फ्रांस का उत्कर्ष: रिशलू और मेजारिन

पंद्रहवीं शताब्दी में फ्रांस में निरंकुश राजतंत्र की स्थापना हुई थी, लेकिन सोलहवी शताब्दी में 1559 से 1589 ई. तक फ्रांस में जो धार्मिक गृहयुद्धों का दौर चला, वह फ्रांसीसी इतिहास का महत्वपूर्ण चरण साबित हुआ। धार्मिक गृहयुद्धों के इस काल में अंततः हेनरी चतुर्थ ने फ्रांस की अस्त-व्यस्त स्थिति को अपने प्रयत्नों से सँभालने का प्रयास किया।

धार्मिक गृहयुद्धों के कारण

1559 से 1589 ई तक फ्रांस में होनेवाले धार्मिक गृहयुद्ध इटली में होनेवाले धर्मसुधार आंदोलन के परिणाम थे। इटली में होनेवाले पुनर्जागरण आंदोलन के फलस्वरूप ही फ्रांस में भी धर्मसुधार आंदोलन आरंभ हुआ। फ्रांसीसी सम्राट फ्रांसिस प्रथम (1515-1589 ई.) इटली के प्रसिद्ध मानववादी विद्वानों एवं कलाकारों जैसे- लियानार्डो दि विंसी तथा टीशियस से अत्यधिक प्रभावित था। फ्रांसिस प्रथम के शासन के पूर्वार्द्ध में फ्रांस में सांस्कृतिक पुनर्जागरण का जो वेग आरंभ हुआ, उसके कारण रोमन कैथोलिक चर्च के द्वारा अनुमोदित विश्वास एवं परंपराओं को भी आघात पहुँचा। फ्रांस में धर्मसुधार आंदोलन के जन्मदाता ‘जाक लेफवरे के नेतृत्व में चलनेवाले आंदोलन ने कैथोलिकों की जड़ों को हिला दिया।

किंतु फ्रांसिस प्रथम ने अपने शासन के उत्तरार्द्ध में ‘एक राजा, एक धर्म एवं एक विधान’ की नीति अपनाई। दरअसल फ्रांसिस ने स्पेनिश प्रतिनिधित्व को यूरोप से समाप्त करने के लिए अपने शासनकाल के पूर्वार्द्ध में जर्मनी के लूथरवादियों को प्रश्रय दिया था। लेकिन अपने शासनकाल के अंतिम चरण में फ्रांसिस प्रथम ने धर्मसुधार आंदोलन का कठोरता से दमन किया। 1547 ई. में धर्म सुधारकों को विशेष न्यायालयों द्वारा दंडित किया गया, 20 हजार से अधिक नगर एवं ग्राम ध्वस्त किये गये और 3,000 से अधिक लोग मौत के घाट उतार दिये गये। यही नहीं, हजारों लोगों को फ्रांस से निष्कासित भी किया गया।

हेनरी द्वितीय (1547-से 1559 ई.)

फ्रांसिस प्रथम के उत्तराधिकारी हेनरी द्वितीय (1547-से 1559 ई.) ने भी पिता की ही भाँति धार्मिक असहिष्णुता की नीति अपनाई। हेनरी ने फ्रांस में ‘इन्क्वीजीशन’ नामक धार्मिक अदालतें स्थापितकर काल्विनवादियों, जो फ्रांस में ह्यूगनोट्स के नाम से जाने जाते थे, का दमन करने का प्रयास किया, किंतु पेरिस की पार्लमां के विरोध के कारण उसकी योजनाएँ सफल नहीं हो सकीं।

हेनरी द्वितीय द्वारा ह्यूगनोटों के दमन के कई कारण थे- प्रथम, तो फ्रांस में ह्यूगनोट्स का प्रभाव अत्यधिक बढ़ गया था और द्वितीय, फ्रांस के नगरवासी एवं सामंत काल्विनवाद को स्वीकार कर कैथोलिक चर्च की संपत्ति पर अधिकार करना चाहते थे। यही नहीं, हेनरी द्वितीय के लिए यह भी असह्य था कि फ्रांस के काल्विनवादी जेनेवा से काल्विन के आदेशों व नियंत्रण को स्वीकार करें। इन्हीं कारणों से हेनरी द्वितीय ने अपने प्रबल प्रतिद्वंद्वी स्पेन के शासक फिलिप द्वितीय के साथ 1559 ई. में ‘कैटियो-कैम्ब्रेसिस’ की संधि भी की थी। यद्यपि यह संधि फ्रांस में ह्यूगनोटों के दमन की नीति का एक हिस्सा थी, किंतु इसी समय हेनरी द्वितीय की मृत्यु ने धार्मिक संघर्ष की समस्या को और अधिक जटिल बना दिया।

कैथरीन-डी-मेडिसी

हेनरी द्वितीय के उत्तराधिकारी अल्पवयस्क थे, इसलिए प्रशासन की बागडोर उसकी विधवा कैथरीन-डी-मेडिसी की संरक्षिता में आ गई। कैथरीन-डी-मेडिसी इटली के प्रसिद्ध मेडिसी परिवार की राजकुमारी थी। उसने अपने पुत्रों- फ्रांसिस द्वितीय (1559-1560 ई.) चार्ल्स नवम (1560-1574 ई.) एवं हेनरी तृतीय (1574-1589 ई.) के नाबालिग होने के कारण उनके संरक्षक के रूप में शासन किया।

हेनरी द्वितीय की मृत्यु से फ्रांसीसी प्रोटेस्टेंटों एवं सामंतों को अपनी शक्ति में वृद्धि करने का अवसर मिल गया। जहाँ एक ओर ह्यूगनोट अपने को संगठिक कर कैथोलिकों से संघर्ष करने को तैयार थे, वहीं दूसरी ओर सामंत वर्ग ने भी अपनी शक्ति में वृद्धि के लिए कैथरीन-डी-मेडिसी की संरक्षकतावाले फ्रांसिस द्वितीय के उत्तराधिकार को चुनौती दी। विरोधी सामंत वर्ग मुख्यतया दो वर्गों में बँटे हुए थे- एक वर्ग बूर्बा वंश का समर्थक था तो दूसरा गीज परिवार का।

बूर्बा वंश के प्रमुख नेता एंटनी, जो नावारे का शासक था, और उसके भाई लुई ड्यूक आफ कांदे ने फ्रांसीसी शासक सेंट लुई का वंशज होने के कारण फ्रांस के सिंहासन पर अपना दावा पेश किया। ये दोनों प्रोटेस्टेंट थे। इन दोनों ने अपनी आकांक्षा की पूर्ति के लिए प्रोटेस्टेंटों का समर्थन किया। दूसरी ओर गीज परिवार यद्यपि फ्रांसीसी नहीं था, किंतु शासनारूढ़ वैलय राजवंश का दूर से संबंधी होने के कारण फ्रांस के सिंहासन पर अपना दावा कर रहा था। यह वर्ग कैथोलिक था। इस प्रकार हेनरी द्वितीय के पश्चात् कैथरीन-डी-मेडिसी को एक विकट स्थिति का सामना करना पड़ा।

कैथरीन-डी-मेडिसी ने दोनों में शक्ति-संतुलन बनाने का प्रयास में 1562 ई. से ह्यूगनोटों को पूजा-संबंधी कुछ सीमित अधिकार प्रदान किये। किंतु इन सीमित अधिकारों से ह्यूगनोट तो संतुष्ट नहीं हुए, लेकिन ह्यूगनोटों को सीमित अधिकार देने से कैथोलिक असंतुष्ट हो गये। इस असंतोष का वीभत्स रूप ‘वासी हत्याकांड’ के रूप में सामने आया, जिसने फ्रांस गृहयुद्ध में उलझ गया।

वासी हत्याकांड मार्च, 1562 ई.

