प्रथम विश्वयुद्ध : कारण और परिणाम (First World War : Causes and Consequences)

1914 में आरंभ हुआ प्रथम विश्वयुद्ध (First World War) कई दृष्टियों से विश्व इतिहास में महत्वपूर्ण है। इसके पूर्व होनेवाले सभी युद्ध क्षेत्रीय स्तर पर लड़े गये थे, अथवा दो या तीन देशों के मध्य हुए थे। यह पहला युद्ध था जिसमें विश्व के लगभग सभी देश उलझे हुए थे और किसी न किसी पक्ष का समर्थन कर रहे थे। इस युद्ध में पहली बार गोरी, पीली, काली तथा भूरी जातियों ने एक-दूसरे की हत्या करने में भाग लिया। सबसे बड़ी बात यह कि पहली बार युद्ध की लपटें पूरब से लेकर पश्चिम तक, उत्तर से लेकर दक्षिण तक तथा जल से लेकर आकाश तक फैल गईं और बड़े पैमाने पर नरसंहार और आतंक फैलानेवाले युद्ध के तरीकों को ईजाद किया गया। इस युद्ध में परंपरागत प्रत्यक्ष आक्रमण-प्रत्याक्रमण की युद्ध-प्रणाली का स्थान नई सैन्य प्रौद्योगिकी और खंदक युद्ध ने ले लिया। इस विश्वयुद्ध में 16 मिलियन से अधिक सैनिक और असैनिक नागरिक मारे गये।

प्रथम विश्वयुद्ध के कारण (Cause of the First World war)

विश्वयुद्ध(world War) की आशंका बहुत समय पहले से ही थी। बिस्मार्क ने 1898 में हर बेलिन से इस युद्ध के बारे में भविष्यवाणी की थी: ‘‘मैं विश्वयुद्ध नहीं देखूंगा पर तुम देखोगे और यह पश्चिमी एशिया में प्रारंभ होगा।’’ यद्यपि बिस्मार्क ने बर्लिन कांग्रेस में आस्ट्रिया का पक्ष लेकर रूस के साथ विश्वासघात किया था, फिर भी वह जब तक सत्ता में रहा, फ्रांस और रूस में मित्रता नहीं होने दिया। बिसमार्क के बाद जर्मनी में कोई ऐसा चतुर राजनीतिज्ञ नहीं हुआ जो बिगड़ती परिस्थिति को सुधार पाता। विश्व युद्ध तो वास्तव में 1909 में ही हो गया होता, यदि बोस्निया एवं हर्जेगोविना के प्रश्न पर रूस ने आस्ट्रिया का सामना करने का निर्णय कर लिया होता। लेकिन तब रूस युद्ध करने की स्थिति में नहीं था, इसलिए युद्ध टल गया। प्रथम विश्व युद्ध (First World War) के प्रारंभ होने के कुछ प्रमुख कारण इस प्रकार हैं-

साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षाएं (Imperial Ambitions)

प्रथम विश्वयुद्ध के कारण बहुत स्पष्ट थे- पहले व्यापार और बाद में औद्योगिक क्रांति के कारण यूरोपीय देशों की साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षा दिन-प्रदिन बढ़ती जा रही थी। जर्मनी में जब तक बिस्मार्क सत्ता में रहा, उसने इंग्लैंड से इस संबंध में प्रतिस्पर्धा करने का कोई प्रयत्न नहीं किया, किंतु बिस्मार्क के बाद जर्मनी ने भी अपने उपनिवेश स्थापित करने के प्रयास किये। किंतु 19वीं सदी का अंत होते-होते नये उपनिवेशों की संभावना समाप्त हो गई, जिसके कारण साम्राज्यवादी देशों में आपस में उपनिवेशों की छीना-झपटी शुरू हो गई और युद्ध अपरिहार्य दिखने लगा।
इसके अलावा कुछ परंपरागत साम्राज्यवादी इच्छाएं भी थीं- फ्रांस मोरक्को पर अधिकार करना चाहता था, रूस इरान, कुस्तुन्तुनिया सहित तुर्की साम्राज्य के अन्य क्षेत्रों पर कब्जा करना चाहता था। इससे जर्मनी के साथ उसके हितों का टकराव हुआ और ब्रिटेन को भी अपने एशियाई उपनिवेशों के लिए खतरा महसूस हुआ। आस्ट्रिया भी इस मामले में रूचि ले रहा था। इन सबका सम्मिलित प्रभाव यह हुआ कि अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में एक जबरर्दस्त प्रतियोगिता का आरंभ हुआ, जिससे ब्रिटेन सबसे अधिक चिंतित हो गया। जब जर्मनी ने उस्मानिया साम्राज्य तुर्कीं की अर्थव्यवस्था पर नियंत्रण करना चाहा और इसके लिए उसने बर्लिन से बगदाद तक रेल-लाइन बिछाने की योजना बना ली, तो जर्मनी की इस योजना से ब्रिटेन, फ्रांस और रूस आतंकित हो गये क्योंकि उनकी नजर भी तुर्की साम्राज्य पर थी।

