राष्ट्रसंघ का गठन: संगठन, उपलब्धियाँ और असफलताएँ (Formation of League of Nations : Organization, Achievements and Failures)

प्रथम महायुद्ध विश्व इतिहास में लड़ा गया ऐसा पहला युद्ध था जिसके दुष्परिणाम अनेक राष्ट्रों के विशाल जन-समुदाय को भोगने पड़े। इस युद्ध में जिस स्तर पर विनाश हुआ, उसने बड़े-बड़े राष्ट्रों को हिलाकर रख दिया। 1565 दिन तक चलनेवाले इस महायुद्ध में लगभग 6 करोड़ सैनिकों और साधारण नागरिकों ने भाग लिया। इनमें से लगभग एक करोड़ तीस लाख व्यक्ति घायल हुए, जिनमें से लगभग सत्तर लाख लोग स्थायी रूप से अपंग हो गये। इस युद्ध में मित्र राष्ट्रों की, जिनमें 27 देश थे, सर्वाधिक हानि हुई। युद्ध में मारे गये लोगों में से दो-तिहाई मित्र राष्ट्रों के थे। इसके अलावा विश्व के अनेक भागों में लोग बीमारी, महामारी और भुखमरी के शिकार हुए। एक अनुमान के अनुसार इस युद्ध में सभी देशों ने 18,600 करोड़ डालर की आहुति दी। इस प्रकार इस युद्ध में जिस विशाल पैमाने पर जन-धन की हानि और बर्बरता का तांडव हुआ, उससे एक ऐसी संस्था स्थापित करने की भावना का जन्म हुआ, जो विभिन्न राष्ट्रों में संघर्ष की स्थिति में शांति स्थापित कर सके।

राष्ट्रसंघ का गठन

1915 के आरंभ में ही कुछ विख्यात अमेरिकनों ने न्यूयार्क में एक शांति स्थापित करनेवाला संघ (लीग टू एनफार्स पीस) की स्थापना की थी। मई 1916 में राष्ट्रपति विल्सन से इस संस्था के सम्मुख भाषण दिया था। अपने भाषण में विल्सन ने राष्ट्रों के ऐसे संगठन के विचार का समर्थन किया था, जिसके द्वारा समुद्रों को स्वतंत्र रखा जाये और सदस्य राज्यों की प्रादेशिक अखंडता और राजनीतिक स्वतंत्रता को अक्षुण्ण रखा जाए। इस संस्था को राष्ट्रसंघ की स्थापना में सबसे शक्तिशाली प्रयास बताया गया है।

1914 में शुरू होनेवाला प्रथम विश्वयुद्ध जैसे-जैसे अपनी पूर्णता की ओर अग्रसर हो रहा था, शक्तिशाली राष्ट्रों के सरकारी अधिकारियों और राजनीतिज्ञों ने एक ऐसे अंतर्राष्ट्रीय संगठन की तलाश शुरू कर दी थी, जो संपूर्ण विश्व को युद्ध की विभीषिका से बचा सके। नवंबर 1918 में जब विजेता और विजित राष्ट्रों के बीच युद्ध-समझौते की बातचीत चल रही थी, उस समय सभी प्रमुख राष्ट्रों के राजनीतिज्ञों और बुद्धिजीवियों ने विभिन्न योजनाएँ प्रस्तुत की। किंतु राष्ट्रसंघ की स्थापना में सर्वाधिक योगदान संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति वुडरो विल्सन का रहा। विल्सन ने 8 जनवरी 1919 को अपने ऐतिहासिक भाषण में यह घोषणा की कि विश्व को भविष्य में युद्धों से बचाने तथा शांति और सुरक्षा की स्थापना के लिए राष्ट्रसंघ की स्थापना की जायेगी। यद्यपि विल्सन विश्वशांति के लिए एक अंतर्राष्ट्रीय संगठन स्थापित करने के पक्ष में थे, आर.एस. बेकर की पुस्तक ‘वुडरो विल्सन एंड वर्ल्ड सेटिलमेंट’ से पता चलता है कि राष्ट्रसंघ की प्रसंविदा का कोई भी लक्षण उनका स्वयं का विचार नहीं था। विल्सन ने तो मुख्यतः दूसरों के विचारों एवं सुझावों का संपादन और उसे व्यवहारिक जामा पहनाने में भूमिका अदा की थी।

पेरिस में जब 25 जनवरी 1919 को शांति-सम्मेलन को दूसरा चरण शुरू हुआ, तब राष्ट्रसंघ के संविधान का प्रारूप बनाने के लिए एक परिषद् का गठन किया गया, जिसकी बैठकें 3 फरवरी से 11 अप्रैल 1919 तक होती रहीं। विल्सन के 20 जनवरी 1919 के प्रारूप एवं ब्रिटेन के लार्ड फिलीमोर की रिपोर्ट के आधार पर उपविदेश मंत्री राबर्ट सिसिल द्वारा तैयार ब्रिटिश प्रारूप आदि का समन्वित रूप ‘हंटर-मिलर’ प्रारूप के रूप में सामने आया। अंततः इस प्रारूप को आधार मानकर राष्ट्रसंघ का अंतिम मसविदा तैयार किया गया। इस प्रकार राष्ट्रसंघ के सिद्धांत मूलरूप से अमेरिका की देन थे, जबकि कानूनी ढाँचा ब्रिटेन द्वारा निर्मित था। फ्रांस, इटली, जापान आदि राज्यों के प्रतिनिधियों ने राष्ट्रसंघ के मसविदे में कई संशोधन प्रस्ताव रखे। अंत में, 28 अप्रैल को राष्ट्रसंघ के विधान को 26 संशोधनों के साथ अंतिम रूप से स्वीकार कर लिया गया और 5 मई 1919 को राष्ट्रसंघ की विधिवत् स्थापना हो गई। विल्सन के आग्रह पर राष्ट्रसंघ की प्रसंविदा को शांति-सम्मेलन की सभी संधियों का अंग बनाया गया। 10 जनवरी 1920 को राष्ट्रसंघ को व्यवहार में कार्यान्वित किया गया। संघ के परिषद् की पहली बैठक वर्साय संधि के प्रभावी होने के छः दिन बाद 16 जनवरी 1920 को पेरिस में हुई। नवंबर में संघ का मुख्यालय जेनेवा स्थानांतरित किया गया, जहाँ 15 नवंबर 1920 को इसकी पहली आम सभा की बैठक हुई, जिसमें 41 राष्ट्रों के प्रतिनिधि सम्मिलित थे।

राष्ट्रसंघ का संविधान

राष्ट्रसंघ के संविधान को समझौते का नाम दिया गया है। 19 प्रतिनिधियों के सम्मेलन में इसका संविधान बनाया गया था। विल्सन इस सम्मेलन का अध्यक्ष था। राष्ट्रसंघ का समझौता या संविदा 4000 शब्दों का था। राष्ट्रसंघ के संविधान में एक भूमिका के साथ-साथ 26 धाराएँ थीं। भूमिका में इसके उद्देश्य, अंतर्राष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा की प्राप्ति, भविष्य में युद्धों को रोकना तथा अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और सहिष्णुता को बढ़ावा देना बताया गया था।

राष्ट्रसंघ की स्थापना का उद्देश्य

संविदा में उल्लिखित भूमिका से स्पष्ट है कि राष्ट्रसंघ की स्थापना के पीछे चार उद्देश्य थे- सामूहिक सुरक्षा द्वारा युद्ध को रोकना, शांति एवं सुरक्षा की स्थापना, विश्व के सभी राष्ट्रों के बीच भौतिक और मानसिक सहयोग को प्रोत्साहित करना और पेरिस शांति-सम्मेलन की कुछ विशिष्ट व्यवस्थाओं को लागू करना। इस प्रकार राष्ट्र संघ के प्राथमिक उद्देश्यों में युद्ध-निषेध, निःशस्त्रीकरण तथा अंतर्राष्ट्रीय विवादों का बातचीत एवं मध्यस्थता द्वारा समाधान करना शामिल थे। इसके अन्य उद्देश्यों में श्रम दशाओं में सुधार, मूल जातियों के साथ न्यायपूर्ण व्यवहार, मानव एवं दवाओं के अवैध व्यापार पर रोक, युद्धबंदियों तथा अल्पसंख्यकों की सुरक्षा आदि थे।

राष्ट्रसंघ की विभिन्न धाराएँ

राष्ट्रसंघ के संविधान की विभिन्न धाराओं में विभिन्न उपबंध रखे गये हैं। संविदा की प्रथम सात धाराओं में संघ की सदस्यता के नियमों और संघ के विभिन्न अंगों का वर्णन किया गया है। इसकी आठवीं और नौंवी धारा निरस्त्रीकरण से संबंधित थी। दसवीं से सोलहवीं धारा तक विभिन्न झगड़ों के शांतिपूर्ण निर्णय, आक्रमणों को रोकने और सामूहिक सुरक्षा बनाये रखने के उपायों का प्रतिपादन किया गया था। दसवीं और बारहवीं धारा काफी महत्वपूर्ण थीं। दसवीं धारा के अनुसार राष्ट्रसंघ के सभी सदस्यों की प्रादेशिक एकता तथा राजनीतिक स्वतंत्रता के सम्मान और किसी भी बाह्य आक्रमण के समय उसकी स्वतंत्रता की रक्षा करने की बात कही गई थी। बारहवीं धारा के अनुसार राष्ट्रसंघ के सभी सदस्य इस बात पर सहमत हैं कि यदि उनके मध्य कोई झगड़ा हो जाये, जिसका परिणाम युद्ध हो सकता है, तो वे इस विवाद के संबंध में पंचों द्वारा उसका निर्णय करायेंगे अथवा निर्णय करने के लिए कौंसिल के पास भेजेंगे। वे तब तक युद्ध प्रारंभ नहीं करेंगे, जब तक कि निर्णय को तीन महीने व्यतीत न हो गये हों। सोलहवीं धारा के अनुसार यदि राष्ट्रसंघ का कोई सदस्य समझौते की उपेक्षा करके युद्ध प्रारंभ करता है, तो वह राष्ट्रसंघ के सभी सदस्यों के विरूद्ध करनेवाला कार्य समझा जायेगा। राष्ट्रसंघ अन्य सदस्यों को आक्रांता देश के साथ सभी प्रकार के आर्थिक और वैयक्तिक संबंध तोड़ने के लिए बाध्य कर सकता था। ऐसी स्थिति में यह व्यवस्था थी कि परिषद् संघ के सदस्यों से यह सिफारिश करे कि वे संविदा की व्यवस्था बनाये रखने हेतु प्रभावकारी सैनिक, नौसैनिक और वायुसैनिक शक्ति का प्रयोग करें।

