लार्ड वेलेजली से लार्ड एमहर्स्ट तक

वेलेजली 1798 ई. में 37 वर्ष की युवावस्था में भारत का गर्वनर जनरल नियुक्त हुआ।

गर्वनर जनरल नियुक्त होने के पूर्व वेलेजली इंग्लैंड के कोष का लार्ड और बोर्ड आफ कंट्रोल का आयुक्त रहा था।

वेलेजली भारत में कंपनी को सबसे बड़ी शक्ति बनाना और सभी भारतीय राज्यों को कंपनी पर निर्भर होने की स्थिति में लाना चाहता था।

वेलेजली केवल युद्धनीति में विश्वास करता था।

वेलेजली ने भारतीय राज्यों को अधीन बनाने के लिए ‘सहायक संधि’ के अस्त्र का प्रयोग किया।

वेलेजली कहा करता था कि ‘मराठा प्रदेशों को विजितकर लेना भारतीय जनता पर महान् अनुग्रह है।’

वेलेजली ने नीति को ‘न्याय तथा तर्कसंगत’ और ‘परिमित तथा शांत’ बताया।

वेलेजली के समय में चौथा मैसूर युद्ध लड़ा गया, जिसमें टीपू सुल्तान की पराजय हुई और वह मारा गया।

सहायक संधि

वेलेजली ने भारतीय राज्यों को अंग्रेजी राजनैतिक परिधि में लाने के लिए सहायक संधि प्रणाली का सहारा किया।

कंपनी चार परिस्थितियों में भारतीय युद्धों में भाग लेती थी-
पहली अवस्था में कंपनी ने भारतीय मित्र राजाओं को युद्धों में सहायता देने के लिए अपनी सेना किराये पर देती थी। 1798 ई. में निजाम से संधि इसी तरह की गई थी।

दूसरी अवस्था में कंपनी स्वयं अपने मित्रों की सहायता से युद्धों में भाग लेती थी।

तीसरी अवस्था में कंपनी अपने भारतीय मित्रों से धन लेती थी और अंग्रेज अधिकारियों की देख-रेख में सेना भरतीकर उन्हें प्रशिक्षण और साज-सज्जा देकर तैयार करती थी, जैसे 1798 ई. में हैदराबाद की संधि।

अपने प्राकृतिक चरण में कंपनी ने अपने मित्रों की सीमाओं की रक्षा का भार अपने ऊपर ले लिया और इसके लिए अपनी एक सहायक सेना उस राज्य में रख दी और इसके बदले भारतीय मित्रों को धन नहीं, बल्कि अपने प्रदेश का एक भाग कंपनी को देना पड़ता था, जैसे 1800 ई. में निजाम की संधि में हुआ था।

डूप्ले पहला यूरोपीय था जिसने अपनी सेना भारतीय राजाओं को किराये पर दिया था।

क्लाइव से लेकर वेलेजली तक सभी गवर्नर-जनरलों ने इस प्रणाली का प्रयोग किया।

वेलेजली की विशेषता थी कि उसने सहायक संधि का विकासकर अपने संपर्क में आनेवाले सभी भारतीय राजाओं के संबंधों में इसका प्रयोग किया।

पहली सहायक संधि 1765 ई. में अवध से हुई जब कंपनी ने निश्चित धन के बदले उसकी सीमाओं की रक्षा करने का वचन दिया।

अवध ने एक अंग्रेज रेजीडेंट को लखनऊ में रखना स्वीकार किया।

फरवरी, 1787 ई. में कंपनी ने कर्नाटक के नवाब से अनुरोध किया कि वह किसी अन्य विदेशी शक्ति से कोई संबंध नहीं रखेगा।

सर जान शोर ने 21 जनवरी, 178 ई. में अवध के नवाब से नई संधि की तो उसने यह अनुरोध किया कि वह किसी अन्य यूरोपीय व्यक्ति को अपनी सेवा में नहीं रखेगा और न ही उससे कोई संबंध रखेगा।

भारतीय राजा समय से धन नहीं दे पाते थे और बकाया बढ़ जाता था, इसलिए कंपनी ने इन सेनाओं के भरण-पोषण के लिए पूर्णप्रभुसत्ता युक्त प्रदेश की माँग की।

1. भारतीय राजाओं के विदेशी संबंध ईस्ट इंडिया कंपनी के अधीन हो जाते थे और जो भी बात दूसरे राज्यों से करनी थी, कंपनी के माध्यम से ही हो सकती थी।

2. राज्यों को कंपनी की पूर्व आज्ञा के बिना राजा किसी भी यूरोपीय को अपनी सेवा में रखने का अधिकार नहीं था।

3. कंपनी सहायक संधि स्वीकार करनेवाले राज्यों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करते हुए राज्य की हर प्रकार के शत्रुओं से रक्षा करने का वचन देती थी।

4. सहायक संधि करनेवाले बड़े राज्यों के लिए आवश्यक था कि वे किसी अंग्रेज सैन्य अधिकारी के अधीन एक सैन्य टुकड़ी को अपने राज्य में रखें और इसके बदले में ‘पूर्ण प्रभुसत्ता वाले क्षेत्र’ कंपनी को दें। छोटे राज्यों को इसके लिए नकद धन देना होता था।

5. राज्यों को अपनी राजधानी में एक अंग्रेज रेजीडेंट रखना होता था।

सहायक संधि प्रणाली के कारण भारतीय राज्य निरस्त्र हो गये क्योंकि उन्हें कंपनी का संरक्षण प्राप्त हो गया।

भारतीय राज्यों की राजधानियों में कंपनी की सेना रखने से अनेक सामरिक महत्त्व के स्थानों पर कंपनी का नियंत्रण हो गया।

सहायक संधि के कारण कोई भी यूरोपीय नागरिक कंपनी की अनुमति के बिना किसी संबंधित राज्य में सेवा नहीं कर सकता था।

सहायक संधि के कारण भारतीय राज्यों का विदेश-संबंध कंपनी के अधीन हो गया।

अंग्रेज रेजीडेंटों ने अपना प्रभाव बढ़ाकर कालांतर में राज्यों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करना आरंभ कर दिया।

सहायक संधि से कंपनी को बहुत-सा पूर्ण प्रभुसत्तायुक्त प्रदेश मिल गया और उसका साम्राज्य विस्तृत हो गया।

निजाम ने 1792 ई. ई. तथा 1799 ई. में जो प्रदेश मैसूर से प्राप्त किये थे, 1800 ई. में कंपनी को दे दिया।

अवध को 1801 ई. में रुहेलखंड तथा दोआब का दक्षिणी भाग कंपनी को देना पड़ा।
सहायक संधि के कारण भारतीय राज्य निरस्त्रीकरण तथा विदेश-संबंध कंपनी के अधीन होने से अपनी स्वतंत्रता गवाँ बेठे।

अंग्रेज रेजीडेंट राज्यों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप लगे जिससे राज्य की व्यवस्था में व्यवधान आया।

सहायक संधि ने उत्पीड़क राजाओं की रक्षा की और जनता को अपनी अवस्था सुधारने के प्रयास का अवसर नहीं दिया।

सहायक संधि स्वीकार करनेवाले राज्य दिवालिया हो गये और प्रायः सभी राज्यों पर कंपनी का बकाया हो गया।विदेशी सैनिक अधिकारियों का खर्च अधिक होता था जिसके लिए राजा को अधिक कर लगाने को बाध्य होना पड़ा।

जिस दिन वेलेजली भारत पहुँचा था, उसी दिन टीपू के दूत मारीशस से एक फ्रांसीसी पोत तथा कुछ सैनिकों एवं फ्रांसीसी सहायता का वचन लेकर मंगलौर पहुँचे थे।

टीपू ने अपने आपको ‘नागरिक टीपू’ कहता था।

टीपू ने फ्रांसीसियों से आक्रामक एवं रक्षात्मक संधि की और श्रीरंगपट्टम में स्वतंत्रता की पताका को फहराया।

मराठा सरदार महादजी सिंधिया ने काउंट द बैन तथा बाद में मस्यु पैरो की सहायता से 8,000 पदाति तथा 8,000 घुड़सवारों की एक सेना तैयार की थी।

महादजी सिंधिया ने नई सेना के भरण-पोषण के लिए उसने गंगा-यमुना दोआब के कर को पृथक्कर दिया था।
वेलेजली ने बंगाल में रहनेवाले अंग्रेजों से युद्धकोष के लिए धन माँगा और 1,20,000 पौंड से अधिक धन एकत्रकर इंग्लैंड भेजा।

वेलेजली ने 1799 ई. में मेंहदी अली खाँ नामक एक दूत को ईरान के शाह के दरबार में भेजा।

नवंबर, 1800 ई. में वेलेजली का एक अन्य दूत जान मैल्कम बहुत से बहुमूल्य उपहार लेकर तेहरान गया। वेलेजली ने फ्रांसीसी नाविक अड्डे मारीशस पर आक्रमण करने की योजना बनाई, किंतु एडमिरल रेनियर ने लंदन के स्पष्ट आदेश के बिना ऐसा करने से इनकार कर दिया।

वेलेजली ने 1800 ई. में भारतीय सैनिकों की एक टुकड़ी जनरल वेयर्ड के नेतृत्व में मिस्र भेजा, किंतु सेना के पहुँचने पूर्व ही फ्रांसीसियों ने हथियार डाल दिया था जिसके कारण यह सेना 1802 ई. में वापस आ गई।

सर जार्ज बार्लो ने 1803 ई. में लिखा था कि ‘फ्रांसीसियों को हराने का एकमात्र उपाय यह है कि भारत में कोई ऐसा राज्य न रहे जो हम पर निर्भर न हो अथवा जिसका राजनैतिक आचरण हमारे अधीन न हो।’

वेलेजली ने सभी भारतीय राज्यों से सहायक संधि स्वीकार करने को बाध्य किया जिससे वे निरस्त्र हो जाएं और फ्रांसीसियों को अपने राज्य से निकाल दें।

सितंबर, 1798 ई. में निजाम ने सहायक संधि को स्वीकार कर लिया।

आंग्ल-मैसूर संघर्ष का अंत (1799 ई.)

टीपू सुल्तान नेपोलियन के सहयोग से अंग्रेजों को भारत से भगाना चाह रहा था। टीपू ने फ्रांसीसी आधार पर अपनी सेना का गठन किया और कई फ्रांसीसी अधिकारियों की सेवाएँ ली।

टीपू द्वारा सहायक संधि को अस्वीकार करने पर फरवरी, 1799 ई. में वेलेजली ने टीपू के विरुद्ध युद्ध की घोषणा की।

टीपू के विरुद्ध निजाम ने अंग्रेजों का साथ दिया।

वेलेजली ने अपने छोटे भाई आर्थर वेलेजली को युद्ध का मोर्चा सौंपकर स्वयं भी मद्रास पहुँच गया।

आर्थर वेलेजली एवं जनरल हैरिस ने मल्लावली नामक स्थान पर टीपू को हरा दिया।

जनरल स्टुअर्ट ने 1799 ई. में सेदासरी के युद्ध में टीपू को पराजित किया।

टीपू ने श्रीरंगपट्टम के युद्ध में वीरगति को प्राप्त किया।

वेलेजली ने पहले के हिंदू राजा के एक वंशज को मैसूर की गद्दी पर बैठा कर विशेष सहायक संधि (1799 ई.)।

वेलेजली ने नवंबर, 1801 ई. में अवध को सहायक संधि स्वीकार करने के लिए बाध्य किया। अवध ने वेलेजली को रुहेलखंड और दोआब के उत्तरी जिले सहायक सेना के व्यय के दिया।

वेलेजली ने पेशवा से सहायक संधि का प्रस्ताव रखा, किंतु पेशवा ने उस प्रस्ताव को ठुकरा दिया। पेशवा ने दिसंबर, 1802 ई. में सहायक संधि पर हस्ताक्षर कर दिया ओर पूना में सहायक सेना तैनात कर दी गई।

ग्वालियर के सिंधिया ने फरवरी, 1804 में और तथा बरार के भोंसले ने 1803 ई. सहायक संधि स्वीकार किया।

वेलेजली ने गोवा से फ्रांसीसियों को निकालने के लिए पुर्तगालियों की अनुमति से वहाँ अपनी सेना तैनात की। दी।

1801 ई. में इंग्लैंड और ब्रिटेन एक-दूसरे के विपरीत थे, इसलिए वेलेजली ने बंगाल में डेनमार्क के अड्डों- ट्रांकूबार तथा सीरमपुर को जीत लिया।

वेलेजली की सहायक संधि स्वीकार करनेवाले अन्य राज्यों में जोधपुर, जयपुर, मच्छेड़ी, बूँदी तथा भरतपुर थे।

1802 ई. में एमींज की संधि से पांडिचेरी का नगर पुनः फ्रांसीसियों को मिल गया।

वेलेजली ने कलकत्ता में नागरिक सेवा में भर्ती किये गये युवकों को प्रशिक्षित करने के लिए ‘फोर्ट विलियम कालेज’ की स्थापना की।

1798 ई. में तीनों प्रेसीडेंसियों के बीच संचार के लिए केवल समुद्र मार्ग था, बीच में स्वतंत्र राज्य थे। 1805 ई. में कलकत्ता-मद्रास और मद्रास-बंबई का सीधा संपर्क स्थापित हो गया।

1801 ई. में मद्रास प्रसीडेंसी का सृजन किया गया।

लार्ड वेलेजली ‘बंगाल का शेर’ के उपनाम से प्रसिद्ध था।

सर जार्ज बार्लो

सर जार्ज बार्लो 1805 से 1807 ई. तक भारत के गवर्नर-जनरल रहे।

अक्टूबर 1805 ई. में लार्ड कार्नवालिस की मृत्यु के समय बार्लो को कार्यकारी गवर्नर जनरल नियुक्त कर दिया गया।

बार्लो के प्रशासन काल में वेल्लोर में सिपाहियों ने विद्रोह किया, जिसे सख्ती से दबा दिया गया।

बार्लो की दुर्बल नीतियों से भारत तथा इंग्लैंड के अंग्रेज इतने नाराज हुए कि गवर्नर जनरल के पद पर उनकी नियुक्ति की पुष्टि नहीं की गई।

मिंटो प्रथम

लार्ड मिंटो प्रथम 1807 ई. से 1813 ई. तक भारत का गवर्नर जनरल रहा।

मिंटो प्रथम अहस्तक्षेप नीति का समर्थक था।

मिंटो प्रथम ने 1809 ई. में पिंडारी नेता अमीर खाँ को बरार में हस्तक्षेप करने से रोका।

मिंटो प्रथम की बड़ी राजनीतिक सफलता पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह के साथ 1809 ई. में की गई अमृतसर की संधि थी।

लार्ड मिंटो ने 1808 ई. में सर जाॅन माल्कम को दूत बनाकर फारस भेजा और उसी साल माउंट स्टुअर्ट एल्फिंस्टन को अफगानिस्तान के अमीर शाहशुजा के पास भेजा।

लार्ड मिंटो प्रथम ने 1810 ई. में पश्चिम में बौर्बन तथा मारिशस के फ्रांसीसी द्वीपों को तथा पूर्व में डच लोगों के द्वारा अधिकृत अंबोयना तथा मसाले वाले द्वीपों को तथा 1811 ई. में जावा द्वीप को जीत लिया।

लार्ड एमहर्स्ट

लार्ड एमहर्स्ट 123 से 1828 ई. तक गवर्नर-जनरल के पद पर रहा।

एमहर्स्ट के समय में 1824-1826 के बीच प्रथम आंग्ल-बर्मा युद्ध लड़ा गया

1825 ई. में ब्रिटिश सेना के सैनिक कमांडर ने बर्मा सेना को परास्तकर 1826 ई. में ‘यांडबू की संधि’ की।

1824 ई. के बैरकपुर का सैन्य विद्रोह लार्ड एमहर्स्ट के समय में हुआ था।

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