फ्रांस की पुरातन व्यवस्था ( Ancien Regime or Old Regime of France)

परिवर्तन की गति अबाध होती है जो स्वतः धीरे-धीरे होता रहता है, जब उसमें व्यवधान पड़ता है तो समाज में उद्वेलन पैदा होता है। समाज के जिस वर्ग के हाथ में शासन-सत्ता होती है, वह तो परिवर्तन नहीं चाहता या उसी सीमा तक चाहता है जहाँ तक उसके हित सुरक्षित रह सकें। समाज के अन्य वर्ग जब इस स्थिति से बहुत असंतुष्ट होने लगते हैं और व्यापक स्तर पर विरोध होने की संभावना बढ़ जाती है, तब कुछ सुधार किये जाते हैं ताकि ऊपरी तौर पर परिवर्तन का भ्रम खड़ा किया जा सके और यथास्थिति बनी रहे। लेकिन जब सुधार नहीं होते या सुधार र्प्याप्त नहीं होते तो असंतोष बढ़ता ही जाता है। असंतुष्ट वर्ग में जब चेतना आती है, तब वह क्षुब्ध होकर व्यवस्था में कुछ मौलिक परिवर्तन करने के लिए उठ खड़ा होता है। ऐसे ही संघर्ष में क्रांति का जन्म होता है।

फ्रांस: 1715 से 1789 ई. की क्रांति तक (France: From 1715 to the Revolution of 1789 AD)

फ्रांस में सोलहवीं तथा सत्रहवीं शताब्दी में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए थे। वहाँ का पूँजीपति वर्ग सचेतन और सुसंगठित हो रहा था, क्योंकि बढ़ता हुआ व्यवसाय उसके हाथ में था। लेकिन राजतंत्र का केंद्रीकरण बढ़ता जा रहा था और सारे देश की धुरी एक मात्र राजा हो गया था। यह स्थिति केवल कुछ कुलीनों और राजपरिवार के हित में थी। लगभग यही स्थिति पूरे यूरोप में थी। केवल इंग्लैंड में संसद के माध्यम से राज्य की सत्ता में अधिकाधिक लोग भागीदार होते जा रहे थे। मध्य यूरोप के कुछ देशों में भी प्रबुद्ध निरंकुशता (एनलाइटेंड डेस्पाटिज्म) के नाम पर थोड़े-बहुत सुधार हो ही रहे थे। लेकिन फ्रांस में परिवर्तन सबसे अधिक आवश्यक था और वहीं यथास्थिति टूट नहीं रही थी। ऐसी स्थिति में जनता का असंतोष 1789 ई. में फूट पड़ा। पूरे दस वर्षों तक फ्रांस में अफरा-तफरी मची रही। इस दौरान राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक जीवन में बहुत से आमूल परिवर्तन हुए और इसलिए इसे ‘क्रांति’ कहते हैं।

1789 की क्रांति की पृष्ठभूमि (Background of Revolution of 1789)

फ्रांस में क्रांति से पूर्व की व्यवस्था को ‘पुरातन व्यवस्था कहा जाता है। इसी पुरातन व्यवस्था में फ्रांसीसी क्रांति के बीज पड़े थे। इस व्यवस्था के अंतर्गत वहाँ की राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक एवं धार्मिक दशा अत्यंत दयनीय हो गई थी। राजनीतिक रूप से फ्रांस में निरंकुश राजतंत्र की तूती बोलती थी और राजा को असीमित अधिकार प्राप्त थे। शासक वर्ग सदैव अपनी और अपने कुलीन सामंतों तथा दरबारियों की स्वार्थ-पूर्ति में लगा रहता था। राजकीय नियम और कानून, पादरियों और कुलीनों के हित का साधन थे। फ्रांसीसी समाज विशेषाधिकारों के आधार पर अनेक वर्गों में बँटा हुआ था, जिसमें पादरियों और सामंतों को समाज में सम्मानजनक स्थान प्राप्त था, जबकि जनसाधारण की देश के शासन-प्रशासन में कोई हिस्सेदारी नहीं थी और उसे अनेक प्रकार के प्रताड़नाओं और कष्टों का सामना करना पड़ता था। दीर्घकालीन व खर्चीले युद्धों, राजदरबार के अपव्यय और दोषपूर्ण कर प्रणाली के कारण फ्रांस की आर्थिक दशा अस्त-व्यस्त हो गई थी। फ्रांस के लोगों को धार्मिक स्वतंत्रता भी प्राप्त नहीं थी और प्रोटेस्टेंट लोग अकसर प्रताड़ना का शिकार होते रहते थे। वैयक्तिक स्वतंत्रता भी नगण्य थी। विचारों की अभिव्यक्ति तथा प्रकाशन की स्वतंत्रता भी नहीं थी। कुल मिलाकर, फ्रांस में अराजकता और अव्यवस्था का वातावरण व्याप्त था। क्रांति के पूर्व फ्रांस की स्थिति का संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है-

राजनीतिक स्थिति (Political Situations)

राजत्व का दैवी अधिकार: फ्रांस में हेनरी चतुर्थ ने (1589-1610 ई.) बूर्बों वंश की स्थापना की थी। उसके समय से ही फ्रांस पर बूर्बों वंश का शासन था। ‘राष्ट्रीय राजतंत्र’ के अभ्युदय के साथ यह वंश फ्रांस की बढ़ती राष्ट्रीय चेतना के साथ एकाकार होता जा रहा था।। लेकिन बूर्बों वंश अपने अतीत में खोया हुआ था; ‘वह न पुराना भूलता था और न नया सीखता था।

लुई तेरहवें (1610-1643 ई.) के काल में उसके मंत्री रिशलू ने सामंतों का दमन कर उन्हें सुंदर कठपुतलियों में परिवर्तित कर दिया था, जिससे राजा और निरंकुश हो गया था। लुई तेरहवें का उत्तराधिकरी लुई चौदहवाँ (1643-1715 ई.) के काल में निरंकुश राजतंत्र अपने विकास की चरम अवस्था पर पहुँच गया। वह राजा के ‘दैवी अधिकारों’ में विश्वास करता था और स्वयं को ही राज्य का मूर्त रूप ‘मैं ही राज्य हूँ कहता था। उसका दावा था कि वह ईश्वर द्वारा प्रदत्त अधिकारों के आधार पर शासन करता है तथा ईश्वर को छोड़कर किसी अन्य व्यक्ति अथवा संस्था के प्रति उत्तरदायी नहीं है। प्रशासन पर उसका नियंत्रण इतना व्यापक था कि वह कोई भी कानून बना सकता था, किसी भी प्रकार का कर लगा सकता था, अपनी इच्छानुसार धन खर्च कर सकता था और युद्ध तथा शांति की घोषणा कर सकता था। लुई चौदहवाँ की शान-ओ-शौकत और साम्राज्यवादी युद्धनीति से फ्रांस को यूरोप में सम्मान तो मिला, लेकिन राज्य की अर्थव्यवस्था अस्त-व्यस्त हो गई।

लुई चौदहवाँ का पौत्र लुई पंद्रहवाँ को आरंभ में ‘परमप्रिय लुई कहा गया। लेकिन वह एक कमजोर ही नहीं, बल्कि विलासी और फ्रांस तथा अपने हितों के प्रति लापरवाह भी सिद्ध हुआ। उसने पड़ोसियों से युद्ध मोल लिया और फ्रांस के चिर-प्रतिद्वंद्वी अंग्रेजों से बिना तैयारी किये लड़ता रहा। आस्ट्रिया के उत्तराधिकार और सप्तवर्षीय युद्धों में फ्रांस पराजित हुआ और उसकी शक्ति क्षीण हो गई। लुई पंद्रहवाँ पर उसकी रखैलों का इतना प्रभाव था कि उसके राज्य को ‘रखैलों की सरकार’ कहा गया। उसका उत्तराधिकारी लुई सोलहवाँ नितांत अयोग्य था। हालांकि वह विलासी नहीं था, लेकिन उसमें न तो निर्णय कर सकने की क्षमता थी और न ही वह किसी दूसरे की सही सलाह समझ सकता था। फ्रांस की समस्याओं में न तो उसकी कोई विशेष रुचि थी और न ही वह इसके लिए कुछ करने की स्थिति में था। उसने सुधारों के लिए एक के बाद एक कई मंत्रियों को नियुक्त किया, लेकिन दृढ़-इच्छाशक्ति के अभाव में उन्हें बर्खास्त कर दिया।

राजतंत्र की अक्षमता: पुरातन व्यवस्था में शीर्ष स्थान राजा का था जिसे विभिन्न प्रकार के विशेषाधिकार प्राप्त थे और वर्साय के शीशमहल में विलासिता का जीवन व्यतीत करता था। यद्यपि उनका बाह्य जीवन चकाचौंध से भरा था, लेकिन शक्तियों के अतिशय केंद्रीकरण के कारण व्यावहारिक रूप से राजा की शक्ति क्षीण हो चुकी थी। वह स्टे्टस जनरल की उपेक्षा कर सकता था, न्यायालयों को आतंकित कर सकता था और प्रांतीय तथा स्थानीय सभाओं को निष्प्रभावी कर सकता था, लेकिन उनमें सामाजिक या न्यायिक सुधार करने की दृढ़ता या क्षमता नहीं थी। सच तो यह है कि फ्रांस के शासक न तो पुरातन व्यवस्था में किसी प्रकार का परिवर्तन करना चाहते थे और न ही उनके पास राज्य की समस्याओं की ओर ध्यान देने का समय ही था। लुई पंद्रहवाँ को जब सुझाव दिया गया कि देश में सुधार किये जाने की अत्यधिक आवश्यकता है, तो विलासी उसने सुधार करने के बजाय जवाब दिया कि वर्तमान व्यवस्था में भी उसका समय तो कट ही जायेगा। इस प्रकार स्पष्ट है कि फ्रांस के राजा विलासी और अयोग्य ही नहीं, अदूरदर्शी भी थे।

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राजा की विलासिता: फ्रांस के बूर्बों शासक अत्यंत शानो-शौकत और विलासिता का जीवन व्यतीत करते थे। यद्यपि फ्रांस की राजधानी पेरिस थी, किंतु लुई चौदहवाँ के समय से फ्रांस के राजा पेरिस से 12 मील दूर वर्साय के दलदल में करोड़ों डालर खर्च करके बनवाये गये आलीशान महल में विलासितापूर्ण जीवन व्यतीत करते थे। यूरोप को चकाचौंध करने वाले वर्साय में अनेक महल और सैकड़ों कमरे, गिरजाघर, नाट्यशाला, अतिथि भवन, नौकरों के कक्ष, मूर्तियाँ, बगीचे आदि थे। राजा और उसके परिवार की सेवा-सुश्रुषा के लिए 18,000 सेवक थे। दरबार की शोभा बढ़ाने के लिए 2,000 सामंत भी वहाँ निवास करते थे। इस ऐश्वर्यपूर्ण जीवन में केवल रानी एंटुआनेट की सेवा के लिए 500 दासियाँ नियुक्त थीं।

राजकीय अपव्ययता: राजा और राजपरिवार के खर्चों की कोई सीमा नहीं थी। राजा अपने कृपापात्रों और सेवकों को खुले हाथ से उच्च पद, भेंट और पेंशन देकर धन का अपव्यय करते थे। अनुमान है कि लुई सोलहवाँ ने अपने पंद्रह वर्षों के शासन में करीब 10 करोड़ डालर का अपव्यय किया था। लुई सोलहवाँ की आस्ट्रियन रानी मेरी एंटुआनेट अत्यधिक खर्चीली महिला थी जो प्रति सप्ताह चार जोड़ी जूते खरीदती थी। उसकी अपव्ययता के कारण उसे ‘मैडम डेफिसिट’ कहा जाता था। राजपरिवार की इस अपव्ययता का राजकोष पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता था। यही कारण है कि फ्रांस में लोग राजदरबार को ‘राष्ट्र की कब्र’ (ग्रेव ऑफ दि नेशेन) कहते थे।

प्रतिनिधि संस्थाओं की अवहेलना: पुरातन व्यवस्था में फ्रांस की एकमात्र प्रतिनिधि संस्था स्टेट्स जनरल थी। इस संस्था के तीन सदन थे- जिन्हें प्रथम सदन, द्वितीय सदन और तृतीय सदन कहा जाता था। प्रथम सदन में कुलीनों के और दूसरे सदन में पादरियों के 300-300 प्रतिनिधि बैठते थे। तीसरा सदन साधारण जनता का प्रतिनिधित्व करता था। यद्यपि जनसंख्या के अनुसार तीसरे सदन की सदस्य संख्या प्रथम और द्वितीय सदनों की सम्मिलित सदस्य संख्या से अधिक होनी चाहिए थी, लेकिन 300 ही थी।

यही नहीं, स्टेट्स जनरल के पास कोई वास्तविक अधिकार भी नहीं था। वह केवल राजा को प्रशासनिक कार्यों में परामर्श दे सकती थी और उन परामर्शों को स्वीकृत अथवा अस्वीकृत करना राजा की इच्छा पर निर्भर था। 1614 ई. के बाद से इस संस्था का कोई अधिवेशन नहीं हुआ था और यह एक प्रकार से विस्मृत होती जा रही थी।

फ्रांस में दूसरी संस्था पार्लमां थी, जिनकी कुल संख्या 13 थी। इनमें पेरिस की पार्लमां सबसे शक्तिशाली थी। लेकिन पार्लमां भी कोई प्रतिनिधि संस्था न होकर उच्चतम न्यायालय के समान थी और इसका प्रमुख कार्य न्याय करने के अलावा राजा के आदेशों को पंजीकृत करना था। लुई सोलहवाँ के समय में पार्लमां की शक्ति में वृद्धि हुई और वह राजा का प्रतिरोध करने लगी थी।

प्रशासनिक अव्यवस्था: फ्रांसीसी सरकार की प्रशानिक व्यवस्था दोषपूर्ण और अव्यवस्थित थी। प्रशासन में योजना और व्यवस्था का पूर्णतया अभाव था। राजा को परामर्श देने के लिए राजधानी में पाँच समितियाँ थीं, जो कानून बनाने, आदेश जारी करने और अन्य धरेलू तथा विदेशी कार्यों का निष्पादन करती थीं। विभागों में कार्यों का बँटवारा अवैज्ञानिक और असंगत था। कई ऐसे कार्य थे, जिनकी जिम्मेदारी कई विभागों में बँटी थी और इस कारण कोई भी विभाग उस कार्य को नहीं करता था।

फ्रांस में स्थानीय प्रशासन के लिए चालीस सरकारें थीं। इन सरकारों के प्रधान सामंत लोग राजधानी वर्साय में रहते थे और स्थानीय प्रशासन की नीतियाँ भी वर्साय से ही नियंत्रित होती थीं। इस प्रकार पूरे राज्य में लालफीताशाही (रेड टेपिज्म) का ही बोलबाला था। वास्तविक प्रशासन के लिए देश को छत्तीस प्रांतों में विभाजित किया गया था, जिन्हें ‘जिनेरालित’ कहा जाता था। प्रत्येक विभाग के अध्यक्ष के रूप में एतादां की नियुक्ति की गई थी जो प्रायः मध्यम वर्ग का होता था। ऐतादां की नियुक्ति राजा करता था और वह केंद्र सरकार के आदेशानुसार शासन का संचालन करता था। ऐतादां अपनी निरंकुशता के कारण जनता के बीच बहुत अलोकप्रिय थे। कुशासन के लिए उन्हीं को उत्तरदायी ठहराया जाता था और जनता उनसे बहुत घृणा करती थी।

सरकारी पदों पर नियुक्ति योग्यता के आधार पर न होकर जन्म या क्रय-शक्ति के आधार पर होती थी। उच्च वर्ग के लोग पदों को खरीद लेते थे और इस प्रकार अपनी आय व सम्मान को बढ़ाते थे। इन पदों के खरीदने व बेचने से भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता था।

फ्रांसीसी प्रशासन भिन्न-भिन्न प्रकार की परंपराओं, नियमों और नीतियों पर आधारित था। फ्रांस में ही अलग-अलग स्थानों के लिए अलग-अलग कानून थे। फ्रांस के तेरह प्रांतों में व्यापार पर किसी प्रकार का प्रतिबंध नहीं था, किंतु अन्य प्रांत एक-दूसरे के लिए अलग देश जैसे थे। एक प्रांत से दूसरे प्रांत को माल भेजने पर कर देना पड़ता था।

फ्रांस में न्याय-व्यवस्था: फ्रांस की न्याय-व्यवस्था भी अत्यंत जटिल व दोषपूर्ण थी। सार्वजनिक तथा न्यायिक पदों का क्रय-विक्रय होता था और लगभग सभी पदों पर कुलीनों और धनवानों का अधिकार था। अलग-अलग प्रांतों के लिए अलग-अलग कानून थे और संपूर्ण देश में लगभग 285 तरह के नियम-कानून प्रचलित थे। जो कार्य किसी नगर में उचित माना जाता था, वही दूसरे शहर में गैर-कानूनी समझा जाता था। लिखित कानूनों के अभाव में एक ही अपराध के लिए अलग-अलग प्रांतों में अलग-अलग दंड का विधान था।

पुरातन व्यवस्था में फ्रांस में व्यक्तिगत स्वतंत्रता का नामोनिशान ही नहीं था, लेकिन गैर-कानूनी गिरफ्तारियों और प्रतिबंधों का प्रचलन था। राजा ही नही, उसका कोई कृपापात्र भी किसी को भी किसी भी समय बिना किसी पूर्व सूचना के लेट्रे दे कैचे (बंदी बनाने का पत्र) की सहायता से गिरफ्तार करवा सकता था और और बिना मुकदमा चलाये ही उसे जल में रखवा सकता था। वाल्टेयर और मिराबो इसी व्यवस्था के अंतर्गत कुछ समय के लिए बंदी बनाये गये थे। फ्रांस का मध्य वर्ग इस कुव्यवस्था का घोर विरोधी था, लेकिन फ्रांस के शासक इस पुरातन-व्यवस्था में किसी भी प्रकार के परिवर्तन के लिए तैयार नहीं थे।

सामाजिक स्थिति (Social Status)

अठारहवीं शताब्दी में फ्रांस का सामाजिक ढाँचा भी अत्यंत दोषपूर्ण एवं कष्टप्रद था। तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था में ऐसी अनेक कुरीतियाँ तथा बुराइयाँ विद्यमान थीं, जिनका बुद्धि व जनहित से कोई वास्ता नहीं था। इनमें से अधिकांश प्रथाएँ सामंतीय युग से चली आ रही थीं जो अनुकूल नहीं थीं। प्रत्येक व्यक्ति का व्यवसाय उसके जन्म के अनुसार बँटा हुआ था। जो जिस घराने में जन्म लेता था, वह उन्हीं परिस्थितियों में रहता था, उसकी योग्यता अथवा अयोग्यता से उसकी सामाजिक या राजनीतिक स्थिति में कोई अंतर नहीं पड़ता था।

मोटेतौर पर फ्रांसीसी समाज में दो वर्ग थे- एक, सुविधाप्राप्त वर्ग, जिसे अनेक प्रकार के विशेषाधिकार प्राप्त थे जिसमें में पादरी और कुलीन अथवा सामंत आते थे, और दूसरा सुविधाविहीन जनसाधारण का वर्ग था, जिसके पास कोई विशेषाधिकार अथवा सुविधाएँ नहीं थीं। सुविधाप्राप्त वर्ग भी दो भागों- पादरियों और सामंतों में बँटा हुआ था। इस प्रकार फ्रांसीसी समाज में मुख्यतया तीन वर्ग या स्टेट थे: पादरी (फर्स्ट स्टेट), सामंत (सेकेंड स्टेट) और जनसाधारण (थर्ड स्टेट)

प्रथम दो स्टेट विशेषाधिकार-संपन्न और प्रभावशाली थे। चूंकि पदों को ऊँची बोली पर नीलाम किया जाता था, इसलिए राज्य, सेना और चर्च के सभी ऊँचे-ऊँचे पदों पर इन्हीं कुलीनों, सामंतों और पादरियों की नियुक्ति होती थी। राज्य की अधिकांश भूमि भी इन्हीं कुलीनों और पादरियों के ही पास थी जो अपनी जमींदारी में कृषकों से तरह-तरह के कर वसूलते, नजराना और बेगार लेते थे। जनसाधारण के तीसरे वर्ग (तृतीय स्टेट) में किसान, मजदूर, कारीगर, शिल्पकार, व्यापारी, दुकानदार आदि थे जो फ्रांस की कुल जनसंख्या के 85 प्रतिशत से भी अधिक थे। फ्रांसीसी अर्थव्यवस्था का पूरा भार इसी तीसरे वर्ग को ही उठाना पड़ता था।

(1.) पादरी वर्ग: फ्रांस की पुरातन व्यवस्था में पादरी प्रथम स्टेट के अंतर्गत आते थे। वे रोमन कैथोलिक चर्च के अधिकारी होते थे। इस चर्च का अपना स्वतन्त्र संगठन, कानून, न्यायालय और करारोपण के अधिकार थे। पादरी अत्यंत शक्तिशाली तथा धनी थे और सामाजिक व्यवस्था में इन्हें अनेक विशेषाधिकार मिले हुए थे। फ्रांस की कुल भूमि का लगभग 1/5वाँ भाग इनके अधीन था। इस भूमि से उन्हें बहुत आय होती थी, लेकिन वे किसानों से धार्मिक कर दशमांश (टिथे) भी वसूल करते थे। चर्च के अधिकारी अपने अधीन किसानों से जागीरदारी कर भी वसूल करते थे। चर्च की वार्षिक आमदनी लगभग दस करोड़ डालर थी, जो अकसर फ्रांस की अन्य संस्थाओं की भाँति चर्च में व्याप्त भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाती थी। चर्च के कुछ धर्माचारियों का नैतिक चरित्र अत्यंत निंदनीय था।

(1.1) बड़े पादरी : पादरियों की भी दो श्रेणियाँ थीं- पहली श्रेणी के बड़े पादरी, कुलीनों और सामंतों की तरह राजसी ठाठ-बाट से जीवन व्यतीत करते थे और इनका संपूर्ण समय राग-रंग में ही व्यतीत होता था। बड़े पादरियों की धार्मिक कार्यों में कोई रुचि नहीं होती थी और सभी प्रकार की धार्मिक क्रियाएँ दूसरी श्रेणी के छोटे पादरी ही करते थे। कुछ बड़े पादरी ऐसे भी थे जिनका ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास नहीं था। तभी तो लुई सोलहवाँ को पेरिस के आर्कबिशप की नियुक्ति करते समय कहना पड़ा था कि हमें कम से कम फ्रांस की राजधानी में तो ईश्वर में आस्था रखने वाले पादरी को नियुक्त करना चाहिए।

(1.2) छोटे पादरी : दूसरी श्रेणी के छोटे पादरी साधारण वर्ग में से नियुक्त किये जाते थे। जहाँ उच्च पादरियों की आर्थिक और सामाजिक स्थिति बहुत अच्छी थी, वहीं चर्च के छोटे पादरियों और साधारण जनता की स्थिति में कोई विशेष अंतर नहीं था। छोटे पादरियों को 25 पौंड वार्षिक वेतन मिलता था। वेतन कम होने के कारण उन्हें भिक्षुओं जैसा जीवन जीना पड़ता था। इस प्रकार छोटे पादरी पुरातन व्यवस्था की विसंगतियों और अन्यायों से पूर्णतया परिचित थे और यही कारण है कि क्रांति के समय इन लोगों ने साधारण वर्ग की सहायता की।

(2.) कुलीन वर्ग (सामंत): फ्रांसीसी समाज में विशेषाधिकार प्राप्त दूसरा वर्ग (सेकेंड स्टेट) कुलीन सामंतों का था। यद्यपि रिशलू और लुई चौदहवाँ ने सामंतों की शक्ति को नष्ट करने का प्रयास किया था, फिर भी यह वर्ग अभी भी प्रभावशाली था। उन्हें राजपरिवार के बाद समाज में सबसे ऊँचा स्थान प्राप्त था। क्रांति से पूर्व फ्रांस में इनकी संख्या लगभग चार लाख थी। फ्रांस की कुल भूमि का एक चौथाई भाग इनके अधीन था और राजदरबार तथा बड़े-बड़े पदों पर इन्हीं की नियुक्ति होती थी। इस वर्ग के लोग अपनी जमींदारी में कृषकों का तरह-तरह से शोषण करते थे। कृषकों को सप्ताह में कई बार इनकी भूमि पर बेगार करनी पड़ती थी। इन सामंतों की दो श्रेणियाँ थीं-सैनिक सामंत और न्यायधीश।

(2.1) सैनिक सामंत: सैनिक सामंत (नोबल्स ऑफ दि स्वॉर्ड) पुराने सैनिक परिवारों से संबंधित थे। सैनिक सामंत भी दो तरह के थे- दरबारी सामंत (कोर्ट नोबल्स) और प्रांतीय सामंत (प्रोविंशियल नोबल्स)। दरबारी सामंत संख्या में कम थे, लेकिन राज्य के अधिकांश उच्च पदों पर इन्हीं का एकाधिकार था। राजदरबार में रहने के कारण वे राजा के निकट रहते थे, जिससे वे अत्यंत शक्तिशाली हो गये थे। फ्रांस की जनता के मन में सामंतों के प्रति जो घृणा थी, वह वास्तव में इन्हीं स्वार्थी और लालची दरबारी सामंतों के प्रति ही थी।

प्रांतीय सामंतों की संख्या अधिक जरूर थी, लेकिन वे सैनिक सामंतों जैसे प्रभावशाली नहीं थे। प्रांतों में रहने के कारण उनका राजाओं से संपर्क कम ही होता था। उन्हें न तो समाज में विशेष सम्मान मिलता था और न ही उनकी आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी थी।

(2.2) न्यायधीश सामंत: सामंतों का दूसरा वर्ग न्यायधीश सामंतों (नोबल्स ऑफ दि रॉब) का था। फ्रांस की पुरातन व्यवस्था में पदों का क्रय-विक्रय होता था। पदों के खरीदने पर सरकार उन्हें सामंत (नोबल) होने का प्रमाण-पत्र देती थी। इस प्रकार न्यायधीश सामंतों का उदय हुआ था। अधिकांश न्यायधीश अथवा न्यायाधिकरणों के सदस्य सैनिक सामंतों की तुलना में उदारवादी थे और समय-समय पर राजा व सरकार के कानूनों का विरोध करते थे। किंतु इन न्यायधीश सामंतों को भी अपने विशेषाधिकारों से विशेष लगाव था, इसलिए वे उन्हें छोड़ने के लिए तैयार नहीं थे।

(3.) साधारण वर्ग: तीसरा वर्ग (थर्ड स्टेट) में फ्रांस की साधारण जनता का था, जिसमें कृषक मजदूर, कारीगर, शिल्पकार, साहित्यकार, डॉक्टर और व्यापारी जैसे लोग सम्मिलित थे। फ्रांस की कुल जनसंख्या का 85 प्रतिशत से भी अधिक भाग साधारण वर्ग का था। इसमें लगभग 25 लाख शिल्पी, दस लाख अर्द्धदास कृषक और दो करोड़ कृषक थे। इस वर्ग को, अन्य दोनों उच्च वर्गों की तरह किसी प्रकार के अधिकार प्राप्त नहीं थे। साधारण वर्ग में सबसे श्रेष्ठ जीवन व्यापारियों का था। उनके पास धन संपत्ति के भंडार भरपूर थे। वे राजा तथा कुलीनों को ऋण देते थे। राजा और कुलीन वर्ग अपनी इच्छानुसार कर लगाते थे और आर्थिक नीतियों में परिवर्तन करते रहते थे, जिससे मध्यम वर्ग के व्यापार-वाणिज्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता था। साधारण वर्ग भी मुख्य रूप से तीन भागों में विभक्त था- मध्यम (बुर्जुआ) वर्ग, शिल्पकार और किसान।