राजनीतिक संधियां और गुटबंदी (Political Treaties and Groups)

प्रथम विश्वयुद्ध (First World War) का एक प्रमुख कारण राजनीतिक संधियां और गुटबंदी था। 19वीं सदी के अंत से ही यूरोप दो सैनिक दलों में विभक्त होने लगा था। सबसे पहले 1879 में जर्मनी ने आस्ट्रिया-हंगरी के साथ द्वि-राष्ट्र संधि की और शीघ्र ही 1882 में इटली भी इसमें शामिल हो गया और एक ‘त्रि-राष्ट्र संघ’ की स्थापना हुई। इस समय जर्मनी में बिस्मार्क अपने शक्ति कीे शिखर पर था और उसकी वैदेशिक नीति का एक प्रमुख उद्देश्य फ्रांस को अलग-थलग रखना था।

1890 में बिस्मार्क के पतन के बाद 1894 में फ्रांस और रूस में संधि हो गई। इंग्लैंड अभी तक शानदार पृथक्ता की नीति पर चल रहा था, किंतु इस समय उसे यह सोचने पर विवश होना पड़ा कि यूरोप की शक्तियों में केवल वही एक ऐसा देश है जो अकेला है और ऐसी स्थिति में यदि किसी देश से युद्ध करना हुआ तो स्थिति कितनी शोचनीय हो जायेगी।

इसलिए इंग्लैंड ने भी अपनी पृथक्ता की नीति का परित्याग करते हुए 1902 में जापान के साथ संधि कर ली। इसके बाद 1904 में इंग्लैंड और फ्रांस में भी संधि हो गई। त्रि-राष्ट्र संघ के विरोध में 1907 में फ्रांस, रूस और ब्रिटेन ने भी एक ‘हार्दिक त्रि-देशीय मैत्री संघ’ बना लिया।

इस प्रकार पूरा यूरोप दो सैनिक गुटों में बंट गया। एक ओर त्रिराष्ट संघ में जर्मनी, आस्ट्रिया और इटली थे, तो दूसरी ओर हार्दिक मैत्री संघ में फ्रांस, इंग्लैंड और रूस थे। विश्वयुद्ध शुरू होने के बाद इटली ने मित्र राष्ट्रों की विजय सुनिश्चित देखकर अपना पाला बदल लिया और मित्र देशों के प्रलोभन पर 1915 में त्रिगुट के विरूद्ध युद्ध में शामिल हो गया। इस प्रकार की गुटबंदी से स्पष्ट हो गया था कि अब छोटा-सा विवाद भी विश्वयुद्ध का रूप ले सकता है।

सैन्यवाद का प्रसार (The Spread of Militarism)

20वीं सदी के आरंभ से ही यूरोपीय देशों में हथियारों की होड़ आरंभ हो गई थी। यूरोप के बाहर औपनिवेशिक एवं व्यापारिक वर्चस्व को लेकर जो संघर्ष थे और यूरोप के अंदर जातीय ध्रुवीकरण, पारंपरिक शत्रुता आदि के मसलों के कारण यूरोपीय देशों में हथियारों की होड़ शुरू हो गई और सैनिक गतिविधियां तेज हो गईं।

