वारेन हेस्टिंग्स (Warren Hanstings)

वारेन हेस्टिंग्स (1772-1785 ई.) की 1772 ई. में बंगाल के गवर्नर के पद पर नियुक्ति हुई।

वारेन हेस्टिंग्स का जन्म 1732 ई. में हुआ था और वह कंपनी सेवा में भर्ती हो गया।

वारेन हेस्टिंग्स 1750 ई. में पहली बार ईस्ट इंडिया कंपनी के एक क्लर्क के रूप में कलकत्ता आया था और कासिम बाजार का अध्यक्ष बना।

वारेन हेस्टिंग्स 1761-64 ई. तक कलकत्ता परिषद् का सदस्य और 1769-72 ई. तक मद्रास परिषद् का सदस्य रहा।

1772 ई. में वारेन हेस्टिंग्स को बंगाल का गर्वनर और 1773 ई. के रेग्युलेटिंग ऐक्ट के द्वारा 1774 ई. में बंगाल का गर्वनर-जनरल नियुक्त हुआ। मद्रास एवं बंबई के ब्रिटिश प्रदेश भी गवर्नर-जनरल के अधीन आ गये।

रेग्युलेटिंग ऐक्ट के अनुसार बंगाल से द्वैध शासन प्रणाली की समाप्ति की घोषणा की और खर्चों में कटौती कर कंपनी की वित्तीय स्थिति में सुधार किया। यह निश्चय किया गया कि प्रशासन तथा सैनिक-प्रबन्ध के विषय भारत सचिव के पास रखे जाएंगे एवं राजस्व के संबंधित मामलों की देख-रेख वित्त मंत्रालय करेगा।

चूँकि मुगल सम्राट शाहआलम मराठों के संरक्षण में चला गया था, अतः उसकी वार्षिक पेंशन बंद कर दी गई। वारेन हेस्टिंग्स ने बनारस के शासक चेतसिंह, अवध की बेगमों एवं रुहेलों से युद्ध किया। वारेन हेस्टिंग्स ने रुहेलों पर आक्रमण करने के लिए अवध से 50 लाख रुपये माँगा।

वारेन हेस्टिंग्स के सुधार

  • वारेन हेस्टिंग्स राजस्व, न्याय व्यवस्था, शिक्षा एवं व्यवसायिक क्षेत्र में अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया।
  • राजस्व सुधार के अंतर्गत वारेन हेस्टिंग्स ने माना कि समस्त भूमि शासक की है। वारेन हेस्टिंग्स ने जमींदारों को केवल कर-संग्रह करनेवाला माना जिन्हें केवल अपने कमीशन का ही अधिकार था।
  • वारेन हेस्टिंग्स ने राजस्व की वसूली का अधिकार कंपनी के अधीन किया और इसमें दोनों भारतीय उप-दीवानों- मुहम्मद रजा खाँ तथा राजा शिताबराय को पदच्युत् कर दिया।
  • हेस्टिंग्स ने राजस्व-सुधार के अंतर्गत 1772 ई. तक कर-संग्रहण के अधिकार ऊँची बोली बोलने वाले जमीदारों को 5 वर्ष के लिए नीलाम किया।
  • 1773 ई. में कर-व्यवस्था में कुछ परिवर्तन करते हुए भ्रष्ट तथा निजी व्यापार में लगे कलेक्टरों को पदमुक्त कर वारेन हेस्टिंग्स ने जिलों में भारतीय दीवान नियुक्त किया।
  • वारेन हेस्टिंग्स ने कलकत्ता में बोर्ड आफ रेवेंयू की स्थाना की।
  • किंतु पंचवर्षीय भू-राजस्व व्यवस्था सफल नहीं हुई। कंपनी के अधिकारियों ने अपने निजी नौकरों तथा गुमाश्तों की सहायता से नीलामी में भाग लिया। हेस्टिंग्स ने स्वयं अपने एक भारतीय नौकर कुंतू बाबू के 10 वर्षीय पुत्र के नाम से एक नीलामी पंजीकृत कराया था।
  • वारेन हेस्टिंग्स ने 1776 ई. में पंचवर्षीय ठेके की व्यवस्था समाप्तकर एकवर्षीय व्यवस्था लागू की।
  • 1781 ई. में प्रांतीय परिषदें समाप्त कर कलेक्टरों को पुनः जिले में नियुक्त किया गया, किंतु उन्हें कर निर्धारित करने का अधिकार नहीं था। निरीक्षण का अधिकार कलकत्ता की राजस्व समिति को दिया गया और कानूनगो पुनः नियुक्त किये गये।

हेस्टिंग्स अपने पीछे दुःख, विद्रोह और अकालों की लड़ी छोड़ गया। 1789 में लार्ड कार्नवालिस ने कहा था ‘कंपनी के अधीन प्रदेश का तीसरा भाग केवल उजाड़ है तथा वहाँ जंगली पशु ही बसते हैं।’

न्यायिक व्यवस्था में सुधार

न्यायिक सुधार के क्षेत्र में वारेन हेस्टिंग्स ने जमींदारों से न्याय-संबंधी अधिकार छीन लिया।

  • वारेन हेस्टिंग्स ने 1772 ई. में प्रत्येक जिले में एक फौजदारी तथा एक दीवानी न्यायलय की स्थापना की।
  • दीवानी न्यायालय कलेक्टरों के अधीन थे, जहाँ पर 500 रु. के मामलों का निपटारा किया जाता था।
  • हिंदुओं के मामलों का निपटारा हिंदू विधि से तथा मुसलमानों का मुस्लिम विधि से किया जाता था। 500 रुपये से ऊपर के मुकदमों की सुनवाई सदर दीवानी अदालत करती थी।
    जिला फौजदारी अदालत एक भारतीय अधिकारी के अधीन होती थी जिसमें मुफ्ती और काजी सहायक होते थे।
  • अदालतों के कार्यों का निरीक्षण कलेक्टर करता था। मृत्युदंड तथा संपत्ति की जब्ती के लिए सदर निजामत अदालत को प्रमाणित करना पड़ता था। जिला निजामत अदालत के विरुद्ध सदर निजामत अदालत में अपील होती थी जिसका अध्यक्ष उपनाजिम होता था। न्यायाधीशों को उपहार एवं शुल्क लेने पर प्रतिबन्ध था।
  • रेग्यूलेटिंग ऐक्ट के द्वारा कलकत्ता में एक सुप्रीम कोर्ट की स्थापना की गई। कलकत्ता में रहने वाले सभी भारतीय तथा अंग्रेज इसकी परिधि में आते थे। कलकत्ता से बाहर के मामले यहाँ तभी सुने जा सकते थे, जब दोनों पक्ष सहमत हों।

सुप्रीम कोर्ट में न्याय अंग्रेजी कानूनों द्वारा किया जाता था, जबकि सदर निजामत और सदर दीवानी अदालतों में हिंदू अथवा मुस्लिम कानून लागू होता था। सुप्रीम कोर्ट तथा सदर न्यायालयों का कार्यक्षेत्र आपस में टकराता था।

इस झगड़े को कम करने के लिए हेस्टिंग्स ने 1780 ई. में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश इम्पे को 5000 रुपये मासिक पर सदर अदालत का अधीक्षक नियुक्त किया जिसे डायरेक्टरों ने इसे अस्वीकृत कर दिया और नवंबर, 1782 में इम्पे को त्यागपत्र देना पड़ा।

शैक्षिक सुधार

  • हेस्टिंग्स ने 1781 ई. में कलकत्ता में मुस्लिम शिक्षा के विकास के लिए एक मदरसा स्थापित किया। हेस्टिंग्स ने संरक्षण में चाल्र्स विलिकिन्स ने गीता का अंग्रेजी अनुवादक किया।
  • 1784 ई. में सर विलियम जोंस ने ‘द एशियाटिक सोसायटी आफ बंगाल’ की स्थापना की। हिंदू तथा मुस्लिम विधियों को भी एक पुस्तक का रूप देने के लिए 1776 ई. में संस्कृत में एक पुस्तक ‘कोड आफ जेंटू ला’ प्रकाशित हुई।
  • 1791 ई. में विलियम जोंस तथा कोलब्रुक की डाइजेस्ट आफ हिंदू ला छपी। फतवा-ए-आलमगीरी का अंग्रेजी अनुवाद करने का भी प्रयास हुआ। हेस्टिंग्स अरबी, फारसी जानता था और बांग्ला भाषा बोल सकता था।

