लॉर्ड डलहौजी (Lord Dalhousie, 1848–1856)

लॉर्ड हार्डिंग के पश्चात् लॉर्ड डलहौजी, जिसे ‘अर्ल ऑफ़ डलहौज़ी’ भी कहा जाता था, 12 जनवरी, 1848 को भारत का गवर्नर जनरल नियुक्त हुआ और 1856 तक इस पद पर रहकर अनेक ऐतिहासिक कार्य किया। 1812 में स्कॉटलैड के एक अभिजात परिवार में जन्मे डलहौजी का वास्तविक नाम जेम्स एंड्रू ब्राउन रामसे था। उसने क्राइस्ट चर्च एंड हेरो और ऑक्सफ़ोर्ड में शिक्षा ग्रहण की थी और 25 वर्ष की आयु में वह ब्रिटिश पार्लियामेंट का सदस्य चुन लिया गया था। सर रॉबर्ट पील के टोरी (रूढ़िवादी) मंत्रिमंडल में व्यापार बोर्ड के उपाध्यक्ष और अध्यक्ष के रूप में वह अपनी प्रशासनिक दक्षता का परिचय दे चुका था। राजनीति के अलावा, उसे सैनिक जीवन का भी अनुभव था क्योंकि वह आयरलैंड का चीफ सेक्रेटरी और युद्ध सचिव भी रह चुका था। भारत का गवर्नर जनरल नियुक्त होने वाला वह सबसे कम उम्र (36 वर्ष) का ब्रिटिश राजनयिक था।

लॉर्ड डलहौजी का आठवर्षीय कार्यकाल आधुनिक भारतीय इतिहास में एक स्मरणीय काल है, क्योंकि उसने विजय और विलय (व्यपगत) सिद्धांत के आधार पर न केवल ब्रिटिश साम्राज्य का विस्तार किया, बल्कि अनेक महत्त्वपूर्ण प्रशासनिक एवं संरचनागत सुधारों के द्वारा आधुनिक भारत के निर्माण में भी योगदान दिया। इस महान साम्राज्यवादी ने एक ओर युद्ध के द्वारा पश्चिम में पंजाब और पूरब में बर्मा के प्रदेशों पर अधिकार किया, तो दूसरी ओर व्यपगत सिद्धांत को व्यापक रूप देकर अनेक देसी राज्यों का ब्रिटिश साम्राज्य में विलय कर लिया। उसने पदों, उपाधियों और पेंशनों को अनावश्यक समझ कर समाप्त कर दिया और कुशासन तथा भ्रष्टाचार का आरोप लगाकर अवध और बरार को हड़प लिया। वह मुगल साम्राट के पद को भी लगभग समाप्त कर चुका था। उसके पहले के गवर्नर जनरल यदि किसी रियासत के विलय को टाल सकते थे, तो टाल जाते थे, लेकिन डलहौजी बिल्कुल भिन्न प्रकृति का था और उसे जैसे ही कहीं कोई उचित बहाना मिला, उसने तुरंत उस राज्य को ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया।

लेकिन साम्राज्यवादी होने के साथ ही लॉर्ड डलहौजी एक कुशल प्रशासक भी था। उसने भारतीय प्रशासन को आधुनिक बनाने का हरसंभव प्रयास किया। उसने संचालकों को लिखा था कि, ‘मैं भारत को बैलगाड़ी सभ्यता को तीन क्रांतिकारी उपायों- रेलवे, एकीकृत डाक व्यवस्था और विद्युत तार व्यवस्था द्वारा अधुनिक बना रहा हूँ।’ उसने प्रशासन का पुनर्गठन कर बड़े पैमाने पर सार्वजनिक निर्माण के कार्य किये। एक बार उसने लिखा था: ‘हम एक राष्ट्र का निर्माण कर रहे हैं।’ उसने भौतिक साधनों और प्रशासनिक उपायों द्वारा भारत को एकीकृत राज्य बनाने का प्रयास किया, यह बात अलग है कि उसके प्रशासनिक कार्यों का मुख्य उद्देश्य भारत में ब्रिटिश साम्राज्य को मजबूत करना था।

डलहौजी की हड़प नीति और प्रशासनिक सुधारों से भारतीयों में असंतोष और संदेह पैदा हुआ, जो 1857 में एक व्यापक क्रांति के रूप में फूट पड़ा, जिससे भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की जड़ हिल गई। यह उसका दुर्भाग्य था कि अपने साम्राज्यवादी अहंकार में वह वस्तुस्थिति को समझने में असमर्थ रहा और जब 1856 में इंग्लैंड लौटा तो घोषणा की कि भारत में सब कुछ शांत है।

ब्रिटिश साम्राज्य का विस्तार : विजय और विलय की नीतियाँ

लॉर्ड डलहौजी का उद्देश्य भारत में साम्राज्य विस्तार के कार्य को पूरा करना था और इस कार्य के लिए उसने मुख्यतः विजय और विलय दो प्रकार की नीतियों का सहारा लिया। लॉर्ड डलहौजी ने पहले प्रत्यक्ष विजय की नीति के द्वारा पंजाब और बर्मा को जीतकर उन्हें ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया। दूसरे विलय की नीति, जिसे राज्य हड़पने की नीति भी कहा गया है, के द्वारा अनेक राज्यों को शांतिपूर्वक हडप लिया। अवध और बरार जैसे राज्यों को कुशासन और भ्रष्टाचार का आरोप लगाकर हड़प लिया गया।

साम्राज्य विस्तार का कारण

राजनीतिक कारण: लॉर्ड डलहौजी ने साम्राज्य विस्तार की नीति को राजनीतिक और आर्थिक कारणों से अपनाया था। उसका राजनीतिक दृष्टिकोण यह था कि अब अंग्रेजों को देसी राज्यों को बनाये रखने की आवश्यकता नहीं रह गई थी। जब बड़े राज्यों से संघर्ष चल रहा था, उस समय छोटे राज्यों को अपने संरक्षण में रखना आवश्यक था, अन्यथा उनके दूसरे पक्ष में मिल जाने की आशंका थी। अनेक छोटे-छोटे राज्य, जो मराठों की अधीनता में थे, अंग्रेजों के संरक्षण में आ गये थे और उन्होंने अंग्रेजों की सहायता भी की थी। किंतु अब कोई अंग्रेजों का प्रतिद्वंदी नहीं था और उनकी सत्ता सर्वोच्च थी। इसलिए अब उन्हें किसी राज्य को बफर बनाने की आवश्यकता नहीं थी। अब उनका एकमात्र उद्देश्य ब्रिटिश सत्ता को स्थायी एवं सुदृढ़ बनाना था और इसके लिए आवश्यक था कि देसी राज्यों को समाप्त कर दिया जाये और संपूर्ण भारत को प्रत्यक्ष ब्रिटिश शासन के अंतर्गत लाया जाए।

आर्थिक कारण: डलहौज़ी कीसाम्राज्य विस्तार की नीति के अनेक आर्थिक कारण भी थे। अंग्रेजों को नीति थी कि साम्राज्यवादी हितों की पूर्ति के लिए भारत में रेलों और तारों का जाल बिछाया जाना आवश्यक है, जिससे भारत में ब्रिटिश माल की खपत को बढ़ाया जा सके। रेल मार्गों के निर्माण से कच्चा माल भी इंग्लैंड को तेजी से भेजा जा सकता था। अनेक देसी राज्यों के शासक दकियानूस तथा पुराने विचारों के थे और रेल मार्ग तथा तार बिछाने के विरोधी थे। इसलिए प्रत्यक्ष रूप से आर्थिक विकास के लिए और अप्रत्यक्ष रूप से भारत के आर्थिक शोषण के लिए लॉर्ड डलहौजी ने साम्राज्य-विस्तार और प्रगतिशील सुधारों की नीति अपनाई।