मार्च, 1562 ई. में ड्यूक आफ गीज के सैनिकों ने प्रार्थना कर रहे निःशस्त्र प्रोटेस्टेंटों पर आक्रमण कर लगभग 50 प्रोटेस्टेंटों की हत्या कर दी। कैथोलिकों के समर्थन के कारण ‘कैथरीन-डी-मेडिसी’ वासी हत्याकांड के लिए ड्यूक को दंडित नहीं कर सकी। इसलिए ह्यूगनोटों ने ड्यूक आफ कांदे एवं जल सेना के सेनापति कलगनी के नेतृत्व में खुला विद्रोह कर दिया। फ्रांसीसी सामंतों ने इस धार्मिक संघर्ष में अपना उल्लू सीधा करने का प्रयास किया।

वासी हत्याकांड से प्रारंभ होनेवाले धार्मिक संघर्ष एवं गृहयुद्ध की आग में फ्रांस 1589 ई. तक झुलसता रहा। इस गृहयुद्ध में आरंभ में कैथोलिकों की विजय हुई, किंतु ह्यूगनोटों ने भी अपनी शक्ति एवं साहस को बनाये रखा। युद्ध आरंभ होने के एक वर्ष बाद ड्यूक आफ गीज एवं नावारे के राजा की हत्या हो गई, किंतु जब प्रोटेस्टेंट सेना पेरिस तक पहँच गई तो कैथरीन-डी-मेडिसी ने 1570 ई. में प्रोटेस्टेंटों के साथ सेंट जर्मन की संधि कर ली। इस संधि के अनुसार कैथरीन ने ह्यूगनोटों को राजकीय मान्यता दी, पूजा-संबंधी सीमित अधिकार दिये और ह्यूगनोटों के लिए सार्वजनिक नौकरियों में चयन के प्रतिबंध हटा दिये। यही नहीं, ह्यूगनोटों को एक वर्ष के लिए 4 प्रसिद्ध दुर्ग दिये गये और चाल्र्स नवम ने अपनी बहिन मारग्रेट का विवाह नावारे के युवराज हेनरी से कर दिया। इस प्रकार कैथरीन-डी-मेडिसी ने सेंट जर्मेन की संधि द्वारा विरोधी संप्रदायों से मैत्री स्थापित करने का प्रयास किया।

किंतु यह स्थिति अधिक समय तक यथावत् नहीं रह सकी। चार्ल्स नवम ने कलीगनी से प्रभावित होकर कैथरीन के प्रभाव से स्वयं को स्वतंत्र करने का प्रयास किया। कैथरीन के लिए यह असह्य था, इसलिए उसने कलीगनी को अपने रास्ते से हटाने के लिए कैथोलिक नेता ड्यूक आफ गीज को समर्थन देना आरंभ कर दिया। कैथरीन ने षड्यंत्र रचकर 24 अगस्त, 1572 ई. को सेंट बाथोलोम्यू दिवस के अवसर पर ह्यूगनोट नेताओं का कत्ल करवाया, जिसमें प्रमुख ह्यूगनोट नेता कलीगनी मारा गया।

ह्यूगनोटों के केवल दो प्रमुख नेता राजकुमार कांदे एवं हेनरी नावारे ही बच सके थे। इस भीषण हत्याकांड ने कैथोलिकों को दो वर्गों में बाँट दिया- एक वर्ग उन कट्टर एवं असहिष्णु कैथोलिकों का था जो गीज परिवार के समर्थक थे और द्वितीय वर्ग में ऐसे मध्यवर्गीय कैथोलिक थे जो कैथोलिक संप्रदाय की प्रतिस्थापना तो चाहते थे, किंतु हिंसा के विरोधी थे। इन मध्यमार्गी कैथोलिकों ने राष्ट्रीय हित के लिए हेनरी नावारे का समर्थन किया।

तीन हेनरियों का युद्ध (1588-1589 ई.)

इधर फ्रांस की सत्ता पर चार्ल्स नवम की मृत्यु के पश्चात् उसका भाई हेनरी तृतीय (1574-1589 ई.) आसीन हुआ। इस भ्रष्ट एवं दुश्चरित्र शासक के शासनकाल में फ्रांस में पुनः गृहयुद्ध आरंभ हो गया, जिसे इतिहास में ‘तीन हेनरियों का युद्ध’ के नाम से जाना जाता है। हेनरी द्वितीय के तीनों उत्तराधिकारी पुत्रों के निःसंतान होने के कारण फ्रांस के उत्तराधिकारी के प्रश्न को लेकर कैथालिक एवं प्रोटेस्टेंट संप्रदाय पुनः चिंतित हो उठे। मध्यममार्गी कैथोलिक नावारे के हेनरी, जो बूर्बावंशीय था, को वैलय राजवंश का निकट संबंधी बताकर उसका समर्थन कर रहे थे, किंतु कट्टर कैथोलिकों ने हेनरी आफ गीज के समर्थन में ‘कैथोलिक लीग’ की स्थापना की। हेनरी आफ गीज को रोम के पोप तथा स्पेनी शासक फिलिप द्वितीय का भी समर्थन प्राप्त था। वैलयवंशी शासक हेनरी तृतीय की शांति एवं सुलह के प्रयास के बावजूद फ्रांस में सत्ता के लिए ‘तीन हेनरियों का युद्ध’ (1588-1589 ई.) आरंभ हो गया।

1588-1589 ई. में यद्यपि शासन-सूत्र हेनरी तृतीय के हाथ में था, किंतु वास्तविक सत्ता हेनरी आफ गीज के पास थी। हेनरी तृतीय ने ड्यूक आफ गीज के विरुद्ध स्टेट्स जनरल की बैठक बुलाई, किंतु स्टेट्स जनरल ने ड्यूक आफ गीज का समर्थन किया। इसलिए हेनरी तृतीय ने 1588 ई. में ड्यूक आफ गीज एवं उसके छोटे भाई लारेन के कार्डिनल की हत्या करवा दी। जब कैथोलिक लीग ने हेनरी तृतीय के सभी आदेशों को अमान्य घोषित कर दिया तो उसने हेनरी नावारे से समझौता कर लिया। कट्टर कैथोलिकों का दमन करने के लिए हेनरी आफ नावारे और हेनरी तृतीय की संयुक्त सेना ने पेरिस को घेर लिया। इसी संघर्ष में एक कट्टर कैथोलिक ने 1589 ई. में हेनरी तृतीय की हत्या कर दी। किंतु मृत्यु से पूर्व हेनरी तृतीय ने हेनरी आफ नावारे को अपना वैध उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था।

फ्रांस की जनता धार्मिक गृहयुद्धों से थक चुकी थी और अब शांति चाहती थी। स्थिति को अनुकूल देखकर 1589 ई. में हेनरी नावारे हेनरी चतुर्थ के नाम से फ्रांस का शासक बना और फ्रांस में वैलय राजवंश के स्थान पर बूर्बों राजवंश की सत्ता को स्थापित किया।

हेनरी चतुर्थ (1589-1610 ई.)

हेनरी चतुर्थ ने अपनी योग्यता एवं कर्मठता से फ्रांस में न केवल शांति और सुव्यवस्था स्थापित की, बल्कि फ्रांस के गौरव को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित करने का कार्य किया। यही कारण है कि हेनरी चतुर्थ का उल्लेख फ्रांसीसी राजाओं के इतिहास में महान् राजा के रूप में नहीं, ‘लोकप्रिय राजा’ के रूप में भी होता रहा है। हेनरी चतुर्थ ने फ्रांस में एक नये राजवंश बूर्बो वंश की शुरूआत की जो दो सौ वर्षो तक फ्रांस पर शासन करता रहा। इस बूर्वो राजवंश ने फ्रांस को ही नहीं, यूरोप को भी सबसे शक्तिशाली राजा प्रदान किये।

हेनरी चतुर्थ की उपलब्धियाँ

1589 ई. में हेनरी नावारे ‘हेनरी’ की उपाधि धारणकर फ्रांस का शासक तो बन गया था, किंतु उसके लिए यह उपाधि कई समस्याओं से युक्त थी। एक तो, हेनरी चतुर्थ ह्यूगनोट संप्रदाय का था, इसलिए फ्रांस के बहुसंख्यक कैथोलिक उसे फ्रांस के शासक के रूप में स्वीकार करने को तैयार नहीं थे। दूसरी ओर स्पेनी नरेश फिलिप द्वितीय फ्रांस के कैथोलिकों को सहायता दे रहा था। दूसरे, हेनरी चतुर्थ भयंकर गृहयुद्धों के पश्चात् फ्रांस का शासक बना था जिसके पीछे सामंतों की स्वतंत्रता एवं शासन में शक्ति प्राप्त करने की अभिलाषा थी। सामंत राजतंत्र के विरोधी एवं अवज्ञाकारी हो गये थे। ह्यूगनोट सामंतों की बढ़ती हुई शक्ति एवं स्वतंत्रता भी हेनरी के लिए खतरा थे।

