द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान भारतीय राष्ट्रवाद (Indian Nationalism During World War II)

सितंबर 1939 में दूसरा विश्वयुद्ध आरंभ हो गया जब जर्मन प्रसारवाद की हिटलर की नीति के अनुसार नाजी जर्मनी ने पौलैंड पर आक्रमण कर दिया। इसके पहले मार्च 1938 में वह आस्ट्रिया और मार्च 1939 में चेकोस्लोवाकिया पर अधिकार कर चुका था। ब्रिटेन और फ्रांस ने हिटलर को खुश करने के लिए सब कुछ किया था, किंतु अब वे पौलैंड की सहायता करने को बाध्य हो गये। 03 सितंबर 1939 को भारत के तत्कालीन वायसरॉय लॉर्ड लिनलिथगो ने यह घोषणा की कि भारत भी द्वितीय विश्वयुद्ध में मित्रराष्ट्रों की ओर से शामिल है। घोषणा से पूर्व उसने किसी भी राजनैतिक दल से परामर्श नहीं किया, जबकि उस समय देश के ग्यारह प्रांतों में से आठ प्रांतों में कांग्रेस के मंत्रिमंडल थे।

विश्वयुद्ध के संबंध में कांग्रेस की नीति (Congress Policy in Relation to World War)

कांग्रेस ने इस विश्वयुद्ध के संबंध में जो नीति अपनाई, उसका प्रभाव दुनिया के अनेक पराधीन देशों पर भी पड़ा। कांग्रेस को फासीवादी हमले के शिकार लोगों से पूरी सहानुभूति थी और युद्ध छिड़ने पर वह फासीवाद-विरोधी संघर्ष में लोकतांत्रिक शक्तियों की सहायता करने को तैयार भी थी। गांधी ने वायसरॉय से कहा कि ब्रिटिश संसद और वेस्टमिनिस्टर एबे के संभावित विध्वंस की कल्पना से ही वे विचलित हो उठते हैं और वे पूरी तरह ब्रिटेन तथा मित्रराष्ट्रों के उद्देश्य के साथ हैं। किंतु कांग्रेस के अधिकांश नेताओं का सवाल था कि एक गुलाम राष्ट्र दूसरे देशों के मुक्ति-संघर्ष में कैसे साथ दे सकता है?

ब्रिटेन को युद्ध में समर्थन देने के मुद्दे पर विचार करने के लिए वर्धा में 10-14 सितंबर 1939 को कांग्रेस कार्यसमिति की एक बैठक बुलाई गई, जिसमें सुभाष बोस, आचार्य नरेंद्रदेव और जयप्रकाश नारायण भी आमंत्रित किये गये। किंतु बैठक में गहरे मतभेद उत्पन्न हो गये। समाजवादी और सुभाषचंद्र बोस जैसे नेता युद्ध-प्रयासों के विरुद्ध कार्रवाई के लिए बेचैन हो रहे थे। सुभाष का तर्क था कि चूंकि यह साम्राज्यवादी युद्ध है और दोनों ही पक्ष अपने-अपने औपनिवेशिक स्वार्थों की रक्षा के लिए लड़ रहे हैं, अतः किसी भी एक पक्ष का समर्थन नहीं किया जा सकता। कांग्रेस को चाहिए कि स्थिति का लाभ उठाकर वह भारत की स्वतंत्रता के लिए तुरंत सविनय अवज्ञा आंदोलन छेड़ दे।

दूसरी ओर राजगोपालाचारी जैसे संसदीय राजनीति में विश्वास करने वाले नेता चाहते थे कि यदि ब्रिटिश सरकार भारत के पूर्ण स्वतंत्र होने के अधिकार को स्वीकार कर ले और एक अस्थायी सरकार बना दे, तो कांग्रेस युद्ध में ब्रिटेन को सहयोग देने की घोषणा कर दे। गांधी दुविधा में थे, एक समय तो वे मानते थे कि यह युद्ध उनके अहिंसा के सिद्धांत के विरुद्ध था; फिर उन्होंने वायसरॉय से युद्ध-प्रयासों में पूरा समर्थन देने का वादा किया, क्योंकि उन्हें लगा कि मित्रराष्ट्रों का पक्ष न्यायसंगत है। गांधीजी का कहना था कि पश्चिम यूरोप के लोकतांत्रिक राज्यों और हिटलर का नेतृत्व स्वीकार करने वाले निरंकुशतावादी राज्यों में साफ फर्क है।

जवाहरलाल नेहरू फासीवाद-विरोधी युद्ध के समर्थन की आवश्यकता के बारे में सजग थे। उनका मानना था कि फ्रांस, ब्रिटेन और पोलैंड का पक्ष न्यायोचित है, लेकिन फ्रांस और ब्रिटेन साम्राज्यवादी नीतियों वाले देश हैं और द्वितीय विश्वयुद्ध, प्रथम विश्वयुद्ध के पश्चात् पूँजीवाद के गहराते हुए अंतर्विरोधों का परिणाम है। इसलिए भारत को स्वतंत्र होने से पूर्व न तो युद्ध में शामिल होना चाहिए और न ही ब्रिटेन की परेशानियों का लाभ उठाकर सविनय अवज्ञा आंदोलन छेड़ना चाहिए। जब गांधीजी को लगा कि सरदार पटेल और राजेंद्र प्रसाद जैसे घनिष्ठ सहयोगी भी उनके साथ नहीं हैं तो उन्होंने नेहरू की राय का समर्थन करने का फैसला किया। कांग्रेस कार्यसमिति ने प्रस्ताव पारित कर पोलैंड पर नाजी हमले और फासीवाद तथा नाजीवाद की निंदा की, लेकिन प्रस्ताव में यह भी घोषित किया कि भारत किसी ऐसे युद्ध में शामिल नहीं हो सकता, जो प्रत्यक्षतः लोकतांत्रिक स्वतंत्रता के लिए लड़ा जा रहा हो, जबकि खुद उसे ही स्वतंत्रता से वंचित रखा जा रहा हो। यदि ब्रिटेन प्रजातांत्रिक मूल्यों और स्वाधीनता की रक्षा के लिए युद्ध कर रहा है, तो उसे पहले भारत को स्वाधीनता प्रदान कर यह साबित करना चाहिए। जन-संघर्ष छेड़ने पर कोई फैसला तो नहीं किया गया, लेकिन यह चेतावनी जरूर दी गई कि उसे ज्यादा समय तक टाला नहीं जा सकता। नेहरू के शब्दों में ‘‘कांग्रेस का नेतृत्व ब्रिटिश सरकार और वायसरॉय को पूरा मौका देना चाहता था।’’

लिनलिथगो की अक्टूबर घोषणा (Linlithgow’s October Announcement)

ब्रिटिश सरकार की प्रतिक्रिया आंतरिक तौर पर नकारात्मक थी। वायसरॉय लिनलिथगो ने अपने 17 अक्टूबर 1939 के वक्तव्य में कांग्रेस की माँगों को मानने से इनकार कर दिया और धार्मिक अल्पसंख्यकों तथा देसी रियासतों को कांग्रेस के विरुद्ध खड़ा करने का प्रयास किया। वायसराय ने घोषणा की कि ‘‘युद्ध के पश्चात जितना शीघ्र हो सकेगा, वेस्टमिनिस्टर जैसा प्रादेशिक स्वशासन देना अंग्रेजी सरकार का उद्देश्य होगा।’’ लिनलिथगो ने भविष्य के लिए यह वादा किया कि युद्धोपरांत ब्रिटिश सरकार, भारत के कई दलों, समुदायों और हितों का प्रतिनिधित्व करने वाली शक्तियों तथा भारतीय राजाओं से इस मुद्दे पर विचार-विमर्श करेगी कि 1935 के भारत सरकार अधिनियम में किस प्रकार के संशोधन किये जाएं। आवश्यकता पड़ने पर परामर्श लेने के लिए सरकार, एक परामर्श समिति का गठन करेगी।

वास्तव में लिनलिथगो का वक्तव्य उस सामान्य ब्रिटिश योजना का हिस्सा था जिसके अनुसार युद्ध से फायदा उठाकर खोये हुए उस आधार को पुनः प्राप्त करना था, जो कि कांग्रेस के प्रयासों के कारण सरकार के हाथ से निकल गया था। सरकार की नीति थी कि कांग्रेस को सरकार के साथ विवादों में उलझा दिया जाए, तत्पश्चात् उत्पन्न परिस्थितियों का उपयोग सत्ता को और स्थायी बनाने में किया जाये। इसी नीति के तहत युद्ध की घोषणा के उपरांत 1935 के अधिनियम में संशोधन कर केंद्र ने राज्य के विषयों में हस्तक्षेप करने के असाधारण अधिकार प्राप्त कर लिये। जिस दिन युद्ध की घोषणा की गई, उसी दिन नागरिक अधिकारों की स्वतंत्रता के दमन हेतु सरकार ने भारतीय सुरक्षा अध्यादेश देश पर थोप दिया था। मई 1940 में क्रांतिकारी आंदोलन से संबंधित एक अति गुप्त अध्यादेश तैयार किया गया, ताकि कांग्रेस द्वारा प्रारंभ किये जाने वाले किसी भी आंदोलन को आसानी से दबाया जा सके। भारत सरकार की इन दमनकारी एवं भेदभावमूलक नीतियों का इंग्लैंड के प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल और भारत सचिव जेटलैंड ने पूर्णरूपेण समर्थन किया। जेटलैंड ने तो कांग्रेस को विशुद्ध हिंदूवादी संगठन तक घोषित कर दिया।

धीरे-धीरे यह स्पष्ट होने लगा कि ब्रिटिश सरकार, युद्ध के पूर्व या पश्चात् अपनी उपनिवेशवादी पकड़ में किसी भी प्रकार की ढील नहीं देना चाहती और कांग्रेस से शत्रुतापूर्ण व्यवहार करने की मंशा रखती है। सरकार द्वारा भारतीय जनमानस की उपेक्षा तथा कांग्रेस के प्रति उसके शत्रुतापूर्ण रवैये की गांधी ने कड़ी आलोचना की। उन्होंने कहा कि ‘‘सरकार की भारत-संबंधी घोषणा यह दर्शाती है कि ब्रिटेन का वश चले तो वह भारत में लोकतंत्र कभी न आने दे।’’ अल्पसंख्यक तथा विशिष्ट वर्ग के हितों की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि कांग्रेस प्रत्येक अल्पसंख्यक तथा विशिष्ट वर्ग के हितों की रक्षा करेगी, बशर्ते उनके दावों का देश की स्वाधीनता के मुद्दे से कोई टकराव नहीं होना चाहिए।”

23 अक्टूबर 1939 को कांग्रेस कार्यसमिति ने वायसरॉय के साम्राज्यवादी वक्तव्य को अस्वीकार कर दिया और युद्ध का समर्थन न करने का निर्णय किया। कार्यसमिति के निर्देश पर साम्राज्यवादी घोषणा के विरुद्ध कांग्रेस की सभी प्रांतीय सरकारों ने अक्टूबर 1939 में इस्तीफा दे दिया। जिन्ना और लीग ने 22 दिसंबर 1939 को ‘मुक्ति-दिवस’ के रूप में मनाया, क्योंकि देश को कांग्रेस से छुटकारा मिल गया था। डॉ. भीमराव आंबेडकर ने भी उनका समर्थन किया और ब्रिटेन की सरकार ने इस दरार से लाभ उठाने की सोची।

सत्याग्रह छेड़ने का प्रश्न (Satyagraha Issue)

लिनलिथगो की (17 अक्टूबर की) घोषणा के पश्चात् तुरंत जन-सत्याग्रह छेड़ने के प्रश्न पर एक बार पुनः बहस प्रारंभ हो गई। गांधीजी एवं उनके समर्थक तुरंत आंदोलन प्रारंभ करने के पक्ष में नहीं थे, क्योंकि उनका मानना था कि संगठनात्मक तौर पर कांग्रेस की स्थिति अच्छी नहीं है और तत्कालीन परिस्थितियाँ जन सत्याग्रह के प्रतिकूल हैं। जनता अभी किसी भी प्रकार के संघर्ष के लिए तैयार नहीं है और सांप्रदायिक संवेदनशीलता एवं हिंदू-मुस्लिम एकता के अभाव में सांप्रदायिक दंगे भड़क सकते हैं। इसलिए आवश्यक है कि सांगठनिक रूप से कांग्रेस को तैयार किया जाए और सरकार से तब तक विचार-विमर्श किया जाए, जब तक यह सार्वजनिक न हो जाए कि विचार-विमर्श से समस्या का समाधान नहीं हो सकता और इसके लिए उपनिवेशिक शासन जिम्मेदार है। इसके पश्चात् ही आंदोलन प्रारंभ किया जाना चाहिए।

सुभाषचंद्र बोस और उनके फॉरवर्ड ब्लाक, कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी, कम्युनिस्ट पार्टी जैसे वामपंथी समूहों का तर्क था कि यह युद्ध एक साम्राज्यवादी युद्ध है और यही उचित समय है कि ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध चौतरफा युद्ध छेड़कर स्वतंत्रता हासिल कर ली जायें वामपंथियों का विश्वास था कि जनता संघर्ष के लिए पूरी तरह तैयार है और आंदोलन प्रारंभ किये जाने की प्रतीक्षा कर रही है। उन्होंने स्वीकार किया कि कांग्रेस में संगठन की कमजोरी तथा सांप्रदायिक कटुता जैसी समस्याएँ अवश्य हैं, किंतु जनसंघर्ष के प्रवाह में ये सारी समस्याएँ बह जायेंगी। उनका तर्क था कि संगठन संघर्ष के पहले तैयार नहीं किया जाता, बल्कि इसका निर्माण संघर्ष प्रारंभ होने के पश्चात् होता है। फलतः कांग्रेस को अतिशीघ्र आंदोलन प्रारंभ कर देना चाहिए। सुभाष बोस तो यहाँ तक चाहते थे कि यदि कांग्रेस शीघ्र ही सत्याग्रह शुरू करने में आनाकानी करती है, तो वामपंथी उससे नाता तोड़ लें और समानांतर कांग्रेस का गठन कर अपनी ओर से आंदोलन प्रारंभ कर दें। उन्हें पूरा यकीन था कि आम जनता के साथ-साथ कांग्रेस के अधिकांश सदस्य इस मुद्दे पर उनका साथ देंगे। लेकिन इसके विपरीत कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी और कम्युनिस्ट पार्टी का मानना था कि गांधीजी और कांग्रेस के नेतत्व के बिना कोई भी संघर्ष शुरू नहीं किया जा सकता। इसलिए कांग्रेस को तोड़ने और राष्ट्रीय संयुक्त मोर्चे में दरार पैदा करने के बजाय कोशिश यह होनी चाहिए कि संघर्ष शुरू करने के लिए उसके नेतृत्व को राजी किया जाए और उस पर दबाव डाला जाये।

जवाहरलाल नेहरू का झुकाव दोनों पक्षों की ओर था। एक ओर उन्हें मित्रराष्ट्रों का साम्राज्यवादी चरित्र स्पष्ट दिख रहा था और दूसरी ओर वे ऐसा कोई कदम नहीं उठाना चाहते थे, जिससे यूरोप में नाजियों और हिटलर की जीत आसान हो जायें एक तरफ उनका पूरा व्यक्तित्व और राजनीतिक चिंतन तुरंत सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू करने के अनुकूल जान पड़ता था, तो दूसरी तरफ वे यूरोप में नाजी-विरोधी संघर्ष और एशिया में जापानी आक्रमण के खिलाफ चीनी जनता के संघर्ष को भी कमजोर नहीं करना चाहते थे। अंततः नेहरू ने गांधी और कांग्रेस नेतृत्व के बहुमत का ही साथ देने का निर्णय किया।

कांग्रेस का रामगढ़ अधिवेशन, 18-20 मार्च 1940 (Ramgarh Session of Congress, 18-20 March 1940)

कांग्रेस का 53वाँ अधिवेशन मौलाना कलाम की अध्यक्षता में 18-20 मार्च 1940 को रामगढ़ (झारखंड) में दामोदर नदी के किनारे संपन्न हुआ। इस अधिवेशन में कांग्रेस ने युद्ध के प्रति कांग्रेस के रुख को दोहराते हुए जहाँ यह घोषणा की कि ‘‘पूर्ण स्वाधीनता से कम कुछ भी जनता को स्वीकार्य नहीं हो सकता’’, वहीं यह भी स्वीकार किया कि ‘‘जैसे ही कांग्रेस संगठन संघर्ष के योग्य हो जाता है या फिर परिस्थितियां इस कदर बदल जाती हैं कि संकट निकट दिखाई दे, वैसे ही कांग्रेस सविनय अवज्ञा आंदोलन छेड़ देगी।’’ सत्याग्रह प्रारंभ करने का पूरा उत्तरदायित्व गांधीजी पर छोड़ दिया गया।

कांग्रेस की समझौतावादी नीतियों के विरोध में सुभाषचंद्र बोस ने समानांतर अधिवेशन किया और पूरे नगर में एक विशाल शोभायात्रा निकाली, जिसमें महंत धनराजपुरी, शाहनवाज हुसैन, लक्ष्मीबाई सहगल और शीलभद्र जैसे लोग शामिल हुए।

अगस्त-प्रस्ताव, 8 अगस्त 1940 (August Offer, 8 August 1940)

द्वितीय विश्वयुद्ध में हिटलर की असाधारण सफलता और बेल्जियम, हालैंड एवं फ्रांस के पतन के पश्चात् ब्रिटेन की स्थिति अत्यंत नाजुक हो गई, फलतः ब्रिटेन ने समझौतावादी दृष्टिकोण अपनाया। युद्ध में भारतीयों का सहयोग प्राप्त करने के उद्देश्य से वायसरॉय लिनलिथगो ने 8 अगस्त 1940 को ‘अगस्त प्रस्ताव’ घोषणा की। इस प्रस्ताव के अनुसार अनिश्चित भविष्य में भारत को डोमिनियन स्टेट्स का दर्जा दिया जायेगा, वायसरॉय की एक्जिक्यूटिव कौंसिल का विस्तार कर उसमें कुछ भारतीय शामिल किये जायेंगे और एक युद्ध-परामर्श परिषद् का गठन किया जायेगा। युद्ध के पश्चात् विभिन्न भारतीय दलों के प्रतिनिधियों की एक संविधान सभा गठित की जायेगी, जो भारतीयों के अपने सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक धारणाओं के अनुरूप संविधान के निर्माण की रूपरेखा सुनिश्चित करेंगी। इस संविधान में रक्षा, अल्पसंख्यकों के हित, राज्यों से संधियाँ तथा अखिल भारतीय सेवाएँ इत्यादि मुद्दों पर भारतीयों के अधिकार का पूर्ण ध्यान रखा जायेगा। अल्पसंख्यकों से वादा किया गया कि सरकार ऐसी किसी संस्था को शासन नहीं सौंपेगी, जिसके विरुद्ध सशक्त मत हो। उक्त आधारों पर भारतीय सरकार को सहयोग प्रदान करेंगे।

अगस्त प्रस्ताव कांग्रेस की उम्मीद से बहुत कम था और इसमें ब्रिटिश सरकार ने अल्पसंख्यकों को पूर्ण महत्त्व प्रदान करने का वादा किया था। गांधी ने घोषणा की कि ‘‘अगस्त प्रस्तावों के रूप में सरकार ने जो घोषणाएँ की है, उनसे राष्ट्रवादियों तथा उपनिवेशी सरकार के बीच खाई और चौड़ी होगी।’’ वास्तव में लंदन की सरकार ऐसे किसी प्रस्ताव के लिए तैयार ही नहीं थी, जो संवैधानिक प्रश्नों पर युद्ध के बाद किसी भी वार्ता में उसके हाथ बाँध देती। फलतः कांग्रेस ने अगस्त प्रस्ताव को जहाँ अस्वीकार कर दिया, वहीं मुस्लिम लीग ने इस प्रस्ताव को स्वीकार करते हुए कहा कि भारत का बँटवारा ही इस समस्या का एक मात्र समाधान है।

अगस्त-प्रस्ताव की असफलता से ब्रिटिश सरकार खिन्न हो गई। उसने राष्ट्रीय आंदोलन और कांग्रेस के प्रति अड़ियल रवैया अपना लिया और घोषित किया कि कांग्रेस जब तक मुस्लिम संप्रदायवादियों के साथ किसी तरह के समझौते को मूर्तरूप नहीं देती, तब तक भारत में किसी प्रकार का संवैधानिक सुधार संभव नहीं है। सितंबर 1940 में गांधी वायसरॉय से दो-दो बार मिले, किंतु कोई समझौता नहीं हो सका। अब सरकार एक के बाद एक अध्यादेश जारी कर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, प्रेस की स्वतंत्रता तथा सभा करने एवं संगठन बनाने जैसे अधिकार छीनने लगी। देश भर में राष्ट्रवादी मजदूरों, विशेषकर वामपंथी समूहों से जुड़े मजदूरों को तरह-तरह से परेशान किया जाने लगा; उन्हें गिरफ्तार कर जेलों में डाला जाने लगा। ऐसे में जाहिर था कि यदि कांग्रेस जन-संघर्ष छेड़ने का फैसला करती, तो उसे तुरंत कुचल दिया जाता।

वैयक्तिक सत्याग्रह, 17 अक्टूबर 1940 (Individual Satyagraha, 17 October 1940)

1940 के अंत में कांग्रेस ने एक बार पुनः गांधीजी से आंदोलन की कमान सँभालने का अनुरोध किया। अब गांधीजी ने ऐसे कदम उठाने शुरू कर दिये, जिससे उनकी अपनी व्यापक रणनीति के दायरे में जनसंघर्ष की भूमिका बनती। उन्होंने तय किया कि हर इलाके में कुछ चुने हुए लोग सीमित पैमाने पर ‘वैयक्तिक सत्याग्रह’ प्रारंभ करेंगे। सत्याग्रही सार्वजनिक रूप से युद्ध के खिलाफ प्रचार करेंगे और जनता से अपील करेंगे कि ब्रिटिश सरकार के युद्ध-कार्य में किसी भी प्रकार से सहयोग न करें। सत्याग्रही जिला मजिस्ट्रेट को पहले से सूचित करेंगे कि किस स्थान पर, किस समय युद्ध-विरोधी भाषण होना है। यदि सत्याग्रहियों को गिरफ्तार नहीं किया गया, तो वे युद्ध-विरोधी भाषण को दुहराएंगे और गाँवों की ओर प्रस्थान करेंगे। तत्पश्चात् गाँवों में ये अपना संदेश फैलाते हुए दिल्ली की ओर बढ़ने का प्रयास करेंगे। इसलिए इस आंदोलन को ‘दिल्ली चलो आंदोलन’ भी कहा जाता है।

वैयक्तिक सत्याग्रह का उद्देश्य (Purpose of Individual Satyagraha)

वैयक्तिक सत्याग्रह का मुख्य उद्देश्य ब्रिटिश सरकार के दावे को खोखला साबित करना था कि ‘भारत की जनता द्वितीय विश्वयुद्ध में सरकार के साथ है।’ वायसरॉय के नाम एक पत्र में गांधी ने इसके उद्देश्यों की व्याख्या इस प्रकार की: ‘‘कांग्रेस नाजीवाद के विजय की उतनी ही विरोधी है, जितना कि कोई अंग्रेज हो सकता है; लेकिन उसकी आपत्ति को युद्ध में उसकी भागीदारी की सीमा तक नहीं खींचा जा सकता, और चूंकि आपने तथा भारतीय मामलों से संबंधित मंत्री ने घोषणा की है कि पूरा भारत स्वेच्छा से युद्ध में सहायता कर रहा है, इसलिए यह स्पष्ट करना जरूरी हो जाता है कि भारतीयों को वस्तुतः युद्ध में कोई दिलचस्पी नहीं है। उनके लिए नाजीवाद और भारत पर शासन करने वाली दोहरी तानाशाही में कोई अंतर नहीं है।’’ इस प्रकार वैयक्तिक सत्याग्रह के दो उद्देश्य थे- पहला, यह भारतीय जनता की उग्र राजनीतिक चेतना की अभिव्यक्ति था और दूसरा, इसके द्वारा ब्रिटिश सरकार को एक और अवसर दिया जा रहा था कि वह भारत की माँगों को स्वीकार कर ले। किंतु लगता है कि सत्याग्रह को जान-बूझकर सीमित और वैयक्तिक इसलिए रखा गया था ताकि देश में व्यापक उथल-पुथल न हो और ब्रिटेन के युद्ध-प्रयासों में बाधा न पहुँचे।

वैयक्तिक सत्याग्रह का आरंभ (Start of Individual Satyagraha)

गांधीजी ने 11 अक्टूबर 1940 को विनोबा भावे को पहले सत्याग्रही के रूप में चुना था। उन्होंने 17 अक्टूबर 1940 को पवनार में सत्याग्रह शुरू किया और ‘तकली की सारी सुप्त-शक्तियों को खोज निकाला।’ पहली सभा सेलू नामक गाँव में हुई और फिर दूसरी सभा सेवाग्राम में। इस सत्याग्रह के कारण विनोबा भावे बहुत प्रसिद्ध हो गये। चार दिन के युद्ध-विरोधी प्रचार के बाद 21 अक्टूबर को ब्रिटिश सरकार ने विनोबा को गिरफ्तार कर लिया। दूसरे सत्याग्रही जवाहरलाल नेहरू को 7 नवंबर 1940 को वैयक्तिक सत्याग्रह शुरू करना था, किंतु गोरखपुर में दिये गये अपने भाषणों के कारण वे 31 अक्टूबर 1940 को ही गिरफ्तार कर लिये गये।

इसके बाद कांग्रेस ने वैयक्तिक सत्याग्रह को अपना कार्यक्रम बनाकर गिरफ्तारी देने का आंदोलन चलाया। गांधी स्वयं गिरफ्तार नहीं हुए, क्योंकि वे इस आंदोलन की व्यवस्था में लगे हुए थे। वैयक्तिक सत्याग्रह ने शीघ्र ही व्यापक आंदोलन का रूप धारण कर लिया। जगह-जगह लोग युद्ध-विरोधी प्रचार करने लगे। देश के कोने-कोने से लोग अपना घर-बार, खेती-बारी, जमीन-जायदाद छोड़कर सरकारी प्रतिबंधों को तोड़कर जेल जाने लगे। छह प्रांतों के भूतपूर्व मुख्यमंत्री, 29 मंत्री तथा 290 विधानमंडलों के सदस्य भी गिरफ्तार किये गये। सत्याग्रह की इस नई पद्धति ने लोगों को बता दिया कि ‘‘अपनी लड़ाई अंग्रेजों से नहीं, बल्कि अंग्रेजी शासन से है।’’ 15 मई 1941 तक 25,000 से अधिक सत्याग्रही सविनय अवज्ञा आंदोलन के लिए दंडित किये जा चुके थे। फिर भी, यह आंदोलन किसी भी तरह सफल नहीं रहा और इस बीच जपानी सैनिक भारत की सीमाओं के और करीब आ गये, जबकि अंग्रेज किसी भी संवैधानिक परिवर्तन का वादा न करने पर अड़े रहे।

विश्व की राजनीति में परिवर्तन (Changes in World Politics)

1941 में विश्व की राजनीति में दो महत्त्वपूर्ण परिवर्तन आये। पश्चिमी यूरोप तथा अधिकांश पूर्वी यूरोप में पौलैंड, बेल्जियम, हालैंड, नार्वे और फ्रांस पर अधिकर कर लेने के बाद नाजी जर्मनी ने 22 जून 1941 को सोवियत संघ पर भी आक्रमण कर दिया। 7 दिसंबर को जापान ने पर्लहार्बर में एक अमरीकी समुद्री बेड़े पर आकस्मिक हमला किया और जर्मनी तथा इटली की ओर से युद्ध में शामिल हो गया। उसने तेजी से दक्षिण-पूर्व एशिया में फिलीपीन, हिंदचीन, इंडोनेशिया, मलाया और बर्मा पर अधिकार कर लिया। 8 मार्च 1942 को जब जापानी फौजों ने रंगून (वर्तमान यांगून) पर कब्जा कर लिया तो युद्ध भारत की सीमाओं तक आ पहुँचा, जिससे भारत के सीमांत क्षेत्रों पर सीधा खतरा पैदा हो गया।

भारतीय नेता, जिन्हें दिसंबर 1941 में रिहा किया गया था, भारत की सुरक्षा को लेकर परेशान थे। सोवियत संघ और चीन को लेकर भी वे चिंतित थे। बहुतों को लग रहा था कि सोवियत संघ पर हिटलर के हमले ने युद्ध के चरित्र को बदल दिया है। गांधीजी ‘एशिया एशियाइयों के लिए है’ के जापानी नारे की निंदा कर चुके थे। अब उन्होंने भारत के लोगों से जापानी वस्तुओं के बहिष्कार की अपील शुरू कर दी। भारतीय सीमाओं की रक्षा करने तथा मित्रराष्ट्रों की सहायता करने की आतुरता में कांग्रेस कार्यसमिति ने जापानी आक्रमण की निंदा की और गांधी तथा नेहरू की आपत्तियों को दरकिनार करते हुए दिसंबर के अंत में एक प्रस्ताव पारित किया, जिसमें कहा गया था कि ‘अगर ब्रिटेन युद्ध के बाद पूर्ण स्वाधीनता का वचन दे और तुरंत ठोस रूप में सत्ता देने के लिए राजी हो जाए, तो वे भारत और मित्रराष्ट्रों की रक्षा में पूरा-पूरा सहयोग करेंगे।’

इसी समय गांधीजी ने जवाहरलाल नेहरू को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया। 15 जनवरी 1941 को अखिल भारतीय कांग्रेस कार्यसमिति में बोलते हुए उन्होंने कहा कि ‘‘किसी ने बताया कि पं. जवाहरलाल और मेरे बीच दरार पड़ चुकी है। हमारे बीच दरार पड़ने के लिए सिर्फ मतभेद काफी नहीं हैं। जबसे हम सहकर्मी बने हैं, तभी से हमारे बीच मतभेद रहे हैं, फिर भी कई वर्षों से मैं कहता रहा हूँ और आज भी कहता हूँ कि राजाजी (सी. राजगोपालाचारी) नहीं, बल्कि जवाहरलाल मेरे उत्तराधिकारी होंगे। उनका कहना है कि वे मेरी भाषा नहीं समझते और वे जो भाषा बोलते हैं, वह मेरे लिए अजनबी है। यह सच हो सकता है और नहीं भी। लेकिन भाषा दिलों के मिलन में आड़े नहीं आती, और मुझे मालूम है कि जब मैं नहीं रहूँगा, तब वे मेरी ही भाषा बोलेंगे।’’

क्रिप्स मिशन, 30 मार्च 1942 (Cripps Mission, 30 March 1942)

द्वितीय विश्वयुद्ध में मित्रराष्ट्रों की स्थिति दिन-प्रतिदिन बिगड़़ती जा रही थी। अब ब्रिटिश सरकार को युद्ध प्रयासों में भारतीयों के सक्रिय सहयोग की तत्काल आवश्यकता थी क्योंकि संयुक्त राज्य अमरीका के राष्ट्रपति रूजवेल्ट, चीन के राष्ट्रपति च्यांग काई शेक तथा ब्रिटेन के लेबर पार्टी के बहुत से सदस्य चर्चिल पर दबाव डाल रहे थे कि संकट की इस घड़ी में वह भारतीयों का समर्थन पाने के लिए पहल करें। इसलिए ब्रिटिश सरकार ने 11 मार्च 1942 को कैबिनेट मंत्री स्टैफोर्ड क्रिप्स के नेतृत्व में एक सद्भाव मंडल भारत भेजने की घोषणा की। क्रिप्स पहले लेबर पार्टी के वामपंथी सदस्य रहे और भारत के राष्ट्रीय आंदोलन का पक्के समर्थक थे।

क्रिप्स अपने मिशन के साथ 23 मार्च 1942 को दिल्ली आये। आते ही उन्होंने घोषणा की कि भारत में ब्रिटश नीति का उद्देश्य है- जितनी जल्दी संभव हो सके, भारत में स्वशासन की स्थापना। भारत के विभिन्न नेताओं से विचार-विमर्श कर उन्होंने 30 मार्च 1942 को अपनी योजना प्रस्तुत की, जिसमें मुख्य रूप से दो प्रस्ताव थे- युद्धोत्तर और युद्धकालीन। युद्धोत्तर प्रस्ताव के अंतर्गत भारत को डोमिनियन स्टेट्स (स्वतंत्र उपनिवेश) का दर्जा देने और एक ऐसी संविधान निर्मात्री परिषद् बनाने का आश्वासन था, जिसके कुछ सदस्य प्रांतीय विधायिकाओं द्वारा निर्वाचित होते और कुछ (रियासतों का प्रतिनिधित्व करने के लिए) शासकों द्वारा नामांकित होते। यह औपनिवेशिक स्वराज्य राष्ट्रमंडल के साथ अपने संबंधों के निर्धारण में स्वतंत्र होता और संयुक्त राष्ट्रसंघ व अन्य अंतर्राष्ट्रीय निकायों एवं संस्थाओं में अपनी भूमिका को खुद ही निर्धारित करता। प्रस्ताव में यह भी व्यवस्था थी कि यदि किसी प्रांत को नया संविधान स्वीकार्य नहीं होगा, तो वह अपने भविष्य के लिए ब्रिटेन से अलग समझौता कर सकता है। युद्धकालीन प्रस्ताव के अनुसार इस दौर में भारत की प्रतिरक्षा पर पूरा-का-पूरा नियंत्रण ब्रिटिश सरकार के पास रहता।

यद्यपि क्रिप्स का प्रस्ताव लिनलिथगो के ‘अगस्त प्रस्ताव’ की तुलना में बेहतर और अधिक प्रगतिशील था, क्योंकि इसमें भारतीयों को न केवल वास्तविक तौर पर संविधान के निर्माण का अधिकार दिया गया था, बल्कि भारत को ऐच्छिक रूप से राष्ट्रमंडल से अलग होने का अधिकार भी मिल रहा था। किंतु क्रिप्स के ‘अनुरक्षणवादी, प्रतिक्रियाशील और सीमित प्रस्ताव’ का भारत के विभिन्न दलों और समूहों ने अलग-अलग आधार पर विरोध किया। कांग्रेस की मुख्य माँग एक वास्तविक राष्ट्रीय सरकार की स्थापना थी, जिसके पास सारे अधिकार सुरक्षित हों तथा जिसमें वायसरॉय केवल एक अध्यक्ष की हैसियत से कार्य करता हो। उधर, ब्रिटिश सरकार को यह मंजूर नहीं था कि वास्तविक शक्ति भारतवासियों को दे दी जायें वह देश की प्रतिरक्षा की जिम्मेदारी अपने हाथों में ही रखना चाहती थी। संविधान सभा में रियासतों की जनता के बजाय शासकों द्वारा नामांकन की व्यवस्था और प्रांतों को पृथक् संविधान बनाने के विकल्प पर भी कांग्रेस को कड़ी आपत्ति थी। नेहरू के अनुसार ‘‘क्रिप्स योजना को स्वीकार करना भारत को अनिश्चित खंडों में विभाजित करने के लिए मार्ग प्रशस्त करना था।’’ गांधीजी ने इसे एक ‘बाद की तारीख का चेक’ बताया, जिसे वह स्वीकार करने को तैयार नहीं थे। उदारपंथी और हिंदू महासभा भी प्रांतों को संघ से पृथक् होने का अधिकार दिये जाने के विरोधी थे। दलितों ने इसलिए विरोध किया क्योंकि उन्हें लगा कि विभाजन के पश्चात् उन्हें बहुसंख्यक हिंदुओं की कृपा पर जीना पड़ेगा। पंजाब को भारत से अलग करने की योजना से सिख भी असंतुष्ट थे। दूसरी ओर ‘पाकिस्तान’ की स्पष्ट घोषणा न किये जाने के कारण मुस्लिम लीग ने भी क्रिप्स प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया।

अंततः वायसरॉय के वीटो (निषेधाधिकार) के प्रश्न पर स्टैफर्ड क्रिप्स तथा कांग्रेस के नेताओं के मध्य वार्ता भंग हो गई और क्रिप्स ब्रिटिश सरकार के प्रस्तावों की योजना वापस लेकर इंग्लैंड लौट गये। वार्ता टूटने का एक कारण यह भी था कि क्रिप्स को लचीला होने की सुविधा नहीं थी; उन्हें जो प्रस्ताव देकर भेजा गया था, उसका अतिक्रमण करने का उन्हें अधिकार नहीं था। दरअसल प्रधानमंत्री चर्चिल, विदेशमंत्री एमरी, वायसरॉय लिनलिथगो और कमांडर-इन-चीफ वेवेल चाहते ही नहीं थे कि क्रिप्स मिशन सफल हो। चर्चिल ने तो साफ-साफ कह दिया था: ‘‘अटलांटिक चार्टर भारत पर लागू नहीं होता और वे प्रधानमंत्री इसलिए नहीं बने हैं कि अंग्रेजी साम्राज्य को समाप्त कर दिया जाये।’’ वास्तव में क्रिप्स मिशन भेजने के पीछे ब्रिटिश सरकार का मुख्य उद्देश्य युद्ध के दौरान भारत के सभी वर्गों एवं दलों की सहायता प्राप्त करना मात्र था। क्रिप्स मिशन की विफलता से भारत में सर्वत्र निराशा छा गई।

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