नेपोलियन बोनापार्ट Napoleon Buonaparte

नेपोलियन बोनापार्ट (Napoleon Buonaparte)

19वीं सदी के आरंभिक 15 वर्षों के काल को ‘नेपालियन युग’ के नाम से जाना जाता है।

फ्रांस में कई वर्षों की क्रांति, अशांति एवं अव्यवस्था के पश्चात् एक निरंकुश शासक के रुप में नेपोलियन बोनापार्ट (Napoleon Buonaparte) (Napoleon Buonaparte) का उदय हुआ, जिसने न केवल फ्रांस, बल्कि पूरे यूरोप को चकाचौंध कर दिया।

यद्यपि नेपोलियन बोनापार्ट (Napoleon Buonaparte) डिक्टेटर था और उसके शासन में स्वतंत्रता का कोई स्थान नहीं था, किंतु क्रांति की दो अन्य भावनाओं- समानता एवं बंधुत्व का उसने पूर्णतया पालन किया।

नेपोलियन बोनापार्ट का आरंभिक जीवन (Early Life of Napoleon Bonaparte)

नेपोलियन बोनापार्ट (Napoleon Buonaparte) का जन्म कार्सिका और फ्रांस के एकीकरण के अगले वर्ष 15 अगस्त 1769 ई. को कार्सिका (Corsica) द्वीप के अजैसियो (Ajaccio) नगर में हुआ था।

नेपोलियन बोनापार्ट (Napoleon Buonaparte) के पिता का नाम कार्लो बोनापार्ट (Carlo Buonaparte) था जो पेशे से वकील थे।

कार्लो बोनापार्ट ने मारिया लीतिशिया रमोलिनो (Maria Leticia Ramolino) नाम की एक उग्र स्वभाव की महिला से विवाह किया था, जिससे नेपोलियन पैदा हुआ था।

ब्रीन की सैनिक एकेदमी में 1779 से 1784 ई. तक सैनिक शिक्षा समाप्त करने के बाद नेपोलियन ने 1784 ई. में तोपखाने से संबंधित विषयों का अध्ययन करने के लिए पेरिस के एक कॉलेज में प्रवेश लिया।

इसके बाद नेपोलियन फ्रांसीसी सेना के तोपखाने में उप-लेफ्टिनेंट के पद पर नियुक्त हुआ।

नेपोलियन को ढाई शिलिंग का प्रतिदिन का वेतन मिला करता था, जिससे वह अपने सात भाई-बहिनों का पालन-पोषण करता था।

कार्सिका के स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने के कारण नेपोलियन की नौकरी छूट गई।

1792 ई. में नेपोलियन ने पेरिस में जैकोबिन दल का सदस्य बन गया और फ्रांस में क्रांतिकारी विचारधारा का प्रचार करना आरंभ किया।

जैकोबिन दल का सदस्य बनने पर नेपोलियन को उसकी नौकरी पुनः मिल गई।

नेपोलियन के उदय तक फ्रांसीसी क्रांति पूर्ण अराजकता में परिवर्तित हो चुकी थी।

जैकोबिन और जिरोंदिस्त दलों की प्रतिद्वंद्विता और वैमनस्य के परिणामस्वरूप फ्रांस में आतंक का शासन चला, जिसमें एक-एक करके सभी क्रांतिकारी, यहाँ तक कि स्वयं राब्सपियर भी मारे गये।

नेपोलियन बोनापार्ट का उत्थान (Rise of Napoleon Bonaparte)

नेपोलियन बोनापार्ट
नेपोलियन बोनापार्ट

नेपोलियन ने अपने सैनिक जीवन की शुरूआत एक सैनिक के रूप में की थी।

अपने संपूर्ण राजनीतिक जीवन में नेपोलियन ने 16 प्रमुख लड़ाइयां लड़ीं, जिसमें से अधिकांश में उसे विजय मिली, कुछ लड़ाइयां अनिर्णयाक रहीं और अंतिम दिनों में लड़ी गई लड़ाइयों में उसे पराजय का सामना करना पड़ा।

तूलों के बंदरगाह की सुरक्षा

28 अगस्त 1793 ई. को अंग्रेजी जहाजी बेड़े ने फ्रांस पर आक्रमण कर तूलों बंदरगाह पर अधिकार कर लिया था।

सैनिक के रूप में नेपोलियन ने तूलों के बंदरगाह पर आक्रमण करके अंग्रेजी सेना को खदेड़ दिया।

तूलों से अंग्रेजी सेना को खदेड़ना नेपोलियन के जीवन की प्रथम महत्वपूर्ण विजय थी, जिससे नेपोलियन को बिग्रेडियर जनरल का पद मिल गया।

राष्ट्रीय सभा की रक्षा (Defense of the National Convention)

फिर 5 अक्टूबर 1795 ई. में नेपोलियन को दूसरी सफलता तब मिली जब प्रजातंत्रवादियों की उत्तेजित भीड़ ने राष्ट्रीय सभा (National Convention) को घेर लिया था।

डाइरेक्टरी द्वारा विशेष रूप से नियुक्त नेपोलियन ने 40 तोपों की सहायता से मात्र दो घंटे के अंदर विद्रोहियों को खदेड़ दिया और कुशलतापूर्वक नेशनल कंवेंशन की रक्षा की।

नेपोलियन ने अपनी प्रतिभा से सारे फ्रांस का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट किया।

9 मार्च 1796 ई. को नेपोलियन ने जोसेफिन नामक एक उच्चवर्गीय विधवा से विवाह किया था।

किंतु अपनी पहली पत्नी जोसेफिन के निःसंतान रहने के कारण नेपोलियन ने ऑस्ट्रिया के सम्राट की पुत्री मैरी लुईस से दूसरा विवाह किया।

फ्रांस में 26 अक्टूबर 1797 ई. में राष्ट्रीय सभा (National Convention) का पतन हो गया और डाइरेक्टरी का शासन आरंभ हुआ।

डाइरेक्टरी के अधीन नेपोलियन के अभियान (Napoleon’s Expedition Under the Directory)

इटली का अभियान

डाइरेक्टरी के आदेश पर नेपोलियन ने 2 मार्च 1796 ई. को इटली के सफल अभियान का नेतृत्व किया।

नेपोलियन ने 28 अप्रैल 1796 ई. को सार्डिनिया को आत्मसमर्पण करने पर मजबूर किया और नीस तथा सेवाय पर फ्रांस का अधिकार हो गया।

नेपोलियन ने 10 मई 1796 ई. को मिलान पर आक्रमण करके उसे अपने अधिकार में कर लिया और कई स्थानों पर आस्ट्रिया की सेना को पराजित किया।

नेपोलियन ने मोडेना, रेग्गियो, बोलोन तथा फरारा को मिलाकर एक गणतंत्र की स्थापना की, इसके बाद नेपोलियन ने अपनी शक्ति के बल पर पोप को फ्रांस की अधीनता स्वीकार करने पर बाध्य दिया।

आस्ट्रिया के विरूद्ध अभियान

नेपोलियन ने आस्ट्रिया की ओर प्रस्थान करते हुए वेनिस की विजय की और ल्योबेन पर भी अधिकार कर लिया।

नेपोलियन ने आस्ट्रिया के समक्ष यह प्रस्ताव रखा कि यदि वह लोम्बार्डी पर फांस का अधिकार मान ले तो युद्ध समाप्त कर दिया जायेगा।

अंततः आस्ट्रिया ने नेपोलियन के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया और आस्ट्रिया को 17 अक्टूबर 1797 को कैम्पो फोर्मियो की संधि (Treaty of Campo Formio) करनी पड़ी।

आस्ट्रिया से कैम्पो फोर्मियो की संधि (Treaty of Campo Formio) के बाद नेपोलियन 5 दिसंबर 1797 ई. को राष्ट्रीय नायक के रूप में पेरिस लौटा।

मिस्र का असफल अभियान

इस समय फ्रांस का प्रतिद्वंद्वी केवल ब्रिटेन रह गया था और नेपोलियन ने ब्रिटिश साम्राज्य को पराजित करने की योजना बनाई, जिसे डाइरेक्टरी ने तुरंत स्वीकार कर लिया।

वैसे भी नेपोलियन की इटली और आस्ट्रिया में मिली सफलता से डाइरेक्टी के सदस्य भयभीत हो गये थे और नेपोलियन को फ्रांस से दूर रखना चहते थे।

पिरामिडों का युद्ध

नेपोलियन ने ब्रिटिश साम्राज्य पर आक्रमण करने के क्रम में 19 मई 1797 ई. को 35 हजार प्रशिक्षित सैनिकों को लेकर मिस्री अभियान पर निकला।

नेपालियन और मिस्री सेनाओं के बीच 21 जुलाई 1798 ई. को पिरामिडों का युद्ध (Battle of the Pyramids) हुआ।

नोपोलियन ने काहिरा पर अधिकार बनाये रखने के लिए स्वयं को मुसलमान घोषित किया और कुरान के प्रति श्रद्धा प्रकट की।

नील नदी का युद्ध

अभी नेपोलियन काहिरा में ही था कि ब्रिटिश नौसेना का भूमध्यसागरीय अध्यक्ष कमांडर नेल्सन नेपोलियन का पीछा करता हुआ सिंकदरिया पहुंच गया।

नेपोलियन बोनापार्ट (Napoleon Buonaparte) और नेल्सन की सेना के बीच अबूबकर की खाड़ी में ‘नील नदी का युद्ध’ (Battle of the Nile) हुआ, जिसमें फ्रांसीसी सेना तितर-बितर हो गई।

नेल्सन की सफलता से ब्रिटेन को फ्रांस के विरुद्ध एक द्वितीय गुट बनाने का समय मिल गया और नेपोलियन द्वारा पराजित यूरोपीय राष्ट्र फ्रांस के विरुद्ध युद्ध की तैयारी करने लगे।

नील नदी के युद्ध में अपनी सेना बिखर जाने और फ्रांस के विरूद्ध द्वितीय गुट बन जाने के कारण नेपोलियन बोनापार्ट (Napoleon Buonaparte) गुप्त रूप से फ्रांस वापस आना पड़ा।

नेपोलियन के मिस्री अभियान की असफलता के बावजूद फ्रांस की जनता ने नेपोलियन बोनापार्ट (Napoleon Buonaparte) का स्वागत किया और उसे ‘फ्रांस का रक्षक’ (Protector of France) कहा जाने लगा।

डाइरेक्टरी के शासन का अंत (End of Directory Rule)

फ्रांस में अक्टूबर 1799 ई. तक संचालक मंडल का शासन अपने कुकृत्यों के कारण बदनाम हो चुका था।

नेपोलियन ने इस स्थिति का लाभ उठाकर 10 नवंबर 1799 ई. को संचालक मडंल (Directory) के शासन का अंत कर दिया।

नेपोलियन ने अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए 1799 में एक संविधान का निर्माण करवाया, जो क्रांतिकाल का चौथा संविधान था।

इस नये संविधान को क्रांतिकाल के आठवें वर्ष का संविधान (Constitution of the Year VIII) भी कहा जाता है।

इस नये संविधान के द्वारा सीनेट ने कार्यपालिका की संपूर्ण शक्तियां तीन निर्वाचित कौंसिलों- नेपोलियन, कैम्नेसरी और तृतीय कौंसिल लैब्रना को सौंप दी। कौंसिलों की कार्यावधि 10 वर्ष निर्धारित की गई।

तीन निर्वाचित कौंसलों की सरकार को ‘कांसुलेट की सरकार’ (Consulate Government) कहा गया है।

कांसुलेट की सरकार में नेपोलियन प्रथम कौंसल था जिसे संपूर्ण अधिकार दिये गये थे, शेष द्वितीय एवं तृतीय कौंसल का कार्य केवल प्रथम कौंसल को परामर्श देना था।

इस प्रकार कांसुलेट की सरकार की सारी शक्तियाँ प्रथम कौंसल नेपोलियन में ही केंद्रित हो गईं।

नेपोलियन बोनापार्ट एक अन्य नाम लिटल कार्पोरल के नाम से भी जाना जाता है।

नेपोलियन के सुधार (Napoleon’s Reformation)

नेपोलियन ने 1799 से 1803 ई. तक अपनी स्थिति सुदृढ़ करने तथा फ्रांस को प्रशासनिक स्थायित्व प्रदान करने के लिए विभिन्न क्षेत्रों में सुधार-कार्य किया, जिसके कारण नेपोलियन को आधुनिक फ्रांस का निर्माता माना जाता है।

राजनीतिक-प्रशासनिक सुधार

नेपोलियन ने प्रशासन की संपूर्ण शक्ति अपने हाथों में केंद्रित कर लिया, किंतु क्रांति के समय जो प्रशासनिक ढांचा और स्वरूप था, उसे बनाये रखा।

स्थानीय अधिकारियों की निर्वाचन व्यवस्था का अंत कर दिया गया और योग्यता के आधार पर इनकी नियुक्ति की गई।

नेपोलियन ने 17 फरवरी 1800 ई. को स्थानीय प्रशासन-संबंधी एक अधिनियम पारित किया, जिसके अंतर्गत प्रत्येक प्रांत में एक प्रीफेक्ट और जिलें में उप-प्रीफेक्ट नियुक्त किया।

फ्रांस के गांव और शहरों में सीधे केंद्रीय सरकार द्वारा मेयरों की नियुक्ति की गई।

नेपोलियन ने अधिकारियों को पर्याप्त प्रशासकीय अधिकार दिये और शासन में फिजूलखर्ची और घूसखोरी रोकने के लिए कठोर दंड की व्यवस्था की।

आर्थिक सुधार

प्रथम कौंसल के रूप में फ्रांस की आर्थिक स्थिति को सुधारने के लिए कर-पद्धति में सुधार किया।

वित्तमंत्री के अधीन करों के लिए एक नवीन कार्यालय गठित किया गया।

नेपोलियन ने करों में एकरूपता स्थापित की और कर-निर्धारण और नियमित कर वसूली के लिए सुयोग्य और सक्षम केंद्रीय कर्मचारियों को नियुक्त किया, जिससे राज्य की आय में वृद्धि हुई।

नेपोलियन ने मितव्ययिता पर बल दिया और घूसखोरी, सट्टेबाजी, ठेकेदारी में अनुचित मुनाफे पर रोक लगा दी।

फ्रांस की वित्तीय साख को बनाये रखने के लिए नेपोलियन ने ‘बैंक ऑफ फ्रांस’ की स्थापना की।

1803 ई. में बैंक ऑफ फ्रांस (Bank of france) को नोट छापने का अधिकार भी मिल गया।

राष्ट्रीय ऋण को चुकाने के लिए नेपोलियन ने एक पृथक् कोष की भी स्थापना की।

नेपोलियन ने जहां तक संभव हुआ सेना के खर्च का बोझ विजित प्रदेशों पर डाला और फ्रांस की जनता को इस बोझ से मुक्त रखने की कोशिश की।

नेपोलियन ने कृषि के सुधार पर भी बल दिया और बंजर और रेतीले इलाके को उपजाऊ बनाने की योजना बनाई।

व्यापार-वाणिज्य की प्रगति के लिए फांस में चैंबर्स आफ कामर्स की स्थापना की गई।

नेपोलियन ने फ्रांसीसी औद्योगिक वस्तुओं को लोकप्रिय बनाने के लिए प्रदर्शनी के आयोजन को बढ़ावा दिया और स्वदेशी वस्तुओं एवं उद्योगों को प्रोत्साहन दिया।

इस तरह नेपोलियन ने फ्रांस को जर्जर और दिवालियेपन की स्थित से उबारा।

धार्मिक सुधार

फ्रांस की बहुसंख्यक जनता कैथोलिक चर्च के प्रभाव में थी, किंतु 1789 ई. की क्रांति के दौरान चर्च को राज्य के अधीन कर दिया गया था।

चर्च की संपति का राष्ट्रीयकरण किया गया और पादरियों को राज्य की वफादारी की शपथ लेने को कहा गया था जिससे पोप के साथ-साथ फ्रांस की आम जनता नाराज थी।

नेपोलियन की धारणा थी कि राज्य का कोई एक धर्म अवश्य होना चाहिए क्योंकि वह धर्म के बिना राज्य को मल्लाह के बिना नौका के समान समझता था।

नेपोलियन ने धार्मिक मतभेद दूर करने के लिए एक ओर धार्मिक सहनशीलता और स्वतंत्रता की नीति अपनाई, तो दूसरी और 1801-02 ई. में रोम के पोप पायस सप्तम (Pope Pius VII) के साथ समझौता किया, जिसे कॉनकारडेट (Concordat) कहा जाता है।

  1. अब विशपों की नियुक्ति प्रथम कौंसल के द्वारा की जानी थी, और शासन की स्वीकृति पर ही विशप छोटे पादरियों की नियुक्ति करेगा।
  2. कॉनकारडेट (Concordat) के अनुसार नेपोलियन ने कैथोलिक धर्म को राजकीय धर्म के रूप में स्वीकार कर लिया।
  3. पोप ने चर्च की जब्त की गई संपत्ति और भूमि पर से अपना अध्किार त्याग दिया।
  4. देश के सभी गिरजाघरों पर राज्य का अधिकार हो गया और उसके अधिकारी राज्य से वेतन पाने लगे। चर्च के सभी अधिकारियों को राज्य-भक्ति का शपथ लेना आवश्यक था।
  5. गिरफ्तार पादरी छोड़ दिये गये और देश से भागे पादरियों और कुलीनों को वापस आने की इजाजत मिल गई।
  6. क्रांतिकाल के कैलेंडर को स्थगित कर प्राचीन कैलेंडर एवं अवकाश-दिवसों को पुनः लागू किया गया।

इस प्रकार नेपोलियन ने राजनीतिक उद्देश्यों से परिचालित होकर पोप से संधि की और क्रांतिकालीन अव्यवस्था को समाप्त कर चर्च को राज्य का सहभागी बना दिया।

किंतु इस घार्मिक समझौते (Concordat) के द्वारा नेपोलियन ने कैथोलिक धर्म को राज्य का धर्म बनाकर राज्य के धर्मनिरपेक्ष भावना को ठेस पहुंचाई।

नेपोलियन का पोप के साथ यह धार्मिक समझौता (Concordat) अस्थायी सिद्ध हुआ क्योंकि 1807 ई. में पोप के साथ उसे संघर्ष करना पड़ा तथा पोप के राज्य पर नियंत्रण स्थापित कर लिया।

न्याय एवं दंड-व्यवस्था में सुधार

प्रथम कौंसल बनने के बाद नेपोलियन ने फ्रांस में अनेक सिविल एवं दंड न्यायालयों की स्थापना की। न्यायाधीशों की नियुक्ति नेपोलियन स्वयं करता था।

नेपोलियन ने क्रांतिकारियों को पकड़ने के लिए मुद्रित पत्रों का पुनः प्रचलन किया और जूरी की प्रथा को प्रारंभ किया।

नेपोलियन की विधि संहिता (Napoleonic Code)

नेपोलियन एक स्थायी कीर्ति का आधार उसकी विधि संहिता है।

नेपोलियन के पूर्व फ्रांस में विभिन्न प्रांतों में अलग-अलग कानून थे जो जटिल और अस्पष्ट थे।

नेपोलियन ने न्याय-व्यवस्था और कानून के क्षेत्र में एकरूपता और निष्पक्षता लाने के लिए प्रचलित कानूनों का संग्रह कर फ्रांस के लिए एक सिविल कोड तैयार करवाया, जिसे नेपोलियन की विधि संहिता (Napoleonic Code) कहा जाता है।

नेपोलियन की विधि संहिता में पांच प्रकार के कानूनों को संकलित किया गया था-

  1. नागरिक संहिता (व्यावहारिक संहिता) में वस्तुओं एवं संपपत्ति से संबंधित कानून थे।
  2. नागरिक प्रक्रिया संहिता (व्यावहारिक प्रक्रिया संहिता) में 1737-38 ई. के अध्यादेशों का संग्रह था।
  3. दंड विधान की संहिता (दंड संहिता) में विभिन्न प्रकार के अपराधों के लिए दंड का प्रावधान था।
  4. अपराधमूलक कानून संहिता (दंड प्रक्रिया संहिता) में अपराधी को न्यायालयों में अपने पक्ष में वकील आदि रखने का विधान था।
  5. व्यवसायमूलक कानून संहिता (वाणिज्य संहिता) में व्यापार-संबंधी नियम और कानून थे।

शैक्षिक सुधार

नेपालियन ने अच्छे नागरिकों का निर्माण करने लिए 1802 ई. में शिक्षा को चर्च के प्रभाव से मुक्त कर शिक्षा का राष्ट्रीयकरण कर दिया।

नेपोलियन की राज्य-नियंत्रित शिक्षा का उद्देश्य विद्यार्थियों को शासन के प्रति निष्ठावान बनाना था।

नेपोलियन ने शिक्षा को प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च स्तरों पर संगठित किया।

  1. प्रत्येक कम्यून में प्राथमिक विद्यालय स्थापित किये गये, जो प्रीफेक्ट और उप-प्रीफेक्ट की देख-रेख में संचालित होते थे।
  2. बड़ी संख्या में माध्यमिक विद्यालयों की स्थापना की गई जिनमें कला, लैटिन और फ्रांसीसी भाषा तथा विज्ञान की शिक्षा दी जाती थी।
  3. नेपोलियन ने 1808 ई. में पेरिस में इंपीरियल विश्वविद्यालय की स्थापना की, जिसमें लैटिन, फ्रेंच, विज्ञान, गणित इत्यादि विषयों की शिक्षा दी जाती थी।
  4. इंपीरियल विश्वविद्यालय में पांच विभाग थे- धर्मज्ञान, कानून, चिकित्सा, साहित्य और विज्ञान।
  5. इंपीरियल विश्वविद्यालय के प्रमुख अधिकारियों की नियुक्ति नेपोलियन स्वयं करता था।
  6. नेपोलियन ने शोध कार्यों के लिए इंस्टीच्यूट ऑफ फ्रांस की स्थापना की।

सामाजिक समानता

नेपोलियन का मानना था कि फ्रांस के लोग स्वतंत्रता नहीं, समानता के भूखे है।

नेपोलियन ने उच्च एवं निम्न वर्गों के भेद को समाप्त कर दिया। अब कोई भी व्यक्ति अपनी योग्यता के बल पर शासन के किसी भी पद को प्राप्त कर सकता था।

नेपोलियन ने फ्रांस से भागे हुए कुलीनों और पादरियों के विरूद्ध पारित किये गये कानूनों का अंत कर दिया, जिसके कारण 40 हजार से भी अधिक परिवार फ्रांस वापस आ गये।

सार्वजनिक कार्य

प्रथम कौंसल क रूप में नेपोलियन ने अनेक सड़कों और नहरों का निर्माण और मरम्मत करवाया।

पेरिस का सौंदर्यीकरण करते हुए उसे सुंदर भवनों और वृक्षों से सुसज्जित किया गया।

नेपोलियन ने विभिन्न देशों से लाई गई कलाकृतियों का एक संग्रहालय भी फ्रांस में स्थापित करवाया।

नेपोलियन के प्रमुख अभियान (Napoleon’s Major Campaigns)

इंग्लैंड, आस्ट्रिया और रूस त्रिगुट

अपनी आंतरिक स्थिति मजबूत करने के बाद नेपोलियन ने फ्रांस के विरूद्ध बने त्रिगुट की ओर ध्यान दिया जिसमें इंग्लैंड, आस्ट्रिया और रूस थे।

नेपोलियन ने फ्रांस के विरूद्ध बने त्रिगुट को भंग करने के लिए सबसे पहले आस्ट्रिया पर आक्रमण किया।

1801 ई. में पराजित आस्ट्रिया को फ्रांस के साथ ल्यूविले की संधि (Treaty of Leoben) करनी पड़ी, जिसमें पहले की कैम्पो फोर्मियो (Campo-Formio) की सारी शर्तें दोहराई गईं।

आस्ट्रिया-फ्रांस संधि ने नाराज होकर रूस त्रिगुट से अलग हो गया और इस प्रकार नेपोलियन के विरूद्ध बना द्वितीय गुट टूट गया।

अकेले इंग्लैंड ने युद्ध से बचने के लिए 27 मार्च 1802 ई. को बिना युद्ध किये ही फ्रांस के साथ अमीन्स (Amiens) की संधि कर ली।

अमीन्स की संधि के अनुसार इंग्लैंड ने पहली बार नेपोलियन के नेतृत्व में गठित सरकार को मान्यता दी और अधिकांश जीते हुए प्रदेश फ्रांस को वापस कर दिये।

सम्राट नेपोलियन (Emperor Napoleon)

1804 ई. में सीनेट ने नेपोलियन को फ्रांस का सम्राट घोषित कर दिया।

अपने राज्याभिषेक के अवसर पर नेपोलियन ने कहा था कि ‘मैंने फ्रांस के शाही ताज को धरती पर पड़ा पाया और उसे अपनी तलवार की नोंक से उठा लिया।’

शासक बनने के बाद नेपोलियन ने यूरोप के विभिन्न देशों के साथ युद्ध किया।

इंगलैंड के विलियम पिट ने 1805 ई. में नेपोलियन के विरूद्ध एक त्रिगुट गुट का निर्माण किया।

फ्रांस के विरूद्ध तृतीय गुट में इंग्लैंड, आस्ट्रिया, रूस, स्वीडन आदि देश शामिल थे, जबकि आस्ट्रिया के विरोधी दक्षिण जर्मनी के राज्य नेपोलियन का साथ थे।

ट्रेफलगर का युद्ध

21 अक्टूबर 1805 ई. को फ्रांस तथा स्पेन की संयुक्त जल सेना और नेल्सन के नेतृत्व में अंग्रेजी जल सेना के मध्य ट्रेफलगर के समीप समुद्र में भयंकर युद्ध हुआ, जिसे ट्रेफलगर का युद्ध (Battle of Trafalgar) कहते हैं।

यद्यपि ट्रेफलगर के युद्ध (Battle of Trafalgar) में नेल्सन वीरगति को प्राप्त हुआ, किंतु इंग्लैंड की जल सेना ने फ्रांस और स्पेन की संयुक्त जल सेना को पराजित कर तितर-बितर कर दिया।

ट्रेफलगर में फ्रांस की इस पराजय से नेपोलियन द्वारा समुद्र की ओर से इंग्लैंड पर आक्रमण करने का भय समाप्त हो गया।

उल्म का युद्ध

नेपोलियन ने आस्ट्रिया की सेना पर आक्रमण कर उसे 1805 ई. को उल्म (Ulm) के युद्ध में पराजित कर दिया। इस विजय के बाद नेपालियन का वियेना पर अधिकार हो गया। आस्ट्रिया का शासक फ्रांसिस द्वितीय वियेना छोड़कर रूस भाग गया।

आस्टरलिट्ज का युद्ध

नेपोलियन ने अक्टूबर, 1805 ई. में आस्टरलिट्ज के युद्ध (Battle of Austerlitz) में रूस और आस्ट्रिया की संयुक्त सेनाओं को पराजित किया। आस्टरलिट्ज के युद्ध (Battle of Austerlitz) को तीन सम्राटों के युद्ध के नाम से भी जाना जाता है।

आस्टरलिट्ज की विजय नेपोलियन की महत्वपूर्ण विजयों में से एक थी।

आस्टरलिट्ज के युद्ध में पराजय के बाद रूस ने अपनी सेनाएँ पीछे हटा लीं और आस्ट्रिया ने नेपोलियन के साथ 26 दिसंबर 1805 ई. को प्रेसवर्ग की संधि कर ली।

पवित्र रोम साम्राज्य का अंत

6 अगस्त 1806 ई. को नेपोलियन ने पवित्र रोमन साम्राज्य का अंत कर दिया।

जेना और आवरसेट के युद्ध

14 अक्टूबर 1806 ई. को नेपोलियन ने जेना (Jena) और आवरसेट (Auerstedt) के युद्ध में प्रशा को पराजित किया। राइन संघ (Rhine Union) की रचना कर अपने भाई जोसेफ बोनापर्ट के शासन को मजबूत किया।

नेपोलियन के विरूद्ध तीसरे गुट में अब केवल इंग्लैंड और रूस ही शेष बचे थे, बाकी सदस्य देश नेपोलियन के हाथों पराजित हो चुके थे।

फ्रीडलैंड का युद्ध

14 जून 1807 ई. को फ्रीडलैंड (Friedland) के युद्ध में नेपालियन ने रूस को हरा दिया।

फ्रीडलैंड के युद्ध में पराजय के बाद रूसी सम्राट जार एलेक्जेंडर ने नीमेन नदी (Neman River) में एक शाही नाव में नेपोलियन से भेंट की।

अंततः टिलसिट (Tilsit) में फ्रांस, रूस और प्रशा के प्रतिनिधियों में 8 जुलाई 1807 ई. को टिलसिट की संधि (Treaties of Tilsit) हो गई।

पुर्तगाल पर आक्रमण

1807 ई. में ही नेपोलियन ने स्पेन के साथ मिलकर पुर्तगाल पर आक्रमण किया और उस पर अधिकार कर लिया।

महाद्वीपीय युद्ध

1808 ई. में नेपोलियन को स्पेन के साथ युद्ध शुरू हुआ, जो 1814 ई. तक चलता रहा।

स्पेन के साथ युद्ध नेपोलियन के युद्ध को महाद्वीपीय युद्ध (Continental warfare) भी कहते है।

आस्ट्रिया के साथ पुनः युद्ध

अप्रैल 1809 में नोपोलियन ने आस्ट्रिया के साथ पुनः युद्ध किया और उसके साथ वियेना की संधि की।

रूस पर आक्रमण

नेपोलियन ने जून 1812 में रूस पर आक्रमण किया। 7 सितंबर 1812 को बोरोडिनो (Borodino) के मैदान में रूस और फ्रासीसी सेना के बीच युद्ध हुआ, जिसका कोई निर्णायक परिणाम नहीं निकला।

इस रूसी अभियान में नोपोलियन को भरी क्षति उठानी पड़ी थी।

लुटजेन और बुटजेन का युद्ध

मई 1813 में लुटजेन और बुटजेन के युद्ध में नेपोलियन ने प्रशा और रूस की संयुक्त सेना को पराजित किया

लिपजिंग का युद्ध

यूरोप के राष्ट्रों- प्रशा, आस्ट्रिया, रूस और इंग्लैंड की संयुक्त सेनाओं ने अक्टूबर 1813 ई. में लिपजिंग (Leipzig) नामक स्थान पर नेपोलियन को बुरी तरह हराया और उसे बंदी बनाकर एल्बा के टापू (Elba Island) पर भेज दिया।

परंतु नेपोलियन बोनापार्ट (Napoleon Buonaparte)न एल्बा से भाग निकला और पुनः 100 दिनों के लिए फ्रांस का सम्राट बन गया।

वाटरलू का युद्ध

नेपोलियन के वापस लौटने की सूचना पाकर मित्रराष्ट्रों की मिली-जुली सेनाओं ने 18 जून 1815 ई. को वाटरलू के युद्ध ( Battle of Waterloo) में नेपोलियन को निर्णायक रूप से पराजित कर बंदी बना लिया।

बंदी नेपोलियन को सेंट हेलेना (St- Helena) टापू पर भेजा गया, जहां 5 मई 1821 ई. को उसकी मृत्यु हो गई।

नेपोलियन की महाद्वीपीय व्यवस्था (Continental System)

नेपोलियन यूरोप के प्रमुख राष्ट्रों-आस्ट्रिया, प्रशा, रूस को क्रमशः 1805, 1806 और 1807 में पराजित कर चुका था।

यूरोप में मात्र इंगलैंड ही बचा था जो नेपोलियन को चुनौती दे रहा था।

ट्रेफलगर के युद्ध में इंग्लैंड से पराजित होने के बाद नेपोलियन समझ गया था कि इंग्लैंड को समुद्री की लहरों पर पराजित करना असंभव है।

इसी समय नेपोलियन को मांटगैलार्ड ने सलाह दी कि इंग्लैंड एक व्यापारिक देश है, इसलिए उसे आर्थिक युद्ध में पराजित किया जा सकता है।

नेपोलियन ने इंग्लैंड से आर्थिक युद्ध करने के लिए इंग्लैंड के आयात-निर्यात की नाकेबंदी करने का फैसला किया।

नेपोलियन ने इंग्लैंड के विरूद्ध आर्थिक बहिष्कार की जो नीति अपनाई, उसे महाद्वीपीय व्यवस्था (Continental System) कहा जाता है।

नेपोलियन का विचार था कि बनियों के देश से जब आयात-निर्यात बंद कर दिया जायेगा, तो खाने-पीने की वस्तुओं के लाले पड़ जायेंगे और इंग्लैंड घुटने टेकने पर विवश हो जायेगा।

इसके अलावा नेपोलियन चाहता था कि यूरोपीय अर्थव्यवस्था का केंद्र लंदन न होकर पेरिस हो।

नेपोलियन का बर्लिन आदेश

महाद्वीपीय व्यवस्था की घोषणा 21 नवंबर 1806 ई. को बर्लिन से एक आदेश निकालकर की गई।

बर्लिन आदेश में कहा गया था कि यूरोप का कोई भी राष्ट्र इंग्लैंड और उसके उपनिवेशो के साथ व्यापार नहीं करेगा।

बर्लिन आदेश के द्वारा इंग्लैंड के जहाजों के लिए सभी समद्री बंदरगाह बंद कर दिये गये।

1806 ई. में नेपोलियन ने नेपल्स पर अधिकार कर उसके बंदरगाह को ब्रिटेन के व्यापार के लिए बंद कर दिया।

फिर, प्रशा को पराजित करने के बाद 25 जुलाई 1807 ई. को नेपोलियन ने वार्सा आदेश जारी कर प्रशा तथा हनोवर के समुद्रतट से भी अंग्रेजी व्यापार पर प्रतिबंध लगा दिया।

टिलसिट की संधि के बाद रूस, प्रशा तथा डेनमार्क ने भी ब्रिटिश माल का बहिष्कार किया, जिससे इंग्लैंड को काफी हानि उठानी पड़ी।

इंगलैंड का प्रथम आर्डर इन कौंसिल

नेपोलियन द्वारा लारी बर्लिन आदेश के पूर्व ही इंग्लैंड उत्तरी समुद्र के महादेशीय बंदरगाहों और इंग्लिश चैनल से होकर आने-जाने वाले सामानों पर खुद ही नाकेबंदी कर चुका था।

नेपोलियन के बर्लिन आदेश का जवाब देने के लिए इंग्लैंड ने 7 जनवरी 1807 ई. को आर्डर्स इन कौंसिल अध्यादेश जारी किया, जिसके अनुसार-

  1. यदि किसी जहाज में फ्रांस अथवा उसके उपनिवेशों का बना हुआ माल पाया जायेगा, उसे जब्त कर लिया जायेगा।
  2. इंग्लैंड ने अपने विदेशी व्यापार को बनाये रखने के लिए तटस्थ राष्ट्रों को कम करों पर सामान देने की घोषणा की।
  3. इंग्लैंड से व्यापार करनेवाले तटसथ जहाजों को हर प्रकार की सुविधा दी जायेगी।
  4. प्रशा तथा पुर्तगाल जैसे देशों ने विवशता मे महाद्वीपीय व्यवस्था को स्वीकार किया है, इसलिए उनके जहाज छोड़ दिये जायेंगे।

इस प्रकार इंग्लैंड ने अपने उपनिवेशों से व्यापार बढ़ाकर अपनी क्षतिपूर्ति करने का प्रयास किया।

नेपोलियन का मिलान आदेश

17 दिसंबर 1807 ई. को नेपोलियन ने मिलान से आदेश जारी किया कि कोई भी ऐसा जहाज, जो ब्रिटिश अध्किार-क्षेत्र वाले बंदरगाहों से होकर आया हो, उसे अपने अधिकार में लेकर उस पर लदे माल को जब्त कर लिया जायेगा।

नेपोलियन का फांटेब्ल्यू आदेश

18 अक्टूबर 1810 को नेपोलियन ने फांटेब्ल्यू (Fontainebleau) से एक कठोर आदेश जारी किया, जिसमें कहा गया था कि जब्त अंग्रेजी माल को जला दिया जायेगा और अवैध ढंग से व्यापार करने वालों को कठोर दंड दिया जायेगा।

महाद्वीपीय व्यवस्था की असफलता

1806 में लागू की गई नेपोलियन की महाद्वीपीय व्यवस्था 1812 ई. में समाप्त हो गई।

यद्यपि दूरदर्शी नेपोलियन बोनापार्ट (Napoleon Buonaparte) ने ब्रिटेन को पराजित करने के लिए सर्वाधिक उपयुक्त कूटनीति को अपनाया, किंतु अपने देश के औद्योगिक पिछड़ेपन और ब्रिटिष उत्पादों की गुणवत्ता तथा उसकी सुदृढ़ नौशक्ति के कारण नेपोलियन की नीति विफल रही।

महाद्वीपीय व्यवस्था के विरुद्ध सबसे पहले स्पेन ने विद्रोह किया। नेपोलियन ने स्पेन पर आक्रमण कर उस पर अधिकार कर लिया।

नेपोलियन बोनापार्ट (Napoleon Buonaparte) के विरूद्ध स्पेन में एक राष्ट्रीय विद्रोह छिड़ गया और स्पेनी नासूर ने नेपोलियन का सत्यानाश कर दिया।

स्पेन के बाद एक-एक करके यूरोपीय राष्ट्र महाद्वीपीय व्यवस्था से अलग होने लगे और नेपोलियन अनिवार्य रूप से आक्रामक युद्धों में उलझ गया जिसकी उसे भारी कीमत चुकानी पड़ी।

अंततः महाद्वीपीय व्यवस्था की असफलता ही नेपोलियन के पतन का कारण बनी।

महाद्वीपीय व्यवस्था की असफलता के कारण फ्रांस के पास सशक्त जलसेना का अभाव और विभिन्न यूरोपीय देशों की इंग्लैंड के जहाजों और उत्पादों पर निर्भरता थी।

नेपोलियन बोनापार्ट (Napoleon Buonaparte) ने फ्रांस की क्रांति के सिद्धांतो को अन्य देशो में पहुंचाया तथा जनसाधारण में स्वतंत्रता की भावना उत्पन्न की।

यूरोप में राष्ट्रीय राज्यों के निर्माण का श्रेय नेपोलियन बोनापार्ट (Napoleon Buonaparte) को है।

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