संविदा की अठारहवीं से इक्कीसवीं तक की धाराओं में संधियों की रजिस्ट्री, प्रकाशन, संशोधन और वैधता का तथा बाईसवीं धारा में संरक्षण प्रथा (मैंडेट सिस्टम) का उल्लेख था। तेइसवीं धारा में संघ सदस्यों द्वारा श्रमिक-कल्याण, बाल-कल्याण, रोगों पर नियंत्रण, नारी-व्यापार निषेघ आदि के संबंध में किये जानेवाले कार्यों पर बल दिया गया था। संविदा की चौबीसवीं धारा में विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं के साथ उसके संबंधों का वर्णन किया गया था। पच्चीसवीं धारा रेडक्रास संगठन को प्रोत्साहन देने से संबंधित थी। अंतिम धारा छब्बीस में राष्ट्रसंघ के समझौते में संशोधन करने की प्रक्रिया समाविष्ट थी।

राष्ट्रसंघ की सदस्यता

राष्ट्रसंघ के संविधान में महायुद्ध में विजयी देशों, उपनिवेशों या स्वशासित प्रदेशों को सदस्य बनाने का अधिकार प्राप्त था, जैसे भारत इंग्लैंड का उपनिवेश होते हुए भी इसका सदस्य था। इसके समझौते पर सर्वप्रथम हस्ताक्षर करनेवाले 16 देशों को इसका सदस्य बनाया गया था। राष्ट्रसंघ की महासभा के दो-तिहाई सदस्यों के बहुमत से किसी भी नये देश को इसका सदस्य बनाया जा सकता था। परिषद् की सर्वसम्मति से किसी राष्ट्र को इसकी सदस्यता से वंचित किया जा सकता था, किंतु यदि कोई देश स्वेच्छा से इसकी सदस्यता छोड़ना चाहे, तो उसे दो वर्ष पूर्व नोटिस देना आवश्यक था।

राष्ट्रसंघ में कभी भी सभी महाशक्तियाँ सम्मिलित नहीं हो सकीं। संघ को स्थापित करने और बढ़ावा देने के प्रयासों के कारण विल्सन को अक्टूबर 1919 में नोबेल शांति पुरस्कार मिला, किंतु संयुक्त राज्य अमेरिका संघ का कभी सदस्य नहीं बना। आरंभ में पराजित जर्मनी को इसका सदस्य नहीं बनाया गया था, बाद में 1926 में उसे इसका सदस्य बनाया गया, किंतु 1933 में उसने इसकी सदस्यता छोड़ने की सूचना दे दी। सोवियत रूस 1933 में इसका सदस्य बना, किंतु परिषद् ने उसे 1940 में फिनलैंड पर आक्रमण करने के कारण संघ से निकाल दिया। जापान ने 1933 में तथा इटली ने 1935 में राष्ट्रसंघ छोड़ दिया। इस प्रकार राष्ट्रसंघ के सदस्यों की संख्या घटती-बढ़ती रही। 1935 में इसके सदस्यों की संख्या 63 तक पहुँच गई, जो सर्वाधिक थी। अप्रैल 1936 में यह संख्या घटकर 43 रह गई और इसमें भी केवल 34 राज्यों के प्रतिनिधि बैठक में सम्मिलति हुए।

राष्ट्रसंघ के अंग 

राष्ट्रसंघ के तीन प्रधान अंग थे- महासभा (असेंबली), परिषद् (कौंसिल) और सचिवालय (सेक्रकेटरिएट)। इसके अतिरिक्त दो अंग स्वायत्तशासी थे- अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय और अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन।

महासभा (असेंबली)

संघ के सभी सदस्यों की सम्मिलित सभा ही महासभा कहलाती थी। इसमें सभी देशों को समान अधिकार प्राप्त थे। प्रत्येक सदस्य राष्ट्र इसमें अधिकतम् तीन प्रतिनिधियों को भेज सकता था, किंतु प्रत्येक को एक ही मत देने का अधिकार था। इस महासभा का अधिवेशन सामान्यतः वर्ष में एक बार जेनेवा (स्विटजरलैंड) में होता था। वार्षिक अधिवेशन के अलावा असाधारण अधिवेशन बुलाने की भी व्यवस्था थी, लेकिन इसके लिए सदस्यों के बहुमत की सहमति अवश्यक थी। राष्ट्रसंघ के संविधान के अनुसार महासभा प्रतिवर्ष अधिवेशन के लिए एक अध्यक्ष और आठ उपाध्यक्षों का निर्वाचन करती थी।

विभिन्न कार्यों के लिए छः समितियाँ थीं- वैधानिक और कानून समिति, तकनीकी समिति, निशस्त्रीकरण समिति, बजट और अर्थ समिति, सामाजिक संस्था समिति और राजनैतिक समिति। इसके अलावा अन्य विशिष्ट समस्याओं के लिए समितियाँ बनाने के लिए महासभा स्वतंत्र थी।

मतदान की पद्धति

महासभा में मतदान की चार पद्धतियाँ थीं- कुछ विषयों पर निर्णय सर्वसम्मति से होते थे, कुछ पर निर्णय साधारण बहुमत से पारित हो सकते थे, कुछ विषयों पर निर्णय के लिए दो-तिहाई बहुमत की तो किसी के लिए पूर्ण बहुमत की आवश्यकता होती थी।

महासभा का कार्य-क्षेत्र

महासभा का कार्य-क्षेत्र अत्यंत विस्तृत था, किंतु मोटे तौर पर इसके तीन कार्य-क्षेत्र थे- निर्वाचन संबंधी, अंगीभूत संबंधी और परामर्श संबंधी।

निर्वाचन संबंधी कार्य-क्षेत्र के अंतर्गत कई कार्य थे, जैसे दो तिहाई मतों से नये सदस्यों का चुनाव, साधारण बहुमत द्वारा नौ अस्थायी सदस्यों में से तीन को सभा के लिए प्रतिवर्ष चुनना, प्रति नौ वर्ष के लिए स्थायी अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय के लिए पंद्रह न्यायाधीशों का निर्वाचन और परिषद् द्वारा नियुक्त राष्ट्रसंघ के महासचिव के नियुक्ति की पुष्टि।

अंगीभूत कार्यों के अंतर्गत महासभा संविदा के नियमों में संशोधन कर सकती थी, किंतु ऐसे संशोधन परिषद् की सर्वसम्मति से स्वीकृत होने आवश्यक थे।

परामर्श-संबंधी कार्य के अंतर्गत महासभा अंतर्राष्ट्रीय हितों से संबंधित किसी विषय पर विचार कर सकती थी। वार्षिक बजट तैयार करना भी इसी का कार्य था।

संगठनात्मक दृष्टि से महासभा की स्थिति परिषद् से गौण थी। महासभा द्वारा पारित प्रस्ताव परिषद् के लिए सुझाव मात्र होते थे। यह परिषद् की इच्छा पर निर्भर करता था कि वह साधारण सभा के प्रस्तावों को स्वीकार करे या नहीं। अंतर्राष्ट्रीय विषयों पर महासभा में केवल औपचारिक चर्चा ही हो सकती थी। इस प्रकार महासभा अपने सीमित अधिकारों के कारण सम्भाषण का केंद्र बन कर रह गई थी। इसके बावजूद महासभा विश्व की समस्याओं पर विभिन्न राष्ट्रों की भावनाओं को व्यक्त करने में सहायक सिद्ध हुई।

परिषद् (कौंसिल)

परिषद् राष्ट्रसंघ की कार्यकारिणी समिति थी और यह महासभा से अधिक शक्तिशाली संस्था थी। राष्ट्रसंघ के सभी सदस्य महासभा के सदस्य होते थे, लेकिन परिषद् की सदस्यता सीमित थी। परिषद् की सदस्यता का आधार समानता के सिद्धांत पर आधारित न होकर महाशक्तियों की उच्चता पर निर्भर था।

विधान के अनुसार आरंभ में परिषद् के पाँच स्थायी सदस्य और चार अस्थायी सदस्य थे। स्थायी सदस्य पाँच बड़े मित्र राष्ट्र थे- ग्रेट ब्रिटेन, फ्रांस, इटली, जापान और अमेरिका। किंतु अमेरिकी सीनेट ने 19 मार्च 1920 को वर्साय संधि की पुष्टि के विरोध में मतदान किया और अमेरिका संघ में शामिल नहीं हुआ जिसके कारण स्थायी सदस्यों की संख्या चार ही रह गई। 1926 में जर्मनी को पाँचवाँ और 1934 में रूस को परिषद् का छठवाँ स्थायी सदस्य बनाया गया।

महासभा अस्थायी सदस्यों का निर्वाचन प्रति तीन वर्ष के लिए करती थी। आरंभ में चार अस्थायी सदस्यों का प्रावधान था- बेल्जियम, ब्राजील, ग्रीस और स्पेन, किंतु 1936 तक इनकी संख्या 11 हो गई।

परिषद् आरंभ से ही एक निर्णायक संस्था थी। इसके निर्णय प्रायः निर्विरोध होते थे। संयुक्त राष्ट्र की भाँति राष्ट्रसंघ के सदस्यों को निषेधाकिार (वीटो) प्राप्त नहीं था। परिषद् की अध्यक्षता, परिषद् के सदस्यों में से प्रति सम्मेलन सदस्यों की फ्रेंच नामावली के क्रमानुसार बदलती रहती थी। स्थायी और अस्थायी सभी सदस्यों को मताधिकार प्राप्त था। केवल उस सदस्य का मत नहीं गिना जाता था, जो स्वयं विवाद से जुड़ा हुआ हो और जिसका निर्णय परिषद् को लेना हो। परिषद् प्रायः एक वर्ष में चार बैठकें करती थी, किंतु विशेष आवश्यकता पड़ने पर कभी-भी असाधारण सत्र बुला सकती थी। 1920 और 1939 के बीच कुल 107 सार्वजनिक सत्र आयोजित किये गये थे।

परिषद् के कार्य

महासभा की भाँति परिषद् के कार्य असीमित थे। इसका सर्वाधिक मुख्य कार्य विश्व-शांति से संबंधित विवादों को निपटाना तथा महासभा के निर्णयों को कार्यान्वित करना था। महासविच को मनोनीत करना, मुख्यालय का स्थान-परिवर्तन, निशस्त्रीकरण, आक्रमणकारी को दंडित करना, अल्पसंख्यक जातियों से संबंधित विषय, अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय के सदस्यों का निर्वाचन, न्यायालय के अन्य कर्मचारियों की नियुक्ति, सार घाटी एवं डेंजिंग का शासन-प्रबंध, संरक्षण प्रणाली के अंतर्गत आनेवाले उपनिवेशों का प्रशासन, राष्ट्रसंघ के अन्य छोटे अंगों से प्रतिवेदन प्राप्त करना आदि कार्य परिषद् को स्वतंत्र रूप से या महासभा के सहयोग से करने होते थे। इसकी बैठकों में सदस्य राज्य अधिकांशतः अपने प्रधानमंत्री या विदेश मंत्री को भेजते थे, जिससे विभिन्न राष्ट्रों को एक-दूसरे के संपर्क में आने का अवसर मिलता था।

सचिवालय (सेक्रकेटरिएट)

सचिवालय राष्ट्रसंघ का सर्वाधिक उपयोगी और सबसे कम विवादास्पद प्रशासनिक अंग रहा था। इसका मुख्यालय जेनेवा (स्विटजरलैंड) में था। सचिवालय का प्रधान महासचिव कहलाता था। महासचिव की नियुक्ति परिषद् द्वारा साधारण सभा की अनुमति से होती थी। महासचिव के सहयोग के लिए दो उपमहासचिव, दो अवर सचिव और लगभग छः सौ कर्मचारी थे। ब्रिटिश नेता सर एरिक डूमांड राष्ट्रसंघ सचिवालय का पहल महासचिव था, जिसने 1020 से 1933 तक पदभार सँभाला था। इसके बाद फ्रांसीसी नेता जोसेफ एवेनाल महासचिव बना।

सचिवालय का कार्य

सचिवालय का कर्य संघ के सभी अंगों की सहायता करना था। यह महासभा और परषिद् के विचाराधीन विषयों की सूची तैयार करता था, बैठकों की कार्यवाही का विवरण रखता था, विविध विषयों के मसौदे तैयार करता था, संधियों को सूचीबद्ध करता था और इसी प्रकार के अन्य प्रशासनिक कार्य करता था। इस प्रकार सचिवालय को निर्णय की नहीं, बल्कि क्रियान्वयन की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। वास्तव में सचिवालय अंतर्राष्ट्रीय सहयोग का सर्वोतकृष्ट नमूना था।

अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय

राष्ट्रसंघ के विधान की चैदहवीं धारा के अंतर्गत 1921 में हेग (नीदरलैंड) में स्वायत्तशासी संगठन के रूप में अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय की स्थापना की गई थी। इसमें विभिन्न देशों के ग्यारह न्यायाधीशों की नियुक्ति की जाती थी, किंतु 1931 में न्यायाधीशों की संख्या पंद्रह कर दी गई। इन्हीं न्यायाधीशों में से तीन वर्ष के लिए एक मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया जाता था। न्यायाधीशों की नियुक्ति व्यक्तिगत प्रतिभा और प्रसिद्धि के आधार पर साधारण सभा द्वारा नौ वर्ष के लिए की जाती थी। इसके सदस्य वे देश भी हो सकते थे, जो राष्ट्रसंघ के सदस्य न हों।

यह न्यायालय अंतर्राष्ट्रीय कानून की व्याख्या कर उसी के आधार पर विभिन्न देशों के विवादास्पद मामलों पर अपने निर्णय देता था। किंतु इस अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय के निर्णय को मानने के लिए सदस्य देश बाध्य नहीं थे, इसलिए इस संस्था का महत्व गिरता गया।

अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन

अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन की स्थापना श्रमिकों के हितों की सुरक्षा के लिए की गई थी। इस संगठन का मुख्यालय भी जेनेवा में था। इसकी स्थापना 11 अप्रैल 1919 को वर्साय संधि के भाग तेरह के आधार पर किया गया था। इसकी सदस्यता उनके लिए भी खुली थी, जो राष्ट्रसंघ के सदस्य नहीं थे। प्रत्येक देश चार प्रतिनिधि भेजता था- दो सरकारी, एक पूँजीपतियों का और एक मजदूर वर्ग का। इस संगठन का मुख्य कार्य श्रमिक पुरुषों, स्त्रियों और बालकों के लिए उचित एवं मानवीय परिस्थितियाँ स्थापित करने में सहयोग देना था। इसके वार्षिक सम्मेलनों में पारित हुए प्रस्ताव सदस्य देशों को भेज दिये जाते थे, किंतु इन्हें मानने और लागू करने की अनिवार्यता नहीं थी। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के पहले निदेशक अल्बर्ट थॉमस थे। 1946 में राष्ट्र संघ के समाप्त होने के बाद भी यह संगठन संयुक्त राष्ट्र संघ का एक अभिकरण बनकर अस्तित्व में बना रहा।

राष्ट्रसंघ के कार्य

राष्ट्रसंघ का मुख्य उद्देश्य शांति बनाये रखना और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग में वृद्धि करना था। अपने उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए राष्ट्रसंघ ने लगभग 20 वर्षों तक कार्य किया। उसके द्वारा किये गये कार्यों में उसे सफलताएँ भी मिलीं और असफलताएँ भी। राष्ट्रसंघ द्वारा किये गये कुछ सफल कार्यों का विवरण इस प्रकार है-

  • प्रशासनिक कार्य
  • संरक्षण (मेंडेट) संबंधी कार्य
  • अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा-संबंधी कार्य
  • अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए किये गये कार्य
  • समाजार्थिक एवं मानव-कल्याण संबंधी कार्य।

(क) प्रशासनिक कार्य 

सार घाटी का प्रशासन

राष्ट्रसंघ वर्साय संधि की उपज थी और आशा की गई थी कि वह शांति-संधियों के क्रियान्वयन में सहयोग करेगा। राष्ट्रसंघ पर संधियों के क्रियान्वयन की जिम्मेदारी के साथ-साथ सार घाटी और डेंजिंग के प्रशासन की जिम्मेदारी भी सौंपी गई थी। फ्रांस को खुश करने के लिए राष्ट्रसंघ को सार बेसिन पर 15 वर्षों तक शासन करने का अधिकार मिला था। शर्तों के अनुसार परिषद् द्वारा नियुक्त पाँच सदस्यों के आयोग को उक्त क्षेत्र पर शासन करने का अधिकार था। 1935 में राष्ट्रसंघ के निरीक्षण में वहाँ जनमत संग्रह किया गया, किंतु यह जनमत तनावपूर्ण वातावरण में संपन्न हुआ क्योंकि पिछले 15 वर्षों से वहाँ की जर्मन जनता को काफी कष्ट भोगने पड़े थे तथा जर्मनी में तानाशाह हिटलर का उदय हो चुका था। जनमत संग्रह के निर्णय के आधार पर 1 मार्च 1935 को राष्ट्रसंघ ने सार का प्रशासन जर्मनी को सौंपकर अपने को उत्तरदायित्व से मुक्त कर लिया।

डेंजिंग का प्रशासन

बाल्टिक सागर के तट पर सिथत डेंजिंग एक जर्मन बाहुल्य प्रदेश था, किंतु पोलैंड को संतुष्ट करने के लिए उसे भी जर्मनी से पृथक् राष्ट्रसंघ के संरक्षण में एक स्वतंत्र नगर बना दिया गया और उसके प्रशासन हेतु एक उच्चायुक्त की नियुक्ति की गई। यद्यपि डेंजिंग को अपने आंतरिक मामलों में पूर्ण स्वयायत्ता प्राप्त थी, किंतु डेंजिंग बंदरगाह का नियंत्रण पोलैंड के हाथ में था, इसलिए वहाँ जर्मन और पोल नागरिकों में सदैव तनाव बना रहा। डेंजिंग के प्रशासन में राष्ट्रसंघ को सफलता नहीं मिल सकी और 1939 में डेंजिंग और पोलिश गलियारे की समस्या को लेकर द्वितीय महायुद्ध शुरू हो गया।

(ख) संरक्षण प्रथा संबंधी कार्य 

संरक्षण प्रथा को मेंडेट सिस्टम, समादेश प्रथा, अधिदेश पद्धति आदि कई नामों से जाना जाता है। संरक्षण प्रथा वह प्रणाली है जिसके द्वारा प्रथम महायुद्ध के अंत में टर्की और जर्मनी से लिये गये उपनिवेशों को कल्याण एवं विकास के लिए सभ्य देशों के संरक्षण में देने के लिए स्वीकार किया गया था और अंत में जिसे राष्ट्रसंघ के विधान की धारा 22 में शामिल किया गया था। इस योजना को सुझानेवाला दक्षिण अफ्रीका का जनरल स्मट्स था। संरक्षण प्रणाली के अंतर्गत प्राप्त प्रदेशों और उपनिवेशों के प्रशासन का अधिकार विभिन्न सदस्य राष्ट्रों को सौंपा गया, जिन्हें संरक्षक कहा गया। संरक्षक राज्य उपनिवेशों के विकास-संबंधी रिपोर्ट परिषद् को भेजते थे। राष्ट्रसंघ का स्थायी संरक्षण आयोग इन रिपोर्टों की जाँच करता था, याचिकाएँ सुनता था और परिषद् को आवश्यक सिफारिशों भेजता था।

संरक्षित क्षेत्रों की तीन श्रेणियाँ थीं- प्रथम श्रेणी के उपनिवेशों को, जिनमें राजनीतिक विकास हो चुका था, शीघ्र ही स्वतंत्र कर देने की बात तय की गई थी। ऐसे देशों में फिलीस्तीन, ईराक, सीरिया, लेबनान तथा ट्रांसजोर्डन थे। सीरिया और लेबनान फ्रांस के तथा फिलीस्तीन, ईराक एवं ट्रांसजोर्डन के प्रदेश ग्रेट ब्रिटेन के संरक्षण में रखे गये थे। दूसरी श्रेणी में मध्य अफ्रीका के जर्मन उपनिवेश थे, जहाँ स्वायत्त शासन के विकास में समय लगनेवाला था। तीसरी श्रेणी में कम जनसंख्यावाले अत्यधिक पिछड़े प्रदेश थे जिनको प्रगति के मार्ग पर अग्रसर करने के लिए संरक्षित देशों को बहुत समय लगाना था।

संरक्षण की इस नई पद्धति से उपनिवेशों की स्वतंत्रता का हनन नहीं हुआ और विजित देशों का स्वार्थ भी पूरा हो गया। किंतु व्यवहार में यह व्यवस्था साम्राज्यवाद का नया रूप साबित हुई। संरक्षक राज्यों ने संरक्षित प्रदेशों का भरपूर शोषण किया और अपने हितों के संरक्षण के लिए दमनचक्र चलाया जिससे आशा निराशा में बदल गई। संरक्षण व्यवस्था इस दृष्टि से भी एकपक्षीय थी कि इसे विजेताओं द्वारा पराजित राष्ट्रों से छीने गये प्रदेशों पर ही लागू किया गया और विजेताओं ने अपने उपनिवेशों को इस व्यवस्था से सर्वथा स्वतंत्र रखा। कुल मिलाकर यह व्यवस्था इतने स्पष्ट रूप से साम्राज्यवादी लक्षणों से जुड़ी हुई थी कि उसने राष्ट्रसंघ को बदनाम करके ही छोड़ा। फिर भी, इस व्यवसथा ने विश्व-व्यवस्था संबंधी एक नवीन दृष्टिकोण की स्थापना की और पहली बार संरक्षण के सिद्धांत को अंतर्राष्ट्रीय स्वीकृति मिली। 1946 में द्वितीय महायुद्ध के बाद संरक्षण प्रणाली का अंत करके संयुक्त राष्ट्रसंघ में ट्रस्टीशिप की पद्धति शुरू की गई।

(ग) राष्ट्रसंघ के शांति एवं सुरक्षा-संबंधी कार्य 

सफल कार्य

अल्बानिया का विवाद

अल्बानिया को राष्ट्रसंघ ने स्वतंत्र राज्य घोषित किया था, किंतु यूनान और यूगोस्लाविया दोनों इसे आपस में बाँटना चाहते थे। 1922 में यूगोस्लाविया ने अल्बानिया में अपनी सेनाएँ भेज दी। अल्बानिया की अपील पर राष्ट्रसंघ ने इस मामले को समझौते द्वारा हल किया।

आलैंड का विवाद

बाल्टिक सागर में स्थित आलैंड द्वीपसमूह पर स्वीडेन और फिनलैंड अपना अधिकार स्थापित करना चाहते थे। विवाद के समाधान के लिए राष्ट्रसंध ने एक त्रिसदस्यीय आयोग का गठन किया। आयोग की सिफारिश पर परिषद् ने आलैंड पर फिनलैंड के आधिकार की घोषणा की, किंतु वहाँ निवास करनेवाली स्वीडिश जनता को  अधिकारों एवं सुरक्षा के लिए गारंटी दी गई। इस देश को तटस्थ और निःशस्त्र देश घोषित किया गया।

रोमानिया और हंगरी का विवाद

पेरिस शांति-समझौते में रोमानिया को ट्रांसिलवानिया और वनात का प्रदेश दिया गया था, किंतु इन प्रदेशों के हंगेरियन निवासी हंगरी जाना चाहते थे, जबकि इन प्रदेशों में उनकी संपत्ति लगी हुई थी। राष्ट्रसंघ ने इस विवाद का शांतिपूर्ण ढ़ंग से समाधान किया।

साइलेशिया पर अधिकार का विवाद

साइलेशिया पर अधिकार को लेकर जर्मनी और पोलैंड में होनेवाले विवाद का समाधान का राष्ट्रसंघ ने किया। साइलेशिया का विभाजन कर एक भाग जर्मनी को और दूसरा भाग पोलैंड को दिया गया।

जार्वोजिना का विवाद

1919 से ही पोलैंड और चेकोस्लोवाकिया के संबंध तनवापूर्ण थे। इसी समय सीमावर्ती जिप्स क्षेत्र में जावोर्जिना के विषय में दोनों के बीच विवाद हो गया। जब राजदूतों की समिति इस विवाद को सुलझाने में असमर्थ रही तो यह मामला राष्ट्रसंघ में उठाया गया। राष्ट्रसंघ ने अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय की राय जानने के बाद एक सीमा आयोग का गठन किया। आयोग की सिफारिशों के आधार पर 1924 में दोनों राज्यों की सीमाएँ निर्धारित की गईं।

मेमल समस्या

वर्साय संधि के अनुार मेमल का प्रदेश पोलैंड को मिला था। किंतु 1923 में लिथुआनिया ने वहाँ अपनी फौजें भेजकर अस्थायी सरकार की स्थापना कर ली। जब राष्ट्रसंघ के सामने यह मामला आया तो राष्ट्रसंघ ने मेमल बंदरगगाह को छोड़कर संपूर्ण मेमल क्षेत्र का सवामी लिथुआनिया को माना, लेकिन उसने मेमलवासियों को आंतरिक स्वतंत्रता प्रदान की और मेमल बंदरगाह के प्रशासन के लिए एक अंतर्राष्ट्रीय बोर्ड की स्थापना की।

मौसुल विवाद

1924 में राष्ट्रसंघ के समक्ष मौसुल विवाद आया। मोसुल के समृद्ध तेल क्षेत्र पर तुर्की, ईराक और ब्रिटेन अपना अधिकार करना चाहते थे। संघ ने जाँच-पड़ताल के बाद मौसुल का अधिकांश क्षेत्र ईराक को दिलवाया। लेकिन तुर्की ने आरंभ में इस फैसले को मानने से इनकार कर दिया। अंत मे, जब ब्रिटेन ने तुर्की को कुछ सुविधाएँ दीं, तब तुर्की ने इस फैसले को स्वीकार कर लिया।

यूनान और बुलगारिया का सीमा-विवाद

1925 में यूनान तथा बुलगारिया के बीच सीमा विवाद इस हद तक पहुँच गया कि यूनान ने बुलगारिया पर आक्रमण करके उसके एक प्रदेश पर अधिकार कर लिया। राष्ट्रसंघ ने यूनान को आक्रामक बताकर सेनाएँ हटाने एवं मुआवजा देने का निर्देश दिया। यूनान ने सेना हटा ली और क्षतिपूर्ति की रकम भी दे दी।

लौटेशिया का विवाद

दक्षिण अमेरिका में कोलंबिया और पीरू की सीमा पर लौटेशिया का बंदरगाह था, जिस पर कोलंबिया का अधिकार था, किंतु पीरू ने 1932 में उस पर अधिकार कर लिया। राष्ट्रसंघ ने हस्तक्षेप करके उसे कोलंबिया का लौटा दिया।

राष्ट्रसंघ के असफल कार्य

कुछ प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय विवादों में राष्ट्रसंघ न्यायपूर्ण समाधान करने में असमर्थ रहा। राष्ट्रसंघ की असफलता का मुख्य कारण यह था कि इन विवादों में या तो किसी एक पक्ष को किसी महाशक्ति का समर्थन प्राप्त था अथवा कोई न कोई महाशक्ति स्वयं ही दूसरा पक्ष था।

विलना विवाद

1921 में लिथुआनिया अधिकृत विलना नगर को लेकर लिथुआनिया और पौलैंड में विवाद हुआ क्योंकि दोनों के मध्य स्थित होने के कारण इस नगर पर पोलैंड ने अधिकार कर लिया। राष्ट्रसंघ दो वर्ष तक इस विवाद को सुलझाने में लगा रहा, किंतु लिथुआनिया को न्याय नहीं दिला सका और न ही दोनों पक्षों में समझौता करा सका। विलना पर पौलैंड का अधिकार इसलिए बना रहा क्योंकि महाशक्तियाँ पोलैंड के पक्ष में थीं।

कोर्फू विवाद

1923 में कोर्फू विवाद उत्पन्न हुआ जो यूनान और इटली के मध्य था। इस विवाद का जन्म उस समय हुआ जब यूनानी प्रदेश में यूनान-अलबानिया का सीमा निर्धारण करनेवाले आयोग के इटालियन प्रतिनिधियों की कुछ उपद्रवी यूनानियों ने हत्या कर दी। इटली के तानाशाह मुसोलिनी ने यूनान से क्षमा माँगने और क्षतिपूर्ति में भारी धनराशि जमा करने का कहा। यूनान ने इस मामले को राष्ट्रसंघ में रखा और अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय की बात मानने व न्यायालय के पास हरजाना जमा करने की बात कही। लेकिन इटली ने यूनानी प्रदेशों पर बम बरसाये और यूनान के कोर्फू टापू पर अधिकार कर लिया। इटली के कहने पर राष्ट्रसंघ ने यह मामला राजदूतों की समिति को सौंप दिया। राजदूतों के फैसले के अनुसार यूनान को इटली से माफी माँगनी पड़ी और क्षतिपूर्ति देनी पड़ी, यद्यपि कोर्फू यूनान को पुनः मिल गया। इस घटना से साफ हो गया कि यूनान को निर्बल होने का दंड मिला, यद्यपि इटली ने कोर्फू पर बमवर्षा करके भारी नुकसान किया था।

चाको क्षेत्र का विवाद

1928 में दक्षिण अमेरिका के दो राज्यों- बोलीविया और पेराग्वे, जो कि संघ के सदस्य भी थे, के मध्य स्थित 11,600 वर्गमील के चाको क्षेत्र को लेकर युद्ध छिड़ गया। पेराग्वे ने चाको के अधिकांश भाग पर अधिकार कर लिया। यह मामला राष्ट्रसंघ में आया। संघ ने विचार-विमर्श कर एक आयोग भेजा, लेकिन कोई परिणाम नहीं निकला। नवंबर 1934 में संघ ने पुनः दोनों राष्ट्रों को कई सुझाव भेजे, बोलविया ने तो सुझावों को स्वीकार कर लिया, किंतु पेराग्वे ने इन सुझावों को अस्वीकार कर दिया। राष्ट्रसंघ ने जब पेराग्वे के विरूद्ध कार्यवाही करने का फैसला किया तो पेराग्वे ने राष्ट्रसंघ से त्यागपत्र दे दिया। इसके बाद राष्ट्रसंघ ने इस मामले में कुछ नहीं किया। 1938 में सं.रा. अमेरिका और दक्षिण अमेरिकी राज्यों के प्रयत्नों से ही इस दोनों पक्षों में संधि हो सकी।

मंचूरिया संकट

राष्ट्रसंघ 1931 में उत्पन्न मंचूरिया संकट का समाधान करने में बुरी तरह असफल रहा। 1931 में जापान ने चीन पर आरोप लगाकर कि उसने दक्षिण मंचूरिया में जापानी रेल-संपत्ति को क्षति पहुँचाई है, मंचूरिया पर आक्रमण कर दिया। चीन की अपील पर राष्ट्रसंघ ने स्थिति की जाँच करने के लिए लिटन आयोग को चीन भेजा, किंतु आयोग के पहुँचने के पहले ही जापान ने वहाँ एक कठपुतली सरकार की स्थापना कर दी। आयोग ने अपनी रिपोर्ट में जापान को आक्रामक देश घोषित करने का प्रस्ताव किया, किंतु राष्ट्रसंघ प्रस्तावों के माध्यम से चीन को मंचूरिया नहीं दिला सका। जापान ने मंचूरिया से सेना हटाने के बजाय 1933 में राष्ट्रसंघ से इस्तीफा दे दिया, जिससे राष्ट्रसंघ की दुर्बलता स्पष्ट हो गई।

अबीसीनिया का संकट

जापान का अनुसरण करते हुए इटली ने दिसंबर 1934 में राष्ट्रसंघ के सदस्य देश ईथोपिया (अबीसीनिया) पर आक्रमण कर दिया। ईथोपिया के सम्राट हेलसिलासी ने राष्ट्रसंघ मेें अपील की। परिषद् ने इटली के इस आरोप का खंडन किया कि ईथोपिया आक्रामक है। साधारण सभा ने सदस्यों को इटली के विरूद्ध प्रतिबंध लगाने को कहा, किंतु प्रतिबंध सफल नहीं हुए। ब्रिटेन और फ्रांस राष्ट्रसंघ के भीतर रहते हुए भी कूटनीतिक दाँव-पेंच से इटली की मदद करते  रहे। महाशक्तियों के लिए एक अफ्रीकी देश की स्वतंत्रता का कोई महत्व नहीं था। 1 मई 1936 कोे इटली की सेनाओं ने ईथोपिया की राजधानी आदिसबाबा पर कब्जा कर लिया और 9 मई को इटली के शासक को ईथोपिया का सम्राट घोषित कर दिया।

30 जून को राष्ट्रसंघ के साधारण सभा की बैठक हुई। भागकर आये ईथोपिया के सम्राट हेलसिलासी ने सहायता की अपील की। किंतु सोवियत प्रतिनिधि को छोड़कर किसी ने उसका समर्थन नहीं किया। इटली के विरूद्ध लगाये गये प्रतिबंध भी मध्य जुलाई तक हटा लिये गये। इस प्रकार ईथोपिया की सभी माँगों को ठुकराते हुए सामूहिक सुरक्षा के सिद्धांत को तिलांजलि दे दी गई और ईथोपिया को उसके भाग्य पर छोड़ दिया गया। इतना ही नहीं, इटली ने ईथोपिया के राष्ट्रसंघ का सदस्य बने रहने के विरोध में संघ का बहिष्कार भी किया। फ्रांस और ब्रिटेन की मदद से राष्ट्रसंघ से ईथोपिया को बाहर निकाल दिया गया और इन दोनों देशों ने इटली की ईथोपिया विजय को मान्यता भी दे दी।

इस प्रकार इटली के समस्त अनैतिक कार्य राष्ट्रसंघ के समक्ष होते रहे, लेकिन राष्ट्रसंघ असहाय मूकदर्शक बना रहा। राष्ट्रसंघ ने धारा 16 के अनुसार आर्थिक प्रतिबंध लगाया, लेकिन वह प्रतिबंधों का कड़ाई से पालन कराने में असफल रहा। ईथोपिया पर आक्रमण राष्ट्रसंघ की क्षमता की अग्निपरीक्षा थी, जिसमें वह बुरी तरह असफल रहा। वास्तव में राष्ट्रसंघ के 16 वर्षों के कार्यकाल में संघ की प्रतिष्ठा इतना कभी नहीं गिरी थी जितना कि 1936 में, जब ईथोपिया के सम्राट को भागना पड़ा और इटली की सेना ने ईथोपिया में प्रवेश किया। लग रहा था कि राष्ट्रसंघ के खंडहरों पर फासीवाद का साम्राज्य स्थापित हो गया है।

स्पेन का गृह-युद्ध (1936-39) 

स्पेन के गृहयुद्ध के मामले में भी राष्ट्रसंघ बुरी तरह असफल रहा। जनरल फ्रांको के नेतृत्व में प्रतिक्रियावादी तत्वों ने स्पेन की गणतंत्रीय सरकार को विरूद्ध सशस्त्र विद्रोह किया जिससे स्पेन में गृह-युद्ध शुरू हो गया। हिटलर और मुसोलिनी ने फ्रांको की खुलेआम सहायता की। जब स्पेन की गणतंत्रीय सकार ने राष्ट्रसंघ से सहायता की याचना की, तो संघ ने तटस्थता की नीति अपनाई। फलतः स्पेन की गणतंत्रीय सरकार का पतन हो गया और फ्रांको की सरकार बन गई। संघ के प्रमुख राज्यों ने फ्रांको की सरकार को मान्यता देकर राष्ट्रसंघ की घोर उपेक्षा की। इस प्रकार स्पेन के गृह-युद्ध में भी राष्ट्रसंघ केवल दर्शक बना रहा।

जर्मनी द्वारा पेरिस शांति-समझौते का उल्लंघन

पेरिस शांति-सम्मेलन की व्यवस्था को बनाये रखना राष्ट्रसंघ का प्रमुख उद्देश्य था। किंतु हिटलर के नेतृत्व में जर्मनी ने वर्साय संधि की धाराओं का एक के बाद एक करके भंग करना आरंभ किया और संघ हिटलर की महत्वाकाक्षाओं को रोकने में असफल रहा। जर्मनी ने 1933 में उसने राष्ट्रसंघ को छोड़ने का नोटिस दे दिया, 1935 में सैनिक सेवा अनिवार्य कर दिया, 1936 में जर्मनी ने राईन को अपने अधिकार में कर लिया, आत्मनिर्णय के सिद्धांत का बहाना कर उसने 1938 में आस्ट्रिया को हड़प लिया, 1938 में जर्मनी ने चेकोस्लोवाकिया पर आक्रमण कर उसकी स्वतंत्रता का हरण कर लिया, और अंत में 1939 में पोलैंड पर आक्रमण कर दिया जिससे द्वितीय विश्वयुद्ध आरंभ हो गया।

चीन-जापान की मुठभेड़

1937 में जापान द्वारा चीन पर आक्रमण होने की स्थिति में राष्ट्रसंघ पंगु बना रहा। जुलाई 1937 में चीन और जापान में मुठभेड़ पीविंग के निकट लुकोचियाओ नामक स्थान पर हुई। इस घटना को लेकर जापान ने चीन के समक्ष कुछ माँगें रखी, जिन्हें चीन ने मानने से इनकार कर दिया। सितंबर 1937 में चीन ने जापान के विरूद्ध आर्थिक प्रतिबंध लगाने की प्रार्थना की, किंतु संघ मूकदर्शक बना रहा। इस समय चीन के प्रतिनिधि वेलिंगटन ने सही कहा था कि ‘‘राष्ट्रसंघ मिस्र की ममी की भाँति सभी भोग एवं ऐश्वर्य के साधनों संपन्न होता हुआ भी निर्जीव हो चुका था।’’

सोवियत रूस का फिनलैंड पर आक्रमण

1939 के अंत में सोवियत रूस ने फिनलैंड पर आक्रमण कर दिया। फिनलैंड ने राष्ट्रसंघ से सहायता माँगी। राष्ट्रसंघ ने सोवियत रूस को संघ से निकाल दिया, किंतु फिनलैंड को बचाने की कोई कार्यवाही नहीं कर सका। 1940 के आरंभ में फिनलैंड पर रूस का अधिकार हो गया।

(घ) अल्पसंख्यकों के हितों की सुरक्षा 

प्रथम विश्वयुद्ध की समाप्ति पर मित्र राष्ट्रों के समक्ष अल्पसंख्यकों के हितों की सुरक्षा एक गंभीर समस्या थी। यूरोप के विभिन्न राज्यों में बिखरे लगभग तीन करोड़ अल्पसंख्यकों के हितों की सुरक्षा की जिम्मेदारी राष्ट्रसंघ को सौंपी गई। किंतु यह कार्य आसान नहीं था क्योंकि प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान आत्मनिर्णय के सिद्धांत का इतना प्रचार हुआ कि अल्पसंख्यकों को ढ़ेर सारी आशाएँ बँध गई थीं। पूर्वी यूरोप में अल्पसंख्यकों का इतना असमान वितरण था कि चेक, सर्ब, यूनानी, मगयार आदि जातियाँ कहीं बहुमत में और कहीं अल्पमत में थीं। इसलिए अल्पसंख्यकों के हितों की सुरक्षा की दृष्टि से राष्ट्रसंघ और विविध राज्यों के बीच समझौता किया गया और इसकी जिम्मेदारी राष्ट्रसंघ की अल्पसंख्यक समिति को दी गई थी। अल्पसंख्यकों से संबंधित कोई भी मामला सीधे परिषद् या अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय मे उठाया जा सकता था, किंतु उल्लंघनकर्ताओं के विरुद्ध कुछ किया नहीं जा सकता था। सारे यूराप के अल्पसंख्यक यंत्रणा के शिकार हो रहे थे और राष्ट्रसंघ आश्वासनों के अलावा कुछ विशेष नहीं कर पा रहा था।

(च) समाजार्थिक और मानव-कल्याण संबंधी कार्य

राष्ट्रसंघ ने केवल शांति-स्थापना, निरस्त्रीकरण एवं युद्ध की संभावनाओं को रोकने और अल्पसंख्यकों को संरक्षण देने का ही कार्य नहीं किया, बल्कि उसने अंतर्राष्ट्रीय विश्व में सहयोग को बढ़ावा देकर आर्थिक एवं सामाजिक समस्याओं के समाधान और मानव-कल्याण संबंधी कार्य भी किये। राष्ट्रसंघ ने आर्थिक दृष्टि से पिछड़े देशों के पुनर्निर्माण में योगदान दिया और सभी राष्ट्रों को स्वस्थ आर्थिक नीतियाँ अपनाने को प्रेरित किया ताकि महायुद्ध से बिखरे विश्व का पुनर्निर्माण किया जा सके। राष्ट्रसंघ के प्रयास से एक अंतर्राष्ट्रीय सहायता संघ बना, जिसने संकटग्रस्त देशों को आर्थिक सहायता प्रदान की। आस्ट्रिया, हंगरी, यूनान और बुल्गारिया को राष्ट्रसंघ ने समय-समय पर ऋण दिलवाया।

संभवतः मानव इतिहास में पहली बार राष्ट्रसंघ ने खाद्यान्न एवं स्वास्थ्य-संबंधी समस्याओं, बीमारियों की रोकथाम, शरणार्थियों के लिए जीविकोपार्जन तथा शिक्षा एवं संस्कृति के विकास द्वारा मानव कल्याण का बीड़ा उठाया। इसके लिए राष्ट्रसंघ ने आयोगों एवं समितियों का गठन किया, विशेषज्ञों का आदान-प्रदान किया और उच्चकोटि के साहित्य के प्रकाशन आदि कार्य किया।

राष्ट्रसंघ विधान की 23वीं धारा में कहा गया था कि संघ के सदस्य बीमारियों को रोकने एवं उन्हें नियंत्रित करने के संबंध में आवश्यक कदम उठाने का प्रयास करेंगे। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए 1923 में स्थायी स्वास्थ्य संगठन की स्थापना की गई जिसका उद्देश्य अंतर्राष्ट्रीय सहयोग द्वारा जन-स्वास्थ्य की सुरक्षा को बढ़ावा देना था। इस संगठन ने संक्रामक रोगों के निवारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। संघ ने अफीम और कोकीन जैसे मादक पदार्थों के व्यापार को भी रोकने का प्रयास किया। शरणार्थियों को बसाने के लिए संघ ने एक पृथक् आयोग की स्थापना की, जिसका अध्यक्ष डा. नानसेन को बनाया गया। बाल-विकास, नारी कल्याण एवं वेश्यावृत्ति पर अंकुश लगाने की दिशा में भी राष्ट्रसंघ की सेवाएँ सराहनीय रहीं। दास प्रथा और बेगारी दूर करने में भी संघ ने बड़ी तत्परता दिखाई।

राष्ट्रसंघ ने बौद्धिक सहयोग के लिए एक अंतर्राष्ट्रीय समिति की स्थापना की, जिसका कार्य अंतर्राष्ट्रीय संबंधों का वैज्ञानिक अध्ययन करना, शिक्षा-संबंधी सूचना एकत्र करना, स्मारकों एवं कलाकृतियों का संरक्षण करना, राष्ट्रसंघ के संबंध में युवकों को प्रशिक्षण देना, प्रौढ़ एवं श्रमिकों की शिक्षा की व्यवस्था करना तथा नाटक, संगीत एवं काव्य के क्षेत्र में अंतर्राष्ट्रीय दृष्किोण को बढ़ावा देना आदि था।

राष्ट्रसंघ असफलता के कारण

राष्ट्रसंघ का निर्माण अंतर्राष्ट्रीय विवादों के शांतिपूर्ण निपटारे, भविष्य में होनेवाले युद्धों को रोकने आदि उद्देश्यों को लेकर हुआ था, किंतु राष्ट्रसंघ अपने उद्देश्यों में पूरी तरह असफल रहा। 1939 तक राष्ट्रसंघ एक निर्जीव संगठन बन चुका था। जब द्वितीय विश्वयुद्ध समाप्त हुआ और संयुक्त राष्ट्रसंघ के गठन का प्रश्न उठा, तो 19 अप्रैल 1946 को राष्ट्रसंघ का विधिवत् दफन कर दिया गया। राष्ट्रसंघ की इस असफलता के कई कारण थे-

1. शांति-संधियों से संबंध

राष्ट्रसंघ की धाराओं को पेरिस की विभिन्न संधियों से जोड़ना उसकी दुर्बलता का प्रमुख कारण बना। पराजित राष्ट्रों को अपमानजनक संधियाँ करनी पड़ी थीं जो उन्हें घृणा की दृष्टि से देखते थे। विभिन्न शांति-संधियों से जुड़े होने के कारण राष्ट्रसंघ को ‘एक चरित्रहीन माँ की बदनाम पुत्री’ कहा जाता था क्योंकि युद्ध में पराजित होनेवाले देश राष्ट्रसंघ को शाति-संधियों द्वारा थोपी गई व्यवस्थाओं का संरक्षक मानते थे और विजेता राष्ट्रों की स्वार्थसिद्धि का साधन मानते थे। इसके बावजूद यदि राष्ट्रसंघ ने शांति-संधियों में संशोधन का सहारा लिया होता तोे राष्ट्रसंघ की एक बड़ी कमजोरी दूर हो सकती थी। राष्ट्रसंघ की संविदा 19वें अनुचछेद का प्रयोग किया जाता तो स्थिति शायद गंभीर न होती क्योंकि वह भाप के दबाव को दूर करनेवाले सेफ्टी वाल्व के समान था। किंतु दुर्भाग्य से इस अनुच्छेद का उपयोग नहीं किया गया। यदि ऐसा होता तो पराजित राष्ट्र कुछ हद तक संतुष्ट हो जाते और द्वितीय विश्वयुद्ध की संभावना कम हो जाती।

2. संवैधानिक दुर्बलता

राष्ट्रसंघ संवैधानिक रूप से दुर्बल था। इसके कई कारण थे- एक तो राष्ट्रसंघ के सदस्य उसकी सिफारिशों को मानने के लिए बाध्य नहीं थे, केवल उन पर नैतिक बंधन था। दूसरे, किसी भी राज्य को अपराधी घोषित करने का निर्णय परिषद् द्वारा सर्वसम्मति से करना पड़ता था, जिसमें राष्ट्रों के आपसी स्वार्थ टकराते थे। इसलिए सर्वसम्मति से निर्णय करना कठिन था। तीसरे, संघ की कार्यप्रणाली जटिल थी। किसी समस्या को लंबा खींचा जा सकता था या उसे स्थगित किया जा सकता था। चौथे, संघ के संविधान में केवल आक्रामक युद्धों को अवैध घोषित किया गया था, जबकि रक्षात्मक युद्ध वैध माने गये थे। यह निर्णय करना आसान नहीं था कि आक्रामक कौन है। प्रत्येक राष्ट्र राष्ट्रीय सुरक्षा की आड़ में युद्ध पर उतारू हो जाता था। पाँचवें, राष्ट्रसंघ के पास अपने निर्णय को लागू करने के लिए कोई अंतर्राष्ट्रीय सैन्य-बल नहीं था। किसी आक्रांता के विरूद्ध कार्यवाही करने के लिए संघ सदस्य राष्ट्रों से सहायता माँग सकता था और सहायता देना या न देना राष्ट्रों की इच्छा पर निर्भर था। अंत में, छठवाँ कारण यह था कि राष्ट्रसंघ के पास स्थायी और स्वतंत्र आय के स्रोत नहीं थे जिसके कारण उसे सदैव आर्थिक संकट का सामना करना पड़ता था।

3. संयुक्त राष्ट्र अमेरिका का असहयोग

राष्ट्रसंघ का दुर्भाग्य था कि उसका निर्माता राष्ट्र अमेरिका ही उसका सदस्य नहीं बना था। अमेरिका जैसी महाशक्ति के अलगाव से राष्ट्रसंघ की नींव कमजोर हो गई। गेथोर्न हार्डी के अनुसार ‘‘एक बालक (राष्ट्रसंघ) को यूरोप के दरवाजे पर अनाथ की भाँति छोड़ दिया गया।’’ अमेरिका द्वारा राष्ट्रसंघ का सदस्य न बनना राष्ट्रसंघ के अस्तित्व के लिए हानिकारक साबित हुआ क्योंकि अमेरिका राष्ट्रसंघ का संविधान मानने के लिए बाध्य नहीं था। यदि किसी देश पर राष्ट्रसंघ प्रतिबंध लगाता तो वह अपनी आवश्यकता की पूर्ति अमेरिका से कर सकता था। अमेरिका के पृथक् रहने के कारण फ्रांस और ब्रिटेन को अपनी स्वार्थपरक और संकीर्ण नीतियों को प्रश्रय देने का अवसर मिल गया। पश्चिमी गोलार्द्ध के मामलों में अमेरिका के सहयोग के बिना राष्ट्रसंघ सफल नहीं हो सकता था।

4. राष्ट्रसंघ का सर्वाभौम न होना

राष्ट्रसंघ की सफलता इस बात पर निर्भर थी कि विश्व के अधिकांश देश इसके सदस्य होते, किंतु ªसंघ के इतिहास ऐसा कभी नहीं हुआ। संयुक्त राष्ट्र अमेरिका तो आरंभ से ही इससे अलग् रहा, रूस, जर्मनी, आस्ट्रिया, बुलगारिया आदि राज्यों को भी संघ में विलंब से प्रवेश मिला। जर्मनी 1926 में संघ का सदस्य बना, किंतु 1933 में संघ से अलग होने का नोटिस दे दिया। रूस को 14 वर्ष तक संघ से अलग रखा गया और जब उसका संघ में प्रवेश हुआ तो राष्ट्रसंघ काफी दुर्बल हो चुका था। 1937 में इटली ने संघ से त्यागपत्र दे दिया। जापान, जर्मनी और इटली के संघ से अलग हो जाने के कारण संघ की शक्ति और प्रभाव को काफी आधात पहुँचा। 1938 के अंत में इसके सदस्यों की संख्या 63 से घटकर 49 रह गई। सार्वभौमिक शक्ति के अभाव में राष्ट्रसंघ अपने निर्णयों को लागू नहीं करवाने में असमर्थ रहा।

5. राष्ट्रसंघ के प्रति सदस्यों के विभिन्न दृष्टिकोण

संघ की सफलता के लिए आवश्यक था कि इसके सदस्य देश किसी ज्वलंत समस्या पर एक समान दृष्टिकोण अपनाते ताकि दोषी राष्ट्र के विरूद्ध कुछ ठोस कदम उठाये जा सकें, किंतु इसके सदस्यों के हितों में स्वार्थपरता और विरोध था, विशेषकर बड़े राष्ट्रों के बीच। अनेक अंतर्राष्ट्रीय विवादों के समय संघ के सदस्यों ने अपने संकीर्ण राष्ट्रीय हितों के नाम पर विश्वशांति एवं न्याय का गला घोंटा। फ्रांस ने राष्ट्रसंघ को सार्वभौम सुरक्षा का संगठन न मानकर केवल जर्मनी से सुरक्षा का माध्यम समझा। ब्रिटेन अपने व्यापारिक हितों के कारण जर्मनी के प्रति उदार नीति अपनाता रहा। इसके अलावा कई राष्ट्र संघ के माध्यम से साम्यवाद के बढ़ते प्रभाव को रोकना चाहते थे। मंचूरिया पर जापान के आक्रमण को ब्रिटेन ने इसी उद्देश्य से अनदेखा कर दिया। हिटलर के लिए राष्ट्रसंघ आँख का कांटा था जो संपूर्ण विश्व पर जर्मनी के प्रभुत्व को स्थापित करने में बाधक था। इटली ने भी कुछ इसी प्रकार की नीति का अनुसरण किया। सोवियत नेताओं की दृष्टि में राष्ट्रसंघ ‘‘पिछली दशाब्दी की सबसे निर्लज्ज और चोरों की बनाई हुई वर्साय संधि की उपज’’ था।

6. संघ के प्रति उत्तरदायित्व का अभाव

राष्ट्रसंघ के पतन का एक प्रमुख कारण यह भी था कि संघ के बड़े सदस्यों ने अपने उत्तरदायित्वों का सही से पालन नहीं किया। उन्होंने अपनी घोषणाओं में भले ही शांति की दुहाई दी थी, किंतु व्यावहारिक रूप से उन्होंने शांति की स्थापना के लिए कोई सक्रिय कदम नहीं उठाये। फ्रांस और ब्रिटेन ने इटली और जर्मनी के प्रति तुष्टीकरण की नीति अपनाई ताकि वे साम्यवाद के विरूद्ध जूझ सकें। सदस्य राष्ट्रों ने संघ के सामने सही तथ्य लाने का भी प्रयास नहीं किया। जब आक्रामक देशों को विश्वास हो गया कि बड़ी शक्तियाँ संघ के आदेशों को लागू करवाने के लिए अपनी सेनाएँ भेजकर जोखिम लेने को तैयार नहीं हैं, तो वे छोटे-छोटे राष्ट्रों को हड़पने का साहस करने लगे। जापान द्वारा मंचूरिया पर आक्रमण के समय इंग्लैंड के प्रतिनिधि जान सीमन ने स्पष्ट कहा था: ‘‘मेरी नीति का उद्देश्य मेरे देश को संकट से दूर रखना है।’’ इसी प्रकार ईथोपिया मामले में उसने कहा था: ‘‘ईथोपिया के लिए एक भी ब्रिटिश जहाज को खोने का खतरा उठाना नहीं चाहूँगा।’’ इंग्लैंड ने वर्साय संधि का उल्लंघन करते हुए जर्मनी के साथ नौ-संधि की। इसी प्रकार फ्रांस ने इंग्लैंड को सूचित किये बगैर इटली के साथ व्यक्तिगत समझौता कर लिया, राईनलैंड का पुनः शस्त्रीकरण कर लिया। जर्मनी द्वारा आस्ट्रिया को हड़पना और चेकोस्लोवाकिया का अंग-भंग करना, इटली द्वारा स्पेनिश जनतंत्र का गला घोंटना आदि घटनाएँ हैं सदस्य राष्ट्रों में उत्तरदायित्व की भावना के अभाव में ही घटित हुईं। कोई भी सदस्य राष्ट्र इन घटनाओं के संबंध में संघ के प्रस्तावों को लागू करवाने का उत्सुक नहीं था।

7. विश्वव्यापी आर्थिक संकट

1930 के आर्थिक संकट ने भी राष्ट्रसंघ को क्षति पहुँचाई। प्रत्येक राष्ट्र इस आर्थिक संकट के कुप्रभाव से मुक्त होने के लिए अन्य राष्ट्रों की चिंता किये बगैर राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न आर्थिक उपायों का सहारा लेने लगा, जिसके परिणामस्वरूप अंतर्राष्ट्रीय सहयोग एवं विकास को आघात पहुँचा। इस आर्थिक संकट ने जर्मनी में नाजीवाद, इटली में फासीवाद और जापान में सैनिकवाद को पनपने में मदद पहुँचाई। इससे अंतर्राष्ट्रीय तनाव में वृद्धि हुई और राष्ट्रसंघ के लिए कार्य करना कठिन हो गया। आर्थिक मंदी से कई पूँजीवादी देशों में भारी असंतोष फैला और जनता में साम्यवाद के प्रति आकर्षण बढ़ने लगा। फलतः पूँजीवादी देश रूस के विरोधी हो गये। उन राष्ट्रों ने रूस-विरोधी जर्मनी, इटली और जापान के प्रति तुष्टीकरण की नीति अपनाई।

8. अधिनायकवाद का विकास

राष्ट्रपति विल्सन और उसके सहयोगियों का विश्वास था कि राष्ट्रसंघ के सभी सदस्य सामूहिक रूप से विश्वशांति, स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक व्यवस्था के विकास के लिए प्रयत्नशील रहेंगे। किंतु यूरोप में प्रथम विश्वयुद्ध के बाद कई कारणों से जर्मनी, इटली और स्पेन में अधिनायकवाद की स्थापना हो गई। हिटलर, मुसालिनी और जनरल फ्रांको से शांति की उम्मीद नहीं की जा सकती थी क्योंकि वे अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए कुछ भी कर सकते थे। इन अधिनायकों का विश्वास था कि युद्ध सदैव ही अनिवार्य होता है, जिसे शांति कहा जाता है वह वास्तव में युद्ध-विराम होता है। फलतः शांति की संभावना क्षीण होती गई और राष्ट्रसंघ में आस्था रखानेवाले देश भी सामूहिक सुरक्षा की नहीं, बल्कि अपनी-अपनी सुरक्षा की चिंता करने लगे।

राष्ट्रसंघ का मूल्यांकन

राष्ट्रसंघ के बीस वर्षीय जीवनकाल में उसकी राजनीतिक उपलब्धियों एवं सफलताओं पर विभिन्न मत हो सकते हैं, लेकिन यह सत्य है कि सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक क्षेत्र में उसकी उपलब्धियों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। मानव इतिहास में पहली बार राष्ट्रसंघ ने पददलित, अल्पसंख्यकों, रोगियों, शरणार्थियों और अशिक्षितों की समस्याओं का अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर समाधान करने का सामूहिक प्रयत्न किया। पहली बार मादक पदार्थों और नारी-व्यापार, बाल-अत्याचारों और दासता और बेगार प्रथा के विरूद्ध राष्ट्रसंघ के तत्वावधान में अंतर्राष्ट्रीय प्रयास आरंभ हुए। इन गैर-राजनीतिक कार्यों में विश्व जनमत राष्ट्रसंघ के साथ था, किंतु राष्ट्रसंघ के शांति-प्रयत्नों की आलोचना के लिए पर्याप्त आधार था।

कहा जाता है कि राष्ट्रसंघ को निर्बल या छोटे देशों के विवादास्पद मामलों में ही सफलता मिली और जिन विवादों में एक पक्ष या दोनों पक्षों में किसी बड़ी यूरोपीय शक्ति की संलिप्तता थी, वहाँ राष्ट्रसंघ न्याय करने अथवा शांति स्थापित करने में असफल रहा। अपने जन्म के बाद के कुछ वर्षों बाद तक राष्ट्रसंघ सफल होता दिख रहा था, क्योंकि संघ छोटे-छोटे राष्ट्रों को विवादों को सुलझाने में सफल हो रहा था। ई.एच. कार के अनुसार 1924 से 1930 के वर्ष राष्ट्रसंघ की प्रतिष्ठा और सत्ता के वर्ष थे। इस बीच राष्ट्रसंघ को अनेक ऐसे अवसर मिले जबयूरोप में साम्राज्यवादियों के आपसी अंतर्विरोधों से पैदा होनेवाले तनावों को कम करने के एक मंच के रूप में उसे प्रतिष्ठा मिली। इस काल में ही युद्ध में पराजित और शांतिकाल में उपेक्षित जर्मनी को राष्ट्रसंघ में स्थायी सदस्यता प्राप्त हुई यद्यपि सोवियत रूस बहिष्कृत ही रहा। लेकिन 1927 में जेनेवा के निशस्त्रीकरण सम्मेलन में भाग लेने के लिए सोवियत प्रतिनिधि को भी आमंत्रित किया गया। कुल मिलाकर इस काल में राष्ट्रसंघ का दायरा बढ़ा और उसे शांति स्थापित करने या अंतर्विरोधों का दमन करने का अवसर मिला जिससे यह आशा बँधने लगी थी कि राष्ट्रसंघ विश्वव्यापी समस्याओं को सुलझाने की दिशा में एक असाधारण मंच सिद्ध होगा। किंतु यह आशावादी वातावरण अधिक समय तक नहीं बना रह सका।

1930 के बाद राष्ट्रसंघ की असफलता का दौर आरंभ हुआ जब पूँजीवादी विश्व आर्थिक मंदी के कारण संकटग्रस्त हो गया और राष्ट्रों के बीच अंतर्विरोध बढ़ने लगा। आर्थिक नाकेबंदी, संरक्षण सीमा कर आदि के कारण तनाव की स्थितियाँ हर जगह बनने लगीं। अब साम्राज्यवादियों ने अपने ऊपर आये भार को दूसरों के माथे पर मढ़ने लगे। फ्रांस और ब्रिटेन क लिए यह संभव था क्योंकि उनके पास उपनिवेश थे, किंतु जिनके पास उपनिवेश नहीं थे, उन्होंने विध्वंसक नीतियों का सहारा लिया। जापान ने मंचूरिया पर आक्रमण कर दूसरे देशों के लिए भी इस प्रकार के रास्तों को खोल दिया। इसी क्रम में इटली के मुसोलिनी और जर्मनी के हिटलर की कार्यवाहियों को देखा जा सकता है। स्पेन के सैनिक तानाशाह ने स्पेन में नवजात गणतंत्र का गला घोंट दिया। ऐसी एक के बाद एक दूसरी घटनाओं ने राष्ट्रसंघ के खोखलेपन को जगजाहिर कर दिया।

वास्तव में इसे राष्ट्रसंघ की असफलता नहीं, सदस्य राष्ट्रों की असफलता माना जानी चाहिए क्योंकि संघ स्वयं शक्ति का स्रोत नहीं था, बल्कि उसकी शक्ति के स्रोत तो सदस्य राष्ट्र ही थे। सदस्य राष्ट्र शांति तो चाहते थे, लेकिन शांति को बनाये रखने के लिए उन समस्याओं को समाप्त करने का साहस नहीं रखते थे जो युद्ध को भड़काती हो। अंतर्राष्ट्रीय शांति-स्थापना में संघ तभी सफल हो सकता था जब विश्व के सभी देश प्रतिस्पर्धा, प्रतिद्वंद्विता, द्वेष, कूटनीति, गुटंबंदी आदि को भूल जाते लेकिन यह न तो तब संभव था और न ही आज संभव है।

यद्यपि राष्ट्रसंघ की असफलता उसके पतन का कारण बनी, किंतु द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान संयुक्त राष्ट्रसंघ के घोषणा-पत्र की तैयारी और बाद में उसका अस्त्त्वि में आ जाना, राष्ट्रसंघ की सफलता और उसकी उपयोगिता का प्रमाण है। राष्ट्रसंघ की सबसे बड़ी देन अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के विचार को उन्नत करना था। यद्यपि एक कार्यशील संस्था के रूप में राष्ट्रसंघ की अंत्येष्टि हो चुकी है, फिर भी वे आदर्श जिसको उसने बढ़ावा देने का प्रयत्न किया, वे आशाएँ जो उसके कारण उत्पन्न हुईं और वह कार्यप्रणाली जिसको उसने अपनाया, सभ्य संसार के राजनैतिक विचारों के महत्वपूर्ण अंग बन गये हैं। संयुक्त राष्ट्रसंघ के उद्देश्यों, सिद्धांतों एवं कार्यप्रणाली पर राष्ट्रसंघ की छाप है। इस प्रकार 18 अप्रैल 1946 को राष्ट्रसंघ की अंत्येष्टि नहीं हुई थी, बल्कि उसका पुनर्जन्म हुआ था।

राष्ट्रसंघ ने विश्व इतिहास में पहली बार दुनिया के राजीतिज्ञों को ऐसा मंच प्रदान किया, जिसके माध्यम से वे अंतर्राष्ट्रीय समस्याओं पर अपने विचार और सुझाव साझा कर सकते थे। 19वीं सदी के गुटों की कूटनीति के बदले राष्ट्रसंघ ने खुली कूटनीति की परंपरा शुरू की थी, यद्यपि संघ असफल रहा। राष्ट्रसंघ ने विश्व को मानवता को सहयोग का पहला पाठ पढ़ाया। इस प्रकार राष्ट्रसंघ एक विश्वव्यापी राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था के संगठन के रूप में प्रथम प्रभावशाली कदम था जिसमें मानव समाज के सामान्य हितों के दर्शन होते हैं और जिसने परंपरा, जातिभेद और भौगोलिक पार्थक्य की बाधाओं से ऊपर उठकर कार्य किया।

Dr. Jai Prakash

डा. जय प्रकाश, वीर बहादुर सिंह राजकीय महाविद्यालय कम्पियरगंज, गोरखपुर (उ.प्र.) में एसोसिएट प्रोफेसर-इतिहास के पद पर कार्यरत हैं। आपने 1982 में शास्त्री औद्योगिक इंटर कॉलेज, कासिमपुर से हाईस्कूल और 1984 मेंं जनता इंटर कॉलेज फतेहपुर बड़ागांव से इंटरमीडियट की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण किया। आपने 1986 और 1988 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय इलाहाबाद से स्नातक और स्नातकोत्तर की परीक्षा भी प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। आपने नेट/जेआरएफ की परीक्षा उत्तीर्ण कर राष्ट्रीय महाविद्यालय सुजानगंज, जौनपुर में प्राचीन इतिहास, संस्कृति और पुरातत्व के प्रवक्ता के रूप में अध्यापन-कार्य की शुरूआत की और लगभग 28 वर्षों से अध्ययन-अध्यापन से जुड़े हुए हैं। आपके दो दर्जन से अधिक शोधपत्र विभिन्न राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं एवं प्रोसीडिंग्स में प्रकाशित हो चुके हैं। आपने पच्चीस से अधिक राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठियों में भी प्रतिभाग किया है। आप राष्ट्रीय संगोष्ठी का संयोजन और कार्यवृत्त का संपादन भी कर चुके हैं। इसके अलावा आप विभिन्न अकादमिक संस्थानों और समितियों के सदस्य भी हैं। आपकी पहली पुस्तक ‘प्राचीन भारत का राजनीतिक एवं सांस्कृतिक इतिहास’ छात्र-छात्राओं और विद्वानों द्वारा बहुत सराही गई है। आपकी अन्य कई पुस्तकें जैसे- भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन: एक मूल्यांकन, आधुनिक भारत का इतिहास और मध्यकालीन भारत का इतिहास प्रकाशनाधीन हैं, जो शीघ्र ही पाठकों और छात्र-छात्राओं के बीच होंगी।

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