उन्नीसवीं सदी में पश्चिमी एवं दक्षिणी भारत में सुधार आंदोलन (Reform Movement in Western and Southern India in 19th Century)

पश्चिमी भारत में सुधारों की शुरूआत उन्नीसवीं सदी के आरंभिक वर्षों में दो अलग-अलग तरीकों से हुई। एक तरीका तो प्राचीन संस्कृत ग्रंथों की छानबीन व अनुवाद का और उनमें भारतीय सभ्यता की गरिमा की तलाश का प्राच्यवादी ढंग था। इस कार्य में लगे विद्वान् सुधारक के.टी. तेलंग, बी.एन. मांडलिक और सबसे बढ़कर प्रोफेसर आर.जी. भंडारकर थे। दूसरा तरीका समाज सुधार की और अधिक प्रत्यक्ष विधिवाला था, जो जातिप्रथा जैसी सामाजिक संस्थाओं पर और विधवा पुनर्विवाह पर लगे प्रतिबंध पर हमले करता था। गुजरात के मेहताजी दुर्गाराम मंचाराम (1809-1876) ने हिंदू विधवाओं के प्रति दुर्व्यवहार के विरुद्ध लिखे। उन्होंने सामाजिक समस्याओं पर चर्चा करने के लिए 1844 में ‘मानव धर्मसभा’ और ‘यूनीवर्सल रिलिजंस सोसायटी’ का गठन किया था। अधिकांश गुजराती सुधारक ‘गुजरात वर्नाक्यूलर सोसायटी’ (अहमदाबाद) से जुड़े हुए थे। करसोनदास मलजी इस क्षेत्र में दूसरे महत्त्वपूर्ण कार्यकर्त्ता थे। 1852 में उन्होंने गुजराती भाषा में विधवा-विवाह के समर्थन में ‘सत्यप्रकाश’ नामक पत्रिका निकाली और गुजरात, महाराष्ट्र में प्रचलित वल्लभाचार्य संप्रदाय का खुलकर विरोध किया। बंबई में हरिकेशजी विधवाओं की व्यथा से प्रभावित होकर विधवा पुनर्विवाह के पक्ष में सशक्त आंदोलन चलाये और गणपत लक्ष्मणजी ने सामाजिक बुराइयों पर प्रहार किये। 1850 में विष्णु शास्त्री पंडित ने ‘विधवा विवाह समाज’ स्थापित किया।

उन्नीसवीं सदी में पश्चिमी एवं दक्षिणी भारत में सुधार आंदोलन (Reform Movement in Western and Southern India in 19th Century)
बी.एन. मांडलिक

कुछ पढ़े-लिखे युवकों ने 1848 में छात्रों की एक साहित्यिक और वैज्ञानिक संस्था बनाई। इसकी दो शाखाएँ थीं- गुजराती और मराठी ध्यान मंडलियां। यह मंडलियाँ सामाजिक प्रश्नों और आम वैज्ञानिक विषयों पर व्याख्यान आयोजित करती थीं। इस संस्था का उद्देश्य महिलाओं की शिक्षा के लिए स्कूल आरंभ करना भी था।

परमहंस सभा

महाराष्ट्र में 1849 में ‘परमहंस सभा’ की स्थापना की गई, जो जाति-पाँति और ऊँच-नीच के बंधनों को तोड़ने में विश्वास करती थी। संस्था की बैठकों में इसके सदस्य नीच जातियों के हाथ का बना भोजन ग्रहण करते थे। वे विधवा विवाह और स्त्री शिक्षा के पक्षधर थे। इस मंडली की शाखाएँ पूना, सतारा और महाराष्ट्र के अन्य नगरों में भी थीं। इस मंडली के प्रभाव के कारण लोगों में इस बात की चर्चा होने लगी थी कि ऊँच-नीच और भेदभाव के कारण देश का बड़ा नुकसान हुआ है और इसको दूर किये बिना देश की तरक्की नहीं हो सकती है। इस सभा के प्रमुख नेताओं में बालशास्त्री जाबेकर (1812-1846), दादोबा पांडुरंग तारखड़कर (1814-1842), भाष्कर पांडुरंग तारखड़कर (1816-1843), गोपालहरि देशमुख (1823-1882) एवं आजीवन ब्रह्मचारी विष्णुबाबा उर्फ विष्णु भीखाजी गोखले (1825-1873) थे। बंबई के बालशास्त्री जाबेकर ने ब्राह्मणवादी कट्टरता की आलोचना की और 1832 में उन्होंनेदर्पण नामक एक साप्ताहिक पत्र का प्रकाशन आरंभ किया, जिसका उद्देश्य था: ‘‘अज्ञान और त्रुटियों के धुंध को दूर भगाना, जिसके कारण लोगों के दिमाग बंद हो गये थे तथा लोगों पर ऐसा प्रकाश डालना जिस प्रकाश से, दूसरे देशों की तुलना में यूरोप के लोग दुनिया में आगे बढ़ चुके थे।’’

गोपालहरि देशमुख (1823-1892) ने, जो ‘लोकहितवादी’ उपनाम से विख्यात हैं, आधुनिक मानवतावादी, धर्मनिरपेक्ष मूल्यों और विवेकसंगत सिद्धांतों के आधार पर भारतीय समाज के पुनर्गठन की वकालत की। उन्होंने हिंदू कट्टरपंथ पर भयानक बुद्धिवादी आक्रमण किया और धार्मिक तथा सामाजिक समानता का प्रचार किया। 1840 के दशक में उन्होंने लिखा था: ‘‘पुरोहित बहुत ही अपवित्र हैं क्योंकि कुछ बातों को बिना अर्थ समझे दुहराते हैं और ज्ञान को इसी रटंत तक भौंड़े ढ़ंग से सीमित करके रख देते हैं। पंडित तो पुरोहितों से भी बुरे हैं क्योंकि वे और भी अज्ञानी हैं तथा अहंकारी भी हैं। ब्राह्मण कौन हैं और किन अर्थों में वे हमसे भिन्न हैं? क्या उनके बीस हाथ हैं और क्या हममें कोई कमी हैं? अब जब ऐसे सवाल पूछे जायें, तो ब्राह्मणों को अपनी मूर्खतापूर्ण धारणाएँ त्याग देनी चाहिए और उन्हें यह मान लेना चाहिए कि सभी मनुष्य बराबर हैं और हर व्यक्ति को ज्ञान प्राप्त करने का अधिकार है।’’ लोकहितवादी का मानना था कि अगर धर्म सामाजिक सुधार की अनुमति नहीं देता, तो उसे बदल दिया जाना चाहिए।

परमहंस मंडली बंगाल के डेरोजियोवादियों की मूर्तिभंजक क्रांतिकारी परंपरा का अनुसरण करता था, पर व्यापकतर समुदाय से सीधे टकराव से बचने के लिए एक गुप्त सभा की तरह काम करता था। इसलिए 1860 में उसके सदस्यों का भांडा फूट जाने पर वह जल्द ही समाप्त हो गया और उसकी उपलब्धियाँ बहुत कम रहीं।

प्रार्थना समाज

1864 में केशवचंद्र सेन (1838-1884) ने बंबई में ब्रह्म समाज की शाखा को ‘प्रार्थना समाज’ के नाम से आरंभ किया। इसका उद्देश्य था: जातिप्रथा का उन्मूलन, विधवा विवाह का समर्थन, स्त्री शिक्षा पर जोर और बाल विवाह पर रोक। यह एक प्रकार से ब्रह्म समाज का मराठी संस्करण था। इसमें भारत के, विशेषकर

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रामकृष्ण गोपाल भंडारकर

महाराष्ट्र के मध्यकालीन संतों, जैसे ज्ञानेश्वर, नामदेव, एकनाथ और तुकाराम की शिक्षाओं का गौरवपूर्ण स्थान मिला।

आत्माराम पांडुरंग (1823-98) ने 31 मार्च 1867 को बंबई में प्रार्थना समाज को पुनगर्ठित किया, किंतु इसके पीछे वास्तविक प्रेरणा महादेव गोविंद रानाडे (1842-1901) की थी, जिनके योग्य सहायक वासुदेव बाबाजी नौरंगे, रामकृष्ण गोपाल भंडारकर (1837-1925) और नारायण गणेश चंद्रावरकर (1855-1923) थे। ब्रह्म आंदोलन की तरह प्रार्थना समाज भी एकेश्वरवाद का प्रचार करता था तथा मूर्तिपूजा, पुरोहितों के प्रभुत्व और जाति-भेदों की निंदा करता था, बाद में उसने समन्वयवाद का विकास किया और स्वयं को महाराष्ट्र की भक्ति परंपरा से जोड़ा। के.टी. तेलंग, जो नियमित रूप से प्रार्थना समाज की बैठकों में आते थे, कभी उसके सदस्य नहीं बने।

उन्नीसवीं सदी में पश्चिमी एवं दक्षिणी भारत में सुधार आंदोलन (Reform Movement in Western and Southern India in 19th Century)
आत्माराम पांडुरंग

प्रार्थना समाज के प्रयास से अनेक अनाथालयों, विधवाश्रमों एवं रात्रि-पाठशालाओं की स्थापना हुई। महादेव गोविंद रानाडे महाराष्ट्र में 1861 में ‘विधवा पुनर्विवाह संघ’ (विडो रीमैरेज एसोसिएशन) की स्थापना कर सामाजिक सुधारों का श्रीगणेश कर चुके थे। उन्होंने अछूतों, विधवाओं तथा पीड़ितों की दशा को सुधारने के लिए पंढ़रपुर में अनाथाश्रम खोला और शिक्षा के विकास हेतु ‘दक्षिण शिक्षा समाज’ नामक संस्था का गठन किया। 1878 में प्रार्थना समाज द्वारा स्थापित रात्रि-विद्यालय जनशिक्षा और प्रौढ़-शिक्षा के क्षेत्र में अग्रणी रहे। इस समाज ने 1882 में ‘आर्य महिला समाज’ की स्थापना कर नारी-जागरण की योजनाओं को आरंभ किया। लालशंकर उमाशंकर के प्रयास से 1875 में पंढ़रपुर में स्थापित ‘वासुदेव बाबाजी नौरंगे बालकाश्रम’ भी प्रार्थना समाज के संरक्षण में आ गया। प्रार्थना समाज ने 1917 में ‘राममोहन अंग्रेजी विद्यालय’ की स्थापना की जिसके संरक्षण में आज भी दस से अधिक विद्यालय बंबई और उसके आसपास के क्षेत्रों में चल रहे हैं।

बंगाल के ब्रह्म आंदोलन के विपरीत प्रार्थना समाज ने समन्वयवादी दृष्टिकोण अपनाया। रानाडे के शब्दों में ‘‘बंबई प्रेसीडेंसी में आंदोलन का प्रमुख तत्त्व उसका यह लक्ष्य था कि अतीत से नाता तोड़ा जाए और हमारे समाज के सारे संबंध भंग हों।’’ प्रार्थना समाज सुधारों को समाज के ढाँचे को तोड़नेवाली उथल-पुथल के रूप में नहीं, बल्कि क्रमिक ढंग से लाना चाहता था। इस क्रमिकवादी दृष्टिकोण ने प्रार्थना समाज को वृहत्तर समाज के लिए अधिक स्वीकार्य बना दिया। पूना, सूरत, अहमदाबाद, कराची, किरकी, कोल्हापुर और सतारा में उसकी शाखाएँ स्थापित हुईं। इसके कार्यकलाप दक्षिण भारत में भी फैले, जहाँ आंदोलन का नेतृत्व तेलगू सुधारक वीरेशलिंगम पांतुलू कर रहे थे।

बीसवीं सदी के आरंभ तक मद्रास प्रेसीडेंसी में इसकी अठारह शाखाएँ थीं। 1875 में जब स्वामी दयानंद सरस्वती ने गुजरात और महाराष्ट्र का दौरा किया तथा एक अधिक अतिवादी धार्मिक आंदोलन की संभावनाएं सामने रखी, तो एस.पी. केलकर के नेतृत्व में समाज के सदस्यों का एक समूह दयानंद की आर्य विचारधारा की ओर खिंचा और अलग हो गया। यद्यपि यह विरोधी गुट प्रार्थना समाज में वापस लौट आया, किंतु यहीं से पश्चिमी भारत में एक अलग प्रकार की धार्मिक राजनीति का आरंभ हुआ, जिसकी पहचान सुधारवाद से अधिक सांस्कृतिक श्रेष्ठतावाद था।

ज्योतिबा फुले

उन्नीसवीं सदी में पश्चिमी एवं दक्षिणी भारत में सुधार आंदोलन (Reform Movement in Western and Southern India in 19th Century)
महात्मा ज्योतिबा फुले

महाराष्ट्र के पुणे में माली (पिछड़ी) जाति में जन्म लेने वाले ज्योतिबा (1827-1890) एक महान् शिक्षाविद्, सामाजिक सुधारों के पुरोधा, अस्पृश्यता और जातिवाद के कलंक को धोने वाले परिवर्तनकारी युगद्रष्टा थे। मानव अधिकारों, सामाजिक न्याय तथा सामाजिक समानता के लिए जीवनभर संघर्ष करने वाले फुले ने अगस्त 1848 में बुधवार पेठ मुहल्ले में भिंडे के मकान में निचली जाति की लड़कियों के लिए पहला विद्यालय खोला, जो कट्टरपंथी पाखंडी ब्राह्मणों के विरोध के कारण मात्र छः महीने तक ही चल सका। 1851 में फुले ने अपनी पत्नी सावित्रीबाई के साथ गंजपेठ में निचली जाति की लड़कियों के लिए दूसरा स्कूल खोला और शीघ्र ही सभी वर्गों के अनाथों तथा स्त्रियों के लिए विद्यालयों की एक शृंखला स्थापित कर दी। यही नहीं, उन्होंने 1855 में प्रौढ़ स्त्री-पुरुषों के लिए पहली बार रात्रि-पाठशाला खोली, जिसमें दिनभर काम करने वाले मजदूर, किसान और गृहणियाँ पढ़ने आती थीं। मुंबई के सरकारी शिक्षा-अभिलेखों के अनुसार पुणे तथा उसके आसपास के क्षेत्रों में ज्योतिबा ने लगभग अठारह पाठशालाएँ खोली थीं। फुले ने स्त्रियों और विधवाओं के अधिकार एवं उनके उद्धार के लिए भी सराहनीय कार्य किया, जिसके कारण उन्हें ‘स्त्री उद्धारकर्त्ता’ की उपाधि दी गई।

ज्योतिबा फुले ने 24 सितंबर 1873 को ‘सत्यशोधक समाज’ की स्थापना कर पूना जैसे कट्टरता के गढ़ में ब्राह्मण-वर्चस्व और उच्च जातियों द्वारा समाज की निम्न जातियों के सामाजिक-सांस्कृतिक उत्पीड़न और अन्याय के विरुद्ध क्रांति का बिगुल बजाया। उन्होंने अपव्ययता, जाति-पाँति, ऊँच-नीच, मूर्तिपूजा और देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना का विरोध किया और निचली जातियों से अपने पारिवारिक उत्सवों, व्रतों, जन्मोत्सवों, मुंडन-संस्कारों और विवाह जैसे समारोहों में ब्राह्मण पुरोहितों के पूर्ण बहिष्कार का आह्वान किया।

फुले ने निचली और अछूत जातियों को जागरूक करने के लिए ‘धर्म तृतीय रत्न’ (पुराणों का भंडाफोड़), ‘इशारा’ (1885), शिवाजी की जवानी’, ‘किसान का कोड़ा’, ‘गुलामगीरी’ (1873) जैसी क्रांतिकारी पुस्तकों की रचना की। उन्होंनेसतसार’ नामक पत्रिका के भी दो अंक निकाले। उनकी एक पुस्तिका ‘कैफियत’ में पात्रों के माध्यम से महारानी से यह प्रार्थना की गई है कि वह दलितों को उनके अधिकार दिलवाएँ। गुलामगीरी को गैरब्राह्मणों और अछूतों कीमुक्ति का घोषणापत्र’ माना जाता है।

जहाँ राममोहन रॉय से लेकर रानाडे तक ऊँची जाति के प्रायः सभी सुधारकों ने केवल अपने समाज की परंपरागत और परिस्थितिजन्य कुरीतियों को दूर करने का प्रयास किये, वहीं ज्योतिबा सदियों से दासता का जीवन जीनेवाली निचली जातियों में शिक्षा के द्वारा मुक्ति की चेतना का प्रसार कर पुरातनवाद को ध्वस्त करने के अपने लक्ष्य में सफल रहे। फुले का महत्त्व मात्र इतना ही नहीं हैं कि उन्होंने पहली बार जातिगत विषमता के विरुद्ध आवाज उठाई, बल्कि इससे बढ़कर उन्होंने साहस के साथ एक विरोध का दर्शन, एक सांगठनिक ढाँचा और एक कार्यक्रम प्रस्तुत किया। फुले की समाज-सेवा से प्रभावित होकर 1888 में मुंबई की एक विशाल सभा ने उन्हेंमहात्मा की उपाधि दी थी। 28 नवंबर 1890 को फुले इस संसार से विदा हो गये।

फुले के विचारों से प्रभावित गोपाल गणेश अगरकर (1856-1895) ने भी बाल-विवाह, वृद्ध-विवाह और सामाजिक कुरीतियों का डटकर विरोध किया। उन्होंने तिलक के दकियानूसी और संकीर्ण विचारों, जैसे- वर्ण-व्यवस्था, जाति-पाँति और धर्मग्रंथों में उनकी आस्था का विरोध किया और व्यक्तिगत स्वतंत्रता, सामाजिक जीवन में समानता तथा प्रतिष्ठा-भाव का समर्थन किया।

सावित्रीबाई फुले

उन्नीसवीं सदी में पश्चिमी एवं दक्षिणी भारत में सुधार आंदोलन (Reform Movement in Western and Southern India in 19th Century)
भारत की प्रथम महिला अध्यापिका सावित्रीबाई फुले

महात्मा ज्योतिबा की पत्नी सावित्रीबाई फुले (1831-1897) पुणे जैसे रूढ़िवादी शहर में न सिर्फ खुद पढ़ीं, बल्कि दूसरी लड़कियों के भी पढ़ने का बंदोबस्त किया और हजारों-हजार साल से शूद्रों, अछूतों और स्त्रियों के लिए बंद रखे गये शिक्षा के दरवाजे को एक ही झटके मंे खोल दिया। उन्होंने 1852 में ‘महिला मंडल’ का गठन कर भारतीय महिला आंदोलन की शुरूआत की, विधवाओें की सुरक्षा के लिए भारत का पहला ‘बाल हत्या प्रतिबंधक गृह’ खोला और निराश्रित महिलाओं के लिए अनाथाश्रम स्थापित किया। उन्होंने एक विधवा ब्राह्मणी काशीबाई को आत्महत्या करने से रोककर अपने घर में प्रसूति करवाया और उसके बच्चे यशवंत को गोद लिया। महाराष्ट्र में 1897 में प्लेग-पीडितों की मदद करते हुए सावित्री स्वयं प्लेग से ही पीड़ित हो गईं और 10 मार्च 1897 को उनका परिनिर्वाण हो गया। भारतीय समाज का एक हिस्सा सावित्री फुले के जन्मदिन 3 जनवरी को ‘भारतीय शिक्षा दिवस’ और उनके परिनिर्वाण के दिन 10 मार्च कोभारतीय महिला दिवसके रुप में मनाता है।

महर्षि धोंडो केशव कर्वे

उन्नीसवीं सदी में पश्चिमी एवं दक्षिणी भारत में सुधार आंदोलन (Reform Movement in Western and Southern India in 19th Century)
महर्षि धोंडो केशव कर्वे

महाराष्ट्र के मुरूड (रत्नागिरि) नामक गाँव में जन्मे डॉ. डी.के. कर्वे (1858-1962) एक अन्य महान् सुधारक थे। फर्ग्यूसन कॉलेज में अध्यापन करते हुए उन्होंने समाजसेवा के क्षेत्र में कदम रखा और अपनी पहली पत्नी राधाबाई के निधन के बाद 1893 में अपने मित्र की विधवा बहन गोपूबाई से विवाह किया। 1896 में उन्होंने पूना के हिंगले नामक स्थान पर दान में मिली एक कुटिया में एक विधवा आश्रम और अनाथ बालिका आश्रम की स्थापना की। महिलाओं के लिए महर्षि कर्वे ने 1907 में एक महिला विद्यालय और 1916 में एक महिला विश्वविद्यालय की नींव डाली, जो कालांतर में विधवाओं को समाज में पुनर्स्थापित करने और आत्म-निर्भर बनाने का अनूठा संस्थान बन गया। इंडियन सोशल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष के रूप में महर्षि ने समाज में व्याप्त बुराइयों को समाप्त करने में भी महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने गाँवों में शिक्षा को सर्वसुलभ बनाने और उसके प्रसार के लिए 50 से अधिक प्राथमिक विद्यालयों की स्थापना की। भारत सरकार ने 1958 में उनकी जन्म-शताब्दी के अवसर पर उन्हें ‘भारतरत्न’ की उपाधि से सम्मानित किया।

दक्षिण भारत में सुधार

दक्षिण भारत में सुधार आंदोलन की गति अपेक्षाकृत धीमी रही। इसके कई कारण थे। उन्नीसवीं शताब्दी के आरंभ में दक्षिण में आधुनिक शिक्षा का अभाव इसका एक प्रमुख कारण था। सामाजिक व्रिद्रोह के अभाव का दूसरा प्रमुख कारण वहाँ का सामाजिक ढाँचा था, जिसमें बहुसंख्यक निम्न वर्गों पर ब्राह्मणों की स्पष्ट प्रमुखता थी। सभी सुधारकों की पृष्ठभूमि प्रायः उच्चवर्ग ही थी और ब्राह्मण किसी भी ऐसे मौलिक सामाजिक परिवर्तन का समर्थन नहीं कर सकते थे, जिसमें उनकी अपनी प्रधानता पर आँच आती। बंगाल और बंबई के नगरीय इलाकों में ब्राह्मणों का कुछ अन्य उच्चवर्गीय जातियों के साथ सामाजिक मिश्रण शुरू हो गया था, किंतु दक्षिण में ऐसा नहीं था। वहाँ जातिप्रथा अभी भी कठोर बनी हुई थी और ऐसे में कोई भी उच्चवर्गीय व्यक्ति सुधार के लिए अपनी जाति से बहिष्कृत होना नहीं चाहता था।

मिशनरी गतिविधियों और धर्म-परिवर्तन के विरुद्ध 1820 के दशक में मद्रास में ‘विभूति संगम’ (सेक्रेड एशेज सोसायटी) बना था, जो अतिवादी शनार ईसाइयों को फिर से हिंदू बनाये जाने का उपदेश देता था। फिर 1840 के दशक में ‘धर्मसभा’ बनी, जिसके संरक्षक मुख्यतः ब्राह्मण और सवर्ण हिंदू थे। ये दोनों संगठन परिवर्तन के रूढ़िवादी विरोध, कठोरता से वर्णाश्रम धर्म के पालन और जातिगत बहिराव का समर्थन करते थे। इस प्रकार मद्रास या संभवतः संपूर्ण दक्षिण में बौद्धिक जीवन या तो देश के अन्य भागों में हो रही गतिविधियों का प्रतिबिंब मात्र था या वह दक्षिण के ईसाई मिशनरियों की शिक्षण-संस्थाओं के इर्द-गिर्द सीमित था।

वीरेशलिंगम पांटुलू

उन्नीसवीं सदी में पश्चिमी एवं दक्षिणी भारत में सुधार आंदोलन (Reform Movement in Western and Southern India in 19th Century)
वीरेशलिंगम पांटुलू

आधुनिक भारत के महानतम् बुद्धिजीवी विचारकों में एक वीरेशलिंगम् (1848-1919) स्त्री-शिक्षा और सहशिक्षा के समर्थक थे। उन्होंने अपने विचारों को क्रियात्मक रूप देने के लिए 1874 में धवलेश्वरम् में और 1884 में इन्निसपेटा में कन्या पाठशालाओं को स्थापित किया और राजमुंदड़ी से ‘विवेकवर्धनी’ (1874) नामक पत्रिका का प्रकाशन आरंभ किया। अपने लेखों और ‘ब्रह्मविवाहम्’ जैसे नाटकों के माध्यम से उन्होंने बाल-विवाह, दहेज-प्रथा जैसी सामाजिक कुरीतियों का मजाक उड़ाया। उन्होंने 1878 में ‘सोसायटी फॉर सोशल रिफॉर्म’ (संघसंस्कारनसमाजम्) एवं ‘राजमुंदड़ी सोशल रिफॉर्म एसोसिएशन’ नामक संगठन का गठन किया।

मद्रास प्रेसीडेंसी में तेलुगूभाषी क्षेत्रों में विधवा पुनर्विवाह के समर्थन में आंदोलन का आरंभ वीरेशलिंगम पांतुलु ने किया। वीरेशलिंगम् ने 1879 में विधवा-विवाह का खुला समर्थन करते हुए एक अन्य ‘विधवाविवाहसमुदाय’ का गठन किया (एक विधवा-विवाह-समुदाय मद्रास में 1774 भी स्थापित हुआ था जो बहुत क्रियाशील नहीं हो सका) और 1881 में घोर विरोध के बीच राजमुंदरी में एक सवर्ण विधवा का विवाह करवाया। 1883 में उन्होंने महिला हितों को पूर्णतया समर्पित एक मासिक-पत्रिका ‘साथहितबोधिनी’ शुरू किया, जिसके परिणामस्वरूप 1891 में नगर के गणमान्य नागरिकों के संरक्षण में एक ‘विधवा पुनर्विवाह संगठन’ (विडो रिमैरिज एसोसिएशन) की स्थापना हुई। किंतु इस उत्साह के बावजूद सुधारक केवल तब तक तीन विवाह का ही आयोजन कर सके थे। वीरेशलिंगम् ने विधवाओं के लिए 1897 में मद्रास में और 1905 में राजमुंदड़ी में निवासगृह बनवाया।

1893 में सरकार ने वीरेशलिंगम् को ‘राय बहादुर की पदवी प्रदान किया, किंतु उन्हें अधिक खुशी तब हुई जब वे 1898 में अखिल भारतीय समाज-सुधार कांग्रेस के सभापति चुने गये। 1899 में वे मद्रास प्रेसीडेंसी कॉलेज में तेलगू के अध्यापक नियुक्त किये गये। इस पद पर नियुक्त होने वाले वे आंध्र प्रदेश के पहले व्यक्ति थे। सेवा से अवकाश के बाद वे पुनः विधवाओं और अनाथ स्त्रियों के उत्थान में लग गये। 1905 में उन्होंने ‘हितकारिणीसमाजम्स्थापित किया, जिसे 1908 में सरकार ने भी मान्यता प्रदान कर दी। उन्होंने देवदासी प्रथा और वेश्यावृत्ति का भी विरोध किया। वीरेशलिंगम् आजीवन नारी-कल्याण के लिए कार्य करते रहे, यही कारण है कि रानाडे ने उन्हें दक्षिण भारत काईश्वरचंद्र विद्यासागर’ कहा था। वे आधुनिक तेलगु गद्य साहित्य के प्रवर्तक, प्रथम उपन्यासकार, प्रथम नाटककार और आधुनिक पत्रकारिता के प्रवर्तक माने जाते हैं।

मद्रास में 1867 में श्रीघरलू नायडू नेवेद समाज की स्थापना की, जिसे 1871 में ब्रह्म समाज ऑफ साउथ इंडिया’ के नाम से संगठित किया गया। बंगाल के साधारण ब्रह्मसमाजी नेता शिवनाथ शास्त्री ने मद्रास जाकर आंदोलन को शक्ति प्रदान किया। एम. बुचीआह और आर. वेंकटरत्नम इस समाज के प्रमुख नेता थे। इन संगठनों के अलावा, दक्षिण भारत में 1877 में माधवाचार्य के दर्शन पर आधारित ‘माधव सिद्धांत उन्नयिनी सभा’ तथा 1886 में तिनवेल्ली में ‘शैव सिद्धांत सभा’ का गठन किया गया। किंतु दक्षिण में ब्रह्म समाज आंदोलन की गति बहुत धीमी रही। मद्रास में ब्रह्म समाज से ज्यादा प्रार्थना समाज का प्रभाव था।

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