दिल्ली सल्तनत: खिलजी वंश (1290-1320 ई.) Delhi Sultanate: Khilji Dynasty (1290-1320 AD)

दिल्ली सल्तनत का दूसरा शासक परिवार खिलजी वंश था। इस वंश की स्थापना जलालुद्दीन खिलजी ने की थी, जिसने अपना जीवन एक सैनिक के रूप में प्रारंभ किया था। यद्यपि खिलजी कबीला लंबे समय से अफगानिस्तान में बसा हुआ था, किंतु अपने पूर्ववर्ती गुलाम सुल्तानों की तरह यह राजवंश भी मूलतः तुर्किस्तान का रहनेवाला था।

खिलजी कौन थे?

खिलजी कौन थे? इस विषय में पर्याप्त विवाद है। इतिहासकार निजामुद्दीन अहमद जलालुद्दीन खिलजी को चंगेज खाँ का दामाद और कुलीन खाँ का वंशज बताते हंै, जबकि तत्कालीन इतिहासकार जियाउद्दीन बरनी का मानना है कि जलालुद्दीन तुर्कों से भिन्न जाति का था। उसका यह भी कहना है कि कैकुबाद की मृत्यु के बाद तुर्कों ने साम्राज्य खो दिया। किंतु खिलजियों को अफगान या पठान वर्ग में नहीं रखा जा सकता।  फखरुद्दीन ने खिलजियों को तुर्कों की 64 जातियों में से एक बताया है और अधिकांश विद्वान् भी फखरुद्दीन के मत का समर्थन करते हैं, जिससे लगता है कि खिलजी मूलतः तुर्की उद्भव के थे। चूंकि भारत आने से पूर्व ही इस जाति अफगानिस्तान के हेलमंद नदी के तटीय क्षेत्रों के उन भागों में रहती थी, जिसे ‘खिलजी’ के नाम से जाना जाता था। संभवतः इसीलिए इस जाति को ‘खिलजी’ कहा गया है। अफगानिस्तान में लंबी अवधि तक रहने के कारण उन्होंने अफगानों के गुणों को अपना लिया था। इसलिए खिलजीे विशेषाधिकारविहीन वर्ग थे और इन्हें इल्वारी वंश की नस्लवादी नीतियों का शिकार बनना पड़ा था।

खिलजी क्रांति

गुलाम वंश के अंतिम सुल्तान शमसुद्दीन क्यूमर्स की हत्या करके जलालुद्दीन खिलजी ने इल्बारी वंश के एकाधिकार का अंत कर दिल्ली के सिंहासन पर अधिकार किया था, इसलिए इतिहास में खिलजी वंश की स्थापना को ‘खिलजी क्रांति’ के नाम से भी जाना जाता है। खिलजी मुख्यतः सर्वहारा वर्ग के थे और खिलजियों ने इस धारणा का अंत किया कि शासन करने का अधिकार केवल विशिष्ट वर्ग को ही है। इस क्रांति के बाद तुर्की अमीर सरदारों के प्रभाव-क्षेत्र में कमी आई। खिलजी क्रांति केवल इसलिए नहीं महत्त्वपूर्ण है कि उसने गुलाम वंश को समाप्त कर नवीन खिलजी वंश की स्थापना की, वरन् इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है कि खिलजी क्रांति के परिणामस्वरूप ही दिल्ली सल्तनत का सुदूर दक्षिण तक विस्तार हुआ। खिलजी युग साम्राज्यवाद और मुस्लिम-शक्ति के विस्तार का युग था। खिलजी क्रांति ने प्रशासन में धर्म व उलेमा के महत्त्व को भी अस्वीकार कर दिया और यह सिद्ध कर दिया कि राज्य को बिना धर्म की सहायता से न केवल जीवित रखा जा सकता है, बल्कि सफलतापूर्वक संचालित भी किया जा सकता है। इस प्रकार खिलजी शासकों की सत्ता मुख्य रूप से शक्ति पर निर्भर थी।

जलालुद्दीन फिरोज खिलजी (1290-1296 ई.)

जलालुद्दीन फिरोज खिलजी ने अपना जीवन एक सैनिक के रूप में शुरू किया था। अपनी योग्यता के बल पर उसने ‘सर-ए-जहाँदारशाही’ (अंगरक्षक) का पद प्राप्त किया तथा बाद में समाना का सूबेदार बनाया गया। कैकुबाद ने उसे ‘आरिज-ए-मुमालिक’ और ‘शाइस्ता खाँ’ की उपाधि दी थी।

जलालुद्दीन खिलजी का राज्याभिषेक

जलालुद्दीन ने दिल्ली के बजाय किलोखरी के महल में अपना राज्याभिषेक करवाया और एक वर्ष बाद दिल्ली में प्रवेश किया। दिल्ली के दिल्ली के सरदारों  एवं नागरिकों ने आरंभ में नये खिलजी शासक जलालुद्दीन फिरोज का स्वागत नहीं किया, क्योंकि वे उसे अफगान वंश का समझते थे। यही कारण है कि जलालुद्दीन ने किलोखरी को अपनी राजधानी बनाया। किंतु, जैसा कि बरनी लिखता है, उसके चरित्र की श्रेष्ठता, उसके न्याय, उदारता एवं अनुराग से धीरे-धीरे लोगों की नाराजगी दूर हो गई तथा भूमि पाने की आशा से उसके सरदारों की श्रद्धा, अनिच्छापूर्वक ही सही, बढ़ने लगी।

उपलब्धियाँ

जलालुद्दीन फिरोज खिलजी दिल्ली का पहला सुल्तान था, जिसकी आंतरिक नीति दूसरों को प्रसन्न करने के सिद्धांत पर आधरित थी। उसने सुल्तान बनने के बाद भी बलबन के संबंधियों को उनके पदों से नहीं हटाया। बलबन का एक संबंधी मलिक छज्जू अवध एवं मानिकपुर का गवर्नर बना रहा। इसी तरह फखरुद्दीन भी दिल्ली का कोतवाल बना रहा। उसने अपने पुत्रों को खानखाना, अर्कली खाँ एवं कद्र खाँ की उपाधि प्रदान की। हिंदू जनता के प्रति भी जलालुद्दीन की नीति अपेक्षाकृत उदार थी। उसकी उदार नीति का सिर्फ एक अपवाद है जब उसने सिद्दीमौला नामक एक दरवेश को फाँसी दी थी।

नये सुल्तान ने विद्रोहियों तथा अन्य अपराधियों के प्रति अत्यंत अनुचित दयालुता प्रदर्शित की। उसकी शांतिमय प्रवृत्ति एवं दयालुता के स्वाभाविक परिणामस्वरूप सरदारों के षड्यंत्र पुनः आरंभ हो गये तथा दिल्ली के राजसिंहासन की सत्ता का निरादर होने लगा। जलालुद्दीन के अल्पकालीन शासन की कुछ महत्त्वपूर्ण उपलब्धियाँ इस प्रकार हैं-

मलिक छज्जू के विद्रोह का दमन

अगस्त, 1290 ई. में बलबन के एक भतीजे तथा कड़ा-मानिकपुर के जागीरदार मालिक छज्जू ने बहुत से सरदारों की मदद से उसके खिलाफ विद्रोह कर दिया। उसने ‘सुल्तान मुगीसुद्दीन’ की उपाधि धारण कर अपने नाम के सिक्के चलवाये एवं खुतबा (प्रशंसात्मक रचना) पढ़ा। सुल्तान ने विद्रोह को सफलतापूर्वक दबा दिया और कड़ा-मानिकपुर की सूबेदारी अपने भतीजे एवं दामाद अलाउद्दीन खिलजी को सौंप दी। उसने दिल्ली के निकटवर्ती क्षेत्रों में उसने ठगों का दमन किया।

रणथभौर के विरूद्ध अभियान

1291 ई. में रणथम्भौर के विरूद्ध जलालुद्दीन का अभियान असफल रहा। सुल्तान दुर्ग पर अधिकार किये बिना ही वहाँ से हट गया, क्योंकि उसका बहुत से मुसलमानों की बलि नहीं देना चाहता था। किंतु 1292 ई. में वह मंडौर एवं झाईन के किलों को जीतने में सफल रहा।

मंगोलों से संबंध

जलालुद्दीन को मंगोलों के एक दल के विरूद्ध निर्णायक सफलता प्राप्त हुई। 1292 ई. में मंगोल आक्रमणकारी हलाकू (हुला) का पौत्र अब्दुल्ला ने लगभग डेढ़ लाख मंगोलों के साथ पंजाब पर आक्रमण कर दिया और वह सुनाम तक पहुँच गया। सुल्तान की सेना ने आक्रमणकारियों को बुरी तरह पराजित किया और फिर दोनों पक्षों में सुलह हो गई। मंगोल भारत से वापस लौटने को तैयार हो गये थे, किंतु चंगेज के एक वंशज (नाती) उलगू ने अपने लगभग 4,000 मंगोल समर्थकों के साथ इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया और भारत में रहने का निर्णय लिया। कालांतर में जलालुद्दीन ने उलगू के साथ अपनी पुत्री का विवाह कर दिया और उनके रहने के लिए दिल्ली के निकट मुगरलपुर नाम की बस्ती बसाई। बाद में उन्हें ही ‘नवीन मुसलमान’ के नाम से जाना गया। यह एक अनुचित छूट थी जिससे बाद में बहुत कष्ट हुआ। वे दिल्ली सरकार के उत्पाती पड़ोसी निकले और उसके लिए संकट के कारण बने।

दक्षिण भारत पर प्रथम आक्रमण

जलालुद्दीन के समय में उसके भतीजे अलाउद्दीन ने अपने चाचा की स्वीकृति के बाद 1292 ई. में मालवा, भिलसा एवं देवगिरि के विरूद्ध अभियान किया। देवगिरि पर आक्रमण मुसलमानों का दक्षिण भारत पर पहला आक्रमण था। इन अभियानों में अलाउद्दीन को अपार संपत्ति प्राप्त हुई। जलालुद्दीन को अमीरों ने सलाह दी कि मार्ग में ही अलाउद्दीन खिलजी से संपत्ति को छीन ले, परंतु जलालुद्दीन ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया।

जलालुद्दीन खिलजी का मूल्यांकन

यद्यपि जलालुद्दीन खिलजी का शासन उदार निरंकुशता की नीति पर आधारित था, किंतु उसने ईरान के धार्मिक फकीर सीदी मौला को हाथी के पैरों तले कुचलवा दिया। सुल्तान का यह एक मात्र कठोर कार्य था, अन्यथा उसकी नीति उदारता और सभी को संतुष्ट करने की ही थी। अपनी उदार नीति के बारे में जलालुद्दीन कहता था: ‘मै एक वृद्ध मुसलमान हूँ और मुसलमान का रक्त बहाना मेरी आदत नहीं है।’ अमीर खुसरो और इमामी दोनों ने अलाउद्दीन खिलजी को ‘भाग्यवादी व्यक्ति’ कहा है। यह सुल्तान के भाग्य की ही विचित्र लीला थी कि उसके महत्त्वाकांक्षी भतीजे ने उसे 1296 ई. में मार डाला।

अलाउद्दीन खिलजी (1296-1316 ई.)

