दिल्ली सल्तनत : सैय्यद और लोदी वंश (1414-1450 ई.) Delhi Sultanate: Syed and Lodi Dynasty (1414-1450 AD)

सैय्यद वंश (1414-1451 ई.)

सैय्यद वंश की स्थापना

सुल्तान महमूद की मृत्यु के पश्चात् दिल्ली के सरदारों ने दौलत खाँ लोदी को दिल्ली का सुल्तान स्वीकार कर लिया। मार्च, 1414 ई. में खिज्र खाँ, जो तैमूर की ओर से मुलतान एवं उसके अधीन प्रदेशों का शासक था, उसके विरूद्ध सेना लेकर बढ़ा तथा उसी वर्ष मई महीने के अंत तक दिल्ली पर अधिकार कर लिया और दौलत खाँ को बंदी बनाकर हिसार फीरोजा भेज दिया गया। संभवतः खिज्र खाँ के पूर्वज अरब से आये थे और वह पैगंबर का वंशज  था, इसलिए उसके द्वारा स्थापित वंश को सैय्यद वंश कहा गया है।

खिज्र खाँ (1414-1421 ई.)

खिज्र खाँ सैय्यद वंश का संस्थापक था। फीरोज तुगलक के समय में वह मुलतान का सूबेदार नियुक्त किया गया था, किंतु बाद में वह तैमूरलंग से मिल गया। तैमूर ने भारत से वापस लौटते समय उसे मुल्तान, लाहौर एवं दीपालपुर का शासक नियुक्त कर दिया था। वह तैमूर के चैथे पुत्र एवं उत्तराधिकारी शाहरुख के राज्यप्रतिनिधि के रूप में शासन करता रहा। कहा जाता है कि खिज्र खाँ उसे नियमित कर भेजा करता था। खिज्र खाँ ने अपनी शक्ति में वृद्धि करके 1414 ई. में दिल्ली के सिंहासन पर अधिकार कर लिया।

खिज्र खाँ के सप्तवर्षीय शासनकाल की कोई विशेष उपलब्धि नहीं है। उसने कभी सुल्तान की उपाधि धारण नहीं किया और वह ‘रैयत-ए-आला’ की उपाधि से ही सन्तुष्ट रहा। उसके समय में पंजाब, मुल्तान एवं सिंध पुनः दिल्ली सल्तनत(delhi sultanate) के अधीन हो गये, किंतु वह शक्तिशाली सुल्तान नहीं था। उसका प्रभाव-क्षेत्र सीमित होता जा रहा गया था। इटावा, कटेहर, कन्नौज, पटियाला, खोर, चलेसर, ग्वालियर, बयाना, मेवात, बदायूँ तथा कंपिल के जमींदार उसे प्रायः चुनौती देते रहते थे। खिज्र खाँ तथा उसके राजभक्त मंत्री ताजुलमुल्क जीवनभर सल्तनत की सुरक्षा के लिए कठिन संघर्ष करते रहे। अंततः 20 मई, 1421 को खिज्र खाँ की मृत्यु हो गई। फरिश्ता ने खिज्र खाँ की एक न्यायप्रिय एवं परोपकारी शासक के रूप में प्रशंसा की है। उसकी मृत्यु पर युवा, वृद्ध, दास और स्वतंत्र नागरिकों सभी ने काले वस्त्र पहनकर दुःख प्रकट किया था।

मुबारक शाह (1421-1434 ई.)

खिज्र खाँ ने अपने पुत्र मुबारक खाँ को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया था। मुबारक खाँ ने ‘शाह’ की उपाधि धारणकर अपने नाम के सिक्के जारी किये। उसने अपने नाम से खुतबा पढ़वाया और विदेशी स्वामित्व का अंत किया। अपने पिता की भाँति उसे भी विद्रोहों के दमन और राजस्व वसूली के लिए नियमित सैनिक यात्राएँ करनी पड़ीं। अपने शासनकाल में मुबारक शाह ने भटिंडा एवं दोआब में हुए विद्रोहों को सफलतापूर्वक दमन किया, किंतु खोक्खर जाति के नेता जसरथ द्वारा किये गये विद्रोह को दबाने में वह असफल रहा।

मुबारक शाह के समय में पहली बार दिल्ली सल्तनत में दो महत्त्वपूर्ण हिंदू अमीरों का उल्लेख मिलता है। उसने वीरतापूर्वक विद्रोहों का दमन किया, सुल्तान के पद की प्रतिष्ठा बढाई और अपने राज्य की सीमाओं को सुरक्षित किया। वह सैय्यद वंश के सुल्तानों में योग्यतम् था। 19 फरवरी, 1434 ई. को जब मुबारक शाह अपने द्वारा निर्मित नये नगर ‘मुबारकाबाद’ का निरीक्षण कर रहा था, उसके वजीर ‘सरवर-उल-मुल्क’ ने उसकी हत्या कर दी।

मुबारक शाह ने विद्वान् याहिया बिन अहमद सरहिंदी को राजकीय संरक्षण प्रदान किया। उसके ग्रंथ तारीख-ए-मुबारकशाही से मुबारक शाह के शासनकाल के विषय में जानकारी मिलती है।

मुहम्मद शाह (1434-1445 ई.)

मुबारकशाह के बाद दिल्ली की गद्दी पर मुबारक शाह का भतीजा मुहम्मद बिन फरीद खाँ मुहम्मद शाह के नाम से गद्दी पर बैठा, जो खिज्र खाँ का नाती था। उसके शासनकाल के प्रारम्भिक छः महीने वजीर सरवर-उल-मुल्क के आधिपत्य में बीते। किंतु छः माह बाद सुल्तान ने अपने नायब सेनापति कमाल-उल-मुल्क के सहयोग से वजीर की हत्या करवा दी और उसी को वजीर नियुक्त कर लिया।

इसके काल में मुल्तान में लंगाओं ने विद्रोह किया, जिसे सुल्तान ने स्वंय जाकर शान्त किया। इसके बाद मालवा के शासक महमूद ने दिल्ली पर आक्रमण कर दिया। मुहम्मद शाह ने मुल्तान के सूबेदार बहलोल लोदी की सहायता से महमूद को वापस खदेड़ दिया। मुहम्मद शाह ने खुश होकर बहलोल लोदी को ‘खान-ए-खाना’ की उपाधि दी और साथ ही उसे अपना ‘पुत्र’ कहकर पुकारा।

बहलोल लोदी ने स्वयं दिल्ली पर अधिकार करने का प्रयास किया, किंतु वह असफल रहा। मुहम्मद शाह के अंतिम समय में अधिकांश राज्यों ने विद्रोह कर स्वयं को स्वतंत्र कर लिया। फलतः 1445 ई. में मुहम्मद शाह की मृत्यु के साथ ही सैय्यद वंश पतन की ओर अग्रसर हो गया।

अलाउद्दीन आलमशाह (1445-1450 ई.)

मुहम्मद शाह की मृत्यु के बाद उसका पुत्र अलाउद्दीन ‘आलमशाह’ की उपाधि धारणकर सिंहासन पर बैठा। वह आराम-पसंद एवं विलासी प्रवृत्ति का था। वजीर हमीद खाँ से अनबन होने के कारण वह दिल्ली छोड़कर बदायूँ में जाकर बस गया। हमीद खाँ ने बहलोल लोदी को दिल्ली आमंत्रित किया। बहलोल लोदी ने दिल्ली आकर वजीर हमीद खाँ की हत्या करवा दी और 1450 ई. में दिल्ली पर अधिकार कर लिया। 19 अप्रैल, 1451 ई. को बहलोल ने स्वयं को सुल्तान घोषित कर दिया। अलाउद्दीन आलमशाह ने अपने को बदायूँ में ही सुरक्षित समझा और वहीं पर 1476 ई. में उसकी मृत्यु हो गई। इस प्रकार लगभग 37 वर्ष के बाद सैय्यद वंश का अंत हो गया।

लोदी राजवंश (1451-1526 ई.)

तैमूर के आक्रमण(taimor ka aakraman) के पश्चात दिल्ली सल्तनत(delhi sultanate) की अस्थिरता का लाभ उठाकर कई अफगान सरदारों ने पंजाब में अपनी स्थिति सुद्ढ़ कर ली थी। इन सरदारों में सबसे महत्त्वपूर्ण बहलोल लोदी था, जो सरहिंद का इक्तादार था। बहलोल लोदी ने खोखरों की बढ़ती शक्ति को रोका। खोखर एक युद्धप्रिय जाति थी और सिंध की पहाडि़यों में रहती थी। अपनी नीतियों और अपने साहस के बल पर बहलोल ने शीघ्र ही सारे पंजाब पर अधिकार जमा लिया। मालवा के संभावित आक्रमण को रोकने के लिए उसे दिल्ली आमंत्रित किया गया और वह बाद में भी दिल्ली में ही रुका रहा। जल्दी ही उसकी फौंजों ने दिल्ली पर भी अधिकार कर लिया। जब दिल्ली का सुल्तान 1451 में एक प्रवासी के रूप में मर गया, तो बहलोल औपचारिक रूप से दिल्ली की गद्दी पर बैठा। इस प्रकार सैयद वंश का अंत हुआ।

पंद्रहवीं शताब्दी के मध्य से ही गंगा घाटी के उत्तरी भागों और पंजाब पर लोदियों का अधिकार था। दिल्ली के पहले सुल्तान तुर्क थे, किंतु लोदी अफगान थे। यद्यपि दिल्ली सल्तनत की फौज में अनेक अफगान थे, लेकिन अफगान सरदारों को कभी भी महत्त्वपूर्ण पद नहीं दिया गया था। यही कारण था कि बख्तियार खिलजी को अपने भाग्य का निर्माण बिहार और बंगाल में करना पड़ा था। उत्तरी भारत में अफगानों के बढ़ते महत्व का अनुमान मालवा में अफगान शासन के उदय से लग रहा था। दक्षिण में भी बहमनी सल्तनत में उनके पास महत्त्वपूर्ण पद थे।

बहलोल लोदी(Bahlol Lodi) (1451-1489 ई.)

दिल्ली में लोदी वंश(lodi vansh in hindi) का संस्थापक अफगान बहलोल लोदी अफगानिस्तान के ‘गिलजाई कबीले’ की महत्त्वपूर्ण शाखा ‘शाहूखेल’ में पैदा हुआ था। उसके पूर्वज मुल्तान में आकर बस गये थे। चूंकि वह लोदी कबीले का अग्रगामी था, इसलिए उसके द्वारा स्थापित वंश को लोदी वंश कहा जाता है। बहलोल सुल्तानशाह लोदी का भतीजा था, जिसे मल्लू इकबाल की मृत्यु के पश्चात् इस्लाम खाँ की उपाधि देकर सरहिंद का शासक नियुक्त किया गया था। अपने चाचा की मृत्यु के बाद बहलोल लाहौर एवं सरहिंद का शासक बना। 1451 ई. में जब अलाउद्दीन आलमशाह ने स्वेच्छापूर्वक दिल्ली का राजसिंहासन त्याग दिया, तब उसने मंत्री हमीद खाँ की सहायता से 19 अप्रैल, 1451 को ‘बहलोल शाह गाजी’ की उपाधि धारण कर स्वयं को दिल्ली का सुल्तान घोषित किया। इस प्रकार भारत के इतिहास में पहली बार एक अफगान शासक दिल्ली की गद्दी पर बैठा।

बहलोल लोदी की उपलब्धियाँ(Achievements of Bahlol Lodi)

बहलोल को दिल्ली राज्य के एक छोटे-से टुकड़े पर शासन करना था और वह टुकड़ा भी उस समय बहुत खराब हालत में था। पर वह अपने निकटतम् पूर्वगामियों से भिन्न पदार्थ का बना था। वह एक लड़ाकू वंश से उत्पन्न था तथा क्रियाशील, रणप्रिय एवं महत्त्वाकांक्षी था। उसने उसने अमीरों को भेंट, पुरस्कार, जागीर आदि देकर अपने विश्वास में ले लिया और अपने अफगान अनुगामियों की सहायता से अपने पुराने मंत्री हमीद खाँ को चतुराई से कैदखाने में बंदकर उसके प्रभाव से छुटकारा पा लिया। केंद्र में अपनी स्थिति सुदृढ़ करने के बाद विद्रोही सामंतों का दमन करने का निश्चय किया। उसकी अधिकांश शक्ति शर्की शासकों से लड़ने में ही लगी रही। उसने जौनपुर के महमूदशाह शर्की के दिल्ली पर अधिकार करने के प्रयास को भी निष्फल कर दिया।

बहलोल ने रोह के अफगानों को यह सोचते हुए आमंत्रित किया कि वे अपनी गरीबी के कलंक से छूट जायेंगे और मैं आगे बढ़ सकूँगा। अफगान इतिहासकार अब्बास सरवानी लिखता है कि ‘इन फरमानों को पाकर रोह के अफगान सुल्तान बहलोल की खिदमत में हाजिर होने के लिए टिड्डियों के दल की तरह आ गये।’ संभवतः इस बात को बढ़ा-चढ़ा कर कहा गया है, किंतु यह सही है कि अफगानों के आगमन से बहलोल न केवल शर्कियों को हराने में सफल हुआ, बल्कि भारत में मुस्लिम समाज की संरचना में भी अंतर आया। उत्तर और दक्षिण दोनों ओर अफगान बहुसंख्यक और महत्त्वपूर्ण हो गये थे। बहलोल ने रोह के अफगानों को योग्यता के अनुसार जागीरें प्रदान कीं।

उसने कुछ प्रांतीय जागीरदारों एवं नायकों को अधीन कर लिया, जो बहुत वर्षों से स्वतंत्रता का उपयोग करते आ रहे थे। उसने दोआब के विद्रोही हिंदुओं का कठोरता के साथ दमन किया, बंगाल के सूबेदार तुगरिल खाँ को हराकर मार डाला और उसके प्रमुख समर्थकों को बंगाल की राजधानी लखनौती के मुख्य बाजार में फाँसी पर लटकवा दिया। उसने अपने पुत्र बुगरा खाँ को बंगाल का सूबेदार नियुक्त करके यह चेतावनी दी कि ‘उसने भी यदि विद्रोह करने का प्रयास किया तो उसका भी हश्र वही होगा, जो तुगरिल खाँ का हो चुका है।’ मेवात के अहमद खाँ, संभल के दरिया खाँ, कोईल के ईसा खाँ, सुकेत के मुबारक खाँ, मैनपुरी एवं मोन गाँव मैनपुरी के राजा प्रताप सिंह, रेवाड़ी के कुत्बखाँ तथा इटावा, चंदवार एवं दोआब के अन्य जिलों के नायकों को पराजित कर अपना सामंत नियुक्त किया। बहलोल ने रेवाड़ी के सूबेदार कुतुब खाँ पर भी विजय प्राप्त की। अहमद यादगार के अनुसार उसने चित्तौड़ के राजा को भी परास्त किया।

बहलोल की प्रमुख उपलब्धि थी जौनपुर के राजा हुसैन पर विजय। उसने जौनपुर के विरूद्ध सफल युद्ध किया जिससे उसकी स्वतंत्रता का अंत हो गया। जौनपूर विजय से बहलोल की प्रतिष्ठा बहुत बढ़ गई। उसने 1486 ई. में अपने सबसे बड़े जीवित पुत्र बारबकशाह को जौनपुर का राजप्रतिनिधि नियुक्त किया।

बहलोल ने पश्चिमोत्तर सीमा की मंगोल आक्रमण से सुरक्षा के लिए अपने बड़े लड़के मुहम्मद खाँ को मुल्तान का हाकिम नियुक्त किया और स्वयं भी सीमा के आसपास ही पड़ाव डालकर रहने लगा। मंगोलों ने 1278 ई. में भारत पर आक्रमण करने का प्रयास किया, किंतु शाहआलम मुहम्मद खाँ ने उन्हें पीछे खदेड़ दिया। 1485 ई. में पुनः आक्रमण कर वे मुल्तान तक बढ़ आये, और शाहजादे पर हमला करके उसे मार डाला।

बहलोल का अंतिम अभियान ग्वालियर पर आक्रमण था जहाँ से उसने अकूत संपति प्राप्त की। ग्वालियर से वहाँ के राजा कीरत सिंह को दंड देकर लौटते समय सुल्तान बीमार पड़ गया। अपने पुत्र बारबकशाह एवं निजामशाह तथा पौत्र आजमे-हुमायूँ के द्वारा गद्दी के उत्तराधिकार के लिए रचे षड्यंत्रों के बीच, जलाली शहर के निकट जुलाई, 1489 ई. के मध्य तक, उसने अंतिम साँस ली।

शासक के रूप में बहलोल उन सभी राजाओं से बहुत बढ़कर था, जो तुगलक-वंश के फिरोज के बाद दिल्ली के सिंहासन पर बैठे थे। उसने दिल्ली सल्तनत का पुराना दरबार एक प्रकार से फिर से कायम किया। वह अपने सरदारों को ‘मसनद-ए-अली’ कहकर पुकारता था। उसने हिंदुस्तान में मुस्लिम शक्ति की प्रतिष्ठा को पुनः स्थापित किया और अपने राज्य की सरकार को सशक्त बनाया। दरबार में शालीनता और शिष्टाचार के पालन पर जोर देकर तथा अमीरों को अनुशासन में बाँधकर उसने सुल्तान की प्रतिष्ठा को ऊपर उठाया। उसका राजत्व सिद्धांत समानता पर आधारित था। वह अफगान सरदारों को अपने समकक्ष मानता था। वह अपने सरदारों के खड़े रहने पर खुद भी खड़ा रहता था। वह राजकीय वैभव के प्रदर्शन के प्रतिकूल तथा निर्धनों के प्रति दयालु था। स्वयं विद्वान् न होने पर भी वह विद्वानों का आश्रयदाता था। उसे अपने निकट संबंधियों एवं अपनी जाति के लोगों का प्रेम और विश्वास प्राप्त था तथा वह अपनी शक्ति एवं समृद्धि में उन्हें हिस्सा दिया करता था।

बहलोल लोदी ने ‘बहलोली सिक्के’ का प्रचलन करवाया, जो अकबर के समय तक उत्तर भारत में विनिमय का प्रमुख प्रतिष्ठित सरदार हिंदू थे। इनमें रायप्रताप सिंह, रायकरन सिंह, रायनर सिंह, राय त्रिलोकचंद्र और राय दादू प्रमुख हैं। वह गरीबों की सहायता करता था और विद्वानों का आश्रयदाता था। उसकी गणना दिल्ली के सबसे शक्तिशाली सुल्तानों में होती है।

सिकंदर लोदी (1489-1517 ई.)

सिकंदर लोदी बहलोल लोदी का द्वितीय पुत्र एवं उत्तराधिकारी था। इसका मूल नाम निजाम खाँ था और वह स्वर्णकार हिंदू माँ की संतान था। बहलोल लोदी की मृत्यु के बाद दिल्ली सल्तनत के उत्तराधिकार पर अमीरों में विवाद था। कुछ अमीर बहलोल के छोटे पुत्र निजाम खाँ को सुल्तान बनाना चाहते थे, किंतु अनेक सरदार उसका विरोध कर रहे थे क्योंकि वह स्वर्णकार हिंदू माँ की सन्तान का पुत्र था। निजाम खाँ के विरोधी सरदार बहलोल के बड़े पुत्र बारबक शाह को सुल्तान बनाने के पक्ष में थे जो उस समय जौनपुर का सूबेदार था। अंततः निजाम खाँ ने एक प्रतिनिधि मंडल भेजकर मामला सुलझा लिया और 17 जुलाई, 1489 ई. को जलाली में सिकंदरशाह के नाम से दिल्ली का सुल्तान बना। उसने बारबकशाह को जौनपुर सल्तनत पर राज्य रखने को कहा और अपने चाचा आलम खाँ से भी विवाद सुलझाए, जो कि तख्ता-पलट करने की योजना बना रहा था।

सिकंदर लोदी की आरंभिक समस्याएँ

सिंहासन पर बैठने के समय सुल्तान के समक्ष अनेक विकट समस्याएँ थी। वह अपने भाई बारबकशाह व उसके सहयोगी अमीरों के विरोध के उपरांत सुल्तान बना था, इसलिए उनका दमन करना आवश्यक था। बारबकशाह दिल्ली पर अधिकार करने के लिए अपनी शक्ति में वृद्धि कर रहा था। अन्य अनेक राज्य भी अपनी स्वतंत्रता का सपना देख रहे थे। यही नहीं, सुनारिन का पुत्र होने के कारण सिकंदर को अपनी योग्यता को भी प्रमाणित करना था कि वह किसी अफगान सुल्तान से कम योग्य नहीं है।

सिकंदर लोदी की उपलब्धियाँ

सिकंदर शाह एक योग्य शासक सिद्ध हुआ। उसके पूर्व के शासनकालों में अधिकांशतः प्रांतीय शासकों, नायकों एवं जमींदारों की दुःशीलता के कारण, जो अव्यवस्था एवं गड़बड़ी फैल गई थी, उसे दूर कर उसने उत्तराधिकार में प्राप्त विशाल साम्राज्य को संगठित और शक्तिशाली बनाने का प्रयास किया।

विद्रोहों का दमन

सिकंदर ने सर्वप्रथम अपने चाचा आलम खाँ, जो रापड़ी और चंदावर का सूबेदार था और सुल्तान बनने का सपना देख रहा था, पर आक्रमण किया। उसने भागकर अपने चचेरे भाई ईसा खाँ के यहाँ शरण ली। यद्यपि ईसा खाँ भी सिकंदर शाह का विरोधी था, किंतु आजम हुमायूँ (सुल्तान का भतीजा) तथा जालरा के सरदार तातार खाँ को परास्त किया।

सिकंदर लोदी ने जौनपुर को अपने अधीन करने के लिए अपने बड़े भाई बारबक शाह के खिलाफ अभियान किया, जिसमें उसे पूर्ण सफलता मिली। जौनपुर के बाद सुल्तान सिकंदर लोदी ने 1494 ई. में बनारस के समीप हुए एक युद्ध में हुसैनशाह शर्की को परास्तकर बिहार को दिल्ली में मिला लिया। उसने बिहार सरकार में दरिया खाँ को नियुक्त किया, तिरहुत के राजा को कर देने को बाध्य किया तथा बंगाल के अलाउद्दीन हुसैनशाह के साथ एक संधि कर ली, जिसके अनुसार दोनों एक-दूसरे के राज्य का अतिक्रमण न करने को राजी हो गये।

राजपूत राज्यों में सिकंदर लोदी ने धौलपुर, मन्दरेल, उतागिरि, नरवर एवं नागौर को जीता। इटावा, बयाना, कोइल, ग्वालियर एवं धौलपुर के नायकों को सफल रूप में अधीन रखने के अभिप्राय से उसने 1504 ई. में एक नया नगर उस स्थान पर स्थापित किया, जहाँ पर आधुनिक आगरा शहर है। 1506 में उसने आगरा को अपनी राजधानी बनाया। अपने जीवन के अंतिम दिनों तक वह विरोधी सरदारों को आज्ञाकारी बनाने का प्रयत्न करता रहा। 21 नवंबर, 1517 ई. को आगरे में सुल्तान ने अंतिम साँस ली।

सिकंदर शाह लोदी का शासन-प्रबंध

सिकंदर शाह लोदी गुजरात के महमूद बेगड़ा और मेवाड़ के राणा सांगा का समकालीन था। उसने दिल्ली को इन दोनों से मुकाबले के योग्य बनाया। उसने उन अफगान सरदारों का दबाने की कोशिश भी की, जो जातीय स्वतंत्रता के आदी थे और सुल्तान को अपने बराबर समझते थे। सिकंदर ने जब सरदारों को अपने सामने खड़े होने का हुक्म दिया, ताकि उनके ऊपर अपनी महत्ता प्रदर्शित कर सके। जब शाही फरमान भेजा जाता था तो सब सरदारों को शहर से बाहर आकर आदर के साथ उसका स्वागत करना पड़ता था। जिनके पास जागीरें थीं, उन्हें नियमित रूप से उनका लेखा देना होता था और हिसाब में गड़बड़ करनेवाले और भ्रष्टाचारी जागीरदारों को कड़ी सजाएँ दी जाती थी। लेकिन सिकंदर लोदी को इन सरदारों को काबू में रखने में अधिक सफलता प्राप्त नहीं हुई। अपनी मृत्यु के समय बहलोल लोदी ने अपने पुत्रों और रिश्तेदारों में राज्य बाँट दिया था। यद्यपि सिकंदर एक बड़े संघर्ष के बाद उसे फिर से एकत्र करने में सफल हुआ था, लेकिन सुल्तान के पुत्रों में राज्य के बँटवारे का विचार अफगानों के दिमाग में बना रहता था।

सिकंदर शाह के सुधार-कार्य

सिकंदरशाह ने भूमि के लिए एक प्रमाणिक पैमाना ‘गज-ए-सिकंदरी’ का प्रचलन करवाया, जो 30 इंच का था। उसने अनाज पर से चुंगी हटा दी और अन्य व्यापारिक कर हटा दिये, जिससे अनाज, कपड़ा एवं आवश्यकता की अन्य वस्तुएँ सस्ती हो गई। सिकंदर लोदी ने खाद्यान्न पर से जकात कर हटा लिया तथा भूमि में गढ़े हुए खजाने से कोई हिस्सा नहीं लिया। अपने व्यक्तित्व की सुंदरता बनाये रखने के लिए वह दाढ़ी नहीं रखता था। सिकंदर लोदी ने अफगान सरदारों से समानता की नीति का परित्याग करके श्रेष्ठता की नीति का अनुसरण किया। वह सल्तनत काल का एक मात्र सुल्तान हुआ, जिसमें खुम्स से कोई हिस्सा नहीं लिया। उसने निर्धनों के लिए मुफ्त भोजन की व्यवस्था कराई, आंतरिक व्यापार कर को समाप्त किया तथा गुप्तचर विभाग का पुनर्गठन किया।

सिकंदर लोदी की धार्मिक नीति

धार्मिक दृष्टि से सिकंदर लोदी असहिष्णु था। उसने हिंदू मंदिरों को तोड़कर वहाँ पर मस्जिद का निर्माण करवाया। एक इतिहासकार के अनुसार सिकंदर ने नगरकोट के ज्वालामुखी मंदिर की मूर्ति को तोड़कर उसके टुकड़ों को कसाइयों को माँस तोलने के लिए दे दिया था। सिकंदर लोदी ने हिंदुओं पर जजिया कर पुनः लगा दिया। उसने एक ब्राह्मण को इसलिए फाँसी दे दी, क्योंकि उसका कहना था कि हिन्दू और मुस्लिम समान रूप से पवित्र हैं। मुसलमानों को ‘ताजिया’ निकालने एवं मुसलमान स्त्रियों को पीरों एवं संतों के मजार पर जाने पर सुल्तान ने प्रतिबंध लगा दिया। क्रोध में उसने शर्की शासकों द्वारा जौनपुर में बनवाई गई एक मस्जिद तोड़ने का आदेश दिया था, यद्यपि बाद में उलेमाओं की सलाह पर आदेश वापस ले लिया गया।

शिक्षा एवं विद्वानों का आश्रयदाता

सिकंदर शाह लोदी विद्या का पोषक व प्रेमी था। विद्वानों को संरक्षण देने के कारण उसका दरबार विद्वानों का केंद्र-स्थल बन गया था। वह विद्वानों और दार्शनिकों को बड़े-बड़े अनुदान देता था। इसलिए उसके दरबार में अरब और ईरान सहित विभिन्न जातियों और देशों के सुसंस्कृत विद्वान् पहुँचते थे। प्रत्येक रात्रि को 70 विद्वान् उसके पलंग के नीचे बैठकर विभिन्न प्रकार की चर्चा किया करते थे। सुल्तान के प्रयत्नों से कई संस्कृत ग्रंथ फारसी भाषा में अनुवादित हुए। उसके आदेश पर संस्कृत के एक आयुर्वेद ग्रंथ का फारसी में ‘फरहंगे सिकंदरी’ के नाम से अनुवाद हुआ।

शिक्षित और विद्वान्

सिकंदर शाह लोदी स्वयं भी शिक्षित और विद्वान् था। उसने स्वयं कुछ फारसी पद्य लिखे। उसका उपनाम ‘गुलरुखी’ था। इसी उपनाम से वह कविताएँ लिखा करता था। उसने संगीत के एक ग्रंथ ‘लज्जत-ए-सिकंदरशाही’ की रचना की। उसने मस्जिदों को सरकारी संस्थाओं का स्वरूप प्रदान करके उन्हें शिक्षा का केंद्र बनाने का प्रयत्न किया था। मुस्लिम शिक्षा में सुधार करने के लिए उसने तुलंबा के विद्वान् शेख अब्दुल्लाह और शेख अजीजुल्लाह को बुलाया था। उसके शासनकाल में हिंदू भी बड़ी संख्या में फारसी सीखने लगे थे और उन्हें उच्च पदों पर रखा गया था।

वह अपनी प्रजा के लिए दयालु था। वह दृढ़ निष्पक्षता से न्याय करता था तथा अपनी दरिद्रतम् प्रजा की शिकायतें स्वयं सुना करता था। सिकंदर लोदी ने 1503 ई. में उसने वर्तमान आगरा शहर की नींव रखी और अपनी राजधानी बनाया।अपने राज्य-पर्यंत व्यापार को बढ़ावा दिया। मुख्यतः उसकी सरकार की कार्यक्षमता से उसके राज्य में शांति एवं समृद्धि फैल गई तथा आवश्यकता की मुख्य वस्तुओं के मूल्य अत्याधिक कम हो गये थे।

सिकंदर लोदी का मूल्यांकन

सिकंदर निस्संदेह अपने वंश के तीनों शासकों में सबसे अधिक योग्य था। समकालीन तथा कुछ उत्तरकालीन लेखकों ने उसके मस्तिष्क और हृदय के उत्तम गुणों की बड़ी प्रशंसा की है। वह दृढ़, सतर्क एवं ईमानदार शासक था। निर्धन एवं दरिद्र के लिए उसके हृदय में दया थी।  सिकंदर लोदी कहता था कि ‘यदि मै अपने एक गुलाम को भी पालकी में बैठा दूँ तो मेरे आदेश पर मेरे सभी सरदार उसे अपने कंधों पर उठाकर ले जायेंगे।’ प्रथम सुल्तान था, जिसने आगरा को निष्पक्ष न्याय के लिए मियाँ भुआ को नियुक्त किया। सुल्तान शहनाई सुनने का शौकीन था। जीवन के अन्तिम समय में सुल्तान सिकंदर शाह के गले में बीमारी होने से 21 नवम्बर, 1517 ई. को उसकी मृत्यु हो गई।

इब्राहिम लोदी (1517-1526 ई.)

सिकंदर लोदी के मरणोपरांत अमीरों ने आम सहमति से उसके पुत्र इब्राहीम लोदी  को 21 नवंबर, 1517 ई. को आगरे के सिंहासन पर बैठाया। इब्राहिम दिल्ली सल्तनत का अंतिम सुल्तान था। नया सुल्तान सैनिक कुशलता से संपन्न था, पर उसमें सुबुद्धि एवं संयम का अभाव था। उसकी शासकीय योग्यताएँ अपने पिता समान नहीं थीं। उसे अनेक विद्रोहों का सामना करना पड़ा। अपने शासनकाल के शुरू में उसने राजपूतों से ग्वालियर छीन लिया, परंतु बल एवं कार्यक्षमता पाने के उद्देष्य से उसने लोहानी, फरमूली एवं लोदी जातियों के शक्तिशाली सरदारों के प्रति, जो राज्य के अधिकारी-वर्ग थे, दमन की नीति चलायी। उसका यह काम बुद्धिहीनता का था। अपने कठोर कामों द्वारा वह अफगान सरदारों की सहानुभूति से हाथ धो बैठा तथा उन्हें राजद्रोह की ओर बढ़ने को मजबूर किया। यह उसकी प्रभुता की पूर्ण अवहेलना के रूप में प्रकट हुआ। इससे सुलतान और भी क्रुद्ध हो गया तथा सरदारों के प्रति उसके कार्य अत्याधिक कठोर बन गये।

इब्राहिम लोदी की उपलब्धियाँ(Achievements of ibrahim lodi)

सिंहासन पर बैठने के उपरांत इब्राहिम ने आजम हुमायूँ शेरवानी को ग्वालियर पर आक्रमण करने हेतु भेजा। वहाँ के तत्कालीन शासक विक्रमजीत सिंह ने इब्राहिम की अधीनता स्वीकार कर ली। पूर्व में भी विद्रोह शुरु हो गया। इब्राहिम लोदी ने राज्य का विभाजन करके अपने भाई जलाल खाँ को जौनपुर का शासक नियुक्त किया। इब्राहिम के भाई जलाल खाँ ने जौनपुर को अपने अधिकार में कर लिया था। उसने कालपी में ‘जलालुद्दीन’ की उपाधि के साथ अपना राज्याभिषेक करवाया था। इब्राहिम ने प्रमुख अमीर खानेजहाँ लोहानी के समझाने पर उसने जलाल खाँ को बुलाने के लिए हैवत खाँ को भेजा, किंतु हैवत खाँ सफल नहीं हो सका। जलाल खाँ ने इब्राहिम के विरूद्ध विद्रोह कर दिया व हुमायूँ शेरवानी, जो इब्राहिम का सेनापति था तथा कालिंजर पर अधिकार करने का प्रयत्न कर रहा था, को अपनी ओर मिला लिया। जलाल खाँ और हुमायूँ ने संयुक्त रूप से अवध पर आक्रमण किया। इब्राहिम ने इसके विरूद्ध अभियान किया, जिससे भयभीत होकर हुमायूँ ने जलाल खाँ का साथ छोड़ दिया और इब्राहिम से मिल गया। जलाल खाँ को जौनपुर छोड़कर भागना पड़ा। वह ग्वालियर होते हुए मालवा गया, किंतु गढ़कंटक में उसे बंदी बना लिया गया व सुल्तान इब्राहिम को सौंप दिया गया। जलाल खाँ की हत्या करा दी गई और जौनपुर को अपने राज्य में मिला लिया।

इब्राहिम ने पुराने एवं वरिष्ठ सेना कमांडरों को अपने वफादार नये वालों से बदलकर दरबार के नवाबों को भी नाखुश कर दिया था। तब उसे अपने लोग ही डराने धमकाने लगे थे और अंततः अफगानी दरबारियों का धैर्य जाता रहा तथा शीघ्र बिहार के सरदारों ने दरिया खाँ लोहानी के अधीन स्वतंत्रता की घोषणा कर दी। लाहौर के अधीन स्वतंत्र शासक दौलत खाँ लोदी के पुत्र दिलावर खाँ के प्रति इब्राहिम के सहानुभूतिरहित व्यवहार से सरदारों का असंतोष और भी बढ़ गया। दौलत खाँ लोदी तथा सुल्तान इब्राहिम के चाचा एवं दिल्ली की गद्दी के दावेदार आलम खाँ ने काबुल के तैमूरवंशी शासक बाबर को भारत पर आक्रमण करने को आमंत्रित किया। इस प्रकार प्रतिशोध, महत्त्वाकांक्षा, उत्पीड़न एवं मनमुटाव के कारण पतनोन्मुख दिल्ली सल्तनत का अंतिम पतन हो गया।

मेवाड़ के राणा सांगा ने जब अपने साम्राज्य का पश्चिम उत्तर प्रदेश तक प्रसार किया, और आगरे पर हमले की धमकी दी तो राणा साँगा के विरूद्ध इब्राहिम लोदी ने अभियान किया, किंतु असफल रहा। खतौली के युद्ध में इब्राहीम लोदी राणा साँगा से हार गया। इस युद्ध में राणा साँगा ने अपना बाँया हाथ खो दिया। राणा साँगा ने चंदेरी पर अधिकार कर लिया। मेवाड़ एवं इब्राहीम लोदी के बीच झगड़े का मुख्य कारण मालवा पर अधिकार को लेकर था।

इब्राहिम लोदी ने लोहानी, फारमूली एवं लोदी जातियों के दमन का पूर्ण प्रयास किया, जिससे शक्तिशाली सरदार असंतुष्ट हो गये। बहलोल लोदी का तीसरा बेटा आलम खाँ सुल्तान इब्राहिम लोदी (1517-26 ई.) का चाचा था। वह अपने भतीजे की अपेक्षा अपने को दिल्ली की सल्तनत का असली हकदार समझता था। जब वह अपने बल पर इब्राहिम लोदी को गद्दी से नहीं हटा सका तो उसने पंजाब के शासक दौलत खाँ लोदी से मिलकर काबुल के तैमूरवंशी शासक बाबर को भारत पर आक्रमण के लिए निमंत्रण दिया। बाबर ने यह निमंत्रण स्वीकार कर लिया।

पानीपत का पहला युद्ध(First Battle of Panipat) (1526 ई.)

1526 ई. में काबुल के तैमूरी शासक जहीररुद्दीन मोहम्मद बाबर की सेना ने दिल्ली के सुल्तान इब्राहिम लोदी की बड़ी सेना को 21 अप्रैल को पानीपत के एक छोटे से गाँव के निकट लड़े गये युद्ध में परास्त किया। पानीपत वो स्थान है जहाँ बारहवीं शताब्दी के बाद से उत्तर भारत के नियंत्रण को लेकर कई निर्णायक लड़ाइयाँ लड़ी गईं। एक अनुमान के मुताबिक बाबर की सेना में 15,000 के करीब सैनिक और 20-24 मैदानी तोपें थीं। लोदी का सेनाबल 1,30,000 के आसपास था, हालांकि इस संख्या में शिविर अनुयायियों की संख्या शामिल है, जबकि लड़ाकू सैनिकों की संख्या कुल 10,0000 से 11,0000 के आसपास थी। इसके साथ कम से कम 300 हाथियों ने भी युद्ध में भाग लिया था। क्षेत्र के हिंदू राजा, राजपूत इस युद्ध में तटस्थ रहे थे, लेकिन ग्वालियर के कुछ तोमर राजपूत इब्राहिम लोदी की ओर से लड़े थे। इस युद्ध में बाबर ने तुगलमा युद्ध-पद्धति का प्रयोग किया था, यह अब तक के युद्धों में पहला ऐसा युद्ध था जिसमें इसका प्रयोग किया गया।

इब्राहिम लोदी की सबसे बड़ी दुर्बलता उसका हठी स्वभाव था। उसके समय की प्रमुख विशेषता उसका अपने सरदारों से संघर्ष था। इब्राहीम की मृत्यु के साथ ही दिल्ली सल्तनत समाप्त हो गई और बाबर ने भारत में एक नवीन वंश ‘मुगल वंश’ की स्थापना की। फरिश्ता के अनुसार ‘वह मृत्यु-पर्यंत लड़ा और एक सैनिक भाँति मारा गया।’ नियामतुल्लाह का विचार है कि ‘सुल्तान इब्राहिम लोदी के अतिरिक्त भारत का कोई अन्य सुल्तान युद्ध-स्थल पर नहीं मारा गया।

दिल्ली सल्तनत का पतन(Fall of Delhi Sultanate)

वस्तुतः उन परिस्थितियों में, जो मुहम्मद बिन तुगलक के अंतिम दिनों में उत्पन्न हो गई थीं, दिल्ली सल्तनत(Delhi Sultanate) का पतन अनिवार्य हो गया। उस सुल्तान के अविवेक से अनेकीकरण की प्रक्रिया प्रारंभ हो गई, जिसकी गति उसके निकटतम उत्तराधिकारी फीरोजशाह की कमजोरी और नीतिहीन कामों, जैसे जागीर-प्रथा को पुनर्जीवित करना, दास संस्था को बढ़ाना, गैर-मुस्लिमों पर जजिया कर लगाना तथा पाखंडी मुस्लिम संप्रदायों को तंग करना- से तीव्र हो गई। यह प्रक्रिया दुर्बल सैयदों एवं अनीतिज्ञ लोदियों के द्वारा नहीं रोकी जा सकी। कुछ सैनिक सफलताओं के बावजूद लोदी शासन-प्रबंध में कोई हितकर एवं बलकारक तत्व नहीं ला सके। सैनिक एवं अधिकारी सरदारों को दमन की नीति से दबाने का प्रयत्नकर उन्होंने प्राणघातक भूल की। एक बाहरी संकट ने इसके अंत को लाने में शीघ्रता कर दी। आंतरिक कलह तो इसकी जीवन-शक्ति को नष्ट कर ही रही थी, उस पर तैमूर के आक्रमण और सरदारों के स्वार्थजनक षड्यंत्रों ने समूचे राज्य को अव्यवस्था और अराजकता के गर्त में डुबा दिया। फलतः  दिल्ली सल्तनत के खंडहर पर न केवल बहुत-से स्वतंत्र राज्य स्थापित हुए, बल्कि भारत में मुगल साम्राज्य की स्थापना भी हुई।

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