमराज द्वितीय का कोई उत्तराधिकारी नहीं था, इसलिए उसके बाद अल्लपराज (ऐलपराज/युवराज तैलप) का नाम मिलता है, जो संभवतः माधवराज तृतीय का पुत्र था। अल्लपराज का पुत्र रणक्षोभ था, जिसे ‘तैलपनिभ’ के नाम से भी जाना जाता था। किंतु यह स्पष्ट नहीं है कि अल्लपराज या तैलपनिभ कभी शासक हुए थे अथवा नहीं। संभवतः कम उम्र में ही उनकी मृत्यु हो गई थी।

मध्यमराज तृतीय शैलोद्भव वंश का अंतिम ज्ञात शासक माना जाता है, जो संभवतः तैलपनिभ (रणक्षोभ) का पुत्र था और टेक्कली में गंगों के अधीन शसन करता था। मध्यमराज तृतीय के समय (लगभग 736 ईस्वी) तक शैलोदभवों के मूल राज्य कोंगोद-मंडल पर भौम-कर राजवंश का अधिकार हो गया और  शैलोद्भव पूर्वी गंग वंश के अधीन सामंत बन गए।

इस प्रकार शैलोद्भव राजवंश की वंशावली और इतिहास का पुनर्निर्माण मुख्यतः अभिलेखों पर आधारित है, किंतु सीमित और कभी-कभी विरोधाभासी प्रमाणों के कारण अभी भी इसमें अनेक अनिश्चितताएँ बनी हुई हैं।

शैलोद्भव वंश के शासकों की सूची एवं प्रमुख अभिलेख

क्रमशासकउपाधि / अन्य नामअनुमानित कालप्रमुख अभिलेख / ताम्रपत्र
1शैलोद्भववंश का पौराणिक संस्थापक
2धर्मराज प्रथमरणभित/ अरणभितलगभग 553–575 ईस्वीसुमंडल ताम्रपत्र (569 ईस्वी)
3माधवराज प्रथमसैन्यभित प्रथम, माधववर्मन प्रथमलगभग 575–600 ईस्वीकनसा ताम्रपत्र (599 ईस्वी), बुगुद और पुरी ताम्रपत्र
4अयशोभित प्रथमयशोभित, चरमपराजलगभग 600–615 ईस्वीखंडपाड़ा–नुआपाली अनुदान
5माधवराज द्वितीयसैन्यभित द्वितीय, माधववर्मन द्वितीयलगभग 615–665 ईस्वीगंजाम ताम्रपत्र (619 ईस्वी) खुर्दा, बुगुद, पुरुषोत्तमपुर और पुरी अभिलेख
6मध्यमराज प्रथमअयशोभित द्वितीयलगभग 665–695 ईस्वीतेक्कली, गंजाम और  पारिकुद अभिलेख
7माधववर्मन तृतीयमाधव7वीं शताब्दी उत्तरार्धधर्मराज द्वितीय के अभिलेखों में उल्लेख
8धर्मराज द्वितीयश्रीमनभितलगभग 695–725 ईस्वीनिमिना (निविन), बानपुर, पुरी, सोनपुर और  खोण्डेण्डा ताम्रपत्र
9मध्यमराज द्वितीयअयशोभित तृतीयआठवीं शताब्दी का प्रारंभ
10अल्लपराजऐलपराज, युवराज तैलपआठवीं शताब्दी का प्रारंभ
11तैलपनिभरणक्षोभ8वीं शताब्दी
12मध्यमराज तृतीयसंभवतः शांतिकर प्रथमलगभग 710–736 ईस्वीटेक्कली ताम्रपत्र

शैलोद्भव वंश का राजनीतिक इतिहास

शैलोद्भव अभिलेखों से लगभग दस पीढ़ियों के शासकों के नामों की जानकारी प्राप्त होती है, जिससे प्रतीत होता है कि यह वंश लगभग दो से ढाई सौ वर्षों तक अस्तित्व में रहा था। इस वंश के आरंभिक शासक विग्रहों, मुद्गलों और गौड़ नरेश शशांक जैसे शासकों की अधीनता में सामंत के रूप में शासन करते थे।

आरंभिक सामंत शासक

धर्मराज प्रथम (लगभग 553–575 ईस्वी)

शैलोद्भव वंश का प्रथम ऐतिहासिक शासक अभय वंश का धर्मराज प्रथम (लगभग 553–575 ईस्वी) था, जिसे रणभित/रणभंज के नाम से भी जाना जाता है। उसने छठी शताब्दी ईस्वी के मध्य में संभवतः 553 ईस्वी के आसपास दक्षिणी कलिंग के गंजाम क्षेत्र में शैलोद्भव राज्य की नींव राखी, जिसे ‘कोंगोद-मंडल’ के नाम से जाना जाता था। इसकी पुष्टि गुप्त संवत 250 (लगभग 570 ईस्वी) के सुमंडल ताम्रपत्र से होती है।

अभय वंश का धर्मराज प्रथम विग्रहवंशीय शासक पृथ्वीविग्रह के सामंत के रूप में शासन करता था और विग्रह स्वयं गुप्त सम्राटों के प्रतिनिधि (वायसरॉय) थे।

धर्मराज प्रथम (रणभित) सूर्योपासक था, क्योंकि सुमंडल ताम्रपत्र में उसे ‘सहस्र-रश्मि पदभक्त’ (सूर्य का उपासक) बताया गया है।

माधवराज प्रथम (लगभग 575–600 ईस्वी)

धर्मराज प्रथम के पश्चात् माधवराज प्रथम (सैन्यभित) कोंगोद-मंडल की गद्दी पर आसीन हुआ, जिसे सैन्यभित के नाम से जाना जाता है। गुप्त संवत 280 (लगभग 600 ईस्वी) के कनसा ताम्रपत्र से ज्ञात होता है कि माधवराज प्रथम भी विग्रह शासकों के अधीन एक ‘महासामंत’ के रूप में शासन करता था। इस तथ्य की पुष्टि उसके उत्तराधिकारी माधवराज द्वितीय के गंजाम ताम्रपत्र से भी होती है, जिसमें उसे लोकविग्रह का ‘महासामंत’ बताया गया  है।

इस प्रकार अभय परिवार के दोनों प्रारंभिक शासक—धर्मराज प्रथम (रणभित) और माधवराज प्रथम (सैन्यभित) कलिंग के विग्रह शासकों की अधीनता में शासन करते थे और क्षेत्रीय प्रशासक के रूप में कोंगोद-मंडल में स्थानीय प्रशासन और राजस्व व्यवस्था का संचालन करते थे।

अयशोभित प्रथम (लगभग 600–615 ईस्वी)

अयशोभित प्रथम (चरमपराज) के शासनकाल शैलोद्भव इतिहास के एक नए युग का आरंभ हुआ। इस समय विग्रहों और मुद्गलों के बीच तोसली पर प्रभुत्व स्थापित करने के लिए संघर्ष चल रहा था। एरंडपल्लि (555 ईस्वी) तथा सोरो ताम्रपत्र (580 ईस्वी) से ज्ञात होता है कि मुद्गल राजा संभुयास ने तोसली पर अधिकार स्थापित कर लिया और कलिंग को भी अपने अधीन करने का प्रयास किया। किंतु लोकविग्रह द्वारा पराजित होने के कारण उसकी योजना विफल हो गई। बाद में, 603 ईस्वी में उसने दक्षिण तोसली पर पुनः अधिकार कर लिया, परंतु शीघ्र ही पिष्टपुर के राजा पृथ्वीमहाराज ने उसे पराजित कर दिया, जिससे मुद्गल संभुयास की शक्ति क्षीण हो गई।

सातवीं शताब्दी ईस्वी के प्रारंभ में पृथ्वीमहाराज को उत्तर से गौड़ के शशांक के आक्रमण का सामना करना पड़ा। इसी समय चालुक्य नरेश पुलकेशिन द्वितीय ने पिष्टपुर पर अपना प्रभाव स्थापित किया। इस राजनीतिक अस्थिरता का लाभ उठाकर अयशोभित प्रथम ने सामंती स्थिति से ऊपर उठकर कोंगोद क्षेत्र में अपना अर्ध-स्वतंत्र शासन स्थापित किया और अपनी राजधानी का नाम ‘विजय कोंगोदवासक’ रखा, क्योंकि बाद के ताम्र-पत्रों में उसके किसी भी अधिपति का उल्लेख नहीं मिलता है।

खंडपाड़ा–नुआपाली अभिलेख से ज्ञात होता है कि अयशोभित प्रथम (चरमपराज) एक अर्ध-स्वतंत्र शासक था। अभिलेख में उसके अधीन कार्य करनेवाले अनेक उच्चाधिकारियों, जैसे—महासामंत, महाराज, राजनक, दंडनायक, कुमारामात्य, उपरिक और आयुक्तक का उल्लेख मिलता है।

शैलोद्भव शासक माधवराज द्वितीय के 620–21 ईस्वी के गंजाम ताम्रपत्र की प्रस्तावना अभय वंश के धर्मराज के 570–71 ईस्वी के सुमंडल ताम्रपत्र के प्रारंभिक भाग से काफी मिलती-जुलती है। इस आधार पर माना जाता है कि अभय वंश के धर्मराज और चरमपराज संभवतः उसी वंश के सदस्य थे, जिसे बाद में ‘शैलौद्भव वंश’ के नाम से जाना गया।

संभवतः अयशोभित प्रथम के शासन के अंतिम चरण में अथवा माधवराज द्वितीय के काल में कोंगोद क्षेत्र पर गौड़ के शशांक का प्रभाव स्थापित हो गया।

नुआपाली अभिलेख से ज्ञात होता है कि अयसोभित प्रथम (चरमपराज) भगवान शिव का उपासक तथा शैव धर्म का संरक्षक था।

शैलोदभवों का संप्रभु शासक के रूप में उदय

माधवराज द्वितीय (लगभग 615–665 ईस्वी)

शैलोदभवों का संप्रभु शासक के रूप में उदय अयशोभित प्रथम (चरमपराज) के पुत्र और उत्तराधिकारी माधवराज द्वितीय (सैन्यभित द्वितीय/माधववर्मन) के शासनकाल में हुआ। उसने लगभग पचास वर्षों तक कोंगोद-मंडल पर शासन किया और बदलती राजनीतिक परिस्थितियों के अनुसार कभी ‘महासामंत’, तो कभी ‘सकल-कलिंगाधिपति’ और ‘परममहेश्वर’ जैसी उपाधियाँ धारण कर खुर्दा शिलालेख जैसा स्वतंत्र दान-पत्र जारी किया।

माधवराज द्वितीय प्रारंभ में गौड़ के शक्तिशाली नरेश शशांक के अधीन सामंत के रूप में शासन करता था, क्योंकि गुप्त संवत् 300 (लगभग 620 ईस्वी) के गंजाम ताम्रपत्र में माधवराज द्वितीय को शशांक का ‘महासामंत बताया गया है। कुछ इतिहासकारों का मत है कि उड़ीसा पर विजय प्राप्त करने के बाद गौड़ राजा शशांक ने कोंगोद-मंडल को एक प्रांत के रूप में संगठित किया और माधवराज द्वितीय को इस क्षेत्र का शासक (सामंत) नियुक्त किया। इस मंडल का विस्तार वर्तमान गंजाम, खुर्दा और पुरी के आसपास था। इसकी राजधानी कोंगोद थी, जो सालिम (सालिय) नदी के किनारे स्थित थी और जिसकी पहचान आधुनिक बानपुर से की जाती है।

ऐसा लगता है कि माधवराज द्वितीय ने 620 ईस्वी के कुछ ही समय बाद संभवतः 625–626 ईस्वी के आसपास अपनी स्वतंत्रता घोषित कर दी, क्योंकि उसके खुर्दा शिलालेख में किसी अधिपति का उल्लेख नहीं है। इस शिलालेख में उसे ‘सकल-कलिंगाधिपति’ (संपूर्ण कलिंग का स्वामी) कहा गया है। किंतु उसके इस दावे को सिद्ध करने का कोई प्रमाण नहीं है कि उसने वास्तव में संपूर्ण कलिंग पर विजय प्राप्त की थी।

संभवतः माधवराज द्वितीय ने हर्षवर्धन और कामरूप के भास्करवर्मन के साथ गौड़ नरेश शशांक के संघर्ष का लाभ उठाकर अपनी स्वतंत्रता की घोषणा की थी। संभव है कि उसने गंग क्षेत्र के कुछ हिस्से पर अधिकार कर लिया हो, किंतु उसकी यह सफलता संभवतः अस्थायी रही होगी। उसके शिलालेखों में कहा गया है कि उसने अश्वमेध जैसे वैदिक यज्ञों का आयोजन किया था, जो प्राचीन भारतीय परंपरा में संप्रभुता और सार्वभौमिक सत्ता के प्रतीक माने जाते थे।

