परवर्ती मुगल शासक और सैयद बंधुओं का उत्थान-पतन (Later Mughal Emperors and Rise and Fall of Syed brothers)

मुगल साम्राज्य अपने अभूतपूर्व विस्तार, अपनी विशाल सैन्य-शक्ति और सांस्कृतिक उपलब्धियों के बावजूद अठारहवीं शताब्दी के आरंभ में अवनति की ओर जाने लगा था। औरंगजेब का राज्यकाल मुगलों का सांध्यकाल था क्योंकि इस समय मुगल साम्राज्य को अनेक व्याधियों ने खोखला करना शुरू कर दिया था। औरंगजेब की मृत्यु के अगले बावन वर्षों में आठ बादशाह दिल्ली की गद्दी पर आसीन हुए। लेकिन वे इतने अयोग्य और दुर्बल थे कि गिरते साम्राज्य को सँभाल नहीं सकते थे। देश के भिन्न-भिन्न भागों में देशी और विदेशी शक्तियों ने छोटे-बड़े राज्य स्थापित कर लिये। बंगाल, अवध और दकन जैसे अनेक प्रदेश मुगल नियंत्रण से बाहर हो गये। दक्षिण में निजामुलमुल्क, बंगाल में मुर्शिदकुली खाँ और अवध में सआदतअली खाँ ने अपनी स्वतंत्रता घोषित कर दी। इसी मार्ग का अनुकरण रुहेलखंड के अफगान पठानों ने भी किया।

मराठों ने भी महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, मालवा और गुजरात पर अधिकार करके पूना को अपनी राजनीतिक क्रिया-कलापों का केंद्र बना लिया। इसके बाद भी मुगल साम्राज्य का इतना प्रभाव था कि पतन की गति बहुत धीमी रही। उत्तर-पश्चिम की ओर से विदेशी आक्रमणकारियों ने साम्राज्य पर प्रहार करना आरंभ कर दिया तथा व्यापारिक कंपनियाँ भारतीय राजनीति में हस्तक्षेप करने लगीं। वास्तव में 1737 ई. में बाजीराव प्रथम और 1739 ई. में नादिरशाह के दिल्ली पर आक्रमणों ने मुगल साम्राज्य के खोखलेपन की पोल खोल दी और 1740 ई. में इस साम्राज्य का पतन स्पष्ट हो गया।

उत्तरकालीन मुगल सम्राट (Later Mughal Emperors)

मार्च, 1707 ई. में औरंगजेब की मृत्यु के बाद उसके तीन जीवित पुत्रों– मुअज्जम, आजम और कामबख्श में उत्तराधिकार का युद्ध हुआ। लाहौर के निकट पुल-ए-शाह नामक स्थान पर मुअज्जम ने 22 अप्रैल 1707 ई. को अपना राज्याभिषेक किया। उसने 8 जून, 1707 ई. को जजाओं के स्थान पर आजम को तथा 3 जनवरी, 1709 ई. को हैदराबाद के निकट कामबख्श को पराजितकर मार डाला और स्वयं बहादुरशाह (प्रथम) के नाम से सिंहासन पर बैठा।

बहादुरशाह (प्रथम), 1709 ई.-1712 ई. (Bahadur Shah (First), 1709 AD-1712 AD.)

सिंहासनारोहण के समय बहादुरशाह प्रथम की आयु 63 वर्ष थी और वह सक्रिय रूप से कार्य नहीं कर सकता था। वह भोग-विलास में लीन होकर प्रशासन के प्रति इतना लापरवाह हो गया कि उसकी उपाधि ही ‘शाहे बेखबर’ हो गई। फिर भी, उसने शिवाजी के पौत्र शाहू को, जो 1689 ई. से मुगलों की कैद में था, मुक्त कर दिया और महाराष्ट्र जाने की अनुमति दे दी।

बहादुरशाह के समय में राजपूत राजाओं से भी शांतिपूर्ण संबंध स्थापित किये गये और उनके प्रदेशों को वापस कर दिया गया। बहादुरशाह को सिक्खों के विरुद्ध कार्यवाही करनी पड़ी क्योंकि उसके नेता बंदा बहादुर ने पंजाब में मुगलों के विरुद्ध व्यापक अभियान आरंभ कर दिया था। बंदा लोहागढ़ के निकट हार गया। मुगलों ने सरहिंद को 1711 ई. में पुनः जीत लिया, सब कुछ करने के बाद भी बहादुरशाह सिक्खों को अपना मित्र नहीं बना सका।

