जैन न्याय शास्त्र का विकास (Development of Jain Jurisprudence)
जैन दर्शन और न्याय धर्म, दर्शन और न्याय—इन तीनों के सुमेल से ही व्यक्ति के
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जैन दर्शन और न्याय धर्म, दर्शन और न्याय—इन तीनों के सुमेल से ही व्यक्ति के
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मदुरा के पांड्य सुदूर दक्षिण भारत में तमिल प्रदेश के प्रारंभिक राजवंशों में चेरों और
मारवर्मन् कुलशेखर पांड्य प्रथम (1268-1308 ई.) मारवर्मन् कुलशेखर पांड्य प्रथम (1268-1308 ई.) पांड्य राजवंश का
मारवर्मन् कुलशेखर पांड्य प्रथम (Maravarman Kulasekara Pandyan I) Read More »
जटावर्मन् सुंदरपांड्य प्रथम (1251-1270 ई.) मारवर्मन् सुंदरपांड्य के बाद पांड्य राजगद्दी पर जटावर्मन् सुंदरपांड्य प्रथम
जटावर्मन् सुंदरपांड्य प्रथम (Jatavarman Sundara Pandyan I) Read More »
चोल राजवंश का राजनीतिक इतिहास (850-1279 ई.) सुदूर दक्षिण भारत के तमिल प्रदेश में प्राचीनकाल
राजेंद्र तृतीय (1252-1279 ई.) राजराज तृतीय के बाद 1252 ई. में राजेंद्र तृतीय चोल सिंहासन
राजराज तृतीय (1216-1256 ई.) कुलोत्तुंग तृतीय की मृत्यु के पश्चात् राजराज तृतीय 1216 ई. में
कुलोत्तुंग तृतीय (1178–1218 ई.) कुलोत्तुंग तृतीय ‘परकेशरिवर्मन’ चोल राजवंश का अंतिम महान शासक था, जिसने
राजराज द्वितीय (1146-1173 ई.) कुलोत्तुंग द्वितीय के पश्चात् उसका पुत्र राजराज द्वितीय 1150 ई. में