बड़े पैमाने पर सैनिकों की भरती, घातक हथियारों का बड़े पैमाने पर निर्माण और युद्धों को महिमामंडित करनेवाले बौद्धिक प्रयासों ने पूरे यूरोप में जैसे युद्ध की मानसिता ही बना दी। ट्रीटस्की ने अपनी रचना ‘पॅलिटिक्स’ में शक्ति ही अधिकार है (Might is right) के सिद्धांत की सराहना की। फ्रांस में भी दार्शनिकों ने इसी प्रकार की सैन्यवादी भावना को प्रोत्साहित किया। इस प्रकार सैनिकवाद की उग्र भावना यूरोपीय राष्ट्रों को निरंतर युद्ध की ओर ढकेल रही थी।

इसके अलावा विभिन्न देशों के प्रकाशित होनेवाले समाचारपत्रों ने भी युद्ध को आरंभ होने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिससे जनता की भावनाएं भड़कती गई और स्थिति पर नियंत्रण करना असंभव हो गया। इस प्रकार युद्ध का एक कारण सभी बड़े देशों में समाचारपत्रों के द्वारा जनता की विचारधारा को दूषित करना था।

राष्ट्रवाद की भावना (Sense of Nationalism)

उपनिवेश और व्यापार को लेकर यूरोपीय देशों में टकराव तो था ही, कुछ आंतरिक घटक भी बहुत महत्वपूर्ण सिद्ध हुए। यूरोप में विभिन्न देशों में उग्र राष्ट्रवादी भावनाओं के प्रसार ने न केवल विश्व युद्ध को शुरू कराने में, बल्कि विश्व युद्ध के विस्तार में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

रूस ने स्लाव जाति पर आधारित एक ध्रुवीकरण आंदोलन चलाया, जिसमें तुर्की साम्राज्य के अनेक बाल्कन देशों के रूस में विलय की योजना थी और इसका नेतृत्व सर्बिया को सौंपा गया था। स्लाव जाति के लोग आस्ट्रिया-हंगरी में भी रहते थे, इसलिए उसे अधिक खतरा महसूस हुआ। अन्य यूरोपीय शक्तियां भी रूस के सर्वस्लाव आंदोलन से चिंतित हुईं।

रूस के सर्वस्लाव आंदोलन की तरह जर्मनी में भी ‘सर्वजर्मन’ आंदोलन चल रहा था, जिसका उद्देश्य यूरोप के विभिन्न राज्यों में रह रहे जर्मनों को एक महान् जर्मनी के अंतर्गत एकजुट करना था। राष्ट्रीयता की इस उग्र भावना के परिणामस्वरूप पूरे यूरोप में राजनीतिक अराजकता उत्पन्न हो गई थी।

प्रादेशिक समस्याएं (Regional Issues)

अल्सास और लारेन के प्रांत के कारण फ्रांस और जर्मनी में दीर्घकाल से शत्रुता चली आ रही थी। फ्रांस 1870-71 में जर्मनी के हाथों अपनी पराजय का बदला लेना चाहता था और साथ ही अपने खोये प्रदेशों-अल्सास और लारेन को वापस चाहता था। फ्रांस में अल्सेस और लारेन को लुई चौदहवें की विजय का प्रतीक माना जाता था। इसके अलावा, लारेन में लौहे की खानों के कारण उसका आर्थिक और औद्योगिक महत्व भी था।

अल्सेस और लारेन की तरह बोस्निया और हर्जेगोविना की समस्या भी थी। 1878 में बर्लिन की संधि के द्वारा इन दोनों प्रांतों को प्रशासन के लिए आस्ट्रिया के अधिकार में दिया गया था, किंतु आस्ट्रिया इन्हें अपने राज्य में नहीं मिला सकता था। किंतु आस्ट्रिया ने 1908 में बर्लिन संधि की अवहेलना करते हुए दोनों प्रदेशों को अपने राज्य में मिला लिया। बोस्निया और हर्जेगोविना में मुख्यतः स्लाव जाति रहती थी, इसलिए सर्बिया ने आस्ट्रिया के इस कार्य का विरोध किया। रूस अभी युद्ध के लिए तैयार नहीं था, नही ंतो विश्वयुद्ध इसी समय आरंभ हो जाता।

विलियम कैसर द्वितीय की महत्वाकांक्षा (Ambitions of William Kaiser II)

