1813 का चार्टर ऐक्ट (Charter Act of 1813)

1813 का चार्टर ऐक्ट (Charter Act of 1813)

जब 1813 में कंपनी के चार्टर ऐक्ट की अवधि समाप्त होने को थी तो इस विषय में बहुत वाद-विवाद हुआ कि कंपनी के व्यापारिक अधिकारों को बढाया जाए अथवा नहीं। इस वाद-विवाद के कई कारण थे।

एक तो यह कि कंपनी का भारतीय क्षेत्र बहुत विस्तृत हो गया था और इतने विस्तृत क्षेत्र पर कंपनी के लिए व्यापारिक तथा राजनीतिक अधिकारी के रूप में कार्य करना संभव नहीं लग रहा था।

दूसरे, उस समय इंग्लैंड में एडम स्मिथ के व्यक्तिवादी सिद्धांत के कारण कंपनी के व्यापारिक एकाधिकार का प्रबल विरोध हो रहा था। विरोध का एक प्रमुख कारण यह भी था कि 1808 में फ्रांस के शासक नेपोलियन की महाद्वीप व्यवस्था से अंग्रेजों के व्यापार को बहुत हानि पहुँची थी, इसलिए इंग्लैंड का व्यापारी वर्ग माँग कर रहा था कि सभी लोगों को भारत के साथ व्यापार करने की स्वतंत्रता दी जाए, ताकि नेपोलियन की महाद्वीपीय व्यवस्था से हुए नुकसान की भरपाई की जा सके।

ईसाई धर्म प्रचारक संसद के अंदर और बाहर यह आंदोलन चला रहे थे कि उन्हें भारत में धर्म-प्रचार के लिए विशेष सुविधाएँ प्रदान की जायें। इसके अलावा, लॉर्ड वेलेजली की विस्तारवादी युद्धनीति के कारण कंपनी की आर्थिक स्थिति दयनीय हो गई थी और वह कर्ज के बोझ से दबती जा रही थी।

इस प्रकार कंपनी के एकाधिकार को समाप्त करने, ईसाई मिशनरियों द्वारा भारत में धार्मिक सुविधाओं की माँग, वेलेजली की भारत में आक्रामक नीति तथा कंपनी की आर्थिक स्थिति के कारण संसद ने 11 मार्च 1808 को कंपनी के मामलों की जाँच करने के लिए एक समिति नियुक्त की। इस समिति की रिपोर्टों के आधार पर ब्रिटिश संसद ने कंपनी के मामलों में हस्तक्षेप किया और 1813 का राजपत्र (चार्टर ऐक्ट) पारित किया।

1813 के चार्टर ऐक्ट के प्रमुख उपबंध (Major Provisions of Charter Act of 1813)

1813 के चार्टर ऐक्ट के द्वारा ब्रिटिश संसद ने कंपनी को अगले बीस वर्ष के लिए पूर्वी देशों (भारत एवं चीन आदि) के साथ व्यापार करने की अनुमति दे दी।

इस ऐक्ट के अनुसार कंपनी का भारतीय व्यापार पर एकाधिकार समाप्त कर दिया गया और सभी ब्रिटिश व्यापारियों को भारत से व्यापार करने की स्वतंत्रता मिल गई, किंतु इसके लिए उन्हें लाइसेंस और परमिट लेना अनिवार्य था।

चाय का व्यापार तथा चीन के साथ व्यापार का एकाधिकार कंपनी के हाथों में ही सुरक्षित रहने दिया गया। कंपनी के भागीदारों को भारतीय राजस्व से 10.5 प्रतिशत लाभांश मिलने लगा।

भारत में ईसाई धर्म के प्रचार की अनुमति मिल गई और इसके लिए अधिकारियों की नियुक्ति की व्यवस्था की गई। ऐक्ट में कहा गया था कि भारत में रहनेवाले तथा वहाँ जानेवाले सभी लोगों को भारतीयों में उपयोगी ज्ञान, धर्म तथा नैतिक उत्थान के प्रचार का अधिकार होगा। भारत में रहनेवाले यूरोपियनों की आध्यात्मिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए कलकत्ता में एक बिशप तथा तीन पादरी नियुक्त करने की व्यवस्था की गई। इस तरह ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए भारत में एक सरकारी गिरजाघर की स्थापना करना अनिवार्य हो गया।

इस अधिनियम का सबसे अधिक महत्वपूर्ण प्रावधान यह था कि पहली बार कंपनी ने भारतीयों में शिक्षा, साहित्य और विज्ञान की प्रगति के लिए एक लाख रुपया प्रतिवर्ष खर्च करने की व्यवस्था की।

भारत में कंपनी के प्रदेशों की स्थानीय सरकारों को सुप्रीम कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में रहते हुए वहाँ की जनता पर टैक्स लगाने का अधिकार दिया गया और टैक्स न देनेवालों के लिए दंड देने की व्यवस्था की गई। जिन मुकदमों में एक तरफ अंग्रेज और दूसरी तरफ भारतीय थे, उनके निर्णय की विशेष व्यवस्था की गई। चोरी, जालसाजी तथा नकली सिक्के बनानेवालों के लिए विशेष दंड देने के लिए नियम बनाये गये। इस ऐक्ट में कंपनी के ऋण को घटाने के लिए भी कदम उठाये गये।

कंपनी को अपने व्यापारिक तथा शासन-संबंधी खातों को अलग-अलग रखने का आदेश दिया गया। भारतीय राजस्व से वेतन पानेवाली ब्रिटिश सेना की संख्या 29,000 निश्चित कर दी गई। इसके अतिरिक्त कंपनी को भारतीय सैनिकों के लिए कानून तथा नियम बनाने का अधिकार मिल गया।

गवर्नर जनरल, प्रधान सेनापति और प्रांतीय गवर्नरों की नियुक्ति कंपनी के संचालकों द्वारा की जाती थी, परंतु उन नियुक्तियों के लिए अंतिम स्वीकृति ब्रिटिश सम्राट से प्राप्त करना अनिवार्य था। इसके अतिरिक्त उन पर नियंत्रण बोर्ड के अध्यक्ष के हस्ताक्षर भी आवश्यक थे।

इस ऐक्ट द्वारा कंपनी के नागरिक तथा सैनिक कर्मचारियों के लिए प्रशिक्षण की व्यवस्था की गई। हेलबरी का कॉलेज, ऐटिसकौम्बी का सैनिक शिक्षणालय को बोर्ड ऑफ कंट्रोल की देख-रेख में रखने का निश्चय किया गया। कलकत्ता तथा मद्रास के कालेजों को भी नियंत्रण बोर्ड के नियमों के अनुसार चलाने की व्यवस्था की गई।

1813 के चार्टर ऐक्ट का मूल्यांकन (Evaluation of Charter Act of 1813)

यह चार्टर ऐक्ट पूर्णतः महत्त्वहीन नहीं कहा जा सकता है। इसके द्वारा भारतीय व्यापार पर कंपनी के एकाधिकार को समाप्त कर संपूर्ण ब्रिटिश प्रजा को भारत से व्यापार करने का अधिकार मिला। अंग्रेज व्यापारियों के भारत के साथ व्यापार करने से इंग्लैंड का व्यापार आगामी पचास वर्षों में सात गुना हो गया। व्यापार की इस वृद्धि से अंग्रेज व्यापारियों ने नेपोलियन की महाद्वीपीय व्यवस्था से हुई आर्थिक हानि की भरपाई की।

ब्रिटिश पूँजी और उद्यम के स्वतंत्र आगमन से भारत में शोषण के एक नये चरण का आरंभ हुआ। अंग्रेज व्यापारियों के बढ़िया तथा सस्ते माल ने भारतीय व्यापार तथा उद्योगों का सत्यानाश कर दिया, जिसका परिणाम हुआ कि उद्योग-प्रधान देश भारत कृषि-प्रधान देश हो गया। सर एल्फ्रेड लायल के शब्दों में ‘भारतीय करघों का बना हुआ कपड़ा लंकाशायर के कारखानों में तैयार हुए माल का मुकाबला नहीं कर सका, धीरे-धीरे भारत उद्योग-क्षेत्र में बहुत पीछे रह गया और जनता का मुख्य व्यवसाय कृषि बन गया।’

यह ऐक्ट इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है कि कंपनी के प्रदेशों पर वास्तविक सत्ता इंग्लैंड के सम्राट की मानी गई थी। संवैधानिक दृष्टि से यह घोषणा बहुत महत्त्वपूर्ण थी। इंग्लैंड में बहुत समय से लोकमत कंपनी के व्यापारिक एकाधिकार का विरोध कर रहा था और सबको भारत से स्वतंत्र व्यापार का अधिकार दिये जाने की माँग कर रहा था। संसद ने लोकमत का आदर करते हुए कंपनी के एकाधिकार पर गहरी चोट की।

इस ऐक्ट का महत्त्व इस बात में भी है कि इसके द्वारा भारतीयों की शिक्षा के लिए भी एक लाख रुपये प्रतिवर्ष खर्च करने की व्यवस्था की गई। यद्यपि इस दिशा में अगले बीस वर्ष तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया और एक लाख रुपया प्रतिवर्ष जमा होता रहा, तथापि यह कम महत्वपूर्ण नहीं है कि इस ऐक्ट के द्वारा ब्रिटिश सरकार ने पहली बार भारतीयों के बौद्धिक उत्थान का दायित्व अपने ऊपर लिया।

इस ऐक्ट के द्वारा भारत में ईसाई मिशनरियों को ईसाई धर्म का प्रचार करने की छूट मिल गई। भारत में गिरजाघर, स्कूल तथा कालेज स्थापित किये गये और उनके माध्यम से ईसाई धर्म का प्रचार किया गया। ऐक्ट में यह कहा गया था कि कंपनी की नीति भारतीयों को अपने धर्म का पूर्ण पालन करने की स्वतंत्रता देने की है।

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