तीसरे, पिछले 20 वर्षों से फ्रांस में जो गृहयुद्ध चला और धार्मिक संघर्ष हुए, उससे फ्रांस की आर्थिक स्थिति बहुत दयनीय हो गई थी। इसलिए हेनरी चतुर्थ को भयंकर आर्थिक समस्या का भी सामना करना था। कृषि व्यवस्था चैपट हो चुकी थी, उद्योग-धंधों की प्रगति थम गई थी और लुटेरों के आतंक से जन-धन की सुरक्षा पर प्रश्नचिन्ह लगा हुआ था। इसके अलावा, इस समय प्रशानिक विफलता के कारण फ्रांस विद्वेष, प्रतिहिंसा, षड्यंत्र और लूट-खसोट का भी शिकार था। इस प्रकार किसी सार्वभौम अथवा सर्वमान्य सरकार के अभाव में पूरे देश में भय, अराजकता, अव्यवस्था और अफरा-तफरी का माहौल था।

समस्याओं का समाधान

हेनरी चतुर्थ ने अपनी लगन, धैर्य, शक्ति, प्रतिभा, साहस एवं कार्यकुशलता से फ्रांस की समस्याओं के निराकरण के लिए सभी आवश्यक कदम उठाये और राजतंत्र को सुदृढ़ करने का प्रयास किया।

धर्म-परिवर्तन

हेनरी चतुर्थ ने सबसे पहले फ्रांसीसी जनमत को अपने पक्ष में करने के लिए अपने व्यक्तिगत धार्मिक विचारों का परित्याग कर जुलाई, 1593 ई. में कैथोलिक धर्म की दीक्षा ले ली। हेनरी के धर्म-परिवर्तन के कारण फ्रांस के कुछ नगरों व प्रांतों ने उसका नेतृत्व स्वीकार कर लिया। स्पेनी सेना पेरिस की रक्षा कर रही थी, किंतु जब वहाँ की जनता हेनरी के पक्ष में हो गई तो स्पेनी सेना को विवश होकर वापस लौटना पड़ा। रोम के पोप ने भी हेनरी के धर्म-परिवर्तन को मान्यता दे दी। इस प्रकार हेनरी ने उत्तराधिकार-संबंधी जनमत की बाधा को धर्म-परिवर्तन करके दूर कर दिया और 1598 ई. में स्पेन के साथ वरविन्स की संधि कर फ्रांस से स्पेनी हस्तक्षेप का अंत कर दिया।

नांटेस की राजाज्ञा,15 अप्रैल, 1598 ई.

1598 ई. में हेनरी चतुर्थ के धर्म-परिवर्तन से कैथोलिक जनमत तो संतुष्ट हो गया, किंतु उसके संकटकालीन प्रोटेस्टेंट मित्र उससे रुष्ट हो गये। ह्यूगनोटों का विचार था कि जो शासक धर्म-परिवर्तन कर सकता है, वह दूसरे धर्म की रक्षा नहीं कर सकता है। फलतः हेनरी चतुर्थ ने ह्यूगनोटों को संतुष्ट करने के लिए 15 अप्रैल, 1598 ई. को ‘नांटेस का अध्यादेश’ जारी किया। इस अध्यादेश से ह्यूगनोटों को धार्मिक स्वतंत्रता मिल गई। फ्रांस के लगभग 200 नगरों तथा 3,500 दुर्गों में उन्हें पूजा-संबंधी अधिकार मिल गये। अब वे इन नगरों में सरकारी सहायता से स्कूल एवं कालेज खोल सकते थे एवं पुस्तकों का प्रकाशन कर सकते थे।

ह्यूगनोटों को सैनिक सेवा-संबंधी बाध्यता से मुक्त कर दिया गया और उनके खर्च के लिए राजकोष से निश्चित रकम देने की व्यवस्था की गई। ह्यूगनोटों को नागरिकता के व्यापक अधिकार मिल गये, जिससे सरकारी नौकरियों में उनकी नियुक्ति संभव हो गई। अब ह्यूगनोट न्यायाधीशों की नियुक्ति फ्रांस के सर्वोच्च न्यायालय (पार्लियामेंटों) में भी होने लगी। यही नहीं, कुछ निर्धारित अभियोगों में उन्हें स्वयं निर्णय करने का अधिकार भी मिल गया। उनके धार्मिक एवं नागरिक अधिकारों की सुरक्षा के लिए उन्हें 75 दुर्ग एवं सैन्य-नगर दिये गये। इन दुर्गों व सैन्य-नगरों में नियुक्त सैनिकों को वेतन राजकोष से मिलता था। इन सैनिक अधिकारियों की नियुक्ति ह्यूगनोट करते थे। इस अधिकार की अवधि पहले 1607 ई. तक थी, किंतु बाद में इसे 1612 ई. तक बढ़ा दिया गया।

इस प्रकार नांटेस की राजाज्ञा के द्वारा ह्यूगनोटों को पर्याप्त धार्मिक स्वतंत्रता एवं अधिकार दिये गये। वास्तव में तत्कालीन धार्मिक असहिष्णुता के युग में यह धार्मिक उदारता एक प्रशंसनीय प्रयास था। इस राजाज्ञा ने भयंकर गृहयुद्ध को समाप्त कर दिया और यह स्पष्ट कर दिया कि अब यूरोप में कैथोलिक एवं प्रोटेस्टेंट धर्मों को जड़ से उखाड़ने के प्रयास बेकार हैं। नांटेस की राजाज्ञा ने पहली बार यह सिद्ध किया कि एक ही राजतंत्र की छत्रछाया में एक से अधिक मतावलंबी धार्मिक संघ बना सकते हैं।

किंतु नांटेस की राजाज्ञा में कई दोष भी थे। कैथोलिकों ने इसे उदारवादी योजना की संज्ञा दी, तो प्रोटेस्टेंटों ने भी इसे अपर्याप्त बताया। इस राजाज्ञा ने देश के दशमांश से कम ह्यूगनोटों को अधिकार व सुविधाएँ प्रदान की, किंतु अन्य संप्रदायों को इन अधिकारों व सुविधाओं से वंचित रखा। इसलिए कैथोलिकों ने उसे ‘बुरा कैथोलिक’ कहा, तो प्रोटेस्टेंटों ने उसे ‘बुरा प्रोटेस्टेंट’।

ह्यूगनोटों की धार्मिक स्वतंत्रता ने ह्यूगनोट सामंतों की शक्ति व स्वतंत्रता में असीमित वृद्धि की, जिससे विकेंद्रीकरण की शक्ति को बल मिला, क्योंकि अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए ह्यूगनोट सामंत नगरों व दुर्गों का संघ बनाना आरंभ कर दिये। इस प्रकार नांटेस की राजाज्ञा ने फ्रांसीसी राष्ट्र के अंदर एक स्वतंत्र राज्य का निर्माण कर दिया। बाद में इस समस्या से प्रधानमंत्री रिशलू को निपटना पड़ा।

सुदृढ़ राजतंत्र की स्थापना

फ्रांसीसी गृहयुद्धों ने दलबंदी की जिस प्रवृत्ति को जन्म दिया था, वह राजतंत्र की शक्ति के विकास के लिए घातक थी। फ्रांस में सामंतों ने अपनी शक्ति का अत्यधिक विकास कर लिया था। अतः हेनरी चतुर्थ ने प्रारंभ में तो सुलह की नीति अपनाई, किंतु जब स्थिति स्थिति नियंत्रण में नहीं हुई तो उसने दमन का सहारा लिया। पहले उसने ब्रियो नामक शक्तिशाली सरदार को मार्शल, ड्यूक एवं वर्गंडी का गवर्नर बनाकर उसे अपना विश्वासपात्र बनाने का प्रयत्न किया, किंतु ब्रियो की षड्यंत्रकारी गतिविधियों के कारण पार्लियामेंट ने उसे देशद्रोही घोषितकर मृत्युदंड दे दिया। इस प्रकार अपने विरोधों का अंतकर हेनरी चतुर्थ सुदृढ़ राजतंत्र की स्थापना की।

सुधार कार्यक्रम

अपनी स्थिति सुदृढ करने के पश्चात् हेनरी चतुर्थ ने आर्थिक, राजनीतिक एवं सामाजिक दृष्टि से जीर्ण-शीर्ण फ्रांस के पुनरुद्वार के लिए प्रयास किया। उसने अपने ह्यूगनोट मित्र बेरन रोनी को, जिसे बाद में 1606 ई. में सली के ड्यूक की उपाधि दी गई, अर्थविभाग का अध्यक्ष नियुक्त किया। हेज के शब्दों में, ‘‘यह फ्रांस का सौभाग्य था कि उसे हेनरी चतुर्थ एवं सली जैसे दो व्यक्तियों का लाभ मिला।’’ सली की राजभक्ति, अदम्य उत्साह, कार्यक्षमता तथा प्रतिभा से हेनरी चतुर्थ अत्यंत प्रभावित था। यही कारण है कि दोनों में चारित्रिक विषमता होने पर भी दोनों ने मिलकर फ्रांस के उत्थान का कार्य सफलतापूर्वक संपन्न किया।