जर्मनी के शासक कैसर विलियम द्वितीय को प्रथम विश्वयुद्ध का जन्मदाता माना जाता है। जब तक जर्मनी में बिस्मार्क सत्ता में रहा, उसने सदैव फांस को पृथक् रखने और इंग्लैंड से प्रतिस्पर्धा न करने की नीति का पालन किया।
कैसर विलियम अति महत्वाकांक्षी था जो सैनिक शक्ति के बल पर विश्व-विजेता बनना चाहता था। उसकी थल सेना अत्यंत शक्तिशाली थी, किंतु इससे वह संतुष्ट नहीं था। वह अपनी जल सेना को भी थल सेना की तरह शक्तिशाली बनाना चाहता था। विलियम की इस नीति से इंग्लैंड का चिंतित होना स्वाभाविक था।

विलियम का कहना था कि ‘‘हमारा भविष्य समुद्र पर निर्भर है… मैं उस समय तक चैन नहीं लूंगा, जब तक कि मेरी जल सेना थल सेना के समान शक्तिशाली नहीं हो जाती है।’’ एक अन्य स्थान पर उसने कहा कि ‘‘हमको अधिक से अधिक नौसेना, थल सेना तथा बारूद की आवश्यकता है।’’ इतना ही नहीं, उसने मित्र राष्ट्रों को धमकाते हुए कहा था कि ‘‘यदि वे युद्ध चाहते हैं तो युद्ध प्रारंभ कर सकते हैं, हम युद्ध से डरते नहीं।’’ विलियम के इस प्रकार के भाषणों से यूरोप का वातावरण तनावपूर्ण हो गया था। विलियम की इतनी उग्र व महत्वाकांक्षी नीति से उसका इंग्लैंड से युद्ध होना स्वाभाविक था।

इंग्लैंड प्रारंभ में जर्मनी से मित्रता करने का इच्छुक था, किंतु कैसर विलियम द्वितीय ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार करते हुए कहा कि बर्लिन का रास्ता आस्ट्रिया होकर आता है। विलियम ने पूरब की ओर विस्तार करना भी आरंभ कर दिया और जब उसने बर्लिन-बगदाद रेलवे लाइन बनाने का प्रस्ताव किया तो इंग्लैंड ने जर्मनी का विरोध किया। इस प्रकार कैसर विलियम की नीतियों के कारण प्रथम विश्व युद्ध आरंभ हो गया।

यूरोप के बाहर और यूरोप के अंदर भी कई ऐसे अवसर आये जब 1914 के पहले ही विश्वयुद्ध (World War) की संभावना नजर आई। सबसे पहले फ्रांस और इंग्लैंड के बीच ही मोरक्को के संकट को लेकर टकराव हुआ, किंतु 1904 में एक संधि हो गई जिसके तहत मोरक्को में फ्रांस की सत्ता ब्रिटेन ने मान ली और बदले में फ्रांस ने ब्रिटेन को छूट दे दी।

इसके विरोध में जब जर्मनी ने मोरक्को में हस्तक्षेप किया, तो 1911 में फ्रांस ने उसे फ्रेंच कार्गो का एक बड़ा भाग देकर संतुष्ट कर दिया। 1908 में ही आस्ट्रिया ने बोस्निया और हर्जेगोविना को हड़प लिया, जिस पर सर्बिया की नजर थी। रूस ने सर्बिया के समर्थन में युद्ध की घोषणा कर दी, किंतु जर्मनी द्वारा आस्ट्रिया का समर्थन कर देने के कारण रूस आगे नहीं आया। इससे यूरोप में स्थिति तनावपूर्ण हो गई। बाल्कन प्रायद्वीप के तुर्की साम्राज्य से नवमुक्त देशों पर नियंत्रण के प्रयासों ने यूरोपीय देशों के बीच तनाव को और बढ़ा दिया।

विश्वयुद्ध का तात्कालिक कारण (Immediate Cause of World War)

प्रथम विश्वयुद्ध (First World War) का तात्कालिक कारण साराजेवो हत्याकांड था। आस्ट्रियन-हंगरी साम्राज्य का उत्तराधिकारी आर्चड्यूक फर्डिनेंड और उसकी पत्नी सोफी की 28 जनू 1914 को बोस्निया की राजधानी साराजेवो में एक सर्बियाई नागरिक गैवरिलो प्रिंसिप ने गोली मारकर हत्या कर दी। यह हत्याकांड ऑस्ट्रिया-हंगरी के बोस्निया पर नियंत्रण रखने के विरोध में हुआ था क्योंकि आस्ट्रिया ने 1908 में बोस्निया को हड़प लिया था जबकि सर्बिया बोस्निया और हर्जेगोविना पर कब्जा करना चाहता था।

गैवरिलो प्रिंसिप सर्व-स्लाव आंदोलन के एक आतंकवादी संगठन ब्लैक हैंड (Black Hand) का सक्रिय कार्यकर्ता था, इसलिए आस्ट्रिया ने इसे सर्बिया का षड्यंत्र मानते हुए हत्या के लिए सर्बिया की सरकार को उत्तरदायी ठहराया।

23 जुलाई 1914 को आस्ट्रिया ने सर्बिया को कठोर शर्तोंवाला एक पत्र भेजा और सर्बिया को इसे स्वीकार करने के लिए 48 घंटे का अल्टीमेटम दिया। सर्बिया के लिए यह बहुत अपमानजनक था, फिर भी उसने पत्र की कुछ शर्तों को स्वीकर कर लिया। किंतु आस्ट्रिया सर्बिया के उत्तर से संतुष्ट नहीं हुआ और उसने 28 जुलाई 1914 को सर्बिया के विरूद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। इंग्लैंड के विदेश मंत्री सर एडवर्ड ग्रे ने युद्ध को टालने का प्रयास किया, किंतु असफल रहा।

युद्धारंभ (The Beginning of the War)

सर्बिया के साथ गठबंधन के कारण रूस ने आस्ट्रिया के विरूद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। इसके प्रत्युत्तर में जर्मनी ने 1 अगस्त को रूस के विरूद्ध और 3 अगस्त को फ्रांस के विरूद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। इंग्लैंड अभी तक युद्ध में सम्म्लिित नहीं हुआ और युद्ध का टालने का प्रयास रक रहा था।

इंग्लैंड के विदेश मंत्री ग्रे ने फ्रांस के राजदूत से यह भी कह दिया था इंग्लैंड इस युद्ध में भाग नहीं लेगा। ग्रे ने फ्रांस व जर्मनी से बेल्जियम की तटस्थता स्वीकार करने हेतु आश्वासन प्राप्त करना चाहा। फ्रांस ने तो वचन दे दिया, किंतु जर्मनी ने कोई उत्तर नहीं दिया। जब जर्मन सेनाएं फ्रांस पर दबाव डालने के लिए 1839 की लंदन संधि का उल्लंघन करते हुए बेल्जियम में घुस गईं तो ब्रिटेन ने भी जर्मनी के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी। इस प्रकार प्रथम विश्वयुद्ध आरंभ हो गया।

प्रथम विश्वयुद्ध (First World War) को आरंभ करने के लिए दोनों पक्षों ने परस्पर एक दूसरे को उत्तरदायी ठहराया है। जर्मनी के चांसलर वैथमेन ने इंगलैंड की विदेश नीति को युद्ध का कारण बताया गया है। उसके अनुसार इंग्लैंड की वैदेशिक नीति के कारण ही प्रथम विश्व युद्ध (First world War) का आरंभ हुआ।

इसके विपरीत इंग्लैंड के वैदेशिक मंत्री ग्रे ने विश्व युद्ध (world War) के लिए जर्मनी को उत्तरदायी ठहराते हुए कहा है कि बिस्मार्क की मृत्यु के बाद उसके त्रि-राष्ट्र संघ के विरूद्ध हार्दिक मैत्री संघ की स्थापना हुई और दोनों दलों के मध्य प्रतिद्वंद्विता 1914 के विश्व युद्ध के अनेक कारणों में से एक कारण बना। इस युद्ध ने जर्मन साम्राज्य को छिन्न-भिन्न कर दिया, किंतु इस युद्ध के लिए किसी एक देश या संघ को उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता था और दोनों ही गुटों पर विश्व युद्ध आरंभ करने का उत्तरदायित्व स्वीकार किया जाना चाहिए।

युद्ध की घटनाएं (War Events)

1914 में जर्मनी ने बेल्जियम की तटस्थता भंग करते हुए फ्रांस की सीमाओं में प्रवेश किया। उसका उद्देश्य पेरिस पर अधिकार करना था, किंतु अपने इस उद्देश्य में वह अंत तक सफल नहीं हो सका। सुदूर पूर्व में जापान ने जर्मन उपनिवेशों की लालच में जर्मनी के विरूद्ध युद्ध की घोषणा कर दी।

1915 में अब तक तटस्थ रहने के बाद इटली भी मित्र राष्ट्रों के पक्ष में हो गया। दूसरी ओर रूस को पराजित करने में जर्मनी ने प्रारंभिक सफलता प्राप्त की और रूस की सेनाओं को उसने टनेनबर्ग के युद्ध में हरा दिया।
1915-16 में मित्र राष्ट्रों ने मेसोपोटामिया एवं गैलीपोली पर अधिकार करने का प्रयत्न किया, किंतु असफल रहे। इस वर्ष लड़े गये अन्य प्रमुख युद्ध आस्ट्रिया द्वारा सर्बिया पर अधिकार करने का प्रयत्न करना था, जर्मनी द्वारा फ्रांस के प्रमुख दुर्ग वर्डन पर विजय प्राप्त करने का प्रयत्न करना था, किंतु जर्मनी सफल नहीं हो सका।

थल युद्ध के साथ जल युद्ध भी चल रहा था। 1916 में जर्मनी एवं इंग्लैंड की नौ-सेनाओं के बीच जूटलैंड का प्रसिद्ध युद्ध हुआ, जिसमें दोनों पक्षों को अपार हानि हुई। 1916 तक आते-आते इंग्लैंड और फ्रांस दिवालिया-से हो गये। मजबूर होकर उन्हें अमरीका से हथियार और दूसरी वस्तुओं की खरीद के लिए बड़े पैमाने पर ऋण-पत्र जारी करने पड़े जिनका भुगतान त्रि-देशों की विजय के बाद ही संभव था।

अपने आर्थिक हितों की सुरक्षा के लिए अमरीका भी अप्रैल 1917 में मित्र देशों के समर्थन में युद्ध में कूद पड़ा। इसके लिए कुछ अमरीकी नागरिकों से लदे एक ब्रिटिश जहाज लूसीतानिया को जर्मन पनडुब्बियों द्वारा डुबोये जाने की घटना ने उत्प्रेरक का कार्य किया था।
इसके पहले मार्च 1917 में रूसी क्रांति हो चुकी थी और नई सत्ताधारी बोल्शेविक पार्टी ने जर्मनी को पराजित करने का प्रयत्न किया, किंतु असफल रहे और विवश होकर उन्हें ब्रिस्टलीवास्क की संधि करनी पड़ी।

युद्ध में रूसी संसाधान की अपार क्षति को देखते हुए अपने वादे के मुताबिक रूस ने शांति की आज्ञप्ति के द्वारा स्वयं को युद्ध से अलग कर लिया। मित्र राष्ट्रों को पश्चिमी मोर्चे पर एवं तुर्की के विरूद्ध भी सफलता प्राप्त नहीं हुई। प्रथम विश्व युद्ध में पहली बार वायुयानों का भी प्रयोग किया गया। लंदन शहर में हवाई बम-वर्षा से हजारों नागरिकों की मृत्यु हुई।

जुलाई 1918 में ब्रिटेन, फ्रांस और अमरीका ने संयुक्त अभियान शुरू किया। शीघ्र ही बुल्गारिया, तुर्की, आस्ट्रिया-हंगरी आदि ने आत्म-समर्पण कर दिया। आस्ट्रिया के पराजित होते ही 8 नवंबर 1918 को बर्लिन में क्रांति हो गई और विलियम कैसर द्वितीय को सपरिवार हालैंड भागना पड़ा।

जर्मनी में गणतंत्र की स्थापना हुई तथा मित्र राष्ट्रों से संधि-वार्ता शुरू हो गई। 11 नवंबर 1918 को नई सरकार ने युद्ध-विराम संधि पर हस्ताक्षर किये और इसके साथ ही प्रथम विश्व युद्ध समाप्त हो गया।