उत्तर भारत के हर्षवर्धन और दक्षिण के पुलकेशिन द्वितीय के बीच सत्ता-संघर्ष के दौरान माधववर्मन ने तटस्थ नीति अपनाई और अपने राज्य की स्वतंत्रता बनाए रखी। माधवराज द्वितीय के शासनकाल के अंतिम चरण में जारी किए गए शिलालेखों में शैलौद्भव राजवंश की उत्पत्ति की पौराणिक कथा मिलती है। इन शिलालेखों का आरंभिक भाग गद्य के बजाय पद्य में मिलता है, जो जैसी पुलकेशिन द्वितीय के ऐहोल शिलालेख के समान है। संभवतः शशांक की मृत्यु के बाद हर्ष ने इस क्षेत्र पर आक्रमण किया था और बाद में पुलकेशिन ने हर्ष को पराजित किया था।

ताम्रपत्रों से ज्ञात होता है कि लगभग 628 ईस्वी के आसपास माधवराज द्वितीय ‘माधववर्मन’ नाम से भी प्रसिद्ध हुआ। इसी समय उसके राज्य को ‘कोंगोद-मंडल’ कहा जाने लगा। उसने कोंगोद-मंडल का विस्तार उत्तर में महानदी तक तथा दक्षिण में महेंद्रगिरि तक किया। किंतु यह विस्तार सैन्य विजयों की अपेक्षा प्रशासनिक नियंत्रण, कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था और भूमि-अनुदान की सुदृढ़ प्रणाली पर आधारित था।

माधवराज द्वितीय के शासनकाल के दौरान लगभग 638 ईस्वी में चीनी तीर्थयात्री ह्वेनसांग ने कोंगोद (कुंग-उ- तो) की यात्रा की थी। उसने इस क्षेत्र का वर्णन करते हुए लिखा है कि देश की सीमाओं के भीतर कई दर्जन छोटे-छोटे नगर हैं जो पहाड़ों से घिरे हुए और समुद्र के किनारे स्थित हैं। ये नगर सुदृढ़ और ऊँचे हैं तथा यहाँ के सैनिक साहसी और पराक्रमी हैं। वे पड़ोसी प्रदेशों पर अपना प्रभाव बनाए रखते हैं, जिससे कोई उनका सहज विरोध नहीं कर पाता है। समुद्र के किनारे बसे देश कई दुर्लभ और मूल्यवान वस्तुएँ प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं। वे व्यापारिक लेन-देन में कौड़ियों तथा मोतियों का प्रयोग करते हैं।

इसी समय कलिंग का गंग वंश पुनः शक्तिशाली हो गया। शशांक द्वारा पूर्व में पराजित किए जाने के बाद उन्होंने पश्चिमी चालुक्यों की सहायता से अपनी शक्ति का पुनर्गठन किया और कलिंग पर पुनः अधिकार कर लिया। इसकी सूचना गंग शासक इंद्रवर्मन तृतीय के चिकाकोल अभिलेख से मिलती है। ऐसी परिस्थिति में माधवराज द्वितीय को संभवतः गंग शासकों की अधीनता स्वीकार करनी पड़ी। संभवतः यही कारण है कि बाद के अभिलेखों में उसकी ‘कलिंगाधिपति’ (कलिंग का स्वामी) की उपाधि नहीं मिलती है।

पुलकेशिन द्वितीय की मृत्यु के पश्चात् लगभग 642 ईस्वी में हर्षवर्धन ने कोंगोद विजय के लिए अभियान किया। हर्ष का यह आक्रमण संभवतः बादामी के चालुक्य नरेश पुलकेशिन द्वितीय को उत्तर-पूर्व दिशा से आक्रमण करने से रोकने के उद्देश्य से किया गया था। पुलकेशिन के ऐहोल अभिलेख (633–634 ईस्वी) से ज्ञात होता है कि महाकोसल और कलिंग पर उसकी विजय हुई थी। ह्वेनसांग के यात्रावृत्त से भी उड़ीसा के अनेक क्षेत्रों पर उसके अधिकार की पुष्टि होती है। किंतु यह स्पष्ट नहीं है कि शशांक की अधीनता स्वीकार करने वाला माधवराज द्वितीय हर्ष की अधिसत्ता मानने के लिए बाध्य हुआ था। यदि शैलोद्भव शासक ने हर्ष की अधीनता स्वीकार भी की हो, तो संभव है कि उसके हटते ही वह समाप्त हो गई होगी।

माधवराज द्वितीय शैलोद्भव वंश का सर्वाधिक शक्तिशाली शासक था। उसके शासनकाल में कोंगोद राजनीतिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यधिक समृद्ध हुआ। उसके ताम्रपत्रों, विशेषकर गंजाम ताम्रपत्र से ज्ञात होता है कि उसने विभिन्न ग्रामों को ब्राह्मणों को कर-मुक्त दान के रूप में प्रदान किया। उसके अभिलेखों में ‘परममहेश्वर’ जैसी उपाधि का प्रयोग उसकी शैव-भक्ति का प्रमाण है। उसने न केवल मंदिरों तथा वैदिक परंपराओं को संरक्षण प्रदान किया, बल्कि अश्वमेध और वाजपेय यज्ञों को भी पुनः प्रारंभ करवाया।

माधवराज द्वितीय के शासन के लगभग पचासवें वर्ष (लगभग 665 ईस्वी) के बाद उसके संबंध में कोई स्पष्ट सूचना नहीं मिलती है। किंतु जिस प्रकार उसने समकालीन शक्तिशाली शासकों—शशांक, पुलकेशिन द्वितीय तथा हर्षवर्धन के बीच संतुलन बनाए रखा और कोंगोद की स्वतंत्रता को सुरक्षित रखा, उससे स्पष्ट होता है कि वह एक अत्यंत कुशल, व्यावहारिक और दूरदर्शी शासक था।

इस प्रकार सातवीं शताब्दी के मध्य तक शैलोद्भव एक सुदृढ़ और स्वतंत्र क्षेत्रीय शक्ति के रूप में स्थापित हो चुके थे, जहाँ वे बिना किसी बाहरी अधिपति के हस्तक्षेप के स्वतंत्र रूप से दान और प्रशासनिक निर्णय लेने में सक्षम थे। शैलोद्भव वंश का यह उत्कर्ष किसी सैन्य विजय का परिणाम नहीं था, बल्कि क्रमिक प्रशासनिक सुदृढ़ीकरण, भूमि-अनुदान की परंपरा और क्षेत्रीय परिस्थितियों के कुशल उपयोग का परिणाम था।

मध्यमराज प्रथम (लगभग 665–695 ईस्वी)

माधवराज द्वितीय के बाद उसके पुत्र मध्यमराज प्रथम (अयशोभित द्वितीय) ने शासन संभाला। उसके संबंध में जानकारी का मुख्यतः पारिकुद ताम्रपत्र से प्राप्त होती है, जिसमें उसके कुछ अलौकिक गुणों का वर्णन है, जैसे—वह दिवंगत आत्माओं से संवाद कर सकता था तथा अपने सैनिकों के कंधों पर खड़े होकर तीव्र गति से दौड़ सकता था। यद्यपि इसे प्रशस्ति-शैली की अतिशयोक्ति माना जाता है, किंतु इससे उसके प्रभावशाली और विशिष्ट व्यक्तित्व का आभास मिलता है।

मध्यमराज प्रथम को शिलालेखों में अश्वमेध और वाजपेय सहित विभिन्न वैदिक यज्ञों के आयोजन का श्रेय दिया गया है, जो उसकी संप्रभुता का द्योतक है। उसके पारिकुद अभिलेख से ज्ञात होता है कि उसने कटक-भुक्ति में बारह ब्राह्मणों को एक ग्राम दान दिया था।

पुरातात्त्विक स्रोतों से ज्ञात होता है कि उसने तीस वर्ष तक शासन किया और उसका शासनकल शांतिपूर्ण एवं समृद्ध था।

धर्मराज द्वितीय (लगभग 695–725 ईस्वी)

मध्यमराज प्रथम की मृत्यु के बाद उसका ज्येष्ठ पुत्र माधवराज तृतीय (श्रीमनभित) गद्दी पर बैठा, किंतु छोटे भाई धर्मराज द्वितीय (मानभित) ने उसका विरोध किया, जिससे उत्तराधिकार-संबंधी युद्ध छिड़ गया। धर्मराज के अभिलेखों के अनुसार उसने सिंहासन प्राप्त करने के लिए सामंतों तथा उच्च अधिकारियों की सहायता से फासिक नामक स्थान पर अपने ज्येष्ठ भ्राता माधव (माधवराज तृतीय) को पराजित कर कोंगोद-मंडल के सिंहासन पर अधिकार कर लिया।

पराजित माधवराज तृतीय ने दक्षिण कोसल के श्रीपुर (सिरपुर) के सोमवंशी शासक तीवरदेव की सहायता से पुनः कोंगोद पर अधिकार करने का प्रयास किया, परंतु धर्मराज द्वितीय (मानभित) ने उनकी संयुक्त सेना को पराजित कर तीवरदेव को मार डाला और माधव विंध्याचल की ओर भाग गया।

धर्मराज द्वितीय (मानभित) एक धर्मपरायण तथा उदार शासक था। उसने वैदिक यज्ञों का आयोजन करवाया, विद्वानों को संरक्षण और ब्राह्मणों को दान दिया। पुरी अभिलेख में उसके द्वारा गोलस्वामी नामक ब्राह्मण को कोंगोद-मंडल के वरतिनी विषय के दोंगी नामक गाँव के एक खेत का दान का उल्लेख है। सोनपुर अभिलेख से पता चलता है कि उसने खिडिगहार विषय के खोण्डेण्डा नामक गाँव के आधे भाग को भट्टगोणदेवस्वामी नामक अग्निहोत्री ब्राह्मण को दान दिया था।

धर्मराज द्वितीय धार्मिक सहिष्णुता के लिए भी प्रसिद्ध था। उसके बानपुर ताम्रपत्र से ज्ञात होता है कि उसकी रानी कल्याणदेवी ने प्रभोधचंद्र नामक एक जैन साधु को भूमि दान में दी थी, जो उसकी उदार धार्मिक नीति का प्रमाण है।

गंग शासक सामंतवर्मन के काम-नलिनाक्षपुर अभिलेख में ‘धर्मराज-कलिंगमार्ग’ नामक एक राजमार्ग का उल्लेख मिलता है, जिसका निर्माण संभवतः धर्मराज द्वितीय (मानभित) ने ही करवाया था।

धर्मराज द्वितीय एक शक्तिशाली एवं प्रभावशाली शासक था, जिसने लगभग तीस वर्ष तक शासन किया। निमिना (निविन) शिलालेख में उसकी ‘परमभट्टारक’, ‘महाराजाधिराज’ तथा ‘परमेश्वर’ जैसी शाही उपाधियाँ मिलती हैं, जो उसकी स्वतंत्र एवं सार्वभौम सत्ता का प्रमाण हैं।

शैलोद्भव राज्य का विघटन

संभवतः धर्मराज द्वितीय (मानभित) के शासनकाल के अंतिम चरण में शैलोद्भव राज्य के विघटन की प्रक्रिया आरंभ हो गई थी। टेक्कली ताम्रपत्र के अनुसार उसका उत्तराधिकारी उसका पुत्र मध्यमराज द्वितीय (अयशोभित तृतीय) हुआ। वह एक साहसी और ऊर्जावान शासक था, किंतु पूर्वी भारत की राजनीतिक परिस्थितियों में परिवर्तन होने के कारण शैलोद्भव राज्य की राजनीतिक स्थिति अपेक्षाकृत क्षीण हो चुकी थी। इस समय एक ओर कलिंग क्षेत्र में पूर्वी गंग वंश का प्रभाव बढ़ रहा था, तो दूसरी ओर तोसली क्षेत्र में भौम-कर वंश का उदय हो रहा था। इन नवोदित शक्तियों के बीच शैलोद्भव शासक अपनी स्वतंत्रता बनाए रखने में असमर्थ थे। मध्यमराज द्वितीय (अयशोभित तृतीय) ने भौम-कर आक्रमणों का कड़ा प्रतिरोध किया, किंतु उसके प्रयास सफल नहीं हुए।

मध्यमराज द्वितीय (अयशोभित तृतीय) का कोई उत्तराधिकारी नहीं था। बाद के मध्यमराज तृतीय के टेक्कली ताम्रपत्र से ज्ञात होता है कि उसका एक चचेरा भाई अल्लपराज (ऐलपराज/युवराज तैलप) था, जो संभवतः माधवराज तृतीय का पुत्र था। इस शिलालेख के अनुसार अल्लपराज का पुत्र रणक्षोभ था, जिसे तैलपनिभ के नाम से भी जाना जाता था। किंतु यह स्पष्ट नहीं है कि अल्लपराज या तैलपनिभ कभी शासन करने में सफल हुए थे या नहीं, संभवतः कम उम्र में ही उनकी मृत्यु हो गई थी।