27 फरवरी 1712 ई. को बहादुरशाह की मृत्यु हो गई। सिडनी ओवन के अनुसार ‘यह अंतिम बादशाह था जिसके लिए कुछ अच्छे शब्द कहे जा सकते हैं। इसके पश्चात् मुगल सामाज्य का तीव्रगामी और पूर्ण पतन मुगल सम्राटों की राजनैतिक तुच्छता और शक्तिहीनता का द्योतक था।’ वास्तव में बहादुरशाह का शासनकाल महान मुगलों के वैभव की अंतिम झलक थी जो उसके पश्चात् शीघ्रता से समाप्त हो गई।

उत्तराधिकार का युद्ध (War of Succession)

बहादुरशाह की मृत्यु (27 फरवरी 1712 ई.) के बाद उसके चार पुत्रों- जहाँदारशाह, अजीम-उस-शान, रफी-उस-शान और जहाँशाह में 14 मार्च 1712 ई. को उत्तराधिकार के लिए युद्ध आरंभ हो गया। उत्तराधिकार के लिए उसके पुत्रों ने इतनी निर्लज्जता दिखाई कि बहादुरशाह का शव एक माह तक दफन नहीं किया जा सका। बहादुरशाह के पुत्रों के उत्तराधिकार युद्ध में एक ओर उसका पुत्र अजीम-उस-शान था, तो दूसरी ओर उसके अन्य तीन पुत्र (जहाँदारशाह, रफी-उस-शान और जहाँशाह) संगठित होकर युद्ध कर रहे थे। अंत में, दरबार में ईरानी दल के नेता जुल्फिकार खाँ की सहायता से जहाँदारशाह 29 मार्च 1712 ई. को बादशाह बनने में सफल रहा।

जहाँदारशाह, 1712 ई.-1713 ई. (Jahandarshah, 1712 AD-1713 AD)

बादशाह बनते ही जहाँदारशाह ने जुल्फिकार खाँ को 10 हजार का मनसब और प्रधानमंत्री (वजीर) के पद से पुरस्कृत किया। जुल्फिकार खाँ के पिता असद खाँ को 12 हजार के मनसब से सम्मानित किया गया और उसे ‘वकीले मुतलक’ के पद पर बना रहने दिया गया। इसके अलावा, असद खाँ को गुजरात तथा उसके पुत्र जुल्फिकार खाँ को दक्षिण की सूबेदारी भी दी गई।

बादशाह बनने के बाद जहाँदारशाह ने एक नाचनेवाली लालकुँवर को ‘इम्तियाज महल’ की पदवी से सम्मानित किया और उसके आने-जाने के समय शाही अलम एवं नक्कारे के प्रयोग की अनुमति दे दी। समकालीन लेखकों के विवरणों से लगता है कि जहाँदारशाह ने लालकुँवर के प्रेम में शाही रीति-रिवाज और मर्यादा को भुला दिया था।

किंतु जहाँदारशाह को अजीम-उस-शान के पुत्र फर्रुखसियर ने सैयद बंधुओं की सहायता से चुनौती दी। 10 जनवरी 1713 ई. को फर्रुखसियर के सैनिकों ने सामूगढ़ के युद्ध में जहाँदारशाह की सेना को पराजित कर दिया। 11 फरवरी 1713 ई. को जुल्फिकार खाँ और जहाँदारशाह की हत्या कर दी गई। इस प्रकार जहाँदारशाह तैमूर के राजवंश का पहला बादशाह था जो शासन-कार्य के लिए नितांत अयोग्य सिद्ध हुआ।

फर्रुखसियर, 1713 ई.-1719 ई. (Farrukhsiyar, 1713 AD-1719 AD)

फर्रुखसियर ने 12 फरवरी, 1713 ई. को दिल्ली में प्रवेश किया। कृतज्ञ फर्रुखसियर ने सैयद अब्दुल्ला खाँ बारहा को ‘कुतुब-उल-मुल्क यारे वफादार जफरजंग’ की पदवी, वजीर का पद और सात हजार के मनसब के साथ मुल्तान की सूबेदारी से पुरस्कृत किया। उसके छोटे भाई हुसैनअली खाँ बारहा को ‘अमीर-उल-उमरा फिरोजजंग’ की पदवी और मीरबख्शी के पद से सम्मानित किया गया। इसके अलावा, उसे सात हजार का मनसब और बिहार की सूबेदारी भी दी गई।

फर्रुखसियर के काल में मुगलों को सिक्खों के ऊपर विजय मिली और उनका नेता बंदा बहादुर गुरुदासपुर के स्थान पर पकड़ लिया गया और 19 जून, 1716 ई. को दिल्ली में उसका कत्ल कर दिया गया। 1717 ई. में फर्रुखसियर ने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को व्यापार-संबंधी बहुत-सी रियायतें दीं, जिसमें बिना सीमा-शुल्क दिये बंगाल के रास्ते से व्यापार करना भी शामिल था।

किंतु बादशाह फर्रुखसियर शीघ्र ही सैयद बंधुओं से तंग आ गया और उनसे मुक्त होने का प्रयास करने लगा। इसके लिए उसने एक षड्यंत्र रचा, किंतु सैयद बंधु सम्राट से अधिक चालाक थे और उन्होंने मराठा सैनिकों की सहायता से फर्रुखसियर को बंदी बना लिया। 28 फरवरी 1719 ई. को रफी-उद्-दरजात को बादशाह घोषित किया गया और 29 अप्रैल, 1719 ई. को फर्रुखसियर की हत्या कर दी गई।

फर्रुखसियर के बाद सैयद बंधुओं ने तीन राजकुमारों- रफी-उद्-दरजात, रफी-उद्-दौला और फिर रोशन अख्तर (नसीरुद्दीन मुहम्मदशाह) को दिल्ली के सिंहासन पर बैठाया।

नसीरुद्दीन मुहम्मदशाह (रोशन अख्तर) Naseeruddin Muhammad Shah (Roshan Akhtar)

नसीरुद्दीन मुहम्मदशाह ‘रंगीला’ के समय में तूरानी अमीरों के नेतृत्व में 9 अक्टूबर, 1720 ई. को हुसैनअली खाँ बारहा का वध कर दिया गया और 15 नवंबर, 1720 ई. को अब्दुल्ला खाँ बारहा को बंदी बना लिया गया। मुहम्मदशाह के कार्यकाल में ही निजाम-उल-मुल्क ने दक्षिण में एक स्वतंत्र राज्य की नींव डाली। इसी समय सआदत खाँ ने अवध और मुर्शिदकुली खाँ ने बंगाल, बिहार और उड़ीसा के प्रांतों में लगभग स्वतंत्र राज्य स्थापित किया। मार्च, 1737 ई. में बाजीराव प्रथम ने मात्र 500 घुड़सवार सैनिकों के साथ दिल्ली को घेर लिया और सम्राट डरकर भागनेवाला था। 1739 ई. में नादिरशाह ने भारत पर आक्रमण कर मुगल साम्राज्य को तहस-नहस कर दिया। वह भारी मात्रा में धन-दौलत लेकर वापस लेकर वापस चला गया।

सैयद-बंधुओं का उत्थान और पतन (The Rise and Fall of the Syed brothers)

सैयद बंधु से आशय सैयद अब्दुल्ला खाँ बारहा (1666-9 अक्टूबर 1720 ई.) और सैयद हुसैन अली खाँ बारहा (1668-12 अक्टूबर 1722 ई.) नामक दो भाइयों से है जो मुगल साम्राज्य में शक्तिशाली सेनानायक थे। सैयद बंधुओं में बड़े भाई का नाम हसन अली खाँ था जिसे ‘अब्दुल्ला खाँ’ के नाम से जाना जाता था। छोटे भाई का नाम हुसैन अली खाँ था। दोनों भाइयों ने समसामयिक परिस्थितियों का आकलन कर अपनी कूटनीतिक चालों से उत्तरकालीन मुगल दरबार की राजनीति में सफलता प्राप्त की। पतनोन्मुख मुगल काल में जब योग्य शासकों का अभाव था और मुगल राजकुमारों में सिंहासन के लिए होड़ मची थी, उस समय सैयद बंधुओं ने अपनी कूटनीतिक क्षमता के बल पर तत्कालीन मुगल दरबार की राजनीति को नियंत्रित करने में सफलता पाई।

वास्तव में परवर्ती मुगलकाल के इतिहास में (1713 से 1720 ई. तक) सैयद बंधु मुगल दरबार में सबसे शक्तिशाली थे जो अपने प्रभाव का प्रयोग कर मुगल साम्राज्य का उत्तराधिकारी नियुक्त करने लगे थे, जिसके कारण उन्हें राजनिर्माता (किंगमेकर) कहा जाता था। सैयद बंधु हिंदुस्तानी दल के नेता थे और प्रायः मुगल-विरोधी और अर्ध-राष्ट्रीय हितों का प्रतिनिधित्व करते थे।

सैयद हजरत मुहम्मद के वंशज थे और ये बहुत शताब्दियों से भारत में, विशेषकर दोआब और मुजफरपुर के प्रदेशों में, बसे हुए थे। बारह (बाढ़ा) गाँव के अब्दुल्ला खाँ और हुसैनअली अबुल फरह के वंशज थे, जो मेसोपोटामिया से आया था और कुछ शताब्दियों पहले पटियाला के समीप बस गया था। सैयद बंधु औरंगजेब के शासनकाल में फौजदार के पद पर नियुक्त किये गये थे। दोनों भाई अपनी शक्ति को बढ़ाते रहे।

औरंगजेब की मृत्यु के बाद जब मुगल सिंहासन के लिए उत्तराधिकार का युद्ध हुआ तो सैयद बंधुओं ने बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई और शहजादा मुअज्जम की आर्थिक सहायता की। उत्तराधिकार-युद्ध में सफल होने के बाद बहादुरशाह प्रथम (मुअज्जम) ने उन्हें उचित रूप से पुरस्कृत किया और उन्हें 4000 का मनसबदार नियुक्त किया । यही नहीं, बहादुरशाह प्रथम ने हसन अली खाँ को अब्दुल्ला खाँ की उपाधि दी और छोटे भाई हुसैन अली को बीदर प्रदेश की सूबेदारी प्रदान की जिससे दोनों भाइयों की शक्ति बहुत बढ़ गई।

1708 ई. में राजकुमार अजीम-उस-शान ने हुसैनअली को बिहार में एक प्रमुख पद पर नियुक्त किया और 1711 ई. में अब्दुल्ला खाँ को इलाहाबाद सूबे में अपना नायब नियुक्त किया। राजकुमार अजीम-उस-शान के इन उपकारों के कारण ही सैयद-बंधुओं ने उसके पुत्र फर्रुखसियर की ओर से युद्ध में भाग लिया और जहाँदारशाह को मारकर दिल्ली का ताज फर्रुखसियर को पहना दिया।

अनुग्रहीत फर्रुखसियर ने सैयद अब्दुल्ला खाँ को अपना वजीर अथवा प्रधानमंत्री नियुक्त किया और नवाब कुत्ब-उल-मुल्क, यमीन-उद्-दौला, सैयद अब्दुल्ला खाँ बहादुर, जफरजंग, सिपहसालार, यार-ए-वफादर की उपाधियों से विभूषित किया। इसी प्रकार छोटे भाई हुसैनअली को मीरबख्शी, जो वस्तुतः मुख्य सेनापति था, नियुक्त किया तथा उमादतुलमुल्क, अमीरुल उमरा बहादुर फिरोजजंग सिपहसालार की उपाधियाँ प्रदान की।

खाफी खाँ के अनुसार यह फर्रुखसियर की पहली भूल थी कि उसने अब्दुल्ला खाँ को अपना वजीर नियुक्त किया और फिर वह उससे छुटकारा नहीं पा सका। संभवतः फर्रुखसियर के पास इसके अलावा कोई विकल्प भी नहीं था। सैयद बंधुओं को इतना महत्त्वपूर्ण पद देने से तूरानी और ईरानी सरदारों की ईर्ष्या भड़क उठी और उन्होंने इन दोनों बंधुओं को अपमानित करने और उन्हें हराने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी।

मीर जुमला

सैयद बंधुओं के विरोधी सरदारों में सबसे सक्रिय मीर जुमला था, जो सम्राट का कृपापात्र था। उसे तूरानी सरदारों की सहानुभूति और समर्थन भी प्राप्त था। सम्राट में चरित्रबल और स्वतंत्र विचार की सामर्थ्य नहीं थी। वह इन शक्तिशाली दलों के हाथ की कठपुतली बनकर रह गया, जिसका परिणाम बहुत घातक हुआ। सम्राट ने मीर जुमला को अपनी ओर से राजाज्ञाओं पर हस्ताक्षर करने की अनुमति दे दी और कहा था कि ‘मीर जुमला के शब्द और हस्ताक्षर मेरे शब्द और हस्ताक्षर हैं।’ दूसरी ओर अब्दुल्ला खाँ का कहना था कि मनसब देना, पदोन्नति अथवा नियुक्ति प्रधानमंत्री से परामर्श के बिना नहीं हो सकती है। खाफी खाँ का मानना है कि सैयदबंधु अपने स्थान पर ठीक थे और सम्राट का अपनी शक्ति को मीर जुमला को हस्तांतरित करना वजारत के पद के नियमों के विरुद्ध था। इसी बीच मीर जुमला के प्रभाव में आकर सम्राट ने हुसैनअली को दक्कन का सूबेदार नियुक्त दिया।

हुसैनअली अपने भाई को दरबार के षड्यंत्रों के बीच अकेला नहीं छोड़ना चाहता था। उसने इस सूबेदारी को अपने नायब द्वारा कार्यान्वित करने की सम्राट से अनुमति माँगी अर्थात् वह दिल्ली में रहेगा और उसका नायब उसकी ओर से दक्कन के सूबेदार का काम करेगा। मीर जुमला के कहने पर सम्राट ने हुसैनअली का प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया और उसे दक्कन जाने का आदेश दिया। बात इतनी बढ़ गई कि सैयद बंधुओं ने दरबर में आना ही छोड़ दिया और अपनी रक्षा का पूरा इंतजाम कर लिया। राजमाता के बीच-बचाव के कारण बाहरी शिष्टाचार पुनः स्थापित हुआ और निश्चित हुआ कि हुसैनअली ही दक्कन की सूबेदारी सँभालने जायेगा और इसी प्रकार मीर जुमला पटना जायेगा।

फर्रुखसियर इस ऊपरी बीच-बचाव से संतुष्ट नहीं था। उसने गुजरात के सूबेदार दाऊद खाँ को कई संदेश भेजा कि वह हुसैनअली को मार डाले और इसके बदले उसे ढ़ेर सारा इनाम दिया जायेगा। हुसैनअली को इस षड्यंत्र की सूचना मिल गई और उसने दाऊद खाँ से युद्धकर उसे मार डाला।

फर्रुखसियर ने फिर हुसैनअली के विरुद्ध षड्यंत्र किया। उसने शाहू और कर्नाटक के जागीरदारों को गुप्त-संदेश भेजा कि वे हुसैनअली का आदेश न मानें, किंतु हुसैनअली सम्राट से ज्यादा चालाक था। उसने दक्कन में अपनी कार्य-प्रणाली बदल दी। उसने दकन में मुगल शासन स्थापित करने के बजाय मराठों से मित्रता कर ली और शाहू से 1719 ई. में एक संधि कर ली, जिसके अनुसार मराठों को बहुत सारी रियायतें दी गई और उसके बदले मराठों ने दिल्ली में हो रहे सत्ता-संघर्ष में उसे सैनिक सहायता देने का वचन दिया।

इसी बीच सम्राट एक निम्न कुल के कश्मीरी मुहम्मद मुराद अथवा इत्काद खाँ के प्रभाव में आ गया और अब्दुल्ला खाँ के स्थान पर इत्काद खाँ को वजीर बनाना चाहा। सम्राट ने ईद-उल-फितर के अवसर पर लगभग 70,000 सैनिक एकत्र कर लिया। अब्दुल्ला खाँ ने भी डरकर एक विशाल सेना एकत्रित कर ली क्योंकि चर्चा थी कि अब्दुल्ला खाँ को बंदी बना लिया जायेगा। लगा कि सम्राट और वजीर की सेनाओं में संघर्ष होकर ही रहेगा।

जब हुसैनअली को अपने भाई और सम्राट के संबंधों के विषय में सूचना मिली तो वह मराठा सैनिकों को लेकर दिल्ली पर चढ़ आया। सम्राट और सैयद बंधुओं की टक्कर निश्चित थी। अब्दुल्ला खाँ ने महत्त्वपूर्ण सरदारों को लालच देकर अपनी ओर मिला लिया था जिसमें सरबुलंद खाँ, निजाम-उल-मुल्क और अजीतसिंह जैसे लोग शामिल थे। वातावरण अनुकूल होने पर सैयद बंधुओं ने सम्राट के समक्ष अपनी माँगें रखी। सम्राट ने उनकी सभी माँगों को स्वीकार कर लिया। अब सम्राट की समस्त अभिभावकता सैयद बंधुओं के हाथों में आ गई, सभी दुर्गों की रक्षा सैयद बंधुओं द्वारा नियुक्त व्यक्तियों के हाथ में दे दी गई तथा इत्काद खाँ को पदच्युत् कर दिया गया। किंतु अब अविश्वास इतना बढ़ चुका था कि सैयद बंधुओं ने 28 अप्रैल, 1719 ई. को सम्राट की हत्या कर दी।