पेरिस में शांति सम्मेलन (Peace Conference in Paris)

प्रथम विश्वयुद्ध (First world War) की समाप्ति 11 नवंबर 1918 को हुई और 18 जून 1918 को पेरिस में शांति सम्मेलन का आयोजन किया गया, जिसमें 37 देशों के नेताओं ने भाग लिया। पेरिस शांति सम्मेलन में अमेरिकी राष्ट्रपति वुडरो विल्सन, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री लॉयड जॉर्ज तथा फ्रांस के प्रधानमंत्री जॉर्ज क्लीमांशू की महत्वपूर्ण भूमिका थी।
मित्र राष्ट्रों ने जर्मनी के साथ वर्साय की संधि (28 जून 1919), आस्ट्रिया के साथ सेंट जर्मेन की संधि (19 सितंबर 1919), बुल्गारिया के साथ न्यूली की संधि (27 अकटूबर 1919), हंगरी के साथ त्रिआनो की संधि (4 जून 1920) तथा तुर्की के साथ सेव्रीज की संधि 10 अगस्त 1920) की।
पराजित जर्मनी के साथ मित्र राष्ट्रों द्वारा की गई वर्साय की संधि एक आरोपित संधि थी जिसके द्वारा पूरे जर्मनी को पंगु बनाने की कोशिश की गई, जिसके कारण विश्व को 20 वर्ष बाद पुनः एक और विश्वयुद्ध की आग में झुलसना पड़ा।

प्रथम विश्वयुद्ध का परिणाम (Result of the First World war)

प्रथम विश्वयुद्ध (First world War) 28 जुलाई 1914 से 11 नवंबर, 1918 ई. तक लगभमग 4 वर्ष तक चलता और इसमें 37 देशों ने भाग लिया। यह विश्वयुद्ध इसके पूर्व के समस्त युद्धों से अधिक भयंकर एवं विनाशकारी था, जिसमें अपार धन-जन की हानि हुई। इस युद्ध में लगभग सोलह मिलियन लोग मारे गये, दोनों पक्षों ने करीब एक खरब छियासी अरब डालर खर्च किये और करीब एक खरब की संपत्ति नष्ट हुई।

प्रथम विश्वयुद्ध (First world War) ने विश्व की सामाजिक, आर्थिक राजनीतिक एवं सांस्कृतिक स्थिति पर गंभीर प्रभाव डाला। नवीनतम् हथियारों के प्रयोग के कारण देशों में आधुनिकतम् हथियारों के आविष्कार के लिए प्रतिस्पर्धा होने लगी। इस युद्ध के परिणामस्वरूप प्रजातंत्र एवं राष्ट्रीयता की भावना का विकास हुआ, जिससे विश्व के विभिन्न देशों में स्वतंत्रता-प्राप्ति के आंदोलनों में तेजी आई तथा आस्ट्रिया, पौलैंड, लाटविया, चेकोस्लोवाकिया आदि देशों में प्रजातंत्रातमक शासन-पद्धति की स्थापना हुई।

राष्ट्रीयता के आधार पर अनेक नवीन राज्यों का निर्माण हुआ। इटली और जर्मनी की सरकारें अपनी जनता को संतुष्ट करने में असफल रहीं जिसके कारण वहां नाजीवाद और फासीवाद का उदय हुआ। इस युद्ध के बाद इंग्लैंड और फ्रांस की शक्ति में वृद्धि हुई। अमरीका के राष्ट्रपति वुडरो विल्सन ने शांति-स्थापना के लिए चौदह सिद्धांतों का प्रतिपादन किया और विश्व में शांति स्थापना के लिए 1920 में एक अंतर्राष्ट्रीय संस्था राष्ट्रसंघ (लीग ऑफ नेशंस) की स्थापना की गई। इसी युद्ध के दौरान रूस में साम्यवादी सरकार की स्थापना हुई तथा विश्व क्षितिज पर अमरीका का राजनीतिक प्रभाव बढ़ा।

1 thought on “प्रथम विश्वयुद्ध : कारण और परिणाम (First World War : Causes and Consequences)

  1. बहुत ही शानदार जानकारी विस्तार से दी आपने बहुत बहुत धन्यवाद

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