मेटरनिख (Metternich)

यूरोप में मेटरनिख का उदय नेपोलियन महान् के पतन के बाद हुआ।

1815 ई. से 1848 ई. तक 33 वर्षों की अवधि में यूरोप के राजनीतिक घटनाक्रम को मेटरनिख ने अपनी प्रतिक्रियावादी नीतियों और अनुदार कार्यों से प्रभावित किया, इसलिए यूरोपीय इतिहास में इस अवधि को मेटरनिख युग (Age of Metternich) कहते हैं।

इसका कारण था कि इस काल में यूरोपीय राजनीतिक क्षितिज पर मेटरनिख छाया हुआ था।

मेटरनिख ने पुरातन व्यवस्था को बनाये रखने के लिए न केवल आस्ट्रिया में, बल्कि संपूर्ण यूरोप में निरंतर प्रयास किया।

हेजन के शब्दों में ‘उन्नीसवीं सदी में जितने भी राजनीतिज्ञ हुए, उनमें मेटरनिख सर्वाधिक प्रख्यात एवं प्रभावशाली था।’

मेटरनिख अपनी वाक्पटुता एवं प्रभावशाली व्यक्तित्व के कारण यूरोप के प्रमुख राजननीतिज्ञों में एक हो गया था।

मेटरनिख आत्मविश्वास से ओतप्रोत रहता था और प्रायः कहा करता था कि ‘मेरा जन्म यूरोपीय समाज के पतनशील ढ़ांचे को सहारा देने के लिए हुआ है।’

मेटरनिख का आरंभिक जीवन (Early Life of Metternich)

मेटरनिख का नाम काउंट क्लीमेंस वान मेटरनिख (Count Clemens Von Metternich) था।

मेटरनिख का जन्म 15 मई 1773 को जर्मनी के कोब्लेंज (Coblong) नामक नगर में एक कुलीन सामंत परिवार में हुआ था।

मेटरनिख आस्ट्रिया के पुराने जर्मन अभिजात वर्ग का एक सदस्य था और उसने अपने वर्ग के रूढ़िवादी विचारों का प्रतिनिधित्व किया।

मेटरनिख के पिता आस्ट्रिया में राजनयिक सेवा में एक ऊंचे पद पर आसीन थे।

1788 में मेटरनिख ने फ्रांस के स्ट्रासबर्ग विश्वविद्यालय में कूटनीति का अध्ययन करने के लिए प्रवेश लिया।

मेटरनिख 1789 में फ्रांसीसी क्रांति के समय स्ट्रासवर्ग विश्वविद्यालय में पढ़ रहा था।

1790 में फ्रांसीसी क्रांति से बचने के लिए मेटरनिख जर्मनी के मैंज विश्वविद्यालय में चला गया।

मेटरनिख कई कारणों से क्रांति और नेपोलियन का व्यक्तिगत शत्रु हो गया था।

मेटरनिख फ्रांस के भागे हुए कुलीनों से फ्रांसीसी क्रांतिकारियों के अत्याचारों की कहानियां सुन चुका था।

फ्रांस की क्रांति की हिंसा, आतंक के शासन की बर्बर हत्याओं और अत्याचार, क्रांतिकारी सिद्धांतों के प्रसार और नेपालियन के साम्राज्यवादी आक्रमणों से मेटरनिख क्रांति का घोर शत्रु बन गया था।

जैकोबिन दल के कार्यों ने मेटरनिख के मन में क्रांति-विरोधी बीज बो दिया था।

फ्रांसीसी सेनाओं के आक्रमण के कारण मेटरनिख को अपने पिता की जागीर से पलायन करना पड़ा था और नेपोलियन ने उसके पिता की जागीर पर अधिकार कर लिया था।

युवा मेटरनिख ने 1795 ई. में आस्ट्रिया के तत्कालीन चांसलर कोनिट्ज की पौत्री से विवाह किया, जिससे न केवल मेटरनिख की प्रतिष्ठा बढी, बल्कि शासक वर्ग तक उसकी पहुंच भी हो गई।

मेटरनिख की योग्यता से प्रभावित होकर आस्ट्रिया के सम्राट फ्रांसिस प्रथम ने मेटरनिख को ऊंचे पदों पर नियुक्त किया।

1801 ई. से 1806 ई. की अवधि में मेटरनिख यूरोप के अनेक देशों में आस्ट्रिया का राजदूत रहा।

1801 में सैक्सनी में नियुक्ति के साथ मेटरनिख का राजनीतिक जीवन की शुरूआत हुई। इसके बाद मेटरनिख की नियुक्ति 1803 में प्रशा और 1806 में फ्रांस में राजदूत के रूप में हुई।

1809 में मेटरनिख को विदेशी मामलों का मंत्री बनाया गया।

मेटरनिख की दक्षता से प्रभावित होकर आस्ट्रिया के सम्राट फ्रांसिस प्रथम ने 1809 ई. में मेटरनिख को आस्ट्रिया का चांसलर (प्रधानमंत्री) नियुक्त किया।

मेटरनिख ने नेपोलियन प्रथम की शादी सम्राट फ्रांसिस प्रथम की पुत्री मेरी लुई से करवाई, जिससे उसे नेपोलियन की

विस्तारवादी विजयों से कुछ राहत मिल गया था।
मेटरनिख आस्ट्रिया के प्रधानमंत्री पद पर 1809 ई. से 1848 ई. तक अर्थात् 39 वर्षों तक बना रहा।

मेटरनिख की राजनीतिक विचारधारा (Political Thinking of Metternich)

मेटरनिख की नीतियां मानवीय स्वभाव एवं आधुनिक विचारधाराओं के विपरीत थी।

मेटरनिख परंपरावादी और पुरातन व्यवस्था का समर्थक था।
मेटरनिख के अनुसार एक देश या अन्य देशों में होनेवाली घटनाएँ या कार्य अन्य पड़ोसी देशों को भी प्रभावित करते हैं।

सौभाग्य से मेटरनिख का सम्राट भी उसी के समान विचारधारा वाला था।

फ्रांस की क्रांति के कारण यूरोप में उस समय स्वतंत्रता, समानता तथा भ्रातृत्व (Liberty, Equality and Fraternity) के विचार प्रबल होते जा रहे थे।

मेटरनिख क्रांति और उसके विचारों का घोर विरोधी था।

मेटरनिख का विचार था कि क्रांति के सिद्धांत, राष्ट्रवाद और उदारवाद एक छूत रोग हैं जिनका समय से इलाज किया जाना आवश्यक है। इसीलिए आस्ट्रिया में ही नहीं, अपितु किसी भी देश में प्रगतिशील विचारों और प्रजातंत्रीय प्रणालियों का विकास नहीं होना चाहिए।

मेटरनिख का विचार था कि प्रतिक्रियावादी नीतियों के द्वारा ही यूरोप में शांति बनाये रखी जा सकती है।

इतिहासकार हेज के अनुसार ‘इसी कारण 1815 ई. से 1848 ई. तक उसने (मेटरनिख) प्रतिक्रियावाद को आस्ट्रिया में तथा आस्ट्रिया को यूरोप में प्रभावशाली बनाने का प्रयास किया।’

आस्ट्रिया के सम्राट फ्रांसिस का कहना था कि ‘शासन करो, किंतु कोई परिवर्तन न करो।’

मेटरनिख भी इसी सिद्धांत का समर्थक था और यूरोप में यथास्थिति को बनाये रखना चाहता था।

मेटरनिख का मानना था कि यथास्थितिवाद को निरंकुश राजतंत्र के द्वारा ही बनाये रखा जा सकता है।

इस प्रकार मेटरनिख की नीति हस्तक्षेप की नीति थी और विस्तृत जागृति के विचारों पर कड़े प्रतिबंध आदि पर आधारित थी।

मेटरनिख की क्रांति-विरोधी नीतियां

आस्ट्रिया को क्रांति, उदारवाद, प्रजातंत्र एवं राष्ट्रीयता के आसन्न खतरों से बचाने के लिए मेटरनिख ने जिन प्रतिक्रियावादी और रूढ़िवादी नीतियों को अपनाया, उसको मेटरनिख पद्धति कहते हैं।

मेटरनिख क्रांति को और उसके सिद्धांतों- स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व और प्रजातंत्र को एक भयानक छूत का रोग समझता था।

मेटरनिख कहा करता था कि ‘क्रांति एक रोग है, जिसका उपचार किया जाना चाहिए, एक ऐसा ज्वालामुखी है, जिसको बुझा देना चाहिए, एक ऐसा गंदा फोड़ा है, जिसे गर्म लोहे से जला देना चाहिए और एक ऐसा जल-सर्प है जो सामाजिक व्यवस्था को निगलने के लिए मुंह खोले खड़ा है।’

मेटरनिख की धारणा थी कि प्रजातंत्र के ज्वालामुखी को अग्नि के निरंकुश राज्य की स्थापना से ही शांत किया जा सकता है।
मेटरनिख जनता को कोई अधिकार और सुविधाएँ नहीं देना चाहता था।

मेटरनिख अकसर कहा करता था कि उसका जन्म यूरोप के जर्जर समाज को उभारने के लिए हुआ है और समस्त संसार का भार उसके कंधों पर है।

मेटरनिख की गृह नीति (Home Policy of Metternich)

मध्यकाल में आस्ट्रियन साम्राज्य हैप्सबर्ग वंश के अधीन था।
आस्ट्रियन सम्राज्य के अंतर्गत आस्ट्रिया, हंगरी, बोहेमिया तथा इटली के कुछ भाग थे।

आस्ट्रिया के विशाल साम्राज्य में अनेक जातियां निवास करती थीं जिनके धर्म, संस्कृति और भाषा भी अलग-अलग थे।

यही कारण है कि आस्ट्रिया को जातियों का अजायबघर कहा जाता था।

1789 ई. की फ्रांसीसी क्रांति के कारण आस्ट्रिया की विभिन्न जातियों में भी स्वतंत्रता की भावनाएं हिलोरें मारने लगी थीं।

अपनी गृह नीति के अंतर्गत मेटरनिख ने निम्न कार्य किये-

उदारवादी विचारों का दमन

मेटरनिख जीवन भर उदारवाद और राष्ट्रीयता की भावनाओं के दमन में लगा रहा।

मेटरनिख जानता था कि आस्ट्रिया साम्राज्य की रक्षा तभी की जा सकती है, जब वहां उदारवादी विचारों को फैलने से रोका जाए।

मेटरनिख क्रांति का घोर विरोधी था।

मेटरनिख ने गुप्तचरों को आदेश दिया था कि वे नवीनता और परिवर्तन के इच्छुक लोगों का पता लगायें और उन्हें कठोर दंड दें।

मेटरनिख ने जनता की भावनाओं को दबाने के लिए प्रेस तथा भषणों पर प्रतिबंध लगा दिया था।

विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में राष्ट्रीयता पर चर्चा करने भी कठोर दंड दिया जाता था।

छात्रों को पढ़ने के लिए दी जानेवाली पुसतकों की पूरी छानबीन की जाती थी।

आस्ट्रिया में बाहर से आनेवाले साहित्य पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया था।

इस प्रकार मेटरनिख ने प्रचार के सभी साधनों पर प्रतिबंध लगाकर आस्ट्रिया में नवीन विचारों को आने से रोकने का पूरा प्रबंध किया था।

यथास्थिति को बनाये रखना

आस्ट्रिया की सामाजिक व्यवस्था सामंतवादी थी। सामंत बड़े-बड़े भूखंडों के स्वामी थे, जिन्हें अपनी जागीर में कर लगाने, न्याय करने और बेगार लेने का अधिकार था।

इसके विपरीत किसानों और आम जनता की स्थिति अत्यंत खराब थी।

दिन-रात मेहनत करके उगाई गई किसानों की फसल का अधिकांश हिस्सा सामंतों के पास चला जाता था।

औद्योगिक क्रांति के कारण मजदूर भी बेरोजगार हो गये थे और मेटरनिख ने मजदूरों की दशा को सुधारने का कोई प्रयास नहीं किया।

असमान कर-व्यवस्था

मेटरनिख की कर-व्यवस्था भी अत्यंत दोषपूर्ण थी।
अधिकांश करों का भार साधारण जनता पर था।

मेटरनिख ने सीमा-शुल्क को भी बढ़ा दिया, जिससे व्यापार-वाणिज्य के विकास में बाधा पहुंची।

गृह नीति के दोष

मेटरनिख की गृह नीति के कारण आस्ट्रिया की जनता में व्यापक असंतोष व्याप्त था।

मेटरनिख की नीतियों के कारण उद्योग, कृषि और व्यापार पर बुरा असर पड़ा था।

मेटरनिख के तमाम प्रतिबंधों के बावजूद विदेशों से क्रांतिकरी साहित्य आस्ट्रिया में आता रहा और जनता को विद्रोह के लिए प्रेरित करता रहा।

मेटरनिख ने अपनी संपूर्ण शक्ति प्रजातंत्र के दमन में लगा दिया, इसलिए आस्ट्रिया का राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक विकास रुक गया।

मेटरनिख की विदेश नीति

मेटरनिख उन शक्तियों का प्रतीक था जो यथास्थिति को बनाये रखने के लिए तत्पर थीं।

मेटरनिख एक योग्य राजनीतिज्ञ था। उसका मानना था कि देश की गृह नीति और विदेश नीति में परस्पर गहन संबंध होना चाहिए।

मेटरनिख की विदेश नीति का मुख्य उद्देश्य यूरोप में शंति बनाये रखना और आस्ट्रिया के प्रभुत्व को बनाये रखना था।

मेटरनिख ने नेपोलियन को पराजित करने में विशेष भूमिका निभाई थी, इसलिए पूरे यूरोप की राजनीति पर उसका प्रभाव था।

मेटरनिख निरंतर अपने प्रभाव में वृद्धि करता गया और 1815 से 1848 तक यूरोप की राजनीति को वह अपने इशारों पर नचाता रहा।

मेटरनिख को विश्वास था कि आस्ट्रिया ही यूरोप की रक्षा कर सकता है, किंतु इसके लिए उसे यूरोप के अन्य राष्ट्रों के सहयोग की आवश्यकता थी।

मेटरनिख के विचार में यूरोप के लिए आस्ट्रिया आवश्यक था और आस्ट्रिया के लिए यूरोप आवश्यक था।

अपनी विदेश नीति के अंतर्गत मेटरनिख ने निम्नलिखित कार्य किये-

नेपोलियन की पराजय में भूमिका

मेटरनिख ने फ्रांस और नेपोलियन के विरूद्ध युद्ध लड़ने और नेपोलियन की शक्ति और सत्ता का हृस करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

मेटरनिख ने मित्र राष्ट्रों की संयुक्त सेनाओं के सथ नेपोलियन का सामना किया और नेपोलियन के विरूद्ध युद्धों में भाग लेकर उसे पराजित करने में प्रमुख भूमिका निभाई।

वियेना कांग्रेस का सूत्रधार

नेपोलियन के पतन के बाद आयोजित वियेना कांग्रेस का सूत्रधार मेटरनिख ही था।

वियेना की कांग्रेस मेटरनिख के राजनैतिक जीवन का उच्चतम बिंदु थी।

वियेना कांग्रेस के प्रायः सभी प्रमुख निर्णय मेटरनिख के सुझावों, प्रस्तावों और उसकी राजनीति के अनुरूप ही लिये गये थे।

मेटरनिख की शह पर ही वियेना के समझौते में विभिन्न देशों की सीमाओं में परिवर्तन किया गया और कई पुराने राजवंशों को पुनः स्थापित किया गया था।

यूरोप की संयुक्त यूरोपीय व्यवस्था

वियना समझौते को लागू करने और यूरोप में शांति व्यवस्था बनाये रखने के लिए मेटरनिख ने संयुक्त यूरोपीय व्यवस्था (Concert of Europe) की स्थापना की थी।

संयुक्त यूरोपीय व्यवस्था (ब्वबमतज वि म्नतवचम) यूरोपियन कांग्रेस की एक श्रृंखला थी, जहां यूरोपीय शक्तियां अपने हितों के लिए बातचीत करती थीं और क्रांतिकारी तथा राष्ट्रवादी आंदोलनों में हस्तक्षेप करने के लिए मिलकर काम करती थीं।

मेटरनिख की संयुक्त यूरोपीय व्यवस्था (Concert of Europe) के सदस्य इंगलैंड, आस्ट्रिया, प्रशा और रूस थे, जिसे चतुर्मखी संघ कहा जाता है।

बाद में चतुर्मखी संघ में फ्रांस भी शामिल हो गया, जिसके कारण उसे ‘पंचमुखी संघ’ कहा जाने लगा।

संयुक्त यूरोपीय व्यवस्था (Concert of Europe) 1815 से 1825 ई. तक कार्य करती रही और बाद में पारस्परिक मतभेद के कारण यह व्यवस्था समाप्त हो गई।

संयुक्त यूरोपीय व्यवस्था (ब्वबमतज वि म्नतवचम) के कारण ही आगामी 40 वर्षों तक यूरोप में शांति बनी रही।

मेटरनिख अपने-आपको यूरोप का भाग्य-विधाता समझता था और अकसर कहा करता था कि यूरोप के पुनः निर्माण का कार्यभार उसी के कंधों पर है।

मेटरनिख और जर्मनी

वियेना कांग्रेस में जर्मनी को 39 राज्यों के एक संघ में बदल दिया गया था, जिसका अध्यक्ष आस्ट्रिया के सम्राट को बनाया गया था।

नेपोलियन के समय से ही जर्मनी में राष्ट्रवादी भानवनाओं का उभार होने लगा था।

मेटरनिख जर्मनी में राष्ट्रवादी भानाओं को खतरनाक समझता था।

जर्मनी में जब कभी राष्ट्रभक्तों ने विद्रोह किया, मेटरनिख ने उनके दमन के लिए एक्शला शेपेल की कांग्रेस से अनुमति लेकर उनका दमन किया।

इसी प्रकार 23 मार्च 1819 ई. को जर्मनी में विद्रोह के दौरान एक पत्रकार कात्सेबू (Kotezebue) की हत्या हो गई, तो मेटरनिख ने कार्ल्सबाद आदेश (Carlsbad Decrees) की घोषणा की और छात्र-आंदोलनों, मनोरंजन की संस्थाओं तथा पत्र-पत्रिकाओं पर प्रतिबंध लगा दिया।

अपनी कठोर नीति के बल पर मेटरनिख जर्मनी में शांति स्थापित करने का प्रयास करता रहा।

किंतु जर्मनी की राष्ट्रवादी भावनाओं को अधिक समय तक दबाये रखना संभव नहीं था।

1830 ई. की क्रांति के बाद जर्मनी के क्रांतिकारी पुनः प्रबल हो उठे, तो मेटरनिख ने कार्स के आदेश को लागू किया, फिर भी विद्रोहों का दमन करना कठिन हो गया।

वास्तव में 1818 ई. में जर्मनी में स्थापित जोलवरीन (Zollaverin) नामक आर्थिक संघ की स्थापना हो चुकी थी, जिससे जर्मनी के सभी राज्य एक-दूसरे से जुड़ गये थे और आर्थिक रूप से संपन्न हो गये थे।

दरअसल जोलवरीन (Zollaverin) नामक आर्थिक संघ ने ही जर्मनी में मेटरनिख की व्यवस्था को विफल किया और प्रशा के नेतृत्व में जर्मनी के एकीकरण का मार्ग प्रशस्त हो गया।

मेटरनिख और इटली

नेपोलियन प्रथम की विजयों ने अनजाने में ही इटली के एकीकरण की शुरूआत कर दी थी।

मेटरनिख का उद्देश्य था- स्वेच्छाचारी निरंकुश राजतंत्रों को बनाये रखना, तानाशाहों का समर्थन करना और यथास्थिति को बनाये रखना।

किंतु 1815 ई. में वियेना कांग्रेस में इटली के देशभक्तों के मंसूबों पर पानी फेर दिया और इटली को अनेक राज्यों में बांट दिया गया।

इटली के लोम्बार्डी और वेनेशिया राज्य पर आस्ट्रिया का अधिकार हो गया।

शेष इटली पर भी आस्ट्रिया का ही प्रभाव बना हुआ था।
मेटरनिख के प्रयास से संपूर्ण इटली में निरंकुश राजतंत्र की स्थापना हो गई थी, जो इटली के देशभक्तों के लिए असहनीय हो रहा था।

नेपल्स और पीडमांट ने आस्ट्रिया के निरंकुश शासन के विरूद्ध विद्रोह किया, किंतु मेटरनिख ने चतुर्मुख संघ की आड़ लेकर इन विद्रोहों का निर्ममतापूर्वक दमन कर दिया।

1830 ई. की फ्रांसीसी क्रांति से प्रेरित होकर माडेना की जनता ने व्रिदोह किया, किंतु उस विद्रोह को भी दबा दिया गया।

1830 ई. के बाद इटली में ‘यंग इटली’ नामक गुप्त संस्था इटली के देशभक्तों को संगठित करने लगी, फिर भी इटली आस्ट्रिया के प्रभाव से मुक्त नहीं हो सका।

इस प्रकार मेटरनिख ने अपनी प्रतिक्रियावादी नीतियों के बल पर संपूर्ण यूरोप पर अपने प्रभुत्व को बनाये रखा।

मेटरनिख का पतन

1848 ई. में फ्रांस में क्रांति की लहर आई तो आस्ट्रिया भी इसके प्रभाव से बच नहीं सका।

आस्ट्रिया की जनता मेटरनिख के प्रतिक्रियावादी शासन से ऊब चुकी थी।

1848 ई. की फ्रासीसी क्रांति ने आस्ट्रिया की जनता में उत्साह की लहर पैदा कर दी।

आस्ट्रिया की जनता ने 13 मार्च 1848 ई. को मेटरनिख एवं सम्राट के महलों को घेर लिया। जनता ने ‘मेटरनिख मुर्दाबाद’ के नारे लगाये।

समय की प्रतिकूलता देखते हुए मेटरनिख अपने पद से त्यागपत्र देकर आस्ट्रिया छोड़कर इंग्लैंड भाग गया।

1851 ई. में मेटरनिख आस्ट्रिया वापस आया और आठ साल बाद वियेना में उसकी मृत्यु हो गई।

यद्यपि मेटरनिख एक योगय राजनीतिज्ञ था, किंतु वह समय के अनुकूल नहीं चल सका।

मेटरनिख प्रायः कहता रहता था कि ‘मैं विश्व में या तो बहुत पहले आया हूँ या बहुत बाद में।’

मेटरनिख का प्रमुख उद्देश्य शांति स्थापित करना था और वह इसमें सफल रहा।

फ्रांसीसी राजनयिक तालिरां के अनुसार मेटरनिख सत्य और सम्मान की उपेक्षा करके सदैव अपनी नीति तथा उद्देश्य बदलनेवाला अवसरवादी था।

वास्तव में आस्ट्रिया के प्रधानमंत्री के रूप में मेटरनिख के लिए कठोर नीति अपनाना आवश्यक था क्योंकि आस्ट्रिया में विभिन्न जातियों, धर्मों और राज्यों के लोग रहते थे।

उदारवादी अथवा क्रांतिकारी विचारों के फैलने पर आस्ट्रिया को एक सूत्र में बांधकर रख पाना कठिन हो जाता। इसलिए प्रतिक्रियावादी नीतियों को अपनाना मेटरनिख की मजबूरी थी।

मेटरनिख इतना बुद्धिमान, सतर्क और संतुलित था कि वह पूर्ण रूप से प्रतिक्रियावादी हो ही नहीं सकता था।

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