मराठा साम्राज्य का उत्कर्ष : छत्रपति शिवाजी (Rise of Maratha Empire and Chhatrapati Shivaji)

जिस प्रकार विजयनगर के उत्थान से भारतीय राजनीति में एक महत्त्वपूर्ण तत्व आया था, वैसे ही सत्रहवीं सदी के उत्तरार्द्ध में मराठा शक्ति के उत्थान से हुआ।

भारतीय इतिहास के पूर्व मध्यकाल में मराठों की राजनैतिक एवं सांस्कृतिक कार्यों में उज्ज्वल परंपराएँ थीं।

उस समय मराठों ने देवगिरी के यादवों के अधीन राष्ट्रीय पक्ष का समर्थन किया था।

अलाउद्दीन के समय में यादव रामचंद्रदेव के पतन के साथ मराठों की स्वतंत्रता नष्ट हो गई, परंतु चालीस वर्षों में वे पुनः बहमनी राज्य में तथा आगे चलकर उत्तरगामी सल्तनतों में महत्त्वपूर्ण भाग लेने लगे।

सत्रहवीं सदी में छत्रपति शिवाजी (Chhatrapati Shivaji) राजे भोसले (1630-1680) ने पश्चिम भारत में राष्ट्रीय राज्य के रूप में मराठा साम्राज्य की नींव रखी।

मराठों के उत्कर्ष के कारण

प्रथमतः महाराष्ट्र के लोगों के चरित्र तथा इतिहास को ढ़ालने में वहाँ के भूगोल का गहरा प्रभाव पड़ा।

मराठा देश दो तरफ से पहाड़ की श्रेणियों से घिरा है- सह्यद्रि उत्तर से दक्षिण तक फैला हुआ है तथा सतपुड़ा एवं विंध्य पूर्व से पश्चिम तक फैले हुए हैं।

मराठा देश नर्मदा एवं ताप्ती नदियों द्वारा रक्षित है। इसमें आसानी से प्रतिरक्षित हो सकनेवाले बहुत से पहाड़ी दुर्ग थे।

मराठा देश अश्वारोहियों के एक धक्के से अथवा एक वर्ष तक आक्रमण करने पर भी आसानी से नहीं जीता जा सकता था।

मराठा देश की ऊबड़-खाबड़ एवं अनुर्वर भूमि, इसकी अनिश्चित एवं कम वर्षा और कृषि-संबंधी अल्प-साधनों के कारण मराठे विषय-सुख एवं आलस्य के दोषों से बचे रहे तथा उन्हें अपने में आत्म-निर्भरता, साहस, अध्यवसाय, कठोर सरलता, रुक्ष खरापन, सामाजिक समानता की भावना का विकास करने में सहायता मिली।

13वीं सदी में महाराष्ट्र में पंढ़रपुर आंदोलन आरंभ हुआ, इसके प्रारंभिक संतों-संत ज्ञानेश्वर, हेमाद्रि और चक्रधर ने महाराष्ट्र के निवासियों में धार्मिक जागरण और सामाजिक एकता का बीजारोपण किया।

पंढ़रपुर आंदोलन ने कृष्ण के अवतार विठोबा की पूजा पर जोर दिया और कर्मकांड तथा जातिप्रथा का विरोध कर आचरण की पवित्रता पर बल दिया।

एकनाथ, तुकाराम, रामदास और वामन पंडित इन मराठा धर्म-सुधारकों ने सदियों से ईश्वर-भक्ति, ईश्वर के सामने सभी मनुष्यों की समानता का प्रचार किया था।

मराठा धर्म-सुधारकों ने अपने देश में पुनर्जागरण अथवा आत्म-जागरण के बीजों का रोपण कर दिया था, जो सामान्यतया किसी राजनैतिक क्रांति की पृष्ठभूमि प्रस्तुतकर उसके आगमन का पूर्वाभास प्रस्तुत करते हैं।

शिवाजी के गुरु रामदास समर्थ ने स्वदेशवासियों के मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव डाला था। उन्होंने मठों के अपने शिष्यों एवं अपनी प्रसिद्ध कृति ‘दासबोध’ के द्वारा समाज-सुधार तथा राष्ट्रीय पुनर्जीवन के आदर्शों से प्रेरित किया।

साहित्य एवं भाषा से महाराष्ट्र के लालों को एकता का एक और बंधन मिला था।

मराठा धर्म-सुधारकों के भक्ति-गीत मराठी भाषा में लिखे गये जिसके फलस्वरूप पंद्रहवीं तथा सोलहवीं सदियों में मराठा साहित्य का विकास हुआ।

वास्तव में सत्रहवीं सदी में महाराष्ट्र में, शिवाजी द्वारा राजनैतिक एकता प्रदान किये जाने के पहले ही, भाषा, धर्म एवं जीवन की एक विलक्षण एकता स्थापित हो गई थी।

जिस समय बहमनी सल्तनत का पतन हो रहा था, उस समय मुगल साम्राज्य अपने चरमोत्कर्ष पर था।

विशाल मुगल साम्राज्य बगावतों से दूर और विलासिता में डूबा हुआ था जब शाहजहाँ का शासन था और शहजादा औरंगजेब दक्कन का सूबेदार था।

बहमनी के सबसे शक्तिशाली परवर्ती राज्यों में बीजापुर तथा गोलकुंडा के राज्य थे।

बहमनी राज्य और बाद के निजामशाही ओर आदिलशाही राज्यों ने मराठों के राजनीतिक और सैनिक प्रशिक्षण का अवसर प्रदान किया।

शाहजी ने अहमदनगर के सुल्तान की सेवा में एक अश्वारोही के रूप में अपना जीवन आरंभ किया था।

शाहजहाँ द्वारा अहमदनगर पर अधिकार के बाद 1636 ई. में शाहजी ने बीजापुर राज्य में नौकरी कर ली और पूना की उनकी पुरानी जागीर के अतिरिक्त उन्हें कर्नाटक में एक विस्तृत जागीर मिली।

दक्कन की सल्तनतों में काम करने के कारण मराठों ने राजनैतिक एवं सैनिक शासन का कुछ पूर्व-अनुभव भी प्राप्त कर लिया था।

छत्रपति शिवाजी (Chhatrapati Shivaji)

शिवाजी (Shivaji) का जन्म शाहजी भोसले की प्रथम पत्नी जीजाबाई (राजमाता जिजाऊ) की कोख से 19 फरवरी, 1630 ई. को जुन्नार के निकट शिवनेर के पहाड़ी दुर्ग में हुआ था।

शिवाजी (Shivaji) तथा उसकी माँ जीजाबाई को दादाजी कोणदेव नामक एक ब्राह्मण की संरक्षकता में छोड़कर शाहजी अपनी दूसरी पत्नी तुकाबाई मोहिते के साथ अपनी जागीर में चले गये।

शिवाजी (Shivaji) का बचपन राजाराम, गोपाल, संतों तथा रामायण, महाभारत की कहानियों और सत्संग मे बीता।

शिवाजी (Shivaji) को विधिवत् कोई साहित्यिक शिक्षा मिली थी अथवा नहीं, परंतु वह एक वीर एवं साहसी सैनिक थे।

शिवाजी (Shivaji) का विवाह 14 मई, 1640 ई. में सइबाई निंबालकर के साथ लालमहल पूना में संपन्न हुआ था।

शिवाजी (Shivaji) अपनी माँ की ओर से देवगिरि के यादवों तथा पिता की ओर से मेवाड़ के वीर सिसोदियों का वंशज होने का दावा करते थे।

गौरवपूर्ण वंश के होने की भावना तथा प्रारंभिक प्रशिक्षण ने शिवाजी (Shivaji) जैसे मराठा सैनिक के मन में एक स्वतंत्र राज्य की स्थापना करने की आकांक्षाएँ जगा दी।

शिवाजी (Shivaji) ने अपने संरक्षक कोणदेव की सलाह पर बीजापुर के सुल्तान की सेवा करना अस्वीकार कर दिया।

बीजापुर का राज्य आपसी संघर्ष तथा विदेशी आक्रमणों के दौर से गुजर रहा था। ऐसे साम्राज्य के सुल्तान की सेवा करने के बदले शिवाजी (Shivaji) मावलों को बीजापुर के खिलाफ संगठित करने लगे।

मावल प्रदेश पश्चिमी घाट से जुड़ा है और कोई 150 किलोमीटर लंबा और 30 कि.मी. चैड़ा है।

मावल प्रदेश में मराठा और सभी जाति के लोग रहते हैं जो संघर्ष-पूर्ण जीवन व्यतीत करने के कारण कुशल योद्धा माने जाते हैं।

शिवाजी ने मावलों को संगठित किया और उनसे संपर्क कर उनके प्रदेश से परिचित हुये।

दक्कन की सल्तनतों की बढ़ती हुई दुर्बलता तथा उत्तर में शाही दल के लंबी अवधि तक युद्ध करते रहने के कारण मराठा शक्ति के उत्थान में बड़ी सहायता मिली।

आपसी संघर्ष तथा मुगलों के आक्रमण से परेशान बीजापुर के सुल्तान आदिलशाह ने बहुत से दुर्गों से अपनी सेना हटाकर उन्हें स्थानीय शासकों या सामंतों के हाथ सौंप दिया था।

आदिलशाह के बीमार पड़ने पर शिवाजी ने अवसर का लाभ उठाकर बीजापुर में प्रवेश का निर्णय लिया।

दुर्गों पर नियंत्रण

1644 में शिवाजी (Shivaji) ने पूना जिले की पश्चिमी पट्टी पर अधिकार कर लिया, जिसे ‘बारह मालव’ कहते थे।

1646 ई. में शिवाजी (Shivaji) ने तोरण के दुर्ग को बीजापुर के किलेदार से छीन लिया।

तोरण का दुर्ग पूना के दक्षिण पश्चिम में 30 किलोमीटर की दूरी पर था।

शिवाजी (Shivaji) ने पुश्तैनी मालिकों अथवा बीजापुर के स्थानीय अफसरों से बल, रिश्वत या छल के द्वारा बहुत-से किलों पर अधिकार किया।

शिवाजी (Shivaji) ने सुल्तान आदिलशाह के पास खबर भिजवाई कि वे पहले किलेदार की तुलना में बेहतर रकम देने को तैयार हैं और यह क्षेत्र उन्हें सौंप दिया जाए।

दरबारियों की सलाह पर आदिलशाह ने शिवाजी ( Shivaji) को तोरण दुर्ग का अधिपति बना दिया।

तोरण दुर्ग में मिली संपत्ति से शिवाजी (Shivaji) ने किले को सुदृढ़ करवाया और 10 किलोमीटर दूर राजगढ़ के दुर्ग पर भी अधिकार कर लिया।

शिवाजी (Shivaji) की इस साम्राज्य-विस्तार की नीति की भनक जब आदिलशाह को मिली, तो वह क्षुब्ध हो गया।

आदिलशाह ने शाहजी राजे को अपने पुत्र को नियंत्रण में रखने की सलाह दी।

शिवाजी (Shivaji) ने अपने पिता की परवाह किये बिना अपने पिता के क्षेत्र का प्रबंध अपने हाथों में ले लिया और नियमित लगान देना बंद कर दिया।

राजगढ़ के बाद शिवाजी (Shivaji) ने चाकन और कोंडना के दुर्ग पर अधिकार कर लिया।

कोंडना (कोंढाणा) पर अधिकार करते समय उन्हें घूस देनी पड़ी।

कोंडना पर अधिकार करके उसका नाम सिंहगढ़ रखा गया।

शाहजी राजे को पूना और सूपा की जागीरदारी मिली थी और सूपा का दुर्ग उनके संबंधी बाजी मोहिते के हाथ में थी।

शिवाजी महाराज (Shivaji) ने रात के समय सूपा के दुर्ग पर आक्रमण करके दुर्ग पर अधिकार कर लिया और बाजी मोहिते को शाहजी राजे के पास कर्नाटक भेज दिया।

पुरंदर के किलेदार की मृत्यु होने पर किले के उत्तराधिकार के लिए उसके तीनों बेटों में लड़ाई छिड़ गई।

शिवाजी (Shivaji) दो भाइयों के निमंत्रण पर पुरंदर पहुँचे और कूटनीति का सहारा लेते हुए उन्होंने सभी भाइयों को बंदी बना लिया और पुरंदर के किले पर भी उनका अधिकार कर लिया।

शिवाजी (Shivaji) 1647 ई. तक चाकन से लेकर नीरा तक के भू-भाग के अधिपति बन चुके थे और कुछ नये किले भी बनवाये।

अपनी बढ़ी सैनिक शक्ति के साथ शिवाजी ने मैदानी इलाकों में प्रवेश करने की योजना बनाई।

शिवाजी (Shivaji) ने एक अश्वारोही सेना का गठनकर आबाजी सोंदेर के नेतृत्व में कोंकण के विरुद्ध एक सेना भेजी।

आबाजी ने कोंकण सहित नौ अन्य दुर्गों पर अधिकार कर लिया। इसके अलावा ताला, मोस्माला और रायटी के दुर्ग भी शिवाजी के अधीन आ गये। लूट की सारी संपत्ति रायगढ़ में सुरक्षित रखी गई।

बीजापुर का सुल्तान शिवाजी ( Shivaji) की हरकतों से आक्रोश में था।
बीजापुर के सुल्तान ने शिवाजी के पिता को विश्वासघाती सहायक बाजी घोरपड़े की सहायता से बंदी बना लिया।

बीजापुर के दो सरदारों की मध्यस्थता के बाद शाहजी को इस शर्त पर मुक्त किया गया कि वे शिवाजी (Shivaji) पर लगाम कसेंगे।

शिवाजी (Shivaji) को कुछ वर्षों के लिए (1649-1655 ई.) बीजापुर के विरुद्ध आक्रमणकारी कार्य स्थगित कर दिये और इस समय का उपयोग कर अपनी सेना को संगठित किया।

शाहजी की मुक्ति की शर्तों के मुताबिक शिवाजी (Shivaji) ने बीजापुर के क्षेत्रों पर आक्रमण तो नहीं किया, पर उन्होंने दक्षिण-पश्चिम में अपनी शक्ति बढ़ाने की चेष्टा की।

जावली का राज्य सातारा के सुदूर उत्तर पश्चिम में वामा और कृष्णा नदी के बीच में स्थित था।

जावली के राजा चंद्रराव मोरे ने बीजापुर के सुल्तान के साथ साठगाँठ कर ली थी।

जावली दुर्ग का किलेदार चंद्रराव मोरे स्वयं को मौर्यों का वंशज और उच्च वर्ग का मराठा मानता था।

जनवरी, 1656 ई. में शिवाजी (Shivaji) ने अपनी सेना लेकर जावली पर आक्रमणकर दुर्ग पर अधिकार कर लिया।

जावली दुर्ग से शिवाजी (Shivaji) को बहुत संपत्ति मिली और कई मावल सैनिक भी शिवाजी की सेना में सम्मिलित हो गये।

मुगलों से पहली मुठभेड़ (1657 ई.)

मुगलों के साथ शिवाजी (Shivaji) की सबसे पहली मुठभेड 1657 ई. में हुई।

शहजादा औरंगजेब और उसकी सेना बीजापुर पर आक्रमण करने में लगी हुई थी।

शिवाजी (Chhatrapati Shivaji) ने अहमदनगर एवं जुन्नार के मुगल जिलों पर हमला कर दिया तथा जुन्नार नगर को लूट लिया।

औरंगजेब शिवाजी (Shivaji) से रुष्ट हो गया और शाहजहाँ के आदेश पर उसने बीजापुर के साथ संधि कर ली।

समय विपरीत देखकर शिवाजी (Shivaji) ने मुगलों की अधीनता स्वीकार कर ली।

औरंगजेब ने शिवाजी (Shivaji) पर कभी विश्वास नहीं किया, किंतु उसने संधि कर ली क्योंकि इसी समय शाहजहाँ बीमार पड़ गया था और उत्तर में उसकी उपस्थिति आवश्यक हो गई थी।

कोंकण पर अधिकार

दक्षिण भारत में औरंगजेब की अनुपस्थिति और बीजापुर की डावाँडोल राजनैतिक स्थिति का लाभ उठाकर शिवाजी ने जंजीरा पर आक्रमण कर दक्षिण कोंकण पर अधिकार कर लिया और दमन के पुर्तगालियों से वार्षिक कर एकत्र किया।

शिवाजी (Shivaji) ने कल्याण, भिवाणी तथा माहुली पर अधिकार वहाँ नौसैनिक अड्डा स्थापित किया और दक्षिण में वे माहद तक पहुँच गये।

इस समय तक शिवाजी (Shivaji) 40 दुर्गों के मालिक बन चुके थे।

बीजापुर से संघर्ष

बीजापुर के सुल्तान ने शिवाजी की शक्ति का नाश करने के लिए 1659 ई. के प्रारंभ में एक प्रमुख सरदार एवं सेनापति अब्दुल्लाह भटारी (अफजल खाँ) के अधीन एक विशाल सेना शिवाजी (Shivaji) के विरुद्ध भेजी।

अफजल खाँ तुलजापुर के मंदिरों को नष्ट करता हुआ वह सतारा के 30 किलोमीटर उत्तर वाई, शिरवल के नजदीक तक आ गया, पर शिवाजी (hivaji) प्रतापगढ़ के दुर्ग पर ही रहे।

अफजल खाँ ने अपने एक दूत मराठा ब्राहमण कृष्णजीभास्कर कुलकर्णी को संधि-वार्ता के लिए भेजा।

शिवाजी (Shivaji) ने कृष्णजीभास्कर को उचित सम्मान देकर अपने दरबार में रख लिया और अपने दूत गोपीनीथ को वस्तुस्थिति का जायजा लेने अफजल खाँ के पास भेजा।

गोपीनाथ और कृष्णजीभास्कर से शिवाजी को ऐसा लगा कि संधि का षड्यंत्र रचकर अफजल खाँ शिवाजी (Shivaji) को बंदी बनाना चाहता है जिससे शिवाजी सावधान हो गये।

शिवाजी (Shivaji) ने युद्ध के बदले अफजल खाँ को एक बहुमूल्य उपहार भेजा और इस तरह अफजल खाँ को संधि-वार्ता के लिए राजी किया।

संधि-स्थल पर जब दोनों मिले तो अफजल खाँ ने अपने कटार से शिवाजी (Shivaji) पर वार कर दिया जिसके बचाव मे शिवाजी ने अफजल खाँ को अपने वस्त्रांे में छिपाये झिलम (बाघनख) से मार डाला।

शिवाजी (Shivaji) ने अपनी सेना की मदद से, जो छिपकर बैठी थी, बीजापुर की नेतृत्वविहीन सेना को हरा दिया तथा उसके पड़ाव को लूट लिया।

खाफी खाँ तथा डफ शिवाजी पर अफजल की हत्या करने का अभियोग लगते हैं। परंतु मराठा लेखकों ने अफजल के प्रति किये गये शिवाजी (Shivaji) के व्यवहार को न्यायोचित ठहराया है।

समकालीन कारखानों (फैक्टरियों) के प्रमाण मराठा इतिहासकारों के कथन से मेल खाते हैं।

शिवाजी (Shivaji) दक्षिण कोंकण तथा कोल्हापुर जिले में घुस गये, किंतु जुलाई, 1660 ई. में पनहाला दुर्ग में उनको बीजापुर की एक सेना ने घेर लिया।

शिवाजी (Shivaji) संकट में फँस चुके थे, किंतु रात्रि के अंधकार का लाभ उठाकर वे भागने में सफल रहे।

कर्नाटक में सिद्दीजौहर के विद्रोह के कारण बीजापुर के सुल्तान ने शाहजी की मध्यस्थता से, जो अब भी बीजापुर राज्य में एक महत्त्वपूर्ण पद पर था, शिवाजी के साथ 1662 ई. में एक अल्पकालीन संधि की जिसके अनुसार उत्तर में कल्याण से लेकर दक्षिण में पोंडा तक का और पूर्व में इंदापुर से लेकर पश्चिम में दावुल तक का भूभाग शिवाजी के नियंत्रण में आ गया।

बीजापुर के सुल्तान ने शिवाजी (Shivaji) को स्वतंत्र शासक की मान्यता दी।

मुगलों के साथ संघर्ष

बादशाह बनने के बाद औरंगजेब ने शिवाजी (Shivaji) पर नियंत्रण रखने के उद्येश्य से अपने मामा शाइस्ता खाँ को दक्षिण का सूबेदार नियुक्त किया।

शाइस्ता खाँ ने पूना जीता, चाकन के दुर्ग पर अधिकार किया तथा मराठों को कल्याण जिले से मार भगाया।

लगभग दो वर्षों के अनियमित युद्ध के पश्चात् शिवाजी ने 5 अप्रैल, 1663 ई. को 350 मवलों के साथ के साथ मुगल सूबेदार शाइस्ता खाँ के कमरे में घुसकर हमला किया।

शाइस्ता तो खिड़की के रास्ते बच निकला, किंतु उसके हाथ का अँगूठा कट गया और उसके पुत्र एवं रक्षकों का कत्ल कर दिया गया।

शिवाजी (Shivaji) सकुशल सिंहगढ़ के पाश्र्ववर्ती दुर्ग में चले गये।

औरंगजेब ने शाइस्ता की जगह शाहजादा मुअज्जम को दकन का सूबेदार बनाया और शाइस्ता को बंगाल की सूबेदारी दे दी।

शिवाजी (Shivaji) ने 16 से लेकर 20 जनवरी, 1664 ई. के बीच पश्चिमी समुद्रतट के सबसे समृद्ध बंदरगाह सूरत पर आक्रमण कर उसे छः दिनों तक लूटा।

सूरत उस समय पश्चिमी व्यापारियों का गढ़ था और हिंदुस्तानी मुसलमानों के लिए हज पर जाने का द्वार।

सूरत की लूट में मराठा नायक को लगभग एक करोड़ रुपये से अधिक की संपत्ति मिली।

सूरत की लूट का जिक्र डच तथा अंग्रेजों ने अपने लेखों में किया है।

सूरत में शिवाजी (Shivaji) की लूट से खिन्न होकर औरंगजेब ने शिवाजी को दंड देने के लिए 1665 ई. के प्रारंभ में अंबर के राजा जयसिंह तथा दिलेर खाँ की एक भारी फौज के साथ दक्कन भेजा।

जयसिंह ने बीजापुर के सुल्तान, यूरोपीय शक्तियों तथा छोटे सामंतों का सहयोग लेकर शिवाजी (Shivaji) पर आक्रमण किया।

जयसिंह ने शिवाजी (Shivaji) के चारों ओर शत्रुओं का एक घेरा बनाकर पुरंदर के गढ़ पर घेरा डाल दिया। मुगलों ने शिवाजी की राजधानी राजगढ़ भी घेर लिया।

शिवाजी (Shivaji) को 22 जून, 1665 ई. को जयसिंह के साथ पुरंदर की संधि करनी पड़ी।

पुरंदर की संधि की शर्तों के अनुसार शिवाजी को अपने तेईस किले मुगलों को देने पड़े, जिनकी आमदनी चार लाख हूण वार्षिक थी।

अब शिवाजी के पास केवल 12 दुर्ग ही रह गये।

बालाघाट और कोंकण के क्षेत्र शिवाजी को मिले, किंतु इसके बदले में उन्हें 40 लाख हूण 13 किस्तों में देना था।

इसके अलावा शिवाजी (Shivaji) ने प्रतिवर्ष 5 लाख हूण का राजस्व और दक्कन में मुगल सेना का सहयोग करने के लिए पाँच हजार घुड़सवार देने का भी वादा किया।

शिवाजी को राज्य के घाटे की पूर्ति के लिए बीजापुर राज्य के कुछ जिलों में चौथ एवं सरदेशमुखी वसूल करने की अनुमति मिल गई।

औरंगजेब के दरबार में उपस्थित होने को राजी करने के लिए जयसिंह ने शिवाजी (Shivaji) से पुरस्कार एवं प्रतिष्ठा की प्रतिज्ञा की, आगरे में उसकी सुरक्षा के उत्तरदायित्व की शपथ खाई और इस प्रकार उन्हें आगरा चलने के लिए राजी किया।

ज्योतिषियों के आश्वासन तथा अपने निकटस्थ पदाधिकारियों की सहमति लेकर वह अपने पुत्र शंभाजी के साथ 9 मई, 1666 ई. को आगरा पहुँच गये।

शिवाजी (Shivaji) स्वयं औरंगजेब के दरबार में उपस्थित होने से मुक्त कर दिये गये, किंतु उनके पुत्र शंभाजी को मुगल दरबार में बंधक रख दिया गया।

औरंगजेब ने शिवाजी (Shivaji) को ‘राजा’ की उपाधि दी।

शिवाजी (Shivaji) आगरा गये, किंतु वहाँ उन्हें उसे पाँच हजारी मनसब की श्रेणी दी गई। इसके विरुद्ध उन्होंने अपना रोष भरे दरबार में दिखाया और औरंगजेब पर विश्वासघात का आरोप लगाया।

औरंगजेब ने क्षुब्ध होकर शिवाजी को नजरबंद करवा दिया।

अपने असाधारण साहस और युक्ति के बल पर शिवाजी (Shivaji) और शंभाजी दोनों 17 अगस्त, 1666 को आगरा से भागने में सफल हो गये।

शंभाजी को मथुरा में एक विश्वासी ब्राह्मण के यहाँ छोड़कर शिवाजी (Shivaji) भिखारी के वेश में इलाहाबाद, बनारस, गया एवं तेलगाना के रास्ते 30 नवंबर, 1666 ई. को राजगढ़ पहुँचे।

औरंगजेब ने संदेह के आधार पर विष देकर जयसिंह की हत्या करवा दी।

जसवंत सिंह के द्वारा पहल करने के बाद 1668 ई. में शिवाजी ने मुगलों के साथ दूसरी बार संधि की।

औरंगजेब ने उसे राजा की उपाधि और बरार में एक जागीर दी तथा उसके पुत्र शंभाजी को पाँच हजारी सरदार के पद पर नियुक्त कर लिया।

शिवाजी (Shivaji) को पूना, चाकन और सूपा का जिले लौटा दिये गये, परंतु सिंहगढ़ और पुरंदर पर मुगलों का अधिपत्य बना रहा।

परंतु 1670 ई. में मुगल सूबेदार शाहआलम तथा उसके सहायक दिलेर खाँ के बीच भारी झगड़े के कारण शाही दल की स्थिति पहले की अपेक्षा अधिक कमजोर हो गई।

शिवाजी (Shivaji) ने अक्टूबर, 1670 ई. में सूरत को दूसरी बार लूटा।

1672 ई. में शिवाजी (Shivaji) ने सूरत से चैथ की माँग की।

छत्रपति शिवाजी (Chhatrapati Shivaji) का राज्याभिषेक

पश्चिमी महाराष्ट्र में अपने स्वतंत्र राष्ट्र की स्थापना के बाद छत्रपति शिवाजी (Chhatrapati Shivaji) ने अपना राज्याभिषेक करना चाहा।

शिवाजी (Shivaji) जाति से कुर्मी थे, जिसे ब्राह्मण वर्ग शूद्र माना जाता था, इसलिए उनके राज्याभिषेक में कई समस्याएँ आईं।

पेशवा, जो स्वयं ब्राह्मण था, ने शिवाजी (Shivaji)  के क्षत्रिय होने का सार्वजनिक रूप से विरोध किया।

ब्राह्मणों ने शिवाजी (Shivaji) के द्वारा किये गये जाने-अनजाने पापों की सूची बनाई, जिसमें भूलवश युद्ध के दौरान गोवध भी शामिल था। इसके आधार पर दंड-निर्धारण किया गया और 11,000 ब्राह्मणों को परिवार सहित भोजन, वस्त्र और अन्य सामग्री चार महीने तक देना पड़ा।

शिवाजी के निजी सचिव बालाजी रावजी के प्रयास से बनारस के गंगाभट्ट नामक ब्राह्मण ने एक लाख रुपये घूस लेकर 16 जून, 1674 ई. को रायगढ़ में छत्रपति शिवाजी (Chhatrapati Shivaji) का विधिवत् राज्याभिषेक किया।

राजतिलक के समय पर शिवाजी को स्वर्ण मुकुट पहनाया गया और बहुमूल्य रत्नों और स्वर्ण पुष्पों की वर्षा की गई।

विभिन्न राज्यों के दूतों, प्रतिनिधियों के अलावा विदेशी व्यापारियों को भी राजतिलक समारोह में आमंत्रित किया गया था।

सूरत में अंग्रेजी फैक्ट्री के मुख्य हेनरी ओक्सेंडेंग ने राजतिलक समारोह अपनी आँखों से देखा था।

राजतिलक समारोह के दौरान शिवाजी (Shivaji) ने अपना हिरण्यगर्भ संस्कार कराया और ‘छत्रपति’ की उपाधि धारण की।

बहुत-सा धन देकर असंतुष्ट ब्राह्मणों को प्रसन्न करने का प्रयास किया गया, किंतु पुणे के ब्राह्मणों ने शिवाजी को राजा मानने से इनकार कर दिया।

राज्याभिषेक के 12 दिन बाद शिवाजी की माता का देहांत हो गया, इसलिए 4 अक्टूबर, 1674 ई. को उनका दुबारा राज्याभिषेक हुआ।

एक स्वतंत्र शासक की तरह शिवाजी (Shivaji) ने अपने नाम के सिक्के चलवाये।

शिवाजी ने गोलकुंडा के सुल्तान से मित्रता कर 1677-78 ई. में जिंजी, वेलोर तथा पाश्र्ववर्ती जिले जीत लिया। इसमें सौ किले थे और उन्हें बीस लाख हूण का वार्षिक राजस्व प्राप्त होता था।

छत्रपति शिवाजी (Chhatrapati Shivaji) का अंतिम अभियान 1679 मेंई. में जालना, औरंगाबाद क्षेत्र में हुआ था।

छत्रपति शिवाजी (Chhatrapati Shivaji) के सफल जीवन का अंत तीन सप्ताह की बीमारी के बाद 3 अप्रैल, 1680 ई. को हो गया।

छत्रपति शिवाजी (Chhatrapati Shivaji) का प्रशासन

छत्रपति शिवाजी (Chhatrapati Shivaji) को बचपन में पारंपरिक शिक्षा कुछ खास नहीं मिली थी, पर वह भारतीय इतिहास और राजनीति से परिचित थे।

बनारस के गंगाभट्ट ब्राह्मण ने शिवाजी को सूर्यवंशी क्षत्रिय घोषित किया था।

छत्रपति शिवाजी (Chhatrapati Shivaji) ने स्वयं ‘क्षत्रिय कुलवतमसां’ (क्षत्रिय परिवार के आभूषण) की उपाधि धारण की थी।

छत्रपति शिवाजी (Chhatrapati Shivaji) की दूसरी उपाधि ‘हैंदवधर्मोंधारक’ थी।

छत्रपति शिवाजी (Chhatrapati Shivaji) का प्रशासन मूलतः दक्षिणी व्यवस्था पर आधारित था, परंतु इसमें कुछ मुगल तत्त्व भी शामिल थे।

मराठा राज्य के अंतर्गत दो प्रकार के क्षेत्र थे- एक तो स्वराज क्षेत्र, जो प्रत्यक्षतः मराठों के प्रत्यक्ष नियंत्रण में थे, जिन्हें ‘स्वराज क्षेत्र’ कहा जाता था।

दूसरे मुघतई (मुल्क-ए-कदीम) क्षेत्र, जिसमें मराठे चैथ एवं सरदेशमुखी वसूल करते थे।

स्वराज क्षेत्र तीन भागों में विभाजित थे- पूना से लेकर सल्हेर तक का क्षेत्र, जिसमें उत्तरी कोंकण भी सम्मिलित था, पेशवा मोरोपंत पिंगले के अधीन था।

दक्षिणी कोंकण का क्षेत्र अन्नाजी दत्तो के अधीन था।

दक्षिण देश के जिले, जिनमें सतारा से लेकर धारवाड़ एवं कोयल तक के क्षेत्र सम्मिलित थे, दत्तोजी पंत के नियंत्रण में था।

हाल में जीते गये जिंजी, वेल्लोर और अन्य क्षेत्र ‘अधिग्रहण सेना’ के अंतर्गत थे।

भारत के मुगलों शासकों की तरह छत्रपति शिवाजी (Chhatrapati Shivaji) की शासन-प्रणाली एकतंत्री थी अर्थात् प्रशासन की समूची बागडोर राजा के हाथ में ही थी।

शिवाजी के प्रशासकीय कार्यों में सहायता के लिए आठ मंत्रियों की एक परिषद् थी, जिन्हें ‘अष्टप्रधान’ कहा जाता था।

अष्ट-प्रधान

मराठा शासक छत्रपति शिवाजी (Chhatrapati Shivaji) के सलाहकार परिषद् को अष्ट-प्रधान कहा जाता था।

1. पेशवा या प्रधानमंत्री- अष्ट-प्रधान में मंत्रियों के प्रधान को ‘पेशवा’ कहते थे जो राजा के बाद सबसे प्रमुख पद था। यह राज्य की सामान्य भलाई और हितों को देखता था।

2. अमात्य वित्तमंत्री- अमात्य, वित्त और राजस्व के कार्यों को देखता था। इसकी तुलना मौर्यकालीन राजा अशोक के महामात्य से की जा सकती है।

3. मंत्री या वाकयानवीस- यह राजा के कामों तथा उसके दरबार की कार्रवाइयों का प्रतिदिन का विवरण रखता था।

4. सचिव अथवा सुरनवीस- सचिव, दफ्तरी का काम करते थे जिसमें शाही मुहर लगाना और संधि-पत्रों का आलेख तैयार करना आदि शामिल होते थे। यह महालों एवं परगनों के हिसाब की जाँच भी करता था।

5. सुमंत या दबीर- यह विदेश मंत्री था।

6. सेनापति या सर-ए-नौबत- सेना के प्रधान को सेनापति कहते थे।

7. न्यायाधीश- दान और धार्मिक मामलों के प्रमुख को पंडितराव कहते थे। यह कानूनी मामलों का निर्णय करता था।

8. पंडितराव एवं दानाध्यक्ष- यह राजपुरोहित एवं दान विभाग का अध्यक्ष होता था।

न्यायाधीश एवं पंडितराव के अतिरिक्त सभी मंत्रियों को असैनिक कत्र्तव्यों के साथ सैनिक सैनिक कार्य भी करना होता था।

मंत्रियों के अधीन राज्य के विभिन्न विभाग थे, जिनकी संख्या तीस से कम नहीं थी।

प्रांतीय प्रशासन

राजस्व-संग्रह तथा प्रशासन के लिए छत्रपति शिवाजी (Chhatrapati Shivaji) का राज्य कई प्रांतों में बँटा था।

प्रत्येक प्रांत में एक सूबेदार था जिसे प्रांतपति कहा जाता था।
कुछ प्रांत केवल करदाता थे और प्रशासन के मामले में स्वतंत्र थे।

कर्नाटक के राजप्रतिनिधि का स्थान प्रादेशिक शासकों के स्थान से कुछ भिन्न था तथा उसे अधिक शक्ति एव स्वतंत्रता प्राप्त थी।

प्रत्येेक सूबेदार के पास भी एक अष्ट-प्रधान समिति होती थी।

इस अष्ठ-प्रधान की सहायता के लिए प्रत्येक विभाग में आठ सहायक अधिकारी होते थे- दीवान, मजुमदार, फड़नवीस, सबनवीस, कारखानी, चिटनिस, जमादार एवं पतनीस।

प्रत्येक प्रांत परगनों तथा तरफों में विभक्त था।

गाँव प्रशासन की सबसे छोटी इकाई था।

राज्य की आय का प्रमुख साधन भूमिकर था।

शिवाजी ने भूमि-राजस्व को ठेके पर देने की, उस समय की फैली हुई प्रथा को छोड़ दिया था और इसके बदले सरकारी अफसरों द्वारा सीधे रैयतों से कर वसूलने की प्रथा चलाई थी।

शिवाजी ने 1679 ई. में अन्नाजी दत्तो द्वारा व्यापक भूमि सर्वेक्षण कराया।

भूमि की सावधानी से जाँचकर कर का निर्धारण होता था।

भूमि की जांच के लिए माप की एक पद्धति अपनाई गई, जो राज्य भर में एक समान व्यवहार में लाई जाती थी।

छत्रपति शिवाजी (Chhatrapati Shivaji) की भूमि राजस्व व्यवस्था को मलिक अंबर की व्यवस्था से भी प्रेरणा मिली थी, किंतु मलिक अंबर माप की इकाई का मानकीकरण में असफल रहा था।

मलिक अंबर ने भूमि की माप की इकाई के रूप में जरीब को अपनाया था, किंतु शिवाजी ने रस्सी के बदले काठी या मानक छड़ी को अपनाया।

20 काठी का बिस्वा (बीघा) होता था और 120 बीघा का एक चावर होता था।

भ़ूमिकर संभावित उपज का 30 प्रतिशत राज्य लेता था, किंतु कुछ समय के बाद, अन्य प्रकार के करों या चुगियों के उठा देने के पश्चात्, इसे बढ़ाकर 40 प्रतिशत कर दिया गया था।

भू-राजस्व नकद और अनाज दोनों रूपों में लिया जाता था।

राज्य रैयतों को बीज तथा मवेशी खरीदने के लिए खजाने से अग्रिम ऋण देकर खेती को प्रोत्साहन देता था जिसे प्रजा आसान वार्षिक किश्तों में चुका देती थी।

फ्रायर का यह कहना गलत है कि अपने राज्य को पुष्ट बनाने के अभिप्राय से शिवाजी राजस्व-संग्रह के मामले में कठोर थे।

आधुनिक अनुसंधानों ने यह पूर्णतः सिद्ध हो गया है कि शिवाजी का राजस्व शासन मानवतापूर्ण, कार्यक्षम तथा उसकी प्रजा के लिए हितकर था।

संभवतः छत्रपति शिवाजी (Chhatrapati Shivaji)  ने जागीरदारी प्रथा एवं जमींदारी प्रथा को पूरी तरह समाप्तकर किसानों के साथ सीधा संपर्क स्थापित करने का प्रयास किया था।

किंतु लगता है कि छत्रपति शिवाजी (Chhatrapati Shivaji) जमींदारी प्रथा को पूरी तरह नहीं समाप्त कर सके, किंतु उन्होंने इतना अवश्य किया की देशमुखों की ताकत कम हो गई।

चौथ और सरदेशमुखी

महाराष्ट्र के पहाडी प्रदेशों से अधिक भूमिकर नहीं मिलता था। इसलिए शिवाजी प्रायः पड़ोस के प्रदेशों, मुगल सूबों एवं बीजापुर राज्य के कुछ जिलों पर चौथ तथा सरदेशमुखी कर लगा दिया करते थे।

चौथ लगाने की प्रथा पश्चिमी भारत में पहले से ही प्रचलित थी, क्योंकि रामनगर के राजा ने दमन की पुर्तगाली प्रजा से चौथ वसूल किया था।

चौथ में 25 प्रतिशत भू-राजस्व देना पड़ता था।

चौथ के स्वरूप के विषय में सरदेसाई का कहना है कि यह वैसा कर था, जो विरोधी अथवा विजित राज्यों से वसूल किया जाता था।

रानाडे चौथ की तुलना वेलेजली की सहायक-संधि से किया है और कहते हैं कि यह पड़ोसी राज्यों की सुरक्षा की गारंटी के लिए लिया जानेवाला कर था।

सर यदुनाथ सरकार का मानना है कि चौथ एक लुटेरे को घूस देकर उससे बचने का उपाय मात्र था, यह सभी शत्रुओं के विरुद्ध शांति तथा व्यवस्था बनाये रखने के लिए सहायक प्रबंध नहीं था। इसलिए चौथ के अधीन जो भूमि थी, उसे औचित्य आधारित प्रभाव-क्षेत्र नहीं कहा जा सकता।

चौथ का सैद्धांतिक आधार जो भी रहा हो, व्यवहार में यह सैनिक चंदा छोड़कर और कुछ भी नहीं था।

सरदेशमुखी दस प्रतिशत का एक अतिरिक्त कर था, जिसकी माँग शिवाजी अपने इस दावे के आधार पर करते थे कि वह महाराष्ट्र के पुश्तैनी सरदेशमुख हैं।

सैन्य-संगठन

छत्रपति शिवाजी (Chhatrapati Shivaji) के द्वारा मराठी सेना को एक नये ढंग से संगठित करना उसकी सैनिक प्रतिभा का एक ज्वलंत प्रमाण है।

पहले मराठों की लड़नेवाली फौज में अधिकतर अश्वारोही होते थे, जो आधे साल तक अपने खेतों में काम करते थे तथा सूखे मौसम में सक्रिय सेवा करते थे।

छत्रपति शिवाजी (Chhatrapati Shivaji)  ने एक नियमित तथा स्थायी सेना का गठन किया। उनके सैनिकों को कर्तव्य के लिए सदैव तैयार रहना पड़ता था तथा वर्षा ऋतु में उन्हें वेतन और रहने का स्थान मिलता था।

छत्रपति शिवाजी (Chhatrapati Shivaji) की सेना में चालीस हजार घुड़सवार और दस हजार पैदल सैनिक थे।

छत्रपति शिवाजी (Chhatrapati Shivaji) ने एक बड़ा जहाजी बेड़ा बनाया था तथा बंबई के किनारे की छोटी-छोटी जातियों के हिंदुओं को नाविकों के रूप में भतीं किया था।

यद्यपि छत्रपति शिवाजी (Chhatrapati Shivaji) के समय में मराठी जल-सेना ने कोई अधिक विलक्षण कार्य नहीं किया, फिर भी बाद में अंग्रियों के अधीन मराठा बेड़े ने अंग्रेजों, पुर्तगालियों तथा डचों को बहुत तंग किया था।

नौसेना में छत्रपति शिवाजी (Chhatrapati Shivaji) ने कुछ मुसलमानों को भी नियुक्त किया था।
सभासद बखर के अनुसार शिवाजी की सेना में लगभग बारह सौ साठ हाथियों तथा डेढ़ से तीन हजार ऊँटों का दल भी था।

छत्रपति शिवाजी (Chhatrapati Shivaji) के गोलंदाज फौज की संख्या ज्ञात नहीं है, किंतु उसने सूरत के फ्रांसीसी निर्देशक से अस्सी तोपें एवं अपनी तोड़ेदार बंदूकों के लिए काफी सीसा खरीदा था।

घुड़सवार सेना की दो शाखाएँ थीं- बर्गी और सिलाहदार। बर्गी वे सिपाही थे, जिन्हें राज्य की ओर से वेतन एवं साज-समान मिलते थे।

सिलाहदार अपना साज-समान अपनेे खर्च से जुटाते थे। मैदान में काम करने का खर्च चलाने के लिए राज्य की ओर से एक निश्चित रकम मिलती थी।

अश्वारोहियों के दल में पच्चीस अश्वारोहियों की एक इकाई बनती थी।

पच्चीस अश्वारोहियों पर एक हवलदार होता था, पांच हवलदारों पर एक जुमलादार तथा दस जुमलादारों पर एक हजारी होता था, जिसे एक हजार हूण प्रतिवर्ष मिलता था।

हजारियों से ऊँचे पद पंचहजारियों तथा सनोबर्त के थे।

सनोबर्त अश्वारोहियों का सर्वोच्च सेनापति था।

पैदल सेना में सबसे छोटी इकाई नौ पायकों की थी, जो एक नायक के अधीन थे।

पांच नायकों पर एक हवलदार, दो या तीन हवलदारों पर एक जुमलादार तथा दस जुमलादारों पर एक हजारी होता था।

अश्वारोहियों में सनोबर्त के अधीन पाँच हजारी थे, किंतु पदाति में सात हजारियों पर एक सनोबर्त होता था।

सेनापति अष्ट-प्रधान (मंत्रिमंडल) का सदस्य होता था।

छत्रपति शिवाजी (Chhatrapati Shivaji) अपने अभियानों का आरंभ अक्सर दशहरा के मौके पर करते थे।

मराठों के इतिहास में किलों का महत्त्वपूर्ण भाग होने के कारण उनमें कार्यक्षम सेना रखी जाती थी।

प्रत्येक किला समान दर्जे के तीन अधिकारियों के अधीन रहता था- हवलदार, सबनीस और सनोबर्त। हवलदार, सबनीस और सनोबर्त तीनों एक साथ मिलकर कार्य करते थे तथा एक दूसरे पर अंकुश रखते थे।

दुर्ग के अफसरों में विश्वासघात को रोकने के लिए शिवाजी ने ऐसा प्रबंध कर रखा था कि प्रत्येक सेना में भिन्न-भिन्न जातियों का संमिश्रण हो।

शिवाजी छापामार युद्ध की नई शैली शिवसूत्र विकसित की थी।

छत्रपति शिवाजी (Chhatrapati Shivaji) सैनिकों के आचरण के लिए कुछ नियम बनाये थे, जिससे उनका नैतिक स्तर नीचा न हो।

किसी स्त्री, दासी या नर्तकी को सेना के साथ जाने की आज्ञा नहीं थी। ऐसा करने पर सर काट लिया जाता था।

गायें जब्ती से मुक्त़ थीं, किंतु बैलों को केवल बोझ ढोने के लिए ले जाया जा सकता था।

कोई सिपाही (आक्रमण के समय) बुरा आचरण नहीं कर सकता था।

युद्ध में लूटे हुए माल के संबंध में शिवाजी की आज्ञा थी कि जब कभी किसी स्थान को लूटा जाए, तो निर्धन लोगों का माल पुलसिया (ताँबे का सिक्का तथा ताँबे एवं पीतल के बर्तन) उस आदमी के हो जायें, जो उन्हें पाये, किंतु अन्य वस्तुएँ, जैसे सोना, चाँदी (मुद्रा के रूप में अथवा ऐसे ही), रत्न, मूल्यवान चीजें अथवा जवाहरात पानेवाले के नहीं हो सकते थे। पानेवाला उन्हें अफसरों को दे देता था तथा वे शिवाजी की सरकार को दे देते थे।

न्याय-प्रशासन

छत्रपति शिवाजी (Chhatrapati Shivaji) की न्याय-व्यवस्था प्राचीन पद्धति पर आधारित थी।

शुक्राचार्य, कौटिल्य और हिंदू धर्मशास्त्रों को आधार मानकर निर्णय दिया जाता था।

ग्राम स्तर पर पाटिल या पंचायत के द्वारा न्याय कार्य किया जाता था।

आपराधिक मामलों को पाटिल देखता था।

सर्वोच्च न्यायालय को ‘हाजिर मजलिस’ कहा जाता था।

धार्मिक नीति

छत्रपति शिवाजी (Chhatrapati Shivaji) धार्मिक सहिष्णुता के पक्षधर थे और उनके साम्राज्य में मुसलमानों को धार्मिक स्वतंत्रता प्राप्त थी और मुसलमानों को धर्म-परिवर्तन के लिए विवश नहीं किया जाता था।

हिंदू पंडितों की तरह मुसलमान संतों और फकीरों को भी सम्मान होता था।

छत्रपति शिवाजी (Chhatrapati Shivaji) ने कई मस्जिदों के निर्माण के लिए अनुदान दिया था और उनकी सेना में मुसलमानों की संख्या अधिक थी।

इस प्रकार शासक एवं व्यक्ति दोनों रूपों में शिवाजी का भारत के इतिहास में एक प्रतिष्ठित स्थान है।

छत्रपति शिवाजी (Chhatrapati Shivaji) ने ‘गनिमीकावा’ नामक कूटनीति को अपनाया, जिसमंे शत्रु पर अचानक आक्रमण करके उसे हराया जाता है।

छत्रपति शिवाजी (Chhatrapati Shivaji) ने दक्कन में अणुओं की तरह बिखरी हुई मराठा जाति को एकता के सूत्र में बाँधा और मुगल साम्राज्य, बीजापुर, पुर्तगालियों, तथा जंजीरा के अबीसीनियनों के जैसी चार बड़ी शक्तियों के विरोध के बावजूद स्वराज का निर्माण किया।

छत्रपति शिवाजी (Chhatrapati Shivaji) ने सदैव अपने राज्य के लोगों के सम्मान की रक्षा करने का प्रयत्न किया था। वह अपने हाथों में आई हुई मुसलमान स्त्रियों तथा बच्चों के सम्मान की रक्षा सावधानी से करते थे।

छत्रपति शिवाजी (Chhatrapati Shivaji) के उत्तराधिकारी

छत्रपति शिवाजी (Chhatrapati Shivaji) का उत्तराधिकार शंभाजी को मिला।

शंभाजी छत्रपति शिवाजी (Chhatrapati Shivaji) के ज्येष्ठ पुत्र थे और दूसरी पत्नी से एक दूसरा पुत्र राजाराम था।

छत्रपति शिवाजी (Chhatrapati Shivaji) की मृत्यु के समय राजाराम की उम्र मात्र 10 वर्ष थी, अतः मराठों ने शंभाजी को राजा मान लिया।

विषय-सुख का प्रेमी होने पर भी शंभाजी वीर थे।

शंभाजी का प्रमुख परामर्शदाता उत्तर भारत का एक ब्राह्मण था, जिसका नाम कवि कलश था।

औरंगजेब के पुत्र शहजादा अकबर ने औरंगजेब के खिलाफ विद्रोह कर दिया।

शंभाजी ने शहजादा अकबर को अपने यहाँ शरण दी।

औरंगजेब ने जोरदार तरीके से शंभाजी के खिलाफ आक्रमण किया और संभाजी की बीबी के सगे भाई गणोजी शिर्के की मुखबिरी से मुकर्रब खाँ नामक एक मुगल अफसर ने शंभाजी को 11 फरवरी, 1689 ई. को रत्नागिरि से बाईस मील दूर संगमेश्वर नामक स्थान पर पकड़ लिया।

शंभाजी के मंत्री कवि कलश तथा उसके पच्चीस प्रमुख अनुगामी भी कैद कर लिये गये।

शाही दल ने शीघ्र बहुत-से मराठा दुर्गों पर अधिकार कर लिया, यहाँ तक मराठा राजधानी रायगढ़ पर भी घेरा डाल लिया।
शंभाजी के मंत्री कवि कलश को बहादुरगढ़ के शाही पड़ाव में 11 मार्च, 1689 ई. को मार डाला गया।

महाराष्ट्र में रामचंद्र, शांकरजी मल्हार तथा परशुराम त्रयंबक जैसे नेताओं ने राजाराम के नेतृत्व में शक्ति संचयकर अपनी पूरी ताकत से मुगलों के साथ राष्ट्रीय प्रतिरोध का युद्ध पुनः आरंभ किया।

शाही दल ने दिसंबर, 1699 ई. में सतारा के दुर्ग पर घेरा डाल दिया, परंतु रक्षक सेना ने वीरतापवूक इसकी प्रतिरक्षा की।

बादशाह स्वयं मराठों के एक के बाद दूसरे किले पर अधिकार करने लगा, किंतु मराठे जो आज खोते थे, उसे कल पुनः प्राप्त कर लेते थे, इस प्रकार युद्ध अंतहीन रूप में जारी रहा।

राजाराम की मृत्यु (12 मार्च, 1700 ई.) के पश्चात् उसकी विधवा ताराबाई ने अपने अल्पवयस्क 4 वर्षीय पुत्र शिवाजी द्वितीय की संरक्षिका के रूप में मराठा राष्ट्र की बागडोर सँभाली।

खाफी खाँ जैसे कटु आलोचक तक ने स्वीकार किया है कि ताराबाई एक चतुर तथा बुद्धिमत्ती स्त्री थी तथा दीवानी एवं फौजदारी मामलों की अपनी जानकारी के लिए अपने पति के जीवनकाल में ही ख्याति प्राप्त कर चुकी थी।

संतजी घोरपड़े तथा धनाजी जाधव नामक दो योग्य एवं सक्रिय मराठा सेनापतियों ने मुगलों को बहुत हानि पहुँचाई।

मराठा इतिहासकारों के अनुसार संतजी घोरपड़े तथा धनाजी जाधव ने बादशाह के पड़ाव तक अपने साहसपूर्ण आक्रमण किये।

मुगल दक्कन के बहुत-से अफसरों ने मराठों को चैथ देकर अपनी रक्षा की तथा उनमें से कुछ ने तो बादशाह के लोगों को लूटने में शत्रु का साथ तक दिया।

3 मार्च, 1707 ई. को औरंगजेब की मृत्यु के बाद मुगल साम्राज्य निरंतर कमजोर होता चला गया और उत्तराधिकार-विवाद के बावजूद मराठे शक्तिशाली होते चले गये।

उत्तराधिकार-विवाद के कारण मराठाओं की शक्ति पेशवाओं (प्रधानमंत्री) के हाथ में आ गई।

पेशवाओं के अधीन मराठा शक्ति का विकास हुआ और वे दिल्ली तक पहुँच गये।

1761 ई. में नादिरशाह के सेनापति अहमदशाह अब्दाली ने मराठाओं को पानीपत की तीसरी लड़ाई में हरा दिया।

पानीपत की तीसरी लड़ाई के बाद मराठा शक्ति का ह्रास होता चला गया।

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