आर्थिक एवं प्रशासनिक सुधार

ड्यूक आफ सली ने सबसे पहले जर्जरित राजस्व विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार को दूर करने के लिए कठोरता की नीति अपनाई। अर्थ-विभाग के हिसाब का परीक्षण किया गया और राजस्व संग्रह के लिए राज्य की ओर से कर्मचारी नियुक्त किये गये। अनावश्यक कर्मचारियों को अपदस्थ कर दिया गया और प्रांतीय गंवर्नरों के कार्यों पर नियंत्रण रखने के उद्देश्य से प्रत्येक प्रांत में नये राज्य कर्मचारियों की नियुक्ति की गई, जो राजा के प्रति उत्तरदायी थे। यही नहीं, सली ने राजकीय व्यय तथा सेना पर होनेवाले व्यय को भी निश्चित कर दिया।

नई कृषि प्रणाली को प्रोत्साहन

कृषि के विकास और उत्थान के लिए नई कृषि प्रणाली को प्रोत्साहित किया गया और यह लक्ष्य रखा कि फ्रांस कृषि-उत्पादन के क्षेत्र में यूरोप का प्रथम देष बने। इसके लिए दलदल एवं बंजर भूमि को कृषि-योग्य बनाया गया, सिंचाई के लिए नहरों की उचित व्यवस्था की गई और कृषकों की रक्षा के समुचित उपाय किये गये। आंतरिक चुंगियाँ समाप्त कर दी गईं, दूध उपलब्ध कराने के लिए पशुओं की नस्लों में सुधार किया गया और फसलों पर से सभी निर्यात कर हटा दिये गये। हेनरी के प्रयासों से फ्रांस शीघ्र ही एक महत्वपूर्ण कृषि-उत्पादक देश बन गया। हेनरी चतुर्थ का नारा था: ‘‘रविवारीय भोजन में प्रत्येक किसान की थाली में मुर्गा।’

उद्योग-धंधों एवं व्यापार में सुधार

यद्यपि सली की उद्योग-धंधों एवं व्यापार में कोई विशेष रूचि नहीं थी, किंतु हेनरी चतुर्थ ने हेनरी ने दूरदर्शिता का परिचय देते हुए उद्योग एवं व्यापार के क्षेत्र में विकास का हरसंभव प्रयास किया। उसने लियन (लियो) तथा नीमेस नामक नगरों के रेषम उद्योग को विकसित करने का प्रयास किया। पेरिस एवं नेयर के शीशे, मिट्टी के बर्तन, ऊन एवं लौह उद्योगों को प्रोत्साहन दिया गया। व्यापारिक आवागमन की दृष्टि से सड़कों, पुलों एवं नहरों का जीर्णोद्धार किया गया। तुर्की, इंग्लैंड एवं हालैंड से व्यापारिक संधियाँ की गईं। यही नहीं, स्पेनी व्यापार के एकाधिकार को समाप्त करने के लिए हेनरी ने राज्य की ओर से एक जहाजी बेड़ा एवं नौसेना का गठन भी किया। हेनरी की इस नीति से शीघ्र ही फ्रांस के व्यापार वृद्धि हुई। हेज के शब्दों में ‘‘पेरिस एवं लियो (लियन) की उल्लेखनीय गति वास्तव में हेनरी चतुर्थ के शासनकाल से ही प्रारंभ हुई।” हेनरी के प्रयत्नों के कारण ही भारत एवं उत्तरी अमरीका में फ्रांसीसी व्यापारिक कोठियाँ खुलीं और धीरे-धीरे व्यापार एवं वाणिज्य के क्षेत्र में स्पेनी एकाधिकार को समाप्त करने में सफलता मिली।

इस प्रकार हेनरी चतुर्थ ने न केवल अपने उत्तराधिकार की समस्या का निदान किया, अपितु फ्रांस को युद्धों की विभीषिका से बचाकर उसे राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक सभी क्षेत्रों में प्रगति के पथ पर अग्रसर किया।

हेनरी चतुर्थ की विदेश नीति

हेनरी की विदेशनीति भी गृहनीति की तरह सुस्पष्ट और युक्तिसंगत थी। उसकी विदेश नीति के दो उद्देश्य थे- एक तो, वह स्पेन एवं आस्ट्रिया के हैप्सबर्गीय राजवंश की प्रतिष्ठा में कम करना और दूसरे, यूरोप की राजनीति में फ्रांस और बूर्बा राजवंश की प्रतिष्ठा को स्थापित करना। यही उद्देश्य उसकी विदेश नीति का प्रमुख आधार-स्तंभ थे।

स्पेनिश हस्तक्षेप का अंत

हेनरी चतुर्थ और फ्रांस का मुख्य प्रतिद्वंद्वी एवं स्वाभाविक शत्रु स्पेन था। इसके कई कारण थे। फ्रांस को स्पेन तथा आस्ट्रिया के हैप्सबर्गीय परिवार की सीमाओं ने घेर रखा था जिससे फ्रांस की राष्ट्रीय सुरक्षा खतरे में थी। साथ ही स्पेन की सेनाएँ फ्रांस के गृहयुद्धों का लाभ उठाकर पेरिस में अड्डा जमाये हुए थीं। स्पेन से उसकी शत्रुता जायज भी थी क्योंकि कोई भी शासक अपने राज्य के भीतर विदेशी सेनाओं का जमाव सहन नहीं कर सकता। जब हेनरी ने अपना धर्म-परिवर्तन किया, तो पेरिस की कैथोलिक जनता उसके साथ हो गई और स्पेन को अपनी सेनाएँ पेरिस से हटानी पड़ी।

फ्रांस-स्पेन युद्ध

फ्रांस के गृहयुद्ध की समाप्ति के बाद उसने 1595 ई. में स्पेन के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। 1598 ई. तक चलनेवाले इस फ्रांस-स्पेन युद्ध का अंत वरविंस की संधि तथा कैटियो कैम्ब्रेसिस की संधि की पुनरावृत्ति से हुई। इस प्रकार फ्रांस में स्पेनिश हस्तक्षेप को समाप्त करने में हेनरी चतुर्थ सफलता रहा।

फ्रांस की सीमाओं की रक्षा

फ्रांस की सीमाएँ हैप्सबर्गीय राज्यों से घिरी थीं। इसलिए हेनरी चतुर्थ ने फ्रांस की प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए तथा आस्ट्रिया और स्पेन की प्रतिष्ठा को कम करने के लिए स्पेन एवं आस्ट्रिया के विरोधी राष्ट्रों (जर्मनी, हालैंड, इटली व उत्तरी यूरोपीय राज्यों) को संगठित करने का प्रयास किया। उसने हैप्सबर्ग परिवार की प्रधानता को विनष्टकर शांतिपूर्ण तरीके से समस्याओं के निदान के लिए एक नवीन यूरोपीय व्यवस्था ‘विश्वसंघ’ की स्थापना का प्रयास भी किया, किंतु उसका यह प्रयास असफल रहा।

हेनरी चतुर्थ ने उत्तरी इटली में फ्रांसीसी प्रभाव स्थापित करने के लिए 1600 ई. में टस्कनी के प्रसिद्ध मेडिसी राजवंश की राजकुमारी मेरी-डी-मेडिसी से विवाह किया। 1601 ई. में उसने सेवाय के साथ और 1607 ई. में वेनिस के साथ संधि की। इस संधि के अनुसार स्पेन ने हेनरी चतुर्थ के राज्यारोहण को मान्यता प्रदान की। इस प्रकार मिलान को छोड़कर उसने संपूर्ण उत्तरी इटली से हैप्सबर्गीय प्रभाव का अंत कर दिया।

प्रोटेस्टेंट राज्यों को सहायता

हैप्सबर्ग परिवार को नीचा दिखाने के लिए हेनरी चतुर्थ ने उन प्रोटेस्टेंट राज्यों को सहायता प्रदान करना आरंभ कर दिया जो आस्ट्रिया के सम्राट या जर्मन सम्राट के प्रभाव से भयभीत थे। उसने तुर्की को आस्ट्रिया पर आक्रमण के लिए उकसाया। 1609 ई. में जब जर्मनी में जूलिक एवं क्लीब राज्यों में उत्तराधिकार के लिए गृहयुद्ध आरंभ हुआ, तो हेनरी चतुर्थ ने वहाँ प्रोटेस्टेंटों का समर्थन किया। ऐसी स्थिति में आस्ट्रिया एवं स्पेन के हैप्सबर्गीय राष्ट्रों से फ्रांस का युद्ध कभी भी हो सकता था, किंतु इसी बीच 14 मई, 1610 ई. को एक कट्टर कैथोलिक राबेलाक ने हेनरी चतुर्थ की हत्या कर दी।

हेनरी चतुर्थ का मूल्यांकन

यद्यपि हेनरी चतुर्थ व्यक्तिगत रूप से उच्च चरित्रवाला नहीं था, किंतु अपने देश के प्रति सत्यनिष्ठा एवं अगाध प्रेम के कारण वह स्मरणीय है। उसमें साहस, वीरता एवं असीम धैर्य तो था ही, उसकी हत्या के लिए किये गये सत्रह प्रयत्नों ने उसे जनप्रिय बना दिया था। उसने धर्म को राजनीतिक आवश्यकताओं की पूर्ति का साधन-मात्र मानते हुए देश की सुरक्षा हेतु स्वयं धर्म-परिवर्तन किया। यही नहीं, कैथोलिक बनने के उपरांत भी उसने प्रोटेस्टेंटों के हितों का पूरा ध्यान रखा। इस प्रकार उसने धार्मिक समस्या का एक संतोषजनक हल निकाला।

राज्यारोहण के समय हेनरी को फ्रांस क्षत-विक्षप्त अवस्था में मिला था, किंतु अपने अथक प्रयास से उसने फ्रांस के राष्ट्रीय गौरव को तो स्थापित किया ही, साथ ही फ्रांस को सुसंगठित भी कर दिया। एक कुशल कूटनीतिज्ञ के रूप में उसने फ्रांस की विदेश नीति को स्पष्ट किया, किंतु उसकी असामयिक मृत्यु के बाद फ्रांस एक बार फिर संकट में पड़ गया। इस संकट से फ्रांस को 15 वर्षों के बाद तब मुक्ति मिली, जब हेनरी चतुर्थ के उत्तराधिकारी लुई तेरहवें ने रिशलू को अपना प्रधानमंत्री नियुक्त किया।

लुई तेरहवाँ (1610-1643 ई.)

हेनरी चतुर्थ की असामयिक मृत्यु के पश्चात् उसका पुत्र लुई तेरहवाँ (1610- 1643 ई.) तीन वर्ष की आयु में फ्रांस का शासक बना। लुई तेरहवाँ के शासनकाल को दो भागों में बाँटा जा सकता है- प्रथम भाग में उसने हेनरी चतुर्थ की विधवा मेरी-डी-मेडिसी के संरक्षण में शासन किया और दूसरे भाग में वयस्क होने पर लुई तेरहवें ने शासन की बागडोर स्वयं सँभाली और कार्डिनल रिशलू को अपना प्रधानमंत्री एवं सलाहकार नियुक्त किया।

मेरी-डी-मेडिसी का संरक्षण काल (1610-1617 ई.)

लुई तेरहवें ने अल्पवयस्क होने के कारण हेनरी चतुर्थ की विधवा मेरी-डी-मेडिसी के संरक्षण में 1610 से 1617 ई. तक शासन किया। फ्लोरेंस के प्रसिद्ध मेडिसी राजवंश की राजकुमारी मेरी-डी-मेडिसी एक ‘महत्वाकांक्षी, किंतु अयोग्य महिला थी।

मेरी-डी-मेडिसी की नीतियाँ

मेरी-डी-मेडिसी ने हेनरी चतुर्थ की गृहनीति के सिद्धांतों का परित्याग कर उसके द्वारा किये गये सुधारों पर पानी फेर दिया। संरक्षिका बनते ही उसने सली को पदच्युत् कर इटालियनों को सलाहकार नियुक्त किया। मेरी की कट्टर कैथोलिक नीति और सली की पदच्युति से ह्यूगनोट असंतुष्ट हो गये, तो उसकी इटालियन परामर्शदाताओं की नियुक्ति से कैथालिक भी क्रांधित हो उठे।

यही नहीं, मेरी के शासनकाल में सामंत भी अपने अधिकारों के लिए विद्रोह करने पर उतारू हो गये। विद्रोही सामंतों को खुश करने के लिए संरक्षिका मेरी ने सली द्वारा संचित धन का भरपूर दुरुपयोग किया, जिससे फ्रांस का खजाना खाली हो गया। देश को आर्थिक संकट से उबारने के लिए 1614 ई. में स्टेट्स जनरल का अधिवेशन बुलाया गया, किंतु राजमाता ने ‘सभा भवन में ताले लगवा दिये।’ अधिवेशन की विफलता से देश में गृहयुद्ध की स्थिति पैदा हो गई।

मेरी-डी-मेडिसी की विदेश नीति

मेरी-डी-मेडिसी ने हेनरी चतुर्थ की विदेश नीति का परित्याग कर स्पेन से मित्रता करने का प्रयास किया। उसने देश की चिंता न करते हुए अपने पुत्र लुई तेरहवें का विवाह 1615 ई. में स्पेन के शासक फिलिप द्वितीय की पुत्री एन आॅफ आस्ट्रिया के साथ कर दिया और फ्रांसीसी राजकुमारी एलिजाबेथ का विवाह स्पेन के युवराज से कर दिया। उसके इन देश-विरोधी कार्यों से फ्रांसीसी जनता में असंतोष होना स्वाभाविक था। इससे फ्रांस की आंतरिक स्थिति तो खराब हुई ही, अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्र में भी फ्रांस को स्पेन का पिछलग्गू समझा जाने लगा।

फ्रांस गृहयुद्ध के मुहाने कगार पर खड़ा था, लेकिन 1617 ई. में वयस्क हो जाने के कारण लुई तेरहवें ने शासन की बागडोर अपने हाथों में ले ली और राजमाता व उसके प्रिय पदाधिकारियों को पदच्युत कर दिया। इस प्रकार अब लुई तेरहवें के शासनकाल का दूसरा चरण आरंभ हुआ, व्यावहारिक रूप से जिसका नेतृत्व उसके प्रधानमंत्री कार्डिनल रिशलू ने किया।

लुई तेरहवें के शासन का द्वितीय चरण (1617-1643 ई.)

लुई तेरहवें में प्रशासकीय क्षमता एवं योग्यता का अभाव था। वह संगीत एवं शिकार का प्रेमी था। लगता था कि फ्रांस के उत्थान का जो सपना हेनरी चतुर्थ और सली ने देखा था, वह साकार नहीं हो सकेगा। किंतु यह फ्रांस का सौभाग्य था कि 1624 ई. में लुई तेरहवें ने कार्डिनल रिशलू को अपना प्रधानमंत्री बनाकर शासन का संपूर्ण उत्तरदायित्व उसको सौंप दिया। रिशलू ने इस उत्तरदायित्व को अगले 18 वर्षों तक पूरी निष्ठा और लगन से निभाया।

कार्डिनल रिशलू (1624-1642 ई.)

रिशलू का जन्म 1585 ई. में पेरिस के प्यायतू के एक सामंत परिवार में हुआ था। वह धार्मिक षिक्षा प्राप्तकर 21 की आयु में ल्यूसों का बिशप हो गया। 1614 ई. में उसने स्टेट्स जनरल की सभा में पुरोहित वर्ग का प्रतिनिधित्व किया। उसकी प्रतिभा, वाक्-पटुता, व्यक्तित्व व आचरण से प्रभावित होकर लुई तेरहवें की संरक्षिका राजमाता मेरी-डी-मेडिसी ने उसे फ्रांसीसी दरबार में रायल कौंसिल का सदस्य बना दिया। इसके बाद रिशलू रोमन चर्च का कार्डिनल भी बन गया। रिशलू की अद्भुत प्रतिभा पर मुग्ध होकर लुई तेरहवें ने 1624 ई. में उसे अपना प्रधानमंत्री एवं सलाहकार नियुक्त कर लिया।

