नेपोलियन तृतीय (Napoleon III)

नेपोलियन तृतीय

नेपोलियन महान् का भतीजा चार्ल्स लुई नेपोलियन 1848 ई. की क्रांति के बाद द्वितीय फ्रांसीसी गणराज्य का राष्ट्रपति तथा 2 दिसंबर 1852 ई. को नेपोलियन तृतीय के नाम से द्वितीय फ्रांसीसी साम्राज्य (Second French Empire) की स्थापना कर फ्रांस का सम्राट (Emperor of the French) बन गया।

नेपोलियन तृतीय 1870 ई. में सीडान के युद्ध में बंदी बनाये जाने तक फ्रांस का सम्राट रहा था।

नेपोलियन तृतीय का आरंभिक जीवन (Early life of Napoleon III)

चार्ल्स लुई नेपोलियन का जन्म 1808 ई. में पेरिस के राजमहल में हुआ था।

चार्ल्स लुई नेपोलियन का पिता लुई बोनापार्ट नेपोलियन महान् का भाई था।

चार्ल्स लुई नेपोलियन की मां हार्टेस डी बेहरानिस थी जो नेपोलियन महान् की पत्नी जोसेफिन की पहली शादी से पैदा हुई थी।

लुई नेपोलियन का शैशव बड़े लाड़-प्यार और वैभव में बीता, परंतु 1815 ई. में नेपोलियन महान् की वाटरलू में अंतिम पराजय और प्रथम फ्रांसीसी साम्राज्य के पतन के बाद लुई नेपोलियन का परिवार फ्रांस से निर्वासित हो गया।

फ्रांस से निष्कासन के बाद लुई नेपोलियन अपनी माँ हार्टेस डी बेहरानिस के साथ स्विट्जरलैंड चला गया।

लुई नेपोलियन के यौवन का अधिकांश भाग स्विट्जरलैंड तथा जर्मनी और इटली में बीता था।

स्विट्जरलैंड में लुई नेपोलियन ने स्विस आर्मी में दाखिला लिया था और तोपखाने का एक मैनुअल लिखा था, क्योंकि उसके चाचा नेपोलियन बोनापार्ट एक तोपखाने अधिकारी के रूप में प्रसिद्ध थे।

लुई नेपोलियन उस वातावरण में शिक्षित एवं दीक्षित हुआ था, जहाँ उसकी पारिवारिक परंपराएं फ्रांसीसी क्रांति और राष्ट्रीयता की पर्यायवाची बन गई थीं।

लुई को विश्वास था कि एक दिन ऐसा जरूर आयेगा, जब वह फ्रांस के राजसिंहासन पर बैठेगा।

फ्रांस से वियेना (Vienna) की व्यवस्था का अंत कर बोनापार्ट वंश का शासन स्थापित करना लुई नेपोलियन के जीवन का लक्ष्य था।

लुई नेपोलियन को विश्वास था कि यदि उसने नेपोलियन बोनापार्ट की तरह पेरिस में मार्च किया, तो फ्रांस के लोग उसके साथ उठ खड़े होंगे क्योंकि वह 1815 में नेपोलियन बोनापार्ट के सौ दिनों के पेरिस मार्च के दौरान जनता के लोकप्रिय उत्साह को देख चुका था।

लुई नेपोलियन ने इटली के क्रांतिकारी दल कारबोनारी के सदस्य के रूप में 1831 ई. में पोप के विरूद्ध एक असफल आंदोलन में भाग लिया था।

आस्ट्रियावालों ने लुई नेपोलियन को पकड़ लिया था, किंतु उसकी माता के अनुनय-विनय पर उसे छोड़ दिया गया।

इसके बाद भी लुई नेपोलियन एक ओर फ्रांस के गणतंत्रवादियों के साथ और दूसरी ओर पोलैंड के देशभक्तों के साथ मिलकर षड्यंत्र करता रहा।

किंतु लुई फिलिप की सतर्कता और जार की दृढ़ता के कारण लुई नेपोलियन को कोई बड़ा उपद्रव करने का मौका नहीं मिला।

लुई नेपोलियन के आरंभिक विद्रोह (Louis Napoleon’s Early Rebellion)

स्ट्रासबर्ग का विद्रोह

29 अक्टूबर 1836 को लुई नेपोलियन ने स्ट्रासबर्ग (Strasbourg) में दुर्गरक्षकों के सहयोग से विद्रोह किया, जिसमें उसे बंदी बना लिया गया था।

फ्रांस के शासक लुई फिलिप ने लुई नेपोलियन को इस शर्त पर जेल से रिहा किया कि वह संयुक्त राज्य अमरीका में निर्वासन में चल जायेगा।

लुई नेपोलियन अगस्त 1837 में अमरीका से स्विट्जरलैंड लौट आया और फिर 1838 ई. में इंग्लैंड पहुँच गया।

लंदन के रहते हुए लुई नेपोलियन ने कभी सत्ता पर कब्जा करने के लिए फ्रांस लौटने का सपना नहीं छोड़ा।

1839 ई. में लुई नेपोलियन ने नेपोलियन बोनापार्ट पर एक पुस्तक लिखी, जिसमें बोनापार्टवाद, समाजवाद तथा शांतिवाद का विचित्र सम्मिश्रण था।

लुई नेपोलियन की पुस्तक के बाद सारे फ्रांस में नेपोलियन अजेय माना जाने लगा और उसकी तथाकथित पराजय को शत्रुओं का षड़यंत्र बताया जाने लगा।

तत्कालीन फ्रांसीसी शासक लुई फिलिप ने अगस्त, 15 दिसंबर 1840 में सेंट हेलेना से नेपोलियन महान् की अस्थियों (remains of Napoleon) को पेरिस में दफनाने के लिए फ्रांस मंगवाया।

इस अवसर पर लुई नेपोलियन को लगा कि सत्ता लेने की कोशिश करने का यह सही समय है।

बोलोन का विद्रोह

लुई नेपोलियन ने अगस्त 1840 में लगभग 60 हथियारबंद लोगों के साथ बोलोन (Boulogne) में एक सैनिक विद्रोह के द्वारा सत्ता हथियाने का प्रयास किया।

बोलोन (Boulogne) विद्रोह में लुई नेपोलियन पकड़ा गया और उसे आजीवन कारावास की सजा देकर उत्तरी फ्रांस में हाम (Ham) के किले में बंद कर दिया गया।

हाम के किले में बंदी जीवन के दौरान लुई नेपोलियन ने राजनीतिक और सामाजिक विषयों पर कई पुस्तकें लिखी।

छः वर्ष बाद 25 मई 1846 ई. को लुई नेपोलियन एक मजदूर के वेश में हाम के किले से निकल भागा और लंदन में शरण ली।

1848 ई. की फरवरी फ्रांसीसी क्रांति

लुई नेपोलियन को 1848 ई. की फरवरी क्रांति (Revolution of February 1848) के कारण अपने लक्ष्य तक पहुँचने का अवसर मिला।

1848 ई. की क्रांति से राजा लुई फिलिप (Louis Philippe I) पतन हो गया और दूसरे फ्रांसीसी गणराज्य की स्थापना हुई, जिससे लुई नेपोलियन के फ्रांस लौटने और नेशनल असेंबली (National Assembly) में जाने का रास्ता खुल गया।

अस्थायी सरकार (Provisional Government)

लुई फिलिप के पतन के बाद क्रांति के प्रमुख नेताओं ने फ्रांस में एक अस्थायी सरकार बनाई, जिसमें प्रजातंत्रवादी, समाजवादी एवं श्रमजीवी नेता शामिल थे, लेकिन इसमें गणतंत्रवादियों की प्रधानता थी।

गणतंत्रवादियों के प्रमुख नेता अल्फोंस डी लामार्टिन (Alphonse de Lamartine) ने घोषित किया कि अब फ्रांस में प्रजातंत्र की स्थापना एवं राजशाही का अंत हो गया है।

लामार्टिन देश की आर्थिक समस्या के समाधान के लिए व्यक्तिगत संपत्ति का पूर्ण-विनाश आवश्यक समझता था।

लामार्टिन के विपरीत समाजवादी नेता लुई ब्लाक का मानना था कि देश की आर्थिक समस्या का समाधान केवल समाजवादी सरकार की स्थापना से ही हो सकती है।

अस्थायी सरकार ने देश के नये संविधान को बनाने के लिए नई असेंबली के लिए चुनाव करवाया।

4 मई 1848 ई. के असेंबली अधिवेशन में फ्रांस में पुनः गणतंत्र की स्थापना की घोषणा की गई, जिसके कारण समाजवादियों ने सरकार के विरूद्ध विद्रोह कर दिया।

15 मई 1848 ई. को समाजवादियों की भीड़ ने असेंबली को भंग कर पुनः अस्थायी सरकार की घोषणा की, किंतु लामार्टिन ने नेशनल गार्ड की सहायता से उपद्रवियों का दमन कर दिया।

24 से 26 जून 1848 ई. तक जून डेज विद्रोह (June Days Uprising) में पुनः मजदूरों की भयंकर भीड़ ने सशस्त्र विद्रोह किया, किंतु असेंबली द्वारा नियुक्त कैवेग्नेक ने सेना और स्वयंसेवकों की सहायता से उनका दमन कर दिया।

द्वितीय फ्रांसीसी गणराज्य (Second French Republic)

नवीन संविधान के अनुसार द्वितीय फ्रांसीसी गणराज्य का नेतृत्व सार्वभौमिक पुरुष मताधिकार द्वारा चुने हुए गणतंत्र के राष्ट्रपति द्वारा किया जाना था।

राष्ट्रपति को मंत्रिपरिषद की सहायता से शासन करना था और एक राष्ट्रीय विधान सभा का गठन किया जाना था।

अप्रैल 1848 के पहले चुनाव में बोनापार्ट नाम एक राजनीतिक शक्ति बना रहा।

नेशनल असेंबली के पहले चुनाव में बोनापार्ट परिवार के तीन सदस्य- जेरेम नेपोलियन बोनापार्ट, पियरे नेपोलियन बोनापार्ट और लुसियेत मुरात चुने गये।

सितंबर 1848 ई. में लुई नेपोलियन पाँच डिपार्टमेंट से नेशनल विधान परिषद का सदस्य चुना गया।

नई व्यवस्था के अनुसार 10-11 दिसंबर 1848 ई. को फ्रांसीसी गणराज्य के राष्ट्रपति के निर्वाचन के लिए चुनाव हुए।

राष्ट्रपति के चुनाव में कुल पांच उम्मीदवार थे- जनरल कैविग्नैक, लामार्टिन, अलेक्जेंड्रे अगस्टे लेडरू-रोलिन, रास्पेल और लुई नोपोलियन।

राष्ट्रपति चुनाव के पांचों उम्मीदवारों में कैवेग्नेक (Cavaignac) और लुई नेपोलियन प्रमुख थे।

1848 के चुनाव अभियान के दौरान लुई नेपोलियन के एक निबंध ‘एक्स्टेंशन ऑफ प्यूपरिज्म’ में श्रमिक वर्ग की मदद के लिए सुधारों की वकालत की गई।

राष्ट्रपति पद के चुनाव का परिणाम 20 दिसंबर को घोषित किया गया, जिसमें लुई नेपोलियन की जीत के आकड़े ने सभी को चौंका दिया।

जनतंत्रवादी कैवेग्नेक (Cavaignac) के 1,469,156 मत की तुलना में लुई नेपोलियन को 5,572,834 मत (74 प्रतिशत) मिले और लुई नये गणराज्य का राष्ट्रपति निर्वाचित हुआ।

समाजवादी लेडरू-रोलिन को 376,834 मत, रास्पेल को 37,106 मत और लामार्टिन को केवल 17,000 मत मिल सके।

नेपोलियन तृतीय के कार्यक्रम और उद्देश्य (Napoleon III’s Programs and Objectives)

लुई नेपोलियन बोनापार्ट दल के प्रतिनिधि के रूप में अपने चाचा की तरह फ्रांस में साम्राज्य स्थापित करना चाहता था।

लुई नेपोलियन ने फ्रांस में राजनीतिक सुव्यवस्था स्थापित करने के लिए चार उददेश्य निर्धारित कियेे-क्रांति के सिद्धांतों की रक्षा, राष्ट्रीयता के सिद्धांत की रक्षा, शांति और धर्म की स्थापना।

लुई नेपोलियन ने राष्ट्रपति पद के शपथ ग्रहण करने अवसर पर फ्रांस की जनता को शपथ का अक्षरशः पालन करने का आश्वासन दिया और यह स्पष्ट घोषित कर दिया कि फ्रांस की स्थापित व्यवस्था को भंग करने वाले को देश का शत्रु समझा जायेगा।

लुई ने जनता को आश्वस्त किया कि वह जनता की प्रभुसत्ता का आदर करता है और करता रहेगा।

राजतंत्रवादियों की अयोग्यता के कारण लुई नेपोलियन को अपनी शक्ति में वृद्धि करने का अवसर मिला।

11 जून 1849 को समाजवादियों ने सत्ता पर कब्जा करने का प्रयास किया, किंतु लुई नेपोलियन ने विद्रोही नेताओं को गिरफ्तार कर विद्रोह का दमन कर दिया।

लुई नेपोलियन ने अपने मंत्रियों से परामर्श किये बिना 1849 ई. में रोम के स्वतंत्रता संग्राम में पोप का पक्ष लेकर उसे रोम के सिहासन पर पुनः प्रतिष्ठित किया।

लुई नेपोलियन सम्राट के रूप में (Louis Napoleon’s as Emperor)

1851 में लुई नेपोलियन ने संविधान को बदलने की कोशिश की, लेकिन विधान सभा ने इनकार कर दिया।

अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए लुई नेपोलियन ने मारनी (Morny), सेंट आरनाड (Saint Arnaud) सरीखे मंत्रियों और पुलिस प्रमुख मॉपास (Maupas) की सहायता से 2 दिसंबर 1851 को शासन पर अधिकार करने का फैसला किया।

लुई नेपोलियन ने 2 दिसंबर की तिथि इसलिए चुना था क्योंकि उसके चाचा नेपोलियन ने 2 दिसंबर 1804 को सम्राट का ताज पहना था और एक साल बाद 2 दिसंबर 1805 को आस्टरलिट्ज की लड़ाई जीती थी।

कैथोलिकों का समर्थन प्राप्त करने के लिए लुई ने 1851 में लोई फॉलौक्स को मंजूरी दी, जिससे फ्रांसीसी शिक्षा प्रणाली पर कैथोलिक चर्च का नियंत्रण हो गया।

2 दिसंबर 1851 को लुई नेपोलियन ने राष्ट्रीय विधान सभा के विघटन की घोषणा की, सार्वभौमिक पुरुष मताधिकार की बहाली और नये चुनावों की घोषणा कर दी।

इस प्रकार फ्रांस में 1789 की तरह द्वितीय गणतंत्र अल्प समय में ही समाप्त हो गया और द्वितीय सम्राज्य की स्थापना हुई।

लुई नेपोलियन ने विरोध का दमन करने के लिए सेना को पेरिस पर कब्जा करने के लिए कहा जिसमें हजारों लोग गिरफ्तार किये गये और कइयों को अल्जीरिया या गुयाना भेज दिया गया।

1851 में लुई-नेपोलियन ने एक जनमत संग्रह कराया, जिसमें 70 प्रशित मतदाताओं ने लुई नेपोलियन की सत्ता का समर्थन किया और लुई नेपोलियन को संविधान में संशोधन करने का जनादेश भी दिया।

इस प्रकार 1851 ई. में लुई नेपोलियन ‘नेपोलियन तृतीय’ के नाम से फ्रांस का सम्राट बन गया

नेपोलियन तृतीय का शासन-विधान

सम्राट का पद ग्रहण करते ही नेपोलियन ने जनवरी 1852 में फ्रांस को एक नया संविधान दिया, जिसके अनुसार नेपोलियन तृतीय को दस साल की अवधि के लिए सम्राट की शक्ति मिल गई।

नये संविधान के अंतर्गत सम्राट संपूर्ण शक्ति का केंद्र था, वह मंत्रियों को नियुक्त और पदच्युत् कर सकता था।

नये संविधान में व्यवस्थापिका सभा और सीनेट मुख्य सभाएं थीं।

व्यवस्थापिका सभा

व्यवस्थापिका सभा में जनता द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधियों की शक्ति अत्यंत सीमित थी और सर्वाधिकार सम्राट में निहित था।

सम्राट सभा को भंग और स्थापित कर सकता था।

व्यवस्थापिका सभा राज्यमंत्रियों द्वारा रखे गये बिलों को स्वीकार या अस्वीकार कर सकती थी।

व्यस्क मताधिकार के आधार पर निर्वाचित होनेवाली इस व्यवस्थापिका सभा का कार्यकाल छः वर्ष का था।

सीनेट

संविधान की व्याख्या और संविधान में संशोधन का अधिकार सीनेट को था, लेकिन सीनेट में मुख्यतया सम्राट द्वारा मनानीत सेना एवं चर्च के पदाधिकारी होते थे।

इस प्रकार नेपोलियन के एकतंत्रीय शासन में निर्वाचन की व्यवस्था तो थी, लेकिन पदाधिकारियों के हस्तक्षेप के कारण निर्वाचन के स्वतंत्र और निष्पक्ष होने की संभवना नहीं थी।

नेपोलियन तृतीय की आंतरिक नीति (Napoleon III’s Internal Policy )

नेपोलियन तृतीय के जिस एकतंत्रीय शासन का गठन किया था, उससे लगता है कि नेपोलियन फ्रांस की जनता की राजनीतिक स्वतंत्रता का दमन करना चाहता था।

दरअसल नेपोलियन तृतीय अपने चाचा नेपोलियन बोनापार्ट की तरह समझता था कि फ्रांसीसी जनता स्वतंत्रता की अपेक्षा सुख, समृद्धि, स्वच्छ प्रशासन और सुव्यवस्था चाहती है।

यद्यपि नेपोलियन तृतीय ने अपने चाचा के समान निरंकुश शासन स्थापित किया, किंतु उसका शासन नेपोलियन महान् के शासन के समान उदार था और जनहित उसका लक्ष्य था।

कठोर प्रशासन

नेपोलियन तृतीय की गृह नीति का उद्देश्य फ्रांस को समृद्ध और शक्तिशाली बनाना था।

नेपोलियन तृतीय ने राज्य की संपूर्ण शक्ति अपने हाथों में केंद्रित कर निरंकुश शासन की स्थापना किया।

मंत्री विधायिका के सदस्य नहीं होते थे और इसलिए उन पर विधायिका का कोई अंकुश नहीं था, समस्त शासन सम्राट के आदेशानुकूल होता था।

सेना तथा नौ-सेना नेपोलियन तृतीय के अधिकार में थीं और नेपोलियन तृतीय को ही युद्ध अथवा शांति का निर्णय करने का अधिकार था।

न्यायाधीश सम्राट के आज्ञाकारी थे और विधायिका भी एक अत्यंत शक्तिहीन संस्था थी।

प्रांतों में स्वशासन का कोई चिन्ह नहीं था, प्रिफेक्ट, मेयर आदि समस्त कर्मचारी सम्राट द्वारा नियुक्त होते थे और उसके आदेशों का पालन करते थे।

नेपोलियन तृतीय ने कड़ी पुलिस की व्यवस्था की, जो अत्यंत स्वेच्छाचारी थी और जनता की स्वतंत्रता तथा समाचार-पत्रों को कठोर नियंत्रण में रखती थी।

इस प्रकार नेपोलियन तृतीय फ्रांस का निरंकुश शासक था।

कानूनी दृष्टि से तो नेपोलियन तृतीय की शक्ति जनता की इच्छा पर आधारित थी क्योंकि उसका जनता ने निर्वाचन किया था, किंतु वास्तव में उसका आधार सेना थी।

17 फरवरी 1852 को नेपोलियन तृतीय ने सख्त प्रेस सेंसरशिप लागू किया।

नेशनल गार्ड, जिसके सदस्य कभी-कभी सरकार विरोधी प्रदर्शनों में शामिल होते थे, को फिर से संगठित किया गया और बड़े पैमाने पर इसका उपयोग केवल परेड में किया।

सरकारी अधिकारियों को आधिकारिक औपचारिक अवसरों पर वर्दी पहनना आवश्यक था।

शिक्षा मंत्री को विश्वविद्यालयों में प्रोफेसरों को खारिज करने और उनके पाठ्यक्रमों की सामग्री की समीक्षा करने की शक्ति दे दी गई।

29 फरवरी 1852 को एक नई नेशनल असेंबली के लिए चुनाव कराये गये।

नई विधानसभा में नेपोलियन तृतीय के विरोधियों की एक छोटी संख्या शामिल थी, जिसमें 17 राजशाहीवादी, 18 रूढि़वादी, 2 उदार लोकतांत्रिक, 3 गणतांत्रिक और 72 निर्दलीय थे।

चुनाव के बाद लुई नेपोलियन तृतीय ने मार्सिले में एक नये गिरजाघर, एक नये स्टॉक एक्सचेंज और एक चैंबर ऑफ कॉमर्स की आधारशिला रखी।

नेपोलियन तृतीय के सुधार (Reforms of Napoleon III)

1860 ई. से 1870 ई. के मध्य लुई नेपोलियन तृतीय ने फ्रांस के राजनीतिक जीवन में कई महत्वपूर्ण परिवर्तन किये।

विरोधियों को संतुष्ट करने के लिए नेपोलियन तृतीय ने 1860 ई. में संविधान में परिवर्तन किया।

इस संविधान संशोधन से सीनेट तथा विधानसभा को वर्ष में एक बार साम्राज्य की नीति पर बहस करने तथा उसकी आलोचना करने का अधिकार देकर उत्तरदायी शासन की ओर कदम उठाया।

1867 ई. में मंत्रियों से प्रश्न पूछने का अधिकार भी विधानसभा को मिल गया।

1868 ई. में समाचार-पत्रों तथा मुद्रणालयों पर से बहुत से नियंत्रण हटा लिये गये और सार्वजनिक भाषण देने की अनुमति मिल गई।

अर्थव्यवस्था का विकास सुधार

नेपोलियन तृतीय ने मध्यमवर्ग के हितों का ध्यान रखते हुए आर्थिक उदारता की नीति अपनाई और लुई फिलिप के सभी मध्यमवर्गीय सुधारों को लागू किया।

व्यापार-वाणिज्य को प्रोत्साहन

नेपोलियन तृतीय ने व्यापार-वाणिज्य को प्रोत्साहन देने के लिए निजी उद्योगों एवं व्यवसायों पर से सरकारी नियंत्रण को हटा लिया।

चूंकि नेपोलियन तृतीय स्विट्जरलैंड, इंग्लैंड, जर्मनी और अमेरिका में लंबे समय तक रहा था, इसलिए उसने इन देशों के बीच आर्थिक और राजनीतिक संबंधों में बहुत रुचि दिखाई।

नेपोलियन तृतीय ने फ्रांसीसी अर्थव्यवस्था का आधुनिकीकरण करने के लिए फ्रांसीसी बाजारों को विदेशी वस्तुओं के लिए खोल दिया और फ्रांसीसी उद्योगों को अधिक कुशल और अधिक प्रतिस्पर्धी बनने के लिए मजबूर किया।

नेपोलियन तृतीय ने 1860 में ब्रिटेन के साथ एक वाणिज्यिक संधि (Cobden–Chevalier free trade agreement) कर मुक्त व्यापार को प्रोत्साहित किया।

किंतु जब नेपोलियन तृतीय ने इंग्लैंड से से आयातित वस्तुओं पर कर कम कर दिया, तो फ्रांस का व्यापारी वर्ग असंतुष्ट हो गया।

बुनियादी ढांचे के निर्माण

नेपोलियन तृतीय ने आर्थिक विकास के लिए बुनियादी ढांचे के निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाई।

सेंट साइमन के आर्थिक उदारवाद से प्रभावित होकर नेपोलियन तृतीय ने उत्पादन के विभिन्न क्षेत्रों में मशीनों के प्रयोग तथा औद्योगिक कारपोरेशन की स्थापना को प्रोत्साहन दिया।

सेंट साइमन के अनुसार जनसाधारण की भौतिक समृद्धि के लिए आर्थिक साधनों, यातायात एवं परिवहन तथा शिक्षा का विकास करना सम्राट का कर्तव्य था।

बैंकिंग प्रणाली का आधुनिकीकरण

फ्रांसीसी बैंकिंग प्रणाली का आधुनिकीकरण एवं फ्रांसीसी रेलवे का विस्तार कर फ्रांसीसी व्यापार को दुनिया में दूसरा सबसे बड़ा व्यापार बना दिया।

नेपोलियन तृतीय के काल में अनेक नये बैंक खोले गये, जिससे व्यापारियों को पूंजी मिलना सरल हो गया।

नेपोलियन ने उद्योगों को पूंजी उपलब्ध कराने के लिए 1852 में पेरियर बंधुओं को क्रेडिट मोबिलियर Credit Mobilier) जैसे नये बड़े बैंक की स्थापना को प्रोत्साहित किया, जो जनता को शेयर बेचते थे और निजी उद्योग और सरकार दोनों को ऋण प्रदान करते थे।

नेपोलियन ने फ्रांस की राष्ट्रीय पूंजी बढ़ाने के लिए 1863 ई. में क्रेडिट लियानेस (Credit Lyonnais), क्रेडिट-फानसियर (Credit foncier) और 1864 में सोसाइटी गेनेराले (Societe Generale) की स्थापना करवाई।

नेपोलियन ने बैंक आफ फ्रांस को के कार्यक्षेत्र में वृद्धि करके उसे ऋण देने का अधिकार प्रदान किया।

इन बैंकों ने नेपोलियन तृतीय की प्रमुख परियोजनाओं- रेलवे और नहरों से लेकर पेरिस के पुनर्निर्माण तक के लिए धन उपलब्ध कराया।

फ्रांसीसी रेलवे का विस्तार

नेपोलियन तृतीय ने रेलवे के विकास को बढ़ावा दिया और उसके नेटवर्क का विस्तार किया।

नेपोलियन तृतीय ने 1855 में गारे डे ल्योन और 1865 में गारे डू नॉड जैसे दो नये रेलवे स्टेशनों का निर्माण करवाया।

सरकार ने नई लाइनों के निर्माण के लिए ऋण की गारंटी प्रदान की और रेलवे कंपनियों को समेकित करने का प्रयास किया।

रेलवे के नेटवर्क के विस्तार से कारखानों, उत्पादों और व्यापारियों के लिए कच्चे माल के परिवहन की सुविधा मिली।

सामाजिक सुधार

आद्योगिक विकास के कारण फ्रांस में मजदूरों की संख्या में वृद्धि हुई।

नेपोलियन तृतीय अपने आपको ‘मजदूरों का सम्राट’ कहने में गर्व का अनुभव करता था।

सामूहिक क्रय-विक्रय के लिए नेपोलियन तृतीय ने मजदूरों को सहकारी समितियाँ खोलने की अनुमति दी।

नेपोलियन तृतीय ने 1863 में मजदूरों के ट्रेड यूनियन बनाने और 1864 ई. में फ्रांसीसी मजदूरों को हड़ताल करने का अधिकार दिया।

गणतंत्रवादियों और समाजवादियों पर अपन प्रभुत्व स्थापित करने तथा मजदूरों को खुश करने के लिए नेपोलियन तृतीय ने अच्छे एवं सस्ते आवास की व्यवस्था की।

फ्रांसीसी मजदूरों की मृत्यु और आकस्मिकता के लिए राज्य की गारंटी सहित ऐच्छिक बीमा की योजनाएं लागू की गईं।

इसके अलावा, नेपोलियन ने मजदूरों के कार्य के घंटों में कमी करके तथा अवकाश में वृद्धि करके मजदूरों को अधिक सुविधाएं देने का प्रयास किया।

नेपोलियन ने प्राथमिक शिक्षा को अनिवार्य और मुफ्त बना दिया।

कृषि की उन्नति के प्रयास

नेपोलियन तृतीय ने कृषि सभाओं का संगठन किया और तरह-तरह के उपायों से कृषि की उन्नति का प्रयास किया, जिसके परिणामस्वरूप किसानों की दशा में बहुत सुधार हुआ।

नेपोलियन तृतीय ने आधुनिक कृषि की स्थापना के लिए कृषियोग्य भूमि का पुनर्वितरण किया और कृषि उत्पादन में वृद्धि के लिए कृषि समितियों का गठन किया।

कृषि शिक्षण हेतु कृषि विद्यालय खोले गये और अच्छे उत्पादन के लिए पुरस्कार की व्यवस्था की गई।

नेपोलियन तृतीय के प्रयास से फ्रांस में अकाल की समस्या का समाधान हो गया और फ्रांस कृषि निर्यातक देश बन गया।

नेपोलियन ने फ्रांस की भौतिक समृद्धि के प्रदर्शन के लिए 1855 और 1867 ई. में औद्योगिक प्रदर्शनी का आयोजन किया।

लोक-निर्माण के कार्य

नेपोलियन तृतीय ने विशाल सार्वजनिक निर्माण परियोजनाओं के अंतर्गत सड़कों, नहरों, एवं पुलों के निर्माण के अलावा पेरिस, अल्सास, लारेन आदि नगरों में सुंदर इमारतों का निर्माण करवाया, मार्सिले और ले हावरे में नई शिपिंग लाइनें बनवाईं और बंदरगाहों का पुनर्निर्माण किया।

बेरेन हासमैन के निर्देशन में पेरिस की सड़कें चौड़ी की गईं, पार्क बनवाये गये और बाग लगवाये गये।

नेपोलियन तृतीय ने जंगलों का विकास किया, दलदलों को सुखाने की व्यवस्था की और नदियों पर पुल बनवाये।

नेपोलियन तृतीय के निर्माण-कार्यों के कारण पेरिस संसार का सबसे सुंदर एवं आकर्षक नगर बन गया।

नेपोलियन तृतीय ने 1859 और 1869 के बीच स्वेज नहर का निर्माण करवाया।

स्वेज नहर (Suez Canal) परियोजना को पेरिस स्टॉक मार्केट के शेयरों द्वारा वित्त-पोषित किया गया था।

धार्मिक सुधार

नेपोलियन तृतीय ने कैथोलिक होने के कारण नहीं, बल्कि राजनीतिक कारणों से कैथोलिक धर्म को प्रमुखता प्रदान की और चर्च का संरक्षक बन गया।

फ्रांस के अधिकांश शिक्षा केंद्र कैथोलिक स्कूल ही थे।

नेपोलियन तृतीय ने विश्वविद्यालयों एवं सार्वजनिक विद्यालयों में पादरियों के प्रभाव में वृद्धि की और धार्मिक शिक्षा को अनिवार्य बना दिया।

इतना ही नहीं, कैथोलिक पादरियों को बेतलहम के पवित्र चर्च के मुख्यद्वार की चाभी को दिलाने के लिए नेपोलियन ने क्रीमिया के युद्ध में भी भाग लिया।

इस प्रकार नेपोलियन ने जनता के सभी वर्गों को संतुष्ट करने का प्रयास किया।

नेपोलियन बोनापार्ट के बाद पहली बार ऐसा लगा कि फ्रांस में ऐसी सरकार है जो दलीय झगड़ों से ऊपर उठकर राष्ट्र के विभिन्न राजनीतिक, सामाजिक एवं आर्थिक हितों में सामंजस्य स्थापित कर सकती है।

नेपोलियन तृतीय की वैदेशिक नीति (Foreign Policy of Napoleon III )

नेपोलियन तृतीय की वैदेशिक नीति अस्थिर, ढुलमुल और कमजोर रही। अपनी वैदेशिक नीति के अंतर्गत नेपोलियन ने कई ऐसे कार्य किये, जिसके परिणामस्वरूप उसकी बहुत बदनामी हुई और उसके पतन का मार्ग खुल गया।

बिस्मार्क ने नेपोलियन के बारे में कहा था, नेपोलियन तृतीय युद्ध करना चाहता है, किंतु उसके दिमाग में युद्ध का ठीक-ठीक नक्शा नहीं है।’

नेपोलियन की मूर्खतापूर्ण वैदेशिक नीति के कारण यूरोपीय राष्ट्र उसे भी नेपोलियन महान की ही भाँति स्वतंत्रता का अपहारक समझने लगे।

पोप की सहायता

देश की बहुसंख्यक कैथोलिक जनता को संतुष्ट करने के लिए नेपोलियन तृतीय ने राष्ट्रपति के रूप में मैजिनी के रोमन गणराज्य को पलट कर रोम में पोप को पुनः सिंहासनासीन किया।

क्रीमिया का युद्ध और नेपोलियन तृतीय

अपनी आंतरिक स्थिति सुदृढ़ करने के बाद नेपोलियन तृतीय ने कैथोलिकों को प्रसन्न करने और फ्रांस के गौरव में वृद्धि करने के उद्देश्य से तुर्की साम्राज्य में स्थित पवित्र स्थानों के संरक्षण का मुद्दा उठाया। रूस इन पवित्र स्थानों को अपने संरक्षण में मानता था।

पवित्र स्थानों के संरक्षण को लेकर 1853-56 ई. में क्रीमिया के युद्ध (Crimean War) में नेपोलियन तृतीय ने ब्रिटेन के साथ मिलकर रूस के विरुद्ध तुर्की साम्राज्य की रक्षा की।

क्रीमिया के युद्ध में रूस को पराजित कर नेपोलियन तृतीय ने नेपोलियन महान् की मास्को पराजय का बदला ले लिया।

वैसे भी रूस का जार निकोलस प्रथम नेपोलियन को राजवंशी नहीं मानता था, इसलिए वह उसे My Brother न कहकर My Good Friend संबोधित करता था।

क्रीमिया के युद्ध के बाद नेपोलियन की अध्यक्षता में 1856 ई. में पेरिस की संधि हुई, जिससे फ्रांस की वैदेशिक प्रतिष्ठा बढ़ी।

इटली में नेपोलियन का हस्तक्षेप

इटली के राष्ट्रवादी नेताओं ने क्रीमिया के युद्ध में मित्र राष्ट्रों की ओर से अपनी सेना भेज कर सहायता दी थी, जिसके कारण 1856 ई. की पेरिस की संधि में इटली के नेता कावूर (Cavour) को आमंत्रित किया गया।

आस्ट्रिया के विरोध के बावजूद पेरिस में कावूर ने इटली की समस्या से सभी देशों को अवगत कराया।

इसी क्रम में इटली के राजा विक्टर एमैनुअल प्रथम की पुत्री का विवाह नेपोलियन तृतीय के भाई जेरोम के साथ संपन्न हुआ।

प्लाम्बियर्स की संधि

जुलाई 1858 ई. में इटली के देशभक्त कावूर (Cavour) ने प्लाम्बियर्स में नेपोलियन तृतीय के साथ एक समझौता किया।

प्लाम्बियर्स समझौते के अनुसार नेपोलियन तृतीय ने सेवाय तथा नीस के बदले लोम्बार्डी तथा वोनेशिया से आस्ट्रिया को निकालने में तथा उत्तर इटली में एक स्वतंत्र राज्य स्थापित करने में सार्डीनिया की सहायता करने का वादा किया।

आस्ट्रिया के विरूद्ध इटली की सहायता

नेपोलियन तृतीय के वादे से आश्वस्त होकर सार्डीनिया ने 1859 ई. में आस्ट्रिया के विरूद्ध युद्ध आरंभ कर दिया।

समझौते के अनुसार फ्रांस की सेना ने सार्डीनिया की सेना के साथ लोम्बार्डी में प्रवेश किया और मिलान पर अधिकार कर लिया।

24 जून 1859 ई. को सोलफेरिनो के युद्ध (The battle of Solferino) में आस्ट्रिया की सेना को पुनः पराजित होना पड़ा।

इटली के स्वतंत्रता संग्राम में कैथोलिक आस्ट्रिया के विरूद्ध सार्डीनिया की सहायता करने से फ्रांस की कैथोलिक जनता नेपोलियन तृतीय का विरोध करने लगी।

सार्डीनिया के नेतृत्व में इटली की स्वतंत्रता का अर्थ था पोप की लौकिक शक्ति का विनाश।

इटली के प्रति विश्वासघात

किंतु अपनी ढुलमुल नीति के कारण नेपोलियन ने शीघ्र ही प्लाम्बियर्स समझौते की उपेक्षा करते हुए कावूर का साथ छोड़ दिया और 1859 आस्ट्रिया के साथ विलाफैंका (Villafranca) का शांति-समझौता कर लिया।

विलाफैंका (Villafranca) शांति-समझौता की पुष्टि ज्यूरिख की संधि से इुई जिसके अनुसार वोनेशिया पर आस्ट्रिया अधिकार मान लिया गया और यह तय किया गया कि इटली के समस्त राज्यों को मिला कर पोप की अध्यक्षता में एक संघ बनाया जायेगा। आस्ट्रिया की सेना को लोम्बार्डी खाली करना पड़ा।

इटली में राष्ट्रीयता की भावना को रोक पाना अब संभव नहीं था।

परमा, माडेना व टस्कनी की जनता ने विद्रोह करके अपने राजाओं को निकाल दिया और सार्डीनिया-पीडमांट के साथ संगठित होने की योजना को स्वीकार कर लिया।

24 मार्च 1860 की ट्यूरिन की संधि (Treaty of Turin) के अनुसार नेपोलियन ने नीस (Nice) और सेवाय (Savoy) पर अधिकार कर लिया तथा सर्डीनिया को परमा, मोडेना, टस्कनी और लोम्बार्डी को मिला लेने को मान्यता प्रदान कर दी।

विलाफैंका (Villafranca) शांति-समझौता और इटली के साथ विश्वासघात के कारण नेपोलियन की प्रतिष्ठा को बहुत घक्का लगा और इटली से फ्रांस के संबंध खराब हो गये।

यूरोपीय राष्ट्र नेपालियन को उसकी ढुलमुल नीति के कारण विश्वासघाती और प्रतिक्रियावादी समझने लगे।

पोलैंड का विद्रोह

नेपोलियन तृतीय ने पोलैंड के स्वतंत्रता आंदोलन में रूस के विरूद्ध पोलों की सहायता करने का वादा किया था।

किंतु जब पोलों ने रूस के विरूद्ध व्रिदोह किया, तो नेपोलियन ने पोलों की कोई सहायता नहीं की, जिससे पोलिश जनता नेपोलियन तृतीय के विरूद्ध हो गई।

रूसी सम्राट अलेक्जेंडर द्वितीय (Alexander II) ने बिस्मार्क के सहयोग से पोलिश विद्रोह का दमन कर दिया।

टामसन के अनुसार ‘नेपोलियन तृतीय ने इस अवसर पर सभी देशों को अपने पक्ष में करने का स्वर्णिम अवसर गवां दिया।’

ओपीयम का युद्ध

लुई नेपोलियन ने 1858 से 1860 ई. ब्रिटेन के साथ मिलकर ओपीयम (Opium) के युद्ध में भाग लेकर सुदूर पूर्व चीन में फ्रांसीसी प्रभुत्व स्थापित किया और कंबोडिया में फ्रेंच प्रोटेक्टोरेट (French Protectorate) बनाया।

मैक्सिको में अपमान

नेपोलियन तृतीय ने 1861 और 1867 के बीच फ्रांसीसी प्रतिष्ठा को पुनर्जीवित करने के लिए मैक्सिको अभियान किया।

मैक्सिको गणराज्य में आपसी अंतर्कलह से उत्पन्न संघर्ष में गणतंत्रवादी नेता वेनिटो ज्वारेज राष्ट्रपति बनाये गये थे।

राष्ट्रपति वेनिटो ज्वारेज ने इंग्लैंड, फ्रांस तथा स्पेन के देय ऋणों की अदायगी करने से इनकार कर दिया।

नेपोलियन तृतीय अमरीका के गृहयुद्ध का लाभ उठाकर मैक्सिको की गणतंत्रवादी सरकार को हटाकर अपने उम्मीदवार मैक्सी मिलियन को राजा बनाना चाहता था।

मैक्सी मिलियन आस्ट्रिया के सम्राट जोसेफ का भाई और बेल्जियम के सम्राट लियोपोल्ड का दामाद था।

नेपोलियन के अनुरोध पर फ्रांस, स्पेन तथा इंग्लैंड की संयुक्त सेनाओं ने जनवरी 1862 ई. में मैक्सिको पर आक्रमण कर दिया।

जब मैक्सिको के राष्ट्रपति ज्वारेज ने ऋणों की अदायगी करना स्वीकार लिया, तो इंग्लैंड और स्पेन ने अपनी सेनाएं वापस बुला ली, लेकिन नेपोलियन वहीं डटा रहा।

जब नेपोलियन तृतीय ने मैक्सी मिलियन को मैक्सिको के सिंहासन पर बैठा दिया, तो 1865 ई. में ज्वारेज ने विद्रोह कर दिया।

इस समय अमरीका में चल रहा गृह युद्ध भी समाप्त समाप्त हो गया था।

अमरीकी सरकार ने 1823 के मुनरो सिद्धांत के आधार पर फ्रांसीसी सेना का विरोध किया।

अंततः नेपोलियन को अपमानित होकर मैक्सिको से अपनी सेना वापस हटानी पड़ी, जिससे आस्ट्रिया और बेल्जियम भी नेपोलियन से नाराज हो गये।

लिप्सन ने लिख है कि ‘मैक्सिको की दुर्घटना ने नेपोलियन की वास्तविक सूझबूझ को नष्ट कर दिया।’

स्लेश्विग और हालस्टाइन की समस्या

प्रशा का बिस्मार्क (Otto von Bismarck) इटली के एकीकरण के लिए श्लेसविग और हालस्टीन के प्रदेशों पर अधिकार करना चाहता था, जो डेनमार्क के अधीन तो थे, लेकिन डेनमार्क का हिस्सा नहीं थे।

डेनमार्क ने श्लेसविग और हालस्टीन के प्रदेशों को अपने राज्य में मिलाने का प्रयास किया, तो बिस्मार्क ने आस्ट्रिया के साथ मिलकर 1864 ई. में डेनमार्क पर आक्रमण कर दिया।

पौलैंड में व्यस्त रहने के कारण रूस ने तटस्थता की नीति अपनाई, जबकि इंग्लैंड एकाकीपन की नीति पर चल रहा था।

मैक्सिको में अपनी शक्ति का ह्रास होने के कारण नेपोलियन ने भी तटस्थ रहने में ही अपनी भलाई समझी।

श्लेसविग और हालस्टीन के बंटवारे को लेकर बिस्मार्क और आस्ट्रिया के बीच 14 अगस्त 1865 ई. में गेस्टीन का समझौता हो गया।

नेपोलियन और बिस्मार्क

बिस्मार्क जानता था कि जर्मनी के एकीकरण के लिए प्रशा का आस्ट्रिया से युद्ध होना इतिहास की मांग है।

बिस्मार्क ने आस्ट्रिया को मित्रविहीन करने के लिए 1865 ई. में ही तैयारी आरंभ कर दी थी।

रूस बिस्मार्क का मित्र था ही, इंग्लैंड भी अपनी आंतरिक समस्याओं में व्यस्त था।

फ्रांस ही एक मात्र ऐसा देश था, जो आस्ट्रिया की मदद कर सकता था।

बिस्मार्क ने नेपोलियन तृतीय से वियारिज में गुप्त रूप से भेंट की।

वियारिज गुप्त वार्ता में बिस्मार्क ने नेपोलियन तृतीय को कुछ सीमांत प्रदेशों का लालच देकर आस्ट्रिया-प्रशा के बीच होने वाले युद्ध में तटस्थ रहने आश्वासन ले लिया। इटली को बिस्मार्क ने वेनेशिया देने का वादा किया।

सेडोवा का युद्ध

फ्रांस की तटसथता का आश्वासन पाकर बिस्मार्क ने आस्ट्रिया के विरूद्ध युद्ध की घोषणा कर दी।

आस्ट्रिया-प्रशा के बीच सेडोवा का युद्ध ‘सात सप्ताह का युद्ध’ चलता रहा।

अंत में सेडोवा में आस्ट्रिया पराजित हुआ और दोनों के बीच प्राग की संधि हो गई।

सेडोवा में बिस्मार्क की विजय से नेपोलियन की आंखें आश्चर्य से खुली रह गईं।

नेपोलियन समझता था कि प्रशा-आस्ट्रिया का युद्ध लंबा चलेगा और दोनों में से कोई उससे सहायता की याचना करेगा।

अब नेपोलियन को अफसोस हुआ कि यदि उसने आस्ट्रिया की खुलकर मदद की होती, तो फ्रांस की सीमा पर प्रशा जैसे शक्तिशाली राष्ट्र का उदय नहीं होता।

प्रशा-आस्ट्रिया युद्ध के संबंध में कहा भी जाता है कि इस युद्ध में आस्ट्रिया की नहीं, फांस की पराजय हुई।

नेपोलियन की कूटनीतिक विफलता

बिस्मार्क जानता था कि जर्मनी के एकीकरण के लिए फ्रांस से युद्ध अवश्य होगा।

एक ओर नेपालियन आस्ट्रिया के विरूद्ध प्रशा की विजय से अपने को अपमानित महसूस कर रहा था, जबकि दूसरी ओर बिस्मार्क फ्रांस को जमर्नी के एकीकरण में बाधक मानता था।

सम्राट नेपोलियन तृतीय ने अपनी और फ्रांस की गिरती हुई प्रतिष्ठा को पुनः जीवित करने के लिए फ्रांस की सीमा को राइन नदी तक विस्तृत करने का विचार किया।

बिस्मार्क अपनी कूटनीतिक चालों से फ्रांस की हर इच्छा को असफल करता रहा।

नेपालियन ने हालैंड से लक्जेमबर्ग लेना चाहा, लेकिन बिस्मार्क के विरोध के कारण संभव नहीं हुआ, जिससे बिस्मार्क और फ्रांस के बीच कटुता की बढ़ने लगी।

प्रशा और फ्रांस, दोनों देशों के अखबार एक दूसरे के खिलाफ जहर उगलने लगे।

स्पेन के उत्तराधिकार का प्रश्न

प्रशा के उत्थान और आस्ट्रिया की पराजय से फ्रांस में नेपोलियन के प्रति असंतोष बढता जा रहा था।

नेपोलियन को लगा कि यदि वह प्रशा के विरूद्ध युद्ध की घोषणा कर दे और प्रशा को पराजित कर जर्मनी का एकीकरण रोक दे, तो उसका भविष्य और राज्य दोनों सुरक्षित हो जायेगा।

इस बीच स्पेन के उत्तराधिकार के प्रश्न को लेकर प्रशा और फ्रांस एक-दूसरे के सामने आ गये।

स्पेन में 1863 ई. में राजगद्दी के प्रश्न को लेकर जनता ने विद्रोह करके रानी ईसाबेला द्वितीय को देश से निकाल दिया और लियोपोल्ड को नया शासक बनाने का प्रयास किया।

लियोपोल्ड प्रशा के सम्राट का रिश्तेदार था, इसलिए नेपोलियन तृतीय ने लियोपोल्ड के उत्तराधिकार का विरोध किया।

नेपोलियन तृतीय के विरोध के कारण लियोपोल्ड ने स्वयं अपनी उम्मीदवारी का परित्याग कर दिया।

किंतु नेपोलियन तृतीय लियोपोल्ड के उम्मीदवारी के परित्याग से ही संतुष्ट नहीं हुआ।

नेपोलियन ने प्रशा से आश्वासन चाहता था कि भविष्य में भी प्रशा कभी अपने किसी प्रतिनिधि या राजकुमार को स्पेन का शासक नियुक्त करने का प्रयास नहीं करेगा।

एम्स का तार

प्रशा से आश्वासन लेने के लिए फ्रांस के राजदूत ने प्रशा के सम्राट से एम्स नामक नगर में भेंट की और स्पेन के शासक के संबंध में आश्वासन लेने का प्रयास किया।

प्रशा के सम्राट ने लियोपोल्ड को स्पेन के सिंहासन न बैठाने का आश्वासन दिया, लेकिन भविष्य के संबंध में किसी प्रकार का आश्वासन देने से साफ इनकार कर दिया।

प्रशा के सम्राट ने फ्रांसीसी राजदूत के साथ अपनी बातचीत का ब्यौरा तार द्वारा बिस्मार्क को भेज दिया।

बिस्मार्क ने अत्यंत चतुराई से एम्स के तार की भाषा में कुछ संशोधन करके प्रकाशित करा दिया।

इस तार को पढ़ कर प्रशा की जनता को लगा कि फ्रांस के राजदूत ने प्रशा के राजा का अपमान किया है और फ्रांस की जनता ने लगा कि फ्रांस के राजदूत का अपमान हुआ है।
अब प्रशा और फ्रांस दोनों युद्ध की तैयारी में लग गये।

नेपोलियन तृतीय का पतन (Fall of Napoleon III )

बिस्मार्क के भड़काने पर नेपोलियन तृतीय ने 19 जुलाई 1870 ई. को प्रशा के साथ युद्ध छेड़ दिया।

सेडन के युद्ध (Battle of Sedan) में नेपोलियन को 85 हजार सैनिकों के साथ जनरल मोल्ट के समक्ष आत्मसमर्पण करना पड़ा।

फ्रांस-प्रशा युद्ध में (Franco-Prussian War) नेपोलियन की पराजय का समाचार पेरिस पहुंचते ही 4 सितंबर 1870 ई. को फ्रांस में द्वितीय साम्राज्य के स्थान पर ‘तृतीय गणतंत्र’ (French Third Republic) की घोषणा कर दी गई।

युद्ध के अंत तक नेपोलियन तृतीय वेस्टफेलिया में कैद रहा और युद्ध की समाप्ति पर उसे इंग्लैंड जाने की अनुमति मिली, जहां 9 जनवरी 1873 को उसकी मृत्यु हो गई।

इस प्रकार नेपोलियन तृतीय को अपमानित होकर फ्रांस का सिंहासन त्यागना पड़ा।

नेपोलियन तृतीय एक शांतिप्रिय प्रजावत्सल सम्राट था और उसके बारे में कहा जाता है कि ‘वह घोड़े की पीठ पर बैठा हुआ सेंट साइमन (St. Simon) था।

फ्रांसीसी जनता की सुख-समृद्धि में वृद्धि करने के बावजूद नेपोलियन तृतीय किसी को अपना नहीं बना सका।

नेपोलियन तृतीय की अस्थिर और ढुलमुल विदेश नीति के कारण यूरोप के प्रायः सभी राष्ट्र उसके विरोधी हो गये।

थामसन का कहना है कि, नेपोलियन नामधारी होते हुए और उसका अनुसरण करने का दावा करते हुए भी उसमें नेपोलियन जैसे गुण नहीं थे।

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