पश्चिमी गंग राजवंश (लगभग 350–1004 ई.)
पश्चिमी गंग राजवंश, जिसे तलकाड के गंग अथवा गंगवाड़ी के गंग कहा जाता है, दक्षिण भारत का एक महत्त्वपूर्ण राजवंश था, जिसने लगभग 350 से 1000 ईस्वी तक मुख्यतः दक्षिणी कर्नाटक पर शासन किया। इनकी प्रारंभिक राजधानी कोलार (कुलुवल) थी, जिसे बाद में हरिवर्मन ने कावेरी तट स्थित तलकाड (तलवनपुर) स्थानांतरित किया। पल्लव शक्ति के कमजोर होने का लाभ उठाकर गंगों ने स्वतंत्र सत्ता स्थापित की। बादामी चालुक्यों के उदय के बाद उन्होंने उनका आधिपत्य स्वीकार किया और पल्लवों के विरुद्ध सहयोग किया। बाद में राष्ट्रकूटों की अधीनता स्वीकार कर उनके युद्धों में भाग लिया। 10वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में राष्ट्रकूटों के पतन, पश्चिमी चालुक्यों के उदय और चोलों के विस्तार से उनकी शक्ति कमजोर हुई। लगभग 1000 ईस्वी में चोलों ने गंगवाड़ी पर अधिकार कर लिया और उनकी स्वतंत्र सत्ता समाप्त हो गई।
गंगों की प्रशासनिक व्यवस्था राजसत्ता, सामंतों और स्थानीय अधिकारियों पर आधारित थी। राज्य को राष्ट्र, विषय और नाडु जैसी इकाइयों में बाँटा गया था। स्थानीय प्रशासन में गवुंड, नाडाबोवा और पेरगडे महत्त्वपूर्ण अधिकारी थे। गवुंड कर-संग्रह, भूमि-प्रबंधन और आवश्यकता पड़ने पर सैन्य सहायता की व्यवस्था करते थे। भूमि-अनुदान अभिलेखों में नदियों, नालों, पहाड़ियों, तालाबों और नहरों को सीमाचिह्न के रूप में प्रयुक्त किए जाने का उल्लेख मिलता है। गंगों की अर्थव्यवस्था मुख्यतः कृषि पर आधारित थी। गंगवाड़ी के मलनाड और मैदानी क्षेत्रों में धान, रागी, दालें, तिलहन, गन्ना, नारियल, सुपारी तथा अन्य फसलों की खेती होती थी। तालाब, कुएँ और बाँध सिंचाई के प्रमुख साधन थे। राज्य की आय का मुख्य स्रोत भूमि-राजस्व था; इसके अतिरिक्त व्यापार, चुंगी और अन्य स्थानीय करों से भी आय होती थी। पशुपालन ग्रामीण अर्थव्यवस्था का महत्त्वपूर्ण अंग था।
धर्म और समाज के क्षेत्र में गंग शासकों ने सामान्यतः सहिष्णु नीति अपनाई। जैन धर्म को विशेष संरक्षण प्राप्त था, जबकि शैव, वैष्णव और वैदिक-ब्राह्मण परंपराएँ भी प्रचलित थीं। श्रवणबेलगोला और कंबदहल्ली जैन धर्म के प्रमुख केंद्र बने। समाज में राजपरिवार, सामंत, ब्राह्मण, कृषक, व्यापारी और कारीगर प्रमुख वर्ग थे। शिक्षा के लिए अग्रहार, घटिका और मठ महत्त्वपूर्ण संस्थाएँ थीं। युद्ध में वीरगति प्राप्त योद्धाओं की स्मृति में वीरगल्लु स्थापित किए जाते थे। पश्चिमी गंगों के समय कन्नड़ और संस्कृत साहित्य का विकास हुआ। राजा दुर्विनीत विद्वान शासक के रूप में प्रसिद्ध थे। गंग मंत्री चावुंडराय द्वारा लगभग 978 ईस्वी में रचित चावुंडराय पुराण कन्नड़ जैन साहित्य की महत्त्वपूर्ण कृति है। स्थापत्य और मूर्तिकला में भी गंगों का उल्लेखनीय योगदान रहा। कंबदहल्ली की पंचकूट बसदी और श्रवणबेलगोला के जैन स्मारक इसके प्रमुख उदाहरण हैं। चावुंडराय के संरक्षण में लगभग 981–983 ईस्वी में निर्मित गोम्मटेश्वर (बाहुबली) की विशाल एकाश्म प्रतिमा गंग कला की सर्वाधिक प्रसिद्ध उपलब्धि है। इस प्रकार पश्चिमी गंगों ने दक्षिण भारत के प्रशासन, कृषि, धर्म, साहित्य, स्थापत्य और मूर्तिकला के विकास में स्थायी योगदान दिया।
पश्चिमी गंग राजवंश के ऐतिहासिक स्रोत
पश्चिमी गंग राजवंश के इतिहास के पुनर्निर्माण के लिए शिलालेख, ताम्रपत्र, साहित्यिक रचनाएँ, सिक्के, मंदिर, जैन बसदियाँ तथा अन्य पुरातात्त्विक अवशेष प्रमुख स्रोत हैं। इनसे राजवंश की राजनीतिक घटनाओं के साथ-साथ प्रशासन, भूमि-व्यवस्था, धर्म, समाज, अर्थव्यवस्था और सांस्कृतिक जीवन की जानकारी प्राप्त होती है।
शिलालेख और ताम्रपत्र
गंग इतिहास के सबसे महत्त्वपूर्ण स्रोत उनके शिलालेख और ताम्रपत्र हैं। तुम्बुला ताम्रपत्र, बेगुर शिलालेख, पेनुकोंडा ताम्रपत्र तथा तलकाड क्षेत्र के अभिलेख विशेष महत्त्व रखते हैं। इनमें राजाओं की वंशावली, भूमि-अनुदान, प्रशासनिक इकाइयों, करों, धार्मिक दानों और राजनीतिक घटनाओं का उल्लेख मिलता है। इन अभिलेखों में संस्कृत और कन्नड़ दोनों भाषाओं का प्रयोग हुआ है, जिससे तत्कालीन राजकीय और प्रशासनिक संस्कृति में दोनों भाषाओं की भूमिका स्पष्ट होती है।
जैन बसदियाँ और धार्मिक अभिलेख
श्रवणबेलगोला और कंबदहल्ली जैसे जैन केंद्र गंग इतिहास के महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं। यहाँ की बसदियों, मूर्तियों और अभिलेखों से जैन धर्म को प्राप्त राजकीय संरक्षण तथा धार्मिक संस्थाओं की सामाजिक और आर्थिक भूमिका का पता चलता है। चंद्रगुप्त बसदी, चावुंडराय बसदी तथा अन्य जैन स्मारक गंगकालीन धार्मिक और स्थापत्य परंपरा को समझने में सहायक हैं।
साहित्यिक स्रोत
संस्कृत और कन्नड़ साहित्य से गंगकालीन धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन की जानकारी मिलती है। राजा दुर्विनीत विद्वान शासक के रूप में प्रसिद्ध थे। चावुंडराय पुराण इस काल की महत्त्वपूर्ण कन्नड़ जैन रचना है। गुणवर्मन और अन्य साहित्यकारों से संबंधित रचनाएँ भी तत्कालीन साहित्यिक वातावरण को समझने में उपयोगी हैं।
सिक्के और पुरातात्त्विक अवशेष
गंगकालीन सिक्के, मूर्तियाँ, वीरगल्लु और अन्य पुरातात्त्विक सामग्री आर्थिक तथा सामाजिक इतिहास पर प्रकाश डालती हैं। सिक्कों पर अंकित प्रतीकों से राजकीय पहचान और आर्थिक गतिविधियों की जानकारी मिलती है, जबकि वीरगल्लुओं से युद्ध-परंपरा, वीरता और तत्कालीन सामाजिक मूल्यों का पता चलता है।
मंदिर और स्थापत्य
तलकाड, कोलार, कंबदहल्ली और श्रवणबेलगोला के मंदिर तथा जैन बसदियाँ गंगकालीन स्थापत्य के महत्त्वपूर्ण प्रमाण हैं। इनमें स्थानीय परंपराओं, द्रविड़ स्थापत्य और जैन कला का समन्वय दिखाई देता है। विशेष रूप से श्रवणबेलगोला स्थित गोम्मटेश्वर (बाहुबली) की विशाल एकाश्म प्रतिमा गंगकालीन मूर्तिकला और धार्मिक संरक्षण की उत्कृष्ट अभिव्यक्ति है। इन सभी स्रोतों के समन्वित अध्ययन से पश्चिमी गंगों के राजनीतिक एवं सांस्कृतिक इतिहास की व्यापक समझ विकसित होती है।
पश्चिमी गंगों की उत्पत्ति
पश्चिमी गंगों की उत्पत्ति के संबंध में निश्चित और निर्विवाद प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। उनके प्रारंभिक इतिहास का पुनर्निर्माण मुख्यतः अभिलेखों, साहित्यिक ग्रंथों तथा बाद की वंशावली परंपराओं के आधार पर किया जाता है। लोकविभाग, चावुंडराय पुराण तथा मैसूर, कोलार, बेंगलुरु, दक्षिणी कर्नाटक और आंध्र प्रदेश से प्राप्त अभिलेख इस विषय में महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं। गंग अभिलेखों में राजवंश की प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए अनेक पौराणिक और वंशावली संबंधी दावे किए गए हैं। इसलिए इन परंपराओं को ऐतिहासिक प्रमाणों के साथ सावधानीपूर्वक देखना आवश्यक है।
गंगों की उत्पत्ति के संबंध में विभिन्न मत प्रचलित हैं। कुछ परंपराएँ उन्हें उत्तर भारतीय क्षत्रिय वंशों से जोड़ती हैं, जबकि प्रारंभिक अभिलेखों में उन्हें जाह्नवेय तथा कण्वायन गोत्र से संबंधित बताया गया है। इसी आधार पर कुछ विद्वानों, विशेषकर लुईस राइस और जायसवाल, ने उनका संबंध मगध के कण्व वंश से जोड़ने का प्रयास किया। किंतु कण्व सत्ता के पतन और दक्षिण भारत में गंगों के उदय के बीच लगभग चार शताब्दियों का अंतर होने के कारण इस मत के समर्थन में ठोस ऐतिहासिक प्रमाण नहीं मिलते।
बाद की वंशावली परंपराओं में गंगों को अयोध्या के इक्ष्वाकु वंश से जोड़ने की कथा भी मिलती है। इस परंपरा में दो राजकुमारों दादिगा और माधव तथा जैन आचार्य सिंहनंदी का उल्लेख है। कथानुसार सिंहनंदी के मार्गदर्शन में दोनों राजकुमारों ने राजनीतिक शक्ति प्राप्त की और माधव को राज्य की स्थापना में सहायता मिली। यह कथा गंगों की उत्पत्ति को धार्मिक और पौराणिक आधार प्रदान करती है, किंतु इसे प्रत्यक्ष ऐतिहासिक प्रमाण नहीं माना जा सकता। कुछ विद्वानों ने उन्हें आंध्र के इक्ष्वाकुओं से जोड़ने का प्रयास भी किया है, लेकिन प्रारंभिक अभिलेखों में ऐसा कोई स्पष्ट वंशगत संबंध प्रमाणित नहीं होता।
एक अन्य मत के अनुसार गंगों का प्रारंभिक संबंध कोंगु नाडु से था। कुछ विद्वानों ने तमिल अभिलेखों में प्रयुक्त ‘कोंगनियारस’ जैसी उपाधियों के आधार पर कोंगु क्षेत्र को उनका मूल स्थान माना है। हालांकि, केवल इस उपाधि के आधार पर कोंगु नाडु को गंगों का मूल निवास-स्थान मानना उचित नहीं है। संभवतः यह उपाधि कोंगु क्षेत्र पर राजनीतिक प्रभुत्व स्थापित करने के बाद प्रचलित हुई। इसलिए कोंगु नाडु को उनके प्रारंभिक विस्तार के क्षेत्र के रूप में देखना अधिक उपयुक्त है।
अधिकांश आधुनिक इतिहासकार दक्षिणी कर्नाटक, विशेषकर कोलार और उसके आसपास के क्षेत्र, को पश्चिमी गंगों का प्रारंभिक शक्ति-केंद्र मानते हैं। नौवीं और दसवीं शताब्दी के अभिलेखों में गंग शासकों को ‘कुवलालपुरवरेश्वर’ अर्थात् कोलार के स्वामी तथा ‘नंदगिरिनाथ’ अर्थात् नंदी पहाड़ियों के स्वामी कहा गया है। कोलार क्षेत्र से प्राप्त प्रारंभिक अभिलेख भी इस मत को समर्थन देते हैं। इससे संकेत मिलता है कि गंगों की प्रारंभिक राजनीतिक शक्ति दक्षिण-पूर्वी कर्नाटक में विकसित हुई। बाद में उनकी राजधानी तलकाड स्थानांतरित हुई और राज्य का विस्तार कोंगु नाडु तथा अन्य सीमावर्ती क्षेत्रों तक हुआ।
उपलब्ध अभिलेखीय प्रमाणों के आधार पर कोंगणीवर्मन माधव को पश्चिमी गंग सत्ता का संस्थापक माना जाता है। उन्होंने लगभग चौथी शताब्दी में दक्षिणी कर्नाटक में गंग राज्य की नींव रखी। उनके उत्तराधिकारियों ने राज्य का क्रमिक विस्तार किया। हरिवर्मन के शासनकाल में गंग सत्ता अधिक सुदृढ़ हुई और राजधानी कोलार से तलकाड स्थानांतरित की गई। इसके बाद गंगों ने कावेरी क्षेत्र तथा कोंगु नाडु में अपना प्रभाव बढ़ाया और दक्षिण भारत की एक महत्त्वपूर्ण क्षेत्रीय शक्ति के रूप में उनका उदय हुआ।
इस प्रकार पश्चिमी गंगों की उत्पत्ति को किसी उत्तर भारतीय राजवंश या पौराणिक वंश से निश्चित रूप से जोड़ना कठिन है। उपलब्ध प्रमाण दक्षिणी कर्नाटक, विशेषकर कोलार क्षेत्र, को उनके प्रारंभिक और अधिक प्रमाणित शक्ति-केंद्र के रूप में स्थापित करते हैं। बाद की वंशावली परंपराओं ने उनकी राजकीय प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए उन्हें कण्व, इक्ष्वाकु और अन्य प्राचीन वंशों से जोड़ा, जबकि कोंगु नाडु से संबंधित प्रमाण उनके राजनीतिक विस्तार की ओर संकेत करते हैं। अतः पश्चिमी गंगों को दक्षिण कर्नाटक की तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों से विकसित हुई एक महत्त्वपूर्ण क्षेत्रीय राजवंशीय शक्ति के रूप में समझना ऐतिहासिक रूप से उचित है।
प्रारंभिक गंग शाखाएँ और सत्ता का विस्तार
कुछ इतिहासकारों ने यह संभावना व्यक्त की है कि पश्चिमी गंगों के प्रारंभिक काल में उनकी विभिन्न शाखाएँ तलकाड, कैवारा और पारुवी जैसे अलग-अलग क्षेत्रों से शासन करती रही होंगी। तलकाड वर्तमान मैसूर क्षेत्र में, कैवारा कोलार क्षेत्र में तथा पारुवी वर्तमान अनंतपुर क्षेत्र में स्थित था। किंतु अनेक इतिहासकारों ने गंगों की स्वतंत्र शाखाओं से संबंधित इस मत को स्वीकार नहीं किया है। उपलब्ध प्रमाणों से इतना स्पष्ट है कि हरिवर्मन और उनके उत्तराधिकारी माधववर्मन द्वितीय के समय तक गंगों ने तलकाड में अपनी स्थिति सुदृढ़ कर ली थी। इसके बाद अन्य संभावित शाखाएँ स्वतंत्र राजनीतिक इकाइयों के रूप में स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं देतीं। इस प्रकार कोलार क्षेत्र से आरंभ होकर तलकाड तक गंग सत्ता के विस्तार ने दक्षिण कर्नाटक में उनके राजनीतिक आधार को मजबूत किया।
प्रारंभिक काल में गंग शासकों के पल्लवों के साथ संबंध भी विवाद का विषय रहे हैं। कुछ इतिहासकारों का मत है कि दक्षिण कर्नाटक में अपने आरंभिक शासन के दौरान गंग शासक काँची के पल्लवों के अधीनस्थ रहे होंगे। किंतु माधववर्मन प्रथम के प्रारंभिक अभिलेखों से इस धारणा के विपरीत संकेत मिलते हैं। इसलिए प्रारंभिक गंग-पल्लव संबंधों को निश्चित रूप से अधीनता का संबंध मानना उचित नहीं है। संभवतः दोनों शक्तियों के बीच समय-समय पर संघर्ष, सहयोग और राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के संबंध रहे होंगे।
प्रारंभिक राजनीतिक विकास
गंगों के प्रारंभिक राजनीतिक इतिहास में कदंबों और पल्लवों के साथ संघर्ष तथा राजनीतिक संबंधों की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। दक्षिण भारत में शक्ति-संतुलन बदलने के साथ गंगों को अपनी स्वतंत्रता और क्षेत्रीय हितों के बीच संतुलन बनाए रखना पड़ा। छठी शताब्दी में बादामी के चालुक्यों के उदय के बाद गंगों ने उनके साथ राजनीतिक संबंध स्थापित किए और कई अवसरों पर सहयोग किया। आगे चलकर राष्ट्रकूटों के प्रभुत्व के समय भी गंग शासकों ने अपनी आंतरिक स्वायत्तता काफी हद तक बनाए रखते हुए उनके अधीन सामंती संबंध स्वीकार किए। इस प्रकार बदलती राजनीतिक परिस्थितियों के अनुरूप संबंधों और नीतियों में परिवर्तन करके गंगों ने कई शताब्दियों तक अपनी सत्ता बनाए रखी। दसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में राष्ट्रकूट साम्राज्य के पतन के बाद दक्षिण भारत में चोलों और पश्चिमी चालुक्यों की शक्ति तेजी से बढ़ी। इस राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के बीच गंगों की स्थिति कमजोर होती गई। अंततः चोल शासक राजराज प्रथम के अभियानों के परिणामस्वरूप लगभग 1004 ईस्वी में तलकाड पर चोलों का अधिकार स्थापित हो गया और पश्चिमी गंगों का स्वतंत्र राजनीतिक प्रभुत्व समाप्त हो गया।
प्रमुख प्रारंभिक गंग शासक
कोंगणिवर्मन माधव (लगभग 350–370 ई.)
कोंगणिवर्मन माधव को पश्चिमी गंग राजवंश का संस्थापक माना जाता है। उन्होंने चौथी शताब्दी के मध्य में कोलार क्षेत्र को केंद्र बनाकर गंग सत्ता की स्थापना की। राजनीतिक अस्थिरता का लाभ उठाकर उन्होंने स्थानीय शक्तियों को अपने अधीन किया और गंगवाड़ी में एक संगठित राज्य की नींव रखी। परंपरागत कथाएँ उन्हें उत्तर भारतीय क्षत्रिय वंशों से जोड़ती हैं। उनका शासन दक्षिण कर्नाटक में गंग राजनीतिक शक्ति की स्थापना का प्रारंभिक चरण था। कोंगणिवर्मन के समय जैन धर्म को संरक्षण मिलने की परंपरा मिलती है। साथ ही, अन्य धार्मिक परंपराओं के प्रति भी उदार दृष्टिकोण दिखाई देता है।
माधव प्रथम (लगभग 370–390 ई.)
माधव प्रथम कोंगणिवर्मन माधव के उत्तराधिकारी थे। उनके शासनकाल में गंग राज्य के प्रशासनिक संगठन को स्थिरता मिली। उन्होंने पल्लवों और कदंबों के बीच संतुलन बनाते हुए अपनी सत्ता को सुरक्षित रखा। इस काल में जैन धर्म को संरक्षण मिलता रहा और धार्मिक संस्थाओं को दान दिए जाने की परंपरा विकसित हुई। प्रशासन में स्थानीय अधिकारियों और सामंतों की भूमिका भी बढ़ी।
हरिवर्मन (लगभग 390–410 ई.)
हरिवर्मन का सबसे महत्त्वपूर्ण योगदान राजधानी को कोलार से तलकाड स्थानांतरित करना था। कावेरी नदी के तट पर स्थित तलकाड राजनीतिक और आर्थिक दृष्टि से अधिक अनुकूल था। इस परिवर्तन से गंग प्रशासन को दक्षिणी कर्नाटक और तमिल प्रदेश की ओर विस्तार करने में सुविधा मिली। हरिवर्मन ने पड़ोसी शक्तियों के साथ राजनीतिक संबंध बनाए और जैन धर्म सहित विभिन्न धार्मिक परंपराओं को संरक्षण दिया।
विष्णुगोप (लगभग 410–430 ई.)
विष्णुगोप हरिवर्मन के उत्तराधिकारी थे। उनके शासनकाल में गंगों ने पड़ोसी शक्तियों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखने का प्रयास किया। वैदिक परंपराओं के प्रति उनकी रुचि के साथ धार्मिक सहिष्णुता की नीति भी जारी रही। उनके परिवार में संस्कृत विद्वता की परंपरा दिखाई देती है। उनके भाई माधव द्वितीय को दत्तकसूत्रवृत्ति से संबंधित विद्वान के रूप में परंपरागत रूप से स्मरण किया जाता है।
माधव तृतीय तंदंगल (लगभग 430–469 ई.)
माधव तृतीय के समय कदंबों और पल्लवों के बीच राजनीतिक प्रतिस्पर्धा बढ़ रही थी। गंगों ने इस परिस्थिति में राजनयिक संबंधों का उपयोग करते हुए अपनी स्थिति बनाए रखी। उन्होंने कदंब शासक कृष्णवर्मन प्रथम के साथ वैवाहिक संबंध स्थापित किया, जिससे दोनों शक्तियों के बीच संबंधों में स्थिरता आई। माधव तृतीय के शासनकाल में प्रशासनिक संगठन, भूमि-अनुदान और कृषि व्यवस्था को भी महत्त्व मिला।
अविनीत (लगभग 469–529 ई.)
अविनीत गंग वंश के महत्त्वपूर्ण शासकों में थे। उनके शासनकाल में गंग राज्य का राजनीतिक सुदृढ़ीकरण हुआ। उन्होंने स्थानीय शक्तियों के साथ संतुलन बनाए रखा और गंगवाड़ी के प्रभाव क्षेत्र को मजबूत किया। उनके शासनकाल में जैन धर्म को विशेष संरक्षण प्राप्त हुआ। भूमि-अनुदानों और धार्मिक संस्थाओं को सहायता देने की परंपरा जारी रही। साथ ही, शैव और वैष्णव परंपराओं के प्रति भी सहिष्णु नीति अपनाई गई। अविनीत के काल में प्रशासनिक संगठन मजबूत हुआ तथा कृषि और स्थानीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिला।
दुर्विनीत (लगभग 529–579 ई.)
दुर्विनीत पश्चिमी गंग वंश के सबसे प्रसिद्ध शासकों में से एक थे। वे राजनीतिक कुशलता, सैन्य क्षमता और विद्वत्ता के लिए प्रसिद्ध हुए। उनके शासन के प्रारंभ में उत्तराधिकार संबंधी संघर्ष हुआ, जिसमें उन्होंने विजय प्राप्त कर अपना अधिकार स्थापित किया। उन्होंने पल्लवों और कदंबों के साथ संघर्ष तथा राजनीतिक संबंध दोनों बनाए। बादामी के चालुक्य शासक पुलकेशिन प्रथम के साथ उनके संबंधों ने गंगों को क्षेत्रीय राजनीति में महत्त्वपूर्ण स्थिति प्रदान की।
दुर्विनीत के शासनकाल में प्रशासन को अधिक व्यवस्थित किया गया। भूमि-अनुदान, कर-संग्रह और स्थानीय प्रशासन को मजबूत किया गया। कृषि और व्यापारिक गतिविधियों को भी प्रोत्साहन मिला। दुर्विनीत जैन धर्म के संरक्षक थे, किंतु उनकी धार्मिक नीति उदार थी। साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में उनका योगदान विशेष रूप से उल्लेखनीय है। परंपरा के अनुसार वे संस्कृत के विद्वान थे और वृहत्कथा के संस्कृत रूपांतर से उनका संबंध माना जाता है। उन्हें व्याकरण तथा साहित्य में भी रुचि थी। उनके शासनकाल को पश्चिमी गंग इतिहास के प्रारंभिक सांस्कृतिक उत्कर्ष का काल माना जाता है।
मुकुंद अथवा मुष्कर (लगभग 579–604 ई.)
मुकुंद, जिन्हें कुछ स्रोतों में मुष्कर कहा गया है, दुर्विनीत के उत्तराधिकारी थे। उनके शासनकाल में गंग राज्य ने पूर्ववर्ती राजनीतिक स्थिरता को बनाए रखा। दक्षिण भारत में चालुक्यों और पल्लवों के बीच संघर्ष जारी था। ऐसी स्थिति में गंगों ने चालुक्यों के साथ संबंध बनाए रखते हुए अपनी क्षेत्रीय स्वायत्तता की रक्षा की। मुकुंद के काल में भूमि-अनुदान, कृषि और स्थानीय प्रशासन की परंपरा आगे बढ़ी। जैन धार्मिक संस्थाओं को संरक्षण मिलता रहा और कन्नड़ भाषा के प्रशासनिक प्रयोग का विस्तार हुआ।
पोलावीर अथवा पोलवीर्य (लगभग 604–629 ई.)
पोलावीर के शासनकाल में दक्षिण भारत की राजनीति में बादामी चालुक्यों का प्रभाव बढ़ रहा था। गंगों ने इस शक्ति-संतुलन के बीच चालुक्यों के साथ संबंध बनाए रखे। उनके समय में प्रशासनिक संगठन, भूमि-अनुदान और स्थानीय अधिकारियों की भूमिका महत्त्वपूर्ण रही। कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था के विकास के लिए सिंचाई और जल-संसाधनों पर ध्यान दिया गया। जैन धर्म को संरक्षण जारी रहा और धार्मिक सहिष्णुता की परंपरा बनी रही। कन्नड़ तथा संस्कृत दोनों का अभिलेखीय प्रयोग भी जारी रहा।
श्रीविक्रम (लगभग 629–654 ई.)
श्रीविक्रम ने पोलावीर के बाद गंगवाड़ी का शासन संभाला। उनके समय में चालुक्यों और पल्लवों के बीच संघर्ष जारी था। उन्होंने इस राजनीतिक प्रतिस्पर्धा में संतुलन की नीति अपनाकर गंगवाड़ी की आंतरिक स्वायत्तता बनाए रखने का प्रयास किया। उनके शासनकाल में स्थानीय प्रशासन, भूमि-अनुदान और कृषि व्यवस्था को व्यवस्थित किया गया। कावेरी क्षेत्र की कृषि अर्थव्यवस्था में सिंचाई और जल-संसाधनों की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। धार्मिक क्षेत्र में जैन धर्म का संरक्षण जारी रहा, जबकि शैव और वैष्णव परंपराओं के प्रति भी उदार नीति अपनाई गई। कन्नड़ और संस्कृत दोनों का अभिलेखीय प्रयोग जारी रहा।
भूविक्रम (लगभग 654–679 ई.)
भूविक्रम श्रीविक्रम के उत्तराधिकारी थे और उनके शासनकाल में गंग राज्य ने अपनी राजनीतिक स्थिति को बनाए रखा। इस समय दक्षिण भारत में चालुक्य-पल्लव संघर्ष का प्रभाव बना हुआ था। गंगों ने परिस्थितियों के अनुरूप अपनी राजनीतिक स्वायत्तता की रक्षा की। प्रशासन, भूमि-अनुदान और कृषि व्यवस्था को निरंतर विकसित किया गया। भूविक्रम के बाद उनके छोटे भाई शिवमार प्रथम गंग सिंहासन पर बैठे।
शिवमार प्रथम (लगभग 679–726 ई.)