मध्यमराज तृतीय शैलोद्भव वंश का अंतिम ज्ञात शासक माना जाता है, जो संभवतः तैलपनिभ (रणक्षोभ) का पुत्र था। कुछ इतिहासकार शांतिकर प्रथम को इस वंश का अंतिम शासक स्वीकार करते हैं। किंतु टेक्कली ताम्रपत्र और वंशावली के आधार पर सामान्यतः मध्यमराज तृतीय (लगभग 736 ईस्वी) को ही शैलोद्भव वंश का अंतिम ज्ञात शासक माना जाता है। शांतिकर प्रथम संभवतः मध्यमराज तृतीय का ही दूसरा नाम था अथवा  वह कोई उत्तरकालीन शासक था।

टेक्कली ताम्रपत्र से ज्ञात होता है कि मध्यमराज तृतीय के समय (लगभग 736 ईस्वी) तक शैलोद्भवों के पूर्व में शासित क्षेत्र भौम-करों के नियंत्रण में चले गए थे और शैलोद्भव शासक गंग शासकों के सामंत के रूप में टेक्कली क्षेत्र पर शासन करने लगे थे।

शैलोद्भव सत्ता के अवसान के उपरांत शैलोद्भव क्षेत्रों का पुनर्गठन किया गया और उन्हें भौम-कर शासकों के अधीन विभिन्न सामंतों को सौंप दिया गया। ऐसा लगता है कि उनका क्षेत्र श्वेतक के गंग वंश का हिस्सा बन गया था, जो कुछ समय तक भौम-कर राजा उन्मत्तकेशरी के अधीन सामंत के रूप में शासन करते थे। 786–787 ईस्वी के एक शिलालेख के अनुसार रणक विश्ववर्णव को कोंगोद-मंडल का सामंत नियुक्त किया गया था, जो उस समय भौम-कर राज्य का एक प्रांत बन चुका था।

मध्यमराज तृतीय के बाद शैलोद्भव वंश के इतिहास के संबंध में कोई स्पष्ट और विश्वसनीय सूचना नहीं मिलती है। आठवीं शताब्दी के मध्य तक शैलोद्भव वंश इतिहास के पटल से विलुप्त हो गया।

शैलोद्भव वंश का पतन मुख्यतः बाह्य शक्तियों—विशेषकर भौम-कर वंश के उदय और उनके सैन्य विस्तार का परिणाम माना जाता है। किंतु अभिलेखों से ऐसा प्रतीत होता है कि यह परिवर्तन केवल युद्ध के कारण नहीं हुआ, बल्कि प्रशासनिक निरंतरता और संभवतः वैवाहिक संबंधों के माध्यम से भी हुआ, क्योंकि भौम-कर अभिलेखों से कोंगोद क्षेत्र पर उनके अधिकार की सूचना मिलती है, किसी बड़े युद्ध का स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता है।
इस प्रकार शैलोद्भव वंश ने लगभग दो शताब्दियों तक क्षेत्रीय राजनीति में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई और कोंगोद-मंडल पर शासन किया। उनके शासनकाल में ब्राह्मण धर्म का व्यापक प्रसार हुआ तथा प्रशासनिक और धार्मिक संस्थाओं को सुदृढ़ आधार प्राप्त हुआ। यद्यपि इस वंश को समय-समय पर बाह्य आक्रमणों और राजनीतिक संघर्षों का सामना करना पड़ा, फिर भी उन्होंने दीर्घकाल तक अपनी सत्ता को बनाए रखा। अंततः उभरती क्षेत्रीय शक्तियों—विशेषतः भौम-कर वंश के उदय के साथ इस राजवंश का विघटन हो गया।

शैलोद्भवकालीन प्रशासन और संस्कृति

प्रशासनिक व्यवस्था

शैलोद्भवों ने कोंगोद-मंडल में प्राचीन भारतीय राजतंत्रीय प्रणाली पर आधारित एक संगठित एवं अपेक्षाकृत केंद्रीकृत प्रशासन स्थापित किया था। राजा सर्वोच्च सत्ता का केंद्र था, जिसे महाराज, परमेश्वर, महासामंत आदि उपाधियों से विभूषित किया जाता था। शैलोद्भव शासक वैदिक परंपराओं के अनुसार शासन करते थे। उन्होंने यज्ञों तथा ब्राह्मणों को संरक्षण प्रदान करके ब्राह्मणवादी व्यवस्था को सुदृढ़ बनाया।

प्रशासनिक सुविधा की दृष्टि से शैलोद्भव राज्य को मंडल और विषय (जिला) जैसी विभिन्न प्रशासनिक इकाइयों में विभाजित किया गया था। ‘मंडल’ राजा के अधीन बड़े प्रशासनिक क्षेत्र होते थे, जहाँ वह स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार शासन का संचालन करता था। ‘विषय’ स्तर पर स्थानीय प्रशासन, राजस्व-संग्रह तथा राजकीय आदेशों के क्रियान्वयन हेतु अधिकारियों की नियुक्ति की जाती थी। शिलालेखों में ‘उत्कल-विषय’ से संबंधित अधिकारियों का उल्लेख प्राप्त होता है। प्रशासन की सबसे छोटी इकाई ग्राम थी, जिसका प्रमुख ग्रामिक कहलाता था।

राजस्व व्यवस्था

शैलोद्भवों की राजस्व-व्यवस्था मुख्यतः भूमि पर आधारित थी। राज्य की आय का प्रमुख स्रोत कृषि उत्पादन था। भूमि से प्राप्त कर तथा उपज का एक भाग राजस्व के रूप में लिया जाता था। शासक प्रायः ब्राह्मणों एवं धार्मिक संस्थाओं को ब्रह्मदेय तथा अग्रहार के रूप में भूमि, गाँव अथवा कृषि क्षेत्र दान में प्रदान करते थे, जो सामान्यतः कर-मुक्त तथा स्थायी या वंशानुगत होते थे। इसकी पुष्टि गंजाम और बानपुर के ताम्रपत्र अभिलेखों से होती है।

इन भूमि-अनुदानों के माध्यम से राज्य, राजस्व-संग्रह से संबंधित कुछ अधिकार दान-प्राप्तकर्ताओं को हस्तांतरित कर देता था। इस व्यवस्था में कठोर केंद्रीकरण के स्थान पर संरक्षण तथा स्थानीय प्रबंधन को अधिक प्राथमिकता दी जाती थी। इसके साथ ही, राजस्व अधिकारियों द्वारा आंतरिक आकलन (मूल्यांकन) की व्यवस्था भी की गई थी, जिससे राज्य को कृषि-अधिशेष का उचित भाग प्राप्त हो सके। ताम्रपत्रों में दान की गई भूमि की सीमाओं, करों से छूट तथा बाहरी हस्तक्षेप से सुरक्षा का विस्तृत उल्लेख मिलता है। इससे स्पष्ट होता है कि धार्मिक वैधता को राजकोषीय नीति के साथ जोड़ दिया गया था।

न्यायिक कार्य प्रायः प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा ही संपादित किए जाते थे, किंतु केंद्रीय सत्ता का नियंत्रण बना रहता था। ताम्रपत्रों में दान-भूमि से संबंधित विवादों को निषिद्ध किया गया है तथा उल्लंघन करने वालों के लिए दंडात्मक और धार्मिक चेतावनियाँ (श्राप) दी गई हैं। इससे ज्ञात होता है कि औपचारिक न्यायालयों की अपेक्षा प्रशासनिक एवं धार्मिक नियंत्रण अधिक प्रभावी था।

शासन-व्यवस्था में सामंती तत्व भी विद्यमान थे। महासामंत जैसे अधिकारी सीमावर्ती अथवा अधीनस्थ क्षेत्रों का प्रशासन संचालित करते थे। यद्यपि वे नाममात्र रूप से राजा के अधीन होते थे, फिर भी स्थानीय स्तर पर उन्हें पर्याप्त अधिकार प्राप्त थे। इसके बावजूद, ताम्रपत्रों से ज्ञात होता है कि केंद्रीय सत्ता भूमि-अनुदानों तथा प्रशासनिक नियंत्रण के माध्यम से अपनी प्रधानता बनाए रखती थी।

इस प्रकार, शैलोद्भव प्रशासन एक संतुलित प्रणाली पर आधारित था, जिसमें केंद्रीय नियंत्रण और स्थानीय स्वायत्तता के बीच समन्वय स्थापित किया गया था। सीमित संसाधनों तथा कृषि-प्रधान अर्थव्यवस्था के संदर्भ में यह व्यवस्था प्रभावी एवं व्यावहारिक सिद्ध हुई।

शैलोद्भव अर्थव्यवस्था
कृषि

शैलोद्भवों की अर्थव्यवस्था मुख्यतः कोंगोद-मंडल की कृषि पर आधारित थी। इस क्षेत्र में पूर्वी घाट के निकट स्थित उपजाऊ जलोढ़ मैदान तथा वर्तमान ओड़िशा के गंजाम जिले के तटीय भाग सम्मिलित थे। यहाँ मानसून पर निर्भर कृषि-प्रणाली प्रचलित थी, जिसके कारण धान (चावल) की फसल प्रमुख रूप में उगाई  जाती थी। ऋषिकुल्या तथा अन्य नदियों के जल से भूमि की उर्वरता में वृद्धि होती थी, जिससे कृषि उत्पादन में स्थिरता बनी रहती थी।

छठी से आठवीं शताब्दी के ताम्रपत्र अभिलेखों में ब्राह्मणों तथा मंदिरों को भूमि-दान देने का उल्लेख मिलता है। इन दानों में प्रायः करों से छूट प्रदान की जाती थी और किसानों से सामान्यतः उपज का छठे से चौथे भाग तक कर के रूप में वसूल किया जाता था। इससे स्पष्ट होता है कि राज्य की आय कृषि-अधिशेष पर निर्भर थी, किंतु अत्यधिक केंद्रीकृत कर-संग्रह के स्थान पर एक संतुलित एवं व्यावहारिक व्यवस्था अपनाई गई थी।

कुछ अभिलेखों से यह भी ज्ञात होता है कि सिंचाई के लिए जल-संसाधनों का उपयोग किया जाता था। इससे प्रतीत होता है कि सिंचाई के कुछ स्थानीय साधन अवश्य विद्यमान थे, जिनसे कृषि उत्पादन में वृद्धि हुई। किंतु बड़े बाँधों या नहरों के स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलते, जिससे यह अनुमान किया जाता है कि कृषि मुख्यतः प्राकृतिक वर्षा तथा नदियों पर निर्भर थी।

व्यापार

कोंगोद बंगाल की खाड़ी के निकट स्थित था और तटीय स्थिति के कारण उसे समुद्री संपर्क का लाभ मिला। ह्वेनसांग ने भी उल्लेख किया है कि कोंगोद समुद्र तट पर स्थित समृद्ध प्रदेश था और वहाँ बहुमूल्य वस्तुएँ उपलब्ध थीं।  तटीय बंदरगाहों के माध्यम से चावल, वस्त्र मसाले, लकड़ी एवं रत्नों का व्यापार संभवतः दक्षिण-पूर्व एशिया के क्षेत्रों से किया जाता था। यद्यपि शैलोद्भव वंश के प्रत्यक्ष और स्वतंत्र व्यापारिक प्रभुत्व के स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलते हैं, फिर भी यह व्यापार व्यापक कलिंगीय समुद्री परंपरा का हिस्सा था। इसी आधार पर कुछ विद्वानों ने शैलोद्भवों और जावा के शैलेन्द्र वंश के बीच सांस्कृतिक संबंधों की संभावना व्यक्त की है।

आंतरिक व्यापार के लिए राजमार्गों और नदी मार्गों के माध्यम से वस्तुओं का आवागमन होता था। इन मार्गों पर लगने वाले कर (टोल) और स्थानीय सरदारों तथा अधीनस्थ सामंतों से प्राप्त उपहार और कर भी राज्य की आय के स्रोत थे। इस प्रकार शैलोद्भव अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार कृषि था, जबकि व्यापार और कर-व्यवस्था उसमें सहायक भूमिका निभाते थे।

सैन्य एवं सुरक्षा व्यवस्था

शैलोद्भव शासकों ने अपनी सीमाओं की रक्षा के लिए एक संगठित, किंतु सीमित सैन्य व्यवस्था का प्रबंध किया था। उनकी सैन्य व्यवस्था मुख्यतः स्थानीय सैनिकों तथा सामंतों पर आधारित थी, जिसका मुख्य उद्देश्य आक्रामक विस्तार के बजाय राज्य की सुरक्षा और आंतरिक स्थिरता बनाए रखना था। मुख्यतः स्थानीय सैनिकों और सामंतों पर आधारित थी। ताम्रपत्रों में माधवराज प्रथम और माधवराज द्वितीय जैसे शासकों को ‘कलिंगाधिपति’ के रूप में वर्णित किया गया है, जिससे राजनीतिक शक्ति और प्रभाव का संकेत मिलता है। इन अभिलेखों में वर्णित विजयों को प्रायः प्रशस्तिपरक अतिशयोक्ति माना जाता है, क्योंकि व्यापक सैन्य अभियानों या बड़े भू-भागों के विजय के ठोस प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं।

शैलोद्भव शासकों का मुख्य ध्यान कोंगोद-मंडल के अंतर्गत क्षेत्रों के एकीकरण और सुरक्षा पर था, जिसमें वर्तमान गंजाम और पुरी के क्षेत्र सम्मिलित थे। भौमकरों तथा अन्य क्षेत्रीय शक्तियों के के साथ संघर्षों में शैलोद्भव शासकों ने रक्षात्मक नीति अपनाई। उनके अभिलेखों में आक्रमणों के विरुद्ध प्रतिरोध का उल्लेख तो मिलता है, किंतु किसी बड़े आक्रामक अभियानों की कोई सूचना नहीं है।

सातवीं शताब्दी में उत्तरी भारत के शक्तिशाली शासक हर्षवर्धन के अभियानों तथा दक्षिण के चालुक्य शासकों के बाहरी दबावों के कारण शैलोद्भवों की शक्ति सीमित हुई। ऐसी परिस्थितियों में उन्होंने सैन्य टकराव के बजाय कूटनीतिक संतुलन की नीति अपनाई।

इस प्रकार शैलोद्भव वंश की सैन्य नीति व्यावहारिक और रक्षात्मक थी। उन्होंने अपने सीमित संसाधनों के अनुरूप सुरक्षा को प्राथमिकता दी, जिससे उन्हें कुछ समय तक स्थिरता प्राप्त हुई, किंतु दीर्घकाल में उभरती शक्तियों—विशेषतः भौम-कर और पूर्वी गंग वंश के सामने उनकी स्थिति कमजोर पड़ गई।

शैलोद्भव राज्य की सुरक्षा-व्यवस्था मुख्यतः उसकी प्राकृतिक भौगोलिक संरचना पर आधारित थी। इस राज्य का विस्तार उत्तर में महानदी के तटीय मैदानों से लेकर दक्षिण में महेंद्रगिरि तथा ऋषिकुल्या नदी के आसपास के क्षेत्रों तक फैला हुआ था। इन क्षेत्रों के मध्य अनेक नीची पहाड़ियाँ एवं दुर्गम भू-भाग स्थित थे। पूर्वी घाट की पर्वतीय तलहटी, ऊबड़-खाबड़ स्थलाकृति तथा पहाड़ी क्षेत्र राज्य की प्राकृतिक रक्षा में महत्वपूर्ण सहायक सिद्ध होते थे।

इस भौगोलिक स्थिति के कारण शैलोद्भव शासकों के लिए कृषि क्षेत्रों तथा व्यापारिक मार्गों पर नियंत्रण बनाए रखना अपेक्षाकृत सरल था। तथापि, राज्य के कुछ भू-भाग रक्षा की दृष्टि से अपेक्षाकृत कमजोर भी थे। विशेष रूप से ऋषिकुल्या से महानदी तक फैला तटीय मार्ग समतल होने के कारण बाहरी शक्तियों के लिए प्रवेश का सुगम मार्ग बन जाता था। परिणामस्वरूप, इसी मार्ग से आंध्र क्षेत्र के शासकों तथा बाद में पूर्वी गंग वंश जैसी शक्तियों का दबाव शैलोद्भव राज्य पर बढ़ा।

कोंगोद इस राज्य का प्रमुख राजनीतिक एवं प्रशासनिक केंद्र था, जिसकी पहचान वर्तमान बानपुर क्षेत्र के निकट मानी जाती है। इसके अतिरिक्त, बांकाडागढ़ जैसे दुर्ग-स्थल भी सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण थे, क्योंकि इन सुरक्षित ऊँचे स्थानों से राज्य की सीमाओं की निगरानी की जाती थी। दुर्गों के निर्माण में मिट्टी के प्राचीर और पत्थर की दीवारों का उपयोग किया जाता था, जो प्राकृतिक ढलानों के साथ समन्वित होकर सुरक्षा को सुदृढ़ बनाते थे।

धर्म और सांस्कृतिक संरक्षण

शैलोद्भव वंश के शासक मुख्यतः शैव धर्म के अनुयायी थे। एक पौराणिक कथा में उनके संस्थापक को भगवान शिव से उत्पन्न बताया गया है। उनके शिलालेख प्रायः शिव-स्तुति से आरंभ होते हैं तथा उनकी राजमुद्राओं पर नंदी (बैल) का चिह्न अंकित मिलता है। शैलोद्भव शासकों को ‘परममहेश्वर’ (शिव का महान भक्त) की उपाधि से संबोधित किया गया है। इससे स्पष्ट होता है कि शैव धर्म उनकी राजकीय वैधता का प्रमुख आधार था।

माधवराज द्वितीय के बुगुड़ा ताम्रपत्र जैसे अभिलेखों से भी ज्ञात होता है कि शैलोद्भव शासक शिव-भक्ति से संबंधित थे। उन्होंने शैव मंदिरों, ब्राह्मणों तथा धार्मिक संस्थाओं को बड़े पैमाने पर भूमि-दान एवं ग्राम-दान दिए। माधवराज के गंजाम ताम्रपत्र (गुप्त संवत् 300 / 619 ईस्वी) में कृष्णगिरि-विषय के छवलखय ग्राम को छररूपस्वामी नामक व्यक्ति को दान देने का उल्लेख मिलता है। इसी प्रकार धर्मराज द्वितीय तथा मध्यमराज के बाणपुर ताम्रपत्रों में ब्राह्मणों के निवास, ग्रामों की सीमाओं तथा राजस्व व्यवस्था का उल्लेख मिलता है। इन अभिलेखों से प्रशासनिक संगठन तथा धार्मिक संरक्षण—दोनों का ज्ञान प्राप्त होता है।

शैलोद्भव शासकों ने अनेक शिव मंदिरों का निर्माण करवाया। परशुरामेश्वर मंदिर संभवतः माधवराज द्वितीय के शासनकाल में निर्मित हुआ था, जो प्रारंभिक कलिंग शैली तथा धार्मिक परंपराओं का उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है। इस मंदिर की वास्तुकला, विशेषकर देउल (शिखर) तथा जगमोहन (मंडप), बाद की उड़िया मंदिर-परंपरा के विकास का आधार सिद्ध हुई। इसके अतिरिक्त शत्रुघ्नेश्वर मंदिर, भारतेश्वर मंदिर, लक्ष्मणेश्वर मंदिर तथा स्वर्णजलेश्वर मंदिर भी इसी काल की स्थापत्य परंपरा से संबंधित माने जाते हैं।

धार्मिक जीवन में वैदिक परंपराओं का भी महत्त्वपूर्ण स्थान था। वैदिक यज्ञों तथा अनुष्ठानों का पुनरुद्धार शैलोद्भव काल की प्रमुख विशेषता थी। माधवराज द्वितीय जैसे शासकों ने अश्वमेध तथा वाजपेय जैसे यज्ञों का आयोजन कर वैदिक परंपरा को संरक्षण प्रदान किया।

यद्यपि शैव तथा ब्राह्मण परंपराओं का प्रभुत्व था, तथापि वैष्णव धर्म को भी कुछ संरक्षण प्राप्त था। बौद्ध धर्म का प्रभाव भी पूर्णतः समाप्त नहीं हुआ था। नीलकंठेश्वर मंदिर के अभिलेख से ज्ञात होता है कि महान बौद्ध दार्शनिक धर्मकीर्ति का संबंध इसी क्षेत्र से था।

शैलोद्भव शासकों ने शैव एवं वैष्णव धर्मों के साथ-साथ स्थानीय जनजातीय परंपराओं के साथ भी समन्वय स्थापित किया तथा जैन धर्म के अनुयायियों को भी संरक्षण प्रदान किया, जिससे उनकी धार्मिक सहिष्णुता का परिचय मिलता है।

इस प्रकार, शैलोद्भव वंश की धार्मिक नीति ने एक ओर ब्राह्मणवादी-वैदिक परंपरा को सुदृढ़ किया, वहीं दूसरी ओर स्थानीय सांस्कृतिक तत्वों के साथ सामंजस्य स्थापित कर अपनी सत्ता को स्थायित्व प्रदान किया।

कला और साहित्य

शैलोद्भव काल वर्तमान उड़ीसा में मंदिर स्थापत्य के प्रारंभिक विकास महत्वपूर्ण चरण था। इस काल की वास्तुकला में अपेक्षाकृत सरल, किंतु प्रयोगात्मक संरचनाएँ दिखाई देती हैं, जिन्होंने आगे चलकर विकसित होने वाली कलिंग शैली की नींव रखी। इन मंदिरों के निर्माण में प्रायः खोंडालाइट पत्थर का उपयोग किया गया तथा ‘देउल’ (शिखरयुक्त गर्भगृह) की प्रारंभिक आकृतियाँ विकसित होने लगीं, जिनमें क्रमशः वक्राकार ऊँचे शिखरों का विकास हुआ। भुवनेश्वर में स्थित शत्रुघ्नेश्वर मंदिर प्रारंभिक कलिंग शैली का उत्कृष्ट उदाहरण है। महेंद्रगिरि शैलोद्भवों का सांस्कृतिक केंद्र था, जहाँ से अनेक शिव मंदिर तथा मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं। कृष्णगिरि एवं बंकाडा के अवशेष शैलोद्भव स्थापत्य एवं नगर नियोजन के प्रमाण प्रस्तुत करते हैं।

बांकाडगड़ा बंकाडा क्षेत्र में स्थित भारतेश्वर और लक्ष्मणेश्वर जैसे मंदिर इस काल की स्थापत्य परंपरा के प्रतिनिधि उदाहरण माने जाते हैं। ये मंदिर मुख्यतः भगवान शिव को समर्पित थे और इनकी संरचना अपेक्षाकृत सरल थी—जैसे समतल अथवा पिड़ा (स्तरीय) छतें तथा सीमित मूर्तिकला-सज्जा। इन प्रारंभिक प्रयोगों ने बाद के भव्य और अलंकृत मंदिर-निर्माण की दिशा निर्धारित की।

पुरातात्त्विक उत्खननों से बांकाडगड़ा से स्वप्नेश्वर मंदिर के अवशेष भी प्राप्त हुए हैं, जिनमें ‘पिड़ा-मुंडी’ (पिरामिडाकार छत) जैसे स्थापत्य तत्त्वों का प्रयोग किया गया है। यही तत्त्व कालांतर मे उड़ीसा की मंदिर वास्तुकला में एक महत्त्वपूर्ण शैलीगत विशेषता के रूप में विकसित हुए।

शिल्प एवं कला के अन्य रूपों के संबंध में प्रत्यक्ष प्रमाण बहुत सीमित हैं। धातुकला या अन्य हस्तशिल्पों को विशेष रूप से शैलोद्भव संरक्षण से जोड़ने वाले पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध नहीं हैं। इस वंश के शासकों ने अपने संसाधनों का उपयोग विविध प्रकार की कलात्मक विलास-वस्तुओं के उत्पादन में न करके मुख्यतः मंदिर-निर्माण और धार्मिक स्थापत्य के विकास में किया।

साहित्य

साहित्य के क्षेत्र में शैलोद्भव वंश का योगदान मुख्यतः अभिलेखीय परंपरा तक सीमित था। शैलोद्भव ताम्रपत्र उड़ीसा में संस्कृत काव्य परंपरा के प्रारंभिक उदाहरण माने जा सकते हैं। इनके ताम्रपत्र अभिलेखों में उत्कृष्ट संस्कृत भाषा में अलंकृत ‘प्रशस्तियाँ’ (स्तुतियाँ) गद्य एवं पद्य में अंकित की जाती थीं, जो शासकों की वंशावली, गुणों तथा धार्मिक आस्थाओं का वर्णन करती थीं। इन अभिलेखों में काव्यात्मक शैली, उपमाओं और अलंकारों का प्रयोग मिलता है, जो उस समय की दरबारी साहित्यिक परंपरा और शास्त्रीय संस्कृत काव्य के प्रभाव का द्योतक हैं। इन प्रशस्तियों का उद्देश्य स्वतंत्र साहित्यिक सृजन न होकर राजकीय वैधता को स्थापित करना और दान-प्रक्रियाओं को प्रमाणित करना था। कुछ अभिलेखों से यह भी संकेत मिलता है कि ताम्रपत्रों पर अंकन से पूर्व सामग्री को ताड़पत्रों पर प्रारूप के रूप में लिखा जाता था, जिससे प्रशासनिक अभिलेखन की विकसित परंपरा का ज्ञान होता है।

इस प्रकार शैलोदभवों का पूर्वी भारत के इतिहास में महत्त्वपूर्ण स्थान है, जिन्होंने राजनीतिक, धार्मिक तथा सांस्कृतिक दृष्टि से इस क्षेत्र के विकास में सराहनीय योगदान दिया।

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