कल्याणी का चालुक्य राजवंश या पश्चिमी चालुक्य भाग-4 (Chalukya Dynasty of Kalyani or Western Chalukya Part-4)

विक्रमादित्य षष्ठ, 1076-1126 ई. (Vikramaditya VI, 1076-1126 AD.)

विक्रमादित्य षष्ठ को स्वाभाविक उत्तराधिकार में राजसिंहासन नहीं मिला था, बल्कि अपने अग्रज सोमेश्वर द्वितीय से इसे बलपूर्वक अपहृत कर वह 1076 ई. में राजा हुआ था (सोमेश्वरात्बाहुबलेन राज्यंग्रहीतवानार्जित कीर्तिलक्ष्मीः)। विक्रमादित्य सोमेश्वर द्वितीय के शासनकाल में भी लगभग स्वतंत्र शासक के रूप में राज्य कर रहा था। अपने पिता सोमेश्वर प्रथम के शासनकाल में विक्रमादित्य षष्ठ ने चोलों को कई बार पराजित किया था, काँची नगर में लूटमार की थी, मालवा के राजा की सहायता की थी, कलचुरियों को हराया था और सुदूरस्थ बंगाल तथा असम तक के राज्यों की विजयें की

अपने राज्यारोहण के अवसर पर विक्रमादित्य षष्ठ ने एक नवीन संवत् ‘चालुक्य विक्रम संवत्’ का प्रवर्तन किया। यह चालुक्य संवत् विक्रम संवत् के नाम से जाना गया और उसके काल में नियमित रूप से प्रयोग होता रहा। यह विक्रम चालुक्य संवत् संभवतः 1076 ई. में शुरू हुआ था और इसी वर्ष उसका अभिषेक भी हुआ था। विक्रमादित्य षष्ठ ने ‘पेरमाडिदेव’, ‘कविविक्रम’ तथा ‘त्रिभुवनमल्ल’ जैसी उपाधियाँ धारण की थी।

चालुक्य राजवंश (Chalukya Dynasty)

विक्रमादित्य षष्ठ की उपलब्धियाँ (Achievements of Vikramaditya VI)

लंका से दौत्य-संबंध: जिस समय विक्रमादित्य षष्ठ ने कुलोत्तुंग के विरूद्ध सफलता प्रापत कर कल्याणी का सिंहासन प्रापत किया था उसी समय महावंश के अनुसार श्रीलंका में विजयबाहु ने भी चोल कुलोतुंग की सेना को खदेड़कर 1076-77 ई. में अपना अभिषेक कराया था। इस अवसर पर विक्रमादित्य ने अपना दूत भेजकर विजयबाहु का अभिनंदन किया और उसे उपहार भेंट किया था। इससे स्पष्ट है कि विक्रमादित्य षष्ठ उन सभी शक्तियों से मैत्रीपूर्ण संबंध बनाने का प्रयास कर रहा था जो चोल शासक कुलोतुंग प्रथम के विरोधी थे।

जयसिंह का विद्रोह: जयसिंह विक्रमादित्य का छोटा भाई था। प्रारंभ में दोनों के संबंध अच्छे थे और सोमेश्वर द्वितीय के साथ युद्धों में जयसिंह ने विक्रमादित्य षष्ठ का साथ दिया था। विक्रमादित्य ने अपने राज्यारोहण के बाद 1077 ई. में उसे उसे बेलवोला तथा पुलिगेरे का शासक नियुक्त कर दिया। एक अभिलेख में उसे युवराज के रूप में कंदूर का राजा तथा अण्णमअंककार (अपने बड़े भाई का रक्षक) कहा गया है। इसी अभिलेख में बतलाया गया है कि उसने एतगिरि के स्कंधावार में हिरण्यगर्भ एवं तुलापुरुष नामक दान दिये थे।

किंतु ऐसा लगता है कि जयसिंह अपनी स्थिति से संतुष्ट नहीं और सम्राट बनने की योजना बनाने लगा। विक्रमांकदेवचरित से भी पता चलता है कि सिंहासन पर अधिकार करने के उद्देश्य से जयसिंह अपनी सैनिक शक्ति और अन्य संसाधन बढ़ाने लगा था। उसने चोल सम्राट कुलोतुंग से भी सहायता माँगी। जब विक्रमादित्य को जयसिंह की विद्रोही गतिविधियों की सूचना मिली तो उसने जयसिंह को मनाने का बहुत प्रयास किया। किंतु जयसिंह पर विक्रमादित्य के समझाने का कोई प्रभाव नहीं हुआ। वह एक बड़ी सेना लेकर कृष्णा नदी के तट पर पहुँच गया जहाँ अनेक मांडलिक (सामंत) भी उसके साथ मिल गये। उसकी सेना जनता को आतंकित कर उन्हें लूटनो और बंदी बनाने लगी जिससे राज्य में अराजकता फैल गई। अब अब विक्रमादित्य को प्रतिरक्षा में हथियार उठाने के लिए विवश हो गया। दोनों पक्षों की सेनाओं में भयंकर युद्ध हुआ। प्रारंभ में जयसिंह की हस्तिसेना को कुछ सफलता मिली, किंतु अंततः जयसिंह पराजित हुआ तथा भाग गया। बाद बाद में जयसिंह को बंदी बनाकर विक्रमादित्य के समक्ष लाया गया। बिल्हण के अनुसार विक्रमादित्य ने उसके प्रति उदारता का व्यवहार किया और स्वतंत्र कर दिया।

बादामी का चालुक्य वंश: आरंभिक शासक (Chalukya Dynasty of Badami: Early Rulers)

मालवा के विरुद्ध अभियान: विक्रमादित्य को मालवा के परमारों के विरुद्ध कई बार अभियान करना पड़ा। उसके राज्यारोहण के पहले ही उत्तराधिकार के युद्ध तथा गुजरात के चालुक्यों और मध्य भारत के चेदियों के आक्रमण के कारण मालवा में अराजकता फैली हुई थी। भोज की मृत्यु के बाद विक्रमादित्य ने अपने पिता सोमेश्वर प्रथम के कहने पर उसके पुत्र जयसिंह को मालवा राजा बनाया था।

विक्रमादित्य का समकालीन मालवा का शासक जयसिंह का पुत्र और उत्तराधिकारी उदयादित्य था। पहले विक्रमादित्य से उसके संबंध अच्छे थे, किंतु बाद में किन्हीं कारणों से दोनों के आपसी संबंध बिगङ गये और विक्रमादित्य ने उसके राज्य पर आक्रमण कर दिया। रायबाग लेख से पता चलता है कि विक्रमादित्य ने न केवल उदयादित्य को पराजित कर मार डाला, बल्कि धारा नगरी को जला दिया और वहाँ अपना विजय-स्तम्ंभ स्थापित किया।

उदयादित्य के तीन पुत्र थे- लक्ष्मणसेन, नरवर्मा तथा जगदेव। उदयादित्य के बाद उसके पुत्रों में उत्तराधिकार के लिए युद्ध छिड़ गया। विक्रमादित्य षष्ठ ने 1097 ई. में पुनः मालवा में हस्तक्षेप किया और नरवर्मा को हटाकर जगदेव को मालवा का राजा बनवा दिया। जब नरवर्मन मालवा का शासक बना। इसमें विक्रमादित्य ने जगदेव का समर्थन किया। बाद में दोनों के संबंध अत्यंत सौहार्दपूर्ण हो गये, जिसके फलस्वरूप विक्रमादित्य ने जगदेव को चालुक्य दरबार में बुलवा लिया। जगदेव के जयनाद अभिलेख से ज्ञात होता है कि विक्रमादित्य षष्ठ ने उसे आंध्रप्रदेश में जनपदीय क्षेत्र का शासक नियुक्त किया था। इस प्रकार विक्रमादित्य षष्ठ ने नर्मदा के दक्षिण स्थित समस्त भू-भाग पर अधिकार कर लिया था।

विक्रमादित्य और वेंगी: पश्चिमी चालुक्यों के लिए वेंगी सदैव प्रतिष्ठा का प्रश्न बना रहा। विजयादित्य की मृत्यु के कई वर्षों बाद तक कुलोत्तुंग के पुत्रों ने वेंगी पर उपराजाओं के रूप में शासन किया। 1092-93 ई. में विक्रमचोल ने वेंगी की गद्दी सँभाली। इसके बाद कोलनु (कोलोर झील) के सामंत की सहायता से दक्षिण कलिंग का शासक, जो वेंगी के अधीन था, ने विद्रोह कर दिया। यद्यपि विक्रमचोल इस विद्रोह को कुचलने में सफल रहा, तथापि उसके राज्य में अशांति फैल गई। संभवतः इस अशांति के पीछे विक्रमादित्य का ही हाथ था, किंतु इन दोनों के बीच किसी युद्ध की सूचना नहीं है।

1118 ई. में कुलोत्तुंग ने वेंगी से अपने शासक विक्रम चोल को वापस बुला लिया जिसके कारण वेंगी में अराजकता फैल गई। इस स्थिति का लाभ उठाते हुए 1118 ई. में विक्रमादित्य षष्ठ ने अपनी सैनिक शक्ति का प्रयोग कर वेंगी को अधिकृत कर लिया और अपने सेनापति अनंतपाल को वहाँ का गवर्नर नियुक्त कर दिया। पता चलता है कि विक्रमादित्य षष्ठ के अधीनस्थ होयसल इरेयंग ने चोल शासक को पत्तों के वस्त्र पहनने के लिए बाध्य कर दिया था (चोलिकर-अण्णलेयम् तलिरनुडिसि)। इस युद्ध में उच्छंगि का पांड्य शासक भी विक्रमादित्य की ओर से कुलोत्तुंग प्रथम के विरूद्ध लड़ा था और विक्रमादित्य ने उसे (पांड्य राजा को) ‘राजिगचोलमनोभंग’ की उपाधि दी थी। वेंगी पर विक्रमादित्य के अधिकार की पुष्टि द्राक्षाराम तथा अन्य तेलुगु प्रदेशों से मिले चालुक्य संवत् की तिथि वाले लेखों से भी होती है। साक्ष्यों से पता चलता है कि 1127 ई. में कोंडपल्लि में अनंतंपाल का भतीजा गोविंद दंडनायक शासन कर रहा था।

पुलकेशिन् द्वितीय, 610-642 ई. (Pulakeshin II, 610-642 AD)

विक्रमादित्य और होयसल: विक्रमादित्य को होयसलों के संकट का सामना करना पङा। विक्रमादित्य के समकालीन होयसल वंश के शासक विनयादित्य, उसका पुत्र एरेयंग तथा एरियंग के पुत्र बल्लाल प्रथम और विष्णुवर्द्धन थे। विनयादित्य तथा उसके पुत्र एरेयंग ने चोलों के विरुद्ध युद्ध में विक्रमादित्य की सहयता की थी। यद्यपि होयसल धीरे-धीरे अपनी शक्ति का विस्तार कर रहे थे और बल्लाल प्रथम के समय तक उनका राज्य काफी बढ गया था, किंतु अब भी होयसल चालुक्यों की अधीनता स्वीकार करते थे। बल्लाल की उपाधि ‘त्रिभुवनमल्ल’ की मिलती है जिससे पता चलता है कि वह विक्रमादित्य का सामंत था। 1101 ई. के बाद के होयसल अभिलेखों से भी पता चलता है कि द्वारसमुद्र के होयसल विक्रमादित्य षष्ठ के सामंत थे।

किंतु लगता है कि बल्लाल प्रथम के छोटे भाई बिट्टिग (विष्णुवर्द्धन) ने अपनी वर्धमान शक्ति से प्रोत्साहित होकर चालुक्यों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया और 1116 ई. में पांड्यों तथा कदंबों का सहयोग से उत्तर में कृष्णा नदी तक के चालुक्य प्रांत पर अपना अधिकार कर लिया। विष्णुवर्द्धन के अभिलेखों में दावा किया गया है कि उसने बेलवोला, हानुंगल, बनवासी तथा नोलम्बवाड़ी पर विजयें प्राप्त की थीं और उसके घोड़ों ने कृष्णा नदी में स्नान किया था।

विक्रमादित्य ने विष्णुवर्द्धन का सामना करने के लिए अपने सेनापति जगद्देव (जो मालव नरेश उदयादित्य का पुत्र था) के नेतृत्व में एक सेना भेजी। 1118 ई. के श्रवणवेलगोला से प्राप्त एक अभिलेख के अनुसार विष्णुवर्द्धन के सेनापति गंगराज ने विक्रमादित्य की सेनाओं पर, जिसका नेतृत्व बारह सामंत कर रहे थे, कण्णेगल में रात्रि के समय जोरदार आक्रमण कर पराजित कर दिया। इस प्रकार प्रारंभ में होयसलों को चालुक्यों के विरूद्ध सफलता मिली जिससे उनका उत्साह और बढ गया।

किंतु होयसलों की यह सफलता क्षणिक सिद्ध हुई। विक्रमादित्य षष्ठ ने मालवा के परमार जगदेव तथा सिंदशासक आचुगि द्वितीय जैसे सामंत शासकों की सहायता से होयसल विष्णुवर्द्धन को परास्त कर अपने राज्य से बाहर निकाल दिया। इसके बाद उसने विष्णुवर्द्धन के सहायकों को भी दंडित किया। सिंद लेखों के अनुसार सम्राट विक्रम (विक्रमादित्य षष्ठ) के आदेश से रणसिंह आचुगि द्वितीय ने होयसलों को पीछे खदेड़कर गोवा पर अधिकार कर लिया, लक्ष्मण को युद्ध में मार डाला, पाण्ड्यों का वीरता के साथ पीछा किया, मेलपों को तितर-बितर कर दिया तथा कोंकण को घेर लिया। आचुगि के पुत्र पेरमादिदेव के विषय में भी कहा गया है कि उसने पृथ्वी के सबसे भयंकर होयसल राजा विष्णुवर्द्धन को पराजित कर भगा दिया और (उसकी राजधानी) द्वारसमुद्र को घेर लिया था। 1122 ई. में हसलूर नामक स्थान पर भी चालुक्य-होयसल सेनाओं में युद्ध हुआ, जिसमें गंगनरेश चालुक्यों की ओर से लङता हुआ मारा गया।

इसी प्रकार होसवीडु नामक स्थान पर हुए एक अन्य युद्ध में भी होयसलों के विरूद्ध चालुक्यों को विजय मिली। 1122-23 ई. में विक्रमादित्य बनवासी के जयंतीपुर नामक स्थान पर ठहरा था। इस प्रकार विष्णुवर्द्धन की साम्राज्यवादी आकांक्षाओं पर पानी फिर गया तथा विक्रमादित्य के जीवनकाल तक वह उसकी अधीनता में रहने को विवश हुआ। होयसलों के ऊपर अपनी विजय के उपलक्ष्य में विक्रमादित्य ने ‘विष्णुवर्द्धन’ की उपाधि धारण की।

पुलकेशिन् द्वितीय के बाद वातापी के चालुक्य (Chalukya of Vatapi After Pulakeshin II)

शिलाहारों के विरूद्ध अभियान: सतारा में करहाटक या करहाट में 10वीं शताब्दी ई. से ही शिलाहारों की एक शाखा शासन कर रही थी। जयसिंह द्वितीय ने शिलाहारों को चालुक्यों की अधीनता स्वीकार करने के लिए बाध्य किया था। विक्रमादित्य षष्ठ ने शिलाहार नरेश मारसिंह की पुत्री चंद्रलेखा से विवाह किया था। मारसिंह के पाँच पुत्र थे-गुवल द्वितीय, गंगदेव, बल्लाल, भोज और गंडरादित्य।

भोज ने 1086 ई. में शासन ग्रहण किया था और चालुक्य सत्ता के विरूद्ध विद्रोह कर दिया। विक्रमादित्य षष्ठ ने 1100 ई. के आसपास विद्रोही शासक भोज पर आक्रमण करने के लिए भीमरथी नदी के तट पर स्थित ‘उप्पयनदकुप्प’ नामक स्थान पर अपना सैनिक शिविर लगाया था। परंतु इसमें उसे पूर्ण सफलता नहीं मिल सकी क्योंकि 1108 ई. में भोज एक शक्तिशाली शासक के रूप में शासन कर रहा था।

यादव एवं काकतीय: नासिक के यादव और अनुमकोंड के काकतीय भी विक्रमादित्य के अधीन थे। यादवों का राज्य अहमद नगर से नर्मदा तक के प्रदेश में फैला हुआ था। हेमाद्रि के चतुर्वर्गचिंतामणि के व्रतखंड के अनुसार यादव सेउणचंद्र ने विक्रमादित्य षष्ठ की उसके शत्रुओं से रक्षा की थी और उसके पुत्र एरमदेव ने विक्रमादित्य षष्ठ की अधीनता में अनेक युद्धों में भाग लिया था। 1100 ई. के एक अभिलेख में भी पता चलता है कि सेउणचंद्र का पुत्र इरमदेव चालुक्यों की प्रभुसत्ता स्वीकार करता था।

किंतु ऐसा लगता है कि बाद में यादवों ने विक्रमादित्य षष्ठ के विरूद्ध विद्रोह कर दिया। विक्रमादित्य ने न केवल यादवों के विद्रोह का दमन किया, बल्कि इरमदेव को पराजित कर सामंत रहने के लिए बाध्य किया।

काकतीय शासक प्रोल के अनुमकोंड लेख (1117 ई.) से ज्ञात होता है कि उसके पिता बेट ने विक्रमादित्य की अधीनता स्वीकार कर ली थी। इससे स्पष्ट है कि बेट उसकी अधीनता पहले ही स्वीकर कर रहा था। संभवतः बेट ने चोलों के प्रभाव में आकर चालुक्यों का विरोध किया था, लेकिन चोल कुलोत्तुंग की मृत्यु के बाद उसने विक्रमादित्य की अधीनता स्वीकार कर ली थी।

कोंकण की विजय: विक्रमादित्य षष्ठ ने कोंकण की भी विजय की थी। 1078 ई. के एक अभिलेख से ज्ञात होता है कि सप्तकोंकण क्षेत्र विक्रमादित्य षष्ठ के लिए वलय (कंकण) बन गये थे। किंतु 1113 ई. के एक अभिलेख में कहा गया है कि पांड्य सामंत कामदेव विक्रमादित्य षष्ठ के सामंत के रूप में कोंकण राष्ट्र पर शासन कर रहा था।

कल्याणी का चालुक्य राजवंश या पश्चिमी चालुक्य भाग-1 (Chalukya Dynasty of Kalyani or Western Chalukya Part-1)

अन्य उपलब्धियाँ : बिलहण ने अपने आश्रयदाता विक्रमादित्य षष्ठ को चक्रवर्ती सम्राट के रूप में चित्रित किया है। कहा गया है कि सिंहासनारोहण के बाद विक्रमादित्य ने करहाट की राजकुमारी चंद्रलेखा के अप्रतिम सांदर्य को सुनकर उसके स्वयंवर में उपस्थित हुआ, जहाँ राजकुमारी ने अयोध्या, चेदि कान्यकुबज, कालिंजर, ग्वालियर, मालवा, गर्जुर, पांड्य चोल आदि राजाओं की उपस्थिति में इसी का वरण किया।

इसके बाद चालुक्य नरेश पश्चिमी तट पर पहुँचा और उसकी हस्तिसेना ने मलय पर्वत के चंदन वन को विजित किया, चोल नरेश को पराजित किया, परमार शासक को अपने अधीन किया, पूर्वी पर्वत की सुंदरियों ने इसके गौड़ एवं कामरूप विजय का यशोगान किया तथा केरल, काँची, वेंगी एवं चक्रकूट के शासकों को पराजित किया। 1077 ई. के बाद के विक्रमादित्य के कई अभिलेखों में भी उसे गुर्जर, आभीर, कश्मीर, नेपाल, सिंध, बर्बर, तुरुष्क, दहाल, मरु, वंग, विदर्भ, कोंकण तथा नल्लूर का विजेता कहा गया है। यद्यपि इन अतिशयोक्तिपूर्ण विवरणों को पूरी तरह स्वीकार करना कठिन है, फिर भी संभव है कि इनमें से कुछ राज्यों पर विक्रमादित्य ने विजय प्राप्त की थी।

याज्ञवल्क्यस्मृति की टीका में विज्ञानेश्वर ने पारंपरिक प्रशंसात्मक शैली में लिखा है कि विक्रमादित्य षष्ठ हिमालय से लेकर रामेश्वरम् तक और बंगाल की खाड़ी से अरब सागर तक विस्तृत संपूर्ण देश का चक्रवर्ती सम्राट था। परंतु उसके साम्राज्य की वास्तविक सीमाएँ उत्तर में नर्मदा नदी और दक्षिण में वर्तमान हसन तथा कुडप्पा जिले तक ही सीमित थीं।

विक्रमादित्य की अनेक रानियाँ थीं- चंद्रलेखा (चंदलादेवी), लक्ष्मीदेवी, केतलादेवी, अव्वलदेवी, मल्लिनीदेवी, चंदनदेवी, जक्कलदेवी, पट्टमहादेवी, मैललमहादेवी, भागलदेवी, सावलदेवी, पद्मलदेवी तथा यलवट्टि आदि। विक्रमांकदेवचरित के अनुसार विक्रमादित्य ने शिलाहार राजकुमारी चंद्रलेखा के साथ स्वयंवर-विवाह किया था। लक्ष्मीदेवी को पियरसि (प्रियरानी) और चंदलादेवी को पियरसि के अतिरक्त अग्रमहामहिषी कहा गया है। उसकी कुछ रानियाँ प्रशासन कार्य से सक्रिय रूप से संबद्ध थीं। चंदनदेवी ने शिक्षा के विकास के लिए प्रचुर दान दिया था। सांवलदेवी, जो महामंडलेश्वर जागमरस की पुत्री थी, 1077-78 ई. में नरेयंगल अग्रहार की प्रशासिका थी। लक्ष्मीमहादेवी पाँचवें वर्ष में द्रोणपुर में और 1109-10 ई. में निट्टसिंगि नामक ग्राम में शासन कर रही थीं। मलयमतिदेवी 1094-95 ई. में किरियकरेयूर के अग्रहार का प्रशासन देख रही थी। केतलादेवी बेल्लारी जिले में, लक्ष्मीमहादेवी द्रोणपुर (धारवाड़ जिले में), जक्कलदेवी 1093-94 ई. इंगुड़िगे ग्राम में तथा मैललमहादेवी 1095 ई. में कण्णवल्ले में शासन कर रही थीं।

विक्रमादित्य षष्ठ के चार पुत्रों- मल्लिकार्जुन, जयकर्ण, सोमेश्वर (तृतीय) तथा तैलप और एक पुत्री मैललदेवी के बारे में सूचना मिलती है। मल्लिकार्जुन लक्ष्मीदेवी का पुत्र था, जबकि जयकर्ण, सोमेश्वर (तृतीय) व तैलप चंदलदेवी से उत्पन्न हुए थे। विक्रादित्य के बाद सोमेश्वर (तृतीय) ही उसका उत्तराधिकारी हुआ था।

कल्याणी का चालुक्य राजवंश या पश्चिमी चालुक्य भाग-2 (Chalukya Dynasty of Kalyani or Western Chalukya Part-2)

विक्रमादित्य षष्ठ की सांस्कृतिक उपलब्धियाँ (Cultural Achievements of Vikramaditya VI)

विक्रमादित्य षष्ठ की महानता का कारण उसकी सैनिक शक्ति, विजयें अथवा सैनिक उपलब्धियाँ नहीं थी। उसकी महानता का मूल कारण थीं उसकी शांतिकालीन उपलब्धियाँ। विक्रमादित्य षष्ठ ने चालुक्य साम्राज्य के विस्तार के साथ-साथ एक कुशल प्रशासन की स्थापना की, कला, साहित्य एवं विद्या के विकास को प्रोत्साहन दिया, विभिन्न देशों के विद्वानों और ब्राह्मणों को चालुक्य साम्राज्य में आमंत्रित कर उन्हें अग्रहार दान दिया और भारतीय संस्कृति के उन्नयन का प्रयास किया। विक्रमादित्य पष्ठ ने अपने नाम पर विक्रमपुर नगर की स्थापना की थी, जिसकी पहचान बीजापुर जिले के अरसिबीडि नामक स्थान से की जाती है। उसने विष्णु के एक मंदिर (विष्णुकमलविलासि) तथा एक विशाल झील का भी निर्माण करवाया था।

विक्रमादित्य षष्ठ विद्वानों का उत्साही संरक्षक भी था। उसने कश्मीरी कवि बिल्हण को अपना ‘विद्यापति’ (प्रमुख राजपंडित) नियुक्त किया जिसने 1085 ई. के आस-पास ‘विक्रमांकदेवचरित’ नामक काव्य की रचना की थी जिसका नायक स्वयं विक्रमादित्य षष्ठ ही था। याज्ञवल्क्य स्मृति पर ‘मिताक्षरा’ नामक टीका लिखने वाला विज्ञानेश्वर उसका मंत्री था। मिताक्षरा में विज्ञानेश्वर ने लिखा है- कल्याण जैसा भव्य नगर, विक्रमादित्य जैसा महान् सम्राट और विज्ञानेश्वर के समान प्रकांड विद्वान् न तो कभी हुए और न ही भविष्य में होंगे। कल्याणी के इस महान् शासक के लगभग 51 वर्ष तक राज्य किया। उसकी अंतिम ज्ञात तिथि 1126 ई. है।

कल्याणी का चालुक्य राजवंश या पश्चिमी चालुक्य भाग-3 (Chalukya Dynasty of Kalyani or Western Chalukya Part-3)

सोमेश्वर तृतीय, 1126-1138 ई. (Someshwara III, 1126-1138 AD.)

विक्रमादित्य षष्ठ की मृत्यु के बाद उसका पुत्र सोमेश्वर तृतीय 1126 ई. में कल्याणी का राजा हुआ। उसने ‘भूलोकमल्ल’ तथा ‘सर्वज्ञचक्रवर्ती’ की उपाधियाँ धारण कीं। सोमेश्वर तृतीय ने भी ‘भूलोकमल्लवर्ष’ नामक नवीन संवत् का प्रवर्तन किया, परंतु उसके कुछ अभिलेखों में विक्रम संवत् का भी प्रयोग मिलता है।

सोमेश्वर के समय में पश्चिमी चालुक्यों की शक्ति का हृास होने लगा था। द्राक्षाराम से प्राप्त एक बिना तिथि के एक लेख के अनुसार गोदावरी तट पर वेलेंचांटि चोड गोंक द्वितीय ने एक युद्ध में पश्चिमी चालुक्यों की सेना को भगा दिया था। यह युद्ध लगभग 1135 ई. में हुआ था। इस युद्ध में सोमेश्वर स्वयं उपस्थित था।

सोमेश्वर तृतीय का होयसल शासक विष्णुवर्द्धन से भी संघर्ष हुआ था। लगता है कि होयसल नरेश विष्णुवर्द्धन कुछ समय तक सोमेश्वर की अधीनता मानता रहा क्योंकि 1137 ई. के सिंदिगेरे के एक लेख में विष्णुवर्द्धन को ‘चालुक्यमणिमांडलिकचूडा़मणि’ कहा गया है। किंतु सोमेश्वर के 13वें वर्ष (1139 ई.) के एक लेख से ज्ञात होता है कि महामंडलेश्वर होयसलदेव ने गंगवाड़ी, नोलंबवाड़ी तथा बनवासी को छीन लिया, उच्छंगि के दुर्ग पर प्रहार किया और कदंब शासक पांनुगल (हानुंगल) को घेर लिया। किंतु बाद में सोमेश्वर ने उसे पराजित कर उसके विद्रोह को सफलतापूर्वक दबा दिया।

कर्नाटक के शिमोगा जिले के बेलगाँव लेख से ज्ञात होता है कि अपने शासन के तीसरे वर्ष (1129 ई.) सोमेश्वर ने दिग्विजय के लिए दक्षिण की ओर प्रस्थान किया था और हुल्लुरि तीर्थ में अपना सैनिक शिविर लगाया था। किंतु लगता है कि इस दिग्विजय का उद्देश्य शौर्य प्रदर्शन मात्र था।

सोमेश्वर तृतीय को आंध्र, द्रामिल, मगध तथा नेपाल का विजेता कहा गया है। परंतु 1134 ई. से कुछ पहले चोल कुलोत्तुंग द्वितीय ने आंध्र राज्य पर अधिकार कर लिया था। वस्तुतः आंध्र में चालुक्यों की शक्ति सोमेश्वर तृतीय के शासनकाल के समय में ही कमजोर हो गई थी और विक्रमादित्य षष्ठ की मृत्यु के बाद वेंगी राज्य के दक्षिणी क्षेत्रों पर चोलों ने अधिकार कर लिया था। सोमेश्वर द्वारा मगध और नेपाल की विजय का विवरण अप्रामाणिक लगता है।

अन्य उपलब्धियाँ : सोमेश्वर धार्मिक कृत्यों एवं साहित्य में विशेष रूचि लेता था। उसके दूसरे वर्ष के लेख से ज्ञात होता है कि वह बीजापुर जिले में कर्णलेवाद या कडलेवड (दक्षिण वाराणसी) के स्वयंभू सोमनाथदेव के मंदिर में दर्शन के लिए गया था। वहाँ उसने 16 महादान संपन्न किया और मंदिर को प्रभूत दान दिया। उसकी साहित्यिक अभिरूचि और विद्वता का ज्वलंत प्रमाण ‘मानसोल्लास’ (अभिलाषितार्थचिंतामणि) नामक प्रसिद्ध ग्रंथ है जिसकी रचना उसने स्वयं की थी। कहा जाता है कि उसने विक्रमादित्य षष्ठ की प्रशंसा में ‘विक्रमांकाभ्युदय’ नामक एक अन्य ग्रंथ की भी रचना की थी।

सोमेश्वर तृतीय की दो रानियों के संबंध में सूचना मिलती है-वर्मलदेवी और राजलदेवी। वर्मलदेवी का उल्लेख 1134 ई. के एक अभिलेख में मिलता है जबकि राजलदेवी ने माविकेश्वरदेव के लिए दान किया था। सोमेश्वर के दो पुत्र थे-जगदेकमल्ल द्वितीय और तैलप तृतीय। दोनों अपने पितामह विक्रमादित्य षष्ठ के समय से ही प्रशासन की जिम्मेदारी का वहन कर रहे थे। सोमेश्वर तृतीय की अंतिम ज्ञात तिथि 1138 ई. है।

पुलकेशिन् द्वितीय, 610-642 ई. (Pulakeshin II, 610-642 AD)

जगदेकमल्ल द्वितीय, 1138-1151 ई. (Jagadekamalla II, 1138-1151 AD.)

सोमेश्वर तृतीय के पश्चात् उसका ज्येष्ठ पुत्र 1138 ई. में गद्दी पर बैठा। अंदूर लेख के अनुसार अपने शासन ग्रहण के प्रथम वर्ष 1138 ई. में ही जगदेकमल्ल महाभैरव मैलारदेव के दर्शन के लिए गया और नरनरेश्वर मंदिर के कलश का निर्माण करवाया था। अपने दो पूर्ववर्ती शासकों की भांति इसने भी अपने राज्यारोहण के समय एक नवीन संवत् का प्रवर्तन किया, जो इसके राज्यकाल में भी लोकप्रिय नहीं हो सका। लेखों में जगदेकमल्ल द्वितीय के लिए ‘त्रिभुवनमल्ल’, ‘त्रिभुवनमल्ल पेरिमाडिदेव’ तथा ‘प्रतापचक्रवर्ती’ आदि नामों का प्रयोग किया गया है। उसका सबसे प्राचीन उल्लेख चित्तलदुर्ग के 1124 ई. के एक अभिलेख में मिलता है जब वह अपने पितामह विक्रमादित्य षष्ठ के अधीन शासन कर रहा था।

सोमेश्वर तृतीय के काल में ही होयसल शासक विष्णुवर्द्धन ने अपना शक्ति विस्तार प्रारंभ कर दिया था। 1149 ई. में विष्णुवर्द्धन ने बंकापुर को केंद्र मानकर गंगवाड़ी, बनवासी, हंगल  और कृष्णा नदी तक हुलगिरे पर शासन कर रहा था। इससे लगता है कि इस समय चालुक्य साम्राज्य का पतन प्रारंभ हो गया था यद्यपि जगदेकमल्ल के समय तक चालुक्य साम्राज्य अक्षुण्ण बना रहा और होयसल उसके अधीनता मानते रहे।

1143 ई. के चित्तलदुर्ग के अनुसार जगदेकमल्ल द्वितीय को चोलों तथा होयसलों के विरुद्ध सफलता मिली थी। 1147 ई. के मुचुगे अभिलेख के अनुसार उसके आदेश से बर्म दंडाधिप ने होयसल शासक पर भयंकर आक्रमण किया था और कलिंग तथा चोल राज्यों के शासकों से कर वसूल किया था। जगदेकमल्ल को चोल, लाट तथा गुर्जर राज्यों के शासकों को खदेड़ने वाला और चालुक्य वंश का प्रतिस्थापक भी कहा गया है। पेरमाडिदेव के एक अभिलेख में कहा गया है कि उसने जगदेकमल्ल के राज्यकाल में कुलशेखनांक को पराजित किया, चट्ट का सिर काट दिया, जयकेशिन का पीछा किया और विष्णुवर्द्धन को बेलुपुर तक खदेड़ कर उस नगर को अधिकृत कर लिया था। इस प्रकार स्पष्ट है कि होयसलों ने चालुक्यों से स्वतंत्र होने का पूरा प्रयास किया था, किंतु उन्हें सफलता नहीं मिल सकी और वे चालुक्यों के अधीन बने रहे।

1143 ई. के लगभग जगदेकमल्ल ने होयसल नरसिंह के साथ मालवा पर आक्रमण किया; परमार शासक जयवर्मा को अपदस्थ कर उसके स्थान पर बल्लाल को प्रतिष्ठित कर दिया। संभवतः इसी अभियान के दौरान उसने लाट को भी लूटा और गुर्जर शासक कुमारपाल को पराजित किया होगा।

दक्षिण में जगदेकमल्ल ने चोल शासक कुलात्तुंग द्वितीय तथा कलिंग के अनंतवर्मा चोडगंग को पराजित किया तथा नोलंब पल्लव के विद्रोह का भी दमन किया। होयसलों की भांति कलचुरि तथा काकतीय भी जगदेकमल्ल का नाममात्र का आधिपत्य मानते रहे।

जगदेकमल्ल द्वितीय के कई सामंतों एवं अधिकारियों की सूचना मिलती है। नोलुंबवाड़ी के पांड्य, बनवासी का रेचरस, अनंतपुर का शासक इरुंगुलचोल (इरुंगोलरस), सांतरवंशीय जगदेव, सिंदराचमल्ल तथा पेरमाडिदेवरस और गंग मारसिंह का पुत्र एक्कल आदि सोमेश्वर तृतीय के सामंत थे। जगदेकमल्ल की अंतिम ज्ञात तिथि 1151 ई. है।

तैलप तृतीय, 1151-1162 ई. (Tailap III, 1151-1162 AD.)

जगदेकमल्ल द्वितीय के पश्चात् उसका छोटा भाई तैलप तृतीय कल्याणी के चालुक्य राजसिंहासन पर बैठा। तैलप तृतीय की प्रथम ज्ञात तिथि 1151 ई. (कुलूर लेख) है, इसलिए उसके राज्यारोहण की भी यही तिथि होगी। बीजापुर से प्राप्त 1151 ई. के एक लेख को इसके शासन के तीसरे वर्ष का बताया जाता है, इसलिए कुछ इतिहासकारों का अनुमान है कि इसने 1149-50 ई. में अपने शासन का आरंभ किया था। तैलप तृतीय के लिए  लेखों में ‘त्रिभुवनमल्ल’, ‘त्रैलोक्यमल्ल’ ‘त्रिभुसवनमलल’, ‘वीरगंगि’, ‘रक्कसगंग’, तथा ‘चालुक्य चक्रवर्ती-विक्रम’ आदि नामों एवं उपाधियों का प्रयोग किया गया है।

यद्यपि तैलप तृतीय ने आरंभ में चालुक्य कुमारपाल तथा चोल कुलोत्तुंग के आक्रमणों का सफलतापूर्वक प्रतिरोध किया, किंतु उसके राज्यकाल में काकतीयों, होयसलों तथा यादवों के आंरिक विद्रोहों से चालुक्य साम्राज्य के विघटन की प्रक्रिया तीव्र हो गई।

अम्मकोंड के एक अभिलेख के अनुसार काकतीय शासक प्रोल प्रथम ने हाथी पर सवार तैलप को बंदी बना लिया। लेकिन बाद में काकतीय प्रोल से तैलप को मुक्त कर दिया। इसके बाद अपमानित तैलप तृतीय कल्याणी छोड़कर अण्णिगेरे (धारवाड़ जिले में) चला गया और उसे राजधानी बनाकर कुछ समय तक शासन करता रहा। लेखों से शिमोगा, कुडप्पा तथा कर्नूल जिलों पर इसका प्रभुत्व प्रमाणित होता है। 1163 ई. अतिसार से तैलप की मृत्यु हो गई।

कल्याणी का चालुक्य राजवंश या पश्चिमी चालुक्य भाग-1 (Chalukya Dynasty of Kalyani or Western Chalukya Part-1)

कलचुरियों का कल्याणी पर प्रभुत्व (Dominance of Kalchuris over Kalyani)

तैलप तृतीय की दुर्बलता और काकतीयों की सफलता से प्रेरित होकर होयसल और कलचुरि कल्याणी पर अधिकार करने का षड्यंत्र करने लगे। अभिलेखों से पता चलता है कि तर्दवाड़ी का कलचुरि शासक बिज्जल तैलप तृतीय का महामंडलेश्वर था। किंतु 1157 ई. के अंतिम लेखों में बिज्जल की उपाधि ‘महाराजाधिराज भुजबलचक्रवर्ती’ मिलती है। वास्तव में काकतीय प्रोल प्रथम के विद्रोह से उत्पन्न अराजकता का लाभ उठाकर बिज्जल अपनी शक्ति बढ़ाता गया और महामंडलेश्वर के स्थान पर उसने दंडनायक, महाप्रधान, भुवनैकवीर, महाराजाधिराज, भुजबलचक्रवर्ती तथा कलचुर्यकुलकमलमार्तण्ड जैसी उपाधियाँ धारण कर ली।

यद्यपि 1161 ई. तक बिज्जल तैलप तृतीय की अधीनता का ढ़ोंग करता रहा, लेकिन 1162 ई. के आस-पास उसने स्वयं को कल्याण का शासक घोषित कर दिया और स्वतंत्र कलचुरि साम्राज्य की स्थापना की। इस उपलक्ष्य में उसने एक नये संवत् का प्रवर्तन किया और ‘त्रिभुवनमल्ल’ की उपाधि धारण की।

बिज्जल ने यद्यपि संपूर्ण चालुक्य साम्राज्य पर अधिकार करने का दावा किया है, किंतु आभिलेखिक साक्ष्यों के अनुसार चालुक्य राज्य के दक्षिणी प्रदेश कभी उसके अधीन नहीं रहे। बिज्जल के सोमेश्वर, संकम, आहवमल्ल तथा सिंहल नामक चार पुत्र और सिरियदेवी नामक एक पुत्री थी।

संभवतः 1168 ई. में बिज्जल ने अपने पुत्र सोमेश्वर के पक्ष के पक्ष में सिंहासन का त्याग कर दिया था। कलचुरि सोमेश्वर की अंतिम ज्ञात तिथि 1177 ई. मिलती  है। इसके बाद उसके छोटे भाई संकम द्वितीय ने शासन ग्रहण किया। लेकिन 1181 ई. के आसपास चालुक्य सोमेश्वर चतुर्थ ने कल्याणी पर पुनः अधिकार कर लिया और संकम के उत्तराधिकारी आहवमल्ल को 1181 से 1183 ई. तक बनवासी और बेलवोला प्रदेशों से ही संतुष्ट रहना पड़़ा।

1183 ई. में बिज्जल के छोटे पुत्र सिंहण (सिंहभूपाल) ने उत्तराधिकार प्राप्त किया, किंतु 1183-84 ई. में सोमेश्वर चतुर्थ ने बनवासी एवं बेलवोला के क्षेत्रों पर भी अधिकार कर लिया। 1184 ई. के बाद कल्याणी में कलचुरियों के शासन का कोई प्रमाण नहीं मिलता।

यद्यपि कलचुरि कल्याणी पर मात्र 26 वर्ष तक ही शासन कर सके, लेकिन इस दौरान इन्होंने जो राजनैतिक अस्थिरता उत्पन्न की, उससे न केवल चालुक्यों का उत्थान बाधित हुआ, बल्कि होयसलों एवं यादवों के अभ्युदय की प्रक्रिया तीव्र हो गई।

सोमेश्वर चतुर्थ, 1162-1298 ई. (Someswara IV, 1162-1298 AD.)

चालुक्य राज्य पर कलचुरियों की अधिसत्ता स्थापित हो जाने से वहाँ राजनैतिक अव्यवस्था व्याप्त हो गई थी। संभवतः तैलप ने 1162 ई. में ही अपने पुत्र सोमेश्वर चतुर्थ को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त कर दिया था। लेखों से पता चलता है कि सोमेश्वर चतुर्थ ने 1182 ई. के पहले अपने सेनापति ब्रह्म के सक्रिय सहयोग से अपनी राजधानी कल्याण को कलचुरियों से मुक्त कराने का प्रयास आरंभ कर दिया था। अंततः 1184 ई. में सोमेश्वर चतुर्थ ने कलचुरि आहवमल्ल को पराजित कर बनवासी एवं बेलवोला सहित अपने पैतृक राज्य के अधिकांश प्रदेशों पर पुनः अधिकार कर लिया। 1184 ई. के एक अभिलेख में सोमेश्वर को ‘चालुक्याभरण श्रीमत त्रैलोक्यमल्ल भुजबल वीर’ तथा 1185 ई. के एक अभिलेख में ‘कलचूर्यकुलनिर्मूलना’ कहा गया है। इस प्रकार सोमेश्वर चतुर्थ को अपने वंश की प्रतिष्ठा का उद्धारक बताया गया है।

1184 ई. के एक लेख में सोमेश्वर को चोल, लाट, मलेयाल, तेलिंग, कलिंग, वंग, पांचाल, तुरूष्क, गुर्जर, मालवा तथा कोंकण राज्यों की विजय का श्रेय दिया गया है, जो निश्चित रूप से अतिरंजित है। सोमेश्वर के अभिलेख कर्नाटक राज्य के शिमोगा, बेल्लारी, बीजापुर तथा चित्तलदुर्ग जिलों पर उसके अधिकार को प्रमाणित करते हैं। बनवासी तथा हानुंगल का शासक होयसल बल्लाल द्वितीय, नोलंबवाड़ी का विजय पांड्य और सिंद मल्लदेव उसके  सामंत थे। इस प्रकार उसने कम से कम 1184 ई. तक गोदावरी नदी तक के क्षेत्र पर शासन किया और 1189 ई. तक बेल्लारी तथा शिमोगा जिलों पर। उसने ‘त्रिभुवनमल्ल’, ‘वीरनारायण’ तथा ‘रायमुरारि’ की उपाधि धारण किया था।

कल्याणी का चालुक्य राजवंश या पश्चिमी चालुक्य भाग-2 (Chalukya Dynasty of Kalyani or Western Chalukya Part-2)

कल्याणी के चालुक्य वंश का पतन (Fall of the Chalukya dynasty of Kalyani)

सोमेश्वर चतुर्थ के काल में राजनीतिक स्थिति एकदम बदल चुकी थी। उसके अनेक सामंत कल्याणी को अधिकृत करने के लिए प्रयत्नशील थे। उनमें देवगिरि के यादव तथा द्वारसमुद्र के होयसल सर्वाधिक घातक साबित हुए। 1188 ई. में देवगिरि के यादव भिल्लम पंचम ने कल्याणी पर अधिकार कर लिया। 1189 ई. के एक अभिलेख में यादव भिल्लम को ‘कर्नाटश्रीवल्लभ’ (कर्नाटक की राजलक्ष्मी का प्रिय) कहा गया है। यादवों से भयभीत होकर सोमेश्वर ने अपने सामंत कदंब जयकेशिन तृतीय के यहां बनवासी (जयंतीपुर) में शरण ली। 1192 ई. के आसपास चालुक्य साम्राज्य मुख्यतः होयसलों एवं यादवों के मध्य विभाजित हो गया, लेकिन जयकेशिन कम से कम 1198 ई. तक सोमेश्वर चतुर्थ का आधिपत्य मानता रहा। सोमेश्वर का अंतिम ज्ञात अभिलेख 1200 ई. का है जो चित्तलदुर्ग जिले से प्राप्त हुआ है। इस तिथि के बाद सोमेश्वर चतुर्थ या कल्याणी के चालुक्य राजवंश के संबंध में कोई सूचना नहीं मिलती है। इस प्रकार काकतीयों, यादवों और होयसलों की बढ़ती हुई शक्ति के परिणामस्वरूप कल्याणी के चालुक्य वंश का पतन हो गया।

कल्याणी का चालुक्य राजवंश या पश्चिमी चालुक्य भाग-3 (Chalukya Dynasty of Kalyani or Western Chalukya Part-3)