शिवमार प्रथम पश्चिमी गंग राजवंश के महत्त्वपूर्ण शासकों में थे। वे भूविक्रम के छोटे भाई और उत्तराधिकारी थे। उनके शासनकाल में गंगवाड़ी बादामी के चालुक्यों के अधीन सामंत राज्य के रूप में कार्य कर रहा था। दक्कन की राजनीति चालुक्य-पल्लव संघर्ष से प्रभावित थी। शिवमार प्रथम ने चालुक्यों के साथ सहयोग की नीति अपनाई और पल्लवों के विरुद्ध उनके अभियानों में सहायता की। इस नीति का उद्देश्य गंगवाड़ी की राजनीतिक स्थिति और सीमाओं को सुरक्षित रखना था। उनके शासनकाल में प्रशासनिक संगठन को सुदृढ़ किया गया तथा स्थानीय सामंतों और अधिकारियों की भूमिका बढ़ी। हल्लीमेरी दानपत्र जैसे अभिलेखों से भूमि-अनुदान, स्थानीय प्रशासन और राजस्व-व्यवस्था की जानकारी मिलती है। नाडगौंड और अन्य स्थानीय अधिकारी कर-संग्रह, भूमि-अभिलेखों तथा विवादों के निपटारे में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते थे। सिंचाई के लिए जलाशयों और बाँधों के निर्माण को प्रोत्साहन मिला, जिससे कृषि उत्पादन और राज्य की आर्थिक स्थिरता को बल मिला। शिवमार प्रथम ने जैन धर्म को संरक्षण दिया, जबकि शैव और वैष्णव परंपराओं के प्रति भी सहिष्णुता बनाए रखी। श्रवणबेलगोला, कोलार और तलकाड जैन गतिविधियों के प्रमुख केंद्र बने। उनके शासनकाल में कन्नड़ के प्रशासनिक और सांस्कृतिक प्रयोग का विस्तार हुआ तथा संस्कृत के साथ द्विभाषिक परंपरा मजबूत हुई।
श्रीपुरुष (लगभग 726–788 ई.)
श्रीपुरुष शिवमार प्रथम के उत्तराधिकारी और पश्चिमी गंग राजवंश के सबसे प्रभावशाली शासकों में से एक थे। उनके शासनकाल में गंगवाड़ी की राजनीतिक शक्ति और क्षेत्रीय प्रभाव में वृद्धि हुई। उन्होंने राजधानी को तलकाड से मान्यपुर स्थानांतरित किया। उनके समय में चालुक्यों, पल्लवों, पांड्यों और उभरती राष्ट्रकूट शक्ति के बीच संघर्ष जारी था। श्रीपुरुष ने इन शक्तियों के बीच संतुलित कूटनीति अपनाकर गंगवाड़ी की स्थिति को सुरक्षित रखने का प्रयास किया। उन्होंने चालुक्य शासक विक्रमादित्य द्वितीय का सहयोग किया और पल्लव नरेश नंदिवर्मन पल्लवमल्ल के विरुद्ध अभियानों में भाग लिया। गंग अभिलेखों के अनुसार इस संघर्ष में सफलता के बाद उन्होंने ‘परमानदी’ की उपाधि धारण की। पल्लवों के साथ उनके संघर्ष से संबंधित कुछ परंपरागत विवरणों में कुवलाल पर आक्रमण और एक बहुमूल्य हार छीने जाने का उल्लेख मिलता है, किंतु इसकी स्वतंत्र समकालीन पुष्टि उपलब्ध नहीं है।
आठवीं शताब्दी के मध्य में दंतिदुर्ग के नेतृत्व में राष्ट्रकूट शक्ति के उदय के बाद श्रीपुरुष ने नई राजनीतिक परिस्थिति के अनुरूप राष्ट्रकूटों के साथ व्यावहारिक संबंध बनाए। कोंगु प्रदेश पर नियंत्रण को लेकर पांड्यों के साथ भी संघर्ष हुए और बाद में राजनीतिक तथा वैवाहिक संबंधों के माध्यम से स्थिति को स्थिर किया गया। श्रीपुरुष ने स्थानीय सामंतों, नाडगौंडों और ग्राम संस्थाओं को प्रशासन में सम्मिलित रखा तथा कृषि, सिंचाई और व्यापारिक मार्गों के विकास को प्रोत्साहन दिया। जैन धर्म को विशेष संरक्षण देते हुए उन्होंने शैव और वैष्णव परंपराओं के प्रति भी सहिष्णु नीति अपनाई। उनके काल में कन्नड़ के प्रशासनिक और सांस्कृतिक प्रयोग का विस्तार हुआ।
शिवमार द्वितीय (लगभग 788–816 ई.)
शिवमार द्वितीय श्रीपुरुष के पुत्र और उत्तराधिकारी थे। उनके शासनकाल तक राष्ट्रकूट दक्कन की प्रमुख शक्ति बन चुके थे। राष्ट्रकूट शासक ध्रुव धारावर्ष ने गंगवाड़ी पर आक्रमण कर शिवमार द्वितीय को पराजित और बंदी बना लिया। राष्ट्रकूट स्रोत इस विजय का स्पष्ट उल्लेख करते हैं, जबकि गंग अभिलेखों में उनकी राजनीतिक स्थिति को अलग रूप में प्रस्तुत किया गया है। ध्रुव की मृत्यु के बाद गोविंद तृतीय के शासनकाल में शिवमार द्वितीय को पुनः गंग सिंहासन प्राप्त हुआ, किंतु उन्हें राष्ट्रकूट अधीनता स्वीकार करनी पड़ी। बाद में स्वतंत्रता के प्रयास के कारण उनका राष्ट्रकूटों से पुनः संघर्ष हुआ और परंपरागत विवरणों के अनुसार उनका अंतिम जीवन कैद में बीता।
उनके शासनकाल में ग्राम और नाडु स्तर की प्रशासनिक व्यवस्था सक्रिय रही तथा भूमि-अनुदान, कृषि, जल-संसाधन और धार्मिक संस्थाओं से संबंधित अभिलेख मिलते हैं। उन्होंने जैन धर्म को संरक्षण दिया और शैव तथा वैष्णव परंपराओं के प्रति सहिष्णुता बनाए रखी। कुछ परवर्ती परंपराएँ उन्हें गजशास्त्र का लेखक मानती हैं, किंतु इसके प्रत्यक्ष प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। उनका शासन राष्ट्रकूट दबाव के बीच गंगवाड़ी की राजनीतिक पहचान और सांस्कृतिक परंपरा को बनाए रखने के संघर्ष का काल था।
राचमल्ल प्रथम (लगभग 816–843 ई.)
राचमल्ल प्रथम शिवमार द्वितीय के उत्तराधिकारी थे। उनके शासनकाल में गंगवाड़ी राष्ट्रकूटों के प्रभाव में रहा। उन्होंने राष्ट्रकूटों के साथ सामंजस्य बनाए रखते हुए गंगों की क्षेत्रीय स्वायत्तता को सुरक्षित रखने का प्रयास किया। नोलंबों के साथ उनके संबंध राजनीतिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण थे। उन्होंने जैन धर्म और धार्मिक संस्थाओं को संरक्षण दिया तथा भूमि-अनुदान की परंपरा जारी रखी। उनके काल में कन्नड़ की सांस्कृतिक और साहित्यिक परंपरा का विकास भी जारी रहा।
नीतिमार्ग प्रथम अथवा एरेगंग नीतिमार्ग (लगभग 843–870 ई.)
नीतिमार्ग प्रथम पश्चिमी गंग वंश के पुनरुत्थान के प्रमुख शासकों में थे। उनके शासनकाल में राष्ट्रकूटों के साथ गंगों के राजनीतिक संबंध और अधिक सुदृढ़ हुए। वैवाहिक संबंधों ने दोनों राजवंशों की निकटता बढ़ाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। नीतिमार्ग प्रथम ने प्रशासन को व्यवस्थित करने के साथ कृषि और सिंचाई के विकास पर भी ध्यान दिया। उनके शासन से संबंधित डोड्डाहुंडी निशिधि अभिलेख विशेष महत्त्व रखता है, जिसमें उनकी सल्लेखना का उल्लेख मिलता है। उनके समय में जैन धर्म को संरक्षण प्राप्त हुआ और कन्नड़ संस्कृति का विकास जारी रहा। बेगूर का नागेश्वर मंदिर इस काल की स्थापत्य परंपरा के विकास का महत्त्वपूर्ण उदाहरण है।
राचमल्ल द्वितीय (लगभग 870–907 ई.)
नीतिमार्ग प्रथम के उत्तराधिकारी राचमल्ल द्वितीय के राज्यारोहण के समय उत्तराधिकार को लेकर संघर्ष उत्पन्न हुआ। राष्ट्रकूटों के सहयोग से उन्होंने अपने विरोधियों को पराजित कर सिंहासन पर अधिकार स्थापित किया। उनके शासनकाल में नोलंबों, बाणों और वैदुंबों के साथ संघर्ष हुए। इन अभियानों के माध्यम से उन्होंने गंगवाड़ी में अपनी राजनीतिक स्थिति सुदृढ़ की और स्थानीय सामंतों पर नियंत्रण बनाए रखा। प्रशासन तथा राजस्व व्यवस्था को व्यवस्थित करने के साथ सिंचाई के विकास पर भी ध्यान दिया गया। जैन धर्म को उनके शासनकाल में संरक्षण मिलता रहा और श्रवणबेलगोला सहित अन्य जैन केंद्रों को राजकीय सहायता प्राप्त हुई। कन्नड़ साहित्य और स्थापत्य के विकास को भी प्रोत्साहन मिला। इस प्रकार नौवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में गंगवाड़ी ने राष्ट्रकूट अधिपत्य के अंतर्गत पर्याप्त राजनीतिक स्थिरता प्राप्त की।
नीतिमार्ग द्वितीय अथवा एरेयप्प नीतिमार्ग (लगभग 907–921 ई.)
राचमल्ल द्वितीय के बाद नीतिमार्ग द्वितीय गंग सिंहासन पर बैठे। उनका शासनकाल अपेक्षाकृत अल्प था। उन्होंने राष्ट्रकूटों के साथ राजनीतिक संबंध बनाए रखते हुए गंगवाड़ी की क्षेत्रीय स्वायत्तता को सुरक्षित रखने का प्रयास किया। उनके समय में जैन धार्मिक संस्थाओं को संरक्षण तथा भूमि-अनुदान की परंपरा जारी रही। स्थानीय सामंतों पर नियंत्रण बनाए रखने के लिए प्रशासनिक व्यवस्था को भी सुदृढ़ किया गया।
नरसिंह (लगभग 921–933 ई.)
नीतिमार्ग द्वितीय के बाद नरसिंह ने गंग सिंहासन संभाला। उनके शासनकाल में गंग राज्य राष्ट्रकूट प्रभाव के अंतर्गत बना रहा। उन्होंने पूर्ववर्ती प्रशासनिक व्यवस्था को बनाए रखा तथा स्थानीय सामंतों और धार्मिक संस्थाओं के साथ संबंधों को सुदृढ़ किया। जैन धर्म को संरक्षण मिलता रहा और कन्नड़ भाषा का प्रशासनिक प्रयोग जारी रहा।
राचमल्ल तृतीय (लगभग 933–938 ई.)
राचमल्ल तृतीय का शासनकाल अपेक्षाकृत अल्प रहा। उनके समय में गंग उत्तराधिकार और राजनीतिक नियंत्रण को लेकर प्रतिस्पर्धा के संकेत मिलते हैं। उपलब्ध अभिलेखीय जानकारी सीमित होने के बावजूद यह स्पष्ट है कि गंग सत्ता इस समय राष्ट्रकूट राजनीतिक व्यवस्था से जुड़ी हुई थी। राचमल्ल तृतीय ने जैन धर्म तथा कन्नड़ संस्कृति को संरक्षण प्रदान किया। उनके बाद बूतुग द्वितीय के शासन में गंग शक्ति को अधिक प्रभावशाली राजनीतिक स्वरूप प्राप्त हुआ।
बूतुग द्वितीय (लगभग 938–961 ई.)
बूतुग द्वितीय पश्चिमी गंग वंश के सबसे शक्तिशाली शासकों में गिने जाते हैं। उन्होंने राष्ट्रकूट सम्राट कृष्ण तृतीय के साथ घनिष्ठ राजनीतिक और वैवाहिक संबंध स्थापित किए। इस गठबंधन ने गंगों को दक्षिण भारत की राजनीति में महत्त्वपूर्ण स्थान दिलाया।
थक्कोलम का युद्ध
लगभग 949 ईस्वी में हुए थक्कोलम के युद्ध में बूतुग द्वितीय ने राष्ट्रकूटों की ओर से चोलों के विरुद्ध युद्ध किया। राष्ट्रकूट-गंग संयुक्त सेना ने चोलों को पराजित किया और चोल युवराज राजादित्य युद्ध में मारे गए। इस विजय से बूतुग द्वितीय की राजनीतिक प्रतिष्ठा बढ़ी और गंगों का प्रभाव बनवासी, कोंगु तथा नोलंबवाड़ी जैसे क्षेत्रों तक विस्तृत हुआ। उन्होंने नोलंबों और अन्य स्थानीय शक्तियों के विरुद्ध भी सफल अभियान चलाए।
बूतुग द्वितीय जैन धर्म के संरक्षक थे। उनके शासनकाल में श्रवणबेलगोला जैन धर्म, शिक्षा और साधना का केंद्र बन गया। जैन आचार्यों और धार्मिक संस्थाओं को राजकीय संरक्षण प्राप्त हुआ। उनके दरबार से संबद्ध चामुंडराय आगे चलकर गंगकालीन संस्कृति के प्रमुख व्यक्तित्व बने। इस प्रकार बूतुग द्वितीय का शासन पश्चिमी गंगों की राजनीतिक शक्ति और सांस्कृतिक उन्नति का महत्त्वपूर्ण चरण था।
मारुलगंग नीतिमार्ग (लगभग 961–963 ई.)
बूतुग द्वितीय के बाद उनके पुत्र मारुलगंग नीतिमार्ग ने अल्प अवधि तक शासन किया। उनके शासन से संबंधित अभिलेखीय सामग्री सीमित है। उन्होंने राष्ट्रकूटों के साथ संबंध बनाए रखे तथा जैन धार्मिक संस्थाओं को संरक्षण प्रदान किया। उनके समय में पूर्ववर्ती प्रशासनिक और धार्मिक नीतियों को ही आगे बढ़ाया गया।
मारसिंह द्वितीय (लगभग 963–975 ई.)
मारसिंह द्वितीय बूतुग द्वितीय के उत्तराधिकारी थे। उनके शासनकाल में राष्ट्रकूट साम्राज्य का पतन आरंभ हो चुका था, फिर भी उन्होंने राष्ट्रकूटों के प्रति अपनी निष्ठा बनाए रखी। लगभग 972–973 ईस्वी में पश्चिमी चालुक्य शासक तैलप द्वितीय ने राष्ट्रकूट सत्ता का अंत कर दिया। इसके बाद मारसिंह द्वितीय ने राष्ट्रकूट उत्तराधिकारी इंद्र चतुर्थ का समर्थन किया। मारसिंह द्वितीय ने नोलंबों के विरुद्ध सफलता प्राप्त की और ‘नोलंबांतक’ की उपाधि धारण की। वे जैन धर्म के प्रमुख संरक्षकों में थे। उनके जीवन के अंतिम चरण का संबंध जैन परंपरा में सल्लेखना से जोड़ा जाता है। इस काल में चामुंडराय मंत्री और सेनापति के रूप में अत्यंत प्रभावशाली रहे।
राचमल्ल चतुर्थ/सत्यवाक्य (लगभग 975–986 ई.)
मारसिंह द्वितीय की मृत्यु के बाद उत्तराधिकार का संकट उत्पन्न हुआ। चामुंडराय के सहयोग से राचमल्ल चतुर्थ ने सत्ता प्राप्त की। इस समय तक राष्ट्रकूट साम्राज्य का पतन हो चुका था और पश्चिमी चालुक्य शासक तैलप द्वितीय ने मान्यखेट पर अधिकार कर लिया था। परिणामस्वरूप गंगों को उत्तर-पश्चिम से पश्चिमी चालुक्यों और दक्षिण से बढ़ती चोल शक्ति का सामना करना पड़ा। इस काल की सबसे उल्लेखनीय सांस्कृतिक उपलब्धि चामुंडराय के संरक्षण से संबंधित है। श्रवणबेलगोला में गोम्मटेश्वर बाहुबली की विशाल एकाश्म प्रतिमा का निर्माण लगभग 981 ईस्वी के आसपास कराया गया। यह जैन मूर्तिकला तथा दक्षिण भारतीय कला की उत्कृष्ट कृतियों में गिनी जाती है।
राचमल्ल पंचम/रक्कसगंग (लगभग 986–999 ई.)
राचमल्ल पंचम पश्चिमी गंग वंश के अंतिम स्वतंत्र शासकों में थे। उनके शासनकाल में चोल शक्ति दक्षिण कर्नाटक की ओर तेजी से बढ़ रही थी। चोल सम्राट राजराज प्रथम ने गंगवाड़ी, नोलंबवाड़ी और तड़िगैपाड़ी पर अभियान चलाए। गंगों ने प्रतिरोध किया, किंतु राष्ट्रकूट सत्ता के पतन के कारण उन्हें पहले जैसी बाहरी सहायता उपलब्ध नहीं हो सकी।
राचमल्ल पंचम के बाद नीतिमार्ग पेरुमानदि का अत्यंत अल्पकालीन शासन माना जाता है, जिसके बाद गंगों की स्वतंत्र राजनीतिक सत्ता समाप्त हो गई। लगभग 1004 ईस्वी तक चोलों ने तलकाड पर अधिकार कर लिया। इसके साथ पश्चिमी गंगों की स्वतंत्र राजनीतिक सत्ता का अंत हो गया। इसके बाद गंग शासक चोलों के अधीन सामंतों के रूप में अस्तित्व में रहे। यद्यपि राजनीतिक शक्ति समाप्त हो गई, जैन धर्म और कन्नड़ संस्कृति के संरक्षण की परंपरा कुछ समय तक जारी रही।
पश्चिमी गंग वंश का पतन (लगभग 974–1004 ई.)
पश्चिमी गंग वंश का पतन किसी एक घटना का परिणाम नहीं था, बल्कि अनेक राजनीतिक और सैन्य परिस्थितियों के संयुक्त प्रभाव से हुआ। राष्ट्रकूट साम्राज्य के पतन ने गंगों के पुराने राजनीतिक संरक्षण को समाप्त कर दिया। इसके बाद पश्चिमी चालुक्यों के उदय और दक्षिण में चोलों के निरंतर विस्तार ने गंगों की स्थिति को कमजोर कर दिया। इसके साथ ही उत्तराधिकार संबंधी संघर्षों और सामंतों पर नियंत्रण की कठिनाइयों ने भी केंद्रीय सत्ता को प्रभावित किया।
दसवीं शताब्दी के अंतिम दशकों में चोल सम्राट राजराज प्रथम ने दक्षिण कर्नाटक की ओर अपने अभियान तेज किए। गंगवाड़ी उनके विस्तार का प्रमुख लक्ष्य बना। लगातार सैन्य दबाव के परिणामस्वरूप गंगों की राजनीतिक शक्ति सीमित होती गई और अंततः लगभग 1004 ईस्वी में तलकाड पर चोल अधिकार स्थापित हो गया। इसके साथ पश्चिमी गंगों की स्वतंत्र सत्ता का अंत हुआ और गंगवाड़ी चोल साम्राज्य का हिस्सा बन गया।
फिर भी पश्चिमी गंगों की ऐतिहासिक विरासत समाप्त नहीं हुई। उनके संरक्षण में विकसित जैन धर्म, कन्नड़ साहित्य, स्थानीय प्रशासन, मंदिर स्थापत्य और मूर्तिकला ने दक्षिण भारत की सांस्कृतिक परंपरा पर दीर्घकालीन प्रभाव डाला। विशेष रूप से श्रवणबेलगोला की गोम्मटेश्वर प्रतिमा और गंगकालीन जैन स्थापत्य उनकी स्थायी सांस्कृतिक विरासत के रूप में आज भी महत्त्वपूर्ण हैं।
राष्ट्रकूट साम्राज्य के पतन के बाद लगभग 973–974 ईस्वी में पश्चिमी चालुक्य शासक तैलप द्वितीय ने राष्ट्रकूटों को पराजित कर मान्यखेट पर अधिकार कर लिया। राष्ट्रकूट लंबे समय से पश्चिमी गंगों के प्रमुख राजनीतिक सहयोगी और संरक्षक रहे थे। उनके पतन के साथ गंगों को एक शक्तिशाली सहयोगी से वंचित होना पड़ा और गंगवाड़ी पश्चिमी चालुक्यों तथा दक्षिण की ओर विस्तार कर रहे चोलों के बीच संघर्ष का क्षेत्र बन गया।
मारसिंह द्वितीय की मृत्यु के बाद गंग राजपरिवार में उत्तराधिकार संबंधी विवादों ने राजनीतिक अस्थिरता को और बढ़ा दिया। यद्यपि राचमल्ल चतुर्थ ने मंत्री एवं सेनापति चामुंडराय के सहयोग से सत्ता संभाली, लेकिन आंतरिक कमजोरियों के कारण गंगों की सैन्य और प्रशासनिक शक्ति पहले जैसी प्रभावी नहीं रह सकी। इसी दौरान राजराज चोल प्रथम के नेतृत्व में चोल साम्राज्य तेजी से विस्तार कर रहा था। चोलों ने दक्षिण कर्नाटक की ओर अपना अभियान बढ़ाते हुए गंगवाड़ी पर आक्रमण किया।
लगातार होने वाले युद्धों ने गंग राज्य के सैन्य और आर्थिक संसाधनों पर गंभीर दबाव डाला। नोलंबों, चोलों और अन्य क्षेत्रीय शक्तियों के साथ संघर्ष के कारण कृषि क्षेत्रों, व्यापारिक मार्गों तथा सामरिक केंद्रों पर प्रभावी नियंत्रण बनाए रखना कठिन हो गया। राष्ट्रकूटों के पतन से दक्षिण भारत में उत्पन्न नए शक्ति-संतुलन में पश्चिमी चालुक्यों का उदय और चोलों का विस्तार गंगों के लिए विशेष रूप से चुनौतीपूर्ण सिद्ध हुआ।
अंततः लगभग 1004 ईस्वी में राजराज चोल प्रथम ने तलकाड पर अधिकार कर लिया। इसके साथ पश्चिमी गंगों की स्वतंत्र राजनीतिक सत्ता का अंत हो गया और गंगवाड़ी चोल साम्राज्य के अधीन आ गया। यद्यपि गंग वंश की कुछ शाखाएँ बाद में स्थानीय सामंतों के रूप में अस्तित्व में बनी रहीं, किंतु उनका स्वतंत्र राज्य समाप्त हो चुका था।
इस प्रकार पश्चिमी गंगों के पतन के पीछे राष्ट्रकूट संरक्षण का अंत, आंतरिक उत्तराधिकार-संघर्ष, सैन्य दुर्बलता और चोलों के बढ़ते विस्तार जैसे परस्पर जुड़े कारण थे। तलकाड की विजय इस दीर्घकालीन प्रक्रिया की निर्णायक परिणति बनी।
पश्चिमी गंगों का प्रशासन, समाज और संस्कृति

गंग प्रशासन
केंद्रीय प्रशासन
गंग प्रशासन में केंद्रीय और स्थानीय दोनों स्तरों पर अनेक अधिकारी कार्यरत थे। राजा सर्वोच्च प्रशासनिक एवं न्यायिक सत्ता का केंद्र था और उसके अधीन विभिन्न अधिकारी राज्य के वित्त, सैन्य व्यवस्था, कूटनीति तथा राजकीय कार्यों का संचालन करते थे। सर्वाधिकारी प्रमुख प्रशासनिक अधिकारी तथा राजा का सलाहकार था। श्रीभंडारी राजकोष और वित्तीय व्यवस्था की देखरेख करता था। संधिविग्रहिक संधि, युद्ध और कूटनीतिक मामलों से संबंधित कार्य देखता था, जबकि महाप्रधान उच्च प्रशासनिक दायित्वों का निर्वहन करता था। दंडनायक सैन्य व्यवस्था का प्रमुख अधिकारी था। इसके अतिरिक्त गजसाहनी हाथी सेना तथा तुरगसाहनी घुड़सवार सेना से संबंधित अधिकारी थे। राजमहल में नियोगी शाही प्रशासन तथा वस्त्र और आभूषणों की व्यवस्था देखते थे। पडियारा राजद्वार, राजकीय शिष्टाचार और दरबारी समारोहों से संबंधित दायित्व निभाते थे। मानेपेरगडे राजपरिवार की गृह-व्यवस्था की देखरेख करते थे, जबकि अन्य पेरगडे विभिन्न सामाजिक और व्यावसायिक समूहों से संबंधित प्रशासनिक कार्यों का संचालन करते थे।
स्थानीय प्रशासन
स्थानीय प्रशासन में पेरगडे, नाडाबोवा, नलगामिगा, प्रभु और गवुंड जैसे अधिकारियों की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। नाडाबोवा नाडु स्तर पर लेखांकन और कर-संग्रह का कार्य करते थे तथा आवश्यकतानुसार लिपिकीय दायित्व भी निभाते थे। नलगामिगा स्थानीय सुरक्षा और सैन्य संगठन से संबंधित अधिकारी थे। प्रभु स्थानीय कुलीन वर्ग के सदस्य होते थे और भूमि-अनुदानों तथा भूमि की सीमाओं के निर्धारण में साक्षी की भूमिका निभाते थे। इनमें गवुंड सबसे प्रभावशाली स्थानीय अधिकारियों में थे। वे प्रायः भूमिधर और ग्रामीण कुलीन वर्ग से संबंधित होते थे तथा दक्षिणी कर्नाटक की ग्रामीण राजनीतिक व्यवस्था में महत्त्वपूर्ण स्थान रखते थे। वे कर-संग्रह, भूमि-अभिलेखों के रख-रखाव, भूमि-अनुदानों और संपत्ति-लेन-देन की पुष्टि तथा स्थानीय विवादों के समाधान में सहायता करते थे। आवश्यकता पड़ने पर वे राज्य को सैन्य सहायता भी उपलब्ध कराते थे।
सामंती व्यवस्था
छठी शताब्दी के बाद गंग प्रशासन में सामंती तत्त्वों का प्रभाव बढ़ा। स्थानीय सामंत अपने-अपने क्षेत्रों का प्रशासन संचालित करते हुए गंग राजा की सर्वोच्चता स्वीकार करते थे। उनके लिए ‘अरसा’ जैसी उपाधियों का प्रयोग मिलता है। इन सामंतों में विभिन्न स्थानीय और कुलीन समूहों के लोग शामिल थे तथा कई बार उनके अधिकार वंशानुगत होते थे। इसके बदले वे राजसत्ता को कर और सैन्य सहायता प्रदान करते थे। इस व्यवस्था ने गंग राजाओं को विस्तृत क्षेत्र पर नियंत्रण बनाए रखने में सहायता दी।
सैन्य व्यवस्था
गंग सेना में पैदल सैनिकों के साथ घुड़सवार और हाथी सेना भी महत्त्वपूर्ण थी। वेलावली राजपरिवार के प्रति निष्ठावान योद्धाओं और अंगरक्षकों का विशेष समूह था। वे अपने स्वामी के प्रति निष्ठा की शपथ लेते थे और युद्ध में प्राणों का बलिदान देने के लिए तत्पर रहते थे। कुछ अभिलेखीय तथा साहित्यिक परंपराओं में राजा की मृत्यु के बाद उनके आत्मोत्सर्ग का उल्लेख मिलता है, किंतु इसे सामान्य प्रथा नहीं माना जाना चाहिए।
भूमि-अनुदान
पश्चिमी गंग काल में भूमि-अनुदान और भूमि-अधिकारों को स्पष्ट रूप से दर्ज करने की विकसित परंपरा थी। अभिलेखों में भूमि की सीमाएँ नदियों, नालों, जलमार्गों, पहाड़ियों, बड़े पत्थरों, गाँवों, किलों, सिंचाई नहरों, मंदिरों, तालाबों, झाड़ियों और बड़े वृक्षों जैसे प्राकृतिक तथा मानवीय चिह्नों के आधार पर निर्धारित की जाती थीं। कुछ अभिलेखों में मिट्टी के प्रकार, भूमि की प्रकृति, फसलों तथा सिंचाई के लिए बनाए जाने वाले तालाबों और कुओं का भी उल्लेख मिलता है। भूमि को आर्द्र, शुष्क और बागवानी योग्य क्षेत्रों में विभाजित किया जाता था। वन और बंजर भूमि का भी उल्लेख मिलता है। शिकारी समुदायों की बस्तियों के लिए ‘पल्ली’ शब्द का प्रयोग मिलता है। इन विवरणों से भूमि-प्रबंधन और ग्रामीण प्रशासन की संगठित प्रकृति का पता चलता है।
दसवीं शताब्दी में गंग मंत्री और सेनापति चामुंडराय का राजनीतिक प्रभाव विशेष रूप से उल्लेखनीय था। उन्होंने प्रशासन, सैन्य गतिविधियों तथा धार्मिक और सांस्कृतिक संरक्षण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके समय में जैन धार्मिक संस्थाओं को भूमि-अनुदान प्राप्त हुए। ये संस्थाएँ केवल धार्मिक केंद्र नहीं थीं, बल्कि शिक्षा, दान और स्थानीय आर्थिक गतिविधियों के केंद्र के रूप में भी कार्य करती थीं।
अर्थव्यवस्था
पश्चिमी गंग राज्य की अर्थव्यवस्था मुख्यतः कृषि, पशुपालन, शिल्प और व्यापार पर आधारित थी। गंगवाड़ी का भौगोलिक स्वरूप विविध था। इसमें अधिक वर्षा वाला मलनाड, अपेक्षाकृत समतल मैदानी क्षेत्र या बयालुसीमा तथा अर्ध-पहाड़ी क्षेत्र शामिल थे। इस भौगोलिक विविधता के कारण विभिन्न प्रकार की फसलों और आर्थिक गतिविधियों का विकास संभव हुआ।
कृषि
कृषि राज्य की आय और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का प्रमुख आधार थी। अधिक वर्षा वाले मलनाड क्षेत्रों में धान, पान, इलायची और काली मिर्च जैसी फसलें उगाई जाती थीं। अर्ध-मलनाड और अपेक्षाकृत शुष्क क्षेत्रों में रागी, बाजरा, दालें और तिलहन का उत्पादन होता था तथा पशुपालन भी महत्त्वपूर्ण था। मैदानी क्षेत्रों में कावेरी, तुंगभद्रा और वेदवती जैसी नदियों का कृषि पर महत्त्वपूर्ण प्रभाव था। यहाँ धान, गन्ना, नारियल, सुपारी, पान, केला और फूलों की खेती की जाती थी। भूमि की प्रकृति के आधार पर आर्द्र, शुष्क और बागवानी योग्य भूमि का वर्गीकरण किया जाता था। धान की खेती के लिए जलयुक्त भूमि विशेष रूप से उपयोगी थी, जिसके लिए कलानी, गलदे, नीरमन्नु और नीरपन्य जैसे शब्द मिलते हैं।
सिंचाई कृषि-विस्तार का प्रमुख साधन थी। तालाब, कुएँ, बाँध, तटबंध और प्राकृतिक जलाशय सिंचाई के लिए प्रयुक्त होते थे। अभिलेखों से पता चलता है कि कुछ बंजर भूमि को सिंचाई की सुविधा देकर कृषि योग्य बनाया गया। इससे ग्रामीण बस्तियों और कृषि क्षेत्रों के क्रमिक विस्तार का संकेत मिलता है।
गंगकालीन अर्थव्यवस्था में भूमि-अनुदान का विशेष महत्त्व था। ब्राह्मणों, जैन धार्मिक संस्थाओं और मंदिरों को विभिन्न प्रकार के भूमि-अनुदान दिए जाते थे। कर-मुक्त अथवा विशेषाधिकार प्राप्त भूमि के लिए ‘मान्य’ शब्द का प्रयोग मिलता है। इन अनुदानों में कभी-कभी एक से अधिक गाँव भी सम्मिलित होते थे। वीरगति प्राप्त योद्धाओं या उनके परिवारों से संबंधित कुछ भूमि-अनुदानों को बिलावृत्ति अथवा कलनाड कहा जाता था, जबकि मंदिरों के रखरखाव के लिए दिए गए कुछ अनुदानों को तलावृत्ति कहा जाता था। इन अनुदानों से धार्मिक संस्थाओं को स्थायी आर्थिक आधार मिला और राजसत्ता, स्थानीय अभिजात वर्ग तथा धार्मिक संस्थाओं के बीच संबंध मजबूत हुए।
पशुपालन
पशुपालन ग्रामीण अर्थव्यवस्था का महत्त्वपूर्ण अंग था। गाय और बैल कृषि, दुग्ध उत्पादन तथा परिवहन में उपयोग किए जाते थे। अभिलेखों में पशुधन से संबंधित अनेक शब्द मिलते हैं, जैसे गोसहस्र, अर्थात् एक हजार गायें; गसार, अर्थात् गायों का स्वामी; और गोसासी, अर्थात् गायों का दाता। इन उल्लेखों से पशुधन के आर्थिक और धार्मिक महत्त्व का पता चलता है। पशुधन को लेकर होने वाले संघर्षों और पशु-छापों के उल्लेख भी मिलते हैं, जिससे स्पष्ट होता है कि कृषि के साथ पशुपालन ग्रामीण जीवन का अभिन्न अंग था। गोदान से संबंधित उल्लेख पशुधन के धार्मिक महत्त्व को भी दर्शाते हैं।
गंग काल में आंतरिक व्यापार और क्षेत्रीय विनिमय का विकास हुआ। तलकाड और कोलार जैसे केंद्र प्रशासनिक गतिविधियों के साथ व्यापार और शिल्प के भी महत्त्वपूर्ण केंद्र थे। विभिन्न कारीगरों में स्वर्णकार, लोहार, धातु-शिल्पी, बुनकर और अन्य हस्तशिल्पी शामिल थे। वस्त्र, धातु की वस्तुएँ, आभूषण, मसाले और अन्य उपयोगी वस्तुओं का उत्पादन तथा विनिमय होता था। व्यापार और वस्तुओं के आवागमन पर विभिन्न प्रकार के कर और चुंगी लगाए जाते थे, जिससे व्यापार राज्य की आय का अतिरिक्त स्रोत बना।
राज्य की आय के स्रोत
राज्य की आय का प्रमुख स्रोत भूमि-राजस्व था। इसके अतिरिक्त व्यापार, चुंगी, पशुधन और अन्य आर्थिक गतिविधियों से भी राजस्व प्राप्त होता था। गंग अभिलेखों में विभिन्न प्रकार के करों का उल्लेख मिलता है। सिद्धय कृषि से संबंधित स्थानीय कर था, जबकि पोट्टोंडी व्यापारिक वस्तुओं पर लगाया जाने वाला कर था। मन्नादारे भूमि-कर से संबंधित था और कुरिम्बदेरे चरवाहों से लिया जाने वाला कर था। भाग भूमि अथवा उससे प्राप्त उपज में राज्य के हिस्से को सूचित करता था। किरुदेरे और समथदेरे जैसे अन्य स्थानीय करों का भी उल्लेख मिलता है। हिरण्य सामान्यतः नकद भुगतान से संबंधित था, जबकि सुलिका व्यापारिक वस्तुओं पर लगाए जाने वाले शुल्क अथवा चुंगी से संबंधित था।
सिंचाई व्यवस्था के लिए बिट्टुवट्टा अथवा नीरवारी जैसे करों का उल्लेख मिलता है। इनसे प्राप्त आय का उपयोग सिंचाई टैंकों और जल-संरचनाओं के निर्माण तथा रखरखाव में किया जाता था। युद्ध के समय गाँवों से गुजरने वाली सेनाओं को भोजन और अन्य आवश्यक सामग्री उपलब्ध कराने का दायित्व भी स्थानीय समुदायों पर डाला जा सकता था।
इस प्रकार पश्चिमी गंगों की अर्थव्यवस्था कृषि और भूमि-राजस्व पर आधारित बहुआयामी ग्रामीण अर्थव्यवस्था थी। सिंचाई, भूमि-अनुदान, पशुपालन, शिल्प और व्यापार ने इसे स्थिरता प्रदान की। स्थानीय गवुंडों, सामंतों और अन्य अधिकारियों की सक्रिय भागीदारी ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को राजसत्ता से जोड़े रखा। भूमि-अनुदान की परंपरा ने ब्राह्मणों, जैन संस्थाओं और मंदिरों को आर्थिक आधार प्रदान किया तथा गंगकालीन सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक जीवन के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।
पश्चिमी गंगकालीन धर्म
पश्चिमी गंग राजवंश की धार्मिक नीति बहुधर्मी और अपेक्षाकृत सहिष्णु थी। यद्यपि विशेषकर आठवीं से दसवीं शताब्दी के बीच जैन धर्म को पर्याप्त राजकीय संरक्षण प्राप्त हुआ, फिर भी शैव, वैष्णव और वैदिक-ब्राह्मण परंपराएँ भी गंग राज्य में सक्रिय और प्रभावशाली रहीं। विभिन्न शासकों की धार्मिक निष्ठाएँ एक जैसी नहीं थीं। कुछ शासक जैन धर्म के संरक्षक थे, जबकि कुछ ने वैदिक अनुष्ठानों तथा शैव या वैष्णव परंपराओं को संरक्षण दिया। इसलिए गंगकालीन धार्मिक जीवन को किसी एक धर्म के प्रभुत्व के बजाय विभिन्न धार्मिक परंपराओं के सह-अस्तित्व और पारस्परिक संरक्षण के रूप में समझना अधिक उचित है।
जैन धर्म
पश्चिमी गंग राज्य में जैन धर्म का प्रभाव विशेष रूप से आठवीं शताब्दी के बाद बढ़ा। अनेक गंग शासकों, मंत्रियों और सामंतों ने जैन बसदियों, मठों तथा धार्मिक संस्थाओं को भूमि और धन के अनुदान दिए। ये संस्थाएँ केवल धार्मिक गतिविधियों के केंद्र नहीं थीं, बल्कि शिक्षा, दर्शन, साहित्य और विद्वत् गतिविधियों के महत्त्वपूर्ण केंद्र भी थीं।
शिवमार प्रथम, बूतुग द्वितीय और उनके प्रभावशाली मंत्री चामुंडराय जैन धर्म के प्रमुख संरक्षकों में माने जाते हैं। माधव तृतीय और अविनीत से संबंधित कुछ अभिलेखों में भी जैन संस्थाओं को दिए गए दानों का उल्लेख मिलता है। जैन मंदिरों और बसदियों में चौबीस तीर्थंकरों की प्रतिमाएँ प्रतिष्ठित की जाती थीं। कालांतर में यक्ष-यक्षियों जैसे सहायक देवताओं की पूजा भी जैन धार्मिक परंपरा का महत्त्वपूर्ण अंग बन गई।
श्रवणबेलगोला का विकास
गंगकाल में श्रवणबेलगोला दक्षिण भारत के प्रमुख जैन तीर्थस्थलों में विकसित हुआ। यहाँ अनेक बसदियों, प्रतिमाओं, अभिलेखों और धार्मिक स्मारकों का निर्माण हुआ। चामुंडराय के संरक्षण में विंध्यगिरि पहाड़ी पर गोम्मटेश्वर बाहुबली की विशाल एकाश्म प्रतिमा स्थापित कराई गई, जिसका निर्माण सामान्यतः लगभग 981 ई. के आसपास माना जाता है। लगभग 57 फीट ऊँची यह प्रतिमा जैन मूर्तिकला की उत्कृष्ट कृतियों में गिनी जाती है।
बाहुबली को कायोत्सर्ग मुद्रा में प्रदर्शित किया गया है। उनके शरीर के चारों ओर लिपटी लताएँ दीर्घकालीन ध्यान, स्थिरता और सांसारिक मोह से विरक्ति का प्रतीक मानी जाती हैं। श्रवणबेलगोला के विकास से स्पष्ट होता है कि गंग शासकों और उनके उच्च अधिकारियों ने जैन धर्म को केवल धार्मिक संरक्षण ही नहीं दिया, बल्कि उसे व्यापक सांस्कृतिक, शैक्षिक और साहित्यिक परंपरा के रूप में विकसित होने का अवसर भी प्रदान किया।
शैव धर्म
जैन धर्म के साथ-साथ शैव धर्म भी गंग राज्य में व्यापक रूप से प्रचलित था। अभिलेखों में कालामुख, पाशुपत तथा अन्य शैव परंपराओं का उल्लेख मिलता है। आठवीं शताब्दी के बाद शैव धर्म को स्थानीय भूमिधर वर्ग, सामंतों, धार्मिक संस्थाओं, अग्रहारों और कुछ स्थानीय राजवंशों का संरक्षण भी प्राप्त हुआ।
शैव मंदिरों के गर्भगृह में सामान्यतः शिवलिंग स्थापित किया जाता था। मंदिर परिसर में नंदी, पार्वती, गणेश, सूर्य तथा अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाएँ भी स्थापित की जाती थीं। नंदी पहाड़ियों, अवनी और हेब्बाटा जैसे क्षेत्रों में शैव धार्मिक गतिविधियों तथा मठों के विकास के प्रमाण मिलते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि गंग राज्य में शैव धर्म जैन धर्म का केवल प्रतिद्वंद्वी नहीं था, बल्कि समानांतर रूप से विकसित एक प्रभावशाली धार्मिक परंपरा था।
वैदिक-ब्राह्मण परंपरा
गंगकाल के प्रारंभिक चरण में वैदिक-ब्राह्मण परंपरा का भी महत्त्वपूर्ण स्थान था। छठी और सातवीं शताब्दी के अभिलेखों में श्रोत्रिय ब्राह्मणों को दिए गए भूमि-अनुदानों तथा विभिन्न वैदिक अनुष्ठानों का उल्लेख मिलता है। कुछ गंग शासकों द्वारा अश्वमेध और हिरण्यगर्भ जैसे अनुष्ठानों के आयोजन का भी उल्लेख मिलता है। राजा दुर्विनीत को वैदिक परंपरा से जोड़ने वाले प्रमाण भी उल्लेखनीय हैं।
ब्राह्मणों और राजसत्ता के बीच परस्पर लाभकारी संबंध विकसित हुए। वैदिक अनुष्ठानों के माध्यम से राजाओं को धार्मिक एवं राजनीतिक वैधता प्राप्त होती थी, जबकि भूमि-अनुदानों से ब्राह्मणों को आर्थिक आधार और सामाजिक प्रतिष्ठा मिलती थी। अग्रहार वैदिक अध्ययन और शिक्षा के प्रमुख केंद्र थे। ब्राह्मण धार्मिक अनुष्ठानों के अतिरिक्त शिक्षा, प्रशासन और स्थानीय सामाजिक व्यवस्था में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते थे।
वैष्णव धर्म
गंगकाल में वैष्णव धर्म भी प्रचलित था, यद्यपि उपलब्ध अभिलेखीय प्रमाणों के आधार पर इसका प्रभाव जैन और शैव परंपराओं की तुलना में अपेक्षाकृत कम दिखाई देता है। कुछ शासकों और स्थानीय अभिजात वर्ग ने विष्णु मंदिरों तथा वैष्णव संस्थाओं को संरक्षण प्रदान किया। विष्णुगोप को वैष्णव परंपरा से संबद्ध माना जाता है।
गंगकालीन वैष्णव मंदिरों में विष्णु की प्रतिमाएँ सामान्यतः चतुर्भुज रूप में बनाई जाती थीं। उनके हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म प्रदर्शित किए जाते थे। नंजनगुड, सत्तूर और हंगला जैसे क्षेत्रों में वैष्णव धार्मिक गतिविधियों के प्रमाण गंगकालीन धार्मिक विविधता को स्पष्ट करते हैं।
धार्मिक सहिष्णुता और समन्वय
पश्चिमी गंगों की धार्मिक व्यवस्था की प्रमुख विशेषता विभिन्न धार्मिक परंपराओं का सह-अस्तित्व और संरक्षण थी। विशेषकर आठवीं से दसवीं शताब्दी के बीच जैन धर्म को प्रभावशाली राजकीय संरक्षण प्राप्त हुआ, लेकिन शैव, वैष्णव और वैदिक-ब्राह्मण परंपराएँ भी निरंतर विकसित होती रहीं। विभिन्न शासकों की व्यक्तिगत धार्मिक निष्ठाएँ अलग-अलग होने के बावजूद राज्य में अनेक संप्रदायों को अपनी धार्मिक गतिविधियाँ संचालित करने का अवसर मिला।
इस धार्मिक विविधता का प्रभाव गंगकालीन स्थापत्य, मूर्तिकला, साहित्य और शिक्षा पर भी पड़ा। जैन बसदियों के साथ शैव और वैष्णव मंदिरों तथा ब्राह्मणिक अग्रहारों का विकास हुआ। इस प्रकार पश्चिमी गंगकालीन धार्मिक जीवन केवल राजकीय संरक्षण तक सीमित नहीं था, बल्कि उसने दक्षिणी कर्नाटक के सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक और कलात्मक विकास को भी गहराई से प्रभावित किया।
पश्चिमी गंगकालीन समाज
पश्चिमी गंगकालीन समाज अनेक सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और व्यावसायिक समूहों से मिलकर बना था। इसमें राजपरिवार, सामंत, ब्राह्मण, कृषक, व्यापारी, कारीगर, पशुपालक, सैनिक तथा विभिन्न स्थानीय समुदाय शामिल थे। ग्रामीण जीवन में भूमिधरों, ग्राम अधिकारियों और स्थानीय सामंतों की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। समाज पर वर्ण एवं जाति-आधारित विभाजन का प्रभाव था, किंतु विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच आर्थिक, प्रशासनिक और धार्मिक संबंध भी विकसित थे। अभिलेखों, साहित्यिक रचनाओं तथा वीरशिलाओं से तत्कालीन सामाजिक जीवन, महिलाओं की स्थिति, शिक्षा, धार्मिक आस्थाओं, संपत्ति-अधिकार, परिधान और मनोरंजन के संबंध में महत्त्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है।
पश्चिमी गंग राज्य में राजपरिवार और सामंत उच्च राजनीतिक वर्ग का निर्माण करते थे। इनके नीचे ब्राह्मण, कृषक, व्यापारी, शिल्पी, पशुपालक और अन्य स्थानीय समुदाय आते थे। ग्रामीण क्षेत्रों में भूमिधर और प्रभावशाली स्थानीय परिवार प्रशासन तथा आर्थिक गतिविधियों में सक्रिय रहते थे। गवुंड जैसे स्थानीय भूमिधर केवल कृषि व्यवस्था और कर-संग्रह से संबंधित नहीं थे, बल्कि भूमि-अनुदानों, स्थानीय विवादों तथा प्रशासनिक कार्यों में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते थे।
ब्राह्मणों की स्थिति
पश्चिमी गंग समाज में ब्राह्मणों को उच्च सामाजिक और धार्मिक प्रतिष्ठा प्राप्त थी। उन्हें भूमि-अनुदान के साथ कुछ करों और शुल्कों से छूट जैसी सुविधाएँ भी दी जाती थीं। इन अनुदानों के फलस्वरूप अनेक ब्राह्मण प्रभावशाली भूमिधर वर्ग के रूप में स्थापित हुए और स्थानीय सामाजिक-आर्थिक जीवन में उनका प्रभाव बढ़ा।
ब्राह्मणों की भूमिका केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं थी। वे वैदिक कर्मकांड, शिक्षा, न्याय, प्रशासन और भूमि-प्रबंधन में सक्रिय भाग लेते थे। कुछ ब्राह्मण विद्यालयों, मंदिरों, तालाबों और विश्रामगृहों जैसी सार्वजनिक संस्थाओं के संचालन से भी जुड़े थे तथा स्थानीय स्तर पर राजस्व-संग्रह और अन्य सार्वजनिक कार्यों में सहयोग करते थे।
पश्चिमी गंग समाज में कृषक और पशुपालक ग्रामीण अर्थव्यवस्था के प्रमुख आधार थे, जबकि व्यापारी तथा कारीगर नगरों और व्यापारिक केंद्रों की आर्थिक गतिविधियों को संचालित करते थे। अभिलेखों और साहित्यिक स्रोतों में विभिन्न वर्णों, जातियों और पेशागत समूहों का उल्लेख मिलता है। इससे स्पष्ट होता है कि सामाजिक स्थिति और व्यवसाय के आधार पर समाज में विभिन्न स्तर विद्यमान थे। विवाह तथा उत्तराधिकार की प्रथाएँ भी सभी समुदायों में समान नहीं थीं।
महिलाओं की स्थिति
पश्चिमी गंगकालीन समाज में उच्च वर्ग की कुछ महिलाओं को प्रशासनिक, आर्थिक और धार्मिक गतिविधियों में भाग लेने का अवसर प्राप्त था। अभिलेखों से ज्ञात होता है कि राजपरिवार तथा सामंती परिवारों की कुछ महिलाओं ने स्थानीय प्रशासन में भी भूमिका निभाई। कुंदत्तूर की सामंती रानी परब्बया-अरसी इसका उल्लेखनीय उदाहरण हैं। इसी प्रकार जक्कियाब्बे को नलगावुंडा का पद प्राप्त था और उनके संन्यास ग्रहण करने के बाद यह दायित्व उनकी पुत्री को सौंपे जाने का उल्लेख मिलता है। इससे संकेत मिलता है कि कुछ परिस्थितियों में प्रशासनिक दायित्वों का उत्तराधिकार महिलाओं के माध्यम से भी हो सकता था।
महिलाएँ धार्मिक दान और भूमि-अनुदान से संबंधित गतिविधियों में भी भाग लेती थीं। राजपरिवार तथा कुलीन वर्ग की महिलाओं द्वारा मंदिरों और जैन संस्थाओं को दान दिए जाने के प्रमाण मिलते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि उच्च सामाजिक वर्ग की महिलाओं की भूमिका केवल घरेलू जीवन तक सीमित नहीं थी। हालाँकि महिलाओं की सामाजिक स्थिति उनके वर्ग, परिवार और आर्थिक परिस्थिति के अनुसार भिन्न होती थी। राजपरिवार की महिलाओं, कुलीन परिवारों की स्त्रियों, धार्मिक संस्थाओं से जुड़ी महिलाओं तथा सामान्य ग्रामीण महिलाओं की भूमिकाओं में पर्याप्त अंतर रहा होगा। इसलिए पूरे समाज की महिलाओं की स्थिति को एक समान मानना उचित नहीं है।
राजदरबार में रानियों और अन्य राजकीय महिलाओं के विभिन्न स्तर दिखाई देते हैं। समकालीन साहित्य, विशेषकर वड्डाराधने, में मुख्य रानी, अन्य रानियों तथा राजकीय महिला सेविकाओं का उल्लेख मिलता है। इससे राजमहल की संगठित सामाजिक संरचना का पता चलता है। राजपरिवार में महिलाओं और पुरुषों की शिक्षा पर विशेष ध्यान दिया जाता था। राजकुमारों तथा राजपरिवार से संबंधित युवाओं को राजनीति, युद्धकला, हाथी और घुड़सवारी, तीरंदाजी, चिकित्सा, काव्य, व्याकरण, नाटक, साहित्य, नृत्य, संगीत तथा वाद्य-यंत्रों के प्रयोग का प्रशिक्षण दिया जाता था। इस प्रकार राजपरिवार की शिक्षा केवल धार्मिक विषयों तक सीमित नहीं थी, बल्कि प्रशासनिक और सैन्य प्रशिक्षण भी उसका महत्त्वपूर्ण हिस्सा था।
गंगकालीन धार्मिक संस्थाओं में महिलाओं की एक विशिष्ट भूमिका मंदिरों से संबंधित सेवाओं में दिखाई देती है। समकालीन साहित्य और अभिलेखों में सुले अथवा देवदासी परंपरा से संबंधित उल्लेख मिलते हैं। मंदिरों में सेवा करने वाली महिलाओं की भूमिकाएँ अलग-अलग प्रकार की थीं। कुछ महिलाएँ देवता की दैनिक सेवा, पूजा, नैवेद्य, पान-सुपारी तथा मंदिर की अन्य धार्मिक गतिविधियों से संबंधित थीं। अंगभोग का संबंध देवता की पूजा और दैनिक सेवा से था, जबकि रंगभोग का संबंध मंदिर में होने वाले धार्मिक-सांस्कृतिक प्रदर्शन से था। इन सेवाओं की प्रकृति और सामाजिक प्रतिष्ठा में अंतर था।
राजदरबार में गणिकाओं और महिला कलाकारों का भी उल्लेख मिलता है। वे संगीत, नृत्य और मनोरंजन जैसी गतिविधियों से जुड़ी होती थीं। कुछ ऐसी महिलाओं को सामाजिक प्रतिष्ठा भी प्राप्त थी और उनके अनुरोध पर स्थानीय शासकों द्वारा धार्मिक संस्थाओं को भूमि-अनुदान दिए जाने के उदाहरण मिलते हैं।
विवाह संबंधी प्रथाएँ
गंगकालीन समाज में विवाह संबंधी प्रथाओं में विविधता थी। समकालीन स्रोतों में अंतर्जातीय विवाह, बाल विवाह, मामा की बेटी से विवाह तथा स्वयंवर जैसी परंपराओं के उल्लेख मिलते हैं। इससे संकेत मिलता है कि विवाह संबंधी प्रथाएँ क्षेत्र, समुदाय और सामाजिक वर्ग के अनुसार अलग-अलग हो सकती थीं। पारिवारिक संपत्ति के संबंध में भी महिलाओं के कुछ अधिकारों के प्रमाण मिलते हैं। यदि किसी व्यक्ति का पुरुष उत्तराधिकारी नहीं होता था, तो उसकी पत्नी, पुत्री अथवा अन्य निकट संबंधी संपत्ति पर दावा कर सकते थे। संपत्ति में घर, भूमि, अनाज, धन तथा अन्य चल-अचल संसाधन शामिल हो सकते थे। यदि कोई वैध उत्तराधिकारी नहीं होता था, तो राज्य उस संपत्ति को अपने अधिकार में ले सकता था। इससे पता चलता है कि उत्तराधिकार व्यवस्था केवल पुरुष वंशजों तक सीमित नहीं थी और कुछ परिस्थितियों में महिलाओं तथा अन्य निकट संबंधियों को भी संपत्ति पर अधिकार प्राप्त हो सकता था।
वीरगल्लु अथवा वीरशिला
पश्चिमी गंगकालीन समाज में वीरता और युद्धकौशल को विशेष सामाजिक प्रतिष्ठा प्राप्त थी। युद्ध में वीरगति प्राप्त करने वाले योद्धाओं की स्मृति में वीरगल्लु अथवा वीरशिला स्थापित करने की परंपरा व्यापक थी। इन स्मारकों पर युद्ध, वीरता, बलिदान तथा धार्मिक प्रतीकों से संबंधित दृश्य अंकित किए जाते थे। वीर योद्धाओं अथवा उनके परिवारों को कभी-कभी भूमि या आर्थिक सहायता भी प्रदान की जाती थी। इससे पता चलता है कि सैनिक सेवा और युद्ध में बलिदान को राज्य तथा समाज में महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त था।
राजकीय सेना से जुड़े कुछ विशेष योद्धा समूहों का भी उल्लेख मिलता है। वेलावली जैसे योद्धा राजपरिवार के प्रति विशेष निष्ठा रखने वाले सैनिक और अंगरक्षक माने जाते थे। वे अपने स्वामी की रक्षा तथा युद्ध में सेवा के लिए शपथ लेते थे। कुछ अभिलेखीय और साहित्यिक परंपराओं में स्वामी की मृत्यु के बाद उनके आत्मबलिदान से संबंधित उल्लेख भी मिलते हैं, किंतु इसे सामान्य प्रथा के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
