त्रिपुरी संकट से क्रिप्स मिशन तक (From Tripuri Crisis to Cripps Mission)

महात्मा गांधी के आशीर्वाद से सुभाषचंद्र बोस फरवरी 1938 के हरिपुरा (गुजरात) कांग्रेस में सर्वसम्मति से कांग्रेस का अध्यक्ष चुने गये थे।
इस अवसर का लाभ उठाते हुए सुभाषचंद्र बोस ने अपने अध्यक्षीय भाषण में संघीय एवं समाजवादी आधार पर प्रशासित स्वतंत्र एवं विकासशील भारत का प्रारूप कांग्रेस के प्रतिनिधियों के सामने रखा था।
सुभाष के नेतृत्व में हरिपुरा कांग्रेस संपन्न तो हो गया, किंतु इसके बाद से ही कांग्रेस में सैद्धांतिक और राजनीतिक मतभेद सतह पर दिखाई देने लगे।
जब राष्ट्रीय संग्राम को तत्काल शुरू करने और ब्रिटेन से किसी भी हाल में कोई समझौता न करने को लेकर सुभाष ने अपनी मुहिम शुरू की, तो स्थिति और बिगड़ गई।
सुभाष ने राष्ट्रीय संग्राम के लिए लोगों को तैयार करने के उद्देश्य से भारत भर में प्रचार कार्यक्रम चलाया, ताकि यूरोप में युद्ध के साथ ही भारत में राष्ट्रीय संग्राम शुरू किया जा सके।
दरअसल 1938 में ही सुभाष को लगने लगा था कि यूरोपीय युद्ध निश्चित है। लेकिन गांधी और नेहरू उनकी इस बात से सहमत नहीं थे।
यद्यपि गांधी की कार्य-पद्धति और उनकी रणनीति को लेकर सुभाष की असहमति सालों-साल बनी रही और एक समय तो नेहरू ने भी इसमें उनका साथ दिया था, लेकिन इस समय तक गांधी और नेहरू के बीच राजनीतिक गठजोड़ बनने लगा था।
इसी बीच सुभाष ने गांधी के स्पष्ट विरोध के बावजूद 1939 में कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए फिर से चुनाव लड़ने का फैसला किया।
21 जनवरी 1939 को अपनी उम्मीदवारी घोषित करते हुए सुभाषचंद्र बोस ने कहा कि वे नये विचारों और नई विचारधाराओं का प्रतिनिधित्व करते हैं तथा उन समस्याओं और उन कार्यक्रमों का भी, जिनका आर्विभाव भारत में साम्राज्यवाद-विरोधी संघर्ष के क्रमशः तेज होने से हुआ है।
सुभाषचंद्र बोस का कहना था कि ‘कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव विभिन्न उम्मीदवारों द्वारा विभिन्न समस्याओं और कार्यक्रमों के आधार पर’ लड़े जाने चाहिए।
सुभाषचंद्र बोस ने कांग्रेसजनों से अपील की कि वे एक ऐसे अध्यक्ष का चुनाव करें, जो वामपंथी होने के साथ-साथ संघवाद का विरोधी भी हो।
यह कांग्रेस पर गांधी के अधिकार एवं पकड़ को खुली चुनौती थी, जो इससे पहले सोची भी नहीं जा सकती थी।
सुभाषचंद्र बोस के जवाब में 24 फरवरी को सरदार पटेल, राजेंद्र प्रसाद, जे.बी. कृपलानी तथा कांग्रेस कार्यसमिति के चार अन्य सदस्यों ने यह बयान जारी किया कि कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव के सिलसिले में विचारधाराओं, कार्यक्रमों, नीतियों आदि की बात करना बेकार है, क्योंकि इनका निर्णय कांग्रेस की विभिन्न समितियाँ करती हैं और कांग्रेस अध्यक्ष की हैसियत एक ऐसे संवैधानिक प्रमुख जैसी होती है, जो राष्ट्र की एकता को प्रतिबिंबित करता है।
कांग्रेसी नेताओं ने गांधी के आशीर्वाद से पट्टाभि सीतारमैया को अपना उम्मीदवार बनाया।
एक प्रकार यह चुनाव वैचारिक मुद्दों पर दक्षिण बनाम वाम, संघ-समर्थन बनाम संघ-विरोध, मंत्रिमंडल-समर्थन बनाम मंत्रिमंडल-विरोध पर लड़ा गया।
29 जनवरी को सुभाषबाबू 1377 के मुकाबले 1580 मतों से चुनाव जीत गये। गांधीजी ने इसे अपनी हार स्वीकार की और कार्यकारिणी समिति के 15 में से 12 सदस्यों ने तुरंत इस्तीफा दे दिया।
सुभाष के अध्यक्ष निर्वाचित होने से कांग्रेस का आंतरिक संकट और गहरा हो गया। सुभाषचंद्र बोस सरदार पटेल और कांग्रेस के अन्य नेताओं को लगातार दक्षिणपंथी करार देते आ रहे थे।
सुभाषचंद्र बोस का स्पष्ट आरोप था कि ‘‘ये नेता सरकार से समझौते की कोशिश करते आ रहे थे और वे नहीं चाहते थे कि कोई वामपंथी कांग्रेस का अध्यक्ष बने, क्योंकि वह इस समझौते में बाधक बन सकता था और वार्ताओं के मार्ग में रोड़े अटका सकता है।’’
बाद में अपनी आत्मकथा के दूसरे हिस्से में सुभाषचंद्र बोस ने लिखा कि कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में उन्होंने पूरी कोशिश की कि कांग्रेस समझौतावाद की राह पर न चले और इससे गांधीवादियों को परेशानी होती थी।
सुभाष के ही शब्दों में, ‘‘गांधीवादी नहीं चाहते थे कि मंत्रिपदीय और संसदीय काम में बाधा आये और वे उस समय किसी राष्ट्रीय संघर्ष के विरुद्ध भी थे।’’
कांग्रेसी नेता अपने को समझौतावादी कहे जाने से खिन्न थे। सुभाष के अध्यक्ष चुन लिये जाने पर उन्हें लग रहा था कि वे ऐसे अध्यक्ष के साथ काम नहीं कर पायेंगे जिसने उनके राष्ट्रप्रेम पर लांक्षन लगाया हो।
गांधीजी ने बयान दिया: ‘‘मैं इस जीत से उल्लसित हूँ क्योंकि सुभाष बाबू जिन्हें दक्षिणपंथी कहते हैं, उनकी मूक सहमति से अध्यक्ष बनने के बजाय वे प्रतिद्वंद्वितापूर्ण चुनाव जीतकर अध्यक्ष बने हैं। इससे उन्हें अपने विचारों का मंत्रिमंडल बनाने और बिना किसी अवरोध के अपना कार्यक्रम लागू करने में सुविधा होगी।’’
जवाहरलाल नेहरू यद्यपि बोस से सहमत नहीं थे, किंतु वे सीधे टकराव से बचना चाहते थे। चुनाव से पहले उन्होंने कहा भी था कि झगड़ा न तो सिद्धांतों और कार्यक्रमों पर है, और न वामपंथ और दक्षिणपंथ के बीच।
पं. नेहरू ने 14 फरवरी 1939 को सुभाष को साफ-साफ लिखा: ‘‘मैं नहीं जानता किसे आप वामपंथी मानते हैं और किसे दक्षिणपंथी। अध्यक्षीय चुनाव के दौरान आपने इन शब्दों का जिस तरह इस्तेमाल किया, उससे लगता है कि गांधीजी और कार्यसमिति के वे लोग, जो उनके साथ हैं, दक्षिणपंथी हैं और उनके विरोधी चाहे वे जिस जगह भी हों, वामपंथी हैं। मुझे लगता है कि चीजों को इस तरह देखना गलत है।……. कड़ी भाषा का इस्तेमाल और कांग्रेस के पुराने नेतृत्व की आलोचना करने और उस पर प्रहार करने की क्षमता राजनीति में वामपंथ की कसौटी नहीं है।…….मेरा खयाल है कि ‘वाम’ और ‘दक्षिण’ शब्दों का इस्तेमाल आमतौर पर पूर्णतः गलत और भ्रामक है। यदि हम इन शब्दों का प्रयोग करने के बजाय नीतियों पर बातचीत करें, तो कहीं बेहतर होगा। बहुत खुशी की बात है कि आप संघवाद-विरोधी नीतियों की वकालत करते हैं। मेरा खयाल है कि कार्यसमिति के अधिकांश नेताओं की नीति भी यही है।’’
दरअसल गांधी और सुभाषचंद्र बोस के बीच विवाद का मुख्य कारण कांग्रेस की रणनीतियों को लेकर था।
सुभाष बाबू का मानना था कि कांग्रेस तुरंत संघर्ष करने की स्थिति़ में है और जनता उसका साथ देने को तैयार है।
त्रिपुरी कांग्रेस के अध्यक्षीय भाषण में सुभाषचंद्र बोस ने इस कार्यक्रम की वकालत की कि ब्रिटिश सरकार को छः महीने की मोहलत दी जाए और इस अवधि में अगर भारत को आजाद नहीं किया, तो सामूहिक सविनय अवज्ञा आंदोलन छेड़ दिया जाये।
गांधीजी का मानना था कि आजादी के लिए संघर्ष तो छेड़ना होगा, लेकिन उन्हें लगता था कि अभी चेतावनी देने का समय नहीं आया है, क्योंकि कांग्रेस और जनता, दोनों ही अभी संघर्ष के लिए तैयार नहीं हैं।

5 मई 1939 को एक इंटरव्यू में गांधी ने अपना नजरिया स्पष्ट करते हुए कहा कि ‘‘वह (सुभाष बोस) मानते हैं कि लड़ने के लिए हमारे पास पूरी ताकत है। मैं उनके विचारों के पूर्णतः विरुद्ध हूँ।……सांप्रदायिक कलह की कोई सीमा नहीं है।……बिहार के किसानों पर हमारी उतनी पकड़ नहीं है जितनी पहले थी।…..मजदूरों और किसानों के बिना हम कोई चीज कैसे कर सकते हैं? देश तो उन्हीं का है। सरकार को चेतावनी देने लायक शक्ति मुझमें नहीं है। इसमें सिर्फ होगा यह कि देश हास्यास्पद हो जायेगा।’’
वास्तव में गांधी जानते थे कि भ्रष्टाचार और अनुशासनहीनता ने कांग्रेस संगठन की संघर्षशीलता को दूषित कर दिया है।
1938 में और 1939 के शुरू में उन्होंने बार-बार और सार्वजनिक रूप से कांग्रेसजनों की आपसी उठापटक, दलीय चुनावों के समय फर्जी सदस्यता और जाली मतदान, कांग्रेस समितियों पर कब्जा करने की प्रवृत्ति तथा दल में अनुशासन के हृास के मुद्दे उठाये थे।
गांधीजी ने लिखा था: ‘‘कांग्रेस में फैले हुए भ्रष्टाचार से मैं इतना उकता गया हूँ कि अगर भ्रष्टाचार को खत्म नहीं किया जा सकता, तो कांग्रेस को ही खत्म कर देने में मुझे कोई हिचक नहीं होगी।’’

बाद में, जब कांग्रेस मत्रिमंडलों ने नवंबर 1939 में इस्तीफा दे दिया, तो गांधीजी ने लिखा कि ‘‘जो हुआ है वह (हमारे) उद्देश्य के लिए सर्वोत्तम है। मैं जानता हूँ कि यह एक कड़वा घूँट है, लेकिन इसकी जरूरत थी। इससे शरीर सभी दूषित कीटाणुओं से मुक्त हो जायेगा।’’
कांग्रेस का आंतरिक टकराव त्रिपुरी अधिवेशन (8 मार्च 1939) में अपने चरम पर पहुँच गया।
इससे पहले कांग्रेस के नवनिर्वाचित अध्यक्ष ही अगली कार्यकारिणी का गठन करते रहे थे, लेकिन 1939 का अध्यक्षीय चुनाव हारने के बाद कांग्रेस के दक्षिणपंथी गांधीवादी गुट ने त्रिपुरी कांग्रेस अधिवेशन में बोस को अपनी कार्यकारिणी चुनने-संबंधी अधिकार पर अंकुश लगाने की कोशिश की। गोविंदवल्लभ पंत ने इस आशय का एक प्रस्ताव रखा, जिसे ‘पंत प्रस्ताव’ के नाम से जाना जाता है।
पंत प्रस्ताव में गांधी के नेतृत्व, पुरानी कार्यसमिति और 20 वर्षों से चली आ रही कांग्रेस की नीतियों में पूरी निष्ठा व्यक्त की गई और सुभाष बाबू से कहा गया कि वे गांधीजी की इच्छा के अनुसार ही अपनी कार्यकारिणी का गठन करें।
बोस समर्थकों ने पंत प्रस्ताव पर अनेक संशोधन और सुझाव रखे, लेकिन अधिकतर प्रतिनिधियों ने उसे स्वीकार नहीं किया।
कांग्रेस का वामपंथी गुट इस सवाल पर गंभीर रूप से बँट गया।
जयप्रकाश नारायण के नेतृत्ववाली कांसपा ने भी, जो सबसे बड़ा वामपंथी घड़ा था, पंत-प्रस्ताव के खिलाफ वोट नहीं डाला।
बहुतों ने इसे बोस के साथ विश्वासघात बताया है, लेकिन कुछ लोगों का मानना है कि सुभाष को त्रिपुरी में और उसके बाद समाजवादियों और कम्युनिस्टों का सहयोग इसलिए नहीं मिला क्योंकि ये लोग किसी भी कीमत पर राष्ट्रीय एकता को बचाना चाहते थे।’
त्रिपुरी अधिवेशन के बाद भारत की कम्युनिस्ट पार्टी ने वक्तव्य दिया: ‘‘साम्राज्यवाद-विरोधी संघर्ष के हितों की माँग एक पक्ष का ऐकांतिक नेतृत्व नहीं, बल्कि गांधीजी के मार्गदर्शन में संयुक्त नेतृत्व है।’’

कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव पी.सी. जोशी ने अप्रैल 1939 में लिखा: ‘‘आज सबसे बड़ा वर्ग-संघर्ष हमारा राष्ट्रीय संघर्ष है और कांग्रेस इस संघर्ष का मुख्य औजार है।’’
अंततः पंत प्रस्ताव भारी बहुमत से पास हो गया और अध्यक्ष पद का चुनाव जीतने के बावजूद सुभाष त्रिपुरी में गांधीवादी दक्षिणपंथियों से मात खा गये।
इस प्रकार पंत प्रस्ताव के जरिये कांग्रेस की राजनीति पर गांधी का वर्चस्व बना रहा।
सुभाषचंद्र बोस अजीब संकट में थे, क्योंकि उन्हें पता था कि वे कांग्रेस को अपने ढंग से नहीं चला सकते।
सुभाषचंद्र बोस ने स्थिति को सुधारने के लिए 31 मार्च 1939 के गांधीजी को पत्र लिखकर अपील की: ’’यदि हमारे रास्ते अलग-अलग हुए, तो गृहयुद्ध छिड़ जायेगा। इसका नतीजा चाहे और जो कुछ हो, पर इससे कांग्रेस आने वाले लंबे समय के लिए कमजोर हो जायेगी और इसका लाभ ब्रिटिश सरकार उठा ले जायेगी। कांग्रेस तथा देश को इस संकट से उबारना आप पर है।…..इसमें कोई शक नहीं कि आज कांग्रेस के दोनों महत्त्वपूर्ण दलों या धड़ों के बीच गहरी खाई है, लेकिन यह खाई आपके ही द्वारा पाटी जा सकती है।’’
वास्तव में सुभाषबाबू चाहते थे कि आने वाले संघर्ष का नेतृत्व गांधी करें, लेकिन संघर्ष की रणनीति सुभाष और वामपंथी समूह तय करेंगे। गांधी को यह मंजूर नहीं था।
गांधीजी ने बोस को लिखा: ‘‘अगर आपका आकलन सही है तो मैं पिछड़ चुका हूँ और सत्याग्रह के सेनापति के रूप में मेरी भूमिका खत्म हो चुकी है।’’
गांधी और सुभाष के बीच कांग्रेस कार्यकारिणी के गठन को लेकर समझौते की कोशिशें कुछ समय तक चलीं, लेकिन अंततः असफल रहीं।
बोस के सामने इस्तीफा देने के सिवा कोई चारा नहीं था। एक ओर तो वे चाहते थे कि कार्यसमिति में नये वामपंथी विचारों के लोग हों और दूसरी ओर वे अपनी कार्यसमिति की घोषणा करने को तैयार नहीं थे।
अंततः 29 अप्रैल 1939 में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की बैठक में सुभाष ने कांग्रेस के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया और तुरंत उनकी जगह राजेंद्र प्रसाद को अध्यक्ष चुन लिया गया।
सुभाष के इस्तीफे की खबर सुनकर रवींद्रनाथ ठाकुर ने उनके शिष्टता और धैर्य की सराहना की।
जब 2 मई 1939 को नये कांग्रेस अध्यक्ष ने अपनी कार्यकारिणी के सदस्यों का नाम घोषित किया, तो उसमें सुभाष की जगह डा. प्रफुल्लचंद्र घोष शामिल कर लिये गये, लेकिन नेहरू की जगह खाली रखी गई थी।
यह अकारण नहीं है कि गांधी ने कभी सुभाष को अपराजेय बताया था।
कांग्रेस के अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने के कुछ ही दिन बाद 3 मई 1939 को सुभाषचंद्र बोस और उनके समर्थकों ने कांगे्रस के अंदर ही एक नये दल ‘फारवर्ड ब्लाक’ की स्थापना की, ताकि सभी वामपंथी शक्तियों को एक छत के नीचे लाया जा सके।
किंतु बंगाल प्रांत से बाहर फारवर्ड ब्लाक को कोई समर्थन नहीं मिला।
सुभाषबाबू ने प्रांतीय कांग्रेस समितियों की अग्रिम अनुमति के बिना अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के एक प्रस्ताव के विरुद्ध 9 जुलाई को ‘देशव्यापी प्रतिवाद दिवस’ मनाने का आह्वान किया, इसलिए गांधी के इशारे पर कांग्रेस कार्यसमिति ने उनको अनुशासनहीनता का दंड दिया।
अगस्त 1939 में सुभाषचंद्र बोस को कांग्रेस के सभी पदों से, और खासकर बंगाल प्रांतीय कांग्रेस समिति के अध्यक्ष पद से हटा दिया गया और आदेश दिया गया कि वे अगले तीन साल तक पार्टी के किसी भी पद पर नहीं रह सकते।
बाद में, गांधी ने जनवरी 1940 में चाल्र्स सी.एफ. एंड्रयूज के नाम एक पत्र में सुभाष को ‘मेरा बेटा’ कहा, लेकिन परिवार का एक ‘बिगड़ैल बच्चा’ भी बताया, जिसको उसके भले के लिए ही एक सबक सिखाना जरूरी था।
कांग्रेस से निष्कासित होने तथा वामपंथी शक्तियों के बीच एकता कायम करने की कोशिशों में नाकाम रहने के बाद सुभाष को लगने लगा कि भारत में रहते हुए स्वतंत्रता-संघर्ष को जारी रखने के लिए उनके पास सीमित विकल्प रह गये हैं।
सुभाष सामने आनेवाले मौकों का फायदा उठाते हुए वह भारत में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ जंग छेड़ने के लिए बाहर से मदद लेने पर भी विचार करने लगे।

द्वितीय विश्वयुद्ध और भारतीय राष्ट्रवाद

सितंबर 1939 में दूसरा विश्वयुद्ध आरंभ हो गया जब जर्मन प्रसारवाद की हिटलर की नीति के अनुसार नाजी जर्मनी ने पौलैंड पर आक्रमण कर दिया।
इसके पहले मार्च 1938 में वह आस्ट्रिया और मार्च 1939 में चेकोस्लोवाकिया पर अधिकार कर चुका था।
ब्रिटेन और फ्रांस ने हिटलर को खुश करने के लिए सब कुछ किया था, किंतु अब वे पौलैंड की सहायता करने को बाध्य हो गये।
03 सितंबर 1939 को भारत के तत्कालीन वायसराय लार्ड लिनलिथगो ने यह घोषणा की कि भारत भी द्वितीय विश्वयुद्ध में मित्रराष्ट्रों की ओर से शामिल है।
घोषणा से पूर्व वायसराय ने किसी भी राजनैतिक दल से परामर्श नहीं किया, जबकि उस समय देश के ग्यारह प्रांतों में से आठ प्रांतों में कांग्रेस के मंत्रिमंडल थे।
कांग्रेस ने द्वितीय विश्वयुद्ध के संबंध में जो नीति अपनाई, उसका प्रभाव दुनिया के अनेक पराधीन देशों पर भी पड़ा।
कांग्रेस को फासीवादी हमले के शिकार लोगों से पूरी सहानुभूति थी और युद्ध छिड़ने पर वह फासीवाद-विरोधी संघर्ष में लोकतांत्रिक शक्तियों की सहायता करने को तैयार भी थी।
गांधी ने वायसराय से कहा कि ब्रिटिश संसद और वेस्टमिनिस्टर एबे के संभावित विध्वंस की कल्पना से ही वे विचलित हो उठते हैं और वे पूरी तरह ब्रिटेन तथा मित्रराष्ट्रों के उद्देश्य के साथ हैं।
कांग्रेस के अधिकांश नेताओं का सवाल था कि एक गुलाम राष्ट्र दूसरे देशों के मुक्ति-संघर्ष में कैसे साथ दे सकता है?
ब्रिटेन को युद्ध में समर्थन देने के मुद्दे पर विचार करने के लिए वर्धा में 10-14 सितंबर 1939 को कांग्रेस कार्यसमिति की एक बैठक बुलाई गई, जिसमें सुभाष बोस, आचार्य नरेंद्रदेव और जयप्रकाश नारायण भी आमंत्रित किये गये।
वर्धा बैठक में गहरे मतभेद उत्पन्न हो गये। समाजवादी और सुभाषचंद्र बोस जैसे नेता युद्ध-प्रयासों के विरुद्ध कार्रवाई के लिए बेचैन हो रहे थे।
सुभाष का तर्क था कि चूंकि यह साम्राज्यवादी युद्ध है और दोनों ही पक्ष अपने-अपने औपनिवेशिक स्वार्थों की रक्षा के लिए लड़ रहे हैं, अतः किसी भी एक पक्ष का समर्थन नहीं किया जा सकता। कांग्रेस को चाहिए कि स्थिति का लाभ उठाकर वह भारत की स्वतंत्रता के लिए तुरंत सविनय अवज्ञा आंदोलन छेड़ दे।
दूसरी ओर राजगोपालाचारी जैसे संसदीय राजनीति में विश्वास करनेवाले नेता चाहते थे कि यदि ब्रिटिश सरकार भारत के पूर्ण स्वतंत्र होने के अधिकार को स्वीकार कर ले और एक अस्थायी सरकार बना दे, तो कांग्रेस युद्ध में ब्रिटेन को सहयोग देने की घोषणा कर दे।
गांधी दुविधा में थे, एक समय तो वे मानते थे कि यह युद्ध उनके अहिंसा के सिद्धांत के विरुद्ध था; फिर उन्होंने वायसराय से युद्ध-प्रयासों में पूरा समर्थन देने का वादा किया, क्योंकि उन्हें लगा कि मित्रराष्ट्रों का पक्ष न्यायसंगत है।
गांधीजी का कहना था कि पश्चिम यूरोप के लोकतांत्रिक राज्यों और हिटलर का नेतृत्व स्वीकार करनेवाले निरंकुशतावादी राज्यों में साफ फर्क है।
जवाहरलाल नेहरू फासीवाद-विरोधी युद्ध के समर्थन की आवश्यकता के बारे में सजग थे।
नेहरू का मानना था कि फ्रांस, ब्रिटेन और पोलैंड का पक्ष न्यायोचित है, लेकिन फ्रांस और ब्रिटेन साम्राज्यवादी नीतियोंवाले देश हैं और द्वितीय विश्वयुद्ध, प्रथम विश्वयुद्ध के पश्चात् पूँजीवाद के गहराते हुए अंतर्विरोधों का परिणाम है। इसलिए भारत को स्वतंत्र होने से पूर्व न तो युद्ध में शामिल होना चाहिए और न ही ब्रिटेन की परेशानियों का लाभ उठाकर सविनय अवज्ञा आंदोलन छेड़ना चाहिए।
गांधीजी को लगा कि सरदार पटेल और राजेंद्र प्रसाद जैसे घनिष्ठ सहयोगी भी उनके साथ नहीं हैं तो उन्होंने नेहरू की राय का समर्थन करने का फैसला किया।
कांग्रेस कार्यसमिति ने प्रस्ताव पारितकर पोलैंड पर नाजी हमले और फासीवाद तथा नाजीवाद की निंदा की, लेकिन प्रस्ताव में यह भी घोषित किया कि भारत किसी ऐसे युद्ध में शामिल नहीं हो सकता, जो प्रत्यक्षतः लोकतांत्रिक स्वतंत्रता के लिए लड़ा जा रहा हो, जबकि खुद उसे ही स्वतंत्रता से वंचित रखा जा रहा हो।
यदि ब्रिटेन प्रजातांत्रिक मूल्यों और स्वाधीनता की रक्षा के लिए युद्ध कर रहा है, तो उसे पहले भारत को स्वाधीनता प्रदानकर यह साबित करना चाहिए।
जन-संघर्ष छेड़ने पर कोई फैसला तो नहीं किया गया, लेकिन यह चेतावनी जरूर दी गई कि उसे ज्यादा समय तक टाला नहीं जा सकता।
नेहरू के शब्दों में ‘‘कांग्रेस का नेतृत्व ब्रिटिश सरकार और वायसराय को पूरा मौका देना चाहता था।’’

सरकार की गुप्त कार्य-नीति

ब्रिटिश सरकार की प्रतिक्रिया आंतरिक तौर पर नकारात्मक थी। वायसराय लिनलिथगो ने अपने 17 अक्टूबर 1939 के वक्तव्य में कांग्रेस की माँगों को मानने से इनकार कर दिया और धार्मिक अल्पसंख्यकों तथा देसी रियासतों को कांग्रेस के विरुद्ध खड़ा करने का प्रयास किया।
वायसराय ने घोषणा की कि ‘‘युद्ध के पश्चात जितना शीघ्र हो सकेगा, वेस्टमिनिस्टर जैसा प्रादेशिक स्वशासन देना अंग्रेजी सरकार का उद्देश्य होगा।’’
लिनलिथगो ने भविष्य के लिए यह वादा किया कि युद्धोपरांत ब्रिटिश सरकार, भारत के कई दलों, समुदायों और हितों का प्रतिनिधित्व करनेवाली शक्तियों तथा भारतीय राजाओं से इस मुद्दे पर विचार-विमर्श करेगी कि 1935 के भारत सरकार अधिनियम में किस प्रकार के संशोधन किये जाएं। आवश्यकता पड़ने पर परामर्श लेने के लिए सरकार, एक परामर्श समिति का गठन करेगी।
वास्तव में लिनलिथगो का वक्तव्य उस सामान्य ब्रिटिश योजना का हिस्सा था जिसके अनुसार युद्ध से फायदा उठाकर खोये हुए उस आधार को पुनः प्राप्त करना था, जो कि कांग्रेस के प्रयासों के कारण सरकार के हाथ से निकल गया था।
सरकार की नीति थी कि कांग्रेस को सरकार के साथ विवादों में उलझा दिया जाए, तत्पश्चात् उत्पन्न परिस्थितियों का उपयोग सत्ता को और स्थायी बनाने में किया जाये।
युद्ध की घोषणा के उपरांत 1935 के अधिनियम में संशोधन कर केंद्र ने राज्य के विषयों में हस्तक्षेप करने के असाधारण अधिकार प्राप्त कर लिया।
जिस दिन युद्ध की घोषणा की गई, उसी दिन नागरिक अधिकारों की स्वतंत्रता के दमन हेतु सरकार ने भारतीय सुरक्षा अध्यादेश देश पर थोप दिया था।
मई 1940 में क्रांतिकारी आंदोलन से संबंधित एक अति गुप्त अध्यादेश तैयार किया गया, ताकि कांग्रेस द्वारा प्रारंभ किये जाने वाले किसी भी आंदोलन को आसानी से दबाया जा सके।
भारत सरकार की दमनकारी एवं भेदभावमूलक नीतियों का इंग्लैंड के प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल और भारत सचिव जेटलैंड ने पूर्णरूपेण समर्थन किया।
जेटलैंड ने तो कांग्रेस को विशुद्ध हिंदूवादी संगठन तक घोषित कर दिया।
वास्तव में ब्रिटिश सरकार, युद्ध के पूर्व या पश्चात् अपनी उपनिवेशवादी पकड़ में किसी भी प्रकार की ढील नहीं देना चाहती और कांग्रेस से शत्रुतापूर्ण व्यवहार करने की मंशा रखती है।
सरकार द्वारा भारतीय जनमानस की उपेक्षा तथा कांग्रेस के प्रति उसके शत्रुतापूर्ण रवैये की गांधी ने कड़ी आलोचना की।
गांधी ने कहा कि ‘‘सरकार की भारत-संबंधी घोषणा यह दर्शाती है कि ब्रिटेन का वश चले तो वह भारत में लोकतंत्र कभी न आने दे।’’
अल्पसंख्यक तथा विशिष्ट वर्ग के हितों की चर्चा करते हुए गांधी ने कहा कि कांग्रेस प्रत्येक अल्पसंख्यक तथा विशिष्ट वर्ग के हितों की रक्षा करेगी, बशर्ते उनके दावों का देश की स्वाधीनता के मुद्दे से कोई टकराव नहीं होना चाहिए।’’
23 अक्टूबर 1939 को कांग्रेस कार्यसमिति ने वायसराय के साम्राज्यवादी वक्तव्य को अस्वीकार कर दिया और युद्ध का समर्थन न करने का निर्णय किया।
कार्यसमिति के निर्देश पर साम्राज्यवादी घोषणा के विरुद्ध कांग्रेस की सभी प्रांतीय सरकारों ने अक्टूबर 1939 में इस्तीफा दे दिया।
जिन्ना और लीग ने 22 दिसंबर 1939 को ‘मुक्ति-दिवस’ के रूप में मनाया, क्योंकि देश को कांग्रेस से छुटकारा मिल गया था।
डा. भीमराव आंबेडकर ने भी उनका समर्थन किया और ब्रिटेन की सरकार ने इस दरार से लाभ उठाने की सोची।
लिनलिथगो की (17 अक्टूबर की) घोषणा के पश्चात् तुरंत जन-सत्याग्रह छेड़ने के प्रश्न पर एक बार पुनः बहस प्रारंभ हो गई।
गांधीजी एवं उनके समर्थक तुरंत आंदोलन प्रारंभ करने के पक्ष में नहीं थे, क्योंकि उनका मानना था कि संगठनात्मक तौर पर कांग्रेस की स्थिति अच्छी नहीं है और तत्कालीन परिस्थितियाँ जन सत्याग्रह के प्रतिकूल हैं।
जनता अभी किसी भी प्रकार के संघर्ष के लिए तैयार नहीं है और सांप्रदायिक संवेदनशीलता एवं हिंदू-मुस्लिम एकता के अभाव में सांप्रदायिक दंगे भड़क सकते हैं। इसलिए आवश्यक है कि सांगठनिक रूप से कांग्रेस को तैयार किया जाए और सरकार से तब तक विचार-विमर्श किया जाए, जब तक यह सार्वजनिक न हो जाए कि विचार-विमर्श से समस्या का समाधान नहीं हो सकता और इसके लिए उपनिवेशिक शासन जिम्मेदार है। इसके पश्चात् ही आंदोलन प्रारंभ किया जाना चाहिए।
सुभाषचंद्र बोस और उनके फाॅरवर्ड ब्लाक, कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी, कम्युनिस्ट पार्टी जैसे वामपंथी समूहों का तर्क था कि यह युद्ध एक साम्राज्यवादी युद्ध है और यही उचित समय है कि ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध चैतरफा युद्ध छेड़कर स्वतंत्रता हासिल कर ली जाये।
वामपंथियों का विश्वास था कि जनता संघर्ष के लिए पूरी तरह तैयार है और आंदोलन प्रारंभ किये जाने की प्रतीक्षा कर रही है।
वामपंथियों ने स्वीकार किया कि कांग्रेस में संगठन की कमजोरी तथा सांप्रदायिक कटुता जैसी समस्याएँ अवश्य हैं, किंतु जनसंघर्ष के प्रवाह में ये सारी समस्याएँ बह जायेंगी।
वामपंथियों का तर्क था कि संगठन संघर्ष के पहले तैयार नहीं किया जाता, बल्कि इसका निर्माण संघर्ष प्रारंभ होने के पश्चात् होता है। फलतः कांग्रेस को अतिशीघ्र आंदोलन प्रारंभ कर देना चाहिए।
सुभाष बोस चाहते थे कि यदि कांग्रेस शीघ्र ही सत्याग्रह शुरू करने में आनाकानी करती है, तो वामपंथी उससे नाता तोड़ लें और समानांतर कांग्रेस का गठन कर अपनी ओर से आंदोलन प्रारंभ कर दें।
बोस को पूरा विश्वास था कि आम जनता के साथ-साथ कांग्रेस के अधिकांश सदस्य इस मुद्दे पर उनका साथ देंगे।
इसके विपरीत कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी और कम्युनिस्ट पार्टी का मानना था कि गांधीजी और कांग्रेस के नेतत्व के बिना कोई भी संघर्ष शुरू नहीं किया जा सकता। इसलिए कांग्रेस को तोड़ने और राष्ट्रीय संयुक्त मोर्चे में दरार पैदा करने के बजाय कोशिश यह होनी चाहिए कि संघर्ष शुरू करने के लिए उसके नेतृत्व को राजी किया जाए और उस पर दबाव डाला जाये।
जवाहरलाल नेहरू का झुकाव दोनों पक्षों की ओर था। एक ओर उन्हें मित्रराष्ट्रों का साम्राज्यवादी चरित्र स्पष्ट दिख रहा था और दूसरी ओर वे ऐसा कोई कदम नहीं उठाना चाहते थे, जिससे यूरोप में नाजियों और हिटलर की जीत आसान हो जाये।
एक तरफ नेहरू का पूरा व्यक्तित्व और राजनीतिक चिंतन तुरंत सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू करने के अनुकूल जान पड़ता था, तो दूसरी तरफ वे यूरोप में नाजी-विरोधी संघर्ष और एशिया में जापानी आक्रमण के खिलाफ चीनी जनता के संघर्ष को भी कमजोर नहीं करना चाहते थे।
अंततः नेहरू ने गांधी और कांग्रेस नेतृत्व के बहुमत का ही साथ देने का निर्णय किया।
कांग्रेस का 53वाँ अधिवेशन मौलाना कलाम की अध्यक्षता में 18-20 मार्च 1940 को रामगढ़ (झारखंड) में दामोदर नदी के किनारे संपन्न हुआ।
रामगढ अधिवेशन में कांग्रेस ने युद्ध के प्रति कांग्रेस के रुख को दोहराते हुए जहाँ यह घोषणा की कि ‘‘पूर्ण स्वाधीनता से कम कुछ भी जनता को स्वीकार्य नहीं हो सकता’’, वहीं यह भी स्वीकार किया कि ‘‘जैसे ही कांग्रेस संगठन संघर्ष के योग्य हो जाता है या फिर परिस्थितियां इस कदर बदल जाती हैं कि संकट निकट दिखाई दे, वैसे ही कांग्रेस सविनय अवज्ञा आंदोलन छेड़ देगी।’’
सत्याग्रह प्रारंभ करने का पूरा उत्तरदायित्व गांधीजी पर छोड़ दिया गया।
कांग्रेस की समझौतावादी नीतियों के विरोध में सुभाषचंद्र बोस ने समानांतर अधिवेशन किया और पूरे नगर में एक विशाल शोभायात्रा निकाली, जिसमें महंत धनराजपुरी, शाहनवाज हुसैन, लक्ष्मीबाई सहगल और शीलभद्र जैसे लोग शामिल हुए।

अगस्त-प्रस्ताव (8 अगस्त 1940)

द्वितीय विश्वयुद्ध में हिटलर की असाधारण सफलता और बेल्जियम, हालैंड एवं फ्रांस के पतन के पश्चात् ब्रिटेन की स्थिति अत्यंत नाजुक हो गई, फलतः ब्रिटेन ने समझौतावादी दृष्टिकोण अपनाया।
युद्ध में भारतीयों का सहयोग प्राप्त करने के उद्देश्य से वायसराय लिनलिथगो ने 8 अगस्त 1940 को ‘अगस्त प्रस्ताव’ घोषणा की।
1. लिनलिथगो प्रस्ताव के अनुसार अनिश्चित भविष्य में भारत को डोमिनियन स्टेट्स का दर्जा दिया जायेगा,
2. वायसराय की एक्जिक्यूटिव कौंसिल का विस्तार कर उसमें कुछ भारतीय शामिल किये जायेंगे और एक युद्ध-परामर्श परिषद् का गठन किया जायेगा।
3. युद्ध के पश्चात् विभिन्न भारतीय दलों के प्रतिनिधियों की एक संविधान सभा गठित की जायेगी, जो भारतीयों के अपने सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक धारणाओं के अनुरूप संविधान के निर्माण की रूपरेखा सुनिश्चित करेंगी।
4. इस संविधान में रक्षा, अल्पसंख्यकों के हित, राज्यों से संधियाँ तथा अखिल भारतीय सेवाएँ इत्यादि मुद्दों पर भारतीयों के अधिकार का पूर्ण ध्यान रखा जायेगा।
5. लिनलिथगो ने अल्पसंख्यकों से वादा किया कि सरकार ऐसी किसी संस्था को शासन नहीं सौंपेगी, जिसके विरुद्ध सशक्त मत हो। उक्त आधारों पर भारतीय सरकार को सहयोग प्रदान करेंगे।
अगस्त प्रस्ताव कांग्रेस की उम्मीद से बहुत कम था और इसमें ब्रिटिश सरकार ने अल्पसंख्यकों को पूर्ण महत्त्व प्रदान करने का वादा किया था।
गांधीजी ने घोषणा की कि ‘‘अगस्त प्रस्तावों के रूप में सरकार ने जो घोषणाएँ की है, उनसे राष्ट्रवादियों तथा उपनिवेशी सरकार के बीच खाई और चैड़ी होगी।’’
वास्तव में लंदन की सरकार ऐसे किसी प्रस्ताव के लिए तैयार ही नहीं थी, जो संवैधानिक प्रश्नों पर युद्ध के बाद किसी भी वार्ता में उसके हाथ बाँध देती।
फलतः कांग्रेस ने अगस्त प्रस्ताव को जहाँ अस्वीकार कर दिया, वहीं मुस्लिम लीग ने इस प्रस्ताव को स्वीकार करते हुए कहा कि भारत का बँटवारा ही इस समस्या का एक मात्र समाधान है।
अगस्त-प्रस्ताव की असफलता से ब्रिटिश सरकार खिन्न हो गई।
सरकार ने राष्ट्रीय आंदोलन और कांग्रेस के प्रति अडि़यल रवैया अपनाया और घोषित किया कि कांग्रेस जब तक मुस्लिम संप्रदायवादियों के साथ किसी तरह के समझौते को मूर्तरूप नहीं देती, तब तक भारत में किसी प्रकार का संवैधानिक सुधार संभव नहीं है।
सितंबर 1940 में गांधी वायसराय से दो-दो बार मिले, किंतु कोई समझौता नहीं हो सका।
सरकार एक के बाद एक अध्यादेश जारी कर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, प्रेस की स्वतंत्रता तथा सभा करने एवं संगठन बनाने जैसे अधिकार छीनने लगी।
देश भर में राष्ट्रवादी मजदूरों, विशेषकर वामपंथी समूहों से जुड़े मजदूरों को तरह-तरह से परेशान किया जाने लगा; उन्हें गिरफ्तार कर जेलों में डाला जाने लगा। यदि कांग्रेस जन-संघर्ष छेड़ने का फैसला करती, तो उसे तुरंत कुचल दिया जाता।

वैयक्तिक सत्याग्रह (17 अक्टूबर 1940)

1940 के अंत में कांग्रेस ने एक बार पुनः गांधीजी से आंदोलन की कमान सँभालने का अनुरोध किया।
गांधीजी ने ऐसे कदम उठाने शुरू कर दिये, जिससे उनकी अपनी व्यापक रणनीति के दायरे में जनसंघर्ष की भूमिका बनती।
गांधीजी ने तय किया कि हर इलाके में कुछ चुने हुए लोग सीमित पैमाने पर ‘वैयक्तिक सत्याग्रह’ प्रारंभ करेंगे।
1. सत्याग्रही सार्वजनिक रूप से युद्ध के खिलाफ प्रचार करेंगे और जनता से अपील करेंगे कि ब्रिटिश सरकार के युद्ध-कार्य में किसी भी प्रकार से सहयोग न करें।
2. सत्याग्रही जिला मजिस्ट्रेट को पहले से सूचित करेंगे कि किस स्थान पर, किस समय युद्ध-विरोधी भाषण होना है।
3. यदि सत्याग्रहियों को गिरफ्तार नहीं किया गया, तो वे युद्ध-विरोधी भाषण को दुहराएंगे और गाँवों की ओर प्रस्थान करेंगे। तत्पश्चात् गाँवों में ये अपना संदेश फैलाते हुए दिल्ली की ओर बढ़ने का प्रयास करेंगे।
इस आंदोलन को ‘दिल्ली चलो आंदोलन’ भी कहा जाता है।
वैयक्तिक सत्याग्रह का मुख्य उद्देश्य ब्रिटिश सरकार के दावे को खोखला साबित करना था कि ‘भारत की जनता द्वितीय विश्वयुद्ध में सरकार के साथ है।’
वायसराय के नाम एक पत्र में गांधी ने वैयक्तिक सत्याग्रह के उद्देश्यों की व्याख्या की: ‘‘कांग्रेस नाजीवाद के विजय की उतनी ही विरोधी है, जितना कि कोई अंग्रेज हो सकता है; लेकिन उसकी आपत्ति को युद्ध में उसकी भागीदारी की सीमा तक नहीं खींचा जा सकता, और चूंकि आपने तथा भारतीय मामलों से संबंधित मंत्री ने घोषणा की है कि पूरा भारत स्वेच्छा से युद्ध में सहायता कर रहा है, इसलिए यह स्पष्ट करना जरूरी हो जाता है कि भारतीयों को वस्तुतः युद्ध में कोई दिलचस्पी नहीं है। उनके लिए नाजीवाद और भारत पर शासन करनेवाली दोहरी तानाशाही में कोई अंतर नहीं है।’’
वैयक्तिक सत्याग्रह के दो उद्देश्य थे- पहला, यह भारतीय जनता की उग्र राजनीतिक चेतना की अभिव्यक्ति था और दूसरा, इसके द्वारा ब्रिटिश सरकार को एक और अवसर दिया जा रहा था कि वह भारत की माँगों को स्वीकार कर ले।
किंतु लगता है कि सत्याग्रह को जान-बूझकर सीमित और वैयक्तिक इसलिए रखा गया था ताकि देश में व्यापक उथल-पुथल न हो और ब्रिटेन के युद्ध-प्रयासों में बाधा न पहुँचे।
गांधीजी ने 11 अक्टूबर 1940 को विनोबा भावे को पहले सत्याग्रही के रूप में चुना था।
विनोबा भावे ने 17 अक्टूबर 1940 को पवनार में सत्याग्रह शुरू किया और ‘तकली की सारी सुप्त-शक्तियों को खोज निकाला।’
पहली सभा सेलू नामक गाँव में हुई और फिर दूसरी सभा सेवाग्राम में, जिसके कारण विनोबा भावे बहुत प्रसिद्ध हो गये।
चार दिन के युद्ध-विरोधी प्रचार के बाद 21 अक्टूबर को ब्रिटिश सरकार ने विनोबा को गिरफ्तार कर लिया।
दूसरे सत्याग्रही जवाहरलाल नेहरू को 7 नवंबर 1940 को वैयक्तिक सत्याग्रह शुरू करना था, किंतु गोरखपुर में दिये गये अपने भाषणों के कारण नेहरू 31 अक्टूबर 1940 को ही गिरफ्तार कर लिये गये।
इसके बाद कांग्रेस ने वैयक्तिक सत्याग्रह को अपना कार्यक्रम बनाकर गिरफ्तारी देने का आंदोलन चलाया।
गांधी स्वयं गिरफ्तार नहीं हुए, क्योंकि वे इस आंदोलन की व्यवस्था में लगे हुए थे।
वैयक्तिक सत्याग्रह ने शीघ्र ही व्यापक आंदोलन का रूप धारण कर लिया। जगह-जगह लोग युद्ध-विरोधी प्रचार करने लगे।
देश के कोने-कोने से लोग अपना घर-बार, खेती-बारी, जमीन-जायदाद छोड़कर सरकारी प्रतिबंधों को तोड़कर जेल जाने लगे।
छह प्रांतों के भूतपूर्व मुख्यमंत्री, 29 मंत्री तथा 290 विधानमंडलों के सदस्य भी गिरफ्तार किये गये।
सत्याग्रह की इस नई पद्धति ने लोगों को बता दिया कि ‘‘अपनी लड़ाई अंग्रेजों से नहीं, बल्कि अंग्रेजी शासन से है।’’
15 मई 1941 तक 25,000 से अधिक सत्याग्रही सविनय अवज्ञा आंदोलन के लिए दंडित किये जा चुके थे।
फिर भी, वैयक्तिक सत्याग्रह आंदोलन किसी भी तरह सफल नहीं रहा और इस बीच जपानी सैनिक भारत की सीमाओं के और करीब आ गये, जबकि अंग्रेज किसी भी संवैधानिक परिवर्तन का वादा न करने पर अड़े रहे।
1941 में विश्व की राजनीति में दो महत्त्वपूर्ण परिवर्तन आये।
पश्चिमी यूरोप तथा अधिकांश पूर्वी यूरोप में पौलैंड, बेल्जियम, हालैंड, नार्वे और फ्रांस पर अधिकर कर लेने के बाद नाजी जर्मनी ने 22 जून 1941 को सोवियत संघ पर भी आक्रमण कर दिया।
7 दिसंबर को जापान ने पर्लहार्बर में एक अमरीकी समुद्री बेड़े पर आकस्मिक हमला किया और जर्मनी तथा इटली की ओर से युद्ध में शामिल हो गया।
जपान ने तेजी से दक्षिण-पूर्व एशिया में फिलीपीन, हिंदचीन, इंडोनेशिया, मलाया और बर्मा पर अधिकार कर लिया।
8 मार्च 1942 को जापानी फौजों ने रंगून (वर्तमान यांगून) पर कब्जा कर लिया और युद्ध भारत की सीमाओं तक आ पहुँचा।
भारतीय नेता, जिन्हें दिसंबर 1941 में रिहा किया गया था, भारत की सुरक्षा को लेकर परेशान थे। सोवियत संघ और चीन को लेकर भी वे चिंतित थे।
बहुतों को लगता था कि सोवियत संघ पर हिटलर के हमले ने युद्ध के चरित्र को बदल दिया है।
गांधीजी ‘एशिया एशियाइयों के लिए है’ के जापानी नारे की निंदा कर चुके थे। अब उन्होंने भारत के लोगों से जापानी वस्तुओं के बहिष्कार की अपील शुरू कर दी।
भारतीय सीमाओं की रक्षा करने तथा मित्रराष्ट्रों की सहायता करने की आतुरता में कांग्रेस कार्यसमिति ने जापानी आक्रमण की निंदा की और गांधी तथा नेहरू की आपत्तियों को दरकिनार करते हुए दिसंबर के अंत में एक प्रस्ताव पारित किया, जिसमें कहा गया था कि ‘अगर ब्रिटेन युद्ध के बाद पूर्ण स्वाधीनता का वचन दे और तुरंत ठोस रूप में सत्ता देने के लिए राजी हो जाए, तो वे भारत और मित्रराष्ट्रों की रक्षा में पूरा-पूरा सहयोग करेंगे।’
इसी समय गांधीजी ने जवाहरलाल नेहरू को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया।
15 जनवरी 1941 को अखिल भारतीय कांग्रेस कार्यसमिति में बोलते हुए गांधीजी ने कहा कि ‘‘किसी ने बताया कि पं. जवाहरलाल और मेरे बीच दरार पड़ चुकी है। …..जबसे हम सहकर्मी बने हैं, तभी से हमारे बीच मतभेद रहे हैं, फिर भी कई वर्षों से मैं कहता रहा हूँ और आज भी कहता हूँ कि राजाजी (सी. राजगोपालाचारी) नहीं, बल्कि जवाहरलाल मेरे उत्तराधिकारी होंगे।’’

क्रिप्स मिशन (Cripps Mission, 30 मार्च 1942)

द्वितीय विश्वयुद्ध में मित्रराष्ट्रों की स्थिति दिन-प्रतिदिन बिगड़़ती जा रही थी। इसलिए ब्रिटिश सरकार को युद्ध प्रयासों में भारतीयों के सक्रिय सहयोग की तत्काल आवश्यकता थी।
संयुक्त राज्य अमरीका के राष्ट्रपति रूजवेल्ट, चीन के राष्ट्रपति च्यांग काई शेक तथा ब्रिटेन के लेबर पार्टी के बहुत से सदस्य चर्चिल पर दबाव डाल रहे थे कि संकट की इस घड़ी में वह भारतीयों का समर्थन पाने के लिए पहल करें।
ब्रिटिश सरकार ने 11 मार्च 1942 को कैबिनेट मंत्री स्टैफोर्ड क्रिप्स के नेतृत्व में एक सद्भाव मंडल भारत भेजने की घोषणा की।
क्रिप्स पहले लेबर पार्टी के वामपंथी सदस्य रहे और भारत के राष्ट्रीय आंदोलन का पक्के समर्थक थे।
क्रिप्स अपने मिशन के साथ 23 मार्च 1942 को दिल्ली आये।
भारत आते ही क्रिप्स ने घोषणा की कि भारत में ब्रिटश नीति का उद्देश्य है- जितनी जल्दी संभव हो सके, भारत में स्वशासन की स्थापना।
भारत के विभिन्न नेताओं से विचार-विमर्श कर क्रिप्स  (Cripps Mission) ने 30 मार्च 1942 को अपनी योजना प्रस्तुत की, जिसमें मुख्य रूप से दो प्रस्ताव थे- युद्धोत्तर और युद्धकालीन।
1. युद्धोत्तर प्रस्ताव के अंतर्गत भारत को डोमिनियन स्टेट्स (स्वतंत्र उपनिवेश) का दर्जा देने और एक ऐसी संविधान निर्मात्री परिषद् बनाने का आश्वासन था, जिसके कुछ सदस्य प्रांतीय विधायिकाओं द्वारा निर्वाचित होते और कुछ (रियासतों का प्रतिनिधित्व करने के लिए) शासकों द्वारा नामांकित होते।
2. यह औपनिवेशिक स्वराज्य राष्ट्रमंडल के साथ अपने संबंधों के निर्धारण में स्वतंत्र होता और संयुक्त राष्ट्रसंघ व अन्य अंतर्राष्ट्रीय निकायों एवं संस्थाओं में अपनी भूमिका को खुद ही निर्धारित करता।
3. प्रस्ताव में यह भी व्यवस्था थी कि यदि किसी प्रांत को नया संविधान स्वीकार्य नहीं होगा, तो वह अपने भविष्य के लिए ब्रिटेन से अलग समझौता कर सकता है।
4. युद्धकालीन प्रस्ताव के अनुसार इस दौर में भारत की प्रतिरक्षा पर पूरा-का-पूरा नियंत्रण ब्रिटिश सरकार के पास रहता।
यद्यपि क्रिप्स का प्रस्ताव लिनलिथगो के ‘अगस्त प्रस्ताव’ की तुलना में बेहतर और अधिक प्रगतिशील था, क्योंकि इसमें भारतीयों को न केवल वास्तविक तौर पर संविधान के निर्माण का अधिकार दिया गया था, बल्कि भारत को ऐच्छिक रूप से राष्ट्रमंडल से अलग होने का अधिकार भी मिल रहा था।
किंतु क्रिप्स के ‘अनुरक्षणवादी, प्रतिक्रियाशील और सीमित प्रस्ताव’ का भारत के विभिन्न दलों और समूहों ने अलग-अलग आधार पर विरोध किया।
कांग्रेस की मुख्य माँग एक वास्तविक राष्ट्रीय सरकार की स्थापना थी, जिसके पास सारे अधिकार सुरक्षित हों तथा जिसमें वायसराय केवल एक अध्यक्ष की हैसियत से कार्य करता हो।
उधर, ब्रिटिश सरकार को यह मंजूर नहीं था कि वास्तविक शक्ति भारतवासियों को दे दी जाये। वह देश की प्रतिरक्षा की जिम्मेदारी अपने हाथों में ही रखना चाहती थी।
संविधान सभा में रियासतों की जनता के बजाय शासकों द्वारा नामांकन की व्यवस्था और प्रांतों को पृथक् संविधान बनाने के विकल्प पर भी कांग्रेस को कड़ी आपत्ति थी।
नेहरू के अनुसार ‘‘क्रिप्स योजना को स्वीकार करना भारत को अनिश्चित खंडों में विभाजित करने के लिए मार्ग प्रशस्त करना था।’’
गांधीजी ने क्रिप्स योजना को एक ‘बाद की तारीख का चेक’ बताया, जिसे वह स्वीकार करने को तैयार नहीं थे।
उदारपंथी और हिंदू महासभा भी प्रांतों को संघ से पृथक् होने का अधिकार दिये जाने के विरोधी थे।
दलितों ने क्रिप्स मिशन के सुझावों का इसलिए विरोध किया क्योंकि उन्हें लगा कि विभाजन के पश्चात् उन्हें बहुसंख्यक हिंदुओं की कृपा पर जीना पड़ेगा।
पंजाब को भारत से अलग करने की योजना से सिख भी असंतुष्ट थे।
दूसरी ओर ‘पाकिस्तान’ की स्पष्ट घोषणा न किये जाने के कारण मुस्लिम लीग ने भी क्रिप्स प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया।
वायसराय के वीटो (निषेधाधिकार) के प्रश्न पर स्टैफर्ड क्रिप्स तथा कांग्रेस के नेताओं के मध्य वार्ता भंग हो गई और क्रिप्स ब्रिटिश सरकार के प्रस्तावों की योजना वापस लेकर इंग्लैंड लौट गये।
वार्ता टूटने का एक कारण यह भी था कि क्रिप्स को लचीला होने की सुविधा नहीं थी।
क्रिप्स को जो प्रस्ताव देकर भेजा गया था, उसका अतिक्रमण करने का उन्हें अधिकार नहीं था।
दरअसल प्रधानमंत्री चर्चिल, विदेशमंत्री एमरी, वायसराय लिनलिथगो और कमांडर-इन-चीफ वेवेल चाहते ही नहीं थे कि क्रिप्स मिशन (Cripps Mission) सफल हो।
चर्चिल ने तो साफ-साफ कह दिया था: ‘‘अटलांटिक चार्टर भारत पर लागू नहीं होता और वे प्रधानमंत्री इसलिए नहीं बने हैं कि अंग्रेजी साम्राज्य को समाप्त कर दिया जाये।’’
वास्तव में क्रिप्स मिशन (Cripps Mission) भेजने के पीछे ब्रिटिश सरकार का मुख्य उद्देश्य युद्ध के दौरान भारत के सभी वर्गों एवं दलों की सहायता प्राप्त करना मात्र था।

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