भारत में वामपंथ का उदय और विकास
परिचय और अवधारणा
वामपंथी राजनीति उस विचारधारा को कहते हैं जो समाज को बदलकर उसमें अधिक आर्थिक बराबरी और सामाजिक न्याय लाना चाहती है। वामपंथी विचारधारा में समाज के उन वर्गों के लिए सहानुभूति और समर्थन दिखाई देता है जो किसी भी कारण से अन्य लोगों की तुलना में पिछड़ गए हों, दलित हों या आर्थिक रूप से शक्तिहीन हों। वामपंथी विचारधारा का मूल उद्देश्य ऐसे समाज की स्थापना करना है जहाँ सभी मनुष्यों को समान अधिकार और समान संसाधन प्राप्त हों। राजनीति के संदर्भ में ‘बाएँ’ (लेफ्ट) और ‘दाएँ’ (राइट) शब्दों का प्रयोग सर्वप्रथम 1789 ई. में फ्रांसीसी क्रांति के समय किया गया था, जब फ्रांस के संसद के दायीं ओर राजा के समर्थक बैठते थे और बायीं ओर विरोधी। इस प्रकार राजा के समर्थकों को दक्षिणपंथी (कंजरवेटिव) और विरोधियों को, जो गणतंत्र, धर्मनिरपेक्षता और समानता में विश्वास करते थे, वामपंथी कहा जाने लगा।
आधुनिक काल में साम्यवाद (कम्युनिज्म) और समाजवाद (सोशलिज्म) से संबंधित विचारधाराओं को ‘वामपंथी राजनीति’ कहा जाता है। ये दोनों विचारधाराएँ आर्थिक और सामाजिक समानता के सिद्धांतों पर आधारित हैं, किंतु उनके उद्देश्य और कार्यप्रणाली में कुछ अंतर पाए जाते हैं। आधुनिक साम्यवाद और समाजवाद का सैद्धांतिक और दार्शनिक आधार मार्क्सवाद है, जो कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स के विचारों पर निर्मित है।

मार्क्सवाद : वामपंथ की वैचारिक नींव
कार्ल मार्क्स (1818-1883 ई.) एक प्रभावशाली जर्मन दार्शनिक, अर्थशास्त्री, समाजशास्त्री, इतिहासकार, पत्रकार और क्रांतिकारी समाजवादी थे, जिन्होंने विश्व इतिहास में वैज्ञानिक समाजवाद का प्रतिपादन किया और एक नई विचारधारा की नींव रखी। मार्क्स के जीवन के अधिकांश वर्ष लंदन में व्यतीत हुए, जहाँ उन्होंने पूंजीवादी व्यवस्था का गहन अध्ययन किया। मार्क्सवादी दर्शन के अनुसार मानव समाज में मौलिक विभाजन वर्ग-आधारित विभाजन है, जो निजी संपत्ति की संस्था और उत्पादन के साधनों के असमान वितरण का परिणाम है।
मार्क्स के अनुसार मानव सभ्यता के संपूर्ण इतिहास में सदैव दो मुख्य वर्ग रहे हैं— पहला, उत्पादन के साधनों के मालिक, जिन्हें आधुनिक समय में पूंजीपति या बुर्जुआ कहा जाता है, और दूसरा, श्रमिक वर्ग, जिन्हें सर्वहारा कहा जाता है। प्राचीन काल में ये संबंध स्वामी-दास के रूप में थे, मध्यकाल में सामंत-किसान के रूप में थे और आधुनिक पूंजीवादी युग में ये संबंध पूंजीपति-मजदूर के रूप में दिखाई देते हैं। मार्क्सवादी विश्लेषण में पूंजीपति (बुर्जुआ) सदैव श्रमिकों (सर्वहारा) का आर्थिक शोषण करता है और उन पर अपना वर्चस्व कायम करने के लिए सामाजिक, राजनीतिक, कानूनी, धार्मिक और नैतिक संस्थाओं का सुनियोजित रूप से उपयोग करता है। मार्क्स का विश्वास था कि पूंजीवादी व्यवस्था को सिर्फ एक क्रांतिकारी आंदोलन के माध्यम से ही नष्ट किया जा सकता है, शांतिपूर्ण सुधारों के द्वारा नहीं।
कम्युनिस्ट पार्टी वह राजनीतिक संगठन है जो साम्यवाद के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक सिद्धांतों में विश्वास रखती है और उन लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए संगठित संघर्ष करती है। 1917 ई. की रूसी क्रांति के बाद रूस की बोल्शेविक पार्टी, जिसे कम्युनिस्ट पार्टी के नाम से भी जाना जाता है, की विश्वव्यापी प्रशंसा की गई। इस क्रांति ने विश्व के कोने-कोने में वामपंथी राजनीतिक आंदोलनों को प्रेरित किया। विभिन्न देशों की कम्युनिस्ट पार्टियों के बीच तालमेल और समन्वय स्थापित करने के लिए मार्च 1919 ई. में सोवियत संघ की राजधानी मॉस्को में कम्युनिस्ट इंटरनेशनल (कॉमिन्टर्न) की स्थापना की गई।
भारत में वामपंथी विचारधारा का प्रारंभिक परिचय
भारत में बीसवीं शताब्दी के दूसरे दशक के अंतिम वर्षों और तीसरे दशक के शुरुआती वर्षों में वामपंथी राजनीति का उदय हुआ। भारत में साम्यवादी विचारधारा को मुख्य रूप से कम्युनिस्टों ने आगे बढ़ाया, जिन्हें रूस के साम्यवादी संगठन कॉमिन्टर्न का समर्थन और निर्देशन प्राप्त था। दूसरी ओर, समाजवादी विचारधारा का वाहक बाद में कांग्रेस समाजवादी दल बना, जिसके प्रमुख प्रतीक जवाहरलाल नेहरू और सुभाषचंद्र बोस जैसे नेता थे। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन और श्रमजीवियों (मजदूरों और किसानों) के संघर्ष को एक अविछिन्न और अविभाज्य रूप में प्रस्तुत करना वामपंथियों की सबसे महत्त्वपूर्ण उपलब्धि रही है।
भारतीयों का वैज्ञानिक समाजवाद से परिचय सोवियत क्रांति (1917 ई.) से बहुत पहले ही हो चुका था। उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में ईश्वरचंद्र विद्यासागर, शशिपद बनर्जी, एस.एस. बंगाली, एन.एम. लोखंडे, शिवनाथ शास्त्री, बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय, लालबिहारी डे, अधीरचंद्र दास और दादाभाई नौरोजी जैसे विचारशील व्यक्तित्व समाजवादी विचारों से परिचित थे और उन्होंने अपने लेखन और कार्यों के माध्यम से इन विचारों को भारत में प्रचारित किया। ये बुद्धिजीवी भारतीय समाज को आधुनिकीकरण के मार्ग पर ले जाने के लिए प्रयासरत थे।
अगस्त 1907 ई. में बेल्जियम के शहर स्टुटगार्ट में अंतरराष्ट्रीय सोशलिस्ट कांग्रेस का आयोजन किया गया। इस महत्त्वपूर्ण कांग्रेस में भारत की तरफ से तीन प्रतिनिधि भाग लिए-श्रीमती भीकाजी रुस्तम कामा (जो भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की एक महान् नारीवादी कार्यकर्ता और क्रांतिकारी थीं), वीरेंद्रनाथ चट्टोपाध्याय, जो बंगाल के एक प्रमुख क्रांतिकारी थे और सरदार सिंहजी रेवाभाई राणा (एस.आर. राणा)। इन प्रतिनिधियों की उपस्थिति से स्पष्ट है कि भारत में समाजवादी विचारधारा के प्रति जागरूकता पहले से ही विद्यमान थी। यद्यपि भारत में वामपंथी विचारधारा का वास्तविक, संगठित और सुव्यवस्थित उदय प्रथम विश्वयुद्ध (1914-1918 ई.) के तुरंत बाद हुआ। युद्ध के कारण यूरोप में जबरदस्त राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक परिवर्तन आए, जिसका प्रभाव भारतीय राजनीति पर भी पड़ा।
रूस की अक्टूबर क्रांति और भारत पर इसका प्रभाव
7 नवंबर 1917 ई. को (रूसी कैलेंडर के अनुसार 25 अक्टूबर, इसीलिए इसे अक्टूबर क्रांति कहा जाता है) लेनिन के दूरदर्शी नेतृत्व में रूस की बोल्शेविक पार्टी, जिसे कम्युनिस्ट पार्टी भी कहा जाता है, ने जारशाही के निरंकुश शासन को उखाड़ फेंका और विश्व के इतिहास में पहला समाजवादी राज्य की स्थापना की। यह क्रांति तीन वर्षों के भीषण गृहयुद्ध के बाद सफल रही। रूस की यह अभूतपूर्व क्रांति विश्व के कोने-कोने से लोगों को मार्क्सवाद और समाजवाद की विचारधारा की ओर आकर्षित करने लगी। पूरी दुनिया के बौद्धिक, कार्यकर्ता और युवा इस नई विचारधारा से अनुप्रेरित हुए। भारतीय युवा इस ओर विशेष रूप से आकर्षित हुए, क्योंकि भारत भी उस समय ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन था और एक पराधीन राष्ट्र के रूप में पीड़ा सह रहा था।
भारतीय कम्युनिज्म की जड़ें राष्ट्रीय आंदोलन के भीतर से ही फूटी थीं। भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन का वास्तविक संस्थापक विख्यात क्रांतिकारी नरेंद्रनाथ भट्टाचार्य, जिन्हें मानवेंद्रनाथ रॉय के नाम से अधिक जाना जाता है, को माना जाता है। मानवेंद्रनाथ रॉय बंगाल के एक प्रतिभाशाली क्रांतिकारी थे, जो शुरुआत में भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के हिंसक धारा में सक्रिय थे। उन्होंने बाद में अपना ध्यान मार्क्सवाद की ओर केंद्रित किया। मानवेंद्रनाथ रॉय को 1919 ई. में मेक्सिको (अमेरिका) में सोवियत संघ के भेजे गए बोल्शेविक प्रतिनिधि मिखाइल बोरोदीन के साथ संपर्क में आने का अवसर मिला। यह संपर्क मानवेंद्रनाथ रॉय के जीवन का एक महत्त्वपूर्ण मोड़ सिद्ध हुआ।
भारत में प्रथम कम्युनिस्ट संगठन की स्थापना
मानवेंद्रनाथ रॉय ने बोल्शेविक प्रतिनिधि मिखाइल बोरोदीन के साथ मिलकर 1919 ई. में मेक्सिकन कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना में सहायता की। यह कार्य उनके राजनीतिक विकास का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण चरण था। मेक्सिकन कम्युनिस्ट पार्टी के अधिकृत प्रतिनिधि के रूप में मानवेंद्रनाथ रॉय को कम्युनिस्ट इंटरनेशनल की दूसरी अंतरराष्ट्रीय कांग्रेस में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया गया। यह ऐतिहासिक कांग्रेस जुलाई-अगस्त 1920 ई. में मॉस्को में आयोजित की गई। इस कांग्रेस में भारत की ओर से अवनी मुखर्जी, जो बाद में एक प्रसिद्ध भारतीय कम्युनिस्ट नेता बने, ने भाग लिया था। कम्युनिस्ट इंटरनेशनल की दूसरी कांग्रेस के दौरान लेनिन और मानवेंद्रनाथ रॉय के बीच एक महत्त्वपूर्ण विवाद हुआ। यह विवाद औपनिवेशिक देशों (जैसे भारत) में कम्युनिस्ट क्रांति की रणनीति को लेकर था। इस विवाद ने भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन के विकास को महत्त्वपूर्ण रूप से प्रभावित किया।
17 अक्टूबर 1920 ई. को मानवेंद्रनाथ रॉय के नेतृत्व में एक ऐतिहासिक पदक्षेप उठाया गया। इस दिन तशकंद (तत्कालीन सोवियत संघ का शहर, जहाँ भारतीय क्रांतिकारी और कम्युनिस्ट सक्रिय थे) में एल्विन ट्रेंट रॉय, अवनी मुखर्जी, रोजा फिटिगोंफ, जो अवनी मुखर्जी की रूसी पत्नी थीं और कम्युनिस्ट आंदोलन में सक्रिय थीं, मोहम्मद अली (उर्फ अहमद हसन), मोहम्मद शफीक सिद्दीकी, एम.एन. रॉय और मंडयम प्रतिवादी भयंकर तीरूमल आचार्य जैसे प्रमुख क्रांतिकारियों ने मिलकर ‘हिंदुस्तान की कम्युनिस्ट पार्टी’ की औपचारिक स्थापना की। इसी अवसर पर, एक महत्त्वाकांक्षी राजनीतिक सैनिक स्कूल ‘इंदुस्की कुर्स’ (कोर्स) की भी स्थापना की गई, जिसका उद्देश्य भारतीय क्रांतिकारियों को कम्युनिस्ट विचारधारा और संगठन तथा सोवियत क्रांतिकारी परंपरा में प्रशिक्षित करना था।
1921 ई. में मॉस्को में भी हिंदुस्तान की कम्युनिस्ट पार्टी का एक केंद्र स्थापित किया गया। 1921 ई. के आरंभिक महीनों में भारत के विभिन्न भागों से आए हुए नए-नए कम्युनिस्ट बने युवा कार्यकर्ताओं को मॉस्को की ‘कम्युनिस्ट यूनिवर्सिटी ऑफ द टॉइलर्स ऑफ द ईस्ट’ (कुटवी) में भर्ती किया गया। यह विश्वविद्यालय पूरब के मजदूर वर्ग को कम्युनिस्ट विचारधारा की शिक्षा देने के लिए स्थापित किया गया था। इस विश्वविद्यालय में भारतीय छात्रों को मार्क्सवादी सिद्धांत, सोवियत क्रांति की व्यावहारिक कार्यप्रणाली और क्रांतिकारी संगठन के तरीकों में प्रशिक्षित किया जाता था।
1922 ई. में मानवेंद्रनाथ रॉय ने हिंदुस्तान की कम्युनिस्ट पार्टी का मुख्यालय तशकंद से स्थानांतरित कर बर्लिन (जर्मनी) ले गए। बर्लिन में उन्होंने कम्युनिस्ट विचारों के प्रचार के लिए ‘वैनगार्ड ऑफ इंडियन इंडिपेंडेंस’ नाम से एक महत्त्वपूर्ण पाक्षिक पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया। इसके अतिरिक्त, अवनी मुखर्जी के सहयोग से उन्होंने ‘इंडिया इन ट्रांजिशन’ नाम की एक अन्य प्रभावशाली पत्रिका भी निकाली। ये पत्रिकाएँ भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन और कम्युनिस्ट विचारों को जोड़ने का प्रयास करती थीं।
बर्लिन ही वह शहर था जहाँ अन्य महत्त्वपूर्ण भारतीय क्रांतिकारी संगठन भी सक्रिय थे। 1922 ई. में बर्लिन में वीरेंद्रनाथ चट्टोपाध्याय (बंगाल के प्रसिद्ध क्रांतिकारी), भूपेंद्रनाथ दत्त (स्वामी विवेकानंद के भाई) और बरकतुल्लाह (तुर्की के एक साम्यवादी नेता) ने मिलकर ‘इंडिया इंडिपेंडेंस पार्टी’ की स्थापना की थी। यह पार्टी भारतीय स्वतंत्रता और समाजवाद दोनों का समर्थन करती थी।
1920 के दशक के मध्य तक बहुत से ‘गदर पार्टी’ के महत्त्वपूर्ण और अनुभवी नेता भी कम्युनिस्ट विचारों की ओर आकर्षित हो गए। गदर पार्टी एक पुरानी क्रांतिकारी संगठन थी जो उत्तरी अमेरिका में भारतीय प्रवासियों द्वारा संचालित की जाती थी। इन गदर नेताओं का कम्युनिस्ट आंदोलन में आना इस आंदोलन को एक मजबूत क्रांतिकारी आधार प्रदान करने में महत्त्वपूर्ण साबित हुआ। हिंदुस्तान की कम्युनिस्ट पार्टी ने भारत में कम्युनिस्ट नेताओं को संगठित और संयोजित करने का अथक प्रयास किया।
वामपंथी विचारों का प्रचार-प्रसार
भारत के विभिन्न भागों में वामपंथी विचारों को प्रसारित करने में कई महत्त्वपूर्ण पत्रिकाओं और समाचार पत्रों की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। कलकत्ता (अब कोलकाता) में ‘आत्मशक्ति’ और ‘धूमकेतु’ जैसी वामपंथी राष्ट्रवादी पत्रिकाएँ निकाली जाती थीं। दक्षिण भारत के गुंटूर शहर में ‘नवयुग’ नाम की एक प्रभावशाली पत्रिका प्रकाशित होती थी। इन पत्रिकाओं में लेनिन और सोवियत रूस की प्रशंसा में लेख प्रकाशित होते थे और कभी-कभी बर्लिन से प्रकाशित ‘वैनगार्ड’ पत्रिका के उद्धरणों की व्याख्या भी छपती थी। ये पत्रिकाएँ भारतीय बुद्धिजीवियों, छात्रों और कार्यकर्ताओं के बीच साम्यवादी विचारों को जनप्रिय बनाने में काम करती थीं।
अगस्त 1922 ई. में महाराष्ट्र के बॉम्बे (मुंबई) शहर में श्रीपाद अमृत डांगे, जो बाद में भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन के एक प्रमुख नेता बने, ने ‘द सोशलिस्ट’ नाम का एक साप्ताहिक समाचार पत्र निकालना शुरू किया। ‘द सोशलिस्ट’ भारत में प्रकाशित होने वाली पहली कम्युनिस्ट पत्रिका थी। यह पत्रिका भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन के लिए एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण माध्यम साबित हुई। इसके माध्यम से मजदूरों और किसानों की समस्याओं को उजागर किया जाता था और कम्युनिस्ट विचारों का प्रचार किया जाता था।
बंगाल में ‘नवयुग’ पत्रिका के संपादक मुजफ्फर अहमद एक महत्त्वपूर्ण कम्युनिस्ट विचारक थे। दक्षिण भारत के मद्रास (चेन्नई) शहर में ‘लेबर किसान गजट’ के संपादक सिंगारवेलु चेट्टियार कम्युनिस्ट विचारों के एक प्रभावशाली प्रवक्ता थे। पंजाब के लाहौर शहर में ‘इंकलाब’ के संपादक गुलाम हुसैन ने भारत में साम्यवादी विचारधारा के प्रसार में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। इन पत्रिकाओं और उनके संपादकों ने सामूहिक रूप से भारत में कम्युनिस्ट विचारों को जनमानस तक पहुँचाने का महत्त्वपूर्ण कार्य किया।
ब्रिटिश शासन का दमन
पेशावर षड्यंत्र केस
1917 ई. की रूसी बोल्शेविक क्रांति ने विश्व की औपनिवेशिक और शासक शक्तियों में गहरी चिंता पैदा कर दी। ब्रिटिश सरकार को आशंका थी कि रूस की क्रांति से प्रभावित समाजवादी और साम्यवादी विचार भारत में भी फैल सकते हैं और ब्रिटिश शासन के विरुद्ध व्यापक राजनीतिक आंदोलन को जन्म दे सकते हैं। विशेष रूप से उन भारतीय युवाओं को लेकर ब्रिटिश प्रशासन चिंतित था, जो सोवियत रूस और ताशकंद में साम्यवादी विचारों से प्रभावित होकर भारत लौट रहे थे। ब्रिटिश सरकार ने ऐसे कार्यकर्ताओं की गतिविधियों पर निगरानी बढ़ा दी और उन्हें भारत में प्रवेश करने से रोकने तथा गिरफ्तार करने के प्रयास किए।
इसी व्यापक साम्यवाद-विरोधी औपनिवेशिक नीति के अंतर्गत पेशावर में भारतीय कम्युनिस्टों और सोवियत संघ से संपर्क रखने वाले क्रांतिकारी कार्यकर्ताओं के विरुद्ध मुकदमे चलाए गए, जिन्हें सामूहिक रूप से ‘पेशावर षड्यंत्र केस’ कहा जाता है। ये मुकदमे मुख्यतः 1922 से 1927 ई. के बीच विभिन्न चरणों में चले। ब्रिटिश सरकार ने आरोप लगाया कि अभियुक्त सोवियत रूस से साम्यवादी प्रशिक्षण और सहायता प्राप्त कर भारत में ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेंकने की गतिविधियों में शामिल थे।
पेशावर षड्यंत्र केस का उद्देश्य
पेशावर षड्यंत्र केस केवल कुछ व्यक्तियों के विरुद्ध चलाए गए सामान्य आपराधिक मुकदमे नहीं थे, बल्कि इनका संबंध भारत में उभर रहे कम्युनिस्ट आंदोलन और औपनिवेशिक शासन के बीच संघर्ष से था। ब्रिटिश सरकार साम्यवादी विचारधारा के प्रसार को अपने शासन के लिए गंभीर खतरा मानती थी। इसलिए उसने कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं, सोवियत संघ से संपर्क रखने वाले भारतीयों और विदेशों से भारत लौटने वाले क्रांतिकारियों पर कड़ी निगरानी रखी।
इन मुकदमों के माध्यम से ब्रिटिश सरकार ने एक ओर कम्युनिस्ट गतिविधियों को कानूनी रूप से नियंत्रित करने का प्रयास किया, वहीं दूसरी ओर भारत में साम्यवादी विचारधारा के प्रसार को रोकने के लिए दमनात्मक नीति अपनाई। पेशावर षड्यंत्र केस इसलिए भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन के प्रारंभिक इतिहास की एक महत्त्वपूर्ण घटना है, क्योंकि इससे स्पष्ट होता है कि 1920 के दशक में ब्रिटिश सरकार साम्यवाद के बढ़ते प्रभाव को किस गंभीरता से देख रही थी।
पहला मुकदमा
पेशावर षड्यंत्र केस का पहला मुकदमा मोहम्मद अकबर, जिन्हें कुछ स्रोतों में अकबर शाह अथवा मोहम्मद अकबर शाह के नाम से भी उल्लेखित किया गया है, उनके पिता हाफिज़ुल्ला ख़ाँ तथा उनके सहयोगी बहादुर के विरुद्ध चलाया गया। इस मुकदमे को भारत में कम्युनिस्ट विचारों और उनसे जुड़े कार्यकर्ताओं के विरुद्ध ब्रिटिश सरकार की प्रारंभिक कानूनी कार्रवाइयों में महत्त्वपूर्ण माना जाता है। ब्रिटिश प्रशासन को आशंका थी कि सोवियत संघ से प्रभावित भारतीय कार्यकर्ता भारत लौटकर मजदूरों और किसानों के बीच साम्यवादी विचारों का प्रचार करेंगे।
दूसरा मुकदमा
पेशावर षड्यंत्र केस की श्रृंखला का दूसरा मुकदमा मोहम्मद अकबर, मोहम्मद हसन और गुलाम महमूद के विरुद्ध चलाया गया। इन अभियुक्तों पर ब्रिटिश सरकार ने भारत में क्रांतिकारी और कम्युनिस्ट गतिविधियों को बढ़ावा देने से संबंधित आरोप लगाए। इस मुकदमे के माध्यम से सरकार ने उन भारतीयों पर विशेष निगरानी रखी जो विदेशों में समाजवादी और साम्यवादी संगठनों के संपर्क में आए थे।
तीसरा मुकदमा
पेशावर षड्यंत्र मामलों के तीसरे मुकदमे को कई संदर्भों में ‘मॉस्को–ताशकंद षड्यंत्र केस’ भी कहा जाता है। इसका कारण यह था कि इस मामले में शामिल अभियुक्तों के संबंध ताशकंद और मॉस्को में सक्रिय भारतीय कम्युनिस्ट समूहों से जोड़े गए थे। ब्रिटिश सरकार के अनुसार, विदेशों में प्रशिक्षित और साम्यवादी विचारधारा से प्रभावित भारतीय कार्यकर्ता भारत में राजनीतिक परिवर्तन के लिए संगठित गतिविधियाँ चलाने का प्रयास कर रहे थे। इस मुकदमे ने ब्रिटिश शासन की साम्यवाद-विरोधी नीति को और स्पष्ट किया।
चौथा मुकदमा
पेशावर षड्यंत्र केस के चौथे मुकदमे में मोहम्मद शफीक को एकमात्र अभियुक्त बनाया गया। उनका संबंध ताशकंद में सक्रिय भारतीय कम्युनिस्ट समूह से बताया जाता है। इस मुकदमे के माध्यम से ब्रिटिश सरकार ने विदेशों में सक्रिय भारतीय क्रांतिकारियों और भारत के भीतर विकसित हो रहे वामपंथी आंदोलन के बीच संबंधों की जाँच करने का प्रयास किया। यह मुकदमा इस बात का प्रमाण है कि ब्रिटिश प्रशासन भारतीय कम्युनिस्ट गतिविधियों को लेकर अत्यंत सतर्क था।
पाँचवाँ मुकदमा
पेशावर षड्यंत्र मामलों के पाँचवें मुकदमे में फ़ज़ल इलाही कुर्बान को अभियुक्त बनाया गया। इस मामले में उन्हें तीन वर्ष के कारावास की सजा दी गई। यह मुकदमा भी ब्रिटिश सरकार द्वारा कम्युनिस्ट और क्रांतिकारी विचारों से जुड़े भारतीय कार्यकर्ताओं के विरुद्ध चलाए गए दमनात्मक अभियानों की श्रृंखला का हिस्सा था।
इस प्रकार पेशावर षड्यंत्र मामलों का मुख्य उद्देश्य भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन के प्रारंभिक विकास को नियंत्रित करना और साम्यवादी विचारधारा के प्रसार को रोकना था। ब्रिटिश सरकार को आशंका थी कि रूसी क्रांति और सोवियत समाजवादी विचारों से प्रभावित भारतीय कार्यकर्ता मजदूरों, किसानों और युवाओं को संगठित कर औपनिवेशिक शासन के लिए चुनौती पैदा कर सकते हैं। इसलिए इन मुकदमों के माध्यम से ब्रिटिश शासन ने कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार करने, उन पर मुकदमे चलाने और उन्हें कठोर दंड देने की नीति अपनाई। इस प्रकार पेशावर षड्यंत्र केस भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन के प्रारंभिक इतिहास तथा ब्रिटिश औपनिवेशिक दमन की नीति को समझने की दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
कानपुर बोल्शेविक षड्यंत्र केस
जो कम्युनिस्ट नेता पेशावर केस से बाहर रहे, उनके विरुद्ध ब्रिटिश सरकार ने एक और भी बड़ा षड्यंत्र केस दर्ज किया। 1924 ई. में कानपुर में ‘कानपुर बोल्शेविक षड्यंत्र’ के नाम से एक महत्त्वपूर्ण मुकदमा चलाया गया। इस मुकदमे में आठ प्रमुख कम्युनिस्ट नेताओं को आरोपित किया गया: एम.एन. रॉय (मानवेंद्रनाथ रॉय), मुजफ्फर अहमद, शौकत उस्मानी, गुलाम हुसैन, श्रीपाद अमृत डांगे, मायलापुरम सिंगारवेलु चेट्टियार, रामचरण शर्मा और नलिनी भूषणदास। ये सभी भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन के अग्रदूत थे।
कानपुर बोल्शेविक षड्यंत्र केस भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन के इतिहास में एक मोड़ साबित हुआ। इस मुकदमे के कारण जनता का ध्यान इन कम्युनिस्ट नेताओं और उनकी विचारधारा की ओर आकर्षित हुआ। समाचार पत्रों में इस केस की विस्तृत रिपोर्टिंग की गई। यद्यपि यह मुकदमा कम्युनिस्टों को दबाने के लिए चलाया गया था, किंतु इसका विपरीत परिणाम हुआ। यह मुकदमा कम्युनिस्ट विचारों को भारतीय जनता के सामने प्रामाणिक और आकर्षक तरीके से प्रस्तुत करने का एक माध्यम बन गया।

भारत की कम्युनिस्ट पार्टी का गठन
दिसंबर 1925 ई. को भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन के इतिहास में एक सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण घटना घटी। कानपुर शहर में भारत के विभिन्न हिस्सों से कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं को एकीभूत करने के लिए एक खुला कम्युनिस्ट सम्मेलन का आयोजन किया गया। इस ऐतिहासिक सम्मेलन के संयोजक सत्यभक्त थे, जो स्वयं एक प्रमुख कम्युनिस्ट नेता थे। इस कम्युनिस्ट सम्मेलन के अध्यक्ष के रूप में सिंगारवेलु को चुना गया और स्वागत समिति के अध्यक्ष के रूप में हसरत मोहानी को नियुक्त किया गया। कानपुर कम्युनिस्ट सम्मेलन में, जो एक ऐतिहासिक मोड़ साबित हुआ, ‘कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया’ (भारत की कम्युनिस्ट पार्टी) का औपचारिक जन्म 1925 ई. में हुआ। यह क्षण भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन के लिए एक महान् उपलब्धि थी।
कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना के आरंभिक दिनों में, भारतीय कम्युनिस्टों ने एक बुद्धिमानीपूर्ण रणनीति अपनाई। उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अंदर ही रहकर कार्य करने का निर्णय किया। इसके लिए वे कांग्रेस के अंदर ही विभिन्न किसान-मजदूर पार्टियों की स्थापना करने लगे। ये पार्टियाँ कांग्रेस के भीतर एक सशक्त वामपंथी मोर्चा बनाने का माध्यम बनीं।

बंगाल में किसान-मजदूर राजनीतिक संगठन का विकास (1925 ई.)
1920 के दशक के मध्य में भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के भीतर मजदूरों और किसानों को संगठित करने की आवश्यकता तेजी से महसूस की जाने लगी। इसी पृष्ठभूमि में नवंबर 1925 ई. में बंगाल में ‘लेबर स्वराज पार्टी ऑफ द इंडियन नेशनल कांग्रेस’ की स्थापना की गई। इसका उद्देश्य कांग्रेस के व्यापक राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़े रहते हुए मजदूरों और किसानों के आर्थिक तथा राजनीतिक हितों को संगठित रूप से सामने लाना था। यह संगठन उस समय बंगाल में वामपंथी और श्रमिक राजनीति के विकास का एक महत्त्वपूर्ण प्रारंभिक प्रयास था।
इस संगठन से मुजफ्फर अहमद, काज़ी नजरुल इस्लाम तथा अन्य वामपंथी और राष्ट्रवादी कार्यकर्ता जुड़े हुए थे। संगठन ने किसानों और मजदूरों तक अपने विचार पहुँचाने के लिए बंगला भाषा में साहित्य और पत्र-पत्रिकाओं का सहारा लिया। इस संदर्भ में ‘लांगल’ नामक पत्रिका विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण थी। ‘लांगल’ का अर्थ हल होता है, जो किसान और कृषि जीवन का प्रतीक था। इसके माध्यम से किसान-मजदूर वर्ग की समस्याओं, सामाजिक असमानता और राजनीतिक अधिकारों से संबंधित विचारों का प्रचार किया गया।
बाद के वर्षों में इस संगठन की दिशा अधिक स्पष्ट रूप से किसान-मजदूर राजनीति की ओर विकसित हुई और 1928 ई. में इसका नाम ‘बंगाल वर्कर्स एंड पीजेंट्स पार्टी’ कर दिया गया। नाम परिवर्तन से संगठन की वर्गीय और राजनीतिक पहचान अधिक स्पष्ट हुई। इसने बंगाल में मजदूरों और किसानों के बीच राजनीतिक चेतना के प्रसार तथा वामपंथी आंदोलन के विस्तार में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
पंजाब में कीर्ति किसान आंदोलन (1926 ई.)
पंजाब में किसान-मजदूर आंदोलन के विकास में ‘कीर्ति’ समूह का विशेष योगदान रहा। 1926 ई. में ‘कीर्ति’ पत्रिका से जुड़े कार्यकर्ताओं ने मजदूरों और किसानों को संगठित करने के लिए राजनीतिक गतिविधियों का विस्तार किया। यह धारा गदर आंदोलन की क्रांतिकारी परंपरा तथा किसान-मजदूर राजनीति से प्रभावित थी। इस आंदोलन से सोहन सिंह जोश का नाम विशेष रूप से जुड़ा हुआ था। वे पंजाब के प्रमुख वामपंथी और किसान-मजदूर नेताओं में से एक बने। ‘कीर्ति’ पत्रिका के माध्यम से मजदूरों, किसानों और क्रांतिकारी युवाओं के बीच सामाजिक एवं राजनीतिक चेतना का प्रसार किया गया। बाद में इस धारा से जुड़े कार्यकर्ताओं ने कीर्ति किसान पार्टी के संगठनात्मक विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
बॉम्बे में किसान-मजदूर पार्टी का विकास (1927 ई.)
औद्योगिक नगर बॉम्बे में मजदूर आंदोलन विशेष रूप से मजबूत था। कपड़ा मिलों, रेलवे और अन्य उद्योगों में बड़ी संख्या में मजदूर कार्यरत थे। इसी पृष्ठभूमि में जनवरी 1927 ई. में बॉम्बे में ‘वर्कर्स एंड पीजेंट्स पार्टी’ के निर्माण की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण संगठनात्मक प्रयास किया गया। इसका उद्देश्य मजदूरों और किसानों को एक साझा राजनीतिक मंच प्रदान करना तथा उनके आर्थिक और सामाजिक अधिकारों के लिए संघर्ष करना था।
इस संगठन से एस. एस. मिराजकर, के. एन. जोगलेकर और एस. वी. घाटे जैसे प्रमुख कम्युनिस्ट और वामपंथी कार्यकर्ता जुड़े थे। संगठन ने मराठी भाषा के माध्यम से भी अपने विचारों का प्रचार किया और ‘क्रांति’ जैसी पत्रिकाओं के जरिए मजदूरों तथा किसानों में राजनीतिक चेतना फैलाने का प्रयास किया। बॉम्बे की औद्योगिक परिस्थितियों ने इस संगठन को मजदूर वर्ग के बीच प्रभाव स्थापित करने का महत्त्वपूर्ण अवसर प्रदान किया।
अखिल भारतीय कामगार और किसान पार्टी का गठन
बंगाल, पंजाब, बॉम्बे तथा भारत के अन्य क्षेत्रों में किसान-मजदूर संगठनों के विकास के बाद इन्हें एक व्यापक अखिल भारतीय संगठन के अंतर्गत लाने की आवश्यकता महसूस की गई। इसी उद्देश्य से दिसंबर 1928 ई. में ‘ऑल इंडिया वर्कर्स एंड पीजेंट्स पार्टी’ के गठन का प्रयास किया गया। इस संगठन का उद्देश्य देश के विभिन्न प्रांतों में सक्रिय मजदूर और किसान संगठनों के बीच समन्वय स्थापित करना था।
इस अखिल भारतीय संगठन से सोहन सिंह जोश जैसे प्रमुख नेता जुड़े हुए थे। पार्टी का लक्ष्य मजदूरों और किसानों के आर्थिक संघर्षों को राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़ना था। साथ ही, संगठन कांग्रेस और व्यापक राष्ट्रीय आंदोलन के भीतर कार्य करते हुए मजदूर-किसान वर्ग को राजनीतिक रूप से संगठित करना चाहता था। कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं के लिए यह मंच महत्त्वपूर्ण था, क्योंकि इसके माध्यम से उन्हें मजदूरों और किसानों के बीच प्रत्यक्ष रूप से कार्य करने तथा व्यापक जनाधार विकसित करने का अवसर मिला।
इस प्रकार 1920 के दशक में बंगाल, पंजाब और बॉम्बे में विकसित किसान-मजदूर संगठनों ने भारतीय वामपंथी आंदोलन के विस्तार में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इन संगठनों के माध्यम से मजदूरों और किसानों के आर्थिक संघर्षों को राजनीतिक चेतना से जोड़ा गया और आगे चलकर भारत में मजदूर-किसान आंदोलनों तथा कम्युनिस्ट राजनीति के व्यापक विकास की आधारभूमि तैयार हुई।
मजदूर आंदोलन में कम्युनिस्टों की भूमिका
1927–1928 ई. में मजदूर आंदोलन
1927–1928 ई. भारतीय मजदूर आंदोलन के इतिहास में अत्यंत सक्रिय और संघर्षपूर्ण दौर था। इस अवधि में देश के विभिन्न औद्योगिक क्षेत्रों में मजदूरों ने वेतन, कार्य-स्थितियों और श्रमिक अधिकारों से संबंधित समस्याओं को लेकर अनेक हड़तालें और आंदोलन किए। भारतीय कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं ने इन संघर्षों में सक्रिय भागीदारी की तथा मजदूरों को संगठित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। रेलवे कार्यशालाओं, कपड़ा मिलों और अन्य औद्योगिक प्रतिष्ठानों में हुए आंदोलनों ने मजदूर वर्ग की बढ़ती राजनीतिक चेतना को स्पष्ट रूप से प्रदर्शित किया।
खड़गपुर रेलवे वर्कशॉप की हड़ताल
फरवरी से सितंबर 1927 ई. तक पश्चिम बंगाल के खड़गपुर रेलवे वर्कशॉप के कर्मचारियों ने एक लंबी हड़ताल की। इस आंदोलन का नेतृत्व उस समय के प्रमुख श्रमिक नेताओं द्वारा किया गया और विभिन्न राजनीतिक धाराओं के कार्यकर्ताओं ने इसमें भाग लिया। कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं ने भी मजदूरों को संगठित करने तथा हड़ताल को व्यापक समर्थन दिलाने में सक्रिय भूमिका निभाई। यह हड़ताल भारतीय रेलवे कर्मचारियों के प्रारंभिक महत्त्वपूर्ण श्रमिक संघर्षों में शामिल थी और इसने मजदूर आंदोलन को नई दिशा प्रदान की।
लिलुआ रेल कार्यशाला का संघर्ष
1928 ई. में बंगाल के लिलुआ रेल कार्यशाला के मजदूरों ने अपने अधिकारों और कार्य-स्थितियों को लेकर संघर्ष किया। इस आंदोलन में कम्युनिस्ट विचारधारा से जुड़े श्रमिक नेताओं और कार्यकर्ताओं की महत्त्वपूर्ण भागीदारी थी। मजदूरों ने बेहतर वेतन, कार्य-स्थितियों और अपने अधिकारों की रक्षा के लिए संगठित होकर आंदोलन किया। इस संघर्ष ने रेलवे कर्मचारियों के बीच संगठन और सामूहिक कार्रवाई की भावना को मजबूत किया।
दक्षिण भारतीय रेलवे की हड़ताल
जुलाई 1928 ई. में दक्षिण भारतीय रेलवे के कर्मचारियों ने भी हड़ताल और आंदोलन किया। ब्रिटिश औपनिवेशिक सरकार ने इस प्रकार के श्रमिक आंदोलनों को नियंत्रित करने के लिए कठोर दमनकारी उपाय अपनाए। आंदोलन से जुड़े कई श्रमिक नेताओं और कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया। कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं की सक्रियता के कारण ब्रिटिश सरकार मजदूर संगठनों और वामपंथी विचारधारा के बढ़ते प्रभाव को लेकर विशेष रूप से चिंतित थी।
बॉम्बे टेक्सटाइल मिलों की आम हड़ताल
अप्रैल से अक्टूबर 1928 ई. तक बॉम्बे की कपड़ा मिलों में एक व्यापक हड़ताल हुई, जिसमें बड़ी संख्या में मजदूरों ने भाग लिया। यह हड़ताल भारतीय मजदूर आंदोलन की महत्त्वपूर्ण घटनाओं में से एक थी। मजदूरों ने वेतन, काम के घंटे और कार्य-स्थितियों से संबंधित समस्याओं को लेकर संघर्ष किया। इस आंदोलन में कम्युनिस्ट नेताओं और श्रमिक संगठनों ने सक्रिय भूमिका निभाई। लंबे समय तक चली इस हड़ताल ने बॉम्बे के औद्योगिक क्षेत्र में मजदूर वर्ग की संगठनात्मक शक्ति को प्रदर्शित किया।
1928 ई. की व्यापक हड़तालें
1928 ई. भारतीय मजदूर आंदोलन के इतिहास में विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण रहा। उपलब्ध श्रम आँकड़ों के अनुसार इस वर्ष देश में 203 हड़तालें हुईं, जिनमें लगभग 5,06,851 मजदूरों ने भाग लिया। इन हड़तालों के कारण लगभग 3 करोड़ 16 लाख से अधिक कार्य-दिवसों का नुकसान हुआ। इनआँकड़ों से पता चलता है कि 1928 ई. में भारतीय मजदूर आंदोलन अत्यंत व्यापक और संघर्षशील रूप धारण कर चुका था। मजदूरों की बढ़ती संगठनात्मक क्षमता और विभिन्न उद्योगों में फैलते आंदोलनों ने ब्रिटिश सरकार को गंभीर रूप से चिंतित कर दिया।
1929–1930 ई. के श्रमिक आंदोलन
वर्ष 1929–1930 ई. के दौरान भी देश में मजदूर संघर्ष जारी रहे। रेलवे कर्मचारियों, तेल डिपो के श्रमिकों तथा अन्य औद्योगिक क्षेत्रों के मजदूरों ने अपनी मांगों को लेकर आंदोलन किए। इन संघर्षों में कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं और वामपंथी श्रमिक नेताओं ने सक्रिय भागीदारी की। इन आंदोलनों के माध्यम से मजदूरों के आर्थिक हितों के साथ-साथ राजनीतिक अधिकारों के प्रश्न भी अधिक व्यापक रूप से उठने लगे।
ब्रिटिश सरकार की चिंता और लॉर्ड इरविन का दृष्टिकोण
मजदूर आंदोलनों और कम्युनिस्ट विचारों के बढ़ते प्रभाव ने ब्रिटिश औपनिवेशिक सरकार की चिंता बढ़ा दी थी। जनवरी 1929 में तत्कालीन वायसराय लॉर्ड इरविन ने केंद्रीय विधानमंडल में अपने वक्तव्य के दौरान कम्युनिस्ट विचारधारा और उसके बढ़ते प्रभाव को सरकार के लिए एक गंभीर चुनौती के रूप में स्वीकार किया। ब्रिटिश सरकार को आशंका थी कि मजदूर आंदोलनों के माध्यम से कम्युनिस्ट विचारधारा देश के व्यापक जनसमूह तक पहुँच रही है। इस प्रकार 1920 के दशक के अंतिम वर्षों में कम्युनिस्टों की सक्रियता ने भारतीय मजदूर आंदोलन को संगठित और राजनीतिक रूप से अधिक जागरूक बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
मेरठ षड्यंत्र केस
ब्रिटिश सरकार कम्युनिस्ट आंदोलन की बढ़ती शक्ति और जनप्रियता से अत्यंत भयभीत हो गई। उसे लगा कि अगर इसी तरह कम्युनिस्टों का प्रभाव बढ़ता रहा, तो भारत में एक क्रांतिकारी स्थिति पैदा हो सकती है। इसी आशंका को मद्देनजर रखते हुए, ब्रिटिश सरकार ने एक अत्यंत कठोर और व्यापक कदम उठाया। 20 मार्च 1929 ई. को ब्रिटिश सरकार ने भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन के 32 प्रमुख नेताओं को एक ही साथ गिरफ्तार कर लिया। इन गिरफ्तारियों को भारतीय दंड संहिता की धारा 121-ए के तहत न्यायसंगत ठहराया गया, जो अधिराज्य (राजशाही) के विरुद्ध षड्यंत्र करने का आरोप है। ये 32 नेताओं को मेरठ (उत्तर प्रदेश के एक शहर) के सत्र न्यायालय (जिला न्यायालय) में पेश किया गया। इस तरह ‘मेरठ षड्यंत्र केस’ का जन्म हुआ, जो भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन के इतिहास में सबसे बड़ा और सबसे महत्त्वपूर्ण मुकदमा साबित हुआ।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने इस मुकदमे को अत्यंत गंभीरता से लिया और कम्युनिस्ट आरोपियों के बचाव के लिए एक ‘केंद्रीय सुरक्षा समिति’ का गठन किया। इस समिति ने कम्युनिस्ट नेताओं के कानूनी बचाव के लिए 1500 रुपये का चंदा एकत्र किया, जो उस समय एक बहुत बड़ी राशि थी।
इस ऐतिहासिक मुकदमे में स्वयं जवाहरलाल नेहरू (जो बाद में भारत के प्रथम प्रधानमंत्री बने), कैलाशनाथ काटजू (एक प्रसिद्ध वकील और राजनेता) और डॉ. एच.एफ. अंसारी (एक प्रसिद्ध बुद्धिजीवी) जैसे प्रमुख व्यक्तित्व कम्युनिस्ट आरोपियों के पक्ष में वकील के रूप में पेश हुए। यह तथ्य अत्यंत महत्त्वपूर्ण है कि राष्ट्रीय आंदोलन के प्रभावशाली नेताओं ने कम्युनिस्टों का समर्थन किया।
यह मुकदमा साढ़े तीन वर्षों तक चला। इसमें 300 गवाहों से पूछताछ की गई और लगभग 300 शहादतें (गवाही) दी गईं। ये आंकड़े इस मुकदमे की विशालता और जटिलता को दर्शाते हैं। न्यायालय में भारी मात्रा में कानूनी और ऐतिहासिक दस्तावेजों को प्रस्तुत किया गया। मेरठ के जिला न्यायालय ने जनवरी 1933 ई. में अपना फैसला सुनाया। न्यायालय ने 27 कम्युनिस्ट नेताओं को भिन्न-भिन्न अवधियों के लिए जेल की सजा सुनाई।
यद्यपि मेरठ केस ब्रिटिश सरकार द्वारा कम्युनिस्टों को दबाने के लिए चलाया गया था, किंतु इसका परिणाम पूरी तरह विपरीत निकला। इस मुकदमे के कारण देश के लाखों-करोड़ों लोग पहली बार साम्यवादी विचारधारा से परिचित हुए। समाचार पत्रों में इस केस की विस्तृत और नाटकीय रिपोर्टिंग की गई। कम्युनिस्ट नेताओं की गिरफ्तारी और मुकदमे ने जनता को आकर्षित किया। जनता उन आरोपियों के बारे में जानना चाहती थी, जिन्हें ब्रिटिश सरकार इतना खतरनाक मानती थी। इसी प्रक्रिया में कम्युनिस्ट विचार जनता तक पहुँचने लगे।
भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन और वामपंथी राजनीति
कम्युनिस्टों और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का संबंध बहुत ही जटिल और विरोधाभासी रहा है। कभी वे एक-दूसरे के करीब आते थे, तो कभी दूर हो जाते थे। यह संबंध ‘प्रेम-नफरत’ का संबंध था, जैसा राजनीतिक विश्लेषकों ने इसे बताया है।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी मुख्य रूप से कम्युनिस्ट इंटरनेशनल (कॉमिन्टर्न) के निर्देशन से परिचालित होती थी। कॉमिन्टर्न का मुख्य कार्यालय मॉस्को में था और सोवियत नेतृत्व वहाँ से विश्वव्यापी कम्युनिस्ट आंदोलन को निर्दिष्ट करता था। कॉमिन्टर्न की नीतियों में जब-जब परिवर्तन होता थे, भारतीय कम्युनिस्टों का कांग्रेस के प्रति दृष्टिकोण भी बदल जाता था। इसे वामपंथी शब्दावली में ‘संकीर्ण राजनीति’ या ‘वामपंथी भटकाव’ कहा गया है।
1929 ई. में कम्युनिस्ट इंटरनेशनल की छठवीं अंतरराष्ट्रीय कांग्रेस हुई। इसी कांग्रेस में कॉमिन्टर्न ने अपनी नीति घोषित की कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस एक ‘पूंजीपति वर्ग की पार्टी’ है, न कि एक सच्ची जनता की पार्टी। इस कॉमिन्टर्न निर्देश के बाद भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने कांग्रेस से अपना नाता पूरी तरह तोड़ लिया। कम्युनिस्ट पार्टी ने कांग्रेस को ‘पूंजीपति वर्ग की पार्टी’ के रूप में प्रकाशित किया।
वामपंथियों ने महात्मा गांधीजी के नेतृत्व को ‘छोटे बुर्जुआ नेतृत्व’ की संज्ञा दी। इसका अर्थ था कि गांधीजी एक अमीर वर्ग के व्यक्ति थे और इसलिए वे सच्चे साम्यवाद की नीति नहीं अपना सकते हैं। वामपंथियों ने गांधीजी की हिंसा न करने की नीति को भी आलोचना की, क्योंकि मार्क्सवाद में क्रांति को हिंसक माना जाता है।
वामपंथियों ने कांग्रेस के वामपंथी नेताओं, जैसे जवाहरलाल नेहरू और सुभाषचंद्र बोस को भी ‘पूंजीपतियों का एजेंट’ करार दिया। उन्होंने दावा किया कि ये नेता ‘भारतीय राष्ट्रवाद की विजय में एक भयानक रुकावट’ हैं। इससे पता चलता है कि कम्युनिस्ट आलोचना कितनी तीव्र थी।
1931 ई. में गांधीजी और ब्रिटिश वायसरॉय लॉर्ड इरविन के बीच एक समझौता हुआ। इस समझौते के तहत गांधीजी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन स्थगित कर दिया। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने इस समझौते को ‘भारतीय राष्ट्रवाद के साथ एक गहरा विश्वासघात’ करार दिया। कम्युनिस्टों का मानना था कि गांधीजी ने ब्रिटिश साम्राज्य के साथ समझौता करके भारतीय जनता को धोखा दिया है।
सरकार ने 23 जुलाई 1934 ई. को भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी को गैर-कानूनी (अवैध) संगठन घोषित कर दिया। इसके अलावा, कम्युनिस्ट पार्टी से संबंधित लगभग 29 जन-संगठनों को भी अवैध घोषित किया गया। यह एक भारी दमन था।
कम्युनिस्ट नेतृत्व का पुनर्गठन
कठोर दमन के बाद भी कम्युनिस्ट आंदोलन समाप्त नहीं हुआ। बल्कि, इसे नए सिरे से संगठित किया गया। अब्दुल हलीम एक कम्युनिस्ट नेता थे। उन्होंने 1931 ई. में ‘बंगाल किसान लीग’ (बंगाल पीजेंट्स लीग) की स्थापना की। यह संगठन कांग्रेस के भीतर काम करता था, किंतु वास्तव में यह कम्युनिस्ट विचारों को आगे बढ़ा रहा था। फरवरी 1932 ई. में अब्दुल हलीम ने ‘वर्कर्स पार्टी ऑफ इंडिया’ (भारत की मजदूर पार्टी) की स्थापना की। यह एक अधिक स्पष्ट कम्युनिस्ट संगठन था, जो खुले तौर पर मजदूरों को संगठित कर रहा था। अप्रैल 1933 ई. तक भारत के लगभग सभी कम्युनिस्ट गुटों ने अब्दुल हलीम की ‘कलकत्ता कमेटी’ को अपने नेतृत्व के रूप में मान्यता दे दी। इससे कम्युनिस्ट आंदोलन में एक केंद्रीय नेतृत्व की स्थापना हुई।
भूपेंद्रनाथ दत्त, जो स्वामी विवेकानंद के भाई थे, की ‘आत्मशक्ति ग्रुप’ और ‘बंगाल प्रोलेटेरियन रिवॉल्यूशनरी पार्टी’ भी अब्दुल हलीम की कलकत्ता कमेटी के साथ एकीभूत हो गईं। यह कम्युनिस्ट आंदोलन का एक महत्त्वपूर्ण एकीकरण था। पंजाब के सिख कम्युनिस्टों के ‘बंगाल किरती दल’ ने भी अब्दुल हलीम की पार्टी का नेतृत्व स्वीकार कर लिया। इससे कम्युनिस्ट आंदोलन भारत के विभिन्न क्षेत्रों में एकीभूत हो गया।
दिसंबर 1933 ई. में साम्यवादी नेताओं के बीच एक रणनीतिक निर्णय लिया गया। उन्होंने कोलकाता (तत्कालीन कलकत्ता) में ‘भारत की कम्युनिस्ट पार्टी’ का एक गुप्त सम्मेलन आयोजित किया। यह सम्मेलन गुप्त रूप से इसलिए आयोजित किया गया था, क्योंकि पार्टी पर प्रतिबंध था। कोलकाता के इस गुप्त सम्मेलन को कम्युनिस्ट इंटरनेशनल (कॉमिन्टर्न) ने 1934 ई. में अपनी भारतीय शाखा के रूप में औपचारिक मान्यता दे दी। यह एक महत्त्वपूर्ण घटना थी, क्योंकि इससे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी को अंतरराष्ट्रीय मान्यता मिल गई।
साम्राज्यवाद-विरोधी संयुक्त मोर्चे का निर्माण
मार्च 1936 ई. में एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण विचारशील दस्तावेज प्रकाशित हुआ। इसे ‘दत्त-ब्रैडले थीसिस’ के नाम से जाना जाता है, क्योंकि इसके लेखक थे आर.पी. दत्त और जॉन ब्रैडले। इस दस्तावेज का शीर्षक था- ‘भारत में साम्राज्यवाद-विरोधी जनता का मोर्चा’। इस थीसिस में एक महत्त्वपूर्ण बदलाव का प्रस्ताव किया गया।
दत्त-ब्रैडले थीसिस दरअसल कॉमिन्टर्न की एक नई नीति का प्रतिबिंब था। इस नई नीति में कॉमिन्टर्न ने कहा कि अब साम्यवादियों को राष्ट्रीय आंदोलनों के साथ काम करना चाहिए और विभिन्न जनवादी शक्तियों के साथ एकजुट होना चाहिए। इस नीति का कारण फासीवाद (नाजीवाद) का बढ़ता हुआ खतरा था।
इसी नई नीति के अनुसार दत्त-ब्रैडले थीसिस में भारतीय साम्यवादियों से कहा गया कि वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हो जाएँ और खासकर कांग्रेस समाजवादी दल को और भी सुदृढ़ और मजबूत बनाने का कार्य करें। यह एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण बदलाव था, क्योंकि कुछ वर्षों पहले कम्युनिस्टों ने कांग्रेस को ‘पूंजीपति वर्ग की पार्टी’ घोषित किया था।
दत्त-ब्रैडले थीसिस के बाद 1936-1937 ई. के दौरान सोशलिस्टों और कम्युनिस्टों के बीच एक वास्तविक आपसी सहयोग की भावना पैदा हुई। इस सहयोग और व्यापक जनजागरण के परिणामस्वरूप देश में अनेक महत्त्वपूर्ण जन-संगठनों का विकास हुआ, जिन्होंने विभिन्न वर्गों को राष्ट्रीय और सामाजिक आंदोलनों से जोड़ा।
अखिल भारतीय किसान सभा
अखिल भारतीय किसान सभा की स्थापना किसानों को संगठित कर उनकी आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक समस्याओं को राष्ट्रीय स्तर पर उठाने के उद्देश्य से की गई। इस संगठन ने किसानों को अत्यधिक लगान, जमींदारी शोषण, बेदखली और भूमि-संबंधी समस्याओं के विरुद्ध संघर्ष के लिए संगठित किया। किसान सभा ने ग्रामीण क्षेत्रों में राजनीतिक चेतना का प्रसार किया और किसानों के अधिकारों को राष्ट्रीय आंदोलन तथा वामपंथी राजनीति के महत्त्वपूर्ण मुद्दों के रूप में स्थापित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
अखिल भारतीय छात्र संगठन
वामपंथी और प्रगतिशील विचारधारा से जुड़े छात्र संगठनों ने विद्यार्थियों और युवाओं को राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन तथा सामाजिक-राजनीतिक संघर्षों से जोड़ने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इन संगठनों के माध्यम से छात्रों में राजनीतिक जागरूकता, सामाजिक जिम्मेदारी और राष्ट्रीय चेतना का विकास हुआ। विद्यार्थियों को साम्राज्यवाद-विरोध, सामाजिक न्याय और लोकतांत्रिक अधिकारों जैसे मुद्दों के प्रति जागरूक किया गया। इस प्रकार छात्र आंदोलन राष्ट्रीय आंदोलन का एक महत्त्वपूर्ण अंग बन गया।
प्रगतिशील लेखक संघ
प्रगतिशील लेखक संघ ने लेखकों, बुद्धिजीवियों और कलाकारों को सामाजिक परिवर्तन तथा प्रगतिशील विचारों के प्रसार के उद्देश्य से संगठित किया। इसका प्रमुख लक्ष्य साहित्य और कला को केवल मनोरंजन तक सीमित न रखकर उसे जनता के जीवन, सामाजिक समस्याओं, आर्थिक असमानता और शोषण के विरुद्ध संघर्ष से जोड़ना था। प्रगतिशील लेखकों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से गरीबों, किसानों, मजदूरों और समाज के वंचित वर्गों की समस्याओं को साहित्य में प्रमुख स्थान दिया।
पी. सी. जोशी का महत्त्वपूर्ण लेख
1939 ई. में भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन के प्रमुख नेता पी. सी. जोशी ने कम्युनिस्ट पत्रिका ‘नेशनल फ्रंट’ में एक महत्त्वपूर्ण लेख लिखा। इस लेख में उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन और कांग्रेस के महत्त्व पर विशेष बल दिया। उन्होंने कहा कि उस समय भारत का सबसे महत्त्वपूर्ण संघर्ष राष्ट्रीय मुक्ति का संघर्ष था और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस इस संघर्ष की प्रमुख राजनीतिक शक्ति थी। पी. सी. जोशी के इस विचार से स्पष्ट होता है कि भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन की राजनीतिक रणनीति में परिवर्तन हो रहा था और राष्ट्रीय आंदोलन के प्रति उसका दृष्टिकोण अधिक सक्रिय तथा सहयोगात्मक बन रहा था।
द्वितीय विश्वयुद्ध और भारतीय वामपंथी राजनीति
सितंबर 1939 ई. में द्वितीय विश्वयुद्ध के आरंभ के साथ ही भारत की राजनीतिक परिस्थितियों में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन आया। ब्रिटेन ने भारत की जनता या भारतीय राजनीतिक नेतृत्व से परामर्श किए बिना भारत को भी युद्ध में शामिल कर दिया। भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के विभिन्न दलों ने इस निर्णय का विरोध किया। उस समय भारतीय कम्युनिस्टों ने भी द्वितीय विश्वयुद्ध को मुख्यतः साम्राज्यवादी शक्तियों के बीच सत्ता, बाजारों और उपनिवेशों के लिए संघर्ष के रूप में देखा और ब्रिटिश युद्ध-प्रयासों का समर्थन नहीं किया।
सोवियत संघ पर जर्मन आक्रमण और कम्युनिस्ट नीति में परिवर्तन
अगस्त 1939 ई. में सोवियत संघ और जर्मनी के बीच जर्मन-सोवियत अनाक्रमण संधि हुई थी। इसके बाद कम्युनिस्ट आंदोलन ने युद्ध को साम्राज्यवादी युद्ध के रूप में देखा। किंतु 22 जून 1941 ई. को जर्मनी द्वारा सोवियत संघ पर आक्रमण किए जाने के बाद परिस्थितियाँ बदल गईं। सोवियत संघ के युद्ध में सीधे शामिल होने के कारण भारतीय कम्युनिस्टों ने अपनी युद्ध-नीति में परिवर्तन किया और बाद में द्वितीय विश्वयुद्ध को फासीवाद-विरोधी जनयुद्ध के रूप में देखने लगे।
1940 ई. का रामगढ़ अधिवेशन और कम्युनिस्टों का रुख
1940 ई. में रामगढ़ में आयोजित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन के समय भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन ने ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध संघर्ष को तेज करने की आवश्यकता पर बल दिया। इस दौर में कम्युनिस्टों ने मजदूरों और किसानों को संगठित कर साम्राज्यवाद-विरोधी संघर्ष को व्यापक बनाने का प्रयास किया। हालांकि इस समय कम्युनिस्ट आंदोलन और अन्य समाजवादी समूहों के बीच संघर्ष की रणनीति तथा संगठनात्मक प्रश्नों को लेकर मतभेद भी उभरने लगे।
कांग्रेस समाजवादी पार्टी और कम्युनिस्टों के बीच मतभेद
कांग्रेस समाजवादी पार्टी में अनेक वामपंथी और समाजवादी कार्यकर्ता सक्रिय थे, जिनमें कुछ कम्युनिस्ट भी शामिल थे। किंतु राजनीतिक रणनीति, संगठनात्मक नियंत्रण और कांग्रेस के प्रति दृष्टिकोण को लेकर कांग्रेस समाजवादी पार्टी और कम्युनिस्टों के बीच मतभेद बढ़ते गए। परिणामस्वरूप दोनों धाराओं के बीच दूरी बढ़ी और कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं को कांग्रेस समाजवादी पार्टी से अलग होना पड़ा। इस प्रकार द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान भारतीय वामपंथी आंदोलन विभिन्न राजनीतिक परिस्थितियों और वैचारिक मतभेदों के कारण अलग-अलग दिशाओं में विकसित हुआ।
ब्रिटिश सरकार का दमन
इसी समय ब्रिटिश सरकार ने भी उचित समय देखकर अधिकांश कम्युनिस्टों को गिरफ्तार कर लिया। साम्यवादियों पर प्रतिबंध लगा दिया गया। कम्युनिस्ट संगठन को अवैध घोषित किया गया।
किंतु विश्व राजनीति में एक नाटकीय परिवर्तन आने वाला था। जून 1941 ई. में हिटलर के नेतृत्व में नाजी जर्मनी ने सोवियत संघ पर एक आश्चर्यजनक आक्रमण किया। यह आक्रमण स्टालिन-हिटलर समझौते को तोड़ देता था। इस आक्रमण के फलस्वरूप 12 जुलाई 1941 ई. को सोवियत संघ और ब्रिटेन के बीच एक सैन्य समझौता हुआ। ये दोनों देश अब एक-दूसरे के सहयोगी बन गए। यह परिवर्तन अत्यंत महत्त्वपूर्ण था।
कम्युनिस्टों का नई स्थिति
सोवियत संघ के ब्रिटेन के साथ समझौते के बाद कम्युनिस्टों की नीति में एक तेज परिवर्तन आया। अब कम्युनिस्टों ने विश्वयुद्ध को ‘साम्राज्यवादी युद्ध’ की बजाय ‘जनता का युद्ध’ (पीपुल्स वॉर) घोषित कर दिया। उनका कहना था कि नाजीवाद और फासीवाद एक बहुत बड़ा खतरा हैं, और इसलिए जनता को ब्रिटेन और सोवियत संघ के साथ मिलकर नाजीवाद के विरुद्ध लड़ना चाहिए।
जुलाई 1942 ई. में सोवियत रूस और ब्रिटेन के अच्छे संबंधों के कारण ब्रिटिश सरकार ने भारतीय कम्युनिस्टों पर लगी पाबंदी को हटा लिया। अब कम्युनिस्ट संगठन को फिर से कानूनी मान्यता मिल गई।
‘भारत छोड़ो’ आंदोलन से अलगाव
अगस्त 1942 ई. में महात्मा गांधीजी ने ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ की घोषणा की, जो ब्रिटिश शासन के विरुद्ध सबसे बड़ा और सबसे व्यापक जनांदोलन था। किंतु कम्युनिस्टों को सोवियत-नेतृत्व वाली कॉमिन्टर्न से निर्देश मिले कि वे इस आंदोलन से दूर रहें, क्योंकि सोवियत संघ युद्ध में ब्रिटेन का सहयोगी था। परिणामस्वरूप, कम्युनिस्टों ने ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ को समर्थन नहीं दिया। यह कम्युनिस्टों की एक विवादास्पद नीति बन गई।
ब्रिटिश सरकार के साथ सहयोग
द्वितीय विश्वयुद्ध के शेष समय तक भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ब्रिटिश सरकार के साथ एक तरह का सहयोग करती रही। इसी सहयोग के कारण कम्युनिस्ट पार्टी को अपने संगठन को मजबूत करने का समय मिला। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान और उसके बाद के वर्षों में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्य संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार, वर्ष 1942 ई. में पार्टी के लगभग 4,000 सदस्य थे, जो 1943 तक बढ़कर लगभग 15,000 हो गए। इसके बाद पार्टी का संगठनात्मक विस्तार तेजी से हुआ और 1946 ई. में सदस्य संख्या लगभग 53,000 तक पहुँच गई। 1948 तक यह संख्या लगभग एक लाख बताई जाती है। सदस्य संख्या में हुई यह तीव्र वृद्धि मजदूरों, किसानों और अन्य जनसमूहों के बीच पार्टी के बढ़ते संगठनात्मक प्रभाव तथा स्वतंत्रता-पूर्व और स्वतंत्रता के बाद के राजनीतिक आंदोलनों में उसकी सक्रिय भूमिका का सूचक है।
1946 ई. में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का प्रस्ताव
1946 ई. भारतीय इतिहास में अत्यंत महत्त्वपूर्ण था, क्योंकि इसी समय भारत की स्वतंत्रता और संभावित विभाजन के प्रश्न पर गंभीर राजनीतिक विचार-विमर्श चल रहा था। ब्रिटिश सरकार ने भारत की संवैधानिक और राजनीतिक समस्या का समाधान खोजने के लिए कैबिनेट मिशन भारत भेजा। इस दौर में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने राष्ट्रीयताओं के प्रश्न पर एक अलग दृष्टिकोण प्रस्तुत किया। पार्टी के कुछ दस्तावेजों में भारत की विभिन्न राष्ट्रीयताओं को आत्मनिर्णय का अधिकार देने और उन्हें स्वायत्त अथवा स्वतंत्र राजनीतिक इकाइयों के रूप में संगठित करने की अवधारणा रखी गई। भारत को अनेक राष्ट्रीय इकाइयों में विभाजित करने का विचार अत्यंत विवादास्पद रहा और राष्ट्रीय एकता के समर्थक राजनीतिक दलों ने इसकी आलोचना की। यह प्रस्ताव उस समय की कम्युनिस्ट नीति में राष्ट्रीयताओं के प्रश्न को लेकर अपनाई गई वैचारिक दृष्टि का परिचायक है।
कम्युनिस्टों द्वारा किसान और मजदूर आंदोलनों का नेतृत्व
राष्ट्रीय आंदोलन की रणनीति और विभिन्न राजनीतिक प्रश्नों पर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की नीतियाँ समय-समय पर विवादास्पद रहीं, किंतु किसान और मजदूर आंदोलनों में उसकी भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण थी। कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं ने मजदूरों के वेतन, कार्य-स्थितियों और श्रमिक अधिकारों के साथ-साथ किसानों के लगान, बेदखली, जमींदारी शोषण और भूमि-संबंधी समस्याओं को लेकर अनेक जनसंघर्षों में भाग लिया। 1940 के दशक में बंगाल, त्रावणकोर और तेलंगाना सहित देश के विभिन्न क्षेत्रों में हुए किसान एवं श्रमिक आंदोलनों में कम्युनिस्टों ने सक्रिय भूमिका निभाई।
तेभागा किसान आंदोलन (1946–1947 ई.)
तेभागा आंदोलन 1946 ई. में बंगाल में आरंभ हुआ और भारतीय किसान आंदोलनों के इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। यह आंदोलन मुख्यतः बटाईदार किसानों (बर्गादारों) द्वारा चलाया गया, जिन्हें जमींदारों और जोतदारों के अधीन खेती करनी पड़ती थी। उस समय प्रचलित व्यवस्था में बटाईदारों को फसल का बड़ा हिस्सा जोतदारों को देना पड़ता था।
‘तेभागा’ का अर्थ फसल के तीन भागों में से दो भाग किसान को और एक भाग जोतदार को मिलना था। आंदोलनकारी किसानों की मांग थी कि चूँकि खेती का अधिकांश श्रम और उत्पादन खर्च किसान स्वयं वहन करते हैं, इसलिए उन्हें उपज का दो-तिहाई हिस्सा मिलना चाहिए। बंगाल प्रांतीय किसान सभा और कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं ने इस आंदोलन को संगठित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह आंदोलन ग्रामीण शोषण और बटाईदारी व्यवस्था के विरुद्ध एक व्यापक किसान संघर्ष के रूप में उभरा।
पुन्नप्रा-वायलार आंदोलन (1946 ई.)
पुन्नप्रा-वायलार आंदोलन त्रावणकोर रियासत में 1946 ई. में हुआ। यह आंदोलन श्रमिकों, किसानों और अन्य जनसमूहों के बीच बढ़ते असंतोष से जुड़ा था। आंदोलन के पीछे आर्थिक कठिनाइयाँ, श्रमिकों की समस्याएँ और त्रावणकोर की तत्कालीन शासन-व्यवस्था के विरुद्ध राजनीतिक असंतोष प्रमुख कारण थे।
कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं और ट्रेड यूनियनों ने इस आंदोलन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। आंदोलन ने बाद में व्यापक संघर्ष का रूप ले लिया और त्रावणकोर सरकार द्वारा इसे कठोरता से दबाया गया। इस संघर्ष में अनेक लोगों की मृत्यु हुई। पुन्नप्रा-वायलार आंदोलन को त्रावणकोर के जनसंघर्षों और भारतीय वामपंथी आंदोलन के इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण घटना माना जाता है।
तेलंगाना किसान आंदोलन (1946–1951 ई.)
तेलंगाना किसान आंदोलन भारत के सबसे व्यापक और लंबे किसान संघर्षों में से एक था। यह आंदोलन 1946 ई. में हैदराबाद रियासत के तेलंगाना क्षेत्र में आरंभ हुआ और लगभग 1951 ई. तक विभिन्न रूपों में जारी रहा। उस समय हैदराबाद पर निजाम का शासन था तथा ग्रामीण क्षेत्रों में जमींदारों और बड़े भू-स्वामियों का व्यापक प्रभाव था।
किसानों को बेगार या वेट्टी प्रथा, अत्यधिक लगान, बेदखली और सामंती शोषण जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता था। कम्युनिस्ट पार्टी और किसान संगठनों ने किसानों को संगठित कर इन व्यवस्थाओं के विरुद्ध संघर्ष चलाया। आंदोलन ने अनेक क्षेत्रों में सशस्त्र संघर्ष का रूप भी धारण किया और किसानों ने कुछ स्थानों पर स्थानीय स्तर पर वैकल्पिक प्रशासन स्थापित करने का प्रयास किया।
तेलंगाना आंदोलन को भारतीय किसान संघर्षों के इतिहास में विशेष महत्त्व प्राप्त है। इस संघर्ष में बड़ी संख्या में किसान और कार्यकर्ता प्रभावित हुए तथा अनेक लोगों को अपने प्राणों की आहुति देनी पड़ी। अंततः राजनीतिक परिस्थितियों में परिवर्तन और कम्युनिस्ट पार्टी की रणनीति में बदलाव के बाद आंदोलन समाप्त हुआ।
रॉयल इंडियन नेवी विद्रोह (1946 ई.)
फरवरी 1946 ई. में रॉयल इंडियन नेवी के नाविकों ने विद्रोह किया, जिसे भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष की अंतिम महत्त्वपूर्ण घटनाओं में गिना जाता है। यह विद्रोह प्रारंभ में बंबई स्थित नौसैनिक प्रतिष्ठानों से शुरू हुआ और शीघ्र ही अन्य स्थानों तक फैल गया।
नाविकों की प्रमुख शिकायतों में खराब भोजन, कम वेतन, भेदभावपूर्ण व्यवहार और कठोर कार्य-स्थितियाँ शामिल थीं। इसके साथ ही ब्रिटिश शासन के विरुद्ध बढ़ती राजनीतिक असंतुष्टि ने भी विद्रोह को प्रभावित किया। कम्युनिस्ट पार्टी और वामपंथी संगठनों ने इस विद्रोह के समर्थन में हड़तालों और जनप्रदर्शनों का आयोजन किया। हालांकि, यह कहना अधिक उचित होगा कि विद्रोह का मुख्य नेतृत्व स्वयं नौसैनिकों के हाथों में था; कम्युनिस्टों ने मुख्यतः इसे राजनीतिक और जनसमर्थन प्रदान किया।
छात्र आंदोलनों में कम्युनिस्टों की भूमिका
भारतीय वामपंथी आंदोलन ने छात्रों और युवाओं को संगठित करने पर भी विशेष ध्यान दिया। विभिन्न विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में छात्र संगठनों के माध्यम से स्वतंत्रता, सामाजिक न्याय, साम्राज्यवाद-विरोध और लोकतांत्रिक अधिकारों के प्रश्नों को उठाया गया।
वामपंथी विचारों से प्रभावित छात्र संगठनों ने विद्यार्थियों को राष्ट्रीय और सामाजिक आंदोलनों से जोड़ा। अखिल भारतीय छात्र महासंघ (AISF) जैसे संगठनों के माध्यम से छात्र राजनीतिक चेतना के विस्तार और जनआंदोलनों में सक्रिय भागीदारी के लिए प्रेरित हुए। इस प्रकार कम्युनिस्ट आंदोलन ने केवल मजदूरों और किसानों तक ही सीमित न रहकर छात्रों, युवाओं और बुद्धिजीवियों के बीच भी अपना प्रभाव बढ़ाने का प्रयास किया।
वामपंथी आंदोलन का ऐतिहासिक महत्त्व और मूल्यांकन
वामपंथी आंदोलन के विरोधियों ने यह आरोप लगाया है कि जब भारत के लिए अंग्रेजी साम्राज्य से मुक्ति प्राप्त करना राष्ट्रीय अभिलक्ष्य था, उस ऐतिहासिक समय में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने राष्ट्रवाद से अधिक साम्यवाद को प्राथमिकता दी। यह आरोप काफी हद तक सत्य है।
कभी-कभी, विशेषकर 1929 से 1935 ई. के बीच कम्युनिस्ट पार्टी ने कांग्रेस और गांधीजी के विरुद्ध एक कठोर रुख अपनाया। इसके कारण कम्युनिस्ट और कांग्रेस के बीच एक अलगाववादी भावना आ गई। यह कम्युनिस्टों की ‘संकीर्ण राजनीति’ या ‘वामपंथी भटकाव’ कही जाती है। यद्यपि ये आरोप सच हैं, फिर भी यह भी सच है कि भारतीय वामपंथी आंदोलन ने कुछ अत्यंत महत्त्वपूर्ण कार्य किए हैं, जिन्हें कभी भी नकारा नहीं जा सकता।
वामपंथियों ने मजदूरों और किसानों के मुद्दों को राष्ट्रीय स्तर पर सर्वाधिक महत्त्व दिया। उन्होंने श्रमिक आंदोलनों को संगठित किया और उन्हें शक्तिशाली बनाया। भारत के विभिन्न भागों में ट्रेड यूनियनें और मजदूर संगठन स्थापित किए गए। ये संगठन आज भी भारतीय अर्थव्यवस्था में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
वामपंथियों ने समाज के वंचित और शोषित वर्गों-श्रमिकों, किसानों, दलितों, महिलाओं और अल्पसंख्यकों से सीधा संबंध स्थापित किया। उन्होंने इन वर्गों की समस्याओं के लिए लड़ाई लड़ी।
यद्यपि कम्युनिस्टों और कांग्रेस के बीच मतभेद थे, किंतु कम्युनिस्ट विचारों ने कांग्रेस की नीतियों को प्रभावित किया। कांग्रेस को भी जनता के आर्थिक मुद्दों पर ध्यान देना पड़ा। कांग्रेस में समाजवाद की भावना का विकास हुआ। जवाहरलाल नेहरू और अन्य कांग्रेस नेताओं पर वामपंथी विचारों का प्रभाव पड़ा।
वामपंथियों ने भारत में विभिन्न महत्त्वपूर्ण जन-संगठनों की स्थापना की। किसान सभा, छात्र संगठन, प्रगतिशील लेखक संघ, महिला संगठन आदि की स्थापना में वामपंथियों की प्रमुख भूमिका रही। ये संगठन भारतीय समाज को जागरूक करने और सामाजिक परिवर्तन के लिए काम कर रहे हैं। वामपंथियों ने भारतीय बुद्धिजीवियों, लेखकों, कलाकारों और सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं को प्रभावित किया। ‘प्रगतिशील लेखक संघ’ की स्थापना इसका एक प्रमाण है। भारतीय साहित्य, कला और संस्कृति में एक जागरूकता आई।
वामपंथियों ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को एक अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण से देखने की दृष्टि दी। उन्होंने यह समझाया कि भारत का संघर्ष केवल एक राष्ट्रीय समस्या नहीं है, बल्कि यह साम्राज्यवाद के विरुद्ध विश्वव्यापी संघर्ष का एक हिस्सा है।
इस प्रकार भारत में वामपंथ का उदय और विकास एक जटिल, बहुआयामी और गतिशील ऐतिहासिक प्रक्रिया थी। इस प्रक्रिया में अंतरराष्ट्रीय क्रांतिकारी आंदोलन, राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम, सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन की आकांक्षाएँ और विभिन्न राजनीतिक विचारों का एक अद्भुत मिश्रण था। रूसी क्रांति का प्रभाव, कॉमिन्टर्न की नीतियाँ, भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की गतिविधियाँ और भारतीय कम्युनिस्टों की अपनी सृजनशील प्रतिक्रिया—ये सभी कारक भारतीय वामपंथ के विकास में महत्त्वपूर्ण थे।
मानवेंद्रनाथ रॉय से लेकर पी.सी. जोशी तक कई महान् नेताओं के प्रयासों के कारण भारत में एक संगठित और प्रभावशाली कम्युनिस्ट आंदोलन का जन्म हुआ। पेशावर केस, कानपुर केस और मेरठ केस जैसे महत्त्वपूर्ण मुकदमों ने भारतीय जनता के सामने कम्युनिस्ट विचारधारा को एक गंभीर और विचारणीय विचारधारा के रूप में प्रस्तुत किया।
भारतीय स्वतंत्रता के पश्चात् कम्युनिस्ट पार्टी का विभाजन हुआ। 1964 ई. में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सी.पी.आई.) विभाजित होकर ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी)’ [सी.पी.आई. (एम)] में विभाजित हुई। पश्चिम बंगाल, केरल और त्रिपुरा जैसे राज्यों में वामपंथी दलों ने लंबे समय तक महत्त्वपूर्ण राजनीतिक भूमिका निभाई है। विभिन्न समाजवादी धाराओं ने भी भारतीय राजनीति और सामाजिक आंदोलनों को प्रभावित किया है।
वामपंथी आंदोलन की प्रमुख उपलब्धि यह रही कि इसने भारतीय राजनीति में वर्ग-सचेतनता, आर्थिक न्याय, समानता और श्रमजीवी शक्ति की अवधारणा को केंद्रीय स्थान दिया। यह विचारधारा स्वतंत्रता के बाद की भारतीय राजनीति, आर्थिक नीतियों और सामाजिक विकास में एक दीर्घकालिक और सकारात्मक प्रभाव डालती रही है। कांग्रेस की समाजवादी नीतियों में, भारतीय संविधान के सामाजिक न्याय के प्रावधानों में, भारत की आर्थिक नीतियों में और अनेक कल्याणकारी योजनाओं में वामपंथी विचारधारा का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। इस प्रकार, भारत में वामपंथ का उदय और विकास भारतीय राष्ट्रीय इतिहास का एक अविभाज्य और महत्त्वपूर्ण अध्याय है।