अलाउद्दीन खिलजी जलालुद्दीन खिलजी का भतीजा और दामाद था। उसके बचपन का नाम अली गुरशस्प था। पितृविहीन अलाउद्दीन का पालन-पोषण उसके चाचा जलालुद्दीन फिरोज ने ही किया था। फिरोज अपने भतीजे अलाउद्दीन को इतना अधिक प्यार करता था कि उसे अपना दामाद भी बना लिया। मलिक छज्जू के विद्रोह को दबाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने के कारण जलालुद्दीन ने उसे इलाहाबाद जिले में स्थित कड़ा-मनिकपुर की जागीर और ‘अमीर-ए-तुजुक’ का पद दिया था। यहीं से अलाउद्दीन के दिमाग में महत्त्वाकांक्षा के बीज बोये गये। संभव है कि अपनी सास मलिका जहाँ तथा अपनी पत्नी के षड्यंत्रों से उत्पन्न पारिवारिक कष्ट से भी उसे दिल्ली दरबार से अलग शक्ति एवं प्रभाव स्थापित करने की प्रेरणा मिली हो।

दक्षिण भारत की लूट

भिलसा में अलाउद्दीन ने देवगिरि के राज्य की अपरिमित संपत्ति की अस्पष्ट अफवाहें सुनी। पश्चिमी दक्कन (दकन) में फैले देवगिरि राज्य पर उस समय यादव वंश का रामचंद्रदेव शासन कर रहा था। अलाउद्दीन कई हजार अश्वारोहियों को लेकर मध्य भारत एवं विंध्य प्रदेश होता हुआ देवगिरि पहुँच गया। अपने इस अभिप्राय को अपने चाचा से गुप्त रखा। रामचंद्रदेव ऐसे किसी आक्रमण के लिए तैयार न था। उसका पुत्र शंकरदेव उसकी अधिकतर सेना के साथ दक्षिण की ओर गया हुआ था। एक निष्फल प्रतिरोध के बाद रामचंद्रदेव की हार हो गई। मजबूर होकर उसे आक्रमणकारी के साथ संधि करनी पड़ी, जिसके अनुसार उसे बहुत बड़ी धनराशि देने का वादा करना पड़ा। परंतु अलाउद्दीन कड़ा लौटने को ही था कि शंकरदेव देवगिरि वापस आ गया और पिता के रोकने पर भी आक्रमणकारियों से जा भिड़ा। किंतु शीघ्र ही शंकरदेव पराजित हो गया और उसकी सेना भाग खड़ी हुई। अब पहले से भी अधिक कठोर शर्तों पर संधि हुई। अलाउद्दीन सोने, चाँदी, रेशम, मोतियों और बहुमूल्य पत्थरों के रूप में लूट का काफी माल लेकर कड़ा लौट आया। खिलजी आक्रमणकारी के इस वीरतापूर्ण आक्रमण से दक्कन की न केवल विशाल आर्थिक क्षति ही हुई, बल्कि विंध्य-पर्वत के पार के प्रदेशों पर विजय का रास्ता भी खुल गया। दक्षिण में मिली विजय और संपत्ति से अलाउद्दीन की महत्त्वाकांक्षा बढ़ गई और दिल्ली का सिंहासन उसका लक्ष्य हो गया।

जलालुद्उीन फिरोज खिलजी की हत्या

बूढ़े सुलतान जलालुद्दीन फिरोज को अहमद चप जैसे पदाधिकारियों ने ईमानदारी के साथ सलाह दी कि वह अपने भतीजे पर नियंत्रण रखे। फिरोज अपने भतीजे एवं दामाद अलाउद्दीन के स्नेह में अंधा होकर उसके बिछाये जाल में फँस गया। अपने दरबार के एक विश्वासघाती की सलाह पर वह आत्मरक्षा का आवश्यक प्रबंध किये बिना ही अपने प्रिय भतीजे से मिलने नाव से कड़ा की ओर चल पड़ा। कड़ा पहुँचने पर नाव से उतर कर ज्यों ही जलालुद्दीन भतीजे अलाउद्दीन से गले मिला, उसके भाई अलमास वेग ने चुपके से छुरा घोंपकर सुल्तान की हत्या कर दी, जिसे बाद में अलाउद्दीन ने ‘उलूग खाँ’ की उपाधि से विभूषित किया।

अलाउद्दीन खिलजी के राज्याभिषेक

अपने चाचा जलालुद्दीन की हत्या के बाद अलाउद्दीन के समर्थकों ने उसके पड़ाव में ही 19 जुलाई, 1296 ई. को अलाउद्दीन को सुल्तान घोषित कर दिया। उसके राज्याभिषेक पर जियाउद्दीन बरनी का कथन है कि ‘शहीद सुल्तान (जलालुद्उीन फिरोज खिलजी) के कटे मस्तक से अभी रक्त टपक ही रहा था कि शाही चंदोबा अलाउद्दीन खिलजी के सिर पर रखा गया और उसे सुल्तान घोषित कर दिया गया।’

इसके बाद अलाउद्दीन ने दिल्ली में अपनी स्थिति सुदृढ़ करने का प्रयास किया। इस बीच दिल्ली में सुल्तान की विधवा बेगम मलिका जहाँ ने अपने छोटे पुत्र को रुकनुद्दीन इब्राहीम के नाम से सिंहासन पर बैठा दिया था। उसका ज्येष्ठ पुत्र अर्कली खाँ उसके कुछ कामों से असंतुष्ट होने के कारण मुलतान चला गया था। अलाउद्दीन शीघ्रता से भयानक वर्षा में ही दिल्ली की ओर चल पड़ा। कुछ क्षीण प्रतिरोध के पश्चात् इब्राहीम अपनी माँ और विश्वासी अहमद चप के साथ मुलतान भाग गया। अलाउद्दीन ने दक्कन से प्राप्त संपत्ति को बाँटकर सरदारों, अधिकारियों एवं दिल्लीवासियों को अपने पक्ष में कर लिया और 3 अक्तूबर, 1296 ई. को बलबन के लालमहल में पुनः अपना  राज्याभिषेक कराया।

अलाउद्दीन के भाई उलूग खाँ तथा उसके मंत्री जफर खाँ ने मुल्तान से मृत सुल्तान के भगोड़े संबंधियों एवं मित्रों को बंदी बना लिया। अर्कली खाँ, इब्राहीम, उसके बहनोई उलगू खाँ मंगोल तथा अहमद चप अंधे कर दिये गये। अर्कली के सभी पुत्र मार डाले गये और उसको तथा उसके भाई को हाँसी के दुर्ग में बंदकर दिया गया। मलिकाजहाँ तथा अहमद चप को कठोर नियंत्रण में दिल्ली में ही रखा गया।

अलाउद्दीन खिलजी की सैनिक उपलब्धियाँ

अभी भी अलाउद्दीन की स्थिति अनिश्चित थी। उसे तुर्कों की दुःशीलता राजस्थान, मालवा एवं गुजरात के शासकों का विद्रोहपूर्ण व्यवहारों, सरदारों के षड्यंत्र तथा मंगोलों के आक्रमण आदि अनेक प्रतिकूल शक्तियों का सामना करना पड़ा, किंतु नये सुल्तान ने न केवल समस्याओं का सामना किया, वरन् सल्तनत का विस्तार भी किया। इस प्रकार अलाउद्दीन खिलजी के साथ साम्राज्यवादी विस्तार का 50 वर्षीय इतिहास आरंभ होता है।

मंगोल आक्रमण का प्रतिरोध

अलाउद्दीन को अपने शासनकाल में मंगोलों के सबसे अधिक एवं सबसे भयानक आक्रमण का सामना करना पड़ा। उसके राजसिंहासन पर बैठने के कुछ ही महीनों के अंदर 1297-98 ई. मंगोलों के एक विशाल दल ने कादर के नेतृत्व में भारत पर आक्रमण कर किया, किंतु जफर खाँ एवं उलूग खाँ के नेतृत्व में सुल्तान की सेना ने जालंधर के निकट उन्हें पराजितकर पीछे भगा दिया।

मंगोलों का दूसरा आक्रमण सलदी के नेतृत्व में 1298 ई. में सेहबान पर हुआ। जफर खाँ ने इस आक्रमण को सफलतापूर्वक असफल कर दिया। इस बार जफर खाँ ने उन्हें हरा दिया तथा उनके नेता को लगभग दो हजार अनुयायियों के साथ बंदी बनाकर दिल्ली भेज दिया।

1299 ई. में कुतलुग ख्वाजा कई हजार मंगोलों को लेकर भारत में घुस आया। इस बार उनका लक्ष्य लूटपाट न होकर विजय था। अतः उन्होंने अपनी राह में पड़नेवाले प्रदेशों को नहीं लूटा और न दुर्गों पर आक्रमण ही किया। वे नगर को घेरने के अभिप्राय से दिल्ली के पड़ोस में पहुँच गये, जिसके फलस्वरूप वहाँ आतंक फैल गया। संभवतः जफर खाँ के पराक्रम से भयतीत होकर ही मंगोल शीघ्र वापस लौट गये, किंतु जफर खाँ ने लड़ते-लड़ते मारा गया।

1304 ई. में मंगोलों ने भारत पर पुनः आक्रमण किया। लगभग दो माह तक सीरी के किले को घेरे रहने के बाद भी उन्हें सफलता नहीं मिल पाई। दिल्ली के समीप के क्षेत्रों में लूट-पाटकर वे वापस चले गये। 1305 ई. में अलीबेग, तार्ताक एवं तार्गी के नेतृत्व में मंगोल अमरोहा तक आ गये। किंतु मलिक काफूर एवं गाजी मलिक ने मंगोलों को बुरी तरह पराजित किया।

अलाउद्दीन के शासनकाल में अंितम मंगोल आक्रमण 1307-1308 ई. में हुआ जब मंगोल इकबालमंद के नेतृत्व में सिंधु के पार आ गये। गाजी मलिक (गयासुद्दीन तुगलक) ने रावी नदी के किनारे मंगोलों को पराजित कर दिया। बार-बार असफलता से हतोत्साहित तथा दिल्ली के सुल्तान की कठोर कार्रवाइयों से भयभीत मंगोल उसके शासनकाल में फिर उपस्थित नहीं हुए जिससे उत्तर-पश्चिम सीमा एवं दिल्ली के लोगों ने चैन की साँस ली।

उत्तर-पश्चिम सीमा की सुरक्षा का उपाय

अलाउद्दीन ने बलबन की तरह अपने राज्य की उत्तर-पश्चिम सीमा की सुरक्षा के लिए कुछ प्रतिरक्षात्मक उपाय भी किये। उसने मंगोलों के रास्ते में पड़नेवाले पुराने दुर्गों की मरम्मत करवाई तथा नये दुर्गों का निर्माण करवाया। राजकीय सेना को मजबूत बनाया गया और उत्तम सुरक्षा के लिए समाना तथा दीपालपुर की सुदूरवर्ती चैकियों में रखवाली करनेवाली सेनाएँ रखीं, जो युद्ध के लिए सदैव तैयार रहती थीं। मंगोल आक्रमण से सुरक्षा के लिए अलाउद्दीन ने 1304 ई. में सीरी को अपनी राजधानी बनाया और उसकी किलेबंदी भी करवाई। 1305 ई. में गाजी मलिक तुगलक (बाद में गयासुद्दीन तुगलक) को सीमा-रक्षक नियुक्त किया गया, जिसने योग्यतापूर्वक मंगोलों को रोके रखा।

नव-मुस्लिमों का दमन

दिल्ली के निकट बसे हुए नव-मुस्लिम (नये मुसलमान) ने अलाउद्दीन की नीतियों से असंतुष्ट थे, क्योंकि अपनी अधिवास-भूमि में उनकी पद प्राप्त करने अथवा अन्य लाभों की उच्चाकांक्षाएँ पूरी नहीं हुईं। जब अलाउद्दीन की सेना गुजरात विजय कर लौट रही थी, तो इन नव-मुस्लिमों ने विद्रोह कर दिया। सुल्तान ने सभी नव-मुस्लिमों (नये मुसलमानों) को अपनी नौकरी से भी अलग कर दिया। इससे उनका असंतोष और भी बढ़ गया। निराश होकर उन्होंने सुल्तान की हत्या याजना बनाई, किंतु शीघ्र ही इस योजना का पता चल गया और सुल्तान ने उनके पूर्ण संहार का आदेश देकर भयंकर प्रतिशोध लिया। इस तरह एक ही दिन में लगभग बीस से तीस हजार नव-मुस्लिम (नये मुसलमान) निर्दयतापूर्वक कत्ल कर दिये गये।

सल्तनत का विस्तार

अलाउद्दीन को अपने शासनकाल के प्रारंभिक वर्षों में बराबर सफलता मिलती गई, जिससे उसका दिमाग ही फिर गया। वह अत्यंत असंभव योजनाएँ बनाने लगा तथा बिल्कुल बे-सिर-पैर की इच्छाएँ सँजोने लगा। उसने एक नया धर्म स्थापित करने और सिकंदर महान् की तरह विश्व-विजेता बनने की योजना बनाई। इन योजनाओं में उसने काजी अलाउल्मुल्क (इतिहासकार जियाउद्दीन बरनी के चाचा) से परामर्श लिया। अलाउल्मुल्क पहले कडा में उसका प्रतिनिधि था तथा उस समय दिल्ली का कोतवाल था। उसने तुरंत ही उसे उसकी योजनाओं की निःसारता को समझा दिया। पहली योजना के विषय में काजी अलाउल्मुलक ने कहा कि जब तक संसार कायम है, धर्म-प्रवर्तक के पद का कभी राजाओं से संबंध न हुआ है और न होगा ही, यद्यपि कुछ धर्मप्रवर्तकों ने राजकाज भी चलाया है। दूसरी योजना के विषय में उसने कहा कि अभी तो हिंदुस्तान का ही एक बड़ा भाग अविजित है, राज्य पर मंगोलों के आक्रमण का भय है और सुल्तान की अनुपस्थिति में राज्य चलानेवाला अरस्तू के समान कोई वजीर भी नहीं है। इस प्रकार सुल्तान को होश में लाया गया और उसने अपनी पागलपन से भरी योजनाओं का परित्याग कर दिया। फिर भी अलाउद्दीन ने ‘सिकंदर द्वितीय’ (सानी) की उपाधि धारण कर इसका उल्लेख अपने सिक्कों पर करवाया।

उत्तर भारत की विजयें

अलाउद्दीन खिलजी साम्राज्यवादी प्रवृति का सुल्तान था। इसके काल में भारत के विभिन्न भागों में मुस्लिम सत्ता का तीव्रता से विस्तार आरंभ हुआ, जो लगभग आधी शताब्दी तक चलता रहा। जहाँ एक ओर उसने उत्तर-भारत के राज्यों को जीतकर उन पर प्रत्यक्ष शासन किया, वहीं दूसरी ओर दक्षिण भारत के राज्यों को अपने अधीन कर उनसे वार्षिक कर वसूल किया और अपने प्रभाव-क्षेत्र का विस्तार किया।

गुजरात विजय

1297 ई. में अलाउद्दीन ने गुजरात राज्य को जीतने के लिए अपने भाई उलुग खाँ तथा वजीर नुसरत खाँ के अधीन एक सेना भेजी। गुजरात को कई बार लूटा गया था, किंतु यह अविजित ही रहा था। गुजरात का राजपूत बघेल शासक कर्णदेव द्वितीय (राजकरन) अहमदाबाद के निकट पराजित हुआ और अपनी पुत्री देवलदेवी के साथ भागकर देवगिरि के राजा रामचंद्रदेव के यहाँ शरण ली। सुल्तान की सेना ने सारे राज्य की रौद डाला और कर्णदेव की रूपवती रानी कमलादेवी को पकड़ लिया। आक्रमणकारियों ने सूरत, सोमनाथ और कैम्बे तक आक्रमण किया और गुजरात के समृ( बंदरगाहों को भी लूटा। यहीं पर नुसरत खाँ ने एक हिंदू हिजड़ा मलिक काफूर को एक हजार दीनार में खरीदा। लूट की विपुल संपत्ति, कमलादेवी और काफूर हिजड़े के साथ सेना दिल्ली लौट आई। अलाउद्दीन खिलजी ने बाद में कमलादेवी से विवाहकर उसे अपनी सबसे प्रिय रानी (मल्लिकाजहाँ) बना लिया। काफूर आगे चलकर राज्य का सबसे प्रभावशाली सरदार सिद्ध हुआ तथा अलाउद्दीन की मृत्यु के पहले और कुछ समय बाद तक सल्तनत का असली स्वामी भी बन बैठा।

रणथम्भौर विजयें

रणथम्भौर का दुर्ग, जो कुतुबुद्दीन ऐबक तथा इल्तुतमिश द्वारा जीता गया था, राजपूतों द्वारा छीन लिया गया था। यहाँ का शासक हम्मीरदेव अपनी योग्यता एवं साहस के लिए प्रसिद्ध था। उसने मुहम्मदशाह एवं केहब जैसे कुछ असंतुष्ट नव-मुस्लिमों (नये मुसलमानों) को शरण दे रखी थी, जिससे अलाउद्दीन क्रु( हो गया। 1299 ई. में सुल्तान ने अपने भाई उलुग खाँ तथा नुसरत खाँ के अधीन दुर्ग जीतने के लिए सेना भेजी। उन्होंने झाइन को जीतकर रणथम्भौर के सामने पड़ाव डाल दिया। किंतु राजपूतों ने शीघ्र ही उनको पराजित कर दिया और नुसरत खाँ एक पाशिब तथा एक गर्गज के निर्माण की देखभाल करते समय दुर्ग की मगरिबी (मंजनीक, ढेलमास) से छूटे हुए एक पत्थर से मारा गया। अपनी सेना की इस पराजय की खबर सुनकर अलाउद्दीन स्वयं रणथम्भौर की ओर बढ़ा। जब वह गढ़ की रास्ते में अपने कुछ अनुचरों के साथ तिलपत में शिकार कर रहा था, तभी उसके भतीजे आकत खाँ ने कुछ नये मुसलमानों के साथ मिलकर उस पर आक्रमण कर उसे घायल कर दिया। किंतु वह विश्वासघाती शीघ्र ही पकड़ लिया गया और अपने समर्थकों सहित मार डाला गया।

अलाउद्दीन रणथम्भौर के किले को एक वर्ष तक घेरा डालने के बाद जुलाई, 1301 ई. में बड़ी कठिनाई से जीत सका। हम्मीर देव तथा नये मुसलमानों को, जिन्हें उसने शरण दी थी, मार डाला गया। सुल्तान ने रनमल और उसके साथियों का भी वध करवा दिया, जो हम्मीरदेव से विश्वासघात करके उससे मिल गये थे। ‘तारीख-ए-अलाई’ एवं ‘हम्मीर महाकाव्य’ में हम्मीरदेव एवं उसके परिवार के लोगों का जौहर द्वारा मृत्यु को प्राप्त होने का वर्णन मिलता है।

जैसलमेर विजय

सेना के कुछ घोड़े चुराने के कारण सुल्तान खिलजी ने जैसलमेर के शासक दूदा एवं उसके सहयोगी तिलकसिंह को 1299 ई. में पराजित किया और जैसलमेर की विजय की।

मेवाड़ की विजय

अलाउद्दीन ने वीर गुहिल राजपूतों की भूमि मेवाड़ पर भी आक्रमण करने की योजना बनाई। उस समय मेवाड़ का राजा राणा रतनसिंह था, जिसकी राजधानी चित्तौड़ थी। चित्तौड़ का दुर्ग सामरिक दृष्टिकोण से बहुत सुरक्षित था, इसलिए यह किला अलाउद्दीन की निगाह में चढ़ा हुआ था। कुछ इतिहासकारों ने चित्तौड़ पर अलाउद्दीन के आक्रमण का कारण राणा रतनसिंह की अत्यंत रूपवती रानी पद्मिनी के प्रति उसका मोहित होना बताया है, किंतु इस तथ्य का किसी भी समकालीन इतिहास अथवा अभिलेख में स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता है। यह आक्रमण  संभवतः रणथम्भौर के विरूद्ध किये गये आक्रमण के समान सुल्तान की राज्य-विस्तार की महत्त्वाकांक्षी इच्छा का परिणाम था। राणा बंदी बनाकर सुल्तान के शिविर में ले जाया गया, किंतु राजपूतों ने वीरतापूर्वक उसे छुड़ा लिया। राजपूतों का एक छोटा-सा दल अपने दो वीर नायकों- गोरा तथा बादल- के अधीन चित्तौड़गढ़ के बाहरी द्वार पर आक्रमणकारियों को रोकता रहा, किंतु वे दिल्ली की शक्तिशाली सेना के सामने अधिक समय तक नहीं टिक सके। अंततः 28 जनवरी, 1303 ई. को सुल्तान चित्तौड़ के किले पर अधिकार करने में सफल हो गया। राणा रतनसिंह वीरगति को प्राप्त हुआ और उसकी पत्नी रानी पद्मिनी ने अन्य स्त्रियों के साथ जौहर कर लिया। अलाउद्दीन ने अपने पुत्र खिज्र खाँ को यहाँ का शासक नियुक्त किया और चितौड़ का नाम बदलकर खिज्राबाद कर दिया।

इसके बाद भी राजपूतों द्वारा चित्तौड़ को पुनः स्वतंत्र कराने के प्रयत्न किये जाते रहे। इसी बीच अलाउद्दीन ने खिज्र खाँ को वापस दिल्ली बुलाकर चित्तौड़ दुर्ग की जिम्मेदारी राजपूत सरदार मालदेव को सौंप दिया। अलाउद्दीन की मृत्यु के पश्चात् गुहिलौत राजवंश के हम्मीरदेव ने मालदेव पर आक्रमण कर 1321 ई. में चित्तौड़ सहित पूरे मेवाड़ को स्वतंत्र करवा लिया। इस तरह अलाउद्दीन की मृत्यु के बाद चित्तौड़ भी एक बार पुनः पूर्ण स्वतंत्र हो गया।

मालवा विजय

अलाउद्दीन ने चित्तौड़-विजय के बाद 1305 ई. में मुल्तान के सूबेदार आईन-उल-मुल्क के नेतृत्व में मालवा पर अधिकार करने के लिए एक सेना भेजी। मालवा के राजा महलक देव तथा इसके सेनापति हरनंद (कोका प्रधान) ने एक बड़ी सेना के साथ वीरतापूर्वक उसका सामना किया। किंतु नवंबर, 1305 ई. में वे हराकर मार डाले गये। सुल्तान का हाजिबे-खास (आत्मीय कर्मचारी) ऐनुल्मुल्क मालवा का शासक नियुक्त हुआ। इसके बाद सुल्तान की सेना ने उज्जैन, मांडू, धार एवं चंदेरी को जीत लिया।

जालौर की विजय

जालौर के शासक कान्हणदेव ने 1304 ई. में अलाउद्दीन की अधीनता को स्वीकार कर लिया था, किंतु धीरे-धीरे उसने अपने को पुनः स्वतंत्र कर लिया। 1305 ई. में कमालुद्दीन गुर्ग के नेतृत्व में सुल्तान की सेना ने कान्हणदेव को युद्ध में पराजित कर उसकी हत्या कर दी। इस प्रकार जालौर पर अधिकार के साथ ही अलाउद्दीन की राजस्थान-विजय का कठिन कार्य पूरा हुआ।

सिवाना पर अधिकार

1308 ई. में अलाउद्दीन ने सिवाना पर अधिकार करने के लिए आक्रमण किया। वहाँ के परमार राजपूत शासक शीतलदेव ने कड़ा संघर्ष किया, किंतु अंततः मारा गया। कमालुद्दीन गुर्ग को वहाँ का शासक नियुक्त किया गया। इस प्रकार 1305 ई. के अंत तक प्रायः समस्त उत्तरी भारत खिलजी साम्राज्य के अधीन हो गया।

उत्तर भारत की विजयों से अलाउद्दीन का मनोबल बढ़ गया और वह अपनी तुलना वह पैगम्बर मुहम्मद से करने लगा। उसने कहा कि जिस तरह से पैगम्बर के चार योद्धा हैं, उसी तरह मेरे भी उलूग खाँ, नुसरत खाँ, जाफर खाँ और अलप खाँ चार योद्धा हैं। वह सिकंदर से भी प्रभावित था और विश्व-विजय करना चाहता था, इसीलिए उसने अपने सिक्के पर उसने सिकंदर-ए-सानी का उपाधि को खुदवाया था। अब वह दक्षिण भारत (दक्कन) की विजय के बारे में सोचने लगा।

दक्षिण भारत में विजय अभियान

यद्यपि व्यापार के कारण भारत का पश्चिमी समुद्र-तट मुसलमानों के संपर्क में पहले से ही आ चुका था, फिर भी मुसलमानों द्वारा दक्कन की पहली विजय अलाउद्दीन के नेतृत्व में खिलजियों द्वारा ही हुई। वास्तव में अलाउद्दीन ने राजनैतिक एवं आर्थिक कारणों से दक्षिण पर आक्रमण किया था। उसके जैसे महत्त्वाकांक्षी शासक के लिए उत्तर पर अधिकार करने के पश्चात् दक्षिण पर अपना प्रभाव स्थापित करने का प्रयत्न करना स्वाभाविक ही था। दक्कन की संपत्ति भी एक साहसी योद्धा के लिए प्रलोभन की वस्तु थी।

विंध्य पर्वत के उस पार के भारत की तत्कालीन राजनैतिक अवस्था ने अलाउद्दीन को सैन्य-अभियान करने का अवसर प्रदान किया। उस समय दक्षिण भारत चार प्रमुख राज्यों में बँटा हुआ था। देवगिरि का यादव राज्य रामचंद्रदेव (1271-1309 ई.) जैसे योग्य शासक के अधीन था। पूर्व में तेलंगाना नामक प्रदेश काकतीय वंश के प्रताप रुद्रदेव प्रथम के अधीन था। इसकी राजधानी वारंगल (आंध्र प्रदेश) में थी। आधुनिक मैसूर (कर्नाटक) का क्षेत्र होयसलों के अधीन था। उस समय वहाँ का राजा वीर बल्लाल तृतीय (1292-1342 ई.) था। उनकी राजधानी द्वारसमुद्र (हलेविड) थी, जो सुंदर मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है। सुदूर दक्षिण में पांड्यों का राज्य था, जिसे मुस्लिम लेखक ‘माबर’ कहते हैं तथा जिसके अंतर्गत आधुनिक मदुरा, रामनद एवं टिनेवल्ली के जिले आते हैं। उस समय इस क्षेत्र पर मारवर्मन् कुलशेखर (1268-1311 ई.) शासन कर रहा था।

अनेक छोटे-छोटे राजा भी थे, जैसे तेलगु चोल राजा ममसिद्ध तृतीय नेलोर जिले में शासन करता था, गंग राजा भानुदेव उड़ीसा में शासन करता था, केरल राजा रविवर्मन् कोल्लम (क्विलन) से शासन करता था तथा आलप राजा बांकिदेव आलुपेंद्र मंगलौर में शासन कर रहा था।

दक्षिण के इन तमाम राज्यों में कोई आपसी एकता नहीं थी। जब 1294 ई. में अलाउद्दीन ने देवगिरि पर आक्रमण किया था, तो इनमें से किसी से रामचंद्रदेव की कोई सहायता नहीं की थी। यही नहीं, कभी-कभी तो होयसल राजा देवगिरि के रामचंद्रदेव पर आक्रमण भी कर दिया करते थे। दक्षिणी राज्यों के बीच की इसी आंतरिक कलह ने उत्तर के आक्रमणकारियों को आमंत्रित किया।

देवगिरि के यादव

अलाउद्दीन ने मार्च, 1307 ई. में काफूर के अधीन, जो अब राज्य का मलिक नायब (सेनाध्यक्ष) कहलाता था, एक सेना देवगिरि के रामचंद्रदेव के विरूद्ध भेजी, क्योंकि उसने पिछले तीन वर्षों से एलिचपुर प्रांत का कर देना बंद कर दिया था। इसके अलावा उसने गुजरात के भगोड़े शासक राय कर्णदेव द्वितीय को शरण भी दी थी। काफूर मालवा होता हुआ देवगिरि की ओर बढ़ा। उसने संपूर्ण देश को उजाड़ डाला, बहुत-सा धन लूटा तथा रामचंद्रदेव को संिध करने के लिए विवश किया। रायकर्ण की कन्या देवलदेवी को पकड़कर गुजरात का शासक अल्प खाँ दिल्ली ले गया, जहाँ वह सुल्तान के ज्येष्ठ पुत्र खिज्र खाँ के साथ ब्याह दी गई।

काफूर अपार धन-संपत्ति, ढेर सारे हाथी तथा राजा रामचंद्रदेव के साथ वापस दिल्ली आया। सुल्तान ने उसके साथ दयापूर्ण व्यवहार किया और ‘रायरायान’ की उपाधि दी। छः महीने बाद सुल्तान ने गुजरात की नवसारी जागीर एवं एक लाख स्वर्ण टंके देकर उसे अपने राज्य में वापस भेज दिया। उसके बाद से रामचंद्रदेव दिल्ली सल्तनत के सामंत के रूप में राज्य करता रहा तथा नियमित रूप से राजस्व दिल्ली भेजता रहा। जब मलिक काफूर द्वारसमुद्र विजय के लिए जा रहा था, तो रामचंद्रदेव ने उसकी भरपूर सहायता की।

तेलंगाना के काकतीय

1303 ई. में अलाउद्दीन ने काकतीय राजा प्रतापरुद्रदेव पर आक्रमण किया था, जो असफल रहा, किंतु यादवों के दर्प-दलन के पश्चात् उसने काकतीय राजा को अपने अधीन करने के लिए 1307 ई. में दूसरा प्रयत्न किया। सुल्तान वारंगल के राज्य को अपने साम्राज्य में मिलाना नहीं चाहता था, क्योंकि अधिक दूरी के कारण उस पर शासन करना एक कठिन कार्य सिद्ध होता। उसका मुख्य उद्देश्य इस राज्य का अपार धन प्राप्त करना तथा प्रतापरुद्रदेव से अपनी अधीनता स्वीकार करवाना था। अलाउद्दीन ने काफूर को आदेश दिया था कि ‘यदि राय अपना कोष, जवाहरात, हाथी और घोडे समर्पित करना तथा अगले वर्ष कोष एवं हाथी भेजना स्वीकार कर ले, तो मलिक नायब काफूर इन शर्तों को मान ले और राय को अधिक न दबाये।’

काफूर ने हीरों की खानों के जिले असीरगढ़ (मेरागढ़) के मार्ग से तेलंगाना में प्रवेश किया। देवगिरि के शासक रामचंद्रदेव ने काफूर की हर संभव सहायता की। जब काफूर की सेना तेलंगाना की ओर बढ़ रही थी, तब उसने उसे एक योग्य रसद-विभाग भी दिया। 1310 ई. में काफूर अपनी सेना के साथ तेललंगाना की राजधानी वारंगल पहुँच गया। प्रतापरुद्रदेव ने वारंगल के सुदृढ़ किले में अपने को बंदकर आक्रमणकारियों का प्रतिरोध करने की चेष्टा की। अंततः मार्च, 1310 ई. में काकतीय राजा ने अपनी सोने की मूर्ति बनवाकर गले में एक सोने की जंजीर डालकर आत्म-समर्पणस्वरूप काफूर के पास भेजा। उसने काफूर को एक सौ हाथी, सात हजार घोड़े तथा काफी जवाहरात और ढ़ले हुए सिक्के समर्पित किये तथा प्रतिवर्ष दिल्ली को कर भेजना भी स्वीकार कर लिया। इसी अवसर पर प्रतापरुद्रदेव ने मलिक काफूर को संसार-प्रसिद्ध कोहिनूर हीरा दिया था। काफूर कोष के बोझ से कराहते हुए एक हजार ऊँटों पर लूट का बहुत-सा माल लेकर दिल्ली लौट आया।

द्वारसमुद्र के होयसल

अपनी सफलताओं से उत्साहित अलाउद्दीन ने सुदूर दक्षिण के राज्यों को जीतने का निश्चय किया। ये राज्य अपने मंदिरों की विपुल संपत्ति के लिए विख्यात थे। 18 नवंबर, 1310 ई. को मलिक काफूर तथा ख्वाजा हाजी के अधीन दिल्ली से एक विशाल सेना होयसलों के राज्य के विरूद्ध चल पड़ी तथा देवगिरि होते हुए होयसलों की राजधानी द्वारसमुद्र पहुँची। 1311 ई. में एक साधारण युद्ध के पश्चात् होयसाल राजा वीर बल्लाल तृतीय ने हथियार डाल दिये और अलाउद्दीन की अधीनता ग्रहण कर ली। मलिक नायब ने अकूत संपत्ति तथा एक होयसाल युवराज को दिल्ली भेज दिया। सुल्तान अलाउद्दीन ने बल्लाल देव को ‘खिलअत’, एक मुकट, छत्र एवं दस लाख टंके की थैली भेंट की। अब होयसल दिल्ली सुल्तान के सामंत बन गये और माबर के अभियान में काफूर की सहायता भी किये।

मलाबार के पांड्य

द्वारसमुद्र में बारह दिनों तक ठहरने के पश्चात् मलिक नायब ने अपनी दृष्टि माबर देश की ओर डाली। पांड्य को माबर (मलाबार) के नाम से भी जाना जाता था। यह लगभग संपूर्ण कारोमंडल (चोलमंडल) तट एवं क्विलन से लेकर कुमारी अंतरीप तक फैला हुआ था। उस समय इस प्रदेश पर पांड्यों का शासन था। पांड्य राजा कुलशेखर के औरस पुत्र सुंदर पांड्य तथा उसके अवैध, किंतु प्रिय पुत्र वीर पांड्य के बीच होनेवाले सत्ता-संघर्ष से मलिक नायब को मदुरा पर आक्रमण करने का अवसर मिल गया। अपने पिता द्वारा पक्षपातपूर्वक वीर पांड्य के उत्तराधिकारी मनोनीत होने पर सुंदर पांड्य ने क्रु( होकर मई, 1310 के अंत में राजा की हत्या दी और राजमुकुट पर अधिकार कर लिया। किंतु उसी वर्ष नवंबर में वह अपने भाई से युद्ध में पराजित हो गया। सुंदर पांड्य ने मुसलमानों से सहायता माँगी।

मलिक काफूर एक विशाल सेना लेकर 14 अप्रैल, 1311 ई. को पांड्यों की राजधानी मदुरा पहुँच गया और पांड्यों के महत्त्वपूर्ण केंद्र ‘वीरथूल’ पर आक्रमण कर दिया। वीर पांड्य तो नहीं मिला, फिर भी नगर को बुरी तरह लूटा गया, जिसमें अमीर खुसरो के अनुसार पाँच सौ बारह हाथी, पाँच हजार घोड़े तथा पाँच सौ मन हीरे, मोती, पन्ना एवं लालमणि आदि विविध प्रकार के जवाहरात मिले। अमीर खुसरो के अनुसार काफूर रामेश्वरम् तक पहुँच गया था। संभवतः आर्थिक दृष्टि से यह काफूर का सर्वाधिक सफल अभियान था। 18 अक्टूबर, 1311 ई. को काफूर विपुल धन-संपत्ति के साथ दिल्ली लौटा, जिसमें छः सौ बारह हाथी, बीस हजार घोड़े, छियानबे हजार मन सोना, जवाहरात एवं मोतियों के कुछ संदूक थे। इस तरह मलाबार देश साम्राज्यवादियों के हाथ आ गया जो मुहम्मद तुगलक के शासनकाल के आरंभ तक दिल्ली सल्तनत के अधीन रहा।

1312 ई. में रामचंद्रदेव के पुत्र शंकरदेव ने दिल्ली सुल्तान को कर देना बंद कर दिया और पुनः स्वतंत्र होने का प्रयत्न करने लगा। इस पर मलिक नायब काफूर ने पुनः दिल्ली से जाकर शंकरदेव को हराकर मार डाला। फलतः संपूर्ण दक्षिण भारत को दिल्ली के सुल्तान की प्रभुता स्वीकार करनी पड़ी।

इस प्रकार अलाउद्दीन ने दिल्ली सल्तनत के अभूतपूर्व विस्तार का कार्य पूरा किया। खजायन-उल-फुतुह में खिलजी को विश्व का सुल्तान, युग का विजेता और जनता का चरवाहा कहा गया है। जोधपुर के एक अभिलेख में कहा गया है कि अलाउद्दीन खिलजी के देवतुल्य शौर्य से पृथ्वी अत्याचारों से मुक्त हो गई।

अलाउद्दीन खिलजी के शासनकाल के विद्रोह

अलाउद्दीन खिलजी के शासनकाल में कुछ विद्रोह भी हुए। 1299 ई. में ‘नवीन मुसलमानों’ द्वारा किये गये विद्रोह का दमन नुसरत खाँ ने किया। अलाउद्दीन के भतीजे आकत खाँ ने कुछ नये मुसलमानों के सहयोग से उस पर प्राण-घातक हमला किया, जिसके बदले में उसे पकड़कर मार दिया गया। अलाउद्दीन के भानजे उमर खाँ और मंजू खाँ, जो क्रमशः अवध एवं बदायूँ के गवर्नर थे, ने बलवा किया तो उनको पराजित कर उनकी हत्या कर दी गई। दिल्ली के हाजी मौला के षड्यंत्र का दमन हमीदुद्दीन ने किया। इस प्रकार अलाउद्दीन को सिंहासनच्युत् करने के निमित्त किये गये सभी षड्यंत्रों का सफलतापूर्वक शमन कर दिया गया।

अलाउद्दीन खिलजी का राजत्व-सिद्धांत

राजत्व एवं प्रभुसत्ता के संबंध में अलाउद्दीन के विचार उसके पूर्वगामियों के विचार से भिन्न थे। वह दिल्ली का प्रथम सुल्तान था जिसने स्पष्ट रूप से घोषणा की कि राजत्व रक्त-संबंध नहीं जानता। यद्यपि अलाउद्दीन ने खलीफा की सत्ता को स्वीकार कर ‘यामिन-उल-खिलाफत-नासिरी-अमीर-उल-मोमिनीन’ की उपाधि ग्रहण की, किंतुु उसने खलीफा से अपने पद की स्वीकृति लेनी आवश्यक नहीं समझी। उसने उलेमा वर्ग को भी अपने शासन-कार्य में हस्तक्षेप नहीं करने दिया। उसने अपने शासन में इस्लाम धर्म के सिद्धांतों को प्रमुखता न देकर राज्यहित को सर्वोपरि माना। उसने घोषणा की कि अपनी सरकार के राजनैतिक हित के लिए मैं बिना उलेमाओं के परामर्श के भी कार्य करूँगा। बियाना के काजी मुगीसुद्दीन से, जो धार्मिक वर्ग की प्रधानता का समर्थक था, उसने कहा, ‘मैं नहीं जानता कि यह वैध है अथवा अवैध। जो भी मैं राज्य के लिए हितकारी अथवा आपातकाल के लिए उचित समझता हूँ, वह आज्ञा दे देता हूँ।

किंतु अलाउद्दीन के इस दृष्टिकोण से यह अनुमान करना अनुचित होगा कि वह इस्लाम धर्म की अवहेलना करता था। भारत के बाहर वह इस्लाम के एक महान् प्रतिरक्षक के रूप में विख्यात था। भारत में इस विषय पर मतभेद था। बरनी एवं उसके शिष्यों के सदृश धर्म-परायणता के समर्थक उसके धर्म की उपेक्षा को अधिक महत्त्व देते हैं, जब कि अमीर खुसरो ने, जो एक सुसंस्कृत तथा सूक्ष्मदर्शी व्यक्ति था, उसे इस्लाम का समर्थक बताया है। अलाउद्दीन ने स्वयं काजी से कहा था ‘यद्यपि मैंने इल्म (विद्या) अथवा किताब (कुरान शरीफ) नहीं पढ़ी है, फिर भी मैं मुसलमान वंश का एक मुसलमान हूँ। अलाउद्दीन के स्मारक चिन्हों के अभिलेख भी यह स्पष्ट बताते हैं कि इस्लाम में उसकी आस्था नष्ट नहीं हुई थी।

विद्रोह-निरोधी अध्यादेश

अलाउद्दीन दृढ़-निश्चयी सुल्तान था जो प्रत्येक कार्य में संपूर्णता की नीति का अनुसरण करता था, ताकि केंद्र में एक शक्तिशाली सरकार स्थापित हो सके। सल्तनत के विभिन्न भागों में होनेवाले षड्यंत्रों के कारणों का अध्ययनकर उसने उन कारणों को समाप्त करने के लिए निरोधी-नियमों की एक संहिता (अध्यादेश) का निर्माण किया।

सर्वप्रथम उसने व्यक्तिगत संपत्ति की संस्था पर आघात किया। सभी दान, उपहार एवं पेंशन के रूप मे अमीरों को दी गई भूमि को जब्तकर उस पर अधिकाधिक कर लगाये गये और सभी गाँव जो मिल्कियत, इनाम एवं वक्फ में थे, जब्त कर लिये गये। बरनी लिखता है कि लोगों पर दबाव डाला जाता तथा उन्हें दंड दिया जाता था, हर तरह के बहाने से उनसे धन चूसा जाता था। बहुत लोगों के पास धन बिलकुल नहीं रह गया। अंत में अवस्था यहाँ तक आ पहुँची कि मलिकों तथा अमीरों, अधिकारियों, मुल्तानियों तथा महाजनों (बैंकरों) के अतिरिक्त किसी के पास अत्यंत छोटी रकम भी नहीं रही।

दूसरे, सुल्तान ने गुप्तचर विभाग को संगठित कर बरीद (गुप्तचर अधिकारी) एवं मुनहिन (गुप्तचर) जैसे कर्मचारियों को नियुक्त किया जो सुल्तान को प्रत्येक घटना की, यहाँ तक कि बाजारों में होनेवाले गपशप और लेनदेन जैसी अत्यंत साधारण बातों की भी, सूचना देतेे थे। सूचना देने की प्रणाली इस हद तक पहुँच गई थी कि सरदार बड़े-से-बड़े स्थानों में भी जोर से बोलने का साहस नहीं कर सकते थे और यदि उन्हें कुछ कहना होता, तो वे संकेतों के द्वारा ही भाव व्यक्त करते थे।

तीसरे, मादक शराब और औषधि तथा जुआ खेलने पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया। सुल्तान ने स्वयं मदिरापान का त्यागकर इसका दृष्टांत पेश किया। मदिरा के उसके सभी पात्र चकनाचूर कर दिये गये।

चौथे, सुल्तान ने सरदारों के आपसी मेल-जोल, सार्वजनिक-समारोहों एवं वैवाहिक-संबंधों पर प्रतिबंध लगा दिया। वे उसकी विशेष आज्ञा के बिना नहीं मिल सकते थे। यह नियम इतनी दृढ़ता से लागू किया गया कि भोज तथा अतिथि-सत्कार की प्रथा बिलकुल लुप्त हो गई।

अलाउद्दीन के प्रशासनिक सुधार

अपने पूर्वकालीन सुल्तानों की तरह अलाउद्दीन के पास भी कार्यपालिका, व्यवस्थापिका एवं न्यायपालिका की सर्वोच्च शक्तियाँ विद्यमान थीं। वह अपने को धरती पर ईश्वर का नायक या खलीफा होने का दावा करता था। वह प्रशासन के केंद्रीकरण में विश्वास करता था। उसने प्रांतों के सूबेदार तथा अन्य अधिकारियों को अपने पूर्ण नियंत्रण में रखा। उसने अपने को सदैव उलेमा के आदेशों से अलग रखा। मंत्रीगण अलाउद्दीन को सिर्फ सलाह देते व राज्य के दैनिक कार्य को सँभालते थे। अलाउद्दीन के समय में पाँच महत्त्वपूर्ण मंत्री थे, जो प्रशासन के कार्यों में महत्त्वपूर्ण स्थान रखते थे।

दीवान-ए-वजारत

मुख्यमंत्री को वजीर कहा जाता था। यह सर्वाधिक शक्तिशाली मंत्री होता था। बरनी के अनुसार ‘एक बु(िमान वजीर के बिना राजत्व व्यर्थ है’ तथा ‘सुल्तान के लिए एक बु(िमान् वजीर से बढ़कर अभियान और यश का दूसरा स्रोत नहीं है और हो भी नहीं सकता।’ वित्त के अतिरिक्त उसे सैनिक अभियान के समय शाही सेनाओं का नेतृत्व भी करना पड़ता था। अलाउद्दीन ने वजीर पद अपने सैनिक अधिकारियों को सौंपा। उसके शासनकाल में ख्वाजा खातिर, ताजुद्दीन काफूर, नुसरत खाँ आदि वजीर के पद पर कार्य कर चुके थे।

आरिज-ए-मुमालिक

दीवान-ए-आरिज युद्धमंत्री व सैन्य-मंत्री होता था। यह वजीर के बाद दूसरा महत्त्वपूर्ण मंत्री होता था। इसका मुख्य कार्य सैनिकों की भर्ती करना, उन्हें वेतन बाँटना, सेना की दक्षता एवं साज-सज्जा की देखभाल करना, युद्ध के समय सेनापति के साथ युद्ध क्षेत्र में जाना आदि था। अलाउद्दीन के शासन में मलिक नासिरुद्दीन मुल्क सिराजुद्दीन आरिज-ए-मुमालिक के पद पर नियुक्त था। उसका उपाधिकारी ख्वाजा हाजी नायब आरिज था। अलाउद्दीन अपने सैनिकों के प्रति सहदयता की नीति अपनाता था।

दीवान-ए-इंशा

यह राज्य का तीसरा महत्त्वपूर्ण विभाग होता था, जिसका प्रधान दबीर-ए-खास या दबीर-ए-मुमलिकात था। उसका महत्त्वपूर्ण कार्य शाही उद्घोषणाओं एवं पत्रों का प्रारूप तैयार करना तथा प्रांतपतियों एवं स्थानीय अधिकारियों से पत्र-व्यवहार करना होता था। इसके सहायक सचिव को ‘दबीर’ कहा जाता था।

दीवान-ए-रसालत

यह राज्य का चौथा मंत्री होता था। इसका संबंध मुख्यतः विदेश विभाग एवं कूटनीतिक पत्र-व्यवहार से होता था। यह पड़ोसी राज्यों को भेजे जानेवाले पत्रों का प्रारूप तैयार करता था और साथ ही विदेशों से आये राजदूतों से नजदीक का संपर्क बनाये रखता था। कुछ इतिहासकारों के अनुसार यह धर्म से संबंधित विभाग था।

नये विभागों की स्थापना

अलाउद्दीन खिलजी ने दो नये विभागों दीवान-ए-मुस्तखराज एवं दीवान-ए-रिसायत की स्थापना की। दीवान-ए-मुस्तखराज आर्थिक मामलों से संबंधित था जो राजस्व अधिकारियों के बकाये की जाँच करता था और उसकी वसूली करता था, जबकि दीवान-ए-रिसायत व्यापारी वर्ग पर नियंत्रण रखता था।

इसके अतिरिक्त सचिव जैसे कुछ अन्य अधिकारी भी होते थे। सुल्तान के अंगरक्षकों के मुखिया को सरजानदार कहा जाता था। राज महल के कार्यों की देख-रेख करनेवाला मुख्य अधिकारी वकील-ए-दर होता था। इनके अतिरिक्त राजमहल के कुछ अन्य अधिकारी अमीर-ए-आखूर, शहना-ए-पील, अमीर-ए-शिकार, शराबदार, मुहरदार आदि होते थे। अलाउद्दीन ने बाजार व्यवस्था के कुशल संचालन हेतु कुछ नये पदों को भी सृजित किया। ‘शहना-ए-मंडी’ बाजार का दरोगा होता था। ‘मुहतसिब’ जनसाधारण के आचरण का रक्षक और माप-तौल का निरीक्षण करता था।

न्याय प्रशासन

न्याय का उच्च स्रोत एवं उच्चतम् अदालत सुल्तान स्वयं होता था। सुल्तान के बाद सद्र-ए-जहाँ या काजी-उल-कुजात होता था, जिसके नीचे नायब काजी या अदल कार्य करते थे। इनकी सहायता के लिए मुफ्ती होते थे। अमीर-ए-दाद नाम का अधिकारी दरबार में ऐसे प्रभावशाली व्यक्तित्व को प्रस्तुत करता था, जिस पर काजियों का नियंत्रण नहीं होता था।

पुलिस एवं गुप्तचर

अलाउद्दीन ने अपने शासनकाल में पुलिस एवं गुप्तचर विभाग को प्रभावशाली ढंग से उपयोग किया। कोतवाल पुलिस विभाग का प्रमुख अधिकारी होता था। पुलिस विभाग को और अधिक क्रियाशील बनाने के लिए अलाउद्दीन ने एक नये पद दीवान-ए-रिसायत का गठन किया, जो व्यापारी वर्ग पर नियंत्रण रखता था। शहना व दंडाधिकारी भी पुलिस विभाग से संबंधित अधिकारी थे। मुहतसिब’सेंसर अधिकारी होता था, जो जन-सामान्य के आचरण की देखभाल करता था।

अलाउद्दीन द्वारा स्थापित गुप्तचर विभाग का प्रमुख अधिकारी बरीद-ए-मुमालिक होता था। उसके नियंत्रण में बरीद (संदेश-वाहक) कार्य करते थे। बरीद के अतिरिक्त अन्य सूचनादाता को मुहनियन कहा जाता था। मुहनियन लोगों के घरों में प्रवेश करके गौण अपराधों को रोकते थे। वस्तुतः इन्हीं अधिकारियों के कारण ही अलाउद्दीन की बाजार-नियंत्रण नीति सफल हो सकी थी।

डाक पद्धति

अलाउद्दीन द्वारा स्थापित डाक-चैकियों पर कुशल घुड़सवारों एवं लिपिकों को नियुक्त किया जाता था, जो राज्य भर में समाचार पहुँचाते थे। इनके द्वारा विद्रोहों एवं युद्ध अभियानों के संबंध में सूचनाएँ शीघ्रता से मिल जाती थी।

सैनिक-प्रबंध

अलाउद्दीन खिलजी ने आंतरिक विद्रोहों दमन करने, बाहरी आक्रमणों का सफलतापूर्वक सामना करने एवं साम्राज्य-विस्तार हेतु एक विशाल, सुदृढ़ एवं स्थायी सेना का गठन किया। स्थायी सेना को गठित करने वाला अलाउद्दीन दिल्ली का पहला सुल्तान था। उसने सेना का केंद्रीकरण किया और साथ ही सैनिकों की सीधी भर्ती एवं नकद वेतन देने की प्रथा शुरू की। उसकी सेना में घुड़सवार, पैदल सैनिक एवं हाथी सैनिक थे। इनमें घुड़सवार सैनिक सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण थे। अमीर खुसरो के वर्णन से पता चलता है कि दस हजार सैनिकों की टुकड़ी को ‘तुमन’ कहा जाता था। उसने घोड़ों को दागने एवं सैनिकों के हुलिया लिखे जाने के संबंध में नया नियम बनाया। दीवान-ए-आरिज प्रत्येक सैनिक की नामावली एवं हुलिया रखता था। फरिश्ता के अनुसार अलाउद्दीन के पास लगभग 4 लाख 75 हजार सुसज्जित एवं वर्दीधारी सैनिक थे। भलीभाँति जाँच-परख कर भर्ती किये जानेवाले सैनिक को ‘मुर्रत्तव’ कहा जाता था। ‘एक अस्पा’ (एक घोड़ेवाले) सैनिक को प्रतिवर्ष 234 टंका तथा ‘दो अस्पा’ (दो घोड़ेवाले) को प्रतिवर्ष 378 टंका वेतन दिया जाता था।

भू-राजस्व सुधार

अलाउद्दीन ने राजकीय आय में वृद्धि एवं मध्यस्थों के अंत तथा धन के संकेंद्रण को रोकने के उद्देश्य से भू-राजस्व के क्षेत्र में सुधार किये। उसने सर्वप्रथम मिल्क, इनाम एवं वक्फ के अंतर्गत दी गई भूमि को वापस लेकर उसे खालसा भूमि में बदल दिया और खूतों, मुकदमों आदि लगान अधिकारियों के विशेषाधिकार को समाप्त कर दिया। ग्रामीण क्षेत्रों में मध्यस्थ वर्ग में खुत, मुकद्दम, चौधरी को किस्मत-ए-खुती के रूप में, हकूक-ए-खुती के रूप में भू-राजस्व का 10 प्रतिशत प्राप्त होता था जिसे अलाउद्दीन खिलजी ने रद्द कर दिया। साथ ही उन्हें अपनी भूमि पर भू-राजस्व नहीं देना पड़ता था। अलाउद्दीन खिलजी ने उनकी भूमि की माप कराई और उस पर भी भू-राजस्व का निर्धारण किया। सुल्तान उनकी अवस्था इतनी दयनीय बना देना चाहता था कि उनके लिए अस्त्र-शस्त्र रखना, घोडे पर चढ़ना, अच्छे वस्त्र धारण करना अथवा जीवन के किसी अन्य सुख का उपभोग करना असंभव हो जाए। इससे इनकी दशा इतनी खराब हो गई कि बरनी कहता है कि अब वे अरबी घोड़े पर नहीं चलते थे और पान नहीं खाते थे। कोई भी अपना सिर ऊपर उठाकर नहीं रख सकता था तथा उनके घरों में सोने, चाँदी, टंका, जीतल या किसी फालतू चीज का कोई चिन्ह नहीं रह गया था…दरिद्रता के कारण खेतों या खुतों एवं मुकद्दमों की स्त्रियाँ मुसलमानों के घर जाकर चैका-बर्तन किया करती थी।

अलाउद्दीन पहला मुस्लिम शासक था जिसने भूमि की पैमाइश कराकर (मसाहत) उसकी वास्तविक आय पर लगान लेना निश्चित किया। अलाउद्दीन प्रथम सुल्तान था, जिसने भूमि माप के लिए एक ‘विस्वा’ को एक इकाई माना। भूमि-मापन की एक एकीकृत पद्धति अपनाई गई और सबसे समान रूप से कर लिया गया। सबसे पहले दोआब क्षेत्र में भूमि की माप कराई गई और मध्यस्थों का अंत किया गया। इसका परिणाम यह हुआ कि धीरे-धीरे जमींदार कृषकों की स्थिति में आ गये।

अलाउद्दीन खिलजी ने नये सिरे से दोआब क्षेत्र में कर का निर्धारण किया और भू-राजस्व की राशि कुल उत्पादन का 50 प्रतिशत निर्धारित किया। लगान को अन्न के रूप में वसूलने को महत्त्व दिया जाता था। उसनेे दो नवीन कर भी लगाये, जैसे- चराई कर, जो दुधारू पशुओं पर लगाया गया था और चरी कर, जो घरों एवं झोपड़ी पर लगाया गया था। करही नाम के एक कर का भी उल्लेख मिलता है। जजिया कर गैर-मुस्लिमों से वसूला जाता था। खम्स कर 4/5 भाग राज्य के हिस्से में तथा 1/5 भाग सैनिकों को मिलता था। जकात केवल मुसलमानों से लिया जाने वाला एक धार्मिक कर था, जो संपति का 40वाँ हिस्सा होता था।

राजस्व संग्रह के लिए सभी वंशानुगत कर-निर्धारक तथा कर-संग्राहक एक ही कानून के अंतर्गत लाये गये। दीवान-ए-मुस्तखराज नामक एक नये विभाग की स्थापना की गई जो राजस्व एकत्रित करनेवाले अधिकारियों के बकाया राशि की जाँच करने और उसे वसूलने का कार्य करता था। इस नियम को सुल्तान के नायब वजीर शर्फ काई तथा उसके अन्य अधिकारियों ने इतनी दृढ़ता से लागू किया कि लोग राजस्व-विभाग के अधिकारियों को ज्वर से भी बुरा समझने लगे। मुंशीगीरी महान् अपराध बन गई और कोई भी मनुष्य अपनी कन्या को किसी मुंशी (क्लर्क) के हाथ नहीं सौंपता चाहता था।

अलाउद्दीन खिलजी की बाजार-नियंत्रण नीति

अलाउद्दीन खिलजी की आर्थिक नीति के संबंध में जियाउद्दीन बरनी की कृति तारीखे-फिरोजशाही से व्यापक जानकारी मिलती है। अमीर खुसरो की पुस्तक ‘खजाइनुल-फुतूह’, इब्नबतूता की पुस्तक ‘रेहला’ एवं इसामी की पुस्तक ‘फुतूह-उस-सलातीन’ से भी उसके मूल्य-नियंत्रण के बारे में थोड़ी बहुत सूचना मिलती है।

बाजार-नियंत्रण नीति का उद्देश्य

अलाउद्दीन के बाजार-व्यवस्था के पीछे के कारणों को लेकर भी इतिहासकारों में मतभेद है। अलाउद्दीन का समकालीन इतिहासकार बरनी कहता है कि ‘इन सुधारों के क्रियान्वयन के पीछे मूलभूत उद्देश्य मंगोल लोगों के भीषण आक्रमण का मुकाबला करने के लिए एक विशाल एवं शक्तिशाली सेना तैयार करना था।’ फरिश्ता के अनुसार सुल्तान के पास लगभग 50,000 दास थे, जिन पर अत्यधिक खर्च होता था। इन तमाम खर्चों को दृष्टि में रखते हुए अलाउद्दीन ने नई आर्थिक नीति का निर्माण किया था। दूसरी तरफ सक्सेना, निजामी और इरफान हबीब जैसे इतिहासकारों का मानना है कि सामान्य जनता की आवश्यकता को ध्यान में रखकर इसे लागू किया गया था और बरनी भी अपने दूसरे ग्रंथ फतवा-ए-जहाँदारी में इसे जनता की आवश्यकताओं से प्रेरित मानता है। अमीर खुसरो बताता है कि ‘सुल्तान ने इन सुधारों को जनकल्याण की भावना से लागू किया था।’ वस्तुतः अलाउद्दीन को अपने साम्राज्य-विस्तार की महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए एवं निरंतर हो रहे मंगोल आक्रमणों से निपटने के लिए एक विशाल शक्तिशाली सेना की आवश्यकता थी। ऐसे समय में, जब  दक्षिण के धन-प्रवाह से मुद्रा का मूल्य घट गया, वस्तुओं के दाम बढ़ गये तो अलाउद्दीन ने आर्थिक क्षेत्र में सुधार कर बाजार-नियंत्रण व्यवस्था को लागू किया।

अलाउद्दीन का मूल्य-नियंत्रण केवल दिल्ली भू-भाग में लागू था या फिर पूरी सल्तनत में, यह प्रश्न विवादास्पद है। मोरलैंड एवं के.एस. लाल ने मूल्य-नियंत्रण केवल दिल्ली में लागू होने की बात कही है, परंतु बनारसी प्रसाद सक्सेना ने इस मत का खंडन किया है।

अलाउद्दीन सैनिकों का वेतन बढ़ाना नहीं चाहता था, क्योंकि इससे राज्य के साधनों पर अधिक भार पड़ता। परंतु सैनिकों को परिमित वेतन पर जीवित रखने के उद्देश्य से उसने कुछ राजाज्ञाएँ निकाली, जिनके द्वारा जीवन की अत्यावश्यक वस्तुओं से लेकर विलास की वस्तुओं, जैसे- दासों, अश्वों, हथियारों, सिल्क और दैनिक सामग्री तक, सभी चीजों के मूल्य निश्चित कर दिये गये और आपूर्ति एवं माँग के नियम को यथासंभव व्यवस्थित कर दिये गये। सुल्तान ने हर सैनिक का वेतन प्रतिवर्ष 2, 3, 4 टंका तथा दो घोड़े रखनेवाले के लिए 78 टंका निश्चित कर दिया। उसने एक अधिनियम द्वारा दैनिक उपयोग की वस्तुओं का मूल्य निश्चित कर दिया। कुछ महत्त्वपूर्ण अनाजों का मूल्य इस प्रकार था- गेहूँ 7.5 जीतल प्रति मन, चावल 5 जीतल प्रति मन, जौ 4 जीतन प्रति मन, उड़द 5 जीतल प्रति मन, मक्खन या घी 1 जीतल प्रति 5/2 किलो।

तीन प्रकार के बाजार

अलाउद्दीन खिलजी की बाजार-व्यवस्था उत्पादन-लागत की प्रगतिशील पद्धति पर काम करती थी और इसके अंतर्गत तीन प्रकार के बाजार स्थापित किये गये।

1. शहना-ए-मंडी

खाद्यान्नों की बिक्री हेतु शहना-ए-मंडी नामक बाजार की स्थापना की गई। राशन व्यवस्था’ के अंतर्गत अनाज को पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध कराने के लिए सुल्तान ने दोआब क्षेत्र एवं राजधानी के चतुर्दिक खालसा गाँवों में भूमिकर नकद के बदले अन्न के रूप में लिया जाने लगा, जबकि पूर्वी राजस्थान के झाइन क्षेत्र से आधी मालगुजारी अनाज में और आधी नकद रूप में वसूल की जाती थी। अकाल या बाढ़ के समय अलाउद्दीन प्रत्येक घर को प्रति आधा मन अनाज देता था। राशनिंग व्यवस्था अलाउद्दीन की नई सोच थी। अनाजों को दिल्ली नगर की राजकीय अन्न-शालाओं (राजकीय गोदामों) में संचित किया जाता था ताकि आवश्यकता के समय इसे बाजारों में भेजा जा सके। अन्न का कोई भी व्यक्तिगत रूप में संचय नहीं कर सकता था। मुख्य अनाजों की बिक्री सहना नामक अधिकारी के नियंत्रण में थी और सबके ऊपर एक शहना-ए-मंडी होता था। मलिक-कबूल को अलाउद्दीन ने खाद्यान्न बाजार का शहना-ए-मंडी नियुक्त किया था।

2. सराय-ए-अदल

यह मुख्यतः कपड़े का बाजार था जहाँ वस्त्र, शक्कर, जड़ी-बूटी, मेवा, दीपक जलाने का तेल एवं अन्य निर्मित वस्तुएँ बिकने के लिए आती थी। इस बाजार के माध्यम से अमीरों को बेशकीमती कपड़े उपलब्ध कराये जाते थे। एक निश्चित दाम पर अमीरों को वे कपड़े प्राप्त हों, इसलिए राज्य मुलतानी व्यापारियों को राजकीय सहायता देता था। सराय-ए-अदल का निर्माण बदायूँ के समीप एक बड़े मैदान में किया गया था। इस बाजार में एक टंके से लेकर 10,000 टंके मूल्य की वस्तुएँ बिकने के लिए आती थीं। सराय-ए-अदल का मुख्य अधिकारी रायपरवाना कहलाता था।

3. घोड़े, मवेषियों एवं दासियों का बाजार

पशुओं की खरीद-बिक्री में दलालों के कारण पशुओं का मूल्य बढ़ जाता था। दलालों को पशुओं के बाजार से बाहर कर दिया गया। सभी पशुओं की कीमतें निर्धारित कर दी गईं, जैसे-अच्छे किस्म के घोड़े की कीमत 120 टंका थी और एक साधारण टट्टू की कीमत 10 टंका थी।

बाजार-नियंत्रण के प्रमुख अधिकारी
दीवान-ए-रियासत

अलाउद्दीन के बाजार-नियंत्रण की पूरी व्यवस्था का संचालन दीवान-ए-रियासत नाम का विभाग करता था। दीवान-ए-रियासत का प्रधान मलिक याकूब को बनाया गया और शहना-ए-मंडी के पद पर मलिक काबुल को नियुक्त किया गया। उसके नीचे काम करने वाले कर्मचारी वस्तुओं के क्रय-विक्रय एवं व्यवस्था का निरीक्षण करते थे। दिल्ली में आकर व्यापार करने वाले प्रत्येक व्यापारी को दीवान-ए-रियासत’में अपना नाम लिखवाना पड़ता था। मूल्य नियंत्रण को सफलतापूर्वक लागू करवाने के लिए मुहतसिब (सेंसर) एवं नाजिर (नजीर के विभाग, माप-तौल अधिकारी) की भी नियुक्ति की गई थी।

शहना-ए-मंडी

प्रत्येक बाजार का अधीक्षक जिसे शहना-ए-मंडी कहा जाता था, जो बाजार का उच्च अधिकारी होता था। उसके अधीन बरीद (राजकीय गुप्तचर) होते थे, जो बाजार के अंदर घूम-घूमकर बाजार का निरीक्षण करते थे और सुल्तान को बाजार-व्यवस्था के संबंध में सूचनाएँ देते रहते थे। बरीद के नीचे मुनहियान (व्यक्तिगत गुप्तचर) कार्य करते थे। इस प्रकार तीन भिन्न स्रोतों से सुल्तान को सूचनाएँ मिलती रहती थीं।

व्यापारियों को अपना नाम एक सरकारी दफ्तार में रजिस्ट्री कराना पड़ता था। उन्हें अपनी सामग्री को बेचने के लिए बदायूँ द्वार के अंदर सराय-अदल नामक एक खुले स्थान पर ले जाने की प्रतिज्ञा करनी पड़ती थी। उन्हें अपने आचरण के लिए पर्याप्त जामिन (जमानत) देना पड़ता था। सुल्तान के नियमों का उल्लंघन करने पर कठोर दंड की व्यवस्था थी। दुकानदारों द्वारा हल्के बटखरों का व्यवहार रोकने के लिए यह आज्ञा थी कि वजन जितना कम हो, उतना ही मांस उनके शरीर से काट लिया जाए। बरनी बाजार व्यवस्था की बड़ी प्रशंसा करता है और मानता है कि मूल्य-नियंत्रण पूरी तरह सफल रहा। मूल्यों में आधे जीतल से अधिक का अंतर भी कभी नहीं आया।

सांस्कृतिक उपलब्धियाँ

सुल्तान के शासनकाल में अमीर खुसरो तथा हसन निजामी जैसे उच्चकोटि के विद्वानों को राजकीय संरक्षण प्राप्त था। बरनी लिखता है की अलाउद्दीन का विद्या से परिचय नहीं था, परंतु फरिश्ता के अनुसार सुल्तान ने गद्दी पर बैठने के बाद फारसी सीखी थी। सुल्तान भवन निर्माण एवं विद्या का प्रेमी था। उसकी आज्ञा से अनेक दुर्ग बने। इनमें सबसे प्रसिद्ध था- वृत्ताकार अलाई किला अथवा कोशके-सीरी (कुश्के-सीरी), जिसकी दीवारे पत्थर, ईंट तथा चूने की बनी थीं और जिसमें सात द्वार थे। यह प्रारंभिक तुर्की कला का एक श्रेष्ठ नमूना माना जाता है। अमीर खुसरो के अनुसार उसने कई नष्ट हो चुकीं मस्जिदों का पुनः निर्माण करवाया था। उसने 1311 ई. में कुतुब को बढ़ाने तथा उस मस्जिद के प्रांगण में पुरानी कुतुबमीनार से ऊँची एक नई मीनार बनवाने का कार्य आरंभ करवाया, किंतु वह उसके जीवनकाल में पूरा नहीं हो सका। 1311 ई. में ही उसने लाल बलुआ पत्थर एवं संगमरमर की मस्जिद के लिए विशाल द्वार भी बनवाया, जिसके चारों ओर छोटे-छोटे द्वार बने थे।

साम्राज्यवादी निरंकुश शासक

अलाउद्दीन इतिहास में अपने साम्राज्यवादी कार्यों के लिए विख्यात है। वह एक साहसी एवं योग्य सैनिक था। उसने अपने शासनकाल के आरंभ में शासक के रूप में भी अदभुत पराक्रम दिखाया। उसके समय के प्रायः सभी सैनिक अभियान सफल रहे। वह बलबन के सैनिकवादी आदर्श को न्यायोचित सीमा तक ले गया। पहली बार पुरोहित वर्ग के प्रभाव और मार्ग-प्रदर्शन से मुक्त होकर राज्य करने का श्रेय उसे ही प्राप्त है। वह किसी भी मूल्य पर अपना शासन सबल बनाना चाहता था।

अलाउद्दीन एक निरंकुश सुल्तान था, उसकी महत्त्वाकांक्षाएँ असीम तथा अनियंत्रित थीं। उसके तरीके सिद्धांत-शून्य थे। बरनी लिखता है कि फिरऔन जितना निरपराध रक्त बहाने के लिए दोषी ठहराया गया, उससे भी अधिक निरपराध रक्त अलाउद्दीन ने बहाया। जलालुद्दीन फीरोज का दुःखपूर्ण अंत, मृत सुल्तान के संबंिधयों के साथ उसका क्रूर व्यवहार तथा नये मुसलमानों के प्रति उसकी निर्दयतापूर्ण कार्रवाइयाँ, जिनमें उनकी स्त्रियों और बच्चों को भी नहीं छोड़ा गया, सुल्तान के कठोर स्वभाव के प्रमाण हैं। वह अत्यंत संदेही तथा ईष्र्यालु था। कभी-कभी वह उनसे भी कृतघ्नता का व्यवहार करता था, जिनसे उसे भारी सहायता मिली रहती थी, जैसे- गद्दी पर बैठने के बाद उसने बहुत-से वैसे सरदारों को अपने धन एवं घरों से वंचित कर दिया, जिन्होंने उसका पक्ष लिया था। उसने उन्हें बंदीगृहों में भेज दिया तथा कुछ को अंधा कर मरवा डाला। सुल्तान अपने ही सेनापति जफर खाँ की वीरता से ईष्र्या करने लगा था। जब मंगोलों ने उसे मार डाला, तब उसके स्वामी को असंतोष हुआ की बिना अपमनित हुए ही उससे छुटकारा मिल गया।

अलाउद्दीन खिलजी की नीतियों के दुष्परिणाम

किंतु अलाउद्दीन खिलजी ने जिस सैनिक राजतंत्र के निर्माण का प्रयत्न किया उसकी नींव बालू पर रखी गई थी। ऊपर से तो उसकी कठोरता के कारण यह सबल दिखलाई पड़ा, परंतु इससे दमित सरदारों तथा अपमानित नायकों के मन में असंतोष का भाव पैदा हुआ। वे स्वाभाविक रूप से अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा एवं शक्ति पुनः प्राप्त करने के अवसरों की प्रतीक्षा करते रहे। उसकी प्रणाली का एक बड़ा दोष यह था कि यह शासित वर्ग का स्वेच्छापूर्वक समर्थन तथा शुभकामनाएँ प्राप्त न कर सका, जो किसी भी सरकार की सुरक्षा के लिए आवश्यक है। इसका अस्तित्व इसके निर्माता के प्रबल व्यक्तित्व पर निर्भर था। इसके नाश के लक्षण सुल्तान के ही अंतिम दिनों में ही परिलक्षित होने लगे तथा उसकी मृत्यु के बाद कुछ ही समय के भीतर पूर्णरूप से प्रकट हो गये। अपने चाचा के प्रति की गई कृतघ्नता का एक उचित प्रतिशोध उसके परिवार पर आ पड़ा और इसकी शक्ति एवं प्रतिष्ठा का नाश उसी ने किया, जिसमें सुल्तान की अत्याधिक आस्था थी। वह था उसका अपना ही दुलारा विश्वासपात्र सेनापति मलिक काफूर।

मलिक काफूर के कहने पर अलाउद्दीन ने अपने पुत्र खिज्र खाँ को उत्तराधिकारी न बनाकर अपने अल्पवयस्क पुत्र शिहाबुद्दीन उमर को उत्तराधिकारी नियुक्त कर दिया। जलोदर रोग से ग्रसित अलाउद्दीन खिलजी को अंतिम समय अत्यंत कठिनाई में बीते और 5 जनवरी, 1316 ई. को उसकी मृत्यु हो गई। अलाउद्दीन की मृत्यु के बाद काफूर ने शिहाबद्दीन को सुल्तान बनाकर शासन-सत्ता पर अधिकार कर लिया। अब मलिक काफूर स्वयं सुल्तान बनने का सपना देखने लगा। कुछ समय बाद उसने स्वयं सुल्तान बनने की इच्छा से उसने अलाउद्दीन के सभी पुत्रों को बंदी बनाकर उन्हें अंधा करना आरंभ कर दिया। अलाउद्दीन का एक पुत्र मुबारक खिलजी किसी तरह बंदीगृह से भाग निकलने में सफल हो गया। अंततः लगभग 35 दिन के सत्ता-उपभोग के बाद मलिक काफूर की हत्या कर दी गई।

कुतुबुद्दीन मुबारकशाह खिलजी (फरवरी, 1316-15 अप्रैल, 1320 ई.)

काफूर की हत्या के बाद मुबारकशाह खिलजी स्वयं सुल्तान शिहाबुद्दीन का संरक्षक बन गया। बाद में उसने अपने छोटे भाई को अंधा कर दिया और कुतुबद्दीन मुबारकशाह खिलजी के नाम से स्वयं सुल्तान बन गया। इसके शासनकाल में राज्य में प्रायः शांति बनी रही। मुबारकशाह खिलजी ने ‘अल इमाम’, ‘उल इमाम’ एवं ‘खिलाफत-उल्लाह’ जैसी उपाधियाँ धारण की। उसने अपने को इस्लाम धर्म का सर्वोच्च धर्माधिकारी और ‘अल-वासिक-बिल्लाह’ (स्वर्ग तथा पृथ्वी के अधिपति का खलीफा) घोषित किया।

देवगिरि तथा गुजरात की विजय

कुतुबुद्दीन मुबारकशाह खिलजी ने लगभग चार वर्ष तक शासन किया। उसके शासनकाल में गुजरात तथा देवगिरि के अतिरिक्त सारे देश में शांति रही। मुबारक ने वारंगल के शासक प्रताप रूद्रदेव के क्षेत्र पर भी आक्रमण और खुसरव खाँ को माबर (मदुरा) के क्षेत्र पर आक्रमण का आदेश दिया। गुजरात में वहाँ के सूबेदार जफर खाँ, जो मुबारक खिलजी का ही ससुर था, ने विद्रोह कर दिया। मुबारक खिलजी ने उसका बलपूर्वक दमन कर दिया। इसी प्रकार देवगिरि के शासक हरगोपाल देव ने भी विद्रोह किया। उसका विद्रोह कुछ अधिक शक्तिशाली था, इसलिए मुबारक खिलजी ने उसके विरूद्ध एक बड़ी सेना का नेतृत्व स्वयं किया। हरगोपाल देव ने भागने की चेष्टा की, किंतु वह पकड़ा गया और मारा गया। उसने देवगिरि में एक विशाल मस्जिद बनवाई और दिल्ली लौट आया। उसकी इन विजयों के अतिरिक्त अन्य किसी भी विजय का वर्णन नहीं मिलता है।

मुबारकशाह खिलजी के सुधार-कार्य

शासन के प्रारंभिक काल में कुतुबुद्दीन मुबारक खिलजी ने कुछ लोकप्रिय कार्य किये। उसने राजनीतिक बंदियों को रिहा किया और अपने सैनिकों को छः माह का अग्रिम वेतन देना प्रारंभ किया। विद्वानों एवं महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों की छीनी गई सभी जागीरें उन्हें वापस कर दी गईं। अलाउद्दीन खिलजी की कठोर दंड-व्यवस्था एवं बाजार-नियंत्रण प्रणाली को भी समाप्त कर दिया गया और जो कठोर कानून बनाये गये थे, उन्हें समाप्त कर दिया गया। इससे जनता को अपार हर्ष तथा संतोष हुआ।

मुबारक खिलजी भोग-विलास में लिप्त रहनेवाला प्राणी था। उसे नग्न स्त्री-पुरुषों की संगत बहुत पसंद थी। अपनी इसी संगत के कारण वह कभी-कभी राज्य-दरबार में स्त्री का वस्त्र पहनकर आ जाता था। बरनी के अनुसार मुबारक खिलजी कभी-कभी नग्न होकर दरबारियों के बीच दौड़ा करता था। वह अपना सारा समय सुरा और सुंदरियों में व्यतीत करने लगा। उसने सुल्तान की प्रतिष्ठा के प्रतिकूल अपना सारा राजकार्य खुसरव खाँ को प्रधानमंत्री बनाकर उसके ऊपर छोड़ दिया।

खिलजी वंश का अंत

खुसरव खाँ एक निम्न वर्ग का गुजराती (बरई) था, जिसने अपना धर्म-परिवर्तन कर लिया था। वह कुतुबुद्दीन मुबारक खिलजी को हटाकर स्वयं सुल्तान बनना चाहता था, इसलिए खुसरव खाँ ने 15 अप्रैल, 1320 ई. में छुरा भोंककर मुबारकशाह खिलजी की हत्या कर दी और स्वयं नासिरुद्दीन खुसरवशाह की उपाधि धारण कर दिल्ली सल्तनत का सुल्तान बन गया।

सीमांत क्षेत्र के शक्तिशाली शासक गाजी तुगलक ने खुसरव का विरोध किया तथा अन्य प्रांतीय अधिकारियो से सहायता माँगी। उसने खुसरव खाँ पर इस्लाम-विरोधी आचरण, अलाउद्दीन के वंश के प्रति विश्वासघात और अन्य अपराधों को दोष आरोपित किया। अंततः गाजी तुगलक ने दिल्ली सल्तनत पर आक्रमण किया और खुसरव खाँ को पराजित कर सत्ता पर नियंत्रण स्थापित कर लिया।

इस प्रकार विभिन्न परिस्थितियों और व्यक्तियों ने खिलजी वंश के पतन में भाग लिया, खासकर मुबारकशाह खिलजी ने। खिलजी शासकों ने रक्तपात के माध्यम से दिल्ली के सिंहासन को प्राप्त किया था और अंत में रक्तपात के द्वारा ही उनके वंश का पतन हो गया।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *