स्वामी दयानंद सरस्वती और आर्य समाज (Swami Dayanand Saraswati and Arya Samaj)

हिंदू धर्म एवं भारतीय संस्कृति से प्रभावित आर्य समाज के प्रवर्तक दयानंद सरस्वती का जन्म 12 फरवरी 1824 में गुजरात के छोटी-सी रियासत मोरवी के टंकारा नामक गाँव में एक धनी, किंतु रूढ़िवादी ब्राह्मण अंबाशंकर के घर हुआ था। मूल नक्षत्र में पैदा होने के कारण इनका नाम मूलशंकर रखा गया। कुशाग्र-बुद्धि एवं जिज्ञासु मूलशंकर ने 1845 में गृह-त्याग कर गेरुआ वस्त्र धारण कर लिया। उन्होंने भ्रमण करते हुए कई आचार्यों से शिक्षा प्राप्त की। प्रथमतः वे वेदांत के प्रभाव में आये और अद्वैत मत में दीक्षित हुए, जहाँ इनका नाम शुद्ध चैतन्य पड़ा। इसके पश्चात् वे स्वामी परमानंद से संन्यासियों की चतुर्थ श्रेणी में दीक्षित हुए और यहीं इनकी प्रचलित उपाधि ‘दयानंद सरस्वती हो गई।

स्वामी दयानंद सरस्वती और आर्य समाज (Swami Dayanand Saraswati and Arya Samaj)
स्वामी दयानंद सरस्वती

सत्य-ज्ञान की खोज में दयानंद सरस्वती ने 1860 में वैदिक साहित्य के प्रख्यात विद्वान् मथुरा के प्रज्ञाचक्षु स्वामी विरजानंद को अपना गुरु बनाया और वेदों का ज्ञान प्राप्त किया। विरजानंद ने दयानंद से कहा था: ‘‘मैं चाहता हूँ कि तुम संसार में जाओ और मनुष्यों में ज्ञान की ज्योति फैलाओ।’’ अपने गुरु के आदेश के अनुरूप दयानंद ने वैदिक धर्म में व्याप्त बुराइयों को दूर करने एवं वैदिक संस्कृति की श्रेष्ठता स्थापित करने का आजीवन प्रयत्न किया।

महर्षि दयानंद ने झूठे धर्मों का खंडन करने के लिए 1863 में हरिद्वार जाकर पाखंडखंडिनी पताका फहराई और मूर्ति-पूजा का विरोध किया। उनका कहना था कि, ‘‘यदि गंगा नहाने, सिर मुँड़ाने और भभूत मलने से स्वर्ग मिलता, तो मछली, भेड़ और गधा स्वर्ग के पहले अधिकारी होते।’’ वे 1872 में कलकत्ता गये और केशवचंद्र सेन के परामर्श पर संस्कृत भाषा के स्थान पर हिंदी भाषा में अपने विचारों का प्रचार करना आरंभ किये, जिससे उनकी लोकप्रियता में वृद्धि हुई।

स्वामी दयानंद ने ‘पाखंडखंडन’ (1866), ‘अद्वैतमत का खंडन’ (1873), ‘वेदभाष्य भूमिका’ (1876), ‘ऋग्वेद भाष्य’ (1877), ‘सत्यार्थ प्रकाश’ (1874), ‘पंचमहायज्ञ विधि’ (1875), ‘वल्लभाचार्य मत का खंडन’ (1875) आदि पुस्तकों की रचना की। ‘सत्यार्थ प्रकाश में उन्होंने सभी धर्मों के दोषों पर प्रकाश डालते हुए यह प्रमाणित करने का प्रयत्न किया है कि वैदिक धर्म ही सर्वश्रेष्ठ है। इसमें उन्होंने इस्लाम तथा ईसाई धर्म के आडंबरों तथा कर्मकांडों की खुलकर आलोचना की।

स्वामी दयानंद ने 10 अप्रैल 1875 को बंबई मेंआर्य समाजकी स्थापना की। इस समाज ने हिंदू धर्म को ईसाइयत और इस्लाम की तरह एक ग्रंथकेंद्रित धर्म के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश की। पश्चिम का आक्रामक प्रत्युत्तर देते हुए दयानंद ने बुद्धि और विज्ञान के पश्चिमी बौद्धिक संवाद को पूरी तरह आत्मसात किया और उनका उपयोग अपने विरोधियों के विरुद्ध किया। उनका दावा था कि, ‘‘वैज्ञानिक सत्यकेवल वेदों में थे और इसलिए इन ग्रंथों पर आधारित धर्म ईसाइयत और इस्लाम से श्रेष्ठ था।’’

वेदों की सत्ता के आधार पर दयानंद सरस्वती ने हिंदू धर्म में व्याप्त मूर्तिपूजा, बहुदेववाद, बलि प्रथा, प्रचलित मत-मतांतर, अवतारवाद, आडंबर, अंधविश्वास आदि की आलोचना की। उनका मानना था कि स्वार्थी और अज्ञानी पुरोहितों ने पुराणों जैसे ग्रंथों के सहारे हिंदू धर्म को भ्रष्ट कर दिया है। उनका विश्वास था कि कोई भी व्यक्ति सत्कर्म, ब्रह्मचर्य एवं ईश्वर की उपासना का सहारा लेकर मोक्ष प्राप्त कर सकता है। वैदिक धर्म श्रेष्ठतम् है क्योंकि यह वेदों पर आधारित है, जो ईश्वरीय हैं। यद्यपि वेद ईश्वर-प्रेरित हैं, किंतु उनकी व्याख्या मानव-विवेक द्वारा होनी चाहिए। मृतकों के श्राद्ध का विरोध करते हुए उन्होंने कहा कि परलोक में मृतक की आत्मा की शांति हेतु यहाँ दान देना एवं भोजन करवाना मूर्खता है। अभिवादन के लिए प्रचलित ‘नमस्ते’ शब्द आर्य समाज की ही देन है।

दयानंद सरस्वती ने समाज सुधार के क्षेत्र में बाल-विवाह, बहुविवाह, पर्दाप्रथा, सतीप्रथा, अशिक्षा आदि की निंदा की। उन्होंने स्त्री-शिक्षा तथा स्त्रियों को पुरुषों के समान अधिकार दिये जाने की वकालत की और विधवा-विवाह, अंतर्जातीय विवाह और स्त्री-शिक्षा का समर्थन किया। उनका मानना था कि स्त्रियों को भी वेदों का अध्ययन करने तथा यज्ञोपवीत धारण करने का अधिकार है।

विवाह की उम्र के संबंध में स्वामी का मानना था कि लड़कों का पच्चीस वर्ष तथा लड़कियों का सोलह वर्ष की आयु से पहले विवाह नहीं करना चाहिए। वे नियोग प्रथा के भी समर्थक थे, जिसके अनुसार विधवा स्त्री अपने पति के छोटे भाई अथवा छोटा भाई न होने पर परिवार के किसी अन्य सदस्य के साथ मिलकर नियोग द्वारा संतान उत्पन्न कर सकती थी, जिससे उसे संपत्ति में अधिकार मिल जाता था।

दयानंद ने सामाजिक समानता पर जोर दिया और छुआछूत एवं जातिप्रथा का निषेध किया, किंतु इसके साथ ही उन्होंने चार वर्णों की व्यवस्था का समर्थन किया और इस तरह भारतीय सामाजिक संगठन की बुनियाद को यथावत् रखा। उन्होंने ब्राह्मणों के प्रभुत्व का विरोध करते हुए सभी जातियों को वेदों के अध्ययन का अधिकार दिया। दूसरे शब्दों में ‘‘उन्होंने पपड़ियों (सामाजिक कुरीतियों की पपड़ियाँ) को धीरे-धीरे न तोड़ करके उन्हें एक ही चोट के ध्वस्त कर देने का निश्चय किया।’’

अपने उग्र विचारों के कारण स्वामी को रूढ़िवादियों के प्रबल विरोध का भी सामना करना पड़ा। उन पर पत्थर मारे गये, विष देने के प्रयत्न हुए, डुबाने की चेष्टा की गई, किंतु वे पाखंड के विरोध और वेदों के प्रचार के अपने पुनीत-कार्य में लगे रहे। यद्यपि उनका आक्रामक सुधारवाद पूर्वी और पश्चिमी भारत में हाशिये पर ही रहा, किंतु शीघ्र ही पंजाब और पश्चिमोत्तर प्रांत में स्थान-स्थान पर आर्य समाज की शाखाएँ स्थापित हो गईं। इसके बाद ग्वालियर, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, गुजरात आदि स्थानों पर आर्य समाज का प्रसार हुआ। 1883 में दयानंद की मृत्यु के समय तक लगभग पूरे देश में इसकी शाखाएँ फैल गईं और इसके बाद यह आंदोलन अधिकाधिक लोकप्रिय, साथ ही अधिकाधिक आक्रामक होता चला गया।

स्वामी दयानंद के बाद शिक्षा के प्रश्न को लेकर आर्य समाज दो भागों में बँट गया। एक के नेता लाला हंसराज तथा दूसरे के नेता स्वामी श्रद्धानंद (मुंशीराम) थे। लाला हंसराज पर पाश्चात्य शिक्षा का बहुत प्रभाव था। उनके प्रयत्नों से अनेक स्थानों पर डी..वी. (दयानंद एंग्लोवैदिक) के नाम से स्कूलों एवं कॉलेजों की स्थापना हुई। 1886 में लाहौर में दयानंद एंग्लोवैदिक स्कूल की स्थापना की गई, जो 1889 में दयानंद एंग्लो कॉलेज में बदल गया। इस कॉलेज में पश्चिमी पद्धति से पठन-पाठन किया जाता था। स्वामी श्रद्धानंद (मुंशीराम) प्राचीन गुरुकुल प्रणाली के समर्थक थे। उनके प्रयत्नों से 1900 में गुरुकुल कांगड़ी नामक संस्था की स्थापना हुई, जो कालांतर में प्रसिद्ध विश्वविद्यालय बन गया। डी.ए.वी. और गुरुकुल कांगड़ी दोनों ही पद्धतियों के संस्थानों ने भारतीय संस्कृति की उपलब्धियों को उजागर करने और विद्यार्थियों के मन में आत्म-गौरव की भावना भरने का काम किया।

आर्य समाज के सुधार कार्य ने समाज की बुराइयाँ खत्म करके जनता को एकताबद्ध करने का प्रयास किया, मगर उसके धार्मिक कार्य में संभवतः अचेतन रूप में ही विकासमान हिंदुओं, मुसलमानों, पारसियों, सिखों और ईसाइयों के बीच पनप रही राष्ट्रीय एकता को भंग करने की प्रवृत्ति भी थी। 1893 के बाद इस समाज के एक जुझारू गुट ने धर्म-परिवर्तन करने वाले हिंदुओं को शुद्ध कर पुनः हिंदू धर्म में शामिल करने और अपनी खोई हुई जमीन दोबारा पाने के लिए पंडित गुरुदत्त और पं. लेखराम के नेतृत्व में एक शुद्धिआंदोलन आरंभ किया। 1890 के दशक में आर्य समाज जोर-शोर से ‘गोरक्षा आंदोलनमें लग गया और इस तरह सुधारवाद से निर्णायक सीमा तक हटकर पुनरुत्थानवाद पर पहुँच गया। 1857 में हिंदुओं और मुसलमानों के बीच जो सद्भाव उपस्थित था, उसकी नींव यहीं से हिलनी आरंभ हो गई।

स्वामी दयानंद सरस्वती का मुख्य लक्ष्य राजनीतिक स्वतंत्रता था। उनका मानना था कि अच्छा से अच्छा विदेशी राज्य भी स्वराज्य का मुकाबला नहीं कर सकता है। उन्होंने सत्यार्थ प्रकाश में एक ऐसे स्वतंत्र भारत की कल्पना की, जिसमें स्वकीय संस्कृति तथा सभ्यता की अमूल्य परंपराएँ अक्षुण्ण हैं। स्वामी जी पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार और स्वदेशी के उपयोग पर बल दिया। उनके दो नारों ‘भारत भारतीयों का है और ‘वेदों की ओर लौटो से भारतीयों में देशभक्ति की भावना का संचार हुआ। यही कारण है कि बाल गंगाधर तिलक ने स्वामी को ‘स्वराज्य का प्रथम संदेश वाहकऔर सावरकर नेस्वाधीनता संग्राम का प्रथम योद्धा कहा है।

देव समाज

प. शिवनारायण अग्निहोत्री ने 1887 में इस समाज की स्थापना की, जो परमात्मा के स्थान पर प्रकृति में विश्वास करता था। इस समाज का मुख्य उद्देश्य आत्मा की शुद्धि, गुरु की श्रेष्ठता की स्थापना एवं अच्छे मानवीय कार्य करना था। इसने आदर्श सामाजिक व्यवहारों, जैसे- रिश्वत न लेना, मांसाहारी भोजन एवं मद्यपान का निषेध एवं हिंसात्मक कार्यों से दूर रहने इत्यादि को अपनाने पर जोर दिया। इस समाज की शिक्षाओं को ‘देव शास्त्र’ नामक पुस्तक में संकलित किया गया है। फिरोजपुर में देवसमाज गर्ल्स कॉलेज ने स्त्री-शिक्षा की दिशा में महत्त्वपूर्ण कार्य किया।

राधास्वामी समाज

उत्तर भारत में आगरा (उत्तर प्रदेश) में एक बैंकर तुलसीराम ने, जिन्हें शिवदयाल के नाम से भी जाना जाता था, 1861 में राधास्वामी समाज की नींव रखी। यह आध्यात्मिक संगठन हिंदुओं के कर्मकांड, विधि-विधान का विरोध करता था। इसमें दलित और पिछड़ी जातियों के लोग भी शामिल थे। शिक्षा के क्षेत्र में इस संस्था ने महत्त्वपूर्ण कार्य किये। इस संस्था में गुरुभक्ति की प्रधानता रही। गुरु ही ज्ञान, सत्य और ईश्वर का अवतार है। इसके सिद्धांत थे कि ईश्वर पूर्ण है और उसे योग तथा तपस्या के द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। इस आंदोलन के अनुयायियों का दरगाह एवं अन्य धार्मिक स्थलों पर जाने में विश्वास नहीं था। वे सत्य एवं विश्वास तथा सेवा एवं प्रार्थना को सर्वोच्च प्राथमिकता देते थे।

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