सैयद बंधुओं का दिल्ली पर प्रभुत्व

फर्रुखसियर के वध के बाद सैयद बंधुओं का प्रभाव पूर्णरूपेण स्थापित हो गया। उन्होंने रफी-उद-दरजात को सम्राट बनाया, किंतु शीघ्र ही क्षय रोग से उसकी मृत्यु हो गई। इसके बाद उन्होंने रफी-उद-दौला को सम्राट बना दिया और उसकी भी पेचिस से मौत हो गई। अब सम्राट-निर्माताओं ने जहानशाह के 18 वर्षीय पुत्र मुहम्मदशाह को सम्राट बनाया। इस समय सैयद बंधु अपनी शक्ति के चरमोत्कर्ष पर थे। उनका इतना प्रभुत्व था कि उन्हीं के कार्यकर्त्ता महलों के परिचारक थे, उन्हीं के सैनिक रक्षक थे और सम्राट का राजकीय कार्यों में कोई दखल नहीं था। मुहम्मदशाह के प्रति सैयद बंधुओं के इस दुर्व्यहार के विषय में खाफी खाँ लिखता है कि ‘सम्राट के चारों ओर भृत्य तथा पदाधिकारी पहले की ही तरह अब्दुल्ला के व्यक्ति थे। अब्दुल्ला के अनुचरों ने एक प्रकार से सम्राट को बंदी बना रखा था। यदि वह बाहर जाता अथवा शिकार पर जाता तो यही लोग उसे घेरे रहते और उसे लेकर जाते अथवा वापस लाते। राजमाता ने एक स्थान पर लिखा है कि सम्राट को केवल नमाज पढ़ने के लिए जाने की अनुमति थी, अन्यथा वह सभी प्रकार से सैयद बंधुओं के अधीन था।

सैयद बंधु हिंदुओं के समर्थन पर निर्भर थे। एक साधारण गल्ले के व्यापारी रत्नचंद को ‘राजा’ की उपाधि से विभूषित किया गया और उसे शासन तथा राज्य के बहुत सारे अधिकार दिये गये। खाफी खाँ के अनुसार रत्नचंद की सत्ता दीवानी, माल तथा कानूनी सभी मामलों में थी, यहाँ तक कि काजियों तथा अन्य पदाधिकारियों की नियुक्ति में भी उसी का हाथ होता था। इससे दूसरे पदाधिकारियों की अनदेखी होने लगी और उसी की आज्ञा का पालन होने लगा। दो राजपूत महाराजे, आमेर के जयसिंह तथा जोधपुर के अजीतसिंह भी सैयद बंधुओं के अंतरंग थे। मराठे भी उनके समर्थक थे। फर्रुखसियर की मृत्यु के बाद जजिया पुनः हटा दिया गया और अहमद नगर के सूबेदार अजीतसिंह ने वहाँ गोहत्या पर प्रतिबन्ध लगा दिया।

सैयद बंधुओं का पतन (The Fall of the Syed brothers)

सैयद बंधुओं ने अपने प्रभाव से ईरानी और तूरानी सरदारों को लगभग शून्य कर दिया था। मुगल रक्त का गौरव और साम्राज्य की भावना एकीकरण की एक बहुत बड़ी भावना थी। इस मुगल प्रतिक्रांति का नेता चिनकिलिच खाँ था, जिसे प्रायः निजामुलमुल्क के नाम से जाना जाता है। सैयद बंधुओं ने उसे मालवा का सूबेदार बनाकर दिल्ली से बाहर भेज दिया। निजामुलमुल्क ने अनुभव किया कि बल-प्रयोग से राज्य-परिवर्तन संभव नहीं है और वह दकन की ओर चला गया। उसने असीरगढ़ और बुरहानपुर के दुर्ग जीत लिये और आलमअली कुली खाँ को, जो हुसैनअली का दत्तक पुत्र और दकन का नायब सूबेदार था, मार डाला।

उधर दिल्ली में एतमादुद्दौला, सआदतअली खाँ और हैदर खाँ ने सैयद बंधुओं से छुटकारा पाने के लिए एक योजना बनाई। राजमाता जो अब्दुल्ला खाँ पर आश्रित थीं, इस योजना में शामिल थीं। हैदर खाँ ने हुसैनअली को मारने का बीड़ा उठाया। 8 अक्टूबर, 1720 को जब हुसैनअली दरबार से वापस लौट रहा था, तो योजनानुसार हैदर खाँ ने उसे एक याचिका दी। जब हुसैनअली याचिका को पढ़ने लगा, तो हैदर खाँ ने छुरे से उसकी हत्या कर दी। इस प्रकार अर्विन के शब्दों में ‘भारतीय कर्बला में दूसरे यजीद ने दूसरे हुसैन को शहीद कर दिया।’

अपने भाई की मौत का बदला लेने के लिए अब्दुल्ला खाँ ने एक बड़ी सेना एकत्रित की और मुहम्मदशाह के स्थान पर एक और कठपुतली को सिंहासन पर बैठाने का प्रयास किया, किंतु 13 नवंबर, 1720 ई. को वह हसनपुर के स्थान पर पराजित हो गया और बंदी बना लिया गया। दो वर्ष बाद 11 अक्टूबर, 1722 ई. को उसे विष देकर मार दिया गया।

सैयद बंधुओं का मूल्यांकन (Evaluation of Syed brothers)

कम से कम फर्रुखसियर ने सैयद बंधुओं के साथ न्याय नहीं किया। सम्राट द्वारा निरंतर किये जा रहे षड्यंत्रों के कारण सैयद बंधु निराशा की चरमसीमा तक पहुँच गये। उन्हें आभास हो गया था कि सम्राट के रहते वे सुरक्षित नहीं हैं, इसलिए उन्होंने सम्राट को समाप्त करने में ही अपना कल्याण समझा, जो उचित ही था। सैयद बंधुओं ने अपने प्रभाव से अपने प्रतिद्वंदियों को निरस्त्र कर दिया और उसके बाद होनेवाले सम्राटों को लगभग शून्य कर दिया।

सैयद बंधु हिंदुस्तानी मुसलमान थे और वे इसमें गौरव का अनुभव करते थे। वे तूरानी दल की श्रेष्ठता को स्वीकार करने को तैयार नहीं थे और न ही उनमें किसी प्रकार की हीनभावना ही थी। किंतु यह कहना कठिन है कि वे मुगलों या विदेशी शासकों के स्थान पर राष्ट्रीय शासन स्थापित करना चाहते थे। धार्मिक क्षेत्र में सैयद बंधुओं ने सहिष्णुता की नीति अपनाई जो अकबर के दिनों की याद दिलाती है। उन्होंने 1713 ई. में जजिया को हटा दिया और जब वह पुनः लगाया गया, तो पुनः हटा दिया। उन्होंने हिंदुओं का विश्वास जीता और उन्हें ऊँचे पदों पर आसीन किया। रत्नचंद की दीवान के रूप में नियुक्ति इस बात का प्रमाण है। उन्होंने राजपूतों को भी अपनी ओर मिलाया और महाराजा अजीतसिंह को विद्रोही से मित्र बना लिया। यहाँ तक कि अजीतसिंह ने अपनी बेटी का विवाह फर्रुखसियर के साथ कर दिया था।

सैयद बंधुओं ने जाटों से भी सहानुभूति दिखाई और उन्हीं के हस्तक्षेप से जाटों ने थूरी दुर्ग का घेरा उठा लिया और चूड़ामन अप्रैल, 1718 ई. में दिल्ली आया। सबसे प्रमुख बात यह थी कि मराठों ने भी सैयद बंधुओं का साथ दिया और छत्रपति मुगल सम्राट का नायक बन गया। यदि उनकी प्रबु( धार्मिक नीति का अनुसरण उनके उत्तराधिकारी करते, तो निश्चय ही भारत का इतिहास भिन्न होता। खाफी खाँ ने लिखा है कि जो लोग कट्टरपंथी और स्वार्थी नहीं थे, उन्हें सैयद बंधुओं के शासन से कोई शिकायत नहीं थी। वे अपने समय के हातिम थे।

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