मुगल साम्राज्य की स्थापना : बाबर (Establishment of Mughal Empire: Babur)

चौदहवीं शताब्दी में मंगोल साम्राज्य के विघटन के पश्चात् तैमूर ने ईरान और तूरान को फिर से एक शासन के अंतर्गत संगठित किया।

तैमूर का साम्राज्य वोल्गा नदी के निचले हिस्से से सिंधु नदी तक फैला हुआ था और उसमें एशिया का माइनर (आधुनिक तुर्की), ईरान, ट्रांस-आक्सियाना, अफगानिस्तान और पंजाब का एक भाग था।

1404 ई. में तैमूर की मृत्यु हो गई। लेकिन उसके पोते शाहरुख मिर्जा ने साम्राज्य का अधिकांश भाग संगठित रखा।

शाहरुख मिर्जा के समय में समरकंद और हिरात पश्चिम एशिया के सांस्कृतिक केंद्र बन गये।

समरकंद के शासकों का इस्लामी दुनिया में काफी सम्मान था।
तैमूर के साम्राज्य को विभाजित करने की परंपरा थी।

अनेक तैमूर रियासतें, जो इस प्रक्रिया में बनी, आपस में लड़ती-झगड़ती रहीं। इससे नये तत्वों को आगे बढ़ने का मौका मिला।

उत्तर से एक मंगोल जाति उजबेक ने ट्रांस-आक्सियाना में अपने कदम बढ़ाये। उजबेकों ने इस्लाम अपना लिया था, लेकिन तैमूरी उन्हें असंस्कृत बर्बर ही समझते थे और पश्चिम की ओर ईरान में सफवीं वंश का उदय हुआ।

सफवी संतों की परंपरा में पनपे थे जो स्वयं को पैगंबर के वंशज मानते थे।

सफवी मुसलमानों के शिया मत का समर्थन करते थे और उन्हें परेशान करते थे जो शिया सिद्धांतों को अस्वीकार करते थे।

उजबेक सुन्नी थे, इसलिए सफवी और उजबेक के बीच संघर्ष सांप्रदायिक मतभेद के कारण और भी बढ़ गया था।

ईरान के भी पश्चिम में आटोमन तुर्कों की शक्ति उभर रही थी जो पूर्वी यूरोप तथा ईराक और ईरान पर अधिपत्य जमाना चाहते थे।

बाबर (Babur) के आक्रमण के पूर्व उत्तर भारत की राजनीतिक स्थिति

भारत में राजनीतिक विघटन की प्रक्रिया मुहम्मद तुगलक के काल में आरंभ हो गई थी।

दक्षिण भारत में विजयनगर और बहमनी राज्यों की स्थापना हुई।

मुहम्मद तुगलक के उत्तराधिकारी फिरोज तुगलक ने उत्तर भारत की स्थिति को सुधारने का कोई प्रयास नहीं किया।

तैमूर के आक्रमण के कारण सल्तनत के विघटन की प्रक्रिया और तेज हो गई।

लोदी सुल्तानों के समय उत्तर भारत आंतरिक रूप से विघटित हो चुका था।

दिल्ली

बाबर के आक्रमण के समय दिल्ली पर इब्राहिम लोदी शासन कर रहा था।

दिल्ली राज्य के अंतर्गत पंजाब, दोआब, जौनपुर, अवध, तिरहुत, बिहार और बुंदेलखंड के कुछ भाग शामिल थे।

इब्राहिम एक योग्य सैनिक था, किंतु उसमें अहंकार, क्रोघ और संशय की प्रवृत्ति थी जिसके कारण वह अपने अमीरों पर नियंत्रण करने में असफल रहा।

इब्राहिम के दो महत्वाकांक्षी अमीर- आलम खां लोदी और दौलत खां लोदी ने बाबर को दिल्ली को लूटने के लिए आमंत्रित किया।

मेवाड़

बाबर (Babur) के आक्रमण के समय उत्तर भारत का दूसरा महत्वपूर्ण राज्य मेवाड़ था।

बाबर के आक्रमण के समय मेवाड़ पर राणा संग्राम सिंह (राणा सांगा) का शासन था।

बाबर के विवरण के अनुसार राणा सांगा ने बाबर को भारत पर आक्रमण करने के लिए बुलाया था।

मालवा

मालवा में बाबर (Babur) के आक्रमण के समय खिलजी वंश का महमूद द्वितीय शासन कर रहा था।

फिरोज तुगलक के काल में मालवा में तुगलक सूबेदार दिलावर खां गोरी ने अपनी स्वतंत्रता की घोषणा करके गोरी राजवंश की स्थापना की थी।

मालवा में 1435 में गोरी राजवंश के स्थान पर खिलजी वंश की स्थापना हुई।

महमूद द्वितीय 1512 में मालवा का शासक बना था।

महमूद द्वितीय के काल में शासन की समस्त शक्तियां मेदिनीराय के हाथ में केंद्रित थीं।

मेदिनी राय ने शासन के सभी उच्च पदों पर राजपूतों की नियुक्तियां की थी जिसके विरोध में मुस्लिम अमीरों ने गुजरात के सुल्तान मुजफ्फरशाह द्वितीय को मालवा पर आक्रमण करने के लिए प्रेरित किया।

मेदिनीराय को राजपूत शासक राणा सांगा से सहायता मिलती थी।

1531 में गुजरात के सुलतान बहादुरशाह ने मालवा को जीत लिया।

गुजरात

गुजरात 1401 ई. में दिल्ली सल्तनत से अलग हो गया था।
महमूद बेगड़ा (1458-1511 ई.) गुजरात का सबसे प्रतापी शासक था।

महमूद बेगड़ा के उत्तराधिकारी मुजफ्फरशाह द्वितीय को मेवाड़ के राणा सांगा ने पराजित किया था।

मुजफ्फरशाह द्वितीय ने इब्राहिम लोदी के चाचा आलम खां को शरण दी थी।

1526 में मुजफ्फरशाह द्वितीय का पुत्र बहादुरशाह गुजरात का शासक हुआ।

गुजरात के बहादुरशाह ने मुगल सम्राट हुमायूं से युद्ध किया और मिर्जाओं को शरण दी थी।

बंगाल

सिकंदर लोदी ने बंगाल के शासक अलाउद्दीन हुसैन (1493-1519) से संधि करके बंगाल की स्वतंत्र सत्ता को मान्यता दी थी।

बाबर का समकालीन बंगाल का शासक अलाउद्दीन हुसैन का पुत्र नुसरतशाह था जो 1519 में शासक बना था।
बाबर (Babur) ने नुसरतशाह से संधि कर ली थी।

सिंध और मुल्तान

सिंध मुहम्मद तुगलक के शासनकाल में स्वतंत्र हुआ था।

फिरोज तुगलक ने सिंध को जीतने का असफल प्रयास किया था।

16वीं सदी में सिंध के सूमरा राजवश की शक्ति बहुत दुर्बल हो गई थी।

बाबर (Babur) के कंधार जीतने के समय कंधार के गवर्नर शाह अरघुन ने 1516 में सिंध के शासक जाम फिरोज को पराजितकर सिंध पर अधिकार कर लिया।

अरघुन के उत्तराधिकारी शाह हुसैन ने मुल्तान पर भी अधिकार किया।

बाबर (Babur) के आक्रमण के समय सिंध और मुल्तान पर शाह हुसैन का शासन था।

खानदेश

खानदेश ताप्ती नदी की घाटी में स्थित था।

फिरोज तुगलक की मृत्यु के बाद खानदेश में सल्तनत से अलग होकर मलिक रजा फारूखी ने अपनी स्वतंत्र सत्ता स्थापित की।

गुजरात के सुल्तान महमूद बेगड़ा की सहायता से आदिल खां तृतीय गुजरात का शासक बना था।

1520 में आदिल खां की मृत्यु के बाद उसका पुत्र मुहम्मद प्रथम खानदेश का शासक बना जो बाबर के आक्रमण के समय गुजरात का शासक था।

बहमनी राज्य

अलाउद्दीन बहमनशाह ने 1347 में बहमनी राज्य की स्थापना की थी।

बहमनी राज्य दक्षिण में बरार से कृष्णा नदी तक फैला था।
1481 में प्रधानमंत्री महमूद गवां की हत्या के बाद बहमनी राज्य का विघटन आरंभ हो गया।

बहमनी के अंतिम शासक कलीमुल्लाह शाह की 1527 में मृत्यु के बाद बहमनी राज्य समाप्त हो गया।

बाबर (Babur) के आक्रमण के समय बहमनी राज्य पांच राज्यों में बंट चुका था।

बहमनी के विभाजित पांच राज्यों में बीजापुर का आदिलशाही राज्य, अहमदनगर का निजामशाही राज्य, बरार का इमादशाही राज्य, गोलकुंडा का कुतुबशाही राज्य और और बीदर का बीदरशाही राज्य थे।

विजयनगर

हरिहर बौर बुक्का ने मुहम्मद तुगलक के काल में विजयनगर के स्वतंत्र राज्य की स्थापना की थी।

विजयनगर राज्य कृष्ण नदी के दक्षिण में स्थित था।

विजयनगर का सबसे शक्तिशाली राजा कृष्णदेव राय था, जो बाबर का समकालीन था।

पुर्तगाली यात्री पेइज और इरानी राजदूत अब्दुर्रज्जाक ने विजयनगर के वैभव की प्रशंशा की है।

बाबर (Babur)

भारत में मुगल साम्राज्य के संस्थापक जहीरुद्दीन मुहम्मद बाबर (Babur) का जन्म 14 फरवरी, 1483 ई. को फरगना में हुआ था।

तुर्की भाषा में बाबर का अर्थ होता है ‘बाघ’।

बाबर के पिता का नाम उमरशेख मिर्जा और माता का नाम कुतलुगनिगार बेगम था।

बाबर अपने पिता की ओर से तैमूर का पाँचवां एवं माता की ओर से चंगेज खाँ (मंगोल नेता) का चौदहवाँ वंशज था।

बाबर का परिवार तुर्की जाति के चगताई वंश का था, इसीलिए बाबर में ‘मंगोलों की क्रूरता, तुर्कों का साहस व योग्यता तथा ईरानियों की शिष्टता थी।’

बाबर ने चागताई में ‘बाबरनामा’ के नाम से अपनी जीवनी लिखी।

बाबर अपने पिता उमरशेख मिर्जा की 8 जून, 1494 ई. में मृत्यु के बाद 11 वर्ष की आयु में 1494 ई. में ट्रांस-आक्सियाना की एक रियासत फरगाना (राजधानी अंदीजन) का उत्तराधिकारी बना।

बाबर ने अपना राज्याभिषेक अपनी दादी ‘ऐसान दौलत बेगम’ के सहयोग से करवाया था।

1497 में बाबर ने उजबेक शहर समरकंद पर आक्रमण किया और 7 महीनों के बाद उसे जीत लिया।

समरकंद पर आक्रमण के समय बाबर के एक सैनिक सरगना ने फरगना पर अपना आधिपत्य जमा लिया।

बाबर फरगना पर अधिकार करने के लिए आ रहा था तो उसकी सेना ने समरकंद में उसका साथ छोड़ दिया जिससे समरकंद और फरगना दोनों बाबर के हाथ से निकल गये।

1501 ई. में बाबर (Babur) ने समरकंद पर पुनः अधिकार कर लिया, किंतु मात्र आठ महीने बाद ही उसे उजबेक शासक शैबानी खान ने हरा दिया।

बाबर ने 1504 ई. में हिंदुकुश की बर्फीली चोटियों को पार करके काबुल पर अपना नियंत्रण स्थापित किया।

काबुल-विजय के बाद बाबर ने अपने पूर्वजों द्वारा धारण की गई उपाधि ‘मिर्जा’ को त्यागकर नई उपाधि ‘पादशाह’ धारण की।

चौदह वर्ष तक बाबर (Babur) इस अवसर की तलाश में लगा रहा कि फिर उजबेकों को हराकर अपनी मातृभूमि पर पुनः अधिकार कर सके।

बाबर (Babur)  ने हेरात के एक तैमूरवंशी हुसैन बैकरह, जो कि उसका दूर का चाचा भी था, के साथ शैबानी के विरुद्ध सहयोग की संधि की।

1506 ई. में हुसैन बैकरह की मृत्यु हो जाने के कारण शैबानी खान ने हिरात पर अधिकार कर लिया।

बाबर ने अपनी जीवनी में हेरात को ‘बुद्धिजीवियों से भरे शहर’ के रूप में वर्णित किया है।

बाबर (Babur) को हेरात में युईगूर कवि मीरअली शाह नवाई की रचनाओं के बारे में पता चला जो चागताई भाषा को साहित्य की भाषा बनाने के पक्ष में थे।

बाबर को अपनी जीवनी चागताई भाषा में लिखने की प्रेरणा संभवतः युईगूर कवि मीरअली शाह नवाई की रचनाओं से मिली थी।

सफवी शासक हेरात और उसके आस-पास के क्षेत्र को अपना कहते थे। इस प्रदेश को तत्कालीन लेखकों ने ‘खुरासान’ कहा है।

1510 ई. में ईरान के सफवी वंश के शासक शाह इस्माइल प्रथम ने शैबानी को हराकर मार डाला।

1510 ई. में बाबर (Babur) ने समरकंद जीतने का एक और प्रयास किया और शाह इस्माईल प्रथम के साथ मध्य एशिया पर मिलकर आधिपत्य जमाने के लिए एक समझौता किया।

शाह इस्माईल की मदद के बदले में बाबर ने सफवियों की श्रेष्ठता स्वीकार की तथा खुद एवं अपने अनुयायियों को सफवियों की प्रभुता के अधीन समझा। इसके उत्तर में शाह इस्माईल ने बाबर को उसकी बहन खानजादा से मिलवाया जिसे शैबानी खाँ ने कैद कर रखा था।

शाह इस्माईल ने बाबर (Babur) को ऐश-ओ-आराम तथा सैन्य-हितों के लिए पूरी सहायता दी और बाबर ने भी अपने को शिया परंपरा में ढ़ाल कर दिया।

शाह इस्माईल के शासनकाल में फारस शिया मुसलमानों का गढ़ बन गया और वो अपने आप को सातवें शिया इमाम मूसा अलकाजिम का वंशज मानता था।

फारस में सिक्के शाह के नाम में ढ़लते थे और मस्जिद में खुतबे शाह के नाम से ही पढ़े जाते थे।

काबुल में सिक्के और खुतबे बाबर (Babur) के नाम पर थे।

अक्टूबर, 1511 में बाबर ने समरकंद पर चढ़ाई की और एक बार फिर उसे अपने अधीन कर लिया।

बाबर समरकंद का शासन शाह इस्माईल के सहयोगी की हैसियत से चलाने लगा। समरकंद में सुन्नी मुलसमानों के बीच बाबर शिया वस्त्रों में एकदम अलग लगता था।

शाह इस्माईल की मदद से बाबर ने बुखारा पर चढ़ाई की।

बुखारा में बाबर तैमूरवंशी होने के कारण लोगों की नजर में उजबेकों से मुक्तिदाता के रूप में देखा गया।

बाबर ईरानी सेनापतियों के व्यवहार के कारण रूष्ट हो गया क्योंकि वे उसे ईरानी साम्राज्य का एक गवर्नर ही मानते थे, स्वतंत्र शासक नहीं।

उजबेकों ने 8 महीनों के बाद समरकंद पर फिर से अधिकार कर लिया और बाबर (Babur) को एक बार फिर काबुल लौटना पड़ा।

शाह ईरान इस्माइल को भी आटोहान-साम्राज्य के साथ हुई प्रसिद्ध लड़ाई में हार का सामना करना पड़ा।

उजबेक ट्रांस-आक्सियाना के निर्विरोध स्वामी हो गये, इसलिए बाबर (Babur) ने भारत की ओर रुख किया।

बाबर की भारत विजय

बाबर (Babur) ने लिखा है कि काबुल जीतने (1504 ई.) से लेकर पानीपत की लड़ाई तक उसने हिंदुस्तान जीतने का विचार कभी नहीं त्यागा। लेकिन उसे भारत-विजय के लिए कभी सही अवसर नहीं मिला था- कभी अपने बेगों के भय के कारण, कभी मेरे और भाइयों के बीच मतभेद के कारण।

मध्य एशिया के कई अन्य आक्रमणकारियों की भाँति बाबर भी भारत की अपार धन-राशि के कारण इसकी ओर आकर्षित हुआ था।

बाबर (Babur) तैमूर का वंशज होने के कारण अफगानिस्तान पर अपना कानूनी अधिकार मानता था।

काबुल की सीमित आय पंजाब को विजित करने का एक कारण थी।

बाबर (Babur) का राज्य बदखशाँ, कंधार और काबुल पर था, जिनसे सेना की अनिवार्यताएँ पूरी करने के लिए आय नहीं हो पाती थी।

काबुल पर उजबेक आक्रमण का भी भय था और बाबर भारत को बढि़या शरण-स्थल समझता था।

बाबर का भारत के विरुद्व पहला अभियान 1519 ई. में युसुफजाई जाति के विरुद्ध था।

प्रथम अभियान में बाबर ने बाजौर और भेरा के शक्तिशाली किले को जीत लिया। अपने प्रथम भारतीय अभियान में बाबर ने तोपखाने का प्रयोग किया था।

बाबर (Babur) ने दौलत खाँ और इब्राहिम लोदी को पत्र और मौखिक संदेश भेजकर यह माँग की कि जो प्रदेश तुर्कों के हैं, वे उसे लौटा दिये जाएं।

दौलत खाँ ने बाबर के दूत को लाहौर में अटका लिया। वह न स्वयं उससे मिला और न उसे इब्राहिम लोदी के पास जाने दिया।

बाबर काबुल लौट गया, तो दौलत खाँ ने भीरा से उसके प्रतिनिधियों को बाहर कर दिया।

1520-21 ई. में बाबर (Babur) ने एक बार फिर सिंधु नदी पार कर बाजौर, भीरा, स्यालकोट एवं सैय्यदपुर को अपने अधिकार में कर लिया।

बाजौर और भीरा भारत के लिए मुगल-द्वार सिद्ध हुए।
बाबर ने डेढ़ साल के घेरे के बाद कंधार को जीत लिया।

लाहौर के गवर्नर दौलत खाँ लोदी ने पुत्र दिलावर खाँ एवं आलम खाँ (बहलोल खाँ का पुत्र) को बाबर को भारत पर आक्रमण करने के लिए आमंत्रित करने के लिए भेजा।

संभवतः राणा सांगा के दूत भी इसी समय बाबर के पास पहुँचे थे जो अफगानों की शक्ति को नष्ट करवाकर स्वयं दिल्ली के सिंहासन को प्राप्त करना चाहता था।

दूतों के पहुँचने पर बाबर को लगा कि यदि हिंदुस्तान को नहीं, तो सारे पंजाब को जीतने का समय आ गया है।

नवंबर, 1525 ई. में बाबर ने 30-40,000 सिपाहियों को इकट्ठाकर लाहौर की ओर बढ़ा।

बाबर के इस पाँचवें अभियान में बदख्शाँ की सैनिक टुकड़ी के साथ उसका पुत्र हुमायूँ था।

बाबर (Babur) से सामना होने पर दौलत खाँ लोदी की सेना बिखर गई, उसने आत्म-समर्पण कर दिया और बाद में उसे बंदी बना लिया गया।

आलम खाँ ने भी आत्म-समर्पण कर दिया। इस प्रकार सिंधु नदी पार करने के तीन सप्ताह के भीतर ही संपूर्ण पंजाब पर बाबर का अधिकार हो गया।

पानीपत का प्रथम युद्ध (1526 ई.)

पानीपत का प्रथम युद्ध दिल्ली के सुल्तान इब्राहिम लोदी (अफगान) एवं बाबर (Babur) के मध्य लड़ा गया।

इब्राहिम लोदी ने पानीपत में एक लाख सैनिकों और एक हजार हाथियों को लेकर बाबर का सामना किया।

बाबर ने सिंधु को जब पार किया था तो उसके साथ 12,000 सैनिक थे, परंतु उसके साथ वे सरदार और सैनिक भी थे जो पंजाब में उसके साथ मिल गये थे।

बाबर (Babur) की सेना संख्या की दृष्टि से कम थी।

बाबर ने पनीपत में मूलतः रक्षात्मक नीति अपनाई जिसे आवश्यतानुसार आक्रामक बनाया जा सकता था।

बाबर ने अपनी सेना के एक भाग को शहर में टिका दिया जहाँ काफी मकान थे, फिर दूसरे भाग की सुरक्षा के लिए उसने खाई खोदकर उस पर पेड़ों की डालियाँ डाल दी और सामने गाडि़यों की कतार खड़ी करके सुरक्षात्मक दीवार बना ली।

बाबर ने 700 गतिशील गाडि़यों की पंक्ति ‘अराबा’ का निर्माण किया, जिस पर सिपाही अपनी तोपें रखकर गोले चला सकते थे। बाबर इस विधि को आटोमन (रूमी) विधि कहता था क्योंकि इसका प्रयोग आटोमनों ने ईरान के शाह इस्माईल के विरुद्ध हुई प्रसिद्ध लड़ाई में किया था।

बाबर ने तोपों के प्रत्येक जोड़े के बीच तोपचियों की शरण के लिए ‘टूरा’ या बचाव स्थान बनाया।

बाबर ने दो अच्छे निशानेबाज तोपचियों उस्ताद अली और मुस्तफा की सेवाएँ मिली थी।

भारत में बारूद का प्रयोग सबसे पहले बाबर (Babur) ने भीरा के किले पर आक्रमण के समय किया था।

भारतीय बारूद से परिचित थे, लेकिन उसका प्रयोग बाबर के आक्रमण के साथ ही आरंभ हुआ।

12 अप्रैल, 1526 ई. को इब्राहिम लोदी और बाबर (Babur)  की सेनाएँ पानीपत के मैदान में आमने-सामने हुईं।

पनीपत युद्ध का आरंभ 21 अप्रैल 1526 ई. को हुआ।

इब्राहिम लोदी अभी अपनी सेना को संगठित कर ही रहा था कि बाबर की सेना के आगेवाले दोनों अंगों ने चक्कर लगाकर उसकी सेना पर पीछे और आगे से आक्रमण कर दिया।

इब्राहिम अपने सैनिकों के साथ दो या तीन घंटों तक युद्ध करता रहा।

इब्राहिम के अतिरिक्त उसके 15,000 से अधिक सैनिक इस लड़ाई में मारे गये। बाबर ने अपनी विजय का श्रेय अपने तीरंदाजों को दिया है।

बाबर (Babur) इब्राहिम के हाथियों का उल्लेख नहीं के बराबर किया है।
बाबर ने अपनी कृति बाबरनामा में पनीपत के युद्ध को जीतने में मात्र 12,000 सैनिकों के उपयोग किये जाने का उल्लेख किया है।

पनीपत के युद्ध में बाबर ने पहली बार प्रसिद्ध ‘तुलगमा युद्ध नीति’ का प्रयोग किया।

तुलगमा युद्ध पद्धति बाबर (Babur) ने उजबेकों से ग्रहण की थी।

पनीपत युद्ध में बाबर (Babur)  ने तोपों को सजाने में ‘उस्मानी विधि’ (रूमी विधि) का प्रयोग किया था।

पानीपत के ही युद्ध में बाबर ने अपने प्रसिद्ध निशानेबाज उस्ताद अली और मुस्तफा की सेवाएँ ली थीं।

पानीपत के युद्ध में इब्राहीम लोदी बुरी तरह से परास्त हुआ और मारा गया।

पानीपत के युद्ध ने भारत के भाग्य का तो नहीं, किंतु लोदी वंश के भाग्य का निर्णय अवश्य कर दिया।

पानीपत विजय के बाद बाबर ने हुमायूं को आगरा पर और अपने बहनोई मेंहदी ख्वाजा को दिल्ली पर अधिकार करने के लिए भेजा।

27 अप्रैल 1526 को दिल्ली की जामा मस्जिद में बाबर के नाम का खुतबा पढ़ा गया।

अफगानों की शक्ति समाप्त नहीं हुई, लेकिन दुर्बल अवश्य हो गई।

पनीपत युद्ध के पश्चात् दिल्ली तथा आगरा पर ही नहीं, बल्कि धीरे-धीरे लोदी साम्राज्य के समस्त भागों पर भी बाबर ने अधिकार कर लिया।

इब्राहिम लोदी द्वारा आगरा में एकत्र खजाने से बाबर की आर्थिक कठिनाइयाँ दूर हो गई।

पानीपत विजय के बाद बाबर (Babur) ने कहा ‘काबुल की गरीबी अब फिर हमारे लिए नहीं’। पनीपत युद्ध में लूटे गये धन को बाबर ने अपने सैनिक अधिकारियों, नौकरों एवं सगे संबंधियों में बाँट दिया।

पनीपत के में युद्ध लूटे गये धन के बँटवारे में हुमायूँ को कोहिनूर हीरा मिला, जिसे ग्वालियर नरेश राजा विक्रमजीत से छीना गया था।

कोहिनूर हीरे की कीमत इतनी थी कि इसके मूल्य द्वारा पूरे संसार का आधे दिन का खर्च पूरा किया जा सकता था।

भारत विजय के ही उपलक्ष्य में बाबर ने प्रत्येक काबुल निवासी को एक-एक चाँदी का सिक्का उपहार स्वरूप प्रदान किया था। इसलिए उसे ‘कलंदर’ की कहा गया।

पानीपत की लड़ाई में विजय के बाद बाबर (Babur) कहता है कि भारत के लोगों ने अच्छी शत्रुता निभाई, उन्होंने मुगल सेनाओं के आने पर गाँव खाली कर दिये।

खानवा का युद्ध (1527 ई.)

उत्तरी भारत में दिल्ली के सुल्तान के बाद सबसे अधिक शक्तिशाली शासक चित्तौड़ का राजपूत नरेश राणा साँगा (संग्राम सिंह) था।

पूर्वी राजस्थान और मालवा पर आधिपत्य के लिए राणा साँगा और इब्राहिम लोदी के बीच संघर्ष चल रहा था।

राणा साँगा ने इब्राहीम लोदी और बाबर (Babur) के युद्ध में तटस्थता की नीति अपनाई थी।

राणा साँगा सोचता था कि बाबर लूट-मारकर वापस चला जायेगा, तब लोदी-शासन को हटाकर दिल्ली में हिंदू राज्य स्थापित करने का उसे सुयोग प्राप्त होगा।

मालवा के महमूद खिलजी को हराने के बाद राणा साँगा का प्रभाव आगरा के निकट एक छोटी-सी नदी पीलिया खार तक बढ़ गया था।

सिंधु-गंगा घाटी में बाबर (Babur) द्वारा साम्राज्य की स्थापना से राणा साँगा को खतरा बढ़ गया था।

खानवा के युद्ध के कारणों के विषय में इतिहासकारों के कई मत हैं।

पहला, चूँकि पानीपत के युद्ध के पूर्व बाबर एवं राणा साँगा में हुए समझौते के तहत इब्राहिम लोदी के खिलाफ साँगा को बाबर के सैन्य-अभियान में सहायता करनी थी, जिससे राणा साँगा बाद में मुकर गया था। बाबर ने राणा साँगा पर संधि तोड़ने का दोष लगाया है।

बाबर कहता है कि राणा साँगा ने मुझे हिंदुस्तान आने का न्योता दिया और इब्राहिम लोदी के खिलाफ मेरा साथ देने का वादा किया, लेकिन जब मैं दिल्ली और आगरा फतह कर रहा था, तो उसने पाँव भी नहीं हिलाये।

दूसरा, साँगा बाबर को दिल्ली का बादशाह नहीं मानता था।
कुछ इतिहासकारों का मानना है कि यह युद्ध बाबर (Babur) एवं राणा साँगा की महत्त्वाकांक्षी योजनाओं का परिणाम था।

इब्राहिम लोदी के छोटे भाई महमूद लोदी सहित अनेक अफगानों ने यह सोचकर राणा साँगा का साथ दिया कि अगर वह जीत गया, तो शायद उन्हें दिल्ली की गद्दी वापस मिल जायेगी।

मेवात के शासक हसन खाँ मेवाती ने राणा साँगा का पक्ष लिया।

प्रायः सभी राजपूत रियासतों ने राणा की सेवा में अपनी-अपनी सेनाएँ भेजी थी।

बाबर ने राणा साँगा के विरूद्ध ‘जेहाद’ का नारा दिया।

बाबर ने लड़ाई से पहले की शाम उसने अपने आप को सच्चा मुसलमान सिद्ध करने के लिए शराब पीने और बेचने पर प्रतिबंध की घोषणा कर शराब के सभी पात्रों को तुड़वा दिया और शराब न पीने की कसम ली।

बाबर ने मुसलमानों से ‘तमगा कर’ न लेने की भी घोषणा की।

तमगा एक प्रकार का व्यापारिक कर था, जिसे राज्य द्वारा लगाया जाता था।

आगरा से चालीस किलोमीटर दूर फतेहपुर सीकरी के पास खानवा नामक स्थान पर बाबर ने पानीपत की तरह बाहरी पंक्ति में गाडि़याँ लगवाकर और उसके साथ खाई खोदकर दुहरी सुरक्षा की पद्धति अपनाई।

खानवा की लड़ाई में बाबर के अनुसार साँगा की सेना में 2,00,000 से भी अधिक सैनिक थे।

साँगा की सेना में 10,000 अफगान घुड़सवार और इतनी संख्या में हसन खाँ मेवाती के सिपाही थे।

साँगा ने बाबर की दाहिनी सेना पर जबरदस्त आक्रमण किया और उसे लगभग भेद दिया। इसी समय बाबर ने केंद्र-स्थित सैनिकों से, जो गाडि़यों के पीछे छिपे हुए थे, आक्रमण करने के लिए कहा। जंजीरों से गाडि़यों से बँधे तोपखाने को भी आगे बढ़ाया गया।

साँगा की सेना बीच में घिर गई और बाबर के तोपखाने ने काफी सैनिक मार गिराये।

खानवा के युद्ध में साँगा की पराजय हुई और वह घायल हो गया, पर किसी तरह अपने सहयोगियों द्वारा बचा लिया गया।

राणा साँगा को उसके सामंतों ने जहर देकर मार दिया।

खानवा के युद्ध को जीतने के बाद बाबर ने ‘गाजी’ की उपाधि धारण की।

राजस्थान के ऐतिहासिक काव्य ‘वीर विनोद’ में साँगा और बाबर (Babur) के इस युद्ध का वर्णन है।

वीर विनोद‘ के अनुसार बाबर बीस हजार मुगल सैनिकों को लेकर साँगा से युद्ध करने आया था।

बाबर और साँगा की पहली मुठभेड़ बयाना में और दूसरी उसके पास खानवा नामक स्थान पर हुई थी।

खानवा विजय का कारण बाबर के सैनिकों की वीरता नहीं, बल्कि उनका आधुनिक तोपखाना था।

बाबर (Babur) ने राजपूतों के बारे में लिखा है कि ‘वे मरना-मारना तो जानते हैं, किंतु युद्ध करना नहीं जानते।’

आगरा के पूर्व में ग्वालियर और धौलपुर जैसे किलों की शृंखला जीतकर बाबर ने अपनी स्थिति मजबूत कर ली थी।

बाबर ने हसन खाँ मेवाती से अलवर का बहुत बड़ा भाग भी छीन लिया।

चंदेरी का युद्ध (1528 ई.)

खानवा के युद्ध के बाद बाबर (Babur) ने मालवा-स्थित चंदेरी के मेदिनी राय के विरुद्ध अभियान किया।

29 जनवरी, 1528 ई. को चंदेरी के युद्ध में बाबर ने वहाँ के सूबेदार मेदिनी राय को पराजित किया।

चंदेरी के युद्ध के बाद बाबर (Babur) ने राजपूताना के कटे हुए सिरों की मीनार बनवाई तथा ‘जेहाद’ का नारा दिया।

मेदिनी राय की दो पुत्रियों का विवाह कामरान एवं हुमायूँ से किया गया।

घाघरा का युद्ध (1529 ई.)

अफगान यद्यपि हार गये थे, लेकिन पूर्वी उत्तर प्रदेश अब भी अफगान सरदारों के हाथ में था।

अफगानों ने बाबर की अधीनता को स्वीकार तो कर लिया था, लेकिन उसे उखाड़ फेंकने को भी तैयार थे।

अफगान सरदारों की पीठ पर बंगाल के सुल्तान नुसरतशाह का हाथ था, जो इब्राहिम लोदी का दामाद था।

अफगान सरदार कई बार पूर्वी उत्तर प्रदेश से मुगल कर्मचारियों को निकाल बाहर कर चुके थे और कन्नौज पहुँच गये थे। परंतु अफगान सरदारों में किसी सर्वमान्य नेता का अभाव था।

इब्राहिम लोदी का भाई महमूद लोदी, जो खानवा में बाबर से लड़ चुका था, अफगानों के निंमंत्रण पर बिहार पहुँचा।

अफगानों ने महमूद लोदी को अपना सुल्तान मान लिया और उसके नेतृत्व में इकट्ठे हो गये।

बाबर ने 1529 ई. के शुरू में आगरा से पूर्व की ओर प्रस्थान किया।

बनारस के निकट गंगा पार करके घाघरा नदी के निकट बाबर ने 6 मई, 1529 ई. को अफगानों और बंगाल के नुसरत शाह की सम्मिलित सेना का सामना किया।

बाबर (Babur) ने अफगान तथा बंगाली सेनाओं को लौटने पर मजबूर कर दिया, पर वह निर्णायक युद्ध नहीं जीत सका।

बीमार बाबर (Babur) ने बंगाल के शासक नुसरत शाह से समझौता करने का निर्णय किया। नुसरतशाह ने बाबर को आश्वासन दिया कि वह बाबर के शत्रुओं को अपने साम्राज्य में शरण नहीं देगा और बाबर आगरा लौट गया।

मुगल राज्य की स्थापना

इब्राहिम लोदी और राणा साँगा की पराजय के बाद बाबर (Babur) ने भारत में मुगल राज्य की स्थापना की और आगरे को अपनी राजधानी बनाया।

सुल्तानों की राजधानी दिल्ली थी, किंतु बाबर (Babur) ने उसे राजधानी नहीं बनाया, क्योंकि वहाँ पठान थे, जो तुर्कों की शासन-सत्ता पसंद नहीं करते थे।

प्रशासन और रक्षा दोनों दृष्टियों से बाबर को दिल्ली के मुकाबले आगरा अधिक उपयुक्त लगा था।

मध्य एशिया में शासकों का सबसे बड़ा पद खान था, जो मंगोलवासियों को ही दिया जाता था।

दूसरे बड़े शासक अमीर कहलाते थे। बाबर का पूर्वज तैमूर भी अमीर ही कहलाता था।

भारत में दिल्ली के मुस्लिम शासक सुल्तान कहलाते थे।

बाबर ने अपना पद बादशाह घोषित किया और उसके बाद सभी मुगल सम्राट बादशाह कहलाये।

बाबर ने केवल चार वर्ष भारत पर राज्य किया।

लगभग 48 वर्ष की आयु में 26 दिसंबर, 1530 ई. को बाबर की आगरा में मृत्यु हो गई।

प्रारंभ में उसके शव को आगरा के आराम बाग में रखा गया, पर अंतिम रूप से बाबर की अंतिम इच्छानुसार उसका शव काबुल ले जाकर दफनाया गया, जहाँ उसका मकबरा बना हुआ है।
बाबर के बाद उसका ज्येष्ठ पुत्र हुमायूँ मुगल बादशाह बना।

कुषाण साम्राज्य के पतन के बाद संभवतः बाबर (Babur) ऐसा पहला शासक था, जिसके उत्तर-भारत के साम्राज्य में काबुल और कंधार सम्मिलित हुए थे।

उत्तर भारत में बाबर ने लोदियों और साँगा के नेतृत्व में संयुक्त राजपूत शक्ति को समाप्त कर ‘मुगल साम्राज्य’ की स्थापना की।

बाबर ने सड़कों की माप के लिए ‘गज-ए-बाबरी’ के प्रयोग का शुभारंभ किया।

बाबर (Babur) ने भारत को एक नई युद्ध-पद्धति दी।

बाबर से पहले भारतीय गोला-बारूद से परिचित थे, लेकिन बाबर ने यह दिखा दिया कि तोपखाने और घुड़सेना का कुशल संयुक्त-संचालन कितनी सफलता प्राप्त करा सकता है।

बाबर (Babur) की विजयों ने भारत में बारूद और तोपखाने को शीघ्र ही लोकप्रिय बना दिया और इस प्रकार किलों का महत्त्व कम हो गया।

अपनी नई सैनिक पद्धति और व्यक्तिगत व्यवहार से बाबर ने राजा के उस महत्त्व को पुनःस्थापित किया जो फिरोज तुगलक की मृत्यु के बाद कम हो गया था।

सिकंदर लोदी और इब्राहिम लोदी ने राजा के सम्मान को फिर से स्थापित करने का प्रयत्न किया था, लेकिन अफगानों की जातीय स्वतंत्रता और बराबरी की भावनाओं के कारण उन्हें आंशिक सफलता ही प्राप्त हुई।

बाबर (Babur) एशिया के दो महान् योद्धाओं तैमूर और चंगेज का वंशज था, इसलिए उसके सरदार उससे बराबरी की माँग नहीं कर सकते थे।

बाबर की स्थिति को चुनौती कोई तैमूरी राजकुमार ही दे सकता था।

बाबर (Babur) ने तुर्की भाषा में अपनी आत्मकथा ‘बाबरनामा‘ की रचना की, जिसका फारसी भाषा में अनुवाद बाद में अब्दुल रहीम खानखाना ने किया।

लीडेन एवं अर्सकिन ने 1826 ई. में ‘बाबरनामा’ का अंग्रेजी भाषा में अनुवाद किया। बेवरिज ने ‘बाबरनामा’ का एक संशोधित अंग्रेजी संस्करण निकाला।

बाबर (Babur) को ‘मुबइयान‘ नामक पद्य शैली का जन्मदाता माना जाता है।

बाबर (Babur) ने ‘खत-ए-बाबरी’ नामक एक लिपि का भी आविष्कार किया था।

बाबर (Babur) ने अपनी आत्मकथा बाबरनामा में केवल पाँच मुस्लिम शासकों- बंगाल, दिल्ली, मालवा, गुजरात एवं बहमनी राज्यों तथा दो हिंदू शासकों मेवाड़ एवं विजयनगर का उल्लेख किया है।

बाबर अपने बेगों का बहुत ध्यान रखता था और अगर वे विद्रोही ने हों तो उनकी कई गलतियाँ माफ कर देता था।

बाबर (Babur) पुरातनपंथी सुन्नी था, लेकिन वह धर्मांध नहीं था और न ही धार्मिक भावना से काम लेता था।

बाबर ने साँगा के विरुद्ध ‘जेहाद’ की घोषणा किया था और जीत के बाद ‘गाजी’ की उपाधि भी धारण की थी, किंतु उसका कारण स्पष्टतः राजनीतिक था।

बाबर अरबी और फारसी का अच्छा ज्ञाता था। बाबर की मातृभाषा तुर्की थी।

बाबर (Babur) की आत्मकथा ‘तुजुक-ए-बाबरी‘ विश्व-साहित्य की एक क्लासिकल रचना है।

बाबर (Babur) ने भारतीय पशु-पक्षियों और प्रकृति का काफी विस्तार से वर्णन किया है।

बाबर (Babur) शायर भी था और उसने रुबाईयों का अपना दीवान भी तैयार किया था।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *