पुलकेशिन् द्वितीय के बाद वातापी के चालुक्य (Chalukya of Vatapi After Pulakeshin II)

642-43 ई. के लगभग पुलकेशिन् द्वितीय की पराजय और उसकी मृत्यु के उपरांत लगभग तेरह वर्ष तक वातापी के चालुक्य राजवंश का इतिहास अस्पष्टता एवं अनिश्चिता के अंधकार से आच्छादित है। इस अतंराल में वातापी से सिर्फ एक अभिलेख मिला है जो पल्लव नरेश नरसिंहवर्मन प्रथम के शासन के 13वें वर्ष (642-43 ई.) का है। वास्तव में पुलकेशिन् द्वितीय के बाद चालुक्य राज्य में राजनैतिक अव्यवस्था उत्पन्न हो गई और वातापी सहित कुछ अन्य दक्षिणी प्रांतों पर पल्लवों का अधिकार हो गया था। चालुक्य राज्य की इस अराजकता का लाभ उठाकर बेल्लारी, नेल्लोर, कुडप्पा और अनंतपुर के क्षेत्र चालुक्य राज्य से अलग हो गये। लाट का चालुक्य सामंत विजयराज की स्वतंत्र हो गया। इसकी पुष्टि उसके द्वारा जारी 643 ई. के कैरा दानपत्र से होती है जिसमें कलचुरि संवत् का प्रयोग किया गया है और चालुक्य सम्राट का कोई उल्लेख नहीं है। विजयराज को पुलकेशिन् ने ही लाट का सामंत नियुक्त किया था। इसी प्रकार सेंद्रक राजकुमार पृथ्वीवल्लभ निकुंभल्लशक्ति ने भी अपनी स्वतंत्रता घोषित कर दी, जबकि सेंद्रक, कीर्त्तिवर्मा के समय से ही चालुक्यों के स्वामिभक्त रहे थे।

चालुक्य इतिहास के अंधकार-काल का एक कारण संभवतः पुलकेशिन् द्वितीय के पुत्रों के बीच सत्ता के लिए होने वाला पारस्परिक संघर्ष भी था। अभिलेखों तथा कुछ साहित्यिक स्रोतों में पुलकेशिन् द्वितीय के छः पुत्रों की सूचना मिलती है- आदित्यवर्मन्, विक्रमादित्य प्रथम, चंद्रादित्य, जयसिंहवर्मन्, नेऽमरि तथा रणरागवर्मन्

अभिलेखों से ज्ञात होता है कि पुलकेशिन् द्वितीय की मृत्यु के उपरांत चालुक्य राज्य में राजनीतिक अस्थिरता एवं अशांति का वातावरण व्याप्त हो गया था। ऐहोल से प्राप्त एक अतिथित लेख से संकेत मिलता है कि पुलकेशिन् द्वितीय ने अपनी मृत्यु के पूर्व विक्रमादित्य प्रथम को अपना उत्तराधिकारी मनोनीत कर दिया था। किंतु कुछ अभिलेखों से पुलकेशिन् के दो अन्य पुत्रों- आदित्यवर्मन् तथा चंद्रादित्य का राजाओं के रूप में उल्लेख मिलता है। कर्लूर से प्राप्त आदित्यवर्मन् के लेख में उसकी स्वतंत्र उपाधियाँ-महाराजाधिराज, परमेश्वर आदि मिलती हैं जबकि नेरुर ताम्रपत्र में चंद्रादित्य को ‘पृथ्वीवल्लभ’ तथा ‘महाराज’ कहा गया है। किंतु अंत में, विक्रमादित्य प्रथम ने अपने नाना गंग नरेश दुर्विनीति की सहायता से न केवल पल्लव शासक नरसिंहवर्मन् को पराजित कर अपनी राजधानी बादामी को पल्लव आधिपत्य से मुक्त कराया, बल्कि बादामी के सिंहासन पर अधिकार कर राजसत्ता के लिए होने वाले संघर्ष का अंत किया।

विक्रमादित्य प्रथम, 655-681 ई. (Vikramaditya I, 655-681 AD)

विक्रमादित्य प्रथम पुलकेशिन् द्वितीय का पुत्र था, जिसे उसके पिता ने अपनी मृत्यु के पूर्व ही अपना उत्तराधिकारी मनोनीत कर दिया था (तत्पादपद्योपाश्रयप्रसादो पातश्रीमहीमान्भागी)। किंतु पुलकेशिन् द्वितीय की पराजय तथा मृत्यु के बाद चालुक्य राज्य में अराजकता और अव्यवस्था फैली रही। विक्रमादित्य प्रथम अपने नाना गंगनरेश दुर्विनीत की सहायता से 655 ई. में बादामी के राजसिंहासन पर अधिकार करने में सफल हो सका।

लगता है कि विक्रमादित्य प्रथम ने पहले पल्लव नरेश नरसिंहवर्मन् को हराकर वातापी से बाहर भगा दिया। इसके बाद उसने अपने विद्रोही भाइयों एवं सामंतों को पराजित कर अपने नियंत्रण में किया। विक्रमादित्य की इस प्रारंभिक सफलता का संकेत उसके शासनकाल के तीसरे वर्ष में अंकित कर्नूल लेख में मिलता है, जिसके अनुसार उसके अपने पिता की उस राजलक्ष्मी को पुनः प्राप्त किया, जिसे तीन राजाओं ने छिपा लिया था। इन तीन राजाओं से तात्पर्य संभवतः उसके दो भाइयों- आदित्यवर्मन् व चंद्रादित्य तथा पल्लव नरेश नरसिंहवर्मन् से है, जिनके कारण चालुक्य राज्य की स्थिति संकटग्रस्त हो गई थी। यह भी बताया गया है कि उसने मंदिरों तथा ब्राह्मणों को पहले से मिले हुए दानों, जिन्हें तीन राजाओं के समय में निरस्त कर दिया गया था, पुनः प्रतिष्ठित किया और प्रत्येक जिले के राजाओं को जीतकर पुनः अपने वंशलक्ष्मी को प्राप्त कर लिया तथा ‘परमेश्वर’ की उपाधि ग्रहण की।

यद्यपि विक्रमादित्य की विजयों का क्रमबद्ध विवरण नहीं मिलता, किंतु कर्नूल अभिलेख से पता चलता है कि अपने शासनकाल के प्रारंभिक वर्षों में ही विक्रमादित्य ने नेल्लोर, बेलारी, अनंतपुर तथा कडप्पा (कुद्रहपह) जिलों पर पुनः अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया। मालेपाडु अभिलेख भी सूचित करता है कि तेलूगचोड, जो पल्लवों के अधीन कार्य कर रहे थे, वह पुनः चालुक्य के अधीन हो गये थे।

इसके अलावा, विक्रमादित्य प्रथम ने चोल, पांड्य एवं केरल प्रदेशों के शासकों की स्वतंत्रता का अंत कर उन्हें अपने अधीन रहने को विवश किया। अपने संपूर्ण राज्य में एकता स्थापित करने के बाद उसने अपने को सम्राट घोषित किया। उसके इस कार्य में सहयोगी सामंतों, उसके दो पुत्रों- विनयादित्य और विजयादित्य और छोटे भाई जयसिंहवर्मन् ने उसकी सहायता की थी। इसलिए उसने जयसिंहवर्मन् को लाट प्रदेश (दक्षिणी गुजरात) का वायसराय बना दिया।

पल्लव-चालुक्य संघर्ष (Pallava-Chalukya Conflict)

पल्लव नरेश नरसिंहवर्मन् द्वारा किये गये चालुक्यों के मान-मर्दन तथा पिता पुलकेशिन् द्वितीय की हत्या के कारण विक्रमादित्य के मन में प्रतिशोध की ज्वाला धधक रही थी। फलतः राजधानी में अपनी स्थिति सुदृढ करने के उपरांत विक्रमादित्य प्रथम ने पल्लव राज्य पर आक्रमण किया। गुजरात के चालुक्य शासक धराश्रय जयसिंहवर्मन् के 671 ई. के नौसारी ताम्रपत्रों में कहा गया है कि विक्रमादित्य ने पल्लव राजवंश को जीता था। विक्रमादित्य की के विरूद्ध अभियान की पुष्टि गदवल, सुवणूर तथा होन्नूर लेख (970-71 ई.) से भी होती है। गदवल ताम्रपट्ट लेख चार श्लोकों में पल्लवों के विरुद्ध विक्रमादित्य की सफलता का उल्लेख मिलता है-

मुदित नरसिंहा यशसा विहितमहेन्द्रप्रताप विलयेन।

नयन विजितेश्वरेण प्रभुण श्रीवल्लभजितम्।।

कृतपल्लवमर्द्ध दक्षिणदिग्युतिमान्त कांचीकः।

यो भृशमभिरभयन्नपि सुतरां श्रीवल्लभत्वभितः।।

वहति स्वमर्थवन्तं रणक्षिकः श्रीमदुरुबलस्कन्धः।

यो राजमल्ल शब्द विहित महामल्ल कुलनाशः।।

दुर्लध्य दुष्कर विभेद विशालशाला दुश्गधिदुस्तर बृहत्परिखा परिता।

अग्राहियेन जयतेश्वर पोतराज कांचीवपिनदिराः विदितेन कांची।।

प्रथम श्लोक के अनुसार श्रीवल्लभ ने नरसिंह की सेनाओं का मानमर्दन किया, महेंद्र के शौर्य का विनाश किया तथा ईश्वर को अपने अधीन कर लिया। दूसरे श्लोक में वर्णन है कि उसने कांची पर अपना अधिकार कर लिया। तीसरे श्लोक में वर्णित है कि रणरसिक ने राजमल्ल की उपाधि धारण की क्योंकि उसने महामल्ल अर्थात् नरसिंहवर्मन् के वंश को समाप्त कर दिया। इस प्रकार विक्रमादित्य को पल्लवों के क्रमशः तीन प्रमुख शासकों- नरसिंहवर्मन् प्रथम, महेंद्रवर्मन् द्वितीय तथा परमेश्वरवर्मन् प्रथम से संघर्ष करना पड़ा था।

विक्रमादित्य प्रथम के अलम (आंध्र प्रदेश) से प्राप्त अभिलेख से पता चलता है कि उसने पल्लव नरेश से कांची में अपनी वंदना करवाई तथा उन्हें आत्मसमर्पण करने को विवश कर दिया। उसने कांची से आये धुर दक्षिण में स्थित केरल, पांड्य तथा चोल के राजाओं को भी अपनी प्रभुता स्वीकार करने के लिए बाध्य कर दिया था।

विक्रमादित्य प्रथम ने कांची तक विजय कर पुलकेशिन् द्वितीय की पराजय का प्रतिशोध लिया। उसकी इस सफलता में उसके भाई जयसिंहवर्मन् ने विशेष सहयोग दिया था, फलतः उसने उसे लाट प्रदेश का शासन नियुक्त किया। जयसिंहवर्मन् ने वलभी नरेश शीलादित्य तृतीय को पराजित करके उसे लाट राज्य में मिला लिया। उसने गुजरात में चालुक्यों की एक पृथक् वंश की नींव डाली, जिसे ‘गुजरात की चालुक्य शाखा’ के नाम से जाना जाता है।

विक्रमादित्य ने मैसूर प्रदेश के गंग एवं पांड्य राज्यों के नरेशों के साथ मैत्री-संबंध स्थापित करके शक्तिशाली चालुक्य साम्राज्य की स्थापना की। उसने ‘श्रीपृथ्वीवल्लभ’, ‘सत्याश्रय’, ‘भट्टारक’, ‘महाराजाधिराज’, ‘परमेश्वर’, ‘अनिवादित’, ‘राजमल्ल’ तथा ‘रणरसिक’ आदि उपाधियाँ धारण की। उसे ‘परममाहेश्वर’ भी कहा गया है जिससे उसकी शिवभक्ति प्रमाणित होती है। उसने गुरुजनों, ब्राह्मणों तथा मंदिरों को दान दिये एवं देवताओं एवं ब्राह्मणों को दिये गये उन दानों का पुनः नवीनीकरण कर दिया जो उसके राजा होने के पहले अराजकता के काल में स्थगित कर दिये थे।

इसकी साम्राज्य की सीमा उत्तर में गुजरात, लाट, मालवा तथा नर्मदा नदी तक अपने राज्य का विस्तार किया। पश्चिम में अधिकांश समुद्रतटीय क्षेत्र उसके अधीन थे और दक्षिण में उसने पल्लवों की राजधानी कांची तक दिग्विजय की थी। कहा जाता है कि ‘चित्रकंठ’ नामक घोड़े ने उसकी विजयों में महत्वूपर्ण भूमिका अदा की थी। इसने लगभग 27 वर्ष तक शासन किया और उसके शासन का अंत लगभग 682 ई. हुआ।

अपने शासन के अंतिम चरण में विक्रमादित्य प्रथम को संभवतः महेंद्रवर्मन् के पुत्र पल्लव नरेश परमेश्वरवर्मन् से पेरुवलनल्लूर के युद्ध में पराजित होना पड़ा। पल्लव अभिलेखों के अनुसार इस युद्ध में परमेश्वरवर्मन् की विजय हुई। इसके विपरीत चालुक्य अभिलेखों में विक्रमादित्य प्रथम की जीत की सूचना दी गई है। ऐसा लगता है कि संभवतः दोनों राजवंशों के बीच हुए प्रारंभिक युद्धों में पहले चालुक्य नरेश विक्रमादित्य प्रथम को सफलता प्राप्त हुई। किंतु दोनों राज्यों के बीच सतत चल रहे संघर्षों के क्रम में अंततः उसे परमेश्वरवर्मन् द्वारा पराजय मिली। इस ऐतिहासिक घटना की पुष्टि विनयादित्य द्वारा किये गये विजयाभियानों से होती है क्योंकि विक्रमादित्य के उत्तराधिकारी विनयादित्य ने पल्लवों के विरुद्ध युद्ध करके चालुक्यों की पराजय का बदला चुकाया था।

विनयादित्य, 680-696 ई. (Vinayaditya, 680-696 AD.)

विक्रमादित्य प्रथम के बाद 680 ई. में विनयादित्य वातापी के राजसिंहासन पर बैठा और लगभग 696 ई. तक वातापी पर राज्य किया। जेजुरि तथा तोगचेंडु अभिलेखों के अनुसार विनयादित्य के राज्यकाल का प्रारंभ 678-679 ई. के बीच हुआ था। किंतु इन दो-तीन वर्ष के अंतर का कारण ज्ञात नहीं है। लेखों से पता चलता है कि विनयादित्य अपने पिता के शासनकाल में युवराज नियुक्त कर किया गया था (सकलभुवनसाम्राज्य लक्ष्मीस्वयंवराभिषेक समयानन्तर समुपजात महोत्साहः)। हैदराबाद अभिलेख के आधार पर नीलकंठ शास्त्री का अनुमान है कि उसे 678-79 ई. में युवराज नियुक्त किया गया था।

परवर्ती चालुक्य राजाओं के लेखों में विनयादित्य का उल्लेख ‘त्रैराज्यपल्लवपति’ के रूप में किया गया है। संभवतः त्रैराज्यपल्लकपति से आशय चोल, पांड्य तथा केरल राज्यों है जो पल्लवनरेश परमेश्वरवर्मन् प्रथम के अधीन थे और जिन्हें विनयादित्य ने अंततः जीत लिया था। परवर्ती चालुक्य अभिलेखों (जेजुरी ताम्रपत्र) में उसे पल्लव, कलभ्र, मूसक, हैहय, विल, मालव, चोल, पांड्य तथा कमेर (कवेर) राज्यों का विजेता कहा गया है। उसने ‘युद्धमल्ल’, ‘भट्टारक’, ‘महाराजाधिराज’, ‘राजाश्रय’ जैसी उपाधियाँ भी धारण की थीं।

विनयादित्य के शासनकाल में चतुर्दिक शांति थी और उसका राज्य समृद्धि और वैभव से युक्त था। उसके पुत्र युवराज विजयादित्य ने उसके उत्तर भारतीय सैन्य-अभियानों में भाग लिया था तथा वहाँ से गंगा-यमुना की आकृतियाँ, पालिध्वज तथा पद्मरागमणि आदि प्रभुतासूचक चिन्हों को लाकर अपने पिता को भेंट किया था। इसकी पुष्टि विजयादित्य के रायगढ़ अभिलेख (730 ई.) से होती है। इसके अतिरिक्त उसके द्वारा दिये गये भूमिदानों के विवरण तथा विभिन्न जैन एवं हिंदू मूर्तियों एवं मंदिरों के निर्माण आदि से उसके पराक्रम एवं राजत्व की गरिमा की पुष्टि होती है। विनयादित्य की रानी विनयवती, जो विजयादित्य की माता थी, अपने पति की मृत्यु के बाद भी जीवित रहीं और 696 ई. में उसने वातापी में ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर की प्रतिमाओं की स्थापना की थी।

विजयादित्य, 696-733 ई. (Vijayaditya, 696-733 AD.)

विनयादित्य के शासन के उपरांत जुलाई, 696 ई. में उसका योग्य पुत्र युवराज विजयादित्य सिंहासन पर बैठा। चालुक्य नरेशों में सबसे अधिक काल तक विजयादित्य ने शासन किया। कर्नूल अभिलेख से ज्ञात होता है कि उसे 691 ई. में विनयादित्य ने युवराज नियुक्त किया था। विजयादित्य ने अपने पितामह (विक्रमादित्य) के शासनकाल में ही राजकीय कार्यों को भली-भाँति सीख लिया था।

येवूर अभिलेख के अनुसार विजयादित्य भी अपने पिता विनयादित्य के समान वीर एवं साहसी था। रायगढ़ अभिलेख (730 ई.) से पता चलता है कि युवराज के रुप में उसने अपने पिता विनयादित्य के उत्तर भारतीय सैन्य-अभियानों में भाग लिया था और वहाँ से गंगा-यमुना की आकृतियाँ, पालिध्वज तथा पद्मरागमणि आदि प्रभुतासूचक चिन्हों को प्राप्त कर अपने पिता को भेंट किया था। उसके सामंत शासकों में गंग, सेंद्रक, आलुप, बाण, रैनाडु के तेलगु, चोल आदि की गणना की गई है।

विजयादित्य ने 710 ई. के आसपास अपने पुत्र विक्रमादित्य द्वितीय को ‘युवराज’ नियुक्त किया था। उसके शासनकाल के 35वें वर्ष के उलचला प्रस्तर अभिलेख से ज्ञात होता है कि उसके पुत्र युवराज विक्रमादित्य द्वितीय ने परंपरागत शत्रु पल्लवों की राजधानी कांची पर आक्रमण किया और तत्कालीन पल्लवनरेश परमेश्वरवर्मन् द्वितीय को पराजित कर उससे कर एवं बहुमूल्य रत्नादि वसूल कर लौटा था। अपने पिता की भांति विजयादित्य ने भी ‘श्रीपृथ्वीवल्लभ’, ‘महाराजाधिराज’, ‘परमेश्वर’, ‘सत्याश्रय’, ‘भट्टारक’ तथा ‘समस्त भुवनाश्रय’ आदि विरुद् धारण किया था।

विजयादित्य धर्मसहिष्णु, महान् निर्माता, स्थापत्य एवं ललित कलाओं का संरक्षक एवं दानी शासक था। उसने पट्टदकल के एक विशाल विजयेश्वर शिवमंदिर का निर्माण करवाया था (स्थापितो महाशैल प्रासदो श्रीविजयेश्वर परमभट्टारक)। अलमपुर अभिलेख से पता चलता है कि विजयादित्य की आज्ञा से ईशानाचार्य ने अलमपुर में एक शिवमंदिर का निर्माण कराया था। उसकी माता विनयवती ने वातापि में ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव की मूर्तियाँ स्थापित कराई थी और उनकी बहन कुमकुमदेवी ने लक्ष्मेश्वर में एक भव्य जैनमंदिर का निर्माण कराया था। पट्टदकल से प्राप्त उलचला प्रस्तर अभिलेख में लोकपालेश्वर मंदिर (अनंतगुण की प्रतिमा) को दान देने का उल्लेख है जिसमें पिता और पुत्र दोनों का वर्णन है। इसी प्रकार नेरूर के ताम्रपत्र में भी पिता और पुत्र के सम्मिलित होने का उल्लेख है।

विक्रमादित्य द्वितीय, 733-745 ई. (Vikramaditya II, 733-745 AD.)

विजयादित्य के पश्चात् लगभग 733-34 ई. में उसका साहसी पुत्र युवराज विक्रमादित्य द्वितीय चालुक्य सिंहासन पर बैठा। विजयादित्य के 710 ई. के सतारा लेख में विक्रमादित्य द्वितीय को ‘युवराज’ कहा गया है अर्थात् इस तिथि के पूर्व ही युवराज बना दिया गया था। विक्रमादित्य द्वितीय ने न केवल पिता से प्राप्त साम्राज्य को सुरक्षित रखा, बल्कि उसमें अभिवृद्धि भी की। वह पल्लवों के साथ अपनी वंशगत शत्रुता को कभी नहीं भुला सका था।

पल्लवों के विरुद्ध अभियान (Campaign Against Pallavas)

चालुक्य महारानी लोकमहादेवी के पट्टदकल अभिलेख में विक्रमादित्य द्वितीय द्वारा काँची को तीन बार रौंदने का उल्लेख मिलता है। पहली बार विक्रमादित्य ने युवराजकाल में चालुक्य सेना का नेतृत्व करते हुए पल्लव सेना को पराजित किया था। नरवण (रत्नागिरि) से प्राप्त एक अभिलेख से पता चलता है कि राज्यारोहण के उपरांत विक्रमादित्य ने तुंडाक प्रदेश से होते हुये पल्लव राज्य पर आक्रमण किया और नंदिपोतवर्मन् (नंदिवर्मन्) को पराजित किया (प्रकृत्यामित्रस्य पल्लवस्य समूलोन्मूलनायं कृतमतिरतिरथातुंडाक विषयप्राप्याभिमखागतन्नंदिपोतवर्मा)। विक्रमादित्य का पल्लवों पर यह दूसरा आक्रमण था। इस दूसरे आक्रमण की पुष्टि नरवण (रत्नगिर), केंदूर, वक्कलेरि तथा विक्रमादित्य की रानी लोकमहादेवी के पट्टदकल अभिलेखों से भी होती है।

केंदूर अभिलेख से पता चलता है कि उसने काँची के वैभव को कोई क्षति नहीं पहुँचाई, बल्कि वहाँ के राजसिंहश्वेर मंदिर को बहूमूल्य रत्नादि भेंट किया (काँचीमविनश्य प्रविश्य दानांदित द्विजदीनानाथजनः नरसिंहपोतवर्मणानिर्मित शिलामय राजसिंहश्वेरदि देवकुलसुवर्णराशि प्रत्यर्पणीपार्जितपुणः)। उसने पल्लवनरेश नरसिंहवर्मन् प्रथम की वातापि-विजय को याद करते हुये राजसिंहेश्वर (कैलाशनाथ) मंदिर की दीवार पर एक अभिलेख उत्कीर्ण करवाया और नरसिंहवर्मन् के ‘वातापिकोंड’ के प्रतिकार में स्वयं ‘कांचिनकोंड’ (कांची विजय करने वाला) की उपाधि धारण की।

संभवतः अपने शासनकाल के अंतिम चरण में विक्रमादित्य द्वितीय ने तीसरी बार काँची की विजय करने के लिए ‘युवराज’ कीर्तिवर्मन् के नेतृत्व में सेना भेजी थी, जिसमें कीर्तिवर्मन् ने पल्लवों को पदाक्रांत कर वहाँ से बहुसंख्यक हाथी एवं रत्न अपहृत कर वातापि लौट आया।

कीर्तिवर्मन् के वक्कलेरि, केंदूर तथा नरवण अभिलेखों से पता चलता है कि विक्रमादित्य ने पराजित सुदूर दक्षिण के चोल, पांड्य, केरल तथा कलभ्र आदि राज्यों को पराजित किया था और इन प्रदेशों पर विजय प्राप्त करके उसने दक्षिणी समुद्रतट पर अपना एक विजयस्तंभ स्थापित करवाया था (दक्ष्णार्णवे शरदमल शशधर विशद यशोराशिमय जयस्तम्भमतिष्ठिपत्)। उसकी प्रभुता पश्चिमी, गंग, बाण तथा आलुप के नरेश भी स्वीकार करते थे। विक्रमादित्य द्वितीय ने ‘वल्लभदुर्नय’, ‘कांचिनकोंडु’, ‘महाराजाधिराज’, ‘श्रीपृथ्वीवल्लभ’, ‘परमेश्वर’ आदि अनेक उपाधियाँ धारण की थी।

अरबों का आक्रमण (Arab Invasion)

विक्रमादित्य के शासनकाल में दक्कन क्षेत्र पर हुए अरबों का आक्रमण भी महत्वपूर्ण है, जिसका उल्लेख लाट प्राप्त प्रांत के शासक पुलकेशिराज के कलचुरि संवत् 490 (738 ई.) के नौसारी अभिलेख में मिलता है। इसमें अरबों को ताज्जिक कहा गया है और उन पर विजय प्राप्त करने का श्रेय जयसिंहवर्मन् के पुत्र पुलकेशिराज को दिया गया है।

विक्रमादित्य द्वितीय का विवाह हैहयवंशी लोकमहादेवी एवं उनकी सहोदरी त्रैलोक्यमहादेवी नामक राजकुमारियों के साथ हुआ था। उसकी ज्येष्ठ रानी लोकमहादेवी ने पट्टदकल में एक विशाल शिवमंदिर का निर्माण कराया था जो आज विरुपाक्ष महादेव मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है। इस मंदिर के प्रधान शिल्पी आचार्य गुंड को त्रिभुवनाचारि, अनिवारिताचारि तथा तेंकणदिशा सूत्रधारि आदि उपाधियों से विभूषित किया गया था। उसकी कनिष्ठ राजमहिषी त्रैलोक्यमहादेवी ने लोकेश्वर शिवमंदिर का निर्माण कराया था। इनके अलावा, विक्रमादित्य ने अनेक शैव एवं जैन मंदिरों का निर्माण भी करवाया था। उसके रचनात्मक व्यक्तित्व का विशद् विवरण लक्ष्मेश्वर एवं ऐहोल अभिलेखों में मिलता है।

कीर्तिवर्मन् द्वितीय, 745-753 ई. (Kirtivarman II, 745-753 AD.)

विक्रमादित्य द्वितीय की मृत्यु के बाद उसका त्रैलोक्यदेवी से उत्पत्र पुत्र कीर्तिवर्मन् द्वितीय बादामी के चालुक्य साम्राज्य की गद्दी पर बैठा। धारवाड़ से प्राप्त एक भूमि-अनुदान लेख से पता चलता है कि विक्रमादित्य द्वितीय ने उसको अपना ‘युवराज’ नियुक्त किया था। केंदूर अभिलेख के अनुसार उसने अपने युवराज काल में ही पल्लव नरेश नंदिवर्मन् को पराजित कर बहुमूल्य रत्न, हाथी एवं सुवर्ण प्राप्त किया था (प्रभूतगजसुवर्णमाणिक्यकोटिरादाय पित्रे समर्पितवान् कीर्तिवर्मा)।

कीर्तिवर्मन् द्वितीय ने ‘सार्वभौम’, ‘लक्ष्मी’, ‘पृथ्वी का प्रिय’, ‘राजाओं का राजा’ एवं ‘महाराज’ आदि अनेक उपाधियाँ धारण की थीं।

राष्ट्रकूटों का उत्थान (Rise of Rashtrakutas)

चालुक्यों के शासनकाल के अंतिम चरण में उनके राष्ट्रकूट सामंत इंद्रराज और दंतिदुर्ग ने क्रमशः अपनी शक्ति बहुत बढ़ा ली थी। संजन दानपत्र से पता चलता है कि राष्ट्रकूट इंद्रराज ने चालुक्य राजकुमारी भावनागा के साथ कैरा में बलात् राक्षस विवाह कर लिया था और लाट तथा वातापि के चालुक्य शासक उसकी शक्ति से डरकर इस सामाजिक अपमान का प्रतिरोध नहीं कर सके तथा शांत बैठ गये थे-

राजस्ततो ग्रहात् यश्चालुक्यनृपात्मजाम्।

राक्षसेन विवाहेन रणे खेटकमण्डपे।।

इंद्रराज का पुत्र एवं उसका उत्तराधिकारी दंतिदुर्ग उससे भी अधिक शक्तिशाली था। उसने मही, नर्मदा तथा महानदी के निकटवर्ती क्षेत्रों में राष्ट्रकूट-शक्ति का विस्तार किया। फिर भी, वह चालुक्य नरेश विक्रमादित्य द्वितीय के समय तक चालुक्यों से सीधा युद्ध करने से बचता रहा।

चालुक्यों की मूल शाखा का पतन (Fall of the Chalukyas of Badami)

कीर्तिवर्मन् द्वितीय बादामी के चालुक्य शासकों की शृंखला का अंतिम शासक था। उसके राज्यारोहण के कुछ ही समय बाद राष्ट्रकूट दंतिदुर्ग ने चालुक्य शासन के विरुद्ध युद्ध छेड़ दिया। दंतिदुर्ग ने कीर्तिवर्मन पर आक्रमण करने से पूर्व पूरी तरह से सैनिक और कूटनीतिक तैयारियाँ की थीं। फलतः युद्ध में कीर्तिवर्मन् पराजित हुआ और गुजरात, उत्तरी महाराष्ट्र तथा आसपास के प्रदेशों पर दंतिदुर्ग का स्वतंत्र शासन स्थापित हो गया। दंतिदुर्ग के इस विजय की सूचना 753-54 ई. के समनगढ़ (कोल्हापुर) अभिलेख से मिलती है। दंतिदुर्ग ने इस विजय के उपलक्ष में ‘परमेश्वर’ तथा ‘राजाधिराज’ की उपाधियाँ धारण की (यो वल्लभ सपदि दंडकलेन (बलेन) जित्वा राजाधिराजपरमेश्वरतामुपैति) और मान्यखेट के राष्ट्रकूट राजवंश की स्थापना की।

इस प्रकार दंतिदुर्ग की विजय के फलस्वरुप चालुक्यों की मूल शाखा का पतन प्रारंभ हो गया। संभवतः दंतिदुर्ग की मृत्यु के बाद 756 ई. में कीर्तिवर्मन् ने पुनः चालुक्य-शक्ति को संगठित करने का प्रयास किया, जिसका संकेत कीर्तिवर्मन् के शासनकाल के ग्यारहवें वर्ष के वक्कलेरि अभिलेख में मिलता है। अभिलेख के अनुसार उसने धारवाड़ के हंगल क्षेत्र की कुछ भूमि ब्राह्मणों को दान में दिया था। किंतु गोविंद तृतीय के वणीगाँव अभिलेख से पता चलता है कि दंतिदुर्ग के उत्तराधिकारी राष्ट्रकूट नरेश कृष्ण प्रथम ने चालुक्य नरेश कीर्तिवर्मन् पराजित करके वातापि के चालुक्य-राज्य को अपहृत कर लिया। अपनी सत्ता-स्थापना के साथ ही कृष्ण प्रथम ने चालुक्यों के राजकीय चिन्ह वराह के स्थान पर हिरण को अपना राजकीय चिन्ह घोषित किया।