विजय नगर : प्रशासन, समाज और संस्कृति (Vijay Nagar: Administration, Society and Culture)

प्रशासन

प्रशासन का केंद्र बिंदु राजा ही था परंतु विजय नगर में संयुक्त शासन के दर्शन होते हैं क्योंकि हरिहर और बुक्का ने साथ-साथ शासन किया।

विजय नगर में राजा को ‘राय’ कहा जाता था।

विजय नगर में राजा को किस तरह का व्यवहार करना चाहिए, इसका उल्लेख कृष्ण देवराय की पुस्तक ‘आमुक्त माल्यद’ में दिखाई पड़ता है।

आमुक्त माल्यद के अनुसार राजा को सदैव अपने प्रजा के सुख और कल्याण को आगे रखना चाहिए। जब राजा प्रजा का कल्याण करेगा तभी प्रजा भी राजा के कल्याण की कामना करेगी तभी देश प्रगतिशील एवं समृद्धशील होगा।

विजय नगर में राजा पर नियंत्रण ‘राज परिषद’ नामक संस्था करती थी। इसका सदस्य स्वयं राजा भी होता था।

विजय नगर में राजा अपना प्रशासन मंत्री परिषद के माध्यम से करता था। इसका प्रमुख अधिकारी प्रधानी अथवा महाप्रधानी होता था।

विजय नगर में मंत्रिपरिषद में 20 सदस्य होते थे तथा सदस्यों की आयु 50 से 70 वर्ष के बीच होती थी।

मंत्रिपरिषद का अध्यक्ष सभा नायक होता था।

अब्दुर्रज्जाक ने सचिवालय का वर्णन किया है और सचिवालय का दीवानखाना के रूप में उल्लेख किया है।

रायसम (सचिव) जैसे अधिकारियों के नाम भी मिलते हैं।

केंद्रीय प्रशासन

विजय नगर साम्राज्य में केंद्र प्रांतों में विभाजित थे, जिसे राज्य या मंड्लम कहा जाता था।

विजय नगर में कुल छः प्रांत थे।

विजय नगर में पायस ने 200 प्रांतों का उल्लेख किया है।

विजय नगर प्रांतों के प्रमुख युवराज अथवा दंडनायक होते थे।

दंडनायक एक पदसूचक शब्द था जो विभिन्न अधिकारियों के लिए प्रयुक्त होता था।

दंडनायक को सेनापति न्यायधीश गर्वनर प्रशासकीय, अधिकारी आदि कुछ भी बनाया जा सकता था।

प्रशासकीय अधिकारियों की एक श्रेणी कार्यकर्ता थी।

स्थानीय प्रशासन में विभाजन राज्य या मंडलम् (प्रांत), बलनाडु (कमिश्नरी), नाडु (जिला) और मेलाग्राम (50 ग्राम), स्थल (तहसील) तथा उद् (ग्राम) में था।

स्थानीय प्रशासन में सभाओं का उल्लेख मिलता है।

नाडु की सभा को ‘नाडुकहा’ तथा इसके सदस्यों को ‘नांतवर’ कहा जाता था।

गीली भूमि को ‘नन्जाई’ तथा नगद लगान को ‘सिद्दम’ कहा जाता था।

नायंकार व्यवस्था

नायंकार व्यवस्था विजय नगर प्रशासन की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता थी।

नायक वस्तुतः एक भू-सामंत होते थे जो सैनिक अथवा असैनिक हो सकते थे।

नायकों वेतन के बदले एक प्रकार की भूमि प्रदान की जाती थी जिसे ‘अमरम’ कहा जाता था।

नायकों को अमरम् प्राप्त करने के कारण इनका एक नाम ‘अमर नायक’ पड़ा।

नायकों के पद धीरे-धीरे आनुवांशिक हो गये।

नायक अपना एक प्रशासनिक एजेंट विजय नगर राज्य में नियुक्त करते थे जिसे ‘स्थानपति’ कहा जाता था।

अच्युत देवराय ने नायकों की उदंडता को रोकने के लिए एक विशेष अधिकारी ‘महामंडलेश्वर’ (कमिश्नर) की नियुक्ति की थी।

आयंगार व्यवस्था

विजय नगर प्रशासन की दूसरी प्रमुख विशेषता उसकी ‘आयंगार व्यवस्था’ थी।

आयंगार व्यवस्था मूलतः गाँवों के प्रशासन से संबंधित थी।

विजय नगर में गाँव में प्रशासन के लिए बारह व्यक्तियों का एक समूह नियुक्त किया जाता था, जिसे ‘आयंगार’ कहते थे।

आयंगारों का पद आनुवांशिक होता था।

आयंगार अपने पदों को गिरवी रख सकते थे अथवा बेच सकते थे।

विजय नगर में आयंगारों को लगान-मुक्त भूमि प्रदान की जाती थी।

विजय नगर में ‘सेनते ओवा’ गाँव का हिसाब किताब रखता था।

तलर’ गाँव का कोतवाल अथवा पहरेदार था।

बेगार’ बल पूर्वक श्रम लेनेवाला अधिकारी था।

महानायकाचार्य’ नामक अधिकारी के द्वारा राजा गाँव पर नियंत्रण रखता था।

भू-राजस्व व्यवस्था

विजय नगर में राज्य की आय का सबसे बड़ा स्रोत ‘भू-राजस्व’ था।

भू-राजस्व से संबंधित विभाग को ‘अष्टबने’ कहा जाता था।

विजय नगर में भूमिकर को ‘शिष्ट’ कहा गया है।

विजय नगर में भू-राजस्व की मात्रा 16 से 32 प्रतिशत के बीच थी।

भूमि को तीन भागों में विभाजित किया गया था- 1. सिंचाई मुक्ति भूमि 2. सूखी जमीन और 3. बाग एवं जंगल मुक्ति भूमि।

विजय नगर में भूमि की माप कृष्ण देवराय ने करवाया था।

सामान्यतः राज्य की ओर से सिंचाई का कोई विभाग नहीं था, परंतु कुछ शासकों ने नहरें निकलवाई थी।

विजय नगर में सिंचाईकर को ‘दास बंद’ कहा जाता था।

बढ़इयों पर बढ़ईकर लगता था, जिसे ‘कसामी गुप्त’ कहा गया है।

वर एवं वधू दोनों से विवाहकर लिया जाता था, परंतु कृष्णदेव राय ने विवाहकर माफ कर दिया था।

नाइयों पर भी कर लगाया जाता था, परंतु सदाशिव राय के शासनकाल में राम राय ने इसे माफ कर दिया था।

कंदाचार’ सैनिक विभाग था तथा दंड नायकों के अधीन रहता था।

पुलिस अधिकारियों को ‘कवलगर’ कहा जाता था।

पुलिस विभाग का खर्च वेश्याओं से प्राप्त आय से चलता था।

भूमि के प्रकार

भंडारवाद’ ग्राम ऐसे ग्राम थे जिनकी भूमि राज्य के सीधे नियंत्रण में होती थी।

ब्रह्मदेय’ ब्राह्मणों को दान में दी गई करमुक्त भूमि थी।

देवदेय मंदिरों को दान में दी गई करमुक्त भूमि थी।

मठों को दान में दी गई करमुक्त भूमि ‘मठीपुर’ कहलाती थी।।

नायकों को दी गई भूमि ‘अमरम’ कही जाती थी।

ग्राम के कुछ विशेष सेवाओं के बदले में लगानमुक्त भूमि को ऊंबलि कहते थे।

युद्ध में शौर्य प्रदर्शन करनेवालों को जानेवाली भूमि ‘रक्त कौड़गै’ अथवा ‘ख्रंत कोड़गै’ कहलाती थी।

ब्राह्मणों बड़े भू-स्वामियों आदि द्वारा किसानों को पट्टे पर दी गई भूमि ‘कुट्टगि’ कही जाती थी।

पट्टेदार एवं भूस्वामी के बीच उपज की हिस्सेदारी को ‘वारम व्यवस्था’ कहते थे ।

कृषक मजदूर ‘कुदि’ कहलाते थे।

व्यापार

विजय नगर में विदेशी व्यापार उन्नति अवस्था में था।
भारत के जहाज मालद्वीप के द्वीपों में बनते थे।

इस समय के प्रमुख व्यवसायों में कपड़ा, खानों की खुदाई, गंधी का पेशा (इत्र) चीनी, मशाले आदि शामिल थे।

अब्दुर्रज्जाक के अनुसार कालीकट अत्यन्त महत्वपूर्ण बंदरगाह था।

विजय नगर से व्यापार करनेवाले प्रमुख देश पुर्तगाल, चीन, यूरोपीय देश, फारस, दक्षिण अफ्रीका, दक्षिण पूर्व एशिया, बर्मा, अरब आदि थे।

कपड़ा, मसाले, चीनी, चावल, लोहा, सोना, बारूद, मोती आदि प्रमुख निर्यातित वस्तुएं थीं।

प्रमुख आयातित वस्तुएं घोड़ा, मदिरा, मोती, मूंगा, पारा, मलमल आदि थीं।

सिक्के

विजय नगर का सर्वाधिक प्रसिद्ध स्वर्ण सिक्का वराह था, जो 52 ग्रेन का होता था।

वराह को विदेशी यात्री पगोड़ा, हूण अथवा परदौस के रूप में उल्लेख करते हैं।

26 ग्रेन के या आधे वराह को ‘प्रताप’ कहा जाता था।

55 ग्रेन के स्वर्ण सिक्कों को ‘फणम्’ कहा जाता था।

चाँदी के छोटे सिक्कों को ‘तार’ कहा जाता था।

विजय नगर काल में मुख्यतः स्वर्ण एवं ताँबें के सिक्के ही प्रचलित थे। चाँदी के सिक्के बहुत कम थे।

विजय नगर के शासकों के सिक्कों पर हनुमान एवं गरुण की आकृति मिल़ती है।

तुलुव वंश के शासकों के सिक्कों पर बैल, गरुड़, शिव, पार्वती, कृष्ण आदि की आकृतियां मिलती हैं।

सामाजिक स्थिति

विजय नगर कालीन अभिलेखों में सकल वर्णाश्रम धर्म मंगला-नुपालि सुंत नामक शब्द का प्रयोग हुआ है।

विजय नगर में राजा सभी वर्णों के मंगल की कामना करता था।
विजय नगर समाज में ब्राह्मण का स्थान सर्वोच्च था। इन्हें किसी भी कार्य के लिए मृत्युदंड नहीं दिया जाता था।

दंड नायक आदि पदों पर अधिकांशतः ब्राह्मणों की नियुक्ति होती थी।

ब्राह्मणों के बाद चेट्टी अथवा शेट्टी थे जिनकी सामाजिक स्थिति अच्छी थी। अधिकांश व्यापार इसी वर्ग के हाथों में था।

चेट्टियों के ही समतुल्य व्यापार करनेवाले वीर पंचाल दस्तकार वर्ग के लोग थे।

दस्तकार वर्ग में लोहार, स्वर्णकार, कांस्यकार, बढ़ई, कैकोल्लार (बुनकर), कंबलत्तर (चपरासी) आदि वर्ग शामिल थे।

वीर पंचालों में लोहारों की स्थित सबसे अच्छी थी।

कैकोल्लार अथवा जुलाहे मंदिरों के आस-पास रहते थे।
समाज में नाइयों की भी प्रतिष्ठा थी।

उत्तर भारत बड़वा वर्ग के लोग दक्षिण भारत में आकर दक्षिण के व्यापार पर अधिकार कर लिये थे जिससे सामाजिक विद्वेष की भावना पनप रही थी।

विजय नगर काल में कुछ निम्न वर्गों का भी उल्लेख मिलता है, जैसे-डोंबर, जो बाजीगरी का कार्य करते थे।

कुछ अन्य निम्न वर्गों में जोगी, मछुआरे, परय्यन, कल्लर आदि का भी उल्लेख मिलता है।

दास प्रथा

विजय नगर में दास प्रथा का उल्लेख निकालो कोंटी ने किया है।

विजय नगर में पुरुष एवं महिला दोनों प्रकार के दास थे।

विजय नगर में दासों के क्रय-विक्रय को ‘वेसवेंग’ कहा जाता था।

स्त्रियों की दशा सामान्यतः निम्न थी, परंतु उत्तर भारत की अपेक्षा अच्छी थी।

महिलाएं अंगरंक्षिकाएं नियुक्त होती थी।

विजय नगर काल में गणिकाओं की स्थित उच्च थी।

वेश्याओं से प्राप्त कर से पुलिस एवं सैन्य विभाग का खर्च चलता था।

विजय नगर में सामान्यतः विधवाओं की स्थिति शोचनीय थी, परंतु विधवा विवाह विवाहकर से मुक्त था।
विजय नगर में दहेज प्रथा प्रचलित थी।

देव राय द्वितीय ने 1424-25 ई. के एक अभिलेख में दहेज को अवैधानिक घोषित किया था।

विजय नगर में सती प्रथा भी प्रचलित थी, जिसका सर्वप्रथम वर्णन बारबोसा ने किया है और द्वितीय बार सती प्रथा का उल्लेख करनेवाला निकोलो कोंटी था।

बुक्का प्रथम के समय के 1354 ई. के एक अभिलेख में मालागौड़ा नामक एक महिला के सती होने का उल्लेख है।

अभिलेखीय प्रमाणों के अनुसार सती प्रथा नायकों तथा राजपरिवारों तक ही सीमित थी, जबकि बारबोसा के अनुसार ब्राह्मणों, चेट्टियों, लिंगायतों में यह प्रथा प्रचलित नहीं थी।

सती होनेवाली स्त्री के स्मृति में पाषाण स्मारक लगाये जाते थे, जिसे ‘सतीकल’ कहा जाता था।

सामान्य वर्ग के पुरुष धोती और सफेद कुर्ता पहनते थे। पगड़ी भी पहनने की प्रथा प्रचलित थी, परंतु वे जूते नहीं पहनते थे।

सामान्य वर्ग की स्त्रियाँ साड़ी पहनती थीं, जबकि राजपरिवार की स्त्रियाँ पावड़ (एक प्रकार का पेटीकोट)।

स्त्री एवं पुरुष दोनों आभूषण प्रिय थे और उनमें इत्रों के प्रति लगाव था।

युद्ध में वीरता दिखानेवाले पुरुष द्वारा पैरों में धारण करनेवाला कड़ा गंड ‘पेद्र’ कहलाता था जो सम्मान का प्रतीक माना जाता था।

विजय नगर काल में शिक्षा का कोई विभाग नहीं था न ही किसी विद्यालय की स्थापना की गई थी।

शिक्षा मूलतः मंदिरों मठों और अग्रहारों में दी जाती थी और लोकप्रिय विषयों में वेद पुराण, इतिहास, काव्य, नाटक, आयुर्वेद आदि प्रमुख थे।

मनोरंजन में नाटक, यक्षगान, मंच पर संगीत और वाद्यों द्वारा अभिनय लोकप्रिय थे।

वोमलाट’ एक प्रकार का छाया नाटक था।

विजय नगर में शतरंज और पासा लोकप्रिय थे तथा कृष्ण देवराय स्वयं शतरंज का प्रसिद्ध खिलाड़ी थे।

पायस के अनुसार कुश्ती भी लोकप्रिय था। यह पुरुषों और महिलाओं में समान रूप से प्रचलित था।

कुरवाई’ एक प्रकार का चावल था।

वेंकट द्वितीय ने पुर्तगालियों को बेल्लौर में एक चर्च बनवाने की अनुमति दी थी।

बैलों एवं गायों के मांस को छोड़कर सभी पशुओं के मांस खाये जाते थे।

पायस ने नवरात्रि पर्व का उल्लेख किया है और इस पर्व के अंतिम दिन ढाई सौ भैसों तथा साढ़े चार हजार भेड़ों की बलि चढ़ाई जाती थी।

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