1624 ई. में प्रधानमंत्री का पद संभालते समय रिशलू ने लुई तेरहवें के सामने जो प्रतिज्ञा की, उसमें उसके उद्देश्यों, गृहनीति और विदेश नीति का पूर्ण पूर्ण स्पष्टीकरण मिल जाता है। रिशलू ने लुई तेरहवें को संबोधित करते हुए प्रतिज्ञा की थी: ‘‘मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि ह्यूगनोटों का विनाश करने, शक्तिशाली एवं अहंकारी सामंतों को नतमस्तक करने तथा आपकी समस्त प्रजा को आज्ञाकारी एवं कर्तव्य-परायण बनाने के लिए और विदेशों में आपके गौरवपूर्ण राजतंत्र को पूर्णरूप से यथोचित प्रतिष्ठा दिलाने में ही मैं अपनी समस्त शक्तियों व अधिकारों (जो आपकी कृपा से मुझे प्राप्त हुई है) का उपयोग करूंगा।’’ रिशलू ने अपनी इस प्रतिज्ञा का पूरी निष्ठा एवं कर्मठता के साथ मृत्यु-पर्यंत (1642 ई.) पालन किया और 1624 ई. से 1642 ई. तक फ्रांस का वास्तविक भाग्यविधाता बना रहा।

रिशलू की उपलब्धियाँ

जिस समय रिशलू ने फ्रांस के प्रधानमंत्री का पद सँभाला उस समय फ्रांस गृहयुद्ध के कगार पर खड़ा था। सुदृढ़ प्रशासन के अभाव में फ्रांस के राजतंत्र का अस्तित्व खतरे में था। ह्यूगनोटों के राजनीतिक एवं सैन्य-अधिकारों में वृद्धि एवं विद्रोही सामंतों के प्रभुत्व ने बूर्बा राजवंश के अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया था। देष की आर्थिक स्थिति डावाँडोल थी और न्याय व्यवस्था भगवान भरोसे।

फ्रांस की इस संकटपूर्ण स्थिति से निपटने के लिए रिशलू ने अपनी गृह-नीति को दो उद्देश्यों तक सीमित किया- एक तो बूर्बा वंश की प्रतिष्ठा को सार्वभौम बनाना, जिसके लिए उसे ह्यूगनोटों एवं सामंत वर्गों का दमन करना आवश्यक था और दूसरा फ्रांस को एक सुसंगठित, सुव्यवस्थित एवं सुदृढ़ प्रशासन प्रदान कर शासन का केंद्रीकरण करना। दूसरे शब्दों में, रिशलू फ्रांस में केवल एक ही राजकोश, जो केवल राजा का हो, देखना चाहता था, वह फ्रांस के लिए केवल एक सशस्त्र सेना, केवल राजा की सेना देखना चाहता था, और ये दोनों उद्देश्य तत्कालीन फ्रांस की आंतरिक स्थिति से निपटने के लिए पर्याप्त थे। अपने उद्देश्यों की पूर्ति के रिशलू ने कई महत्वपूर्ण कदम उठाये-

ह्यूगनोटो के अधिकारों की समाप्ति

हेनरी चतुर्थ के काल में नांटेस की राजाज्ञा के कारण ह्यूगनोटों ने स्वयं को एक शक्तिशाली राजनीतिक दल के रूप में संगठित कर लिया था, जिससे ‘राज्य के भीतर राज्य’ की स्थिति पैदा हो गई थी। यह बूर्बा राजवंश के लिए खतरे का संकेत था। यद्यपि रिशलू ह्यूगनोटों की धार्मिक स्वतंत्रता का विरोधी नहीं था, किंतु वह उन्हें राजनीतिक दृष्टि से राजा की आज्ञा के अधीन करना चाहता था। जब 1625 ई. में हयूगनोटों ने राजतंत्र के प्रति विद्रोह किया, तो रिशलू ने ह्यूगनोटों के प्रमुख गढ़ रशेल का घेरा डाल दिया। इंग्लैंड की सहायता के बावजूद ह्यूगनोटों को अक्टूबर, 1628 ई. में रिशलू के समक्ष आत्म-समर्पण करना पड़ा। रिशलू ने धार्मिक सहिष्णुता का परिचय देते हुए ह्यूगनोटों के साथ ‘आलैस की संधि’ कर ली। इस संधि के अनुसार ह्यूगनोटों के धार्मिक एवं नागरिक अधिकार यथावत् बने रहे, किंतु उनके सेना, दुर्ग एवं राजनीतिक सभाएँ करने संबंधी अधिकार समाप्त कर दिये गये। इस प्रकार रिशलू ने बड़ी चतुराई से ह्यूगनोटों की धार्मिक भावनाओं का सम्मान करते हुए बूर्बा राजवंश का भविष्य सुरक्षित कर दिया।

सामंतों का दमन

बूर्बा राजवंश की सुरक्षा के लिए रिशलू ने उद्दंड सामंतों की स्वतंत्रता एवं विशेषाधिकारों पर प्रहार किया। फ्रांस में सामंत ही प्रांतीय गवर्नर नियुक्त किये जाते थे और धीरे-धीरे इन सामंतों ने अपनी-अपनी सेना खड़ी कर ली थी। इस सेना के बल पर ये सामंत अपने प्रांतों में शासक की तरह शासन करते थे और कभी-कभी राजाज्ञा का भी विरोध करने में नहीं हिचकते थे। राजमाता मेरी-डी-मेडिसी एवं डयूक आफ आर्लेआं की शह पर इन्होंने राजदरबार में भी षड्यंत्र आरंभ कर दिया था। इस खतरनाक स्थिति से निपटने के लिए रिशलू ने 1626 ई. में एक विशिष्ट अध्यादेश घोषित कर सामंतों के सभी दुर्गों को नष्ट करने की आज्ञा दे दी। उसने सामंतों के द्वंद्वयुद्धों पर प्रतिबंध लगा दिया और उनके शिकार-संबंधी अधिकार अवैध घोषित कर दिये। इनका उल्लंघन करने पर मृत्युदंड का विधान किया गया। रिशलू ने इस अध्यादेश को इतनी कड़ाई से लागू किया कि मांटगोमरी के शक्तिशाली परिवार के नेता काउंट मुटबिल को मृत्युदंड दे दिया। इस प्रकार रिशलू ने अपनी कठोरता और गुप्तचर प्रणाली के बल पर सामंतों की उद्दंडता एवं स्थानीय स्वतंत्रता का दमन किया और उन्हें राज्याधीन किया जो उसकी महत्वपूर्ण उपलब्धि थी।

शासन का केंद्रीकरण

रिशलू जानता था कि प्रषासन का केंद्रीयकरण करके ही सुव्यवस्थित एवं सुदृढ़ प्रशासन स्थापित किया जा सकता है। इसलिए उसने सबसे पहले प्रांतीय सरदारों या सामंतों के अधिकारों को सीमित कर उनके सैन्य-संगठन, न्याय एवं राजस्व-संग्रह जैसे अधिकार समाप्त कर दिये। इनके स्थान पर प्रत्येक जिले में एक नवीन राज्य कर्मचारी नियुक्त किये गये जिसे इन्टेंडेंट कहते थे। इन अधिकारियों को अपने क्षेत्र का संपूर्ण विवरण रिशलू के पास भेजना होता था, और ये केंद्र के ही प्रति उत्तरदायी थे। कालांतर में इन अधिकारियों की संख्या 30 हो गई, जिसके कारण इन्हें ‘तीस निरंकुश शासक’ कहा जाने लगा।

रिशलू के आदेशानुसार इन्टेंडेंटों द्वारा प्रांतों, नगर सभाओं, गाँवों, पार्लियामेंट एवं बिशप आदि पर नियंत्रण व संचालन होता था। रिशलू ने स्टेट्स जनरल एवं पार्लियामेंट को शक्तिहीन कर राजपद में ही सभी अधिकार निहित कर दिये। उसने अपने शासनकाल में स्टेट्स जनरल का अधिवेशन ही नहीं बुलाया और पार्लियामेंट को बाध्य किया कि वह समस्त अध्यादेशों को पारित करे। दरअसल रिशलू बूर्बा वंश का वफादार सेवक एवं फ्रांसीसी देशभक्त दोनों था। फ्रांस का देशभक्त होने के कारण वह स्पेनिश प्रधानता एवं प्रतिष्ठा को धूमिल कर यूरोप की राजनीति में फ्रांस को प्रतिष्ठित स्थान दिलाना चाहता था। इस प्रकार लुई तेरहवें के एक वफादार सेवक के रूप में रिशलू हैप्सवर्ग परिवार की प्रतिष्ठा को समाप्त कर यूरोप में बूर्बा राजवंश की प्रतिष्ठा एवं गौरव को स्थापित करने मे कामयाब हुआ।

रिशलू की विदेश नीति

फ्रांस के विकास की सबसे बड़ी बाधा स्पेन और आस्ट्रिया का विस्तृत साम्राज्य था। मेरी-डि-मेडिसी की स्पेनपरस्त नीति के कारण रिशलू के प्रधानमंत्री बनने के समय फ्रांस को स्पेन का ‘पिछलग्गू’ कहा जाता था। किंतु कार्डिनल रिशलू की विदेश नीति का उद्देश्य अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्र में फ्रांस के गौरव को स्थापित करना था, इसलिए उसने स्पेन और आस्ट्रिया के हैप्सबर्गीय राजवंष की गरिमा को नष्ट करने का हरसंभव प्रयास किया।

अपनी उद्देश्यों की पूर्ति के लिए रिशलू ने पिरेनीज, राइन नदी तथा नीदरलैंड्स की ओर फ्रांसीसी सीमा का गठन व सीमा-विस्तार करना प्रारंभ किया। उसने इंग्लैंड से वैवाहिक संबंध स्थापित कर शीघ्र ही वैलेंटाइन पर अधिकार कर लिया। हैप्सबर्गीय राजवंश को नीचा दिखाने के लिए रिशलू ने कैथालिक होते हुए भी तीसवर्षीय युद्ध में हस्तक्षेप कर प्रोटेस्टेंटों की सहायता की जिससे तीसवर्षीय युद्ध का स्वरूप पूर्णतः राजनीतिक हो गया। यद्यपि तीसवर्षीय युद्ध के समाप्त होने के पहले ही (4 फरवरी, 1642 ई.) रिशलू की मौत हो गईं, किंतु युद्ध का निर्णय फ्रांस के अनुकूल रहा। यह युद्ध 1648 ई. में वेस्टफेलिया की संधि से समाप्त हुआ। 1659 ई. में पिरेनीज की संधि से स्पेन-फ्रांस युद्ध का भी अंत हो गया। यह फ्रांस के लिए एक नये युग का आरंभ था। इस प्रकार रिशलू ने एक साहसपूर्ण विदेश नीति अपनाई और अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में बूर्बा वंष की प्रतिष्ठा को स्थापित कर दिया।

रिशलू की उपलब्धियों का मूल्यांकन

फ्रांस में निरंकुष राजतंत्र के संस्थापक के रूप में रिषलू की सेवाएँ अविस्मरणीय रहेंगी। संपूर्ण फ्रांस में एक केंद्रीयकृत, शक्तिशाली एवं सुसंगठित व्यवस्था स्थापित करने के लिए उसने ह्यूगनोटों और शक्तिशाली सामंतों के राजनीतिक एवं सैनिक अधिकारों का दमन किया जो निःसंदेह एक कठिन कार्य था। उसने इन्टेंडेंट्स नामक अधिकारियों की नियुक्ति कर प्रांतीय स्वतंत्रता का अंत किया और सामान्यतः लोकतांत्रिक पद्धति का गला घोंटा, परंतु इसके लिए रिशलू को दोषी नहीं माना जा सकता है। तत्कालीन परिवेश में सुदृढ़ राजतंत्र की स्थापना एक अनिवार्यता थी। दूसरी ओर स्टेट्स जनरल के 1614 ई. के अधिवेशन में वह स्वयं स्टेट्स जनरल की माखौलबाजी को देख चुका था और साथ ही इंग्लैंड में पार्लियामेंट व राजा के बीच चल रहे संघर्ष से वह परिचित था। इसलिए जब फ्रांस गृहयुद्ध के कगार पर था, पालियामेंट के अधिकारों को सीमित करना उसकी दूरदर्शिता ही थी।

कहा जाता है कि उसने प्रजाहित की उपेक्षा की। यह सही है कि आंतरिक समस्याओं के कारण वह देश में सुधारों को कार्यान्वित नहीं कर सका, किंतु उसने फ्रांस के व्यापार में वृद्धि के लिए डेनमार्क, स्वीडेन एवं रूस से व्यापारिक संधियाँ की और जनता को शासन में स्थान देने का प्रयास किया। इन्टेंडेंट्स नामक अधिकारी मध्यम वर्ग से ही चयनित होते थे। सबसे बड़ी बात यह कि उसने राजनीति को प्रमुखता दी, धर्म को नहीं। एक कैथोलिक होते हुए भी उसने फ्रांस के गौरव को यूरोप में प्रतिष्ठित करने के लिए उत्तरी यूरोप एवं जर्मनी के प्रोटेस्टेंट राज्यों की सहायता की और हैप्सबर्गीय वंश के गौरव को समाप्त किया। इस तरह रिशलू फ्रांस में निरंकश राजतंत्र का प्रमुख निर्माता था। उसकी महत्ता का आंकलन इस बात से होता है कि उसकी नीति का अनुसरण उसके अनुगामी प्रधानमंत्री कार्डिनल मेजारिन ने भी किया।

कार्डिनल मेजारिन (1642-1661 ई.)

कार्डिनल मेजारिन 1602 ई. में इटली के एक साधारण परिवार में पैदा हुआ था। उसने रोम एवं मेड्रिड में शिक्षा पाई थी। वह चर्च का उच्च पदाधिकारी बनना चाहता था। अपनी इच्छा के अनुरूप वह पेरिस में पोप का प्रतिनिधि नियुक्त हुआ था। यहीं उसका संपर्क कार्डिनल रिशलू से हुआ। रिशलू उससे प्रभावित हुआ और उसने उसे फ्रांस में सरकारी पद पर नियुक्त कर दिया। 1639 ई. में उसने फ्रांस की नागरिकता ग्रहण कर ली। कार्डिनल रिशलू की मृत्यु के पश्चात् लुई तेरहवें ने कार्डिनल मेजारिन को अपना प्रधानमंत्री एवं सलाहकार नियुक्त किया, किंतु 14 मई, 1643 ई. को लुई तेरहवें की भी मृत्यु हो गई।

लुई तेरहवें की मृत्यु के पश्चात् उसका पाँच वर्षीय पुत्र लुई चौदहवाँ फ्रांस का शासक बना और उसकी माता उसकी संरक्षिका नियुक्त हुई। कार्डिनल मेजारिन अपने पद पर यथावत् बना रहा।

कार्डिनल मेजारिन की उपलब्धियाँ

रिशलू ने फ्रांस में जो केंद्रीयकृत शासन स्थापित किया था, उस पर नियंत्रण बनाये रखने के लिए रिशलू की ही भाँति कठोर नीति की आवश्यकता थी, किंतु कार्डिनल मेजारिन में रिशलू के समान क्षमता एवं योग्यता नहीं थी। इसलिए शीघ्र ही देश की आंतरिक स्थिति इतनी खराब हो गई कि 1648 ई. में फ्रांस में भयंकर विद्रोह हो गया, जिसे इतिहास में ‘फ्रोंडे’ (गृहयुद्ध) के नाम से जाना जाता है। यह युद्ध 1652 ई. तक चलता रहा।

फ्रोंडे (गृहयुद्ध) के कारण

फ्रोंडे शब्द से अभिप्राय लड़कों के एक खेल से है, जिसे स्थानीय पुलिस नियंत्रित करती थी, किंतु रूपक अर्थ में इसका तात्पर्य सरकार का विरोध करनेवालों से था। फ्रोंडे (विद्रोह) के कई कारण थे-एक, तीसवर्षीय युद्ध में फ्रांस की आर्थिक स्थिति खराब हो चुकी थी और कार्डिनल मेजारिन ने अपने विरोधियों को संतुष्ट करने के लिए विरोधियों के धन-वितरण की नीति अपनाई, जिससे राजकोष प्रायः रिक्त हो गया।

सरकार ने अत्यधिक कर वसूली से इसकी भरपाई करने की कोशिश की। करों की वसूली ठेके पर साहूकार करते थे जो निरीह जनता से अधिकाधिक कर वसूल करते थे। इस प्रथा से एक ओर तो साहूकार धनाढ्य हो गये, दूसरी ओर सामान्य जनता में व्यापक असंतोष फैल गया। दूसरे, देश की विपन्न आर्थिक स्थिति का लाभ उठाकर सामंत वर्ग अपनी शक्ति पुनः प्राप्त करना चाह रहा था, इसलिए वे मेजारिन को सत्ता से बेदखल करना चाहते थे। तीसरे, मेजारिन मूलरूप से इटली का निवासी था और फ्रांस की नागरिकता ग्रहण करने के बाद भी लोग उसे विदेशी ही मानते थे। सामंतों व पार्लमां ने मेजारिन को विदेशी कहकर जनता का समर्थन लेने का प्रयास किया।

