सल्तनतकालीन प्रशासन (Sultanate Administration)

इस्लाम में एक राज्य इस्लामी राज्य, एक ग्रंथ कुरान, एक धर्म इस्लाम और एक जाति मुसलमान की अवधारणा है।

मुहम्मद पैगम्बर के बाद प्रारंभ में चार खलीफा हुए, हजरत अबूवक्र, हजरत उमर, हजरत उस्मान ओर हजरत अली।

प्रारंभ में खलीफा का चुनाव होता था किंतु आगे चलकर खलीफा का पद वंशानुगत हो गया।

661 ई. में उम्मैया वंश खलीफा के पद पर प्रतिष्ठित हुआ और उसका केंद्र दमिश्क (सीरिया) था।

750 ई. में अब्बासी खलीफा स्थापित हुए और उनका केंद्र बगदाद था।

1253 ई. में चंगेज खाँ के पोते हलाकू खाँ ने बगदाद के खलीफा की हत्या कर दी, इसके बाद खलीफा की सत्ता का केंद्र मिस्र हो गया।

बाद में खलीफा के पद के कई दावेदार हो गये थे, जैसे स्पेन का उम्मैया वंश, मिस्र का फातिमी वंश और बगदाद के अब्बासी वंश।

प्रारंभ में एक ही इस्लाम राज्य था, किंतु बाद में विभिन्न क्षेत्रों के गवर्नर स्वतंत्र होने लगे तो इस्लामी एकता के लिए खलीफा ने गवर्नरो को शासन करने का सनद देना शुरू किया।

खलीफा से सनद पानेवाले गवर्नर सुल्तान कहे जाने लगे।

सैद्धांतिक रूप से खलीफा ही भौतिक एवं आध्यात्मिक प्रधान होता था और सुल्तान उसका नायब होता था।

इल्तुतमिश दिल्ली का प्रथम वैधानिक सुल्तान था।

मुहम्मद बिन तुगलक ने 1347 ई. में खलीफा से सनद प्राप्त की थी।

फिरोज तुगलक मुस्लिम भारत का प्रथम सुल्तान था जिसने अपने सिक्कों पर खलीफा का नायब खुदवाया।

फिरोज तुगलक ने शासन के अंतिम 6 वर्षों में खलीफा से दो बार सनद प्राप्त की।

मुबारकशाह खिलजी दिल्ली का एक मात्र सुल्तान था जिसने स्वयं को खलीफा घोषित किया।

केंद्रीय शासन

भारत का मुस्लिम राज्य धर्म-प्रधान राज्य था।

सैद्धांतिक रूप से दिल्ली सल्तनत एक इस्लामी राज्य था, किंतु व्यवहारिक रूप में यहाँ शरियत के कानून का पालन नहीं होता था।

बरनी ने दिल्ली सल्तनत को इस्लामी राज्य न मानकर व्यवहारिक और लौकिक (जहाँदारी) माना है।

सुल्तान सीजर (राजनैतिक क्षेत्र में सर्वप्रधान) तथा पोप (धार्मिक क्षेत्र में सर्वप्रधान) का मिश्रित रूप समझा जाता था।

सिद्धांततः धार्मिक मामलों में सुल्तान की शक्ति कुरान के पवित्र कानून द्वारा सीमित थी।

अलाउद्दीन के अतिरिक्त कोई सुल्तान स्पष्ट रूप से धर्म की राजनीति से अलग नहीं रख सका।

व्यवहारतः भारत का मुस्लिम सुल्तान एक स्वेच्छाचारी शासक था।

दिल्ली के सुल्तान समय-समय पर बगदाद तथा मिस्र के खलीफाओं के प्रति केवल शिष्टाचार-युक्त स्वामिभक्ति प्रदर्शित करते थे।

सुल्तान समस्त शासन-प्रणाली का प्रधान था।

सुल्तान की प्रभुता का वास्तविक साधन सैनिक शक्ति था।

सुल्तान कार्यपालिका के प्रधान के रूप में उन अधिकारियों तथा मंत्रियों की सहायता से शासन चलाता था, जिन्हें वह स्वयं चुनता था।

दिल्ली का राज्य सैनिक प्रकृति का था और सुल्तान प्रधान सेनापति था।

दिल्ली का सुल्तान प्रमुख कानून-स्रष्टा एवं अपील का अंतिम न्यायालय भी था।

दिल्ली सल्तनत में उत्तराधिकार का कोई स्वीकृत कानून नहीं था।

सुल्तान का चुनाव प्रायः मृत सुल्तान के परिवार के जीवित बचे सदस्यों तक ही सीमित रहता था।

सुल्तान के मित्रों एवं विश्वसनीय अधिकारियों की मजलिस-ए-खलबत नामक एक परिषद् होती थी।

सुल्तान मजलिस-ए-खलबत से राज्य के महत्त्वपूर्ण विषयों पर परामर्श लेता था।

मजलिस-ए-खलबत (परिषद्) के सदस्य अपनी सम्मतियाँ व्यक्त करते थे, किंतु सुल्तान उन्हें मानने के लिए बाध्य नहीं था।

सुल्तान सभी दरबारियों, खानों, मलिकों तथा अमीरों से मजलिस-ए-खास नामक दरबार में मिलता था।

सुल्तान सर्वोच्च न्यायाधीश के रूप में बार-ए-आजन में मुकदमें सुनता था।

केंद्रीय सरकार का सर्वोच्च अधिकारी वजीर था, जिसके नियंत्रण में राज्य के अन्य विभाग होते थे।

अपीलों का विभाग दीवान-ए-रसालत था।

दीवाने-अर्ज सैनिक विभाग था।

दीवाने-इंशा पत्राचार विभाग कहलाता था।

दीवाने-बंदगान दास विभाग था।

दीवाने-कजा-मसालिक न्याय विभाग कहलाता था।

दीवाने-अमीरकोही एक कृषि-विभाग था, जिसे मुहम्मदबिन तुगलक ने गठित किया था।

दीवाने-मुस्तखराज बकाया लगान वसूल करनेवाला विभाग था जिसे अलाउद्दीन खिलजी ने स्थापित किया था।

फीरोज शाह के राज्यकाल में दीवाने खैरात या दान-विभाग स्थापित हुआ था।

पेंशन-विभाग को दीवाने-ए-इस्तिफाक कहते थ।

वजीर के नियंत्रण में टकसाल, दान की संस्थाएँ तथा कारखाने थे।

मुस्तौफी-ए-मुमालिक या आडीटर-जनरल का काम राज्य के खर्चों को जाँचना था।

मुखरिफ-ए-मुमालिक सरकार द्वारा दिये गये ऋणों के कागजात सुरक्षित रखता था।

खजीन कोषाध्यक्ष कहलाता था।

अमीरे-बहर नावों का नियंत्रणकर्ता था।

बख्शी-ए-फौज फौज को वेतन देता था।

तुगलक काल मुस्लिम भारतीय विजारत का स्वर्ण-काल था।

सैय्यदों के समय में विजारत की शक्ति घटने लगी तथा अफगानों के अधीन वजीर का पद अप्रसिद्ध हो गया।

काजी-उल-कुजात अथवा प्रमुख न्यायाधीश न्याय करता था।

काजी-उल-कुजात को कानून की व्याख्या करने में मुफ्ती सहायता देते थे।

कानून कुरान के आदेशों पर आधारित था।

अलाउद्दीन तथा मुहम्मदबिन तुगलक-जैसे शासक न्याय करने में नीति का विचार करते थे।

दंड-विधान अत्यंत कठोर था तथा अपराधियों को अंग-भंग तथा मृत्यु के दंड देना आम बात थी।

अपराध स्वीकार कराने के लिए बल तथा यातना का प्रयोग किया जाता था।

ऋण-संबंधी कानून कठोर थे तथा महाजन कर्जदारों से अपना बकाया प्राप्त करने के लिए प्रायः राजकीय सहायता लेते थे।

कोतवाल शांति एवं व्यवस्था का संरक्षक था।

मुहतसिब लोगों के आचरण, बाजार तथा नाप-तौल पर कडी नजर रखता था।

गुप्तचर सुल्तान को लोगों के हरकतों की सूचना देते रहते थे।

पुराने किले बंदीगृहों के रूप में प्रयोग होते थे।

बंदीगृह के नियम ढीले थे तथा अधिकारियों में भ्रष्टाचार था।

भारत के तुर्की सुल्तानों की आर्थिक नीति मुस्लिम कानूनविदों की हनफी विचारधारा के वित्तीय सिद्धांत के ढाँचे पर थी।

हनफी विचारधारा के वित्तीय सिद्धांत तुर्की सुल्तानों ने गजनवियों से लिया था।

दिल्ली सल्तनत के राजस्व के प्रमुख साधन थे- खिराज अथवा भूमिकर, खुम्स, जजिया और जकात।

खिराज भूमिकर जनता से लिया जाता था।

अलाउद्दीन उपज पर 50 प्रतिशत भूमिकर लेता था।

खुम्स अथवा लड़ाई में लूटे गये माल का 20 प्रतिशत (पाँचवाँ भाग) होता था, जो राज्य को मिलता था।

अलाउद्दीन ने खुम्स में 80 प्रतिशत लेता था।

जजिया एक प्रकार से गैर-मुस्लिमों से लिया जानेवाला कर था।

जजिया नकद अथवा अनाज दोनों रूपों में लिया जाता था।

जकात केवल मुसलमानों से लिया जाता था जो उनकी आय का 40वां हिस्सा होता था।

भूमि को ठेके पर देने की प्रथा प्रचलित थी।

सल्तनत की स्थायी सेना में राजकीय अंगरक्षक और राजधानी की फौज सम्मिलित थी।

सल्तनत की सेना में भिन्न-भिन्न जातियों के लोग जैसे तुर्क, खताइअन, पारसी तथा भारतीय भरती किये जाते थे।

दिल्ली सल्तनत में सेना की प्रमुख शाखाएँ थीं- पैदल, जिसमें बहुत-से धनुर्धारी रहते थे, घुड़सवार और हाथी।

इल्तुतमिश राज्यकाल से ही ऊँचाई और दूर तक आग लगाकर फेंके भेजे जानवाले, जल उठानेवाले, एक तेल-विशेष (नपथा) के गोलों तथा जोर से गोले फेंकनेवाले यंत्र का उपयोग होता था।

मंजनीक, मंगोनेल और मंगोन एक प्रकार की कलदार तोपें थीं।

कलदार तोप मध्यकालीन भारत में घेरा डालने में प्रयुक्त होती थी।

दिल्ली के तुर्की सुल्तान दरबार करते थे, यद्यपि यह मुगलों के दरबार की तरह ऐश्वर्यशाली नहीं था।

सुल्तानों तथा राज-परिवार के शाहजादों की स्त्रियों तथा रखैलों से भरे जनानखाने (हरम) राजप्रासाद के अंग होते थे।

महत्त्वपूर्ण पदाधिकारी

सुल्तान मजलिस-ए-खलवत में अपने महत्त्वपूर्ण मित्रों, परामर्शदाताओं और विद्वानों से विचार विमर्श करता था।

बर्र-ए-खास में सुल्तान महत्त्वपूर्ण मलिकों, अमीरों एवं अन्य महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों से मिलता था।

दीवान-ए-विजारत में वजीर का पद अधिक महत्त्वपूर्ण था।

इल्तुतमिश का वजीर निजामुल मुल्क जुनैदी था।

दीवान-ए-विजारत विभाग भू-राजस्व का आकलन, आय व्यय का आकलन आदि से जुड़ा हुआ विभाग था।

बलबन के समय दीवान-ए-विजारत विभाग का महत्व कम हो गया था।

तुगलक काल में दीवान-ए-विजारत विभाग सबसे महत्त्वपूर्ण हो गया था।

गयासुद्दीन तुगलक विशेष बातों पर परामर्श के लिए भूतपूर्व वजीरों से भी मंत्रणा करता था।

वजीर की सहायता के लिए दो अधिकारी- मुस्तरिफ (महालेखाकार) और मुस्तौफी (महालेखा परीक्षक) होते थे

दीवान-ए-इंशा राजकीय पत्राचार से संबंधित विभाग था।

दीवान-ए-कजा विभाग न्याय से संबंधित था।

दीवान-ए-रिसालत को विदेश विभाग माना जाता है। कुछ विद्वान धार्मिक विभाग मानते हैं जिसका प्रधान सद्र-उस-सद्र (मुख्य सद्र) होता था।

दीवान-ए-आरिज विभाग की स्थापना बलवन ने की।

दीवान-ए-आरिज विभाग सेना की नियुक्ति, उनके प्रशिक्षण और सैनिक प्रशासन से जुड़ा हुआ था।

अलाउद्दीन खिलजी के समय दीवान-ए-आरिज विभाग ने हुलिया और दाग की प्रणाली अपनाई।

गुप्तचर विभाग का प्रधान बरीद-ए-मुमालिक होता था।

जलालुद्दीन खिलजी ने दीवान-ए-वक्फ विभाग की स्थापना की जो राजकीय व्यय का ब्यौरा रखता था।

अलाउद्दीन खिलजी ने दीवान-ए-मुस्तखराज विभाग की स्थापना भू-राजस्व की वसूली के लिए की।

अलाउद्दीन खिलजी ने बाजार नियंत्रण नीति को लागू करने के लिए दीवान-ए-रियासत विभाग की स्थापना की।

दोआब क्षेत्र में कृषि सुधार को क्रियान्वित करने के लिए मुहम्मद बिन तुगलक ने दीवान-ए-कोही की स्थापना की।
दीवान-ए-कोही का प्रधान अमीर-ए-कोही होता था।

फिरोज तुगलक ने दासों से संबंधित दीवान-ए-बंदगान विभाग की स्थापना की।

फिरोज तुगलक ने गरीबों के कल्याण के लिए दीवान-ए-खैरात विभाग की स्थापना की।

वकील-ए-दर कारखानों का प्रधान होता था जो राजकीय कारखानों का निरीक्षण करता था।

दीवान-ए-हाजीब दरबार की कार्यवाहियों की देखरेख करता था।

सर-ए-जानदार सुल्तान की व्यक्तिगत सुरक्षा से जुड़ा हुआ अधिकारी था।

अमीर-ए-मजलिस शाही दावतों एवं आयोजनों की देखरेख करता था।

शाही अस्तबल का प्रधान अमीर-ए-अखूर होता था।

शहना-ए-पील हस्तशाला का प्रधान होता था।

सुल्तान की स्थिति कमजोर होने पर नायब-ए-ममलिकात पद का सृजन किया गया।

इख्तियारउद्दीन ऐतिगीन प्रथम नायब-ए-ममलिकात था।

मुबारक शाह के बाद नायब-ए-ममलिकात पद समाप्त हो गया।
खुसरो अंतिम नायब-ए-ममलिकात था।

प्रांतीय शासन

सुल्तान का प्रत्यक्ष प्रभाव उसके अत्यंत निकटस्थ दुर्गों तथा चैकियोंवाले क्षेत्र तक ही सीमित होता था।

सुदूरवर्ती प्रांत राजप्रतिनिधियों के अधीन थे, जिन्हें नायब सुल्तान कहा जाता था।

प्रांतों की संख्या बीस से पच्चीस के भीतर थी।

प्रांत कई छोटे-छोटे टुकड़ों में बँटा था, जो मुक्तों या आमिलों के नियंत्रण में थे।

प्रत्येक प्रांत साम्राज्य का प्रतिरूप था तथा नायब सुल्तान अपने प्रदेश मेंएक निरंकुश शासक की भाँति कार्यपालक, न्यायपालक तथा सैनिक अधिकारों का उपयोग करता था।

नायब सुल्तान पर केवल केंद्रीय सरकार का नियंत्रण रहता था।

इब्नबतूता का मानना है कि मुहम्मद बिन तुगलक के समय 23 प्रांत थे।

इक्ता का विभाजन शिक में होता था।

संभवतः 1279 ई. में बलबन के समय पहली बार शिक का निर्माण हुआ। इस पर शिकदार नामक अधिकारी नियुक्त किये जाते थे।

शिक का विभाजन परगनों में होता था और इस पर आमिल नामक अधिकारी नियुक्त किये जाते थे।

अफीफ के अनुसार फिरोज तुगलक के समय दोआब में 55 परगने थे।

इब्नबतूता एक और प्रशासनिक ईकाई ‘सदी’ की चर्चा करता है जो परगना के नीचे होता था।

सदी 100 या 84 गाँवों का समूह होता था और इस पर चौधरी नामक अधिकारी नियुक्त होता था।

प्रशासन की सबसे छोटी ईकाई गाँव थी।

नायब सुल्तान का वेतन उसके प्रांत के राजस्व से मिलता था तथा शासन का खर्च काटने के बाद शेष राजस्व केंद्रीय कोष में भेज दिया जाता था।

नायब सुल्तान स्थानीय सेना रखता था तथा कभी-कभी उसे सुल्तान को सैनिक सहायता देनी पड़ती थी।

मुस्लिम सरदारों का राज्य में सेनापतियों, शासकों तथा कभी-कभी राजा बनानेवालों के रूप में बहुत प्रभाव था।

मुस्लिम सरदारों में अधिकतर तुर्क ही थे, पर इसमें दूसरी जातियों के लोग भी थे, अरब, अफगान, अबिसीनियन (हब्शी) मिस्री जवाई तथा भारतीय।

स्वभावतः सरदार बहुधा अपनी पारस्परिक प्रतिद्वंद्विताओं में फंसे रहते थे।

अर्थव्यवस्था

दिल्ली के सुल्तानों तथा कुछ छोटे प्रांतीय शासकों ने केवल अपनी राजनैतिक एवं प्रशासनिक आवश्यकताओं के लिए व्यवसायों और व्यापार को प्रोत्साहन दिया।

दिल्ली के शाही कारखानों में सुल्तानों की माँगों की पूर्ति के लिए दूसरी चीजों के कारीगरों के अतिरिक्त कभी-कभी रेशम के चार हजार जुलाहे नियुक्त किये जाते थे।

आज की तरह कारखाने (फैक्ट्रियाँ) अथवा बड़े पैमाने पर व्यवसायिक संगठन नहीं थे।अधिकतर कारीगरों का संबंध सीधे व्यापारियों से रहता था।

कभी-कभी कारीगर अपने माल को मेलों में बेचते थे।

कृषि अधिकतर लोगों की जीविका थी।

कृषि के अलावा कुछ महत्त्वपूर्ण व्यवसाय भी थे जैसे- बुनाई का व्यवसाय, रंगने का व्यवसाय तथा सूती कपड़े पर नक्शा छपाई, चीनी का व्यवसाय धातु का कार्य, पत्थर तथा ईंट का कार्य तथा कागज का व्यवसाय आदि।

कुछ महत्त्वपूर्ण छोटे व्यवसाय भी थे- प्याले बनाना, जूते बनाना, अस्त्र बनाना विशेषकर धनुष तथा बाण, इत्रों, आसवों तथा मादक द्रव्यों का व्यवसाय इत्यादि।

बंगाल तथा गुजरात बुने हुए सामानों के व्यवसाय और निर्यात में विशेष रूप से प्रसिद्ध थे।

बंगाल के माल की उत्तमता की प्रशंसा अमीर खुसरो तथा विदेशी यात्रियों ने की है।

बार्थेमा सोलहवीं सदी के प्रारम्भिक भाग (1503-1508 ई.) में भारत आया था।

बारबोसा भारत में 1518 ई. के लगभग आया था।

समुद्र-मार्ग से भारत का व्यापारिक संबंध यूरोप के दूरस्थ क्षेत्रों, मलय द्वीप-पुंज तथा चीन एवं प्रशान्त महासागर के अन्य देशों के साथ था।

स्थल-मार्गों से भारत का संबंध मध्य एशिया, अफगानिस्तान, फारस, तिब्बत और भूटान के साथ था।

मसालिकुल-अवसर के अनुसार सभी देशों के व्यापारी भारत से शुद्ध सोना ले जाने से कभी नहीं चूकते तथा उसके साथ ही जडी-बूटियों गोंद के सामान ले जाते हैं।

भारत में आयात की मुख्य वस्तुएं थीं- धनी वर्ग के लिए विलास की वस्तुएँ, घोडे एवं खच्चर आदि।

भारत निर्यात की मुख्य वस्तुएं थी- कृषि-संबंधी माल और बुने हुए सामान।

कम महत्त्वपूर्ण निर्यात की वस्तुएं थीं- सफेद मिलावटी धातु, अफीम, नील की टिकिया आदि।

फारस की खाड़ी के चारों ओर के कुछ देश अपने भोजन की आपूर्ति के लिए भारत पर पूर्णतः निर्भर थे।

भारत के निर्यात-व्यापार के लिए मुख्यतः बंगाल तथा गुजरात के बंदरगाह प्रयुक्त होते थे।

बर्थोमा ने बंगाल को रुई, अदरक, चीनी अन्न तथा हर प्रकार के माँस के लिए संसार का सबसे अधिक समृद्ध देश समझा जाता था।

संपूर्ण युग में वस्तुओं के मूल्य एक से नहीं थे।

दुर्भिक्ष तथा अभाव के समय में असाधारण रूप से बढ़ जाते थे, पर अत्याधिक उत्पादन के समय में बहुत घट जाते थे।

मुहम्मद बिन तुगलक के राज्यकाल में भीषण दुर्भिक्षों के कारण अनाज का मूल्य सोलह तथा सत्रह जीतल प्रति सेर हो गया था।

सिंध पर फिरोज शाह के द्वितीय आक्रमण के बाद उस प्रांत में अन्न का मूल्य प्रति पसेरी (पाँच सेर) आठ और दस जीतल तथा दलहन का चार और पाँच टंका प्रति मन अथवा क्रमशः 6.4 और 8 जीतल प्रति सेर हो गया।

इब्राहिम लोदी के राज्यकाल में मूल्य बहुत कम थे।

एक बहलोली का मूल्य 1.6 जीतल के बराबर था।

इब्राहिम लोदी के राज्यकाल में एक बहलोली से दस मन अनाज, पाँच सेर तेल तथा दस गज मोआ कपड़ा खरीदा जा सकता था।

अलाउद्दीन के राज्यकाल में मूल्य स्वाभाविक थे- जैसे गेहूँ-साढ़े सात जीतल प्रति मन, जौ- चार जीतल प्रति मन, धान अथवा चावल-पाँच जीतल प्रति मन, दहलन-पाँच जीतल प्रतिमन, मसूर-तीन जीतल प्रति मन, चीनी (सफेद)-सौ जीतल प्रति मन, चीनी-साठ जीतल प्रति मन, भेड़ का माँस- दस जीतल प्रतिमन तथा घी- सोलह जीतल प्रतिमन ।

दिल्ली की मलमल सत्रह टके में एक टुकड़े के हिसाब से आती थी और अलीगढ़ की छः टके में एक टुकड़ा।

मोटे कंबल का मूल्य छः जीतल था तथा प्रत्येक महीन कंबल का छत्तीस जीतल था।

इब्नबतूता लिखता है कि ऐसा देश नहीं देखा था, जहाँ वस्तुएँ बंगाल से अधिक हों।

धनी वर्गों तथा कृष्कों की जीवन शैली में लगभग धरती और पाताल का अंतर था।

अमीर खुसरो का कथन है कि राजमुकुट का प्रत्येक मोती दरिद्र किसान के अश्रुपूर्ण नेत्रों से गिरे हुए रक्तबिंदु का ठोस रूप है।

गाँव आर्थिक क्षेत्र में स्वतः पूर्ण थे।

ग्रामीण जनता की साधारण आवश्यकताएँ स्थानीय रूप से पूरी हो जाती थीं।

इक्ता व्यवस्था

इक्ता एक अरबी शब्द है।

निजामुलमुल्क तुसी के रियासतनामा में इक्ता को परिभाषित किया गया है।

गोरी की विजय के बाद उत्तर भारत में इक्ता व्यवस्था स्थापित हुई।

मोहम्मद गोरी ने 1191 ई. में ऐबक को हाँसी का इक्ता दिया।

मोहम्मद गोरी ने मलिक नसीरुद्दीन को कच्छ का प्रदेश इक्ता के रूप में दिया।

इल्तुतमिश ने मुल्तान से लेकर लखनौती तक का क्षेत्र इक्ता के रूप में विभाजित किया।

इक्ता की दो श्रेणियाँ होती थीं- पहला, खालसा के बाहर प्रांतीय स्तर की इक्ता तथा दूसरा, कुछ गाँवों के रूप में छोटी इक्ता

गाँव के रूप में छोटी इक्ता खालसा का ही एक अंग होती थी।

इक्तादार तीन प्रकार के होते थे- प्रथम प्रकार के इक्तादार वे थे जिन्हें जीते हुये प्रदेश में सुल्तान के द्वारा नियुक्त किया जाता था।

दूसरे प्रकार के इक्तादार वे थे जो अर्द्धविजित क्षेत्र में नियुक्त किये जाते थे और उन्हें उस क्षेत्र को पुनः जीतना होता था।

दूसरे प्रकार के इक्तादारों पर सुल्तान की पकड़ अपेक्षाकृत कम होती थी।

तीसरे प्रकार के इक्तादार वे होते थे जो ऐसी भूमि पर इक्तादार नियुक्त किये जाते थे जो अभी तक जीता नहीं गया होता था। ऐसे इक्तादार व्यवहारतः स्वतंत्र होते थे।

इक्ता के प्रशासक मुक्ति या वलि कहलाते थे।

मुक्ति या वलि संबंधित क्षेत्र में भू-राजस्व का संग्रह करते थे और उस क्षेत्र का प्रशासन देखते थे।

मुक्ति या वलि से अपेक्षा की जाती थी कि प्रशासनिक खर्च और वेतन को पूरा करने के पश्चात् जो शेष रकम बचती है उसे वे केंद्रीय खजाने में भेज दें।

केंद्रीय खजाने में भेजनेवाली रकम फवाजिल कहलाती थी।

सुल्तान और मुक्ति का परस्पर संबंध परिस्थितियों पर निर्भर करता था। सैद्धांतिक रूप में मुक्ति या वाली का पद वंशानुगत नहीं होता था और साथ ही हस्तांतरणीय होता था।

बलबन ने मुक्ति को नियंत्रित करने के लिए इक्ता में ख्वाजा नामक अधिकारी को नियुक्ति किया।

ख्वाजा नामक अधिकार इक्ता की आमदनी का आकलन करता था।

अलाउद्दीन खिलजी ने इक्तादारों के स्थानांतरण पर बल दिया ताकि निहित स्वार्थ पैदा नहीं हो सके।

अलाउद्दीन खिलजी ने इक्ता में नौकरशाही के हस्तक्षेप को बढ़ाया।

अलाउद्दीन खिलजी ने दीवान-ए-वजारत को यह अधिकार दिया था कि वह प्रत्येक इक्ता की आमदनी का निश्चित अनुमान लगाये।

मुहम्मद बिन तुगलक ने भू-राजस्व संग्रह और प्रशासन के कार्यों का विभाजन किया।

इक्ता के आय-व्यय के निरीक्षण के लिए एक आमील नामक अधिकारी नियुक्त होता था।

मुहम्मद बिन तुगलक ने इक्ता के सैनिकों का वेतन भी केंद्रीय खजाने से देने का प्रावधान किया।

फिरोज तुगलक ने इक्तादार के पद को वंशानुगत बनाया।

फिरोज तुगलक सैनिकों के वेतन के बदले उन्हें गाँव प्रदान किया।

सैनिकों के वेतन के बदले दिये जानेवाले गाँव ‘वजह’ कहलाते थे और वजह को धारण करनेवाले को वजहदार कहा जाता था।

खालसा

खालसा भूमि वह भूमि होती थी जिसकी आय सुल्तान के लिए सुरक्षित रखी जाती थी।

प्रारंभिक सुल्तानों के समय भटिंडा और ग्वालियर खालसा भूमि थी।

अलाउद्दीन खिलजी के समय खालसा भूमि का विस्तार हुआ।
फिरोज तुगलक के समय खालसा भूमि कम हो गई।

कर व्यवस्था

सबसे पहले पंजाब में इस्लामी करारोपण पद्धति लागू हुई थी।

अलाउद्दीन खिलजी से पहले दिल्ली एवं आसपास के क्षेत्रों में इस्लामी करारोपण पद्धति शुरू नहीं हुई थी।

शरियत के मुताबिक चार प्रकार के कर स्थापित हुए- जकात, खिराज और उस्र, जजिया और खुम्स।

खिराज भूमिकर था जो हिंदुओं की भूमि पर लगाया जाता था।

फिरोज तुगलक ने फतुहाते-फिरोजशाही में खिराज का भाग निर्धारित किया गया है।

उस्र मुसलमानों की भूमि पर लगाया जानेवाला कर था।

भूमि पर प्राकृतिक रूप से सिंचाई की सुविधा उपलब्ध होती थी उस पर खिराज की दर कुल उत्पादक का 1/10 भाग थी।

जहाँ राज्य के द्वारा सिंचाई की सुविधा प्रदान की जाती थी, वहाँ खिराज की दर कुल उत्पादक का 1/3 भाग होती थी।

अगर कोई हिंदू किसी मुसलमान की जमीन खरीद लेता था तो उसे उस भूमि पर उस्र के बदले खिराज देना पड़ता था।

यदि कोई मुसलमान किसी हिंदू की जमीन खरीदता था तो खिराज का परिवर्तन उस्र में नहीं होता था।

जकात (सदका) धनवान मुसलमानों पर लगाया जाता था जो आय का अढ़ाई (2.5) प्रतिशत होती थी।

जकात (सदका) का उपयोग धार्मिक कार्यों के लिए होता था।

जजिया कर सैनिक सेवा के बदले गैर मुसलमानों पर लिया जाता था।

जजिया की दर क्रमशः 48 दिरहम, 24 दिरहम और 12 दिरहम थी।

जजिया प्रायः खराज के साथ लिया जाता था।

फिरोज तुगलक ने जजिया को एक अलग कर बना दिया।
खुम्स युद्ध के लूट के माल पर लगता था।

खुम्स में राज्य का हिस्सा 20 प्रतिशत और सैनिकों का हिस्सा 80 प्रतिशत होता था।

अलाउद्दीन खिलजी ने खुम्स में राज्य का हिस्सा 80 प्रतिशत और सैनिकों का हिस्सा 20 प्रतिशत निश्चित किया था।

फिरोज तुगलक ने खुम्स में पुनः राज्य का हिस्सा 20 प्रतिशत और सैनिकों का हिस्सा 80 प्रतिशत किया।

भू-राजस्व व्यवस्था

तुर्कों ने इस्लामी अर्थव्यवस्था-संबंधी सिद्धांत को अपनाया।

इस्लामी अर्थव्यवस्था-संबंधी सिद्धांत बगदाद के मुख्य काजी अबू याकूब द्वारा लिखित किताब-उल-खराज में लिपिबद्ध है।

सल्तनत काल में भूमि निम्नलिखित भागों में विभाजित थी- 1. इक्ता 2. खालसा 3. मिल्क 4. वक्फ 5. ईनाम।

सल्तनत काल में सुल्तान के अधिकार से मुक्तभूमि को मोरलैण्ड ने ‘अनुदान’ कहा है।

यह अनुदान मिल्क (राजा द्वारा प्रदत्त), वक्फ (धर्म सेवा के आधार पर प्राप्त भूमि) ईनाम (पेंशन) होता था।

संपूर्ण साम्राज्य दो भागों में बाँटा जा सकता है- खराज भूमि और मवास भूमि।

खराज भूमि वह थी, जिससे नियमित भू-राजस्व प्राप्त होता था और मवास भूमि वह थी जहाँ से भू-राजस्व प्राप्त नहीं होता था।

मवास क्षेत्रों में सल्तनत की सेना लूट मचाती थी।

भू-राजस्व (खराज) संग्रह की पद्धति

गल्ला बख्शी या बंटाई के तीन प्रकार थे।

1. खेत बटाई– जब खड़ी फसल में राज्य का हिस्सा निर्धारित कर दिया जाता था, तो वह खेत बंटाई कहलाता था।

2. लंक बटाई- लंक बटाई में फसल कटने के बाद किंतु भूसा अलग करने के पहले ही राज्य का हिस्सा निर्धारित कर दिया

3. राशि बटाई– इसमें भूसा अलग करने के बाद तैयार अनाज का विभाजन किया जाता था।

कनकूत में अनुमान के आधार पर राज्य का हिस्सा निर्धारित किया जाता था।

मसाहत भूमि माप की पद्धति थी और अलाउद्दीन खिलजी ने मसाहत को पहली बार अपनाया।

अलाउद्दीन खिलजी ने वफा-ए-विसवा को अपनाया, जो माप की इकाई था।

अलाउद्दीन खिलजी ने किसानों से सीधा संपर्क किया और मध्यस्थ वर्ग का अंत कर दिया।

राज्य द्वारा किसानों से सीधे संपर्क अधिकारी थे- उस्माल, मुतसर्रिफ, मुशरिफ, मुहासिललान, नवीसिन्दगान आदि।

मोरलैंड के अनुसार मध्यस्थ वर्ग में खुत, मुक्कद्दम और चौधरी थे। अलाउद्दीन खिलजी ने हक-ए-खूती और किस्मत-ए-खूती का अंत किया।

नायब-वजीर शरीफ केनी ने भ्रष्ट अधिकारियों को दंडित किया।

अपने पारिश्रमिक के रूप में किसानों से उनकी उपज का कुछ अंश प्राप्त करना हक-ए-खूती कहलाता था।

गयासुद्दीन तुगलक ने मध्यस्थ वर्ग को हक-ए-खूती का अधिकार दिया। गयासुद्दीन तुगलक ने मध्यस्थ वर्ग को किस्मत-ए-खूती का अधिकार नहीं दिया।

गयासुद्दीन तुगलक ने मध्यस्थ वर्ग को गृहकर और चराई कर से मुक्त कर दिया।

ग्यासुद्दीन तुगलक ने भूमि को मापने की व्यवस्था जारी रखी, लेकिन अवलोकन और वास्तविक उपज (बर-हुक्म हासिल) के अधार पर भी कर का निर्धारण किया।

अलाउद्दीन खिलजी की कर-प्रणाली का आधारभूत सिद्धांत था कि सबल वर्ग का बोझ निर्बल वर्ग पर नहीं पड़ना चाहिए।

मुहम्मद बिन तुगलक के समय भी भूमि मापने की प्रथा अपनाई गई।

मुहम्मद बिन तुगलक के समय अनाज के रूप में वसूली वास्तविक उत्पादन के आधार पर न करके राज्य द्वारा निर्धारित पैदावार (वफा-ए-फरमानी) के आधार पर की गई।

मुहम्मद बिन तुगलक के समय नगद रूप में वसूली बाजार में प्रचलित मूल्य के आधार पर नहीं, वरन् राज्य द्वारा घोषित मूल्य (निख-ए-फरमानी) के आधार पर की गई।

मुहम्मद बिन तुगलक के समय राजस्व वसूली का काम ठेकेदारी पर दिया जाने लगा।

फसल खराब होने पर भूमि-राजस्व में छूट भी दी जाती थी।

मुहम्मद बिन तुगलक ने किसानों को कृषि-ऋण दिया, जिसे सोनधर (तकाबी ऋण) कहा जाता है।

सिंचाई

सिंचाई के मुख्य साधन कुएँ और तालाब थे।

मुहम्मद बिन तुगलक ने कुंओं की खुदाई के लिए ऋण प्रदान किया।

कुंओं से सिंचाई के लिए एक नई तकनीकी विकसित हुई, जिसे गियर प्रणाली कहते हैं।

गियर प्रणाली को साकिया के नाम से जाना जाता था।

नहर द्वारा सिंचाई मध्य एशिया के प्रभाव से 14वीं सदी में विकसित हुई।

गयासुद्दीन तुगलक प्रथम सुल्तान था जिसने नहर का निर्माण कराया।

फिरोज तुगलक ने यमुना नदी से राजवाह और उलूगखानी नामक नहर निकलवाई।

फिरोज तुगलक ने सतलज नदी से फिरोजशाही नामक नहर निकलवाई। फिरोज तुगलक ने एक नहर घग्गर नदी से और दूसरी काली नदी से निकलवाई।

फिरोज तुगलक प्रथम सुल्तान था जिसने सिंचाई कर प्रारंभ किया।

फिरोज तुगलक के द्वारा लगाया गया सिंचाई कर हक-ए-शर्ब के नाम से जाना जाता था और वह कुल उपज का 10 प्रतिशत होता था।

सल्तनत काल में रबी और खरीफ दोनों फसलें उगाई जाती थीं।

इब्नबतूता ने दिल्ली के आसपास दोनों प्रकार की फसलों की चर्चा की है।

ठक्करफेरू ने, जो अलाउद्दीन खिलजी के अधीन एक अधिकारी था, 25 प्रकार की फसलों के नाम गिनाया हैं।

ठक्करफेरू ने नील और पोस्त की चर्चा नहीं की है।

14वीं और 15वीं सदी में पहली बार मलबरी रेशम कीट पालन प्रारंभ हुआ।

इस काल में कलम लगाने की प्रथा प्रचलित नहीं थी।

सल्तनत काल में किसानों को भूमि पर स्वामित्व नहीं था।

भूमि की अधिकता थी इसलिए भूमि स्वामित्व के प्रति अधिक सजगता नहीं थी।

सल्तनत काल में सबसे छोटे किसान बलाहार कहलाते थे।
धनी किसान के वर्ग में खुत, मुकद्दम और चौधरी आते थे।

ग्रामीण क्षेत्र में सबसे ऊपर राजा, रणका और रावत होते थे।

चरखा तुर्कों के द्वारा 13वीं-14वीं सदी में लाया गया।

1350 ई. की कृति फुतुह-उस सलातीन में चरखे की चर्चा की गई है।

मिफताह-उल-फुजाला में करघा का चित्र मिलता है।

तुर्कों के द्वारा चूना और गारा का प्रयोग और कागज व जिल्दसाजी का विकास किया गया।

तुर्कों के द्वारा स्थापत्य में मेहराब का प्रयोग व वैज्ञानिक रूप से बने हुए गुम्बदों का प्रयोग किया गया।

तुर्कों के द्वारा रकाब, नाल और बारुद का प्रयोग किया गया।

कलई का प्रयोग तुर्कों के द्वारा आरंभ किया गया।

तुर्कों के द्वारा आसवन विधि का विकास हुआ।

तुर्कों के समय में नाविकों के द्वारा कुतुबनुमा का प्रयोग आरंभ हुआ।

वाणिज्य-व्यापार और नगर

दिल्ली सल्तनत काल को तृतीय नगरीकरण की शुरुआत का काल माना जाता है।

मुसलमानों की जनसंख्या कम थी और वे मुख्यतः इक्ता के मुख्यालय और राजधानी में बसे।

राजा के महल के आसपास ही सैनिक शिविर भी स्थापित किये गये।

सल्तनत काल की भू-राजस्व नीति ने प्रेरित व्यापार को जन्म दिया।

सल्तनत काल में विलासिता के क्षेत्र में रेशम के कपड़ों का उत्पादन शुरू हुआ।

सल्तनत काल में ईरान से कालीन बनाने की कला आई।

सल्तनत काल कागज और जिल्दसाजी की पद्धति भी विकसित हुई।

बरनी के अनुसार, अलाउद्दीन खिलजी के अधीन 7,0000 कारीगर काम करते थे।

इब्नबतूता दिल्ली को पूर्वी इस्लामी दुनिया का सबसे बड़ा शहर बताता है।

पूरब में कड़ा और लखनौती, उत्तर पश्चिम में लाहौर और मुल्तान, पश्चिम में अन्हिलवाड़ा और कैम्बे महत्त्वपूर्ण नगर के रूप में विकसित हुये।

बंगाल और गुजरात के नगर अच्छे किस्म के वस्त्रों के लिए प्रसिद्ध थे।

गुजरात के कैम्बे सूती वस्त्र, सोना और चाँदी के काम के लिए प्रसिद्ध थे। बंगाल का सोनारगाँव कच्चे रेशम एवं महीन सूती वस्त्र (मलमल) के लिए प्रसिद्ध था।

भारत में उत्तम श्रेणी के वस्त्र (अतलस), शीशे के सामान और घोड़े पश्चिम एशिया से आते थे।

चीन से कच्चे रेशम एवं चीनी मिट्टी के बर्तन मँगवाये जाते थे।
सल्तनतकालीन ग्रंथों में कारवानी या नायक और मुल्तानी व्यापारियों की चर्चा है।

कारवानी अनाज के व्यापारी थे और मुल्तानी व्यापारी दूरस्थ व्यापार से जुड़े हुये थे।

सल्तनत काल में व्यापार में दलालों की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी।
बरनी ने दलालों को बाजार का स्वामी (हाकिमान बाजार) कहा है।

फिरोज तुगलक ने दलालों पर लगाये जानेवाला कर दलालात-ए-बजाराहा को समाप्त किया था।

सर्राफ नामक व्यापारी मुद्रा विनिमय एवं हुंडी से जुड़े थे।

मुद्रा व्यवस्था

गोरी शासकों ने चाँदीयुक्त ताँबे के सिक्के जारी किये थे।

पहले सिक्कों पर देवी लक्ष्मी, बैल तथा घुड़सवारों की आकृति बनाई जाती थी और शासकों का नाम नागरी लिपी में लिखा जाता था।

पहले के सिक्कों को देहलीवाला कहा जाता था।

इल्तुतमिश ने पहली बार सिक्के का मानकीकरण किया।

इल्तुतमिश ने सोने और चाँदी के टके और ताँबे के जीतल जारी किये।

इल्तुतमिश के समय सोने और चाँदी का अनुपात 1:10 था।

सल्तनत के टकसालों में मोटे तौर पर तीन धातुओं के सिक्के निर्मित किये जाते थे- सोना चाँदी और बिलन (चाँदी व ताँबे का मिश्रण)।

बरनी ने दो अन्य सिक्कों दांग और दिरहम की चर्चा की है।

एक चाँदी का टका-48 जीतल-192 दांग-490 दिरम या दिरहम होता था।

देवगिरि की विजय से पूर्व सोना और चाँदी बंगाल से आता था।
अलाउद्दीन खिलजी के समय चाँदी की मुद्राएं प्रमुख थीं।

गयासुद्दीन तुगलक के काल में सोने एवं बिलन की तुलना में चाँदी के सिक्के कम मिलते हैं।

15वीं शताब्दी में बिलन सिक्के ही प्रभावी रहे क्योंकि लोदी शासकों ने अन्य सिक्के नहीं जारी किये।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *