फ्रांस में 1830 ई. की जुलाई क्रांति (July Revolution of 1830 AD in France)

यूरोप के इतिहास में 1830 ई. को क्रांति के वर्ष के रूप में जाना जाता है।
1830 की क्रांति फ्रांस से प्रारंभ होकर संपूर्ण यूरोप में फैल गई।

यूरोप में कहावत मशहूर हो गई थी कि जब फ्रासं को छींक आती है तो पूरे यूरोप को जुकाम हो जाता है।

फ्रांस में 1789 ई. की क्रांति के समय से ही आर्तुला का काउंट (Count of Artois) कट्टर राजसत्तावादियों का प्रमुख नेता था।

1824 में लुई 18वें की मृत्यु के बाद उसका भाई आर्तुला का काउंट (Count of Artois) चार्ल्स दशम् के नाम से फ्रांस की गद्दी पर बैठा।

चार्ल्स दशम् राजा के दैवी अधिकार के सिद्धांत में विश्वास करता था और अपनी प्रतिक्रियावादी नीति के तहत फ्रांस में पुरानी व्यवस्था को पुर्नस्थापित करना चाहता था।

जब चार्ल्स दशम् ने अपने कठोर प्रतिक्रियावादी नीतियों को लागू किया तो फ्रांस की जनता विरोध पर उतर आई और 1830 ई. में फ्रांस में एक बार फिर क्रांति की आग भड़क उठी।

1830 की क्रांति के कारण

चार्ल्स दशम् की प्रतिक्रयावादी नीतियां

चार्ल्स दशम् घोर प्रतिक्रियावादी शासक था। सिंहासन पर बैठते समय चार्ल्स दशम् ने लुई 18वें द्वारा घोषित चार्टर पर चलने की बात कही थी, किंतु गद्दी पर बैठते ही चार्ल्स दशम् ने अपनी प्रतिक्रियावादी नीति को लागू करना आरंभ कर दिया।

राजा के दैवी अधिकार के सिद्धांत में विश्वास करने वाले चार्ल्स दशम् ने जब पुरातन व्यवस्था को फिर से लागू करने का प्रयास किया, तो फ्रांस की जनता ने विद्रोह कर दिया। चार्ल्स दशम् की प्रमुख प्रतिक्रियावादी नीतियां थीं-

(क) कैथेलिक चर्च की पुनर्स्थापना

1789 की फ्रांस की क्रांति के दौरान चर्च एवं पादरियों की शक्ति में कमी आई थी और नेपोलियन ने धर्म के संबंध में जनता को पूर्ण स्वतंत्रता प्रदान की थी।

नेपोलियन ने राज्य कोई धर्म नहीं माना था, किंतु चार्ल्स दशम् ने कैथोलिक धर्म को राज्य का धर्म घोषित कर दिया और चर्च की शक्ति एवं प्रभाव में वृद्धि के लिए अनेक उपाय किये।

चार्ल्स दशम् ने चर्च को पुनः शिक्षा देने का अधिकार प्रदान किया और फ्रांस के विश्वविद्यालय का अध्यक्ष एक पादरी को बना दिया।

वेलिंग्टन ने लिखा है कि चार्ल्स दशम ऐसे राज्य की स्थापना करने जा रहा था जो पादरियों द्वारा, पादरियों का पादरियों के लिए था। चार्ल्स दशम् की पादरियों को अनावश्यक अधिकार देने की नीति से जनता नाराज हो गई थी।

(ख) सामंतों को विशेष सुविधाएं

फ्रांस की 1789 की क्रांति के दौरान कुलीन सामंतों को उनकी भूमि एवं संपत्ति से बेदखल कर दिया गया था।

चार्ल्स दशम् ने फ्रांस में वापस आये प्रवासी सामंतों के अधिकारों एवं सुविधाओं को पुनः स्थापित करने के लिए 1825 ई. में एक कानून बनाया और उन सामंतों को मुआवजा देने की व्यवस्था की।

फ्रांस में वापस आये प्रवासी कुलीनों की संपत्ति का मूल्य लगभग दस करोड़ फ्रेंक था और चार्ल्स दशम इसकी क्षतिपूर्ति करना चाहता था।

जब चार्ल्स दशम ने राष्ट्रीय ऋण पर ब्याज की दर 5 प्रतिशत से घटाकर 3 प्रतिशत कर दिया तो उसके इस कार्य से न केवल पूंजीवादी, साहकूार तथा व्यापारी, बल्कि मध्यम वर्ग भी सरकार एवं चार्ल्स के विरोधी हो गये।

(ग) गिरजाघर का अधिनियम

चार्ल्स दशम ने एक अधिनियम (Sacrilege Act) बनाया, जिसके अनुसार जो लोग गिरजाघार को अपवित्र करेंगे, उनको मृत्युदंड दिया जायेगा और जो लोग पूजा-पाठ के बर्तनों की चोरी करेंगे, उनके हाथ काट लिये जायेंगे।

फ्रांस की जनता ने इस अमानवीय कानून का खुलकर विरोध किया।

क्रांति के सिद्धांतों की अवहेलना

चार्ल्स दशम क्रांति और नेपोलियन का घोर शत्रु था। चार्ल्स दशम की नजर में राजा के दैवीय अधिकार, चर्च और कुलीनतंत्र ही सभ्यता के चिन्ह थे।

क्रांति काल में चार्ल्स दशम् ने मेरी एंटुवानेट के साथ मिलकर क्रांति का दमन करने का प्रयास किया था और असफल होने पर वह विदेश भाग गया था।

शासक बनने पर चार्ल्स दशम् ने एक बिल द्वारा समाचार-पत्रों की स्वतंत्रता समाप्त करने का प्रयास किया।

तात्कालिक कारण

चार्ल्स दशम् ने चैंबर आफ डेप्युटीज (Chamber of Deputies) को भंगकर पुनः 23 जून को चुनाव कराया, लेकिन सरकार को अनुकूल बहुमत नहीं मिला।

19 जुलाई, 1830 ई. के चुनाव में चार्ल्स दशम के विरोधी सदस्यों की संख्या 221 से बढ़कर 271 पहुँच गई और उसके मात्र 143 समर्थक ही बचे थे।

क्रुद्ध होकर चार्ल्स दशम् चार्ल्स दशम् ने समय से पहले 6 जुलाई को नवनिर्वाचित डेप्युटीज को भंग कर दिया और 25 जुलाई, 1830 ई. को शाही निवास सेंट क्लाउड से चार अध्यादेश जारी किये।

सेंट क्लाउड के अध्यादेश से चार्ल्स दशम् ने समाचार-पत्रों की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगा दिया।

चार्ल्स दशम् ने चुनाव प्रणाली में परिवर्तन कर डेप्युटीज की संख्या घटाकर 258 कर दी और सभा की कार्य अवधि 7 वर्ष से 5 वर्ष कर दिया।

चार्ल्स दशम् ने संपत्ति की योग्यता को ऊँचा कर मताधिकार को सीमित कर दिया, जिसके कारण 75 प्रतिशत नागरिक मताधिकार से वंचित हो गये।

चार्ल्स दशम् ने नये कानून के अनुसार आगामी सितंबर माह में चुनाव कराने की घोषणा कर दी।

25 जुलाई के सेंट क्लाउड के अध्यादेशों की घोषणा के बाद से ही 1830 ई. की जुलाई क्रांति की उलटी गिनती प्रारंभ हो गई।

1830 ई. की क्रांति की घटनाएं

चार्ल्स दशम् के चारों अध्यादेशों को समाचार पत्र लेमोनीतुर यूनिवर्स ने सोमवार 26 जुलाई 1830 ई. को प्रकाशित किया तो जनता और पत्रकारों के साथ-साथ उदारवादी, गणतंत्रीय विचारवाले, मजदूर तथा बोनापार्ट दलवाले, सभी चार्ल्स दशम् के विरोधी हो गये।

सर्वप्रथम फ्रांस के पत्रकारों की ओर से लेनेशनल के पत्रकार एडोल्फ दीयर्स (Adolphe Thiers) ने उक्त अध्यादेशों के विरूद्ध सैंतालीस पत्रकारों के हस्ताक्षर-युक्त एक घोषणा-पत्र प्रस्तुत किया और फ्रांस की जनता से अत्याचार का विरोध करने की अपील की।

अध्यादेशों के विरूद्ध घोषणा-पत्र कहा गया था कि सरकार ने कानून को भंग किया है। हम यह नहीं मानेंगे। हम प्रतिबंध की परवाह किये बिना अपने समाचार-पत्र प्रकाशित करेंगे। हम इसका कड़ा विरोध करेंगे।

27 जुलाई को क्रांतिकारियों ने पेरिस की तंग गलियों एवं सर्पिल सड़कों पर मोर्चा बांध लिया। क्रांतिकारियों को नेतृत्व करनेवाले प्रमुख व्यक्तियों में 1789 ई. की क्रांति के प्रमख क्रांतिकारी लफायेत, पत्रकारों के नेता दियर्स, फ्रांस के कूटनीतिज्ञ तालीरां थे।

1814 ई. के घोषणा पत्र को पुनः लागू करने की माँग के साथ प्रतिक्रियावादी चार्ल्स दशम् एवं प्रधानमंत्री पोलिगनिक-विरोधी नारों, जैसे ‘डाउन द बॉर्बन्स’ और लॉन्ग लिव द चार्टर’ से पेरिस गूंज उठा।

28 जुलाई को क्रांतिकारियों एवं सेना के मध्य संघर्ष चला। क्रांतिकारियों की संख्या लगभग 10000 थी एवं सैनिकों की लगभग 14000।

29 जुलाई को दो सैनिक टुकडि़याँ क्रांतिकारियों से जा मिलीं और क्रांतिकारियों ने पेरिस पर अधिकार कर लिया।

30 जुलाई को चार्ल्स दशम् अपने प्रधानमंत्री पोलिगनिक को पदच्युत करने एवं अपने चार प्रतिक्रियावादी अध्यादेशों को वापस लेने को तैयार हो गया।

31 जुलाई, 1830 ई. को चार्ल्स दशम् ने अपने पौत्र बोर्दा के ड्यूक (Duke of Bordeaux) के पक्ष में सिंहासन का परित्याग कर दिया और फ्रांस छोड़कर इंग्लैंड भाग गया।

चार्ल्स दशम् के पश्चात् लाफायेत के व्यक्तिगत प्रभाव से आर्लिया के ड्यूक लुई फिलिप (Louis Philippe) को शासक बनाकर फ्रांस में संवैधानिक राजतंत्र की स्थापना की गई।

लुई फिलिप 7 अगस्त, 1830 को व्यवस्थापिका सभा द्वारा विधिवत् फ्रांस के राजा के स्थान पर फ्रांसीसी जनता का राजा घोषित किया गया।

लुई फिलिप के राजा बनने से राजा के दैवीय अधिकारों की समाप्ति हुई और संवैधानिक राजतंत्र की स्थापना हुई।

1830 ई. की क्रांति के कारण बूर्बो वंश के स्थान पर लुई फिलिप ने आर्लिया वंश की स्थापना की और चार्ल्स दशम् द्वारा स्थापित कुलीनतंत्र चर्च एवं पादरियों का वर्चस्व समाप्त हो गया।

बूर्बो वंश के सफेद झंडे का स्थान क्रांतिकारी तिरंगे ने ले लिया और निरंकुश राजतंत्र के सिद्धातं के स्थान पर लोकप्रिय प्रभसुत्ता के सिद्धांत की स्थापना हुई।

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