उत्तर-पश्चिम भारत के प्राचीन नगर : मस्सग, पुष्कलावती और तक्षशिला (The Ancient town of North West India : Massaga, Pushkalavati And Takshashila)

उत्तर-पश्चिम भारत के प्राचीन नगर : मस्सग, पुष्कलावती और तक्षशिला

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प्राचीन अर्थशास्त्रियों ने राजा को निर्देश दिया है कि वह धर्म के उदय अथवा उपार्जन (समुदयस्थान) के लिए बड़े-बड़े नगरों (स्थानीय-निवेश) का निर्माण करवाए। नगर का निर्माण उपयुक्त स्थानों, जैसे नदी के संगम (नदी-संगमे), सरोवर व तड़ाग के तटों पर वास्तुविद्या-विशारदों द्वारा संपन्न कराया जाता था। नगर का निर्माण भूमि के अनुसार वृत्ताकार दीर्घ (लंबा) अथवा चतुरथ (चौकोर) रूप में किया जाता था। नगर के लिए पानी की व्यवस्था हेतु चारों ओर छोटी-छोटी नहरों का निर्माण भी आवश्यक था। नगर में बिक्री की वस्तुओं के संग्रह और विक्रय का प्रबंध तथा नगर में आने-जाने के लिए स्थल तथा वारि-पथ (जलमार्ग) दोनों प्रकार की सुविधाओं का प्रबंध आवश्यक था।

जनपदों को बसाने के लिए कौटिल्य ने राजा को स्पष्ट निर्देश दिया है कि वह दूसरे देशों से जनों को लाकर अथवा अपनी आबादी को बढ़ाकर पुराने या नए जनपद बसाए। भारतीय अर्थशास्त्रियों के निर्देश के परिणामस्वरूप प्राचीन काल में भारत में नगरों के निर्माण की दिशा में राजाओं ने बहुत ध्यान दिया। यही कारण है कि सिंकंदर के समकालीन इतिहासकारों ने तत्कालीन भारत को अनेक बड़े और विशाल नगरों से परिपूर्ण बताया है। स्ट्रैबो लिखता है कि ‘हमें पहले के लेखकों से पता चलता है कि मेसीडोनियनों ने हिडासपिस (झेलम) और हिपनिस (व्यास) के बीच स्थित नौ राज्यों को जीता था, जिनमें 5,000 नगर थे।’ ग्लासाय के साम्राज्य में एरियन के अनुसार 37 नगर थे, जिनकी आबादी 5,000 से 10,000 थी। अकेले पोरस के राज्य में 2,000 नगर थे। मेगस्थनीज के अनुसार आंध्र प्रदेश में 30 नगर थे। पांड्य आदि दक्षिण के राज्यों में तीन-तीन सौ नगर थे। इस आलेख में उत्तर-पश्चिम भारत के मस्सग, तक्षशिला और पुष्कलावती पर प्रकाश डालने का प्रयास किया गया है।

मस्सग या मस्सक

उत्तर-पश्चिमी सीमांत का नगर मस्सग संभवतः मलाकंद दर्रे के उत्तर की ओर स्थित था। एरियन लिखता है कि अस्सकिनोई के प्रदेशों में एक महान् नगर था, जिसे मस्सग या मस्सक कहते हैं। यह उस राजशक्ति का केंद्रस्थान था, जो संपूर्ण साम्राज्य का शासन करता था। कर्टियस के अनुसार मस्सक नगर प्रकृति और शिल्प से दृढ़ता के साथ परिवेष्ठित था। कर्टियस के विवरण से ज्ञात होता है कि मस्सक नगर दुर्ग के रूप में बना हुआ था। यह नगर पूर्व में एक पहाड़ी नदी से घिरा हुआ था और उसके दोनों ओर चट्टानों के ऐसे ढाल थे कि नगर तक पहुँचना कठिन था। दक्षिण और पश्चिम में प्रकृति ने ऊँची-ऊँची पहाड़ियों को खड़ा कर दिया था, जिससे नगर पूर्णतया सुरक्षित था। इस प्राकृतिक परिवेष्ठन के साथ नगर की रक्षा के लिए एक विशाल खाई खोदी गई थी तथा वह 35 स्टेडिया की परिधि वाली एक दीवार से घिरा था। इस दीवार की नींव पत्थर की थी और ऊपर का भाग धूप में सुखाई गई ईंटों से बना था। इस नगर-दुर्ग की रक्षा में उसके राजा अस्सकेनोस ने 38 हजार सेना लेकर सिंकंदर का प्रतिरोध किया था।

पुष्कलावती

इस नगर का एक नाम पुष्करावती भी था। इस नगर की पहचान सुवास्तु एवं कुंभा नदियों के संगम पर स्थित आधुनिक चारसद्दा से की जाती है। रामायण में इस नगर की स्थापना का श्रेय भरत को दिया गया है। उन्होंने इसका नाम अपने पुत्र पुष्क के नाम पर रखा था। पश्चिमी गांधार के इस प्रसिद्ध नगर का उल्लेख पालि-ग्रंथों में भी यदा-कदा मिलता है। गाथाओं के अनुसार बोधिसत्त्व ने अपने एक पूर्वजन्म में यहाँ पर एक भूखी व्याघ्री को अपना शरीर अर्पित किया था।

पेरीप्लस के अनुसार यह नगर प्रसिद्ध व्यापारिक मार्गों पर स्थित था। टॉल्मी तथा एरियन ने इसे विशाल राजधानी तथा घनी आबादी वाला नगर बताया है। उत्तर-पश्चिम भारत में स्थित होने के कारण इस नगर पर आक्रमण होते रहे हैं। सिंकंदर के आक्रमण के समय यह नगर गांधार प्रांत की राजधानी था। इस आक्रमण से नगर को भारी क्षति पहुँची। शकों एवं कुषाणों के आक्रमणों के कारण इसकी प्राचीन समृद्धि नष्ट हो गई।

कालान्तर में अपनी महत्त्वपूर्ण भौगोलिक स्थिति के कारण इस नगर का पुनरोदय हुआ। वाणिज्य का केंद्र होने के कारण इसके नष्ट वैभव का पुनः उद्धार हुआ। ह्वेनसांग के यात्रा-विवरण से पता चलता है कि उसके आगमन के समय यह नगर अत्यंत समृद्ध था। उसके अनुसार इसकी परिधि लगभग तीन मील थी और यहाँ के निवासी धन-धान्य से परिपूर्ण थे। नगर के पश्चिम द्वार पर एक देवमंदिर था, जिसमें स्फटिक निर्मित मूर्ति प्रतिष्ठित थी। इसके समीप अशोक द्वारा निर्मित स्तूप विद्यमान था। इसके दर्शनार्थ अनेक बौद्ध धर्मानुयाई देश के विभिन्न भागों से यहाँ एकत्र होते थे। ह्वेनसांग से यह भी ज्ञात होता है कि इस नगर के समीप और भी स्तूप तथा विहार विद्यमान थे।

तक्षशिला

तक्षशिला उत्तर-पश्चिम भारत का एक अत्यंत प्रसिद्ध नगर था। यह प्रारंभ में पूर्वी गांधार की राजधानी थी। रामायण में इस नगर की स्थापना का श्रेय भरत के पुत्र तक्ष को दिया गया है। महाभारत के अनुसार परीक्षित के पुत्र जनमेजय का नागयज्ञ यहीं हुआ था। कुछ इतिहासकार तक्षशिला का संबंध शक्तिशाली तक्क जाति से जोड़ते हैं जो सिंधु और चिनाब नदियों के बीच निवास करती थी। फाह्यान ने अपने यात्रा-विवरण में इसे ‘चु-शि-शु-लो’ कहा है, जिसका अर्थ चीनी भाषा में ‘कटा सिर’ होता है। जातक कथाओं के अनुसार गौतम बुद्ध का जन्म एक बार दलिद्दी नामक ग्राम के एक ब्राह्मण-कुल में हुआ था। उन्होंने एक याचक को अपना सिर काटकर भिक्षा के रूप में समर्पित किया था। इस घटना के कारण इस नगर का यह नाम पड़ा।

बौद्ध ग्रंथों में तक्षशिला नगर का विशेष वर्णन मिलता है। एक जातक के अनुसार वाराणसी का एक राजा आक्रमण हेतु अपनी शक्तिशाली सेना के साथ यहाँ आया था, किंतु नगर के प्रधान द्वार के ऊपर निर्मित शिखर के सौंदर्य से वह इतना प्रभावित हुआ कि उसने आक्रमण का विचार ही त्याग दिया।

बौद्ध ग्रंथों से पता चलता है कि तक्षशिला अपने समय का महान् शिक्षा-केंद्र था। देश के विभिन्न भागों से विद्यार्थी यहाँ अध्ययन के लिए आते थे। यहाँ तक कि राजकुलों से सम्बन्धित व्यक्ति भी इस विद्या-केंद्र में अध्ययन करने के लिए आया करते थे। काशी के राजकुमारों की शिक्षा प्रायः यहीं सम्पादित होती थी। जातकों के अनुसार कोशल के राजकुमार प्रसेनजित तथा बिम्बिसार के अवैध पुत्र जीवक की शिक्षा तक्षशिला में ही संपन्न हुई थी। पाणिनि और कौटिल्य भी इसी विश्वविद्यालय के छात्र थे। जीवक ने चिकित्साशास्त्र की शिक्षा के लिए यहाँ सात वर्षों तक अध्ययन किया था। काशी के दो नवयुक इस नगर में धनर्विद्या सीखने आए थे।

यहाँ वेद, व्याकरण, दर्शन, ज्योतिष, नक्षत्र-विद्या, कृषि, इंद्रजाल, चिकित्सा, धनुर्विद्या, संगीत, नृत्य और चित्रकला आदि विषयों की केवल उच्च शिक्षा प्रदान की जाती थी। विषय के संकलन में कोई जाति-प्रतिबंध नहीं था। क्षत्रिय ब्राह्मणों के साथ वेदों का अध्ययन कर सकते थे। ब्राह्मण धनुर्विद्या का अध्ययन कर सकता था। वाराणसी के एक राजपुरोहित ने अपने पुत्र को धनुर्विद्या के अध्ययन के लिए तक्षशिला भेजा था।

तक्षशिला नगर में आधुनिक विद्यालयों की भाँति संगठित शिक्षण-संस्थाएं नहीं थीं। यहाँ विद्वान् पण्डित रहते थे जिनका घर ही विद्यालय होता था। एक ही पण्डित के घर पढ़ने वाले विद्यार्थियों की संख्या 20 तक होती थी। योग्यता की स्वीकृति के लिए विद्यार्थी को परीक्षा नहीं देनी पड़ती थी। प्रतिदिन के अध्यापन-कार्य में शिक्षक विद्यार्थी के ज्ञान का अनुमान लगा लेता था। विद्यार्थियों को प्रायः निःशुल्क शिक्षा दी जाती थी। आचार्य के घर में विद्यार्थी के भोजन एवं विश्राम की व्यवस्था हो जाती थी। बदले में वह आचार्य के घर का कार्य एवं उसकी परिचर्या करता था। केवल धनी विद्यार्थियों के द्वारा ही दक्षिणा देने का उल्लेख कहीं-कहीं मिलता है। जैसे काशी के एक राजकुमार ने तक्षशिला में अपने आचार्य को एक हजार मुद्राओं की थैली भेट की थी। कभी-कभी राजकुमार यहाँ पर अलग घर लेकर भी  रहते थे। विद्यार्थी अत्यंत अनुशासित एवं संयमी होते थे। अध्यापक का अपने विद्यार्थी के ऊपर पूर्ण नियंत्रण रहता था। जातकों से पता चलता है कि राजवर्ग के लोग भी प्रायः शारीरिक दंड के भागी बनते थे।

पाँचवीं शताब्दी ईसापूर्व में यह नगर हखामनी सम्राट दारा प्रथम के अधीन आ गया। पर्सीपोलस और नक्शेरूस्तम लेख से ज्ञात होता है कि तक्षशिला के आसपास का भूभाग बहुत ही संपन्न और जनाकीर्ण था, जिससे पारसीक सम्राट को बहुत आय होती थी। इस आधिपत्य का ऐतिहासिक प्रभाव यह पड़ा कि उत्तर-पश्चिम भारत में स्वदेशी ब्राह्मी लिपि के स्थान पर खरोष्ठी लिपि का विकास हुआ।

चौथी शताब्दी ईसा पूर्व में सिंकंदर ने इस पर आक्रमण किया। उस समय यहाँ आम्भि का शासन था। यूनानी लेखकों ने इस नगर की गणना महान् और समृद्ध नगरों में की है। अरिस्टोबुलस के अनुसार ‘मेसोडोनियन लोग बसंत के प्रारंभ में इस महान् नगर में पहुँचे थे। तक्षशिला में ही उन्होंने पहले-पहल भारतीय बरसात की बौछारें देखी थी। स्ट्रैबो ने लिखा है कि तक्षशिला सिंधु और हिडासपिस के बीच स्थित था। यह एक बड़ा नगर था और इसका शासन-विधान उत्तम था। इसके आसपास का प्रदेश विस्तृत और उर्वर था। यहाँ की आबादी बहुत घनी थी। प्लिनी ने भी इसके महान् उत्कर्ष का उल्लेख किया है। अपोलोनियस ने लिखा है कि तक्षशिला यूनानी नगरों की तरह दीवार से घिरा नगर था, जो विस्तार में निनेवह के बराबर था। यूनानी लेखकों द्वारा उल्लिखित तक्षशिला संभवतः कालकसराय से एक मील उत्तर-पूर्व साहूधरी के निकट था।

यूनानी लेखकों के अनुसार यहाँ बहुविवाह एवं सती प्रथा प्रचलित थी। अरिस्टोबुलस ने तक्षशिला के कुछ रीति-रिवाजों का उल्लेख करते हुए लिखा है कि यहाँ के गरीब लोग अपनी विवाह-योग्य कन्याओं को बाजार में ले जाकर प्रदर्शित करते हैं और स्वीकृत शर्तों पर जो युवक लड़की से विवाह करना चाहता है, उससे शादी कर देते हैं। यहाँ के लोग कई विवाह कर सकते हैं। मृतकों को गिद्धों को खाने के लिए फेंक दिया जाता है। यहाँ की कुछ जातियों में स्त्रियाँ मृत-पति के साथ चिता में बैठकर अपने को जला देती हैं ।

मौर्यकाल में यह उत्तर-पश्चिम प्रांत का प्रमुख प्रशासनिक केंद्र था। बिंदुसार के काल में अशोक तक्षशिला का राज्यपाल था। इस स्थान से प्राप्त एक लेख में अशोक का नाम प्रियदर्शी मिलता है। दिव्यावदान से ज्ञात होता है कि बिंदुसार के काल में इस सीमांत प्रदेश के कर्मचारियों के विरुद्ध जनता ने विद्रोह कर दिया था जिसका दमन करने के लिए अशोक को भेजा गया था। उन्होंने कुमार से शोषण करने वाले कर्मचारियों की घोर निन्दा की थी। अशोक के शासन काल में कुणाल तक्षशिला का राज्यपाल बनाया गया। इस नरेश के राज्यकाल में भी इस नगर के नागरिकों ने एक बार विद्रोह किया था। इस विद्रोह को दबाने के लिए कुणाल को भेजा गया। यहाँ के नागरिक कुणाल से प्रभावित थे।

मौर्यों के बाद यह हिंद-यवनों, शकों, पह्लवों और कुषाणों के अधीन रहा। बेसनगर के गरुड़-स्तंभ-लेख से पता चलता है कि तक्षशिला के यूनानी शासक अण्टियालकीडस के दरबार से भागवत मतावलम्बी हेलियोडोरस नामक राजदूत शुंग नरेश भागभद्र (भद्रक) के दरबार में आया था। यवनों के शासन काल में इस नगर का पुनिर्माण एक निश्चित योजना के अनुसार किया गया। हिंद-यवनों के काल में तक्षशिला की कला विशेषरूप से प्रभावित हुई। मुद्रा-निर्माण की शैली में परिवर्तन आया। अब पंचमार्क आहत सिक्कों के स्थान पर यूनानी ढ़ंग से सिक्के ढ़ाले गए। इनकी तौल एथेंस की मुद्राओं के तौल के आधार पर निर्धारित की गई। सिक्कों ऊपर यूनानी भाषा में राजाओं के विरुद उत्कीर्ण किए गए। राजाअें के चित्र एवं मुद्राओं के प्रकार यूनानी आदर्श पर आधारित थे। तक्षशिला से प्राप्त मृण्मूर्तियों एवं बर्तनों पर भी यूनानी प्रभाव परिलक्षित होता है। इतिहासकारों का अनुमान है कि इस नगर में शिल्पविद्या के विद्यार्थियों को यूनानी आधार पर मुद्राओं एवं प्रतिमाओं का निर्माण करना सिखायाा जाता था। हिंद-यवन शासन ने भाषा एवं साहित्य को भी प्रभावित किया जिससे तक्षशिला की शिक्षा-पद्धति का प्रभावित हो़ना स्वाभाविक था। अपोलोनियस के अनुसार पहली शताब्दी ईस्वी में इस नगर के भारतीय एवं यूनानी एक-दूसरे के दर्शन को जानते थे। इसके आसपास के ग्राम-निवासी यूनानी भाषा लिख और पढ़ सकते थे। इससे लगता है कि यूनानियों के शासन काल में यूनानी अनुशीलन तक्षशिला के पाठ्यक्रम में सम्मिलित था।

प्रथम शताब्दी ईस्वी के उत्तरार्द्ध में यह नगर कुषाणों के द्वारा छीन लिया गया। एक कुषाणकालीन लेख ‘तक्सिला सिल्वर स्क्राल इंस्क्रिप्शन’ में यहाँ के धर्मराजिका स्तूप का उल्लेख मिलता है। इस लेख के अनुसार उरशादेशीय इन्तप्रिय के पुत्र के द्वारा, जो वाह्लीक एवं नवाचल नगर का रहने वाला था, धर्मराजिका स्तूप के निकट वर्तमान अपने बोधिसत्व-गृह में भगवान् गौतम बुद्ध का देहावशेष पुण्यार्जन के निमित्त प्रतिष्ठापित किया गया। चैथी शताब्दी ईस्वी के अंतिम चरण में फाह्यान तक्षशिला आया था जिसने यहाँ के कई स्तूपों का उल्लेख किया है। पाँचवीं शताब्दी में इस नगर पर हूणों ने आक्रमण किया जिससे नगर के मठों और विहारों को काफी क्षति पहुँची।

तक्षशिला के अवशेष आधुनिक रावलपिंडी के उत्तर-पश्चिम में लगभग 20 मील की दूरी पर स्थित हैं। यहाँ तीन प्रमुख स्थलों—भिर माउण्ड, सरकप और सिरमुख से तक्षशिला के भग्नावशेष प्राप्त हुए हैं। भिर माउण्ड उत्तर से दक्षिण तक 1210 गज और पूरब से पश्चिम तक 730 गज गज लंबा है। स्थानीय परंपरा के अनुसार तक्षशिला सबसे पहले भिर माउण्ड पर ही बसा हुआ था। उत्खनन से इसका समर्थन भी होता है। पंजाब की एक स्थानीय परंपरा के अनुसार सरकप नाम तन्नामधारी एक राक्षस के नाम पर पड़ा था। अंत में यह नगर सिरमुख में बसाया गया। इसका निर्माण कुषाणों के काल में पहली शताब्दी में किया गया। इसके चारों ओर पत्थर की दीवार बनी हुई थी जिसकी चैड़ाई साढ़े 18 फीट थी। सरकप और सिरमुख के दुर्गों में कई दृष्टियों से अंतर था। सिरमुख के दुर्ग में चिकने पत्थर की चिनाई की गई थी, जबकि सरकप के दुर्ग के पत्थर अपेक्षाकृत खुरदुरे थे। सिरमुख की दीवार में छेद बने हुए थे ताकि दुर्ग के भीतर के सैनिक छिद्रों से बाहर की शत्रु-सेना पर बाण से प्रहार कर सकें। सरकप के बुर्ज आयताकार तथा अंदर से ठोस बने हुए थे। किंतु सिरमुख के बुर्ज अर्द्धवृत्ताकार थे और भीतरी भाग भी ठोस नहीं था। सिरमुख का नगर आयताकार बना हुआ था। रक्षा के प्राकृतिक साधनों के अतिरिक्त कृत्रिम साधनों से भी वह अधिक संपन्न था।

तक्षशिला के प्राचीन स्मारकों में धर्मराजिका स्तूप विशेष उल्लेखनीय है। अनुमान है कि इसका निर्माण अशोक के काल में हुआ था। दिव्यावदान में स्पष्ट कहा गया है कि अशोक धर्मराजिका का निर्माणकर्ता था। तक्षशिला के अन्य स्मारकों में कुणाल का स्तूप है, जिसका उल्लेख ह्वेनसांग ने अपने यात्रा-विवरण में किया है।

तक्षशिला गांधार कला का भी प्रमुख केंद्र था। इस नगर में यूनानी, पारसी, शक, पह्लव, कुषाण बसे हुए थे। गांधार कला का विषय यद्यपि पूर्णरूप से भारतीय है, किंतु इसकी शैली निर्विवाद रूप से यूनानी है। यहाँ की कला भारतीय विषयवस्तु और यूनानी शैली का अद्भुत समन्वय प्रस्तुत करती है। इस शैली में निर्मित मूर्तियाँ अधिकांशतः गौतम बुद्ध की हैं। गौतम की कुछ मूर्तियाँ बनावट की दृष्टि से यूनान की अपोलो की मूर्तियों से साम्य रखती हैं। इस प्रकार मस्सग, पुष्कलावती और तक्षशिला उत्तर-पश्चिम भारत के ऐसे महत्वपूर्ण नगर थे, जिन्होंने न केवल राजनीतिक और आर्थिक दृष्टि से, बल्कि सांस्कृतिक और शैक्षिक दृष्टि से भी भारतीय इतिहास में विशिष्ट स्थान प्राप्त किया।

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