पेरिस की पार्लमां

पेरिस की पार्लमां को यह अधिकार था कि वह राजा द्वारा पारित अध्यादेशों को स्वीकार करे या न करे। बिना पार्लमां की स्वीकृति के कोई भी अध्यादेश कानून नहीं बन सकता था। रिशलू ने पार्लमां को बाध्य किया था कि वह सभी अध्यादेशों को पारित करे। किंतु रिशलू की मृत्यु होते ही 1644 ई. में पार्लमां ने राजकीय अध्यादेशों को अस्वीकृत कर शासन का विरोध करना आरंभ कर दिया। यही नहीं, पार्लमां के न्यायाधीशों की समिति ने लुई चौदहवें के सम्मुख एक माँग-पत्र प्रस्तुत किया कि, ‘‘पेरिस की पार्लमां की स्वीकृति के बिना कोई नया कर न लगाया जाये, नये पदों का सृजन न किया जाये। किसी भी व्यक्ति को बिना मुकदमा चलाये 24 घंटे से अधिक जेल में न रखा जाये। ठेकेदारों की कर-वसूली की उचित जाँच की जाए। करों में कमी की जाये और इन्टेंडेंटों के पद समाप्त किये जायें।

चूंकि इस समय शाही सेना जर्मनी में थी, इसलिए मेजारिन ने माँग-पत्र की कुछ बातें मान ल़ीं। इन्टेंडेंटों के पद निरस्त कर दिये गये, करो में भारी कमी कर दी गई और वित्तीय अनियमितताओं की न्यायिक जाँच का आश्वासन दिया गया, किंतु जैसे ही 6 माह पश्चात् शाही सेना जर्मनी से वापस आ गई, मेजारिन ने सैन्य-बल का प्रयोगकर दिये गये अधिकारों को समाप्त करने का प्रयास किया। इससे पूरे देश में विद्रोह आरंभ हो गया।

फ्रोंडे (गृहयुद्ध) की घटनाएँ

कार्डिनल मेजारिन द्वारा सैन्य-बल का प्रयोग विद्रोहियों के लिए असह्य था। स्थानीय षड्यंत्रों एवं विद्रोहों का सिलसिला जनवरी, 1648 ई. से आरंभ हो गया। लेकिन मेजारिन ने अप्रैल, 1649 ई. की ‘रूयूईल की संधि’ द्वारा प्रथम फ्रोंडे (गृहयुद्ध) का अंत कर दिया। इस संधि के अनुसार मेजारिन ने स्वीकृत किये गये अधिकारों की पुष्टि कर दी।

राजकुमरों का फ्रोंडे

रूर्यूइल की संधि (1649 ई.) क्षणिक सिद्ध हुई क्योंकि विद्रोहियों का मुख्य उद्देश्य स्वीकृत किये गये अधिकारों की पुष्टि कराना नहीं, मेजारिन को अपदस्थ कराना था। 1650 ई. में पुनः गृहयुद्ध आरंभ हो गया जो कि 1652 ई. तक चला। किंतु इस इस बार विद्रोह में मुख्यतया उच्च वर्ग एवं राजपरिवार के सामंतों ने ही भाग लिया। इसलिए इसे ‘राजकुंमारों का फ्रोंडेे’ कहा जाता है।

इस युद्ध का आरंभ उस समय हुआ जब मेजारिन ने खतरनाक विद्रोही कोदे सहित अनेक सामंतों को बंदी बना लिया। कोदे व अन्य सामंतों को बंदी बनाये जाने की सूचना पेरिस व अन्य प्रांतों में आग की तरह फैल गई। मेजारिन को फरवरी, 1651 ई. में पेरिस छोड़कर ब्रूल भागना पड़ा और कोदे व उसके साथियों को छोड़ना पड़ा। कोदे ने पेरिस पर अधिकार कर कार्डिनल की पदवी धारण की, किंतु शीघ्र ही उसके अहंकार के कारण उसके सहयोगियों ने उसका साथ छोड़ दिया। फलतः कोदे को अक्टूबर 1652 ई. में भागकर स्पेन में शरण लेनी पड़ी। कोदे के पेरिस से भागते ही लुई चैदहवें ने पेरिस में शान के साथ प्रवेश किया। इस प्रकार ’द्वितीय फ्रोंडे’ का भी अंत हो गया।

फ्रोंडेे की असफलता के कई कारण थे- एक, पार्लमां कोई जनता की प्रतिनिधि संस्था नहीं थी। वह देश की सर्वोच्च अदालत थी। इसलिए पार्लमां को सामान्य जनता का पूरा सहयोग नहीं मिला। दूसरे, फ्रोंडे के प्रथम विद्रोह में तो जनता ने विद्रोहियों का साथ दिया था, किंतु पेरिस में सरकार बन जाने पर सामंत अपने-अपने स्वार्थों की पूर्ति में लग गये। स्वार्थ-पूर्ति के लिए लड़ते सामंतों को देखकर जनता निराश हो गई और उसने उच्च वर्ग व सामंत वर्ग का समर्थन नहीं किया। तीसरे, विद्रोहियों के पास कोई निर्धारित कार्यक्रम या वास्तविक आदर्श नहीं था। इसके अलावा, बौद्धिक जागरण के अभाव में फ्रांस की जनता स्वेच्छाचारी एवं निरंकुश राजतंत्र की आदी हो चुकी थी।

फ्रोंडे की असफलता से सामंत एवं उच्च वर्ग की प्रतिष्ठा को गहरा धक्का लगा। पार्लमां के राजनीतिक एवं आर्थिक अधिकारों पर अब राजतंत्र का अंकुश दिन-प्रतिदिन बढ़ता गया। द्वितीय फ्रोंडे की असफलता से निरंकुश राजतंत्र की स्थापना में आनेवाली सभी बाधाएँ दूर हो गईं। इस प्रकार मेजारिन फ्रांसीसी गृहयुद्ध का दमन करने में सफल रहा, किंतु वह फ्रांस की वित्तीय स्थिति को सुधारने का वह कोई प्रयास नहीं कर सका।

मेजारिन की विदेश नीति

मेजारिन ने रिशलू द्वारा अपनाई गई विदेश नीति को आधार बनाकर स्पेन व आस्ट्रिया के हैप्सबर्ग राजवंश के स्थान पर फ्रांस के बू्र्बा राजवंश के गौरव को प्रतिष्ठित करने का प्रयास किया। उसने रिशलू के बाद तीसवर्षीय युद्ध में फ्रांस की सक्रियता बनाये रखी। 1648 ई. में उसने हैप्सबर्ग सम्राट के साथ वेस्टफेलिया की संधिकर फ्रांस के गौरव को यूरोप में प्रतिष्ठित किया। स्टुबर्ग को छोड़कर संपूर्ण अल्सास व राइन क्षेत्र पर फ्रांस का अधिकार हो गया। यही नहीं, जर्मनी में फ्रांसीसी अधिकारों की भी पुष्टि की गई और उसे जर्मन पार्लियामेंट में अपने प्रतिनिधि भेजने का अधिकार मिल गया।

तीसवर्षीय युद्ध की समाप्ति के पश्चात् भी मेजारिन ने स्पेन से युद्ध जारी रखा जो कि 1659 ई. की पिरेनीज की संधि से समाप्त हुआ। इस संधि से रूसिलों एवं दक्षिणी नीदरलैंड्स के कुछ प्रदेशों पर भी फ्रांस का अधिकार हो गया। फिलिप चतुर्थ ने अपनी पुत्री मारिया थेरेसा का विवाह लुई चौदहवें से करना स्वीकार किया। किंतु यह निश्चित किया गया कि विवाह में प्राप्त होनेवाले दहेज के बदले में मारिया थेरेसा स्पेनी सिंहासन पर अपने अधिकार का दावा नहीं करेगी। लेकिन स्पेन दहेज की राशि चुका नहीं पाया और यहीं से बाद में होनेवाले स्पेनी उत्तराधिकार के युद्ध में फ्रांस के हस्तक्षेप की पृष्ठभूमि तैयार हो गई।

मेजारिन की उपलब्धियों का मूल्यांकन

मेजारिन में कई चारित्रिक दोष थे। वह धनलोलुप और अस्थिर प्रकृति का तो था ही, उसमें विवेकशीलता की भी भारी कमी थी। वह फ्रांस की आर्थिक स्थिति को सुधारने में असफल रहा जो भावी फ्रांस के लिए नासूर बन गया। फिर भी, उसने फ्रोंडे (गृहयुद्ध) का सफलतापूर्वक दमनकर बू्र्बा राजवंश की निरंकुशता को प्रतिस्थापित करने में सफलता पाई। वेस्टफेलिया तथा पिरेनीज की संधियों द्वारा उसने अपनी मृत्यु (1661 ई.) के पहले अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में बूर्बा राजवंश को प्रतिष्ठिापित कर दिया।