अंतरिम सरकार : कांग्रेस और मुस्लिम लीग (Interim Government: Congress and Muslim League)

वायसराय वेवेल ने हर संभव तरीका आजमाने के बाद 24 अगस्त 1946 को अंतरिम सरकार (Interim Government) के गठन की घोषणा की और 2 सितंबर 1946 को नेहरू के प्रधानमंत्रित्व में कांग्रेस के वर्चस्ववाली सरकार को शपथ दिलाया।

अंतरिम सरकार में कांग्रेस के सदस्य

नेहरू के नेतृत्ववाली अंतरिम सरकार (Interim Government) में एक ईसाई जान मथाई, एक पारसी के.एच. भाभा, एक सिख सरदार बलदेवसिंह, एक अनुसूचित जाति जगजीवन राम, तीन मुसलमान सर सफाअत अहमद खान, सैयदअली जहीर व आसफअली और नेहरू का लेकर पाँच सवर्ण हिंदू वल्लभभाई पटेल, डा. राजेंद्र्र प्रसाद, राजगोपालाचारी, शरतचंद्र बोस एक्ज्युक्यूटिव कौंसिल के सदस्य नियुक्त किये गये।

जिन्ना को लगा कि प्रशासन को कांग्रेस (Congress) के हाथों में छोड़ देना आत्मघाती होगा; पाकिस्तान के लिए लड़ना है, तो सरकार में हिस्सेदारी जरूरी है। इसलिए बाद में मुस्लिम लीग (Muslim League) भी अंतरिम सरकार में शामिल हो गई, यद्यपि उसने कैबिनेट मिशन (Cabinet Mission) के किसी भी, अल्पकालीन या दीर्घकालीन प्रावधान को स्वीकार नहीं किया था।

भारत राज्य सचिव लारेंस के कहना था कि ‘‘यदि लीग को सरकार में शामिल नहीं किया जाता, तो गृहयुद्ध अपरिहार्य हो जाता।’’

अंतरिम सरकार में मुस्लिम लीग के सदस्य

13 अक्टूबर 1946 के एक प्रस्ताव द्वारा लीग के चार मुसलमान मुहम्मदअली जिन्ना, लियाकत अली, आई.आई. चुदरीगर, अब्दुल रब निस्तार और एक अनुसूचित जाति के योगेंद्रनाथ मंडल भी नेहरू के नेतृत्ववाली अंतरिम सरकार में शामिल हो गये।

मुस्लिम लीग की कार्यशैली

नेहरू के नेतृत्ववाली अंतरिम सरकार (Interim Government) में शामिल मुस्लिम लीग के मंत्रियों की सरकार-भंजक कार्यशैली से स्पष्ट हो गया कि लीग और जिन्ना का उद्देश्य किसी भी तरह पृथक् पाकिस्तान का निर्माण है।

लीग ने कांग्रेस (Congress) के सदस्यों द्वारा लिये गये निर्णयों तथा नियुक्तियों पर सवाल उठाना शुरू कर दिया। वित्तमंत्री लियाकत अली खान ने तो कांग्रेस के हर विभाग का काम चलाना ही मुश्किल कर दिया।

संविधान सभा की बैठक

अंतरिम सरकार में शामिल होकर भी लीग ने संविधान सभा में सम्मिलित नहीं हुई और लीग के सदस्यों की अनुपस्थिति में 9 दिसंबर 1946 से डा. राजेंद्र प्रसाद की अध्यक्षता में संविधान सभा की बैठकें शुरू हुई।

22 जनवरी 1947 को लीग की अनुपस्थिति में जवाहरलाल नेहरू द्वारा तैयार किये गये सुप्रसिद्ध उद्देश्यों को पारित किया गया।

जब लीग ने अंतरिम मंत्रिमंडल (Interim Cabinet) द्वारा बुलाई गई अनौपचारिक बैठक में भी भाग नहीं लिया, तो नेहरू वेवेल से यह कहने पर विवश हो गये कि मुस्लिम लीग (Muslim League) या तो कैबिनेट मिशन योजना को स्वीकार करे या सरकार से बाहर निकल जाये।

फरवरी 1947 में मंत्रिमंडल (Interim Cabinet) के नौ कांग्रेस (Congress) सदस्यों ने वायसराय को पत्र लिखकर माँग की कि वे लीग के सदस्यों को त्यागपत्र देने के लिए कहें, अन्यथा वे मत्रिमंडल से अपना नामांकन वापस ले लेंगे।

जब लीग ने संविधान सभा को भंग करने की माँग की, तो स्थिति और बिगड़ गई। कलकत्ता के बाद नोआखली, अहमदाबाद, बिहार, गढ़मुक्तेश्वर और पंजाब सहित देश के विभिन्न भागों में दंगे हो रहे थे।

माउंटबेटन को भारत भेजने की घोषणा

इस समय अंग्रेजों के पास सााधन कम थे और सांप्रदायिक हिंसा के कारण अंग्रेजों के पास मौजूद राजनीतिक विकल्प और कम हो गये थे। फलतः एटली ने दिसंबर 1946 में वेवल की जगह माउंटबेटन को भारत भेजने का प्रस्ताव रखा।

एटली ने जनवरी 1947 में ही स्वीकार कर लिया कि आबादी के तमाम राजनीतिक सोचवालों के सक्रिय विरोध के सामने कुछ सौ अंग्रेजों के लिए प्रशासन चलाना….एक दम असंभव होगा।

ब्रिटिश प्रधानमंत्री एटली की घोषणा

ब्रिटिश प्रधानमंत्री एटली ने 20 फरवरी 1947 को घोषणा की कि 30 जून 1948 तक सत्ता ऐसे किसी संगठन को और ऐसे किसी ढ़ंग से सौंप दी जायेगी, जिनको सबसे अधिक बुद्धिसंगत और भारतीय जनता के बेहतरीन हितों में माना जायेगा। यदि लीग संविधान सभा का बहिष्कार जारी रखेगी, तो हमें सोचना होगा कि ब्रिटिश प्रदेशों की केंद्रीय प्रभुसत्ता निश्चित तिथि तक किसको सौंपी जाए, केंद्रीय सरकार को या प्रदेशों में कार्य कर रही प्रांतीय सरकारों को अथवा कोई और मार्ग, जो कि उचित हो और भारतीयों के हित में हो।

ब्रिटिश सरकार को आशा थी कि सत्ता-हस्तांतरण (Transfer of power) की तिथि निश्चित हो जाने पर भारत के राजनैतिक दल मुख्य समस्या के समाधान हेतु सहमत हो जायेंगे। इस प्रकार जून 1948 एक अंतिम तिथि दे दी गई जब अंग्रेज भारत से चले जायेंगे।

संभवतः मार्च-अप्रैल 1947 तक अनेक कांग्रेसी नेता पाकिस्तान स्वीकार करने के विचार से तालमेल बिठा चुके थे और यह मान लिये थे कि विभाजन के साथ स्वतंत्रता सांप्रदायिक हिंसा जारी रहने के लिए मुकाबले एक बेहतर विकल्प है। 29 अप्रैल को नेहरू ने लिखा था: आखिरकार हमारे पास एकजुट और मजबूत भारत होगा।’’

कांग्रेस(Congress) वर्किंग कमेटी ने 8 मार्च के एक प्रस्ताव द्वारा स्वायत्तशासी उपनिवेशों को सत्ता हस्तांतरित करने की योजना को स्वीकार कर लिया और मुस्लिम क्षेत्रों से गैर-मुस्लिम क्षेत्रों को अलग करने के लिए दो प्रांतों में पंजाब के विभाजन के पक्ष निर्णय किया क्योंकि इससे भारत के अधिक विखंडित होने की संभावना नहीं थी।

सत्ता हस्तांतरित करने की योजना में प्रांतों एवं देसी रियासतों को अलग से स्वतंत्रता देने का कोई प्रावधान नहीं था। इसमें प्रस्ताव किया गया था कि प्रांत पूरी तरह स्वैच्छिक आधार पर संघ में शामिल हो सकते हैं और संविधान को स्वीकार कर सकते हैं। साथ ही तत्कालीन प्रांतीय व्यवस्थापिकाएं स्वयं अपने क्षेत्रों के लिए संविधान का निर्माण कर सकती थीं और इससे गतिरोध को समाप्त करने में मदद मिलने की उम्मीद थी।

किंतु कांग्रेस (Congress)की यह उम्मीद शीघ्र ही धूल-धूसरित हो गई, क्योंकि मुस्लिम लीग (Muslim League) ने भारत-विभाजन के लिए एक प्रचंड आंदोलन प्रारंभ कर दिया। लीग कलकत्ता, असम, पंजाब, उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत में निर्लज्ज रूप से उत्पात मचाने लगी। हिंदू और मुस्लिम संप्रदायवादी जघन्य हत्याओं और क्रूरता के द्वारा एक-दूसरे का मुकाबला कर रहे थे।

न्यूनतम् मानव-मूल्यों का इस तरह उल्लंघन होने और सत्य-अहिंसा को ताक पर रख दिये जाने से क्षुब्ध होकर गांधीजी जनता की अंतरात्मा को जगाने के लिए पूर्वी बंगाल और बिहार के दंगा-प्रभावित क्षेत्रों में निडर और अकेले घूमते रहे।

लीग ने उन मुस्लिम बहुसंख्यक प्रांतों में, जहाँ लीग की सरकारें नहीं थीं, अराजकता फैलाकर लीग की सरकार बनाने का प्रयास किया। वे पंजाब में सफल भी हो गये, किंतु असम तथा उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत में असफल रहे।

घृणा और आतंक के इस वातावरण से स्पष्ट हो गया कि अब भारतीय एकता को बनाये रखना आसान नहीं है।

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