मस्तिकल्लु अथवा महासतीकल
गंगकालीन समाज में मस्तिकल्लु अथवा महासतीकल जैसे स्मारक भी पाए गए हैं। ये उन महिलाओं की स्मृति से संबंधित थे जिन्होंने पति की मृत्यु के बाद सती होने जैसी प्रथा का पालन किया। ऐसे स्मारकों की उपस्थिति विशेष रूप से उच्च और राजकीय वर्गों में इस परंपरा के अस्तित्व का प्रमाण देती है। दूसरी ओर, जैन प्रभाव वाले क्षेत्रों में सल्लेखना जैसी धार्मिक मृत्यु-परंपरा के प्रमाण मिलते हैं। इसमें व्यक्ति धार्मिक अनुशासन के अंतर्गत क्रमशः आहार का त्याग करते हुए मृत्यु को स्वीकार करता था। जलसमाधि जैसी अन्य धार्मिक मृत्यु-परंपराओं के उल्लेख भी मिलते हैं। इन परंपराओं को तत्कालीन धार्मिक विश्वासों, तपस्या और मोक्ष की अवधारणाओं के संदर्भ में समझना चाहिए।
गंगकालीन समाज के परिधान के संबंध में अभिलेखीय, साहित्यिक और मूर्तिकला संबंधी स्रोतों से जानकारी मिलती है। पुरुष सामान्यतः धोती अथवा निचला वस्त्र तथा उसके साथ ऊपरी वस्त्र धारण करते थे। उच्च पदस्थ पुरुषों में पगड़ी का प्रचलन था। महिलाएँ साड़ी तथा अन्य पारंपरिक वस्त्र पहनती थीं। सामाजिक स्थिति के अनुसार वस्त्रों की गुणवत्ता और अलंकरण में अंतर रहा होगा। राजपरिवार और उच्च वर्ग के लोगों के वस्त्र अधिक अलंकृत होते थे। धार्मिक और राजकीय अवसरों पर विशेष परिधान धारण किए जाने की संभावना भी स्रोतों से स्पष्ट होती है।
स्त्री और पुरुष दोनों के बीच आभूषणों का व्यापक प्रचलन था। पुरुष अंगूठियाँ, हार, कंगन और कलाईबंद आदि धारण करते थे। महिलाओं के आभूषणों में नाक के आभूषण, नथ, चूड़ियाँ, हार तथा कमरबंध प्रमुख थे। मूर्तियों और मंदिरों की शिल्पकला में इन आभूषणों के विभिन्न रूपों का चित्रण मिलता है। राजपरिवार और उच्च वर्ग के लोगों के आभूषणों में सोने तथा अन्य मूल्यवान धातुओं का प्रयोग किया जाता था। विशेष अवसरों पर हाथियों और घोड़ों को भी सजाया जाता था, जिससे राजकीय वैभव और सैन्य प्रतिष्ठा का प्रदर्शन होता था।
गंगकालीन समाज में मनोरंजन के अनेक साधन प्रचलित थे। पुरुषों के बीच घुड़सवारी, कुश्ती, मुर्गों की लड़ाई और मेढ़ों की लड़ाई जैसी गतिविधियाँ लोकप्रिय थीं। पशु-आधारित खेल तथा युद्धकौशल से संबंधित प्रदर्शन भी सामाजिक मनोरंजन का हिस्सा रहे होंगे। संगीत, नृत्य और नाट्य सामाजिक तथा धार्मिक जीवन से जुड़े थे। मंदिरों और राजदरबारों में संगीत तथा नृत्य की प्रस्तुतियाँ होती थीं। धार्मिक उत्सवों और सामुदायिक अवसरों पर भी सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते थे। इस प्रकार मनोरंजन केवल व्यक्तिगत गतिविधि नहीं था, बल्कि धार्मिक और सामाजिक जीवन का भी महत्त्वपूर्ण अंग था।
पश्चिमी गंगकालीन समाज में राजसत्ता, स्थानीय सामंतों, ग्राम समुदायों और धार्मिक संस्थाओं के बीच घनिष्ठ संबंध दिखाई देते हैं। ग्रामीण अर्थव्यवस्था में कृषक, पशुपालक और भूमिधर महत्त्वपूर्ण थे, जबकि ब्राह्मण और जैन संस्थाएँ शिक्षा तथा धार्मिक गतिविधियों के प्रमुख केंद्र थे। महिलाओं के कुछ वर्गों को प्रशासन, संपत्ति और धार्मिक दान में भाग लेने का अवसर प्राप्त था। वीरगल्लु और मस्तिकल्लु जैसी स्मारक-परंपराएँ तत्कालीन वीरता तथा धार्मिक मान्यताओं को प्रतिबिंबित करती हैं।
सामाजिक विभाजन के बावजूद पश्चिमी गंगकालीन समाज में विभिन्न जातियों और समुदायों के बीच आर्थिक तथा प्रशासनिक परस्पर निर्भरता बनी हुई थी। कृषक, पशुपालक, व्यापारी, कारीगर और स्थानीय अधिकारी ग्रामीण तथा आर्थिक जीवन में अपनी-अपनी भूमिका निभाते थे। शिक्षा-केंद्रों, मंदिरों, मठों और धार्मिक संस्थाओं ने सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन को भी प्रभावित किया।
इस प्रकार पश्चिमी गंगकालीन समाज की प्रमुख विशेषताओं में कृषि-आधारित ग्रामीण जीवन, सामंती संबंध, धार्मिक विविधता, स्थानीय प्रशासन, शिक्षा, वीरता तथा कला-संस्कृति का विकास प्रमुख थे। सामाजिक विभाजन के साथ विभिन्न समूहों की पारस्परिक सहभागिता ने इस समाज को संगठित और गतिशील बनाए रखा।
साहित्य
पश्चिमी गंग राजवंश का काल दक्षिण भारत में संस्कृत और कन्नड़ साहित्य के विकास की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण चरण था। गंग शासकों, मंत्रियों, जैन आचार्यों तथा विद्वानों के संरक्षण में काव्य, गद्य, व्याकरण, छंदशास्त्र, धार्मिक साहित्य और ज्ञानपरक ग्रंथों की रचना हुई। इस काल की अनेक कृतियाँ आज उपलब्ध नहीं हैं, किंतु बाद के साहित्य में उनके उल्लेख मिलते हैं। इसलिए पश्चिमी गंगकालीन साहित्यिक परंपरा का पुनर्निर्माण उपलब्ध ग्रंथों के साथ-साथ अभिलेखीय और साहित्यिक संदर्भों के आधार पर किया जाता है। संस्कृत की दीर्घकालीन शास्त्रीय परंपरा के साथ-साथ कन्नड़ ने भी इस काल में अपनी स्वतंत्र साहित्यिक पहचान को सुदृढ़ किया।
पश्चिमी गंग वंश के प्रारंभिक साहित्यिक व्यक्तित्वों में राजा दुर्विनीत का विशेष स्थान है। छठी शताब्दी के इस विद्वान शासक को संस्कृत और कन्नड़ दोनों भाषाओं की साहित्यिक परंपरा से जोड़ा जाता है। कविराजमार्ग में उन्हें कन्नड़ गद्य के प्रारंभिक लेखकों में स्मरण किया गया है। परंपरा में उनके नाम से बृहत्कथा के संस्कृत रूपांतरण, शब्दावतार तथा संस्कृत कवि भारवि के किरातार्जुनीय पर टीका जैसी रचनाओं का उल्लेख मिलता है। यद्यपि इन कृतियों का मूल रूप वर्तमान में उपलब्ध नहीं है, फिर भी उनके उल्लेख से गंग दरबार में संस्कृत विद्या और साहित्यिक गतिविधियों के महत्त्व का पता चलता है।
गंग शासक माधव द्वितीय को भी प्रारंभिक संस्कृत साहित्यिक परंपरा से संबंधित माना जाता है। उनके नाम से ‘दत्तकसूत्रवृत्ति’ नामक ग्रंथ का उल्लेख मिलता है, जो दत्तक नामक विद्वान के कामशास्त्रीय ग्रंथ पर आधारित माना जाता है। इससे संकेत मिलता है कि गंग दरबार में धार्मिक साहित्य के साथ-साथ व्याकरण, कामशास्त्र और अन्य शास्त्रीय विषयों का भी अध्ययन किया जाता था।
राजा शिवमार द्वितीय साहित्य और ज्ञानपरक लेखन में रुचि रखने वाले शासकों में माने जाते हैं। उनके नाम से ‘गजाष्टक’ तथा ‘गजमातकल्पना’ जैसी कृतियों का उल्लेख मिलता है। इन ग्रंथों का संबंध हाथियों के प्रशिक्षण, स्वभाव और प्रबंधन से माना जाता है। यद्यपि गजाष्टक वर्तमान में उपलब्ध नहीं है, किंतु इसके उल्लेख से संकेत मिलता है कि गंगकालीन साहित्य केवल धार्मिक और काव्यात्मक विषयों तक सीमित नहीं था, बल्कि व्यावहारिक तथा तकनीकी ज्ञान को भी उसमें स्थान प्राप्त था।
लगभग नौवीं शताब्दी के उत्तरार्ध अथवा दसवीं शताब्दी के प्रारंभ में गुणवर्मा प्रथम कन्नड़ साहित्य के महत्त्वपूर्ण प्रारंभिक कवियों में दिखाई देते हैं। उनके नाम से ‘शूद्रक’ और ‘हरिवंश’ जैसी कृतियों का उल्लेख मिलता है। ये रचनाएँ वर्तमान में उपलब्ध नहीं हैं, किंतु बाद के साहित्यिक संदर्भों से उनके अस्तित्व की जानकारी प्राप्त होती है। माना जाता है कि गुणवर्मा को गंग शासक एरेगंग नीतिमार्ग द्वितीय का संरक्षण प्राप्त था। उनकी रचनाओं से कन्नड़ में पौराणिक तथा ऐतिहासिक विषयों को साहित्यिक रूप देने की प्रारंभिक प्रवृत्ति का पता चलता है।
दसवीं शताब्दी में मंत्री और सेनापति चामुंडराय गंगकालीन साहित्य और संस्कृति के प्रमुख संरक्षकों में थे। उनके संरक्षण में अनेक जैन विद्वानों और साहित्यकारों को प्रोत्साहन मिला। स्वयं चामुंडराय ने लगभग 978 ईस्वी में कन्नड़ गद्य में ‘चावुंडराय पुराण’ की रचना की, जिसे ‘त्रिषष्टिलक्षण महापुराण’ भी कहा जाता है। यह कन्नड़ की प्रारंभिक उपलब्ध गद्य-कृतियों में से एक है।
चावुंडराय पुराण जैन पुराण परंपरा पर आधारित है और इसमें जिनसेन तथा गुणभद्र द्वारा रचित आदिपुराण तथा उत्तरपुराण की परंपरा का संक्षिप्त रूप प्रस्तुत किया गया है। ग्रंथ में जैन परंपरा के प्रमुख पात्रों और 63 शलाकापुरुषों से संबंधित कथाओं का वर्णन मिलता है। चामुंडराय ने अपेक्षाकृत सरल और सुबोध कन्नड़ का प्रयोग किया, जिससे जटिल जैन धार्मिक तथा दार्शनिक विचारों को व्यापक पाठक-वर्ग तक पहुँचाने में सहायता मिली। इस दृष्टि से यह कृति कन्नड़ गद्य के विकास और जैन साहित्य के प्रसार, दोनों की दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
दसवीं शताब्दी के प्रसिद्ध कन्नड़ कवि रन्न के प्रारंभिक साहित्यिक जीवन का संबंध चामुंडराय के संरक्षण से जोड़ा जाता है। उनकी प्रारंभिक कृति ‘परशुरामचरित’ को उनके संरक्षक चामुंडराय की प्रशस्ति से संबंधित माना जाता है। चामुंडराय के संरक्षण ने रन्न जैसे प्रतिभाशाली कवियों को साहित्यिक वातावरण प्रदान किया। आगे चलकर रन्न कन्नड़ साहित्य के प्रमुख कवियों में शामिल हुए और चंपू तथा वीरकाव्य की परंपरा को समृद्ध किया। इस प्रकार गंगकालीन साहित्यिक संरक्षण ने कन्नड़ के उस साहित्यिक विकास की पृष्ठभूमि तैयार की, जिसका उत्कर्ष बाद के काल में दिखाई देता है।
गंगकाल के उत्तरार्ध से संबंधित नागवर्मा प्रथम ने कन्नड़ साहित्य और छंदशास्त्र के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। वे मूलतः वेंगी क्षेत्र से संबंधित ब्राह्मण विद्वान माने जाते हैं और चामुंडराय के संरक्षण से जुड़े थे। उनकी छंदोम्बुधि कन्नड़ छंदशास्त्र की प्रारंभिक महत्त्वपूर्ण कृतियों में मानी जाती है। इसमें कन्नड़ काव्य में प्रयुक्त छंदों और उनकी संरचना का विवेचन किया गया है। उनकी ‘कर्नाटक कादंबरी’ संस्कृत साहित्य की प्रसिद्ध कादंबरी परंपरा से प्रभावित कन्नड़ रचना थी। यह चंपू शैली में रचित मानी जाती है, जिसमें गद्य और पद्य का समन्वय होता है। इससे पता चलता है कि इस काल में कन्नड़ साहित्यकार संस्कृत की स्थापित साहित्यिक परंपराओं को ग्रहण करते हुए उन्हें स्थानीय भाषा और साहित्यिक अभिरुचि के अनुरूप विकसित कर रहे थे।
गंगकालीन साहित्यिक वातावरण में जैन विद्वानों का योगदान विशेष रूप से उल्लेखनीय था। हेमसेन, जिन्हें विद्याधनंजय के नाम से भी जाना जाता है, ने ‘राघवपांडवीय’ की रचना की। यह श्लेषप्रधान काव्य है, जिसमें रामायण और महाभारत की कथाओं को एक साथ प्रस्तुत करने का साहित्यिक प्रयास किया गया है। ऐसी रचनाएँ तत्कालीन विद्वानों की भाषिक दक्षता और जटिल काव्य-रचना की क्षमता को दर्शाती हैं।
हेमसेन के शिष्य वादीभसिंह ने ‘गद्यचिंतामणि’ और ‘क्षत्रचूड़ामणि’ जैसी रचनाएँ कीं। इन कृतियों में जैन धार्मिक विचारों के साथ विकसित गद्य-शैली दिखाई देती है। इस प्रकार जैन आचार्यों और विद्वानों ने केवल धार्मिक विचारों के प्रसार में ही योगदान नहीं दिया, बल्कि संस्कृत और कन्नड़ की साहित्यिक परंपराओं को भी समृद्ध किया।
पश्चिमी गंगकालीन साहित्य के विकास में राजकीय संरक्षण के साथ-साथ जैन मठों, मंदिरों और विद्वत् संस्थाओं की भूमिका भी महत्त्वपूर्ण थी। जैन आचार्य साहित्य, दर्शन, व्याकरण और धार्मिक ग्रंथों के अध्ययन-अध्यापन से जुड़े थे। गंग शासकों तथा उनके मंत्रियों द्वारा दिए गए भूमि-अनुदानों से इन संस्थाओं को आर्थिक आधार प्राप्त होता था। इससे विद्वानों और साहित्यकारों को स्थायी संरक्षण मिला तथा साहित्यिक गतिविधियों के विकास के लिए अनुकूल वातावरण तैयार हुआ।
इस काल में संस्कृत का प्रयोग मुख्यतः शास्त्रीय साहित्य, धार्मिक ग्रंथों, प्रशस्तियों और विद्वत् परंपरा में होता रहा, जबकि कन्नड़ धीरे-धीरे प्रशासन, स्थानीय अभिलेखन और साहित्य की महत्त्वपूर्ण भाषा बनती गई। संस्कृत और कन्नड़ के इस परस्पर प्रभाव ने दक्षिण भारत की साहित्यिक संस्कृति को समृद्ध किया। पश्चिमी गंगों के संरक्षण में विकसित यह साहित्यिक परंपरा आगे चलकर मध्यकालीन कन्नड़ साहित्य के उत्कर्ष की आधारभूमि बनी।
कला एवं स्थापत्य
पश्चिमी गंग राजवंश ने दक्षिण भारत, विशेषकर दक्षिण कर्नाटक में कला, स्थापत्य, अभिलेखन और शिक्षा के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। गंगकालीन कला में स्थानीय कन्नड़ परंपराओं के साथ पल्लव और प्रारंभिक चालुक्य स्थापत्य की विशेषताओं का समन्वय दिखाई देता है। जैन धर्म को प्राप्त संरक्षण के कारण जैन बसदियों और स्मारकों की एक विशिष्ट स्थापत्य परंपरा विकसित हुई, जबकि शैव और वैष्णव मंदिरों का भी निर्माण एवं संरक्षण जारी रहा।
गंगकालीन स्थापत्य में स्तंभों का विशेष महत्त्व था। मंदिरों में गोलाकार अथवा बहुभुजीय स्तंभ, अलंकृत आधार, पुष्पीय रूपांकन और सूक्ष्म नक्काशी का प्रयोग मिलता है। मंदिरों के विमानों में क्रमशः ऊपर उठती हुई मंजिलों तथा छोटे मंदिराकार अलंकरणों का प्रयोग किया जाता था। इन विशेषताओं पर पल्लव और प्रारंभिक चालुक्य स्थापत्य का प्रभाव दिखाई देता है, किंतु गंग शिल्पियों ने इन्हें स्थानीय धार्मिक आवश्यकताओं और कलात्मक परंपराओं के अनुरूप विकसित किया।
जैन स्थापत्य गंगकाल की प्रमुख कलात्मक उपलब्धियों में शामिल था। जैन बसदियों में संतुलित अनुपात, अलंकृत स्तंभ, सूक्ष्म नक्काशी और तीर्थंकर प्रतिमाओं का संयमित प्रयोग प्रमुख था। दीवारों और स्तंभों पर पुष्पीय, ज्यामितीय तथा धार्मिक रूपांकन बनाए जाते थे। कंबदहल्ली की पंचकूट बसदी इसका उल्लेखनीय उदाहरण है। इसकी बहु-कक्षीय योजना, अलंकृत स्तंभ, द्रविड़ स्थापत्य के प्रभाव और तीर्थंकर प्रतिमाएँ गंगकालीन जैन स्थापत्य की विशेषताओं को स्पष्ट करती हैं।
श्रवणबेलगोला गंगकाल में जैन स्थापत्य और मूर्तिकला का प्रमुख केंद्र बनकर उभरा। यहाँ चावुंडराय बसदी, चंद्रगुप्त बसदी तथा अन्य जैन स्मारकों का निर्माण हुआ। चंद्रगुप्त बसदी के वर्तमान स्वरूप में बाद के काल के निर्माण और अलंकरण भी दिखाई देते हैं, इसलिए इसे केवल गंगकालीन स्थापत्य का विशुद्ध उदाहरण मानना उचित नहीं है।
गंगकालीन मूर्तिकला की सर्वाधिक प्रसिद्ध उपलब्धि श्रवणबेलगोला की गोम्मटेश्वर बाहुबली की विशाल एकाश्म प्रतिमा है। इसका निर्माण मंत्री चामुंडराय के संरक्षण में लगभग 981 ई. के आसपास कराया गया। लगभग 57 फीट ऊँची यह प्रतिमा महीन दाने वाले ग्रेनाइट से निर्मित है और जैन मूर्तिकला की उत्कृष्ट कृतियों में गिनी जाती है। बाहुबली को कायोत्सर्ग मुद्रा में दर्शाया गया है। उनके शरीर के चारों ओर लिपटी लताएँ दीर्घकालीन ध्यान, आत्मसंयम और सांसारिक मोह से विरक्ति का प्रतीक मानी जाती हैं। शांत मुखभाव, संतुलित शारीरिक अनुपात, विशाल एकाश्म संरचना और उत्कृष्ट शिल्पकौशल इस प्रतिमा को दक्षिण भारतीय मध्यकालीन मूर्तिकला की असाधारण उपलब्धि बनाते हैं।
गंगकालीन जैन कला में ब्रह्मदेव स्तंभ तथा अन्य स्वतंत्र स्तंभों की परंपरा भी उल्लेखनीय थी। इनके स्तंभ-शाफ्ट पर पुष्पीय और लतामय अलंकरण तथा धार्मिक अभिलेख अंकित किए जाते थे। ये स्तंभ धार्मिक स्मारकों के साथ-साथ दान और धार्मिक गतिविधियों की स्मृति को भी सुरक्षित रखते थे।
गंग शासकों तथा उनके अधीनस्थ सामंतों ने शैव और वैष्णव मंदिरों के निर्माण एवं संरक्षण को भी प्रोत्साहित किया। तलकाड इस दृष्टि से प्रमुख केंद्र था। यहाँ के मंदिरों में स्थानीय द्रविड़ स्थापत्य के साथ प्रारंभिक चालुक्य प्रभाव दिखाई देता है। अरकेश्वर, पातालेश्वर और मरालेश्वर मंदिर इस परंपरा से संबंधित हैं। इसके अतिरिक्त होलालूर का अरकेश्वर मंदिर, मन्ने का कपिलेश्वर मंदिर, कोलार का कोलारम्मा मंदिर, नरसमंगल का रामेश्वर मंदिर, बेगुर का नागेश्वर मंदिर और अरलगुप्पे का कल्लेश्वर मंदिर भी गंगकालीन हिंदू स्थापत्य परंपरा के महत्त्वपूर्ण उदाहरण माने जाते हैं। इन मंदिरों की मूर्तिकला में देवी-देवताओं के साथ पुराणों और महाकाव्यों से संबंधित प्रसंगों को भी स्थान दिया गया।
पश्चिमी गंगकालीन कला में वीरगल्लु अथवा वीरशिला की परंपरा भी महत्त्वपूर्ण थी। युद्ध में वीरगति प्राप्त योद्धाओं की स्मृति में स्थापित इन स्मारकों पर युद्ध, वीरता, बलिदान और धार्मिक विश्वासों से संबंधित दृश्य अंकित किए जाते थे। डोड्डाहुंडी की वीरशिला इस परंपरा का उल्लेखनीय उदाहरण है। इसी प्रकार मस्तिकल्लु अथवा महासती स्मारक तत्कालीन सती-परंपरा से संबंधित सामाजिक और धार्मिक मान्यताओं को अभिव्यक्त करते थे। इस प्रकार स्मारक-कला में धार्मिक विषयों के साथ तत्कालीन युद्ध-संस्कृति और सामाजिक आदर्शों को भी स्थान मिला।
पश्चिमी गंगों का महत्त्व
पश्चिमी गंग वंश ने लगभग छह शताब्दियों तक दक्षिण कर्नाटक और दक्षिण भारत की राजनीति, धर्म, कला, साहित्य तथा सामाजिक-आर्थिक जीवन को प्रभावित किया। कदंबों, पल्लवों, चालुक्यों और राष्ट्रकूटों जैसी शक्तियों के बदलते राजनीतिक समीकरणों के बीच गंग शासकों ने गंगवाड़ी में अपनी सत्ता को लंबे समय तक बनाए रखा। उनकी विरासत प्रशासन, कृषि, सिंचाई, धर्म, शिक्षा, साहित्य, स्थापत्य और मूर्तिकला जैसे विभिन्न क्षेत्रों में दिखाई देती है।
प्रशासन के क्षेत्र में गंगों ने केंद्रीय सत्ता और स्थानीय संस्थाओं के बीच समन्वय स्थापित किया। सामंतों, स्थानीय अधिकारियों और भूमिधरों को प्रशासन में महत्त्वपूर्ण भूमिका प्राप्त थी। गवुंड जैसे प्रभावशाली भूमिधर कृषि, राजस्व-संग्रह, भूमि-प्रबंधन और ग्राम-प्रशासन से जुड़े थे। भूमि-अनुदान तथा कर-व्यवस्था ने ग्रामीण प्रशासन को संगठित करने में सहायता की और स्थानीय संस्थाओं को सुदृढ़ बनाया।
गंगकालीन अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार कृषि थी। सिंचाई के लिए तालाबों, बाँधों और जलाशयों के निर्माण तथा रखरखाव पर ध्यान दिया जाता था। इसके साथ पशुपालन, शिल्प, धातुकर्म और व्यापार भी आर्थिक जीवन के महत्त्वपूर्ण अंग थे। ब्राह्मणों, जैन संस्थाओं और मंदिरों को दिए गए भूमि-अनुदानों से कृषि के विस्तार के साथ धार्मिक एवं शैक्षिक संस्थाओं को भी आर्थिक आधार मिला।
धार्मिक क्षेत्र में गंगों की सबसे विशिष्ट पहचान जैन धर्म के संरक्षण से जुड़ी है। श्रवणबेलगोला और कंबदहल्ली जैन धर्म, दर्शन और शिक्षा के प्रमुख केंद्र बने। मंत्री चामुंडराय का योगदान विशेष रूप से उल्लेखनीय था। यद्यपि जैन धर्म को पर्याप्त संरक्षण मिला, शैव, वैष्णव और वैदिक-ब्राह्मण परंपराएँ भी सक्रिय रहीं। इस धार्मिक सह-अस्तित्व ने गंगवाड़ी में विविधतापूर्ण सांस्कृतिक वातावरण को विकसित किया।
कला और स्थापत्य में श्रवणबेलगोला की गोम्मटेश्वर बाहुबली की विशाल एकाश्म प्रतिमा गंगकालीन उपलब्धियों का सर्वाधिक प्रसिद्ध उदाहरण है। इसके अतिरिक्त कंबदहल्ली की पंचकूट बसदी, जैन बसदियाँ तथा शैव और वैष्णव मंदिर स्थापत्य की विविधता को दर्शाते हैं। इन निर्माणों में स्थानीय परंपराओं के साथ पल्लव और प्रारंभिक चालुक्य प्रभावों का समन्वय दिखाई देता है। वीरगल्लु और मस्तिकल्लु जैसे स्मारक तत्कालीन वीरता, धार्मिक विश्वासों और सामाजिक आदर्शों को अभिव्यक्त करते हैं।
साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में भी गंगों का योगदान महत्त्वपूर्ण था। संस्कृत और कन्नड़ दोनों भाषाओं को संरक्षण मिला। राजा दुर्विनीत विद्वान शासक के रूप में प्रसिद्ध थे, जबकि दसवीं शताब्दी में चामुंडराय की चावुंडराय पुराण कन्नड़ गद्य की प्रारंभिक महत्त्वपूर्ण कृतियों में शामिल हुई। जैन आचार्यों ने साहित्य, दर्शन और धार्मिक ग्रंथों के विकास में योगदान दिया। अग्रहार, घटिका, ब्रह्मपुर और मठ शिक्षा के प्रमुख केंद्र थे, जहाँ व्याकरण, दर्शन, धर्मशास्त्र और साहित्य का अध्ययन-अध्यापन होता था।
कन्नड़ भाषा और अभिलेखीय परंपरा के विकास में भी गंगों की भूमिका उल्लेखनीय रही। प्रारंभिक अभिलेखों में संस्कृत का प्रयोग वंशावली और प्रशस्तियों के लिए अधिक हुआ, जबकि भूमि-अनुदान, ग्राम-सीमाओं, करों तथा स्थानीय प्रशासन से संबंधित विवरणों में कन्नड़ का प्रयोग बढ़ता गया। इससे कन्नड़ के प्रशासनिक और सामाजिक महत्त्व में वृद्धि का संकेत मिलता है।
दसवीं शताब्दी के अंत में चोलों द्वारा गंगवाड़ी पर अधिकार किए जाने के बाद भी गंगों की सांस्कृतिक विरासत समाप्त नहीं हुई। श्रवणबेलगोला जैसे जैन केंद्रों का महत्त्व बना रहा तथा कन्नड़ भाषा, साहित्य और अभिलेखीय परंपरा आगे विकसित होती रही। इस प्रकार पश्चिमी गंग वंश की विरासत प्रशासन, कृषि, धार्मिक सह-अस्तित्व, जैन संस्कृति, स्थापत्य, मूर्तिकला, शिक्षा और कन्नड़ साहित्य के विकास में निहित है। उन्होंने दक्षिण कर्नाटक की दीर्घकालीन राजनीतिक, धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को आकार देने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।