डलहौज़ी की युद्ध और विजय की नीति

द्वितीय आंग्ल-सिख युद्ध और पंजाब का विलय (1849) : डलहौज़ी की पहली सफलता पंजाब के विलय से मिली। गवर्नर जनरल हार्डिंग के कार्यकाल में प्रथम आंग्ल-सिख युद्ध (1846) हुआ था। उसने पंजाब को अंग्रेजी राज्य में विलय न करके अप्रत्यक्ष नियंत्रण की नीति अपनाई थी और सिख सेना को कम करके लाहौर दरबार में एक अंग्रेज रेजीडेंट के साथ अंग्रेजी सेना रख दी थी। कश्मीर सिखों से छीन लिया गया था। बाद में एक दूसरी संधि करके एक रीजेंसी काउंसिल बनाई गई थी, जिसे अंग्रेज रेजीडेंट के नियंत्रण में प्रशासन करना था। इस प्रकार सिख राज्य अंग्रेजों के नियंत्रण में आ गया था। अंग्रेजों के नियंत्रण से सिखों में असंतोष और रोष उत्पन्न होना स्वाभाविक था। सिख सेना स्वयं को पराजित नहीं मानती थी और अंग्रेजों से पुनः युद्ध करने के लिए उत्साहित थी। ऐसे में दूसरा आंग्ल-सिख युद्ध होना ही था।

जनवरी, 1848 में डलहौजी भारत आया और मार्च, 1848 में दो अंग्रेज़ अधिकारियों की हत्या के बाद मुल्तान के गवर्नर मूलराज ने विद्रोह कर दिया। डलहौजी चाहता तो मूलराज के विद्रोह का तुरंत दमन कर देता, लेकिन कहा जाता है कि वह एक पूरा युद्ध चाहता था, जिससे सिख सेना का विनाश किया जा सके और पंजाब को अंग्रेजी राज्य में मिला लिया जाये। डलहौजी ने सैनिक कार्रवाई में देर की, जिससे मूलराज के विद्रोह ने राष्ट्रीय युद्ध का रूप धारण कर लिया और छतरसिंह जैसे बहुत-से पंजाबी, सिख मूलराज के झंडे तले इकट्ठे हो गये। यही नहीं, सिखों ने पेशावर, अफगानिस्तान के अमीर दोस्तमुहम्मद को देकर उसकी मित्रता भी प्राप्त कर ली। 16 नवंबर को अंग्रेजी सेना ने लॉर्ड गफ के नेतृत्व में सीमा पार की। अंग्रेजों और सिखों के बीच तीन भयंकर युद्ध हुए- रामनगर, चिलियांवाला और गुजरात। 22 जनवरी तक अंग्रेजों ने मुल्तान जीत लिया और मूलराज को आत्म-समर्पण करना पड़ा। शेरसिंह, छतरसिंह एवं अन्य सिख सरदारों ने भी 12 मार्च, 1849 तक आत्मसमर्पण कर दिया। 29 मार्च, 1849 की घोषणा के द्वारा पंजाब को ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया गया और अंग्रेजों ने पंजाब का शासन सँभाल लिया। ग्यारहवर्षीय महाराज दलीपसिंह को पेंशन देकर लंदन भेज दिया गया। लॉर्ड डलहौजी के आदेश पर राजा दलीपसिंह ने 793 कैरेट का कोहिनूर हीरा भी ब्रिटिश की महारानी के लिए सौंप दिया। इस युद्ध के विषय में डलहौज़ी ने कहा थाः ‘सिखों ने युद्ध माँगा है, यह युद्ध प्रतिशोध सहित लड़ा जायेगा।’

पंजाब का विलय एक विशुद्ध साम्राज्यवादी नीति थी और इसके लिए डलहौजी के पास कोई वैधानिक या नैतिक अधिकार नहीं था। डलहौजी के आलोचकों का कहना था कि उसने जान-बूझकर स्थानीय विद्रोह को राष्ट्रीय विद्रोह में बदलने का अवसर दिया था। किंतु ब्रिटिश सेना के कमांडर इन चीफ ने उसे तेज कार्रवाई के विरूद्ध चेतावनी दी थी। जो भी हो, इतना निश्चित है कि डलहौजी ने जो कदम उठाये थे, वे बहुत हद तक अनियमित थे क्योंकि मुल्तान का विद्रोह अंग्रेजों के विरूद्ध नहीं, बल्कि सिख सरकार की नीतियों के विरूद्ध था। यही कारण है कि इतिहासकारों ने इस विलय को ‘सिद्धांतहीनऔरहिंसक विश्वासघात’ की संज्ञा दी है। हेनरी लारेंस ने भी डलहौजी को विलय न करने की सलाह दी थी, किंतु पंजाब की जीत और उसका विलय ब्रिटिश साम्राज्यवाद की आवश्यकता थी और यही डलहौजी की हड़प नीति का औचित्य था।

द्वितीय बर्मा युद्ध और लोअर बर्मा का विलय (1852) : डलहौजी ने पूरब में ब्रिटिश साम्राज्य के विस्तार के लिए द्वितीय आंग्ल-बर्मा युद्ध किया और बर्मा की हार के बाद लोअर बर्मा (दक्षिणी बर्मा) तथा पीगू को 1852 में अंग्रेज़ी साम्राज्य में मिला लिया।

1826 की यान्डबू की संधि के बाद बहुत-से अंग्रेज व्यापारी दक्षिणी बर्मा के दक्षिणी तट एवं रंगून में बस गये थे। अंग्रेज व्यापारी बर्मा पर अंग्रेजी राज्य का अधिकार चाहते थे। इन व्यापारियों ने 1851 में कलकता के अधिकारियों से बर्मा सरकार के उत्पीडन की शिकायत की थी। डलहौजी ने अंग्रेज व्यापारियों का पक्ष लेने और बर्मा पर ब्रिटिश प्रभुत्व स्थापित करने के लिए अपने “फॉक्स” नामक युद्धपोत के साथ लेम्बर्ट को रंगून भेजा। लेम्बर्ट ने बर्मा के राजा के एक पोत को पकड़ लिया। डलहौजी ने बर्मा का पक्ष सुनने के बजाय बर्मा के राजा से क्षमा माँगने और एक लाख पौंड क्षतिपूर्ति की माँग कर दी। बर्मा सरकार से जवाब न मिलने पर 5 अप्रैल, 1852 को अंग्रेजों और बर्मा के महाराजा के बीच युद्ध छिड़ गया। इस युद्ध में बर्मा का राजा पराजित हुआ और अंग्रेजी सेना ने 12 अप्रैल को रंगून पर और जून में दक्षिणी बर्मा (पेगू क्षेत्र) पर अधिकार कर लिया।. संचालक चाहते थे कि पूरे बर्मा पर कब्जा कर लिया जाये, किंतु डलहौजी ने घने जंगल, दलदली जमीनों और पहाड़ों के कारण आगे बढ़ना उचित नहीं समझा। अंततः 20 दिसंबर, 1852 को दक्षिणी बर्मा का ब्रिटिश साम्राज्य में विलय कर दिया गया। जनवरी, 1853 में बिना किसी संधि के साथ युद्ध समाप्त हो गया और पेगु को लोअर बर्मा नाम दिया गया।

द्वितीय आंग्ल-बर्मा युद्ध भी किसी दृष्टि से न्यायपूर्ण नहीं था, लेकिन डलहौजी ने ब्रिटिश साम्राज्य की आवश्यकता के लिए इसे उचित ठहराया। इस युद्ध से ब्रिटेन को रंगून जैसा एशिया का बड़ा बंदरगाह मिल गया।

लॉर्ड डलहौज़ी का व्यपगत सिद्धांत

लॉर्ड डलहौज़ी अपने कुख्यात ‘व्यपगत सिद्धांत’, जिसे ‘राज्य हड़पने की नीति’ भी कहा जाता है, के कारण अधिक जाना जाता है। उसने ब्रिटिश साम्राज्य के विस्तार के लिए इस व्यपगत सिद्धांत का व्यापक स्तर पर प्रयोग किया।

लॉर्ड डलहौज़ी के व्यपगत सिद्धांत या विलय (हड़प) नीति का अर्थ था कि यदि स्वाभाविक उत्तराधिकारी न हो तो ऐसे आश्रित राज्यों का ब्रिटिश साम्राज्य में विलय हो जायेगा। आश्रित राज्य का अर्थ था जो राज्य ब्रिटिश सरकार द्वारा बनाये गये थे या उस पर आश्रित थे। इस नीति के पक्ष में तर्क दिया गया था कि मुगल साम्राज्य के पतन के बाद ब्रिटिश सरकार ने सर्वोच्च सत्ता के रूप में यह अधिकार प्राप्त कर लिया था। किंतु वस्तुतः यह एक सामंती प्रथा थी, जिसके अनुसार यदि कोई सामंत निःसंतान मर जाता था, तो राज्य उसकी जामीन पर अधिकार कर लेता था।

हिंदुओं में गोद लेने की प्रथा बहुत पुरानी है और धर्म द्वारा अनुमोदित है। इसके अलावा, इस सिद्धांत को देसी राज्यों पर लागू करने में अन्य कठिनाइयाँ भी थीं। पहली कठिनाई यह थी कि अनेक देसी राज्यों की स्थापना अंग्रेजी राज्य की स्थापना के पहले हुई थी। अंग्रेजों ने ऐसे देसी राज्यों के साथ जो संधियाँ की थी, उनमें सर्वोच्चता जैसी कोई बात नहीं थी और देसी राज्यों ने अंग्रेजों की केवल अधीनता स्वीकार की थी। इन संधियों में अंग्रेज सरकार को यह अधिकार नहीं था कि यदि किसी राजा के कोई उतराधिकारी न हो तो उसके राज्य का अपहरण कर ले। वस्तुतः प्रत्येक राज्य के अपने उत्तराधिकार के रीति-रिवाज थे। अंग्रेजों को उनमें हस्तक्षेप करने का कोई नैतिक अधिकार नहीं था।

व्यपगत सिद्धांत या हड़प नीति डलहौजी की मौलिक कल्पना नहीं थी। उससे पहले यह नीति गवर्नर जनरलों ने क्रियान्वित की थी। डलहौजी का नाम इस नीति से इसलिए जुड़ गया क्योंकि उसने इस नीति को बड़े पैमाने पर प्रयोग किया। यह नीति लॉर्ड बैंटिंक के कार्यकाल में आरंभ हुई थी। 1834 में कंपनी के डाइरेक्टरों ने कहा था कि ‘पुत्र न होने पर दत्तक पुत्र का अधिकार हमारी ओर से एक अनुग्रह मात्र है, एक विशेष अनुकंपा तथा स्वीकृति है, जो एक अपवाद होना चाहिए।’ उन्होंने यह भी कहा था कि यह अधिकार सामान्य रूप से न दिया जाये और केवल विशेष कृपा के रूप में ही दिया जाये। गृह सरकार ने 1841 में गवर्नर जनरल को आज्ञा दी कि अगर उपयुक्त अवसर मिले तो नवीन प्रदेशों को ब्रिटिश राज्य में सम्मिलित कर लिया जाये। इन्हीं आज्ञाओं का पालन करते हुए बैंटिंक ने 1832 में कछार, 1834 में कुर्ग को कुशासन का आरोप लगाकर ब्रिटिश राज्य में शामिल कर लिया था। 1831 में मैसूर राज्य को अंग्रेजों ने केवल प्रशासन के लिए अपने हाथों में ले लिया था। बैंटिंक ने इन कार्यों को इस आधार पर किया था कि ब्रिटिश राज्य सर्वोच्च सत्ता थी और उसे देसी राज्यों को विलय करने का अधिकार था। हड़प नीति का आधार ब्रिटिश सर्वोच्चता को बनाया गया था। इसी सिद्धांत के आधार पर 1839 में मांडवी, 1840 में कोलाबा और जालौर राज्य तथा 1842 में सूरत की नवाबी समाप्त की गई थी।

ब्रिटिश नीति में यह परिवर्तन 1818 के बाद आना शुरू हुआ था। लॉर्ड हेस्टिंग्स की देसी राज्यों के प्रति नीति थी कि उनका विलय न करके उनको संरक्षण प्रदान किया जाये। हेस्टिंग्स की नीति थी कि संरक्षित राज्यों के विदेशी संबंधों पर नियंत्रण रखा जाये। ये संरक्षित राज्य न तो युद्ध कर सकते थे, न संधि कर सकते थे और न अन्य राज्यों से संबंध स्थापित कर सकते थे। संरक्षित राज्य की स्थिति अधीनस्थ राज्य की थी। किंतु 1823 से 1834 के मध्य हेस्टिंग्स की नीति में धीरे-धीरे परिवर्तन होता गया और यह परिवर्तन दो रूपों में सामने आया- प्रथम, राज्यों में रेजीडेंटों का प्रशासन में हस्तक्षेप बढ़ता गया; द्वितीय, संरक्षण के स्थान पर अब विलय को अपनाया गया।

देसी राज्यों का वर्गीकरण

डलहौजी का विचार था कि देसी राज्यों में कुशासन समाप्त करने का सर्वोत्तम उपाय यह है कि उन्हें अंग्रेजी राज्य में सम्मिलित कर लिया जाये। उसका विचार था कि सैकड़ों छोटे-छोटे राज्यों को सरंक्षण प्रदान करना उत्तम नीति नहीं थी। उन्हें अंग्रेजी राज्य में सम्मिलित कर लेना चाहिए, जिससे ब्रिटिश सुशासन का लाभ उन राज्यों की प्रजा को भी मिल सके। यह विशुद्ध रूप से साम्राज्यवादी नीति थी, किंतु डलहौजी इस नीति को मनमाने तौर पर लागू नहीं कर सका, क्योंकि इसका भारी विरोध हुआ। अंततः डलहौजी को अपनी नीति में संशोधन करना पड़ा और भारतीय देसी राज्यों को तीन श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया-

  1. प्रथम श्रेणी : इस श्रेणी में ऐसे स्वतंत्र राज्य शामिल थे, जो कभी किसी अन्य शक्ति के अधीन नहीं रहे थे और न किसी में ‘कर’ देते थे, जैसे- जयपुर, जोधपुर, उदयपुर। इन राज्यों के राजा गोद लेने के लिए स्वतंत्र थे।
  2. द्वितीय श्रेणी: इस श्रेणी में ऐसे आश्रित राज्य सम्मिलित थे, जो मुगल सम्राट या पेशवा को ‘कर’ देते थे और अब अंग्रेज़ों के अधीनस्थ थे। इस प्रकार के राज्य नागपुर, ग्वालियर थे। इन राज्यों के राजाओं को दत्तक पुत्र लेने के लिए अंग्रेजों से स्वीकृति लेना आवश्यक था।
  3. तृतीय श्रेणी : इस श्रेणी में ऐसे अधीनस्थ राज्य शामिल थे, जिन्हें अग्रेजों ने बनाया था और जो पूर्ण रूप से अंग्रेजों की आधीनता में थे, जैसे- सतारा, झाँसी। इन राज्यों के राजाओं को दाक पुत्र लेने का कोई अधिकार नहीं था।

लॉर्ड डलहौज़ी का कहना था कि प्रथम श्रेणी के राज्यों से गोद लेने के अधिकार को नहीं छीना जा सकता है और इन राज्यों के राजा किसी पुत्र को गोद लेने के लिए स्वतंत्र थे। दूसरी श्रेणी के अंतर्गत आने वाले राज्य अंग्रेजों के संरक्षण में थे और अंग्रेजों की अनुमति से गोद लेने का अधिकार मिल सकता है। ऐसे मामलों में अनुमति दी भी जा सकती है और नहीं भी; वैसे प्रयास अनुमति देने का ही रहेगा। किंतु तीसरी श्रेणी के राज्यों में दत्तक उत्तराधिकार की अनुमति कदापि नहीं दी जायेगी। ऐसे राज्यों का निर्माण अंग्रेजों ने किया था और उत्तराधिकारी न होने की दशा में ये राज्य सर्वोच्चता सत्ता को ‘लैप्स’ हो जायेंगे। वस्तुतः डलहौजी अति उत्साह में लैप्स का सिद्धांत सभी राज्यों पर लागू करना चाहता था, लेकिन कठिनाइयों को देखकर वह इस नीति को केवल अधीनस्थ राज्यों पर ही लागू कर सका।

डलहौज़ी द्वारा भारतीय राज्यों का किया गया यह वर्गीकरण अनुचित तथा अस्पष्ट था क्योंकि किसी भी राज्य को किसी भी श्रेणी में रखा जा सकता था। करौली राज्य को डलहौजी ने आश्रित राज्य माना था, जबकि डाइरेक्टरों ने उसे स्वतंत्र राज्य माना। इसी प्रकार डलहौजी ने सतारा को स्वतंत्र राज्य माना, जबकि डाइरेक्टरों ने उसे आश्रित राज्य बताया। वास्तविकता यह थी कि राजनीतिक अवसरवादिता ही एकमात्र आधार था, जिस पर किसी भारतीय राज्य को अंग्रेजी राज्य में मिलाये जाने का निर्णय लिया जाता था। डलहौजी द्वारा इस सिद्धांत का प्रतिपादन पूर्णतया मनमाना था। इसके द्वारा दिये गये अधिकार और लगाये गये प्रतिबंध पूर्णतया अंग्रेजों की इच्छा के अधीन थे। अंततः डलहौज़ी ने अपने विलय की नीति से भारत की प्राकृतिक सीमाओं तक अंग्रेज़ी राज्य का विस्तार कर दिया।

हड़प नीति के शिकार राज्य

डलहौजी ने हड़प नीति के अंतर्गत सात राज्यों का अंग्रेजी राज्य में विलय किया- सतारा (1848), सम्भलपुर (1849), जैतपुर (1849), बघाट (1850), उदयपुर (1852), झाँसी (1853), नागपुर (1854) और करौली (1855)। इनमें से करौली का विलीनीकरण संचालकों ने अस्वीकार कर दिया था।

सतारा (1848): डलहौजी ने व्यपगत सिद्धांत के आधार पर सबसे पहले सतारा राज्य का विलय किया गया, जिसे लॉर्ड हेस्टिंग्स ने बनाया था। सतारा के राजा अप्पा साहिब के कोई पुत्र नहीं था, इसलिए उन्होंने अपनी मृत्यु के कुछ समय पहले अंग्रेजों की स्वीकृति के बिना एक पुत्र को गोद (दत्तक पुत्र) लिया था। अप्पा साहिब की मृत्यु के बाद डलहौजी ने दत्तक पुत्र को उत्तराधिकारी के रूप में स्वीकार नहीं किया और सतारा राज्य को आश्रित राज्य घोषित कर ब्रिटिश राज्य में मिला लिया।

सम्भलपुर (1849): सम्भलपुर का राजा नारायणसिंह 1849 में निःसंतान मर गया। वह कोई पुत्र गोद नहीं ले सका था। इसलिए डलहौजी ने उत्तराधिकारी के अभाव में इस राज्य को भी अंग्रेजी राज्य में मिला लिया।

जैतपुर (1849): यह राज्य बुंदेलखंड में स्थित था। 1850 में यहाँ के राजा की पुत्रहीन अवस्था में मृत्यु हो गई। अतः पुत्र या उत्तराधिकारी के अभाव में इस राज्य का भी अंग्रेजी राज्य में विलय कर लिया गया।

बघाट (1850): यह पंजाब के पर्वतीय प्रदेश में स्थित एक छोटा-सा राज्य था। 1850 में इसका राजा निसंतान मर गया और इसे अंग्रेजी राज्य में मिला लिया गया।

उदयपुर (1852): यह राज्य मध्य प्रांत में स्थित था। राजा के कोई औरस पुत्र नहीं था। इसलिए 1852 में उसकी मृत्यु के बाद इसे भी अंग्रेजी राज्य में शामिल कर लिया गया।

झाँसी (1853): 1817 में लॉर्ड हेस्टिंग्स ने रामचंद्रराव को इस राज्य का वंशानुगत राजा मान लिया था।। अंग्रेजों का कहना था कि पेशवा के पतन के पश्चात् इस राज्य को पुनर्स्थापित किया गया था। अतः रामचंद्रराव उनका आश्रित राजा था। 1835 में उसने मृत्यु-शय्या पर एक पुत्र गोद लिया था, लेकिन अंग्रेजों ने उसके भाई गंगाधरराव को गद्दी पर बिठाया। 1853 में राजा गंगाधरराव की मृत्यु हो गई। वह निसंतान था और मृत्यु से पूर्व उसने हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार दामोदरराव (आनंदराव) नामक बालक को गोद लिया था। चूंकि उसने अंग्रेजों की स्वीकृति के बिना पुत्र को गोद लिया था, इसलिए डलहौजी ने उसे उत्तराधिकारी मानने से इनकार कर दिया और इस राज्य को अंग्रेजी राज्य में मिला लिय।

नागपुर (1854): लॉर्ड हेस्टिंग्स ने 1815 में नागपुर राज्य पर अधिकार किया था और इसे अंग्रेजी राज्य में न मिलाकर राघोजी तृतीय भोंसले को दे दिया था। इस प्रकार नागपुर एक आश्रित राज्य था। 1853 में राघोजी भोंसले की मृत्यु हो गई। मृत्यु से पहले उसने अपनी रानी को बालक यशवंतराव को गोद लेने का आदेश दिया था और रानी ने यशवंतरांव को गोद ले भी लिया था। किंतु डलहौजी ने यशवंतराव को उत्तराधिकारी नही माना और 1854 में नागपुर राज्य को अंग्रेजी राज्य में मिला लिया।

करौली (1855): करौली राज्य राजस्थान में स्थित था। करौली का राजा नरसिंहपाल पेशवा को ‘कर’ देता था। नरसिंहपाल के कोई पुत्र नहीं था। नरसिंहपाल के मरने के बाद डलहौजी ने करौली राज्य को हड़पने के लिए गृह-सरकार से अनुमति माँगी। किंतु संचालकों ने इसके विलय की अनुमति नहीं दी। संचालकों का कहना था कि करौली एक स्वतंत्र और सुरक्षाप्राप्त राज्य था। बाद में, वायसराय लॉर्ड केनिंग ने बघाट और उदयपुर के विलीनीकरण को भी निरस्त कर दिया।

उपाधियों तथा पेंशनों की समाप्ति

कंपनी जिन राज्यों को अपने शासन में सम्मिलित करती थी, वहाँ के शासकों को वह पेंशन या उपाधि देती थी। लॉर्ड डलहौजी ने अपने हड़प सिद्धांत को उपाधियों और पेंशनों पर भी लागू किया। उसका कहना था कि उपाधि या पेंशन देना व्यर्थ था। उसने तर्क दिया कि उपाधिधारी विद्रोहियों का नेतृत्व करते थे और पेंशनों पर अनावश्यक रूप से काफी धन व्यय होता था। उसका यह भी कहना था कि उपाधियाँ तथा पेंशनें व्यक्तिगत थीं, इसलिए इन्हें वंशानुगत नहीं माना जा सकता था।

कर्नाटक के नवाब मुहम्मद गौस को वेलेजली ने ‘नवाब’ की उपाधि के प्रयोग का अधिकार दिया था। किंतु 1853 में जब कर्नाटक के नवाब की मृत्यु हो गई तो डलहौजी ने मद्रास सरकार के सुझाव से सहमत होकर उसके पुत्र से ‘नवाब’ की उपाधि छीन ली और उसके वंशजों का राजपद समाप्त कर दिया।

तंजौर राज्य को वेलेजली ने अंग्रेजी राज्य में मिलाया था, लेकिन उसके राजा शिवाजी को ‘राजा’ की उपाधि का प्रयोग करने की अनुमति दी थी। राजा शिवाजी के कोई पुत्र नहीं था, इसलिए 1855 में जब राजा की मृत्यु हुई, तो डलहौजी ने उसकी ‘राजा’ की उपाधि को समाप्त कर दिया।

अंग्रेज सरकार अंतिम पेशवा बाजीराव द्वितीय को आठ लाख रुपया वार्षिक पेंशन देती थी। पेशवा बाजीराव द्वितीय के कोई पुत्र नहीं था। उसने धोंडूपंत को, जो नानासाहब के नाम से प्रसिद्ध हुए, गोद लिया था। 1853 में बाजीराव द्वितीय की मृत्यु के बाद डलहौजी ने नानासाहब को बाजीराव की संपत्ति का उत्तराधिकारी तो मान लिया, किंतु पेंशन देने से इनकार कर दिया। उसका कहना था कि पेंशन पेशवा को नहीं, बल्कि बाजीराव द्वितीय को व्यक्तिगत रूप से दी गई थी।

इसी प्रकार डलहौजी मुगल सम्राट की उपाधि को भी समाप्त करना चाहता था, किंतु कंपनी के संचालकों ने उसके इस प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया। फिर भी, उसने युवराज फखरुद्दीन को इस शर्त पर युवराज स्वीकार किया कि बादशाह बहादुरशाह जफर की मृत्यु के बाद वह लालकिला खाली कर देगा और कुतुब में जाकर रहेगा।

कुशासन और भ्रष्टाचार के आधार पर विलय

लॉर्ड डलहौजी की अवसरवादी हड़प नीति का मूल उद्देश्य ब्रिटिश साम्राज्य का प्राकृतिक सीमा तक विस्तार करना था। इसमें किसी सिद्धांत की खोज या औचित्य की जाँच करना व्यर्थ था। डलहौजी ने बरार और अवध पर भी अपनी हड़प नीति को लागू किया, किंतु इसके कारण औरस पुत्र नहीं, बल्कि कुशासन और भ्रष्टाचार थे।

दार्जिलिंग पर अधिकार: लॉर्ड डलहौजी ने 1850 में दार्जिलिंग पर अधिकार कर लिया, जो सिक्किम राज्य में था। उसने सिक्किम के राजा पर आरोप लगाया कि उसने कंपनी के अधिकारी और दो अंग्रेज़ डॉक्टरों के साथ दुर्व्यवहार किया है। वास्तविकता यह थी कि दार्जिलिंग चाय उत्पादक क्षेत्र था और अंग्रेज कंपनियाँ उस पर अधिकार करने की माँग कर रही थीं।

बरार (1853): बरार क्षेत्र हैदराबाद के निजाम के नियंत्रण में था और इंग्लैंड की गृह सरकार हैदराबाद के विलय के पक्ष में थी, किंतु डलहौजी का कहना था कि हैदराबाद एक बड़ी मुस्लिम रिसायत थी। उसके विलय से मुसलमानों में असंतोष उत्पन्न होने की आशंका थी। अंततः डलहौजी ने केवल बरार का विलय करने का निश्चय किया, जो कपास उत्पादन का क्षेत्र था। इसके लिए डलहौजी को बहाना भी मिल गया।

1800 की संधि के अनुसार निजाम को एक अतिरिक्त सहायक सेना रखनी पड़ी थी, जिसका सारा व्यय निजाम को देना पड़ता था। यह व्यय इतना अधिक था कि निजाम इसका भुगतान नहीं कर पाता था। इसका परिणाम हुआ कि 1853 तक उस पर 4,50,000 पौंड ऋण हो गया था। डलहौजी ने निजाम पर एक नई संधि के लिए दबाव डाला, जिसके अनुसार निजाम को सेना के व्यय के लिए बरार प्रांत की आय कंपनी को सौंपनी पड़ गई। फलतः बरार का प्रशासन अंग्रेज रेजीडेंट को सौंप दिया गया और इस प्रकार बरार पर निजाम को सत्ता तो बनी रही, लेकिन इस पर अंग्रेजों का अधिकार हो गया।

अवध का विलय, (1856): अवध जैसे राज्यों पर व्यपगत सिद्धांत लागू नहीं हो सकते थे क्योंकि नवाब वाजिदअलीशाह के वारिस थे।अतः डलहौजी ने अवध को ‘अच्छे दिन‘ के नाम पर 1856 में अंग्रेजी राज्य में मिला लिया।

1848 में डलहौजी ने कर्नल स्लीमैन को लखनऊ में रेजीडेंट के रूप में भेजा था, जिसने अवध के कुशासन का विस्तृत विवरण भेजा था। 1854 में स्लीमैन के स्थान पर आउट्रम भारत आया और उसने भी अपनी रिपोर्ट में बताया कि अवध का प्रशासन बहुत दूषित है और लोगों की दशा बहुत शोचनीय है। अब डलहौजी को अवध के नवाब वाजिदअली शाह पर अयोग्यता तथा दोषपूर्ण शासन करने का आरोप लगाने का बहाना मिल गया। उसने नवाब पर एक नई संधि स्वीकार करने का दबाव डाला, जिसके अनुसार नवाब को 12 लाख रुपये वार्षिक पेंशन देकर अवध राज्य को अंग्रेजी साम्राज्य में मिला लिया जाता। फलतः नवाब वाजिदअली ने इस संधि को स्वीकार करने से इनकार कर दिया । अंततः लॉर्ड डलहौजी ने नवाब को गद्दी से उतारकर कलकत्ता भेज दिया और 13 फरवरी, 1856 को एक घोषणा द्वारा अवध को कंपनी के राज्य में मिला लिया।

अवध का विलय एक घोर अनैतिक कार्य था और सभी ने इसकी निंदा थी। अवध के इस अनैतिक विलय से न केवल मुस्लिम अभिजात वर्ग असंतुष्ट हो गया, बल्कि ब्रिटिश सेना के उन हजारों सैनिकों को भी गहरा आघात लगा, जो अवध के मैदानी क्षेत्रों से सेना में जाकर ब्रिटिश कंपनी की सेवा कर रहे थे। अगले साल 1857 में यही असंतोष क्रांति के रूप में सामने आ गया।

व्यपगत सिद्धांत (हड़प नीति) की समीक्षा

हड़प नीति (व्यपगत सिद्धांत) का प्रयोग मुख्य रूप से साम्राज्य विस्तार के लिए किया गया था। पुत्र गोद लेने की प्रथा हिंदुओं में बहुत प्राचीन थी और इसे बड़ी धूमधाम से और धार्मिक कर्मकांडों के अनुसार मनाया जाता था। मुगलों और पेशवाओं के अधीन गोद लेने के लिए केवल नज़राना देना पड़ता था, किंतु डलहौजी ने इस प्रथा की आड़ में पूरे राज्य को ही हड़पना शुरू कर दिया। इसके अलावा, आश्रित राज्य और संरक्षित मित्र राज्य का भेद और वर्गीकरण भी एक कल्पना मात्र था।

डलहौजी की हड़प नीति का आधार अंग्रेजी राज्य की सार्वभौम शक्ति को बनाया गया था। इसके पूर्व, मुगल या मराठों ने भी सार्वभौम शक्ति का दावा किया था, लेकिन उन्होंने इसे राज्यों को हड़पने का आधार नहीं बनाया था और केवल ‘वार्षिक कर’ से संतुष्ट रहे। डलहौजी का यह भी तर्क था कि राज्य के निवासियों के हितों की रक्षा के लिए किसी भी राज्य को अंग्रेजी राज्य में सम्मिलित किया जा सकता था। वास्तव में कुशासन का आरोप भी साम्राज्य-विस्तार का एक बहाना था।

साम्राज्यवादी इतिहासकारों ने डलहौजी के हड़प नीति का समर्थन किया है। उनके अनुसार इससे विलीन राज्यों को कुशल और सक्षम ब्रिटिश प्रशासन का लाभ मिला। ब्रिटिश साम्राज्य को सुदृढ़ बनाने तथा शक्तिशाली बनाये रखने के लिए भी यह नीति आवश्यक थी। हड़प नीति के कारण ही छोटे-छोटे राज्यों के स्थान पर एक विस्तृत अंग्रेजी राज्य स्थापित हुआ। डलहौजी ने अत्यंत सावधानी के साथ इस नीति को केवल ‘आश्रित’ राज्यों पर ही लागू किया और स्वतंत्र राज्यों, जैसे- हैदराबाद, बहावलपुर के मामलों में हस्तक्षेप नहीं किया, यद्यपि संचालक इन दोनों राज्यों का भी विलय चाहते थे। डलहौजी तो इस मुद्दे पर अपना त्यागपत्र तक देने को तैयार था। दरअसल डलहौजी बहुत ही सावधान और आत्म-बोधपूर्ण व्यक्ति था और वह अन्याय करने के लिए अयोग्य था। किंतु यह केवल एक साम्राज्यवादी की प्रशंसा है और वास्तविकता ठीक इसके विपरीत थी।

डलहौजी की राज्य हड़पने की इन अनैतिक नीतियों, विशेषकर अवध के अधिग्रहण के कारण विस्थापित राजाओं, ताल्लुकेदारों, भारतीय सैनिकों, मुल्लिम अभिजनों और आम जनता में व्यापक असंतोष फैला, जो एक वर्ष बाद ही 1857 में क्रांति के रूप में फूट पड़ा। इस प्रकार हड़प नीति को 1857 की क्रांति का मुख्य कारण माना जा सकता है।

लॉर्ड डलहौजी प्रशासन एवं सुधार

लॉर्ड डलहौजी बोर्ड ऑफ कंट्रोल का अध्यक्ष रह चुका था और काबुल प्रशासक के रूप में उसने ख्याति अर्जित की थी। वह साम्राज्यवादी और अग्रगामी नीति का समर्थक था। उसका शासनकाल ब्रिटिश साम्राज्य के विस्तार का काल था। किंतु साम्राज्य विस्तार के साथ- साथ उसने प्रशासन को भी सुसंगठित किया और उसे आधुनिक बनाने का प्रयास किया।

इस समय यूरोप में वैज्ञानिक तथा तकनीकी प्रगति हो रही थी और इस प्रगति से अंग्रेज शासकों का प्रभावित होना स्वाभाविक था। ब्रिटेन में मानवतावादी विचारों का प्रभाव बढ़ रहा था, जिसका प्रभाव डलहौजी पर पड़ा था। वह अपने सुधारों के द्वारा प्रशासन को जनोपयोगी स्वरूप देना चाहता था, जिससे भारतीय जनमानस को संतुष्ट किया जा सके और ब्रिटिश जनता के समक्ष कंपनी के शासन का औचित्य सिद्ध किया जा सके।

इसके अलावा, लॉर्ड डलहौजी के सुधारों और निर्माण-कार्यों के अन्य भी कई कारण थे। एक तो, राज्य हड़पने की नीति के कारण ब्रिटिश साम्राज्य काफी विस्तृत हो गया था और इस विस्तृत साम्राजय की सुरक्षा के लिए यातायात और संचार के तीव्रगामी साधनों की आवश्यकता थी; दूसरे, इंग्लैंड की औद्योगिक क्रांति की आवश्यकताओं और ब्रिटिश पूँजीपतियों के हितों की सुरक्षा के लिए भी व्यापक सुधारों और निर्माण-कार्यों, विशेषरूप से रेलमार्गों के निर्माण की आवश्यकता थी। जो भी हो, कंपनी की आर्थिक स्थिति संतोषजनक थी, इसलिए डलहौजी बड़े पैमाने पर निर्माण-कार्यों को पूरा कर सका। लॉर्ड बैंटिंक को छोड़कर किसी गवर्नर जनरल ने भारत में इतने सुधार नहीं किये, जितने डलहौजी ने। यही कारण है कि कुछ इतिहासकार उसे ‘आधुनिक भारत का निर्माता’ मानते हैं।

लॉर्ड डलहौजी के प्रशासनिक सुधार

लॉर्ड डलहौजी के प्रशासनिक सुधारों का आधार केंद्रीकरण की नीति थी। वह सत्ता के समस्त अधिकारों का अपने हाथों में रखना चाहता था। इन सुधारों के द्वारा भारतीय साम्राज्य की नवीन आवश्यकताओं को भी पूरा करना चाहता था। इस व्यवस्था के अंतर्गत समस्त कार्य कमिश्नरों को करना था, जो सीधे गवर्नर जनरल के प्रति उत्तरदायी थे। उसका विश्वास था कि सत्ता के केंद्रीकरण से प्रशासन की कुशलता तथा प्रभावशीलता में वृद्धि होगी। उसके द्वारा किये गये प्रमुख प्रशासनिक सुधार इस प्रकार हैं-

नॉन रेगुलेशन प्रणाली: डलहौजी ने हाल में ही जिन प्रदेशों को ब्रिटिश साम्राज्य में मिलाया था, उनमें एक विशिष्ट शासन प्रणाली की व्यवस्था की, जिसे ‘नॉन रेगुलेशन प्रणाली’ कहा जाता था। इस प्रणाली के अंतर्गत डलहौजी ने विजित प्रांतों में चीफ कमिश्नरों (मुख्यायुक्तों) की नियुक्ति की, जो प्रत्यक्ष रूप से उसके प्रति उत्तरदायी थे। यह प्रणाली पंजाब, अवध, बर्मा तथा मध्य प्रदेश में लागू की गई।

बंगाल में लेफ्टिनेंट गवर्नर की नियुक्ति: बंगाल एक बड़ा प्रांत था। इसके अतिरिक्त, ब्रिटिश साम्राज्य के विस्तार से गवर्नर जनरल का कार्य-क्षेत्र व्यापक हो गया था। अतः डलहौजी ने अपने प्रशासनिक सुधारों के अंतर्गत बंगाल प्रांत में एक लेफ्टिनेंट गर्वनर की नियुक्ति की।

जिलों का निर्माण: डलहौजी ने प्रशासनिक कुशलता के लिए ब्रिटिश प्रांतों को जिलों में विभाजित किया और उनमें से प्रत्येक जिले में एक-एक डिप्टी कमिश्नर (उपायुक्त) नियुक्त किया। इस व्यवस्था के फलस्वरूप बंगाल प्रांत में तेइस, बंबई में तेरह, मद्रास में छब्बीस और सिंध में तीन जिले बनाये गये। इसके साथ ही, उसने केंद्रीय सरकार में विभिन्न विभाग स्थापित किये और पृथक कार्य सौंपे गये।

लॉर्ड डलहौजी के सैनिक सुधार

लॉर्ड डलहौजी के काल में विजयों तथा राज्यों के विलीनीकरण के कारण ब्रिटिश साम्राज्य का विस्तार हुआ था। इससे सरकार के बाह्य एवं आंतरिक सुरक्षा के प्रति उत्तरदायित्व में वृद्धि हो गई थी, विशेष रूप से पंजाब की विजय से उत्तर पश्चिम सीमा की सुरक्षा महत्वपूर्ण हो गई थी अतः डलहौजी ने सैनिक क्षेत्र में अनेक सुधार किये-

  1. सैन्य-सुधारों के अंतर्गत अंग्रेजी तोपखाने का मुख्यालय कलकत्ता के स्थान पर मेरठ स्थानान्तरित कर दिया गया और सेना का मुख्यालय भी कलकत्ता हटाकर शिमला में स्थापित किया गया। इस समय शिमला भारत सरकार की ग्रीष्मकालीन राजधानी बन चुका था।
  2. पंजाब में एक अनियमित सेना का गठन किया गया, जो सीधे पंजाब प्रशासन की आधीनता में थी। गोरखा रेजीमेंटों की संख्या बढ़ाई गई और उनके सैनिकों की संख्या में भी वृद्धि की गई। पंजाब की इस अनियमित सेना और गोरखा रेजीमेंटों ने 1857-58 की क्रांति के दौरान महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
  3. डलहौजी ने भारतीय सैनिकों को छोटी-छोटी टुकडियों में विभाजित करके उन्हें एक-दूसरे से पृथक् कर दिया। उसने अनुभव किया कि सेना में भारतीय सैनिकों की संख्या अंग्रेजों की अपेक्षा अधिक थी। इस समय सेना में 38,000 भारतीय और 45,000 यूरोपीय सैनिक थे। उसने भारतीय सैनिकों की संख्या में कटौती की और अंग्रेज सैनिकों की संख्या में वृद्धि की, क्योंकि यूरोपियन सैनिक ही भारत में कंपनी की शक्ति के आधार थे। यही नहीं, उसने दो अंग्रेज रेजीमेंटों को चीन और फारस भेजने का विरोध भी किया था।

डलहौजी जानता था कि उसकी हड़प नीति के कारण भारतीयों में गहरा असंतोष था। इसलिए उसने भारत में होने वाली संभावित प्रतिक्रिया और विद्रोह को रोकने के लिए सतर्क था। उसने गोरखा सेना तथा पंजाब की सेना का विस्तार और निर्माण इसी उद्देश्य से किया था।

रेलवे व्यवस्था का आरंभ

लॉर्ड डलहौजी के काल में ही भारत में रेल यातायात की शुरूआत हुई इसीलिए डलहौज़ी को भारत में रेलवे का जनक माना जाता है। भारत में अंग्रेजी साम्राज्य की सुरक्षा के लिए रेल यातायात आवश्यक था। डलहौजी के व्यक्तिगत प्रयास से 1853 में बंबई से थाणे के बीच 20 मील लंबी रेल लाइन बिछाई गई और 16 अप्रैल 1853 को बंबई के बोरीबंदर (छत्रपति शिवाजी टर्मिनल) से ठाणे के बीच 34 किमी पहली रेलगाड़ी चलाई गई। इस रेलगाड़ी के 14 डिब्बों को ब्रिटेन से मँगवाये गये सुल्तान, सिंध और साहिब नामक तीन भाप इंजनों ने खींचा था। अगले वर्ष 1854 में कलकत्ता से झरिया (रानीगंज) के कोयला क्षेत्र तक रेल लाइन का निर्माण किया गया। 1856 में मद्रास से अरकोनम के लिए रेलवे का संचालन आरंभ हुआ।

रेलमार्गों के निर्माण के लिए बड़ी पूँजी की आवश्यकता थी, इसलिए डलहौज़ी ने पूँजीपतियों को इसमें पूँजी निवेश के लिए प्रोत्साहित किया। इसके लिए ब्रिटिश पूँजीपतियों को ब्याज की गारंटी दी गई। यद्यपि रेलमार्गों का निर्माण मुख्यतः साम्राज्यिक उद्देश्यों से किया गया था और इससे ब्रिटिश पूँजीपतियों को भारत के आर्थिक शोषण का नवीन क्षेत्र मिल गया। रेलवे के विकास से ब्रिटेन के लौह-इस्पात उद्योग और ठेकेदारी फर्मों को भारी लाभ हुआ।

अंग्रेजों ने रेलवे का विकास भारत के आधुनिकीकरण के लिए नहीं, बल्कि अपने साम्राज्यिक हितों के लिए किया था, फिर भी, इसके कुछ दूरगामी सकारात्मक लाभ भी हुए। देश के विभिन्न भाग एक दूसरे के निकट आ गये और लोगों के बीच आपसी संपर्क बढ़ा, जिससे देश में एकता की भावना पैदा हुई। रेलवे के आगमन से एक नई सामाजिक क्रांति हुई और जाति पर आधारित सामाजिक भेदभाव काफी कमजोर हो गया। इसके अलावा, रेलवे के विकास से रोजगार के नये अवसर पैदा हुए और देश में भी विभिन्न उद्योगों का विकास संभव हुआ। इस प्रकार ‘रेलों ने भारत को एक राष्ट्र बना दिया।‘

विद्युत तार का आरंभ

भारत में विद्युत तार की शुरुआत करने का श्रेय भी डलहौज़ी को ही प्राप्त है। उसने 1852 में डाक तार विभाग की स्थापना की और ओ,शैधनेसी को विद्युत तार विभाग का अध्यक्ष नियुक्त किया। अपने अथक प्रयास से ओ,शैधनेसी ने लगभग 4,000 मील लंबी तार-लाइन बिछा दी, जिससे कलकत्ता से पेशावर, बंबई और मद्रास जैसे देश के सभी प्रमुख स्थान तार प्रणाली से जुड़ गये। 1857 में एक विद्रोही ने मरते हुए कहा था: ‘इस तार ने हमारा गला घोंट दिया।’

डाक व्यवस्था की शुरूआत

भारत में आधुनिक डाक व्यवस्था की नींव भी लॉर्ड डलहौजी के कार्यकाल में ही पड़ी थी। डलहौज़ी ने डाक व्यवस्था में सुधार के लिए एक आयोग गठित किया और उसके सुझाव पर 1854 में ‘पोस्ट ऑफ़िस एक्ट’ पारित कर डाक विभाग की स्थापना की। उसने इस विभाग के प्रमुख अधिकारी के रूप में एक महानिदेशक (डाइरेक्टर जनरल) की नियुक्ति की। संपूर्ण भारत में 753 आधुनिक डाकखानें स्थापित किये गये। एक पैसे मूल्य का पोस्टकार्ड और दो पैसे मूल्य का लिफाफा जारी किया गया, जिसमें आधा तोला भार का पत्र देश के अंदर कहीं भी भेजा जा सकता था। विदेशों में पत्र भेजने के लिए चार आने का टिकट लगाना था। इस प्रकार डलहौज़ी ने पहली बार दो पैसे और चार आने के टिकटों का प्रचलन प्रारंभ किया।

लॉर्ड डलहौजी के सार्वजनिक निर्माण-कार्य

डलहौजी से पहले सार्वजनिक निर्माण का कार्य एक सैनिक बोर्ड करता था। किंतु डलहौज़ी ने 1854 में एक स्वतंत्र विभाग के रूप में ‘सार्वजनिक निर्माण विभाग’ की स्थापना की। डलहौजी ने प्रत्येक प्रेसीडेंसी में सार्वजनिक निर्माण विभाग स्थापित किया, जिसका अध्यक्ष एक मुख्य अभियंता (चीफ इंजीनियर) होता था। सार्वजनिक निर्माण विभाग का मुख्य काम सड़़क, पुल और सरकारी इमारतें बनाना था। निर्माण-कार्य पर निगरानी रखने के लिए मुख्य अभियंता और अन्य प्रशिक्षित अभियंताओं को इंग्लैंड से बुलाया जाता था।

डलहौजी ने भारतीयों को इंजीनियरिंग का प्रशिक्षण देने के लिए रुड़की में एक इंजीनियरिंग कॉलेज की स्थापना की और अन्य प्रेसीडेंसी नगरों में भी इंजीनियरिंग कॉलेज स्थापित करने में योगदान दिया, इसलिए उसे भारत में ‘प्रोफेशनल और टेक्निकल एजुकेशन का जनक’ भी कहा जाता है।

कृषि के विकास और सिंचाई की सुविधा के लिए डलहौजी ने गंगा नहर के निर्माण-कार्य को पूरा करवाया और 8 अप्रैल, 1854 को उसे सिंचाई के लिए खोल दिया। उसने पंजाब में बारी दोआब नहर योजना पर कार्य भी आरंभ करवाया। डलहौज़ी ने कलकत्ता से पेशावर तक जाने वाली ग्रांड ट्रक रोड का निर्माण कार्य भी पुनः शुरू करवाया और उसके लिए अनेक पुल बनाये गये। उसने कृष्णा डेल्टा योजना, पोलार नहर योजना को भी पूरा करवाया, जिससे कृषि उत्पादन में वृद्धि हुई।

लॉर्ड डलहौजी के शैक्षिक सुधार

डलहौजी के कार्यकाल में शिक्षा के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण परिवर्तन और सुधार हुए। 1853 में टामसन की व्यवस्था के अनुसार उत्तर-पश्चिमी प्रांत (आधुनिक उत्तर प्रदेश), लोअर बंगाल और पंजाब में स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार भारतीय भाषाओं में शिक्षा का प्रस्ताव स्वीकार किया गया।

जुलाई, 1854 में सर चार्ल्स वुड (बोर्ड ऑफ़ कंट्रोल के प्रेसीडेंट) ने भारत में शिक्षा प्रणाली को पुनर्व्यवस्थित करने के लिए शिक्षा की एक नई योजना भेजी, जिसे ‘वुड का डिसपेच ऑफ़ 1854’ कहा जाता है। इसे भारत में ‘अंग्रेजी शिक्षा का मैग्नाकार्टा भी कहा जाता है।

वुड डिस्पैच के अनुसार लॉर्ड डलहौज़ी ने प्राथमिक शिक्षा से लेकर विश्वविद्यालय स्तर की शिक्षा के लिए एक व्यापक कार्य-योजना बनाई। इसके अंतर्गत ज़िलों में एंग्लो-वर्नाक्यूलर स्कूल, प्रमुख नगरों में सरकारी कॉलेज और तीनों प्रेसीडेंसी नगरों-कलकत्ता, मद्रास तथा बंबई में एक-एक विश्वविद्यालय स्थापित किये गये। यही नहीं, निम्न वर्ग की शिक्षा के लिए क्षेत्रीय भाषा में भी स्कूल खोले गये। प्रत्येक प्रेसीडेंसी में अलग से शिक्षा विभाग स्थापित किये गये और एक शिक्षा निदेशक की नियुक्ति की गई। अनेक शिक्षक-प्रशिक्षण संस्थान भी स्थापित किये गये और तकनीकी शिक्षा के लिए रुड़की में एक इंजीनियरिंग कॉलेज की स्थापना की गई।

लॉर्ड डलहौजी के सामाजिक सुधार

लॉर्ड डलहौजी ने राजपूतों में प्रचलित कन्या भ्रूण हत्या रोकने के लिए कई कानून बनाये और उड़ीसा और मद्रास में भूमि की उर्वरता को बढ़ाने के लिए प्रचलित नरबलि की प्रथा को भी रोकने का प्रयत्न किया।

डलहौजी के आने से पहले तक यह नियम था कि यदि कोई व्यक्ति धर्म-परिवर्तन कर लेता था, तो वह पिता की संपत्ति से वंचित हो जाता था। किंतु डलहौजी ने 1850 में एक रिलीजियस डिसेबिलिटी एक्ट पारित किया, जिसके अनुसार धर्म-परिवर्तन करने पर भी उसकी पुश्तैनी संपत्ति पर उसका अधिकार रहेगा।

इसके साथ ही, डलहौजी ने विधवा़ओं की स्थिति में सुधार लाने के उद्देश्य से विधवा पुनर्विवाह को प्रोत्साहित किया और 1856 में विधवा पुनर्विवाह अधिनियम पारित किया, जिसके कारण हिंदुओं में विधवाओं का पुनर्विवाह होना शुरू हो गया। यह बात अलग है कि इन सामाजिक परिवर्तनों के कारण रूढ़िवादी भारतीयों में अंग्रेजों के विरूद्ध असंतोष उत्पन्न हुआ।

अमेरिका का स्वतंत्रता संग्राम 

लॉर्ड डलहौजी के व्यावसायिक सुधार

डलहौजी ने स्वतंत्र व्यापार की नीति का पक्षधर था। उसने स्वतंत्र व्यापार के विकास के लिए भारत के बंदरगाहों को अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के लिए खोल दिया और कराची, कलकत्ता, मद्रास एवं बंबई के बंदरगाहों में प्रकाश-स्तंभ स्थापित कर उन्हें आधुनिक बनाने का प्रयास किया।

लॉर्ड डलहौजी का मूल्यांकन

लॉर्ड डलहौजी को एक साम्राज्यवादी गवर्नर जनरल के रूप में याद किया जाता है। उसने अपनी विलय नीति के द्वारा भारत के वर्तमान मानचित्र का निर्माण किया और राज्यों का विलय कर आंतरिक संगठन के कार्य को पूर्ण किया। उसकी विजय एवं विलय नीति से लगभग ढाई लाख वर्ग मील का क्षेत्र कंपनी के अधीन आ गया। विकास कार्यों के रूप में उसने रेलवे, नहरों एवं सार्वजनिक निर्माण की दूरगामी योजनाएँ तैयार की। इस प्रकार डलहौजी के कार्यों के मूल्यांकन के बारे में दो विरोधी विचार प्रकट किये गये हैं। इतिहासकारों के अनुसार वह एक महान् गवर्नर जनरल था, जिसने आधुनिक भारत की नींव डाली थी। दूसरी ओर भारतीयों की दृष्टि में वह घोर साम्राज्यवादी और भारतीय जनता का शोषक था।

वास्तव में डलहौजी ने क्लाइव के द्वारा शुरू किये गये कार्य को पूरा किया और भारत में ब्रिटिश साम्राज्य को प्राकृतिक सीमा प्रदान किया। उसने देशी राज्यों का अंत कर कंपनी के राज्य को संगठित किया, प्रशासन को केंद्रीकृत किया और सेना को संगठित कर शांति, सुरक्षा की स्थापना की। रेलवे, डाक एवं तार के द्वारा उसने इंग्लैंड के व्यापारिक लाभ के लिए पूँजी के नये क्षेत्र खोले। इस प्रकार उसकी व्यावसायिक नीति ने भारत के शोषण का मार्ग प्रशस्त किया। यह सही है कि उसके कार्य इंग्लैंड के व्यावसायिक लाभ के लिए थे, किंतु अनजाने में ही उसके कुछ कार्यों से भारत को भी कुछ लाभ मिले।

लॉर्ड डलहौजी के भारत में प्रगतिशील परिवर्तन करने और कई राज्यों में ब्रिटिश शासन लागू करने के बाद भी उसे भारतीयों और अंग्रेजों की आलोचना का सामना करना पड़ा। उसने भारतीय राज्यों के प्रति जो हड़प नीति अपनाई और भारतीयों के पारंपरिक रीति-रिवाजों की जो अवहेलना की, उससे व्यापक असंतोष फैला और अंततः एक वर्ष बाद ही यही असंतोष 1857 की महान् क्रांति के रूप में फूट पड़ा और ब्रिटिश राज्य की नींव हिल उठी।

लॉर्ड डलहौजी 6 मार्च, 1856 को भारत से इंग्लैंड लौट गया और कंपनी ने उसे 5000 यूरो की पेंशन दी। उनके भारत छोड़ने के तुरंत बाद ही 1857 की क्रांति हो गई और इससे जुड़े आरोपों और निंदा से जूझते हुए 1860 में उसकी मृत्यु हो गई।

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