व्यावसायिक सुधार

वारेन हेस्टिंग्स ने आंतरिक व्यापार के क्षेत्र में जमींदारों के क्षेत्र में कार्य कर रहे शुल्क-गृहों को बंद करवाया। अब केवल कलकत्ता, हुगली, मुर्शिदाबाद, ढाका तथा पटना में पाँच शुल्क-गृह ही रह गये।

शुल्क 2.5 प्रतिशत किया जो सभी को देना अनिवार्य था। वारेन हेस्टिंग्स ने कंपनी के अधिकारियों के व्यक्तिगत व्यापार पर दी जानेवाली छूट बंद कर दिया। वारेन हेस्टिंग्स ने तिब्बत तथा भूटान से भी व्यापार बढ़ाने का प्रयास किया।

रेग्युलेटिंग ऐक्ट और परिषद् के झगड़े

  • 1773 ई. में रेग्यूलेटिंग ऐक्ट का उद्देश्य भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी की गतिविधियों को ब्रिटिश सरकार की निगरानी में लाना था। यह अधिनियम 1774 ई. में लागू किया गया।
  • रेग्यूलेटिंग ऐक्ट के अनुसार बंगाल का गवर्नर अंग्रेजी क्षेत्रों का ‘गवर्नर जनरल’ कहा जाने लगा और मद्रास तथा बंबई के गवर्नर उसके अधीन हो गये।
  • गवर्नर जनरल को सलाह देने हेतु चार सदस्यों की एक परिषद् बनी। गवर्नर जनरल परिषद् का अध्यक्ष था, किंतु उसे बहुमत से निर्णय करना होता था। मत बराबर होने पर गवर्नर जनरल अपने मत का प्रयोग कर सकता था।
  • परिषद् की बैठक के लिए न्यूनतम् 3 की संख्या अनिवार्य थी।
  • परिषद् के पाँचों सदस्यों का नाम रेग्यूलेटिंग ऐक्ट में दिये गये थे- गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स, बारवेल भारत में ही थे, शेष तीन सर फिलिप फ्रांसिस, क्लेवरिंग व मानसन 1774 ई. में भारत आये। परिषद् के सदस्यों को पाँच वर्ष के पूर्व कोर्ट आफ डायेरेक्टर्स की सिफारिश पर ब्रिटिश सम्राट हटा जा सकता था।
  • परिषद् के चार सदस्यों में से तीन हेस्टिंग्स के विरोधी थे। बारवैल, फ्रांसिस, क्लेवरिंग और मानसन तीनों ने हेस्टिंग्स के विरुद्ध एक गुट बना लिया।
  • पहली बैठक में तीनों सदस्यों ने हेस्टिंग्स के शासन की अनियमितताओं पर बहस का प्रस्ताव रखा।
  • तीनों सदस्यों ने बहुमत से निर्णय दिया कि लखनऊ से मिडलिटन को वापस बुलाया जाए तथा रुहेला युद्ध को अन्यायपूर्ण घोषित किया जाए। लखनऊ में नये रेजीडेंट ब्रिस्टो की नियुक्ति की गई और आदेश दिया गया कि वह नवाब वजीर से नई संधि करे।
  • फैजाबाद की नई संधि के द्वारा नवाब ने 2,10,000 रुपया मासिक के स्थान पर 2,60,000 रुपया मासिक देना स्वीकार किया। बनारस की जमींदारी शाश्वत रूप से कंपनी को मिली।
  • परिषद् के इन तीनों सदस्यों के धृष्टतापूण् विरोध के कारण 1776 ई. में हेस्टिंग्स ने त्यागपत्र तक देने की सोची थी। 25 सितंबर, 1776 को माॅनसन की मृत्यु से वारेन हेस्टिंगस को परिषद् में बहुमत प्राप्त मिल गया।
  • डायरेक्टरों ने माॅनसन के स्थान पर एडवर्ड ह्वीलर की नियुक्ति की और क्लेवरिंग को गवर्नर-जनरल बना दिया।
  • क्लेवरिंग ने 20 जून को अपने पद की शपथ ली, किंतु वारेन ने उसे कार्यभार नहीं दिया। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों ने वारेन हेस्टिंग्स को ही ठीक माना।
  • 1777 ई. में क्लेवरिंग की भी मृत्यु हो गई, किंतु फ्रांसिस विरोध करता रहा। फ्रांसिस और वारेन हेस्टिंग्स में द्वंदयुद्ध भी हुआ, जिसमें फ्रांसिस पिस्तौल की गोली से घायल हुआ। दिसंबर 1780 ई. में फ्रांसिस वापस लंदन जाने पर झगड़ा शांत हो गया।

नंदकुमार को फाँसी

  • वारेन हेस्टिंग्स परएक बंगाली ब्राह्मण नंदकुमार ने 1775 ई. में अल्पवयस्क नवाब मुबारिकुद्दौला का संरक्षक बनाने के लिए मुन्नी बेगम (मीरजाफर की विधवा) से 3.5 लाख रुपये घूस लिया था।
  • वारेन हेस्टिंग्स ने इस आरोप का खंडन किया और नंदकुमार को झूठा, तथा निष्कृष्टतम् मनुष्य की संज्ञा दी।
    वारेन हेस्टिंग्स ने नंदकुमार पर मुकदमे किया।
  • 19 अप्रैल को कमालुद्दीन ने कहा कि नंदकुमार ने दबाव डालकर वारेन हेस्टिंग्स और बारवैल के विरुद्ध प्रार्थनापत्र पर हस्ताक्षर करवाया था। एक अन्य व्यक्ति मोहनलाल ने कहा कि नंदकुमार ने दिवंगत बुलाकीदास के रत्नों को जालसाजी करके हड़प लिया है।
  • 6 अप्रैल, 1775 ई. को नंदकुमार को बंदी बनाया गया और अंग्रेज जूरी की सहायता से बहुमत के निर्णय से फाँसी पर लटका दिया गया। बहुमत के निर्णय में मुख्य न्यायधीश इम्पे का भी हाथ था।

नंदकुमार के मुकदमे को ‘न्यायिक हत्या’ कहा गया है। मैकाले के अनुसार हेस्टिंग्स ही मुख्य अभियोजक था। पी. ई. राबर्टस इसे ‘न्यायिक भूल’ की संज्ञा दी है।

ब्रिटिश साम्राज्य का प्रसार

हेस्टिंग्स ने बनारस के राजा के साथ अन्यायपूर्ण तरीके से धनउगाही की और अंत में उसे सत्ता से बेदखल कर दिया। हेस्टिंग्स के समय में 1774 में रुहेला युद्ध, 1775-1782 में प्रथम मराठा युद्ध तथा 1780-1784 में मैसूर का दूसरा युद्ध लड़ा गया।

सम्राट शाहआलम से संबंध

मराठों ने सिंधिया तथा जसवंतराव होल्कर के नेतृत्व में राजस्थान, आगरा के आसपास के जाटों तथा दोआब के रुहेलों को हराकर फरवरी, 1771 में दिल्ली जीत लिया और दिल्ली के सिंहासन पर शाहआलम को बैठा दिया।

शाहआलम ने कड़ा और इलाहाबाद के दो जिले मराठों को दिया था। वारेन हेसिटंग्स ने सम्राट को दी जानेवाली 26 लाख रुपये की पेंशन बंद कर दी औरन दोनों जिलों को अवध के नवाब को 50 लाख रुपये में बेंच दिया।

अवध से संबंध

हेस्टिंग्स ने 1773 ई. में बनारस की संधि की और इलाहाबाद तथा कड़ा के जिले 50 लाख रुपये में नवाब को बेच दिया। नवाब ने 30,000 रुपये मासिक के स्थान पर 2,10,000 रुपये देना स्वीकार किया। यदि नवाब रुहेलों के विरुद्ध कंपनी की सहायता माँगे, तो उसे 40 लाख रुपया और देना होगा।

रुहेला युद्ध

  • 1772 ई. में मराठों ने रुहेला सरदार जब्ता खाँ को पराजित कर उसके समस्त क्षेत्र पर अधिकार कर लिया। रुहेला सरदार हाफिज रहमत खां ने 17 जून, 1772 ई. को अवध के नवाब से एक संधि की। संधि के अनुसार उसने मराठों के विरुद्ध नवाब से सहायता माँगी और 40 लाख रुपया देना स्वीकार किया।
  • 1773 ई. में मराठों ने रुहेलखंड पर आक्रमण किया, किंतु कंपनी और नवाब की सेना देखकर वापस लौट गये। नवाब ने रुहेलों से 40 लाख रुपयों की माँग की, लेकिन रूहेलों ने आनाकानी की।
  • फरवरी, 1774 ई. में नवाब ने रुहेलखंड पर आक्रमण किया। सम्राट और जाब्ता खाँ से मित्रता कर ली। कंपनी की सेना की सहायता से अप्रैल, 1774 में नवाब ने रुहेलखंड पर आक्रमण किया और मीरापुरकटरा के निर्णायक युद्ध में हाफिज रहमत खाँ मारा गया। रुहेलखंड अवध में मिला लिया गया।

मैकाले का कहना है कि ‘कंपनी के सैनिकों के सामने रुहेला-ग्राम लूटे गये, बच्चे मार डाले गये तथा स्त्रियों के साथ बलात्कार किया गया। बहुत से रुहेलों को देश से निकाल दिया गया।

प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध

  • 1772 ई. में पेशवा माधव राव की मृत्यु तथा पेशवा नारायणराव की हत्या के बाद नारायण राव के चाचा रघुनाथ राव ने नारायण राव के मरणोपरांत जन्मे पुत्र माधवराव नारायण के विरूद्धरूद्ध कंपनी की सहायता माँगी और बंबई सरकार से 1775 ई. में सूरत की संधि कर ली।
  • सूरत की संधि के अनुसार कंपनी ने रघुनाथराव को पेशवा बनाना था तथा उसके बदले में कंपनी को सालसेट और बसीन नगर मिलने थे।
  • कंपनी की सहायता से रघुनाथराव का मई, 1775 ई. में अर्रास नामक स्थान पर एक अनिर्णायक युद्ध हुआ।
  • कलकत्ता परिषद् को सूरत संधि की प्रति युद्ध आरंभ होने पर मिला। कलकत्ता परिषद् ने सूरत की संधि को अस्वीकार कर दिया और युद्ध को अन्यायपूर्ण घोषित किया।
  • कलकत्ता परिषद् ने कर्नल अपटन को पूना भेजा, जिसने मार्च, 1776 ई. में पुरंदर की संधि की। इस संधि के अनुसार कंपनी रघुनाथराव का पक्ष नहीं लेगी, किंतु सालसेट कंपनी के पास ही रहेगा।
  • लंदन में डायरेक्टरों ने सूरत संधि का मान्यता दी और पुरंदर संधि को अस्वीकार कर दिया। बंबई परिषद् ने लंदन से प्रोत्साहित होकर सूरत की संधि को पुनर्जीवित कर दिया।
  • बंबई की अंग्रेजी सेना बड़गाँव स्थान पर पेशवा की सेना से हार गई तथा जनवरी, 1779 ई. में बड़गाँव की संधि हुई। बड़गाँव की संधि के अनुसार अंग्रेजों ने 1773 ई. के बाद जीते गये सभी प्रदेशों को लौटाने का वादा किया। वारेन हेस्टिंग्स ने ग्वालियर तथा पूना के विरुद्ध दो सेनाएं भेज दी।
  • गाडर्ड ने गायकवाड़ को अपनी ओर मिला लिया, किंतु वह पूना पर अधिकार नहीं कर पाया। पोफम ने ग्वालियर की सेना को पराजित किया और अगस्त, 1780 ई. में ग्वालियर दुर्ग जीत लिया।
  • मई, 1782 ई. में सालबाई की संधि हुई। अग्रेजों ने रधुनाथराव का साथ छोड़ दिया और माधवराव नारायण को पेशवा स्वीकार कर लिया। राघोबा को पेंशन दी गई।

द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध (1780-84 ई.)

  • अमरीकी स्वतंत्रता संग्राम के कारण फ्रांस तथा इंग्लैंड में युद्ध छिड़ गया। वारेन हेस्टिंग्स ने फ्रांसीसी बस्तियों को अपने अधीन करने के लिए मालाबार तट पर स्थित माही को जीत लिया, जो हैदरअली के अधीन था।
  • अंग्रेजों ने हैदरअली को मराठा-आक्रमण के समय उसकी सहायता का वादा किया था।
  • 1771 ई. में मराठों ने मैसूर पर आक्रमण किया लेकिन अंग्रेजों ने साथ नहीं दिया जिससे हैदरअली नाराज हो गयां। हैदरअली ने मराठों तथा निजाम के साथ एक समझौता किया। जुलाई, 1780 ई. में हैदरअली ने कर्नाटक पर आक्रमण कर अर्काट को जीत लिया और हैक्टर मुनरो की सेना को हरा दिया।
  • सर आयरकूट के अधीन कलकत्ता से भेजी गई सेना ने हैदरअली को पोर्टोनोवो, पोलिलूर तथा सोलिंगपुर में कई स्थानों पर पराजित किया। अंग्रेजों ने सिंधिया से समझौता कर मराठों को हैदरअली से अलग कर दिया।
  • हैदर की सहायता के लिए फ्रांस से भेजे गये जनरल सफरिन को ह्यूज के अधीन अंग्रेजी बेड़े ने निष्फल कर दिया। दिसंबर, 1782 ई. में हैदरअली की मृत्यु हो गई
  • हैदर के बेटे टीपू ने जनरल मैथ्यू को पराजित किया। जुलाई, 1783 ई. में पेरिस की संधि से अमरीकी युद्ध समाप्त हो गया, तो जनरल सफरिन वापस फ्रांस लौट गया। मद्रास के गवर्नर लार्ड लार्ड मैकार्टनी के प्रयास से मार्च, 1784 ई. में अंग्रेजों और टीपू के बीच मंगलौर की संधि हो गई।

चेतसिंह

चेतसिंह बनारस का राजा था, जो जो पहले अवध के नवाब के आश्रित था। 1775 ई. में नवाब शुजाउद्दौला की मृत्यु के बाद चेतसिंह ने ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रति निष्ठा व्यक्त की और कंपनी के साथ एक संधि कर नवाब को दिये जाने वाले 22.5 लाख रुपये का सालाना नजराना कंपनी को देना स्वीकार किया। इसके बदले में कंपनी ने वादा दिया कि यदि राजा यह धनराशि नियमित देता रहा तो कंपनी किसी भी आधार पर अपनी माँग नहीं बढ़ायेगी और किसी भी व्यक्ति को राजा के अधिकार में दखल देने अथवा उसके देश की शांति-भंग करने की इजाजत नहीं देगी।

  • 1778 ई. में वारेन हेस्टिंग्स ने चेतसिंह से 5 लाख रुपये का एक विशेष अंशदान युद्धकर के रूप में माँगा। चेतसिंह ने उसे दे दिया। 1779 ई. में यह माँग फिर की गई और 2 लाख जुर्माने के साथ फौजी कार्रवाई की धमकी भी दी गई।
  • 1780 ई. में तीसरी बार धन की मांग की गई तो चेतसिंह ने 2 लाख रुपये घूस दिया। हेस्टिंग्स को इस उम्मीद के साथ भेजा कि उससे अतिरिक्त धन नहीं माँगा जाएगा।
  • हेस्टिंग्स ने 5 लाख रुपया और 2,000 घुड़सवारों की फिर माँग कर दी। चेतसिंह ने क्षमा-याचना कर 500 घुड़सवारों और 500 तोड़दारों की प्रबंध कर गवर्नर-जनरल को सूचित किया।
  • हेस्टिंग्स ने अवज्ञा का आरोप लगाकर चेतसिंह पर 50 लाख रुपये जुर्माना कर दिया और उसे दंड देने के लिए स्वयं बनारस गया। चेतसिंह ने बक्सर के स्थान पर हेस्टिंग्स का स्वागत किया और अपनी पगड़ी उसके पाँव पर रखा।
  • गवर्नर-जनरल ने राजा को बंदी बना लिया जिसके कारण चेतसिंह के सिपाहियों ने विद्रोह कर दिया। हेस्टिंग्स अपनी जान बचाकर चुनार भागा और वहाँ से एक कुमुक लाकर बनारस पर अधिकार कर लिया।
  • चेतसिंह के महल को लुटा गया। चेतसिंह ग्वालियर भाग गया। हेस्टिंग्स ने चेतसिंह के भतीजे महीप नारायण को 40 लाख रुपये वार्षिक देने की षर्त पर राजा बना दिया।
  • वारेन हेस्टिंग्स के समर्थकां का कहना है कि चेतसिंह केवल जमींदार था और 22.5 लाख रुपया भूमिकर था, शुल्क चेतसिंह को युद्धकर देना चाहिए था।
  • 1775 ई. की संधि में लिखा था कि चेतसिंह से 22.5 लाख रुपये के अलावा कोई और राशि नहीं माँगी जाएगी। वारेन हेस्टिंग्स का समस्त आचरण अनुचित, निष्ठुर तथा प्रतिशोध की भावना से प्रेरित था।

अवध की बेगमें

  • नवाब आसफउद्दौला की माँ और दादी ही अवध की बेगमें थीं। 1775 ई. में आसफउद्दौला ने ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ फैजाबाद की संधि की थी, और अवध में ब्रिटिश सेना रखने के लिए एक बड़ी धनराशि देना स्वीकार किया था। निश्चित धनराशि न देने के कारण नवाब पर कंपनी का 15 लाख रुपया बकाया था।
  • वारेन हेस्टिंग्स ने अवध के नवाब से बकाया रकम को चुकाने के लिए दबाव डाला, तो नवाब ने अपनी विमाताओं के कोष पर अधिकार करने की अनुमति मांगी।
  • अवध की बेगमें आसफउद्दौला को 5,60,000 पौंड की धनराशि पहले ही दे चुकी थीं।
  • कलकत्ता परिषद् ने बेगमों को आश्वासन दिया था कि भविष्य में उनसे कोई माँग नहीं की जाएगी।
  • 1781 ई. में अवध के नवाब ने अपनी माँ और दादी के दौलत की माँग की। हेस्टिंग्स ब्रिटिश रेजिडेन्ट मिडिल्टन को आदेश दिया कि वह बेगमों पर बकाये की धनराशि का भुगतान करने के लिए दबाव डाले।
  • जब रेजीडेंट मिडिल्टन ने समुचित तत्परता नहीं दिखाई, तो ब्रिस्टो को नियुक्त किया गया। ब्रिस्टो ने बेगमों के उच्च पदस्थ कर्मचारियों को कैद में डाल दिया। बेगमों कोेे बाध्य होकर 105 लाख रुपया हेस्टिंग्स को दे दिया।

हेस्टिंग्स पर महाभियोग

  • गवर्नर जनरल के रूप में वारेन हेस्टिंग्स की दो कारणों से बड़ी बदनामी हुई- एक, बनारस के राजा चेतसिंह से अकारण अधिक रुपयों की माँग करने, एवं दूसरे, अवध की बेगमों के ऊपर अत्याचार करके अवध का खजाना लूटने के कारण।
  • वारेन हेस्टिंग्स फरवरी, 1785 ई. में इंग्लैंड पहुँचा, तो बर्क ने उसके ऊपर महाभियोग लगाया।
  • ब्रिटिश पार्लियामेंट में यह महाभियोग 1788 ई. से 1795 ई. तक चला।
  • ब्रिटेन के प्रधानमंत्री पिट ने माना कि चेतसिंह के मामले में हेस्टिंग्स का व्यवहार क्रूर, अनुचित और दमनकारी था, लेकिन अंत में वह सभी आरोपों से मुक्त हो गया।
  • हेस्टिंग्स ने प्राचीन विद्याओं और साहित्य को संरक्षण दिया। वह अरबी, फारसी जानता था और बंगाली बोल सकता था। उसने चाल्र्स विकिन्स के गीता के प्रथम अनुवाद की प्रस्तावना लिखी।

विल्किन्स ने फारसी तथा बांग्ला मुद्रण के लिए ढ़लाई के अक्षरों का आविष्कार किया। विल्किन्स ने गीता तथा हितोपदेश का अंग्रेजी अनुवाद भी किया। विलियम जोंस ने 1778 ई. में ‘एशियाटिक सोसायटी आॅव बंगाल’ की नींव डाली।

संभवतः वारेन क्लाइव की ही भाँति लालची था। मून का विश्वास है कि उसने लगभग 30 लाख रुपये की धूस ली थी।


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