(3.1) मध्य वर्ग: फ्रांस के मध्य वर्ग को बुर्जुआ कहते थे। इस वर्ग के लोग शहरों में रहते थे और इसमें डॉक्टर, अध्यापक, वकील, लेखक, कवि, दाशर्निक, इंजीनियर व क्लर्क जैसे लोग शामिल थे। इन्हें शारीरिक श्रम नही करना पड़ता था। यद्यपि इस वर्ग को कोई राजनीतिक अधिकार नहीं मिले थे, लेकिन इनका जीवन ग्रामीण कृषकों, शिल्पियों और कारीगरों से कुछ बेहतर था। यह वर्ग पुरातन व्यवस्था का घोर विरोधी था और यह वर्ग समाज तथा शासन में पादरियों और कुलीनों के प्रभाव और सम्मान के कारण स्वयं को हीन महसूस करता था। मध्य वर्ग के अनेक धनी व्यापारियों ने सरकार को कर्ज दे रखा था, लेकिन स्थिति की गंभीरता के कारण उन्हें अपने धन की चिंता होने लगी थी।

वास्तव में फ्रांस के सर्वाधिक बुद्धिमान धनी, सभ्य तथा प्रगतिवादी लोग मध्यवर्गीय ही थे, किंतु उनको कोई राजनीतिक अधिकार प्राप्त नहीं थे क्योंकि पुरातन-व्यवस्था में समस्त राजनीतिक पदों पर कुलीनों का कब्जा था। राजनीतिक अधिकारों के अभाव में मध्यवर्गीय व्यापारियों को अत्यधिक परेशानियों का सामना करना पड़ता था। मध्य वर्ग राजनीतिक अधिकार पाने के लिए लालायित था और पुरातन व्यवस्था का अंत किये बिना उसको राजनीतिक अधिकार नहीं मिल सकते थे।

लेकिन मध्य वर्ग केवल राजनीतिक व्यवस्था में ही परिवर्तन का इच्छुक नहीं था, बल्कि वे सामाजिक क्रांति भी चाहते थे। वाल्टेयर, रूसो, मांटेस्क्यू जैसे बुद्धिजीवियों के विचारों ने उन्हें आंदोलित कर रखा था। बौद्धिक आंदोलन के कारण इस वर्ग में अपने हितों की रक्षा करने की प्रवृत्ति बलवती होती जा रही थी। यही कारण था कि फ्रांस की क्रांति में मध्य वर्ग का प्रमुख योगदान रहा।

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(3.2) शिल्पकार: तृतीय वर्ग के मध्य वर्ग की तरह शहरों में रहने वाला दूसरा वर्ग शिल्पकारों का था। फ्रांस में क्रांति से पूर्व उद्योग-धंधे पूर्णतया विकसित नहीं हो सके थे, अतः इनकी संख्या कम ही थी। फ्रांस में उस समय इनकी संख्या लगभग 25 लाख थी। शिल्पकार अनेक श्रेणियों (गिल्डों) में विभक्त थे और प्रत्येक श्रेणी के अपने-अपने नियम थे। श्रेणियों के पारस्परिक संबंध अत्यंत खराब थे और उनमें आपस में अकसर झगड़े होते रहते थे। इस निर्धन वर्ग को सरकार की ओर से किसी प्रकार की सुविधा नहीं दी जाती थी।

(3.3) किसान: फ्रांसीसी समाज के तृतीय वर्ग (थर्ड स्टेट) में सर्वाधिक संख्या किसानों की थी जो फ्रांस की कुल जनसंख्या का 9/10वाँ भाग थे। लेकिन समाज में सबसे दयनीय स्थिति किसानों की ही थी क्योंकि करों का संपूर्ण भार इन्हीं किसानों के कंधों पर था। उन्हें कदम-कदम पर कर देना पड़ता था। वे सामंतों को भूमिकर और चर्च को दशमांश (तिथे) देते थे। किसानों को सड़कों और पुलों का प्रयोग करने पर भी टोल टैक्स तथा तरह-तरह की चुंगियाँ देनी पड़ती थी। सामंतों की आटाचक्की तथा शराब बनाने के लिए भट्ठी का प्रयोग करने के लिए उन्हें 4-5 मील तक जाना पड़ता था और चक्की अथवा भट्ठी का प्रयोग करने पर भी कर देना पड़ता था। कुल मिलाकर, किसानों को अपनी आय का 80 प्रतिशत से भी अधिक भाग करों के रूप में देना पडता था। अर्द्धदास कृषकों को अपनी अनाज और मुर्गियाँ तक जमींदार को देनी पड़ती थीं और सप्ताह में कई दिन उन्हें कुलीनों और पादरियों की भूमि पर बेगार करनी पड़ती थी। सड़कों की मरम्मत तो उन्हें ही करनी पड़ती थी।

कुलीन सामंतों के शिकार के लिए उनके शिकारगाहों में बड़ी संख्या में तरह-तरह के जंगली पशु रहते थे जो किसानों की फसलों को नष्ट करते रहते थे, परंतु किसान उन्हें अपने खेतों से भगा नहीं सकते थे। प्राकृतिक आपदा के समय कभी-कभी उन्हें भूखे पेट ही सोना पड़ता था और सरकार के कान पर जूँ तक नहीं रेंगती थी। फलतः भूख से बेहाल हजारों किसान लुटेरे बनने को अभिशप्त थे। ऐसे में किसानों में असंतोष बढ़ना स्वाभाविक था। उन्हें लगने लगा था कि उनकी स्थिति में तभी परिवर्तन हो सकता है, जब पुरातन-व्यवस्था में आमूल परिवर्तन किया जाए। वास्तव में ‘किसान इतने दुःखी हो चुके थे कि वे स्वयं ही एक क्रांतिकारी तत्व के रूप में परिणित हो गये। उन्हें क्रांति करने के लिए मात्र एक संकेत की आवश्यकता थी।

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आर्थिक स्थिति (Economic Condition)

1789 ई. फ्रांसीसी राज्य-क्रांति से पूर्व फ्रांस की आर्थिक दशा अव्यवस्थित, अस्त-व्यस्त और भयंकर ऋणग्रस्तता का शिकार थी। फ्रांसीसी सरकार की योजनारहित आर्थिक नीतियों और लुई चौदहवाँ जैसे शासकों के साम्राज्यवादी युद्धों तथा भव्य राजभवनों के निर्माण से फ्रांस आर्थिक रूप से जर्जर हो गया था। लुई चौदहवाँ के उत्तराधिकारी लुई पंद्रहवाँ ने ऑस्ट्रिया के उत्तराधिकार युद्ध और सप्तवर्षीय युद्ध में भाग लेकर फ्रांस की आर्थिक स्थिति को और भी दयनीय बना दिया। लुई पंद्रहवाँ के उत्तराधिकारी लुई सोलहवाँ के समय फ्रांस दिवालियेपन के कगार पर खड़ा था, इसके बावजूद उसने अमेरिका के स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया, जिससे फ्रांस पर ऋणों का बोझ और बढ़ गया।

फ्रांस यूरोप के धनी और उर्वरा राज्यों में से एक था, फिर भी उसे बार-बार ऋण लेकर काम चलाना पड़ता था। राज्य का खर्च सदैव आय से अधिक होता था, जिससे सरकार को बार-बार ऋण लेना पड़ता था। एक अनुमान के अनुसार राजकीय आमदनी का लगभग 50 प्रतिशत भाग ऋणों के ब्याज की अदायगी में ही चला जाता था।

वित्तीय नीति का सामान्य सिद्धांत यह है कि आमदनी के अनुसार खर्च किया जाए, किंतु फ्रांसीसी सरकार का सिद्धांत था कि व्यय के अनुसार आय की व्यवस्था की जाए। इससे ऋण का निरंतर बढ़ना स्वाभाविक था। बढ़ते ऋणों से मुक्ति पाने के लिए सरकार पदों को बेंचकर तथा और अधिक ऋण लेकर धन एकत्र करती थी। लुई सोलहवाँ के समय में ऋण इतना अधिक बढ़ गया कि बैंकरों ने राज्य को ऋण देना ही बंद कर दिया, जिससे गंभीर वित्तीय संकट में पैदा हो गया। लुई सोलहवाँ ने आर्थिक संकट को हल करने के प्रयास में तुर्जो, नेकर, केलोन जैसे कई वित्तमंत्रियों को इधर-उधर किया। कभी कर बढ़ाये गये तो कभी खर्च में कमी करने की कोशिश की गई, लेकिन स्थिति हाथ से निकल़ चुकी थी।

अंततः विवश होकर लुई सोलहवाँ को 1787 ई. में प्रमुखों की सभा बुलानी पड़ी, लेकिन यह सभा भी आर्थिक संकट का कोई समाधान नहीं ढूढ़ सकी। एकमात्र समाधान यही हो सकता था कि विशेषाधिकार संपन्न और कर-मुक्त लोगों पर भी कर लगाया जाए। लेकिन प्रमुखों की सभा के सदस्य विशेषाधिकार संपन्न लोग ही थे। समस्या को टालने के लिए उन्होंने तर्क दिया कि राज्य को स्टेट्स जनरल के माध्यम से ही कर लगाने का अधिकार है।

बजट का अभाव: पुरातन व्यवस्था में आर्थिक बजट बनाने और राज्य के आय-व्यय का लेखा-जोखा रखने की कोई परंपरा नहीं थी और इसके लिए कोई प्रयास भी नहीं किया जाता था। जनता राज्य के आय-व्यय और आर्थिक स्थिति से पूरी तरह अनजान रहती थी। राजा की आय और राज्य की आय में कोई अंतर नहीं था। राजा, राजपरिवार के सदस्य, दरबारी और राजा के कृपापात्र राजकीय धन को व्यक्तिगत धन समझकर मनमाने तरीके से अपनी शानो-शौकत और विलासिता पर खर्च करते थे। जब 1781 ई. में नेकर ने राष्ट्रीय आय-व्यय का एक तरह का बजट (कोंत रान्द्यू) प्रकाशित भी किया, तो उसे अपने पद से हाथ धोना पड़ा। ऐसी परिस्थिति में देश की आर्थिक स्थिति पर विपरीत प्रभाव पड़ना स्वाभाविक ही था।

पदों का क्रय-विक्रय: निरंतर बढ़ते हुए ऋण से मुक्ति पाने के लिए सरकार और अधिक ऋण लेती थी और पदों को बेचकर धन जुटाती थी। इसके अलावा, कुछ धनी बैंकर भी राजा को धन देते थे और बदले में उन्हें ‘कर वसूलने का अधिकार मिला हुआ था। इस दोषपूर्ण व्यवस्था के कारण जनता को वास्तविक कर से अधिक कर का भुगतान करना पड़ता था, जिससे उसका प्रतीड़न होता था और राज्य की आमदनी भी कम हो जाती थी।

असमान कर-व्यवस्था: किसी भी देश की आय का मुख्य स्रोत कर होते हैं, लेकिन फ्रांस की कर-व्यवस्था अत्यंत दोषपूर्ण थी। फ्रांस में कराधान की कोई एक समान व्यवस्था नहीं थी, जैसे-सामंतों और जागीरदारों का देश की चौथाई भूमि पर अधिकार था, लेकिन उन्हें कोई कर नहीं देना पड़ता था। उन्हीं की तरह पादरियों का भी देश की भूमि के पाँचवें भाग पर कब्जा था, लेकिन वे भी करों से मुक्त थे।

प्रत्यक्ष कर : कर दो प्रकार के थे-प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष। प्रत्यक्ष कर व्यक्तिगत संपत्ति, आय व जागीर पर देने पड़ते थे, किंतु अधिकांश कर ऐसे थे जिनसे सामंत और पादरी जैसे विशेषाधिकार संपन्न वर्ग मुक्त थे। इसलिए करों का पूरा भार उस असहाय साधारण जनता को उठाना पड़ता था जो दो जून की रोटी के लिए जद्दोजहद करती थी। यह विडंबना ही है कि जो वर्ग कर देने में सक्षम था, उसे कर ही नहीं देना पड़ता था और जो भूखे पेट सोते थे, उनसे उनके शरीर की हड्डियाँ भी वसूल ली जाती थीं। तभी तो फ्रांस में कहावत मशहूर थी : ‘सामंत युद्ध करते हैं, पादरी पूजा करते हैं और जनता कर देती है।’

अप्रत्यक्ष कर : फ्रांस में अनेक प्रकार के अप्रत्यक्ष कर भी प्रचलित थे, लेकिन अप्रत्यक्ष कर वसूलने का कार्य ठेके पर दिया जाता था और ठेकेदार अधिकतम लाभ कमाने के लिए अधिक से अधिक कर वसूलने के लिए अत्यंत कठोर और निर्मम तरीकों का उपयोग करते थे, जिससे न केवल सरकारी आय कम होती थी, बल्कि साधारण जनता को भारी कष्ट उठाना पड़ता था। अप्रत्यक्ष करों में सबसे कष्टकारी कर नमक-कर था। इसके अंतर्गत सात वर्ष से बड़े प्रत्येक व्यक्ति को साल भर में कम से कम सात पौंड नमक खरीदना अनिवार्य था, अन्यथा उसे कठोर दंड दिया जाता था। इसी प्रकार शराब कर भी था। शराब, फ्रांस का एक प्रमुख उद्योग था, लेकिन उस पर इतने कर लगा दिये गये थे कि यह उद्योग भी ठप्प होने की स्थिति में पहुँच गया था। किसानों को शराब बनाने के लिए सामंतों की प्रयोग करना पड़ता था और उन्हें इसके बदले में भी कर देना पड़ता था।

वाणिज्य और व्यवसाय: देश में वाणिज्य और व्यवसाय भी पतनशील अवस्था में था। देश के भिन्न-भिन्न भागों में चुंगी और टोल टैक्स की दरों में बहुत अधिक अंतर था, जिसके कारण व्यापारिक माल का उत्पादन भी कम हो रहा था और उद्योग-धंधे बद होते जा रहे थे। कारीगरों और मजदूरों की दशा अच्छी नहीं थी क्योंकि व्यापारिक संस्थाएँ ही उनके काम के घंटों, छुट्टियों और वेतन आदि का निर्धारण करती थी। उनको उनके परिश्रम के अनुसार मजदूरी नहीं मिलती थी, जिससे उनके अंदर भी असंतोष और असुरक्षा की भावना बढ़ती जा रही थी। अब वे भी व्यवस्था में आमूल परिवर्तन के द्वारा ‘अच्छे दिनों’ की उम्मीद कर रहे थे।

इस प्रकार पुरातन व्यवस्था में फ्रांस का आर्थिक ढाँचा भी असमानता, विशेषाधिकार, स्वेच्छाचारिता और अन्यायपूर्ण नियमों पर आधारित था। अतः फ्रांस की जनता द्वारा इन उत्पीड़क व अन्यायपूर्ण नीतियों का विरोध करना स्वाभाविक था।

धार्मिक स्थिति (Religious Status)

फ्रांस में किसी प्रकार की धार्मिक स्वतंत्रता नहीं थी। बूर्बों वंश के शासक रोमन कैथोलिक चर्च के अनुयायी थे, इसलिए फ्रांस में चर्च का प्रभुत्व छाया हुआ था। कैथोलिक चर्च के पास अपार संपदा थी और उसके उसके पादरी व अधिकारी शानो-शौकत और विलासिता का आनंदमय जीवन जीते थे। फ्रांस में बड़ी संख्या में प्रोटेस्टेंट भी रहते थे जिन्हें ‘ह्यूग्नोट्स’ कहा जाता था। हेनरी चतुर्थ ने इन ह्यूग्नोट्स को ‘नांत के अध्यादेश द्वारा धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान की थी, किंतु मंत्री रिशलू ने ह्यूग्नोट्स की धार्मिक स्वतंत्रता छीन ली और उन पर अत्याचार किये। लुई चौदहवाँ में यद्यपि ह्यूग्नोट्स पर अत्याचार नहीं किये गये, लेकिन 1685 ई. में उसने उनके सभी विशेषाधिकारों को समाप्त कर दिया गया और उनकी धार्मिक स्वतंत्रता का अपहरण कर लिया। लुई सोलहवाँ के काल में यद्यपि ह्यूग्नोट्स पर अत्याचार नहीं किये गये, किंतु प्रतिबंधों को पूर्ववत् बनाये रखा गया। यहूदियों के साथ भी फ्रांस में दुर्व्यवहार किया जाता था।

इस प्रकार स्पष्ट है कि फ्रांस की राज्यक्रांति के प्रारंभ होने से पहले फ्रांस की पुरातन व्यवस्था से प्रायः सभी वर्गों में असंतोष की भावना व्याप्त हो चुकी थी और देश के ढाँचे में तत्काल आमूल परिवर्तन की आवश्यकता थी, किंतु शासक और विशेषाधिकारसंपन्न वर्ग पुरातन व्यवस्था में किसी प्रकार का परिवर्तन करने को तैयार नहीं था। ऐसे में फ्रांस में क्राति होनी ही थी।

<फ्रांस: 1715 से 1789 ई. की क्रांति तक

>फ्रांस के चरमोत्कर्ष का काल : लुई XIV का युग

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