मगध साम्राज्य : नंद वंश (Magadha Empire : Nanda Dynasty)

नंद वंश (Nanda Dynasty) प्राचीन भारत का महत्त्वपूर्ण वंश था जिसने पांचवीं-चौथी शताब्दी ई.पू. में उत्तरी भारत के विशाल भाग पर शासन किया। नंदों के इतिहास की जानकारी के अनेक छिटफुट विवरण पुराणों, जैन और बौद्ध ग्रंथों एवं कुछ यूनानी इतिहासकारों के विवरणों में प्राप्त होते हैं।

यद्यपि सभी स्रोतों में कोई पूर्ण या ऐकमत्य नहीं है, तथापि इतना निश्चित है कि नंद शासकों की अधिकांश प्रवृतियां भारतीय शासन परंपरा के विपरीत थीं। पुराणों में इसे महापद्म तथा महाबोधिवंस में उग्रसेन कहा गया है।

पुराण महापद्मनंद (Mahapadmanand) को शैशुनाग वंश के अंतिम राजा महानंदिन् की शूद्रा स्त्री के गर्भ से उत्पन्न पुत्र बताते हैं।

विष्णु पुराण में कहा गया है कि महानंदी की शूद्रा से उत्पन्न महापद्म अत्यंत लोभी तथा बलवान एवं दूसरे परशुराम के समान सभी क्षत्रियों का विनाश करनेवाला होगा।

जैनग्रंथ परिशिष्टपर्वन् में भी महापद्मनंद (Mahapadmanand) को नापित पिता और वेश्या माता का पुत्र कहा गया है।

आवश्यकसूत्र के अनुसार महापद्मनंद (Mahapadmanand) नापित दास (नाई का दास) था।

महावंसटीका में नंदों को अज्ञात कुल का बताया गया है, जो डाकुओं के गिरोह सह का मुखिया था।

महापद्मनंद (Mahapadmanand) ने उचित अवसर पाकर मगध की सत्ता पर अधिकार कर लिया।

यूनानी लेखक कर्टियस लिखता है कि सिकंदर के समय वर्तमान नंद राजा का पिता वास्तव में अपनी स्वयं की कमाई से अपनी क्षुधा न शांत कर सकनेवाला एक नाई था, जिसने अपने रूप-सौन्दर्य से शासन करनेवाले राजा की रानी का प्रेम प्राप्त कर राजा की भी निकटता प्राप्त कर ली। फिर विश्वासपूर्ण ढंग से उसने राजा का वध कर डाला, उसके बच्चों की देख-रेख के बहाने राज्य को हड़प लिया, फिर उन राजकुमारों को मार डाला तथा वर्तमान राजा को पैदा किया।

डियोडोरस के अनुसार धनानंद का नाई पिता अपनी सुंदरता के कारण रानी का प्रेमपात्र बन गया और रानी ने अपने वृद्ध पति की हत्या कर दी तथा अपने प्रेमी को राजा बनाया।

यूनानी लेखकों के वर्णनों से स्पष्ट होता है कि वह वर्तमान राजा अग्रमस् अथवा जण्ड्रमस् (चंद्रमस?) था, जिसकी पहचान धनानंद से की गई है।

धननंद का पिता महापद्मनंद (Mahapadmanand) था, जो कर्टियस के कथनानुसार नाई जाति का था।

महाबोधिवंस में महापद्म (Mahapadma) का नाम उग्रसेन मिलता है और उसका पुत्र धनानंद सिकंदर का समकालीन था।

अनेक संदर्भों से यह स्पष्ट हो जाता है कि नंद वंश (Nanda Dynasty) के राजा नाई जाति के शूद्र थे।

महापद्मनंद (Mahapadmanand)

महापद्मनंद (Mahapadmanand) नंद वंश (Nanda Dynasty) का प्रथम और सर्वाधिक शक्तिशाली शासक था। पुराण उसकी गिनती शैशुनाग वंश में ही करते हैं, किंतु बौद्ध और जैन अनुश्रुतियों में उसे (Mahapadmanand) एक नये वंश (नंद वंश) का प्रारंभकर्ता माना गया है, जो उचित है।

पुराणों के कलियुगराजवृत्तान्त खंड से पता चलता है कि वह (Mahapadmanand) अतिबली, अतिलोभी, महाक्षत्रान्तक और द्वितीय परशुराम के समान था जो महापद्म, एकराट, सर्वक्षत्रांतक आदि उपाधियों से विभूषित था।

स्पष्ट है कि बहुत बड़ी सेनावाले (उग्रसेन) उस राजा ने अपने समकालिक अनेक क्षत्रिय राजवंशों का समूल नाशकर अपने बल का प्रदर्शन किया और उनसे कठोरतापूर्वक धन भी वसूल किया।

यह आश्चर्य नहीं है कि उस अपार धन और सैन्य-शक्ति से महापद्मनंद (Mahapadmanand) ने हिमालय और नर्मदा के बीच के सारे प्रदेशों को जीतने का उपक्रम किया।

महापद्मनंद (Mahapadmanand) के जीते हुए प्रदेशों में इक्ष्वाकु (अयोध्या और श्रावस्ती के आसपास का कोसल राज्य), पांचाल (उत्तर-पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बरेली और रामपुर के पाश्र्ववर्ती क्षेत्र), कौरव्य (इंद्रप्रस्थ, दिल्ली, कुरुक्षेत्र और थानेश्वर), काशी (वाराणसी के पाश्र्ववर्ती क्षेत्र), हैहय (दक्षिणापथ में नर्मदातीर के क्षेत्र), अश्मक (गोदावरी घाटी में पौदन्य अथवा पोतन के आसपास के क्षेत्र), वीतिहोत्र (दक्षिणापथ में अश्मकों और हैहयों के क्षेत्रों में लगे हुए प्रदेश), कलिंग (उड़ीसा में वैतरणी और वराह नदी के बीच का क्षेत्र), शूरसेन (मथुरा के आसपास का क्षेत्र), मिथिला (बिहार में मुजफ्फरपुर और दरभंगा जिलों के बीचवाले क्षेत्र तथा नेपाल की तराई का कुछ भाग) तथा अन्य अनेक राज्य शामिल थे।

भारतीय इतिहास में पहली बार एक ऐसे साम्राज्य की स्थापना हुई जिसमें हिमालय और विन्ध्याचल के बीच कहीं भी उसके शासन का उल्लंघन नहीं हो सकता था।

इस प्रकार महापद्मनंद (Mahapadmanand) ने सारी पृथ्वी (भारत के बहुत बड़े भाग) पर एकराट् होकर राज्य किया।

महापद्मनंद (Mahapadmanand) के विजयों की प्रमाणिकता कथासरित्सागर, खारवेल के हाथीगुम्फा अभिलेख तथा मैसूर से प्राप्त कुछ अन्य अभिलेखों के कुछ बिखरे हुए उल्लेखों से भी सिद्ध होती है।

हाथीगुम्फा लेख से महापद्मनंद (Mahapadmanand) की कलिंग-विजय के संबंध में पता चलता है कि नंदराज कलिंग से जिन् की प्रतिमा को मगध उठा लाया था और कलिंग में एक नहर का निर्माण करवाया था।

मैसूर के बारहवीं शताब्दी के लेखों से भी नंदों द्वारा कुंतल जीते जाने का उल्लेख मिलता है।

यूनानी लेखकों के विवरणों से भी ज्ञात होता है कि अग्रमीज का राज्य पश्चिम में व्यास नदी तक विस्तृत था। निश्चित रूप से इस विस्तृत भूभाग को महापद्मनंद ने ही विजित किया था क्योंकि परवर्ती नंद शासकों की किसी महत्त्वपूर्ण विजय का उल्लेख नहीं मिलता है।

पुराणों में महापद्मनंद (Mahapadmanand) के आठ पुत्र उत्तराधिकारी बताये गये हैं; किंतु महाबोधिवंस जैसे बौद्ध ग्रंथों में वे उसके भाई बताये गये हैं।

महापद्मनंद (Mahapadmanand) के उत्तराधिकारी थे- उग्रसेन, पंडुक, पांडुगति, भूतपाल, राष्ट्रपाल, गोविषाणक, दशसिद्धक, कैवर्त, धनानंद।

इसमें कोई विवाद नहीं है कि सभी मिलाकर संख्या की दृष्टि से नवनंद कहे जाते थे।

पुराणों में नंदों का राज्यकाल 100 वर्षों तक बताया गया है- 88 वर्षों तक महापद्मनंद (Mahapadmanand) का और 12 वर्षों तक उसके पुत्रों का।

किंतु एक ही व्यक्ति 88 वर्षों तक राज्य करता रहे और उसके बाद के क्रमागत 8 राजा केवल 12 वर्षों तक ही राज्य करे, यह संभव नहीं है।

सिंहली अनुश्रुतियों में नवनंदों का राज्यकाल 40 वर्षों का बताया गया है।

नवनंदों ने लगभग ई.पू. 364 से ई.पू. 324 तक शासन किया।

धनानंद (Dhananand)

नंद वंश (Nanda Dynasty) का अंतिम शासक धननंद अर्थात् अग्रमस् (औग्रसैन्य अर्थात् उग्रसेन का पुत्र) सिकंदर के आक्रमण के समय मगध (प्रसाई-प्राची) का सम्राट् था, जिसकी विशाल और शक्तिशाली सेना के भय से यूनानी सिपाहियों ने पोरस से हुए युद्ध के बाद आगे बढ़ने से इनकार कर दिया।
यूनानी लेखकों के अनुसार उसके पास असीम सेना और अतुल संपत्ति थी।

कर्टियस लिखता है कि नंदों की सेना में दो लाख पैदल, बीस हजार घुड़सवार, दो हजार रथ और तीन हजार हाथी थे।

धनानंद (Dhananand) का सेनापति भद्दशाल था और उसका साम्राज्य उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में गोदावरी नदी तक तथा पश्चिम में सिंधु नदी से लेकर पूरब में मगध तक फैला हुआ था। पूर्वी दक्षिणापथ में कलिंग भी उसके साम्राज्य में सम्मिलित था।

महावंसटीका से ज्ञात होता है कि अंतिम नंद धनानंद (Dhananand)एक लालची और धन-संग्रही शासक था। वह कठोर लोभी और कृपण स्वभाव का व्यक्ति था। संभवतः इस लोभी प्रकृति के कारण ही उसे धननंद कहा गया है।

तमिल, संस्कृत तथा सिंहली ग्रंथों से भी उसकी अतुल संपत्ति की सूचना मिलती है।

कथासरित्सागर के अनुसार नंदों के पास ग्यारह करोड़ स्वर्णमुद्राएं थीं। कहा गया है कि अपनी असीम शक्ति और संपत्ति के बावजूद धननंद जनता का विश्वास नहीं जीत सका और जनता नंदों के विरुद्ध हो गई थी।

प्लूटार्क कहता है कि चंद्रगुप्त (सैण्ड्रोकोट्टस) मौर्य ने सिकंदर से मिलकर उसकी नीच-कुलोत्पत्ति और जनता में अप्रियता की बात कही थी। संभव है, धननंद को उखाड़ फेंकने के लिए चंद्रगुप्त ने उस विदेशी आक्रमणकारी के उपयोग का भी प्रयत्न किया हो।

मुद्राराक्षस से पता चलता है कि धनानंद (Dhananand) द्वारा अपमानित ब्राह्मण चाणक्य ने अपनी कूटनीति से क्षत्रिय चंद्रगुप्त मौर्य के सहयोग से धननंद को पराजित कर चंद्रगुप्त मौर्य को मगध का शासक बनाया।

संभवतः ई.पू. 324 में चंद्रगुप्त और चाणक्य ने एक भीषण युद्ध में धननंद की हत्याकर उसके वंश का अंत कर दिया।

नंद शासन का महत्त्व

नंद राजाओं का शासन भारतीय इतिहास के पृष्ठों में एक सामाजिक क्रांति जैसा है।

सामाजिक दृष्टि से नंद राजाओं का शासन निम्न वर्ग के उत्कर्ष का प्रतीक है।

नंद वंश (Nanda Dynasty) के शासकों को उनकी शूद्र कुलोत्पत्ति के कारण वर्णव्यवस्थापरक भारतीय समाज में अप्रिय घोषित किया गया है, इसमें कोई संदेह नहीं है।

इतिहासकारों को नंदों की प्रवृत्तियाँ परंपरा-विरुद्ध दिखाई पड़ती हैं, जबकि नंद पहले ऐसे शासक थे जिन्होंने भारतवर्ष के राजनीतिक एकीकरण की प्रक्रिया को अत्यंत जोरदार रूप में आगे बढ़ाया।

नंदों का राजनैतिक महत्त्व इस तथ्य में निहित है कि इस वंश (Nanda Dynasty) के शासकों ने उत्तर भारत में सर्वप्रथम एकछत्र शासन की स्थापना की।

महापद्मनंद (Mahapadmanand) पहला ऐसा शासक था जिसने गंगा घाटी की सीमाओं का अतिक्रमण कर विंध्य पर्वत के दक्षिण तक अपनी विजय-पताका फहराई।

नंदों को इस बात का श्रेय दिया जाना चाहिए कि उन्होंने एक ऐसी सेना तैयार की थी जिसका उपयोग परवर्ती मगध राजाओं ने विदेशी आक्रमणकारियों को रोकने तथा भारतीय सीमा में अपने राज्य का विस्तार करने में किया।

नंद राजाओं के समय में मगध राजनैतिक दृष्टि से अत्यंत शक्तिशाली तथा आर्थिक दृष्टि से समृद्धिशाली साम्राज्य बन गया।

नंदों की अतुल संपत्ति को देखते हुए यह अनुमान करना स्वाभाविक है कि हिमालय पार के देशों के साथ उनका व्यापारिक संबंध था। साइबेरिया की ओर से वे स्वर्ण मंगाते थे।

जेनोफोन की साइरोपेडिया से पता चलता है कि भारत का एक शक्तिशाली राजा पश्चिमी एशियाई देशों के झगडों की मध्यस्थता करने की इच्छा रखता था। इस भारतीय शासक को अत्यंत धनी व्यक्ति कहा गया है जिसका संकेत नंद वंश के शासक धननंद की ओर ही है।

सातवीं शती के चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भी नंदों के अतुल संपत्ति की कहानी सुनी थी। उसके अनुसार पाटिलपुत्र में पांच स्तूप थे, जो नंद राजा के सात बहुमूल्य पदार्थों द्वारा संचित कोषागारों का प्रतिनिधित्व करते हैं।

मगध की आर्थिक समृद्धि ने राजधानी पाटलिपुत्र को शिक्षा एवं साहित्य का प्रमुख केंद्र्र बना दिया।

व्याकरण के आचार्य पाणिनि महापद्मनंद के मित्र थे और उन्होंनेे पाटलिपुत्र में रहकर शिक्षा पाई थी।

वर्ष, उपवर्ष, वररुचि, कात्यायन (राक्षस) जैसे विद्वान् भी नंदकाल में ही उत्पन्न हुए थे।

नंद शासक जैनमत के पोषक थे तथा उन्होंने अपने शासन में कई जैन मंत्रियों को नियुक्त किया था। इनमें प्रथम मंत्री कल्पक था जिसकी सहायता से महापद्मनंद (Mahapadmanand) ने समस्त क्षत्रियों का विनाश किया था।

शकटाल तथा स्थूलभद्र धनानंद (Dhananand) के जैन मतावलंबी अमात्य थे। मुद्राराक्षस से भी नंदों का जैन मतानुयायी होना सूचित होता है।

नंद राजाओं के काल में मगध साम्राज्य राजनैतिक तथा सांस्कृतिक दोनों ही दृष्टियों से प्रगति के पथ पर अग